शान्ति पर्व · अध्याय 28
नारद द्वारा सृञ्जय को सोलह राजाओं की कथा
अर्जुन के कहने पर कृष्ण युधिष्ठिर के शोक को दूर करने का प्रयत्न करते हैं और बताते हैं कि मारे गए योद्धा शत्रु के सामने लड़कर वीरगति से स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं। वे वह प्राचीन कथा सुनाते हैं जिसमें नारद ने पुत्र-शोक में डूबे राजा सृञ्जय को सान्त्वना दी थी। नारद पूर्वकाल के सोलह महान् राजाओं का वर्णन करते हैं, मरुत्त, सुहोत्र, अङ्ग, शिबि, भरत, राम, भगीरथ, दिलीप, मान्धाता, ययाति, अम्बरीष, शशबिन्दु, गय, रन्तिदेव, सगर और पृथु, और उनके दिए हुए दानों तथा उनके राज्य की समृद्धि को बताते हैं; हर कथा का अन्त इसी बात से करते हैं कि जब वे भी मर गए, तब तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो। अन्त में सृञ्जय कहते हैं कि उनका शोक शान्त हुआ है और वे अपना पुत्र वापस माँगते हैं, तब नारद उस बालक को लौटाने का वचन देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.28.1)
अव्याहरति राजेन्द्रे धर्मपुत्रे युधिष्ठिरे । गुडाकेशो हृषीकेशमभ्यभाषत पाण्डवः ॥
avyāharati rājendre dharmaputre yudhiṣṭhire | guḍākeśo hṛṣīkeśamabhyabhāṣata pāṇḍavaḥ
धर्मपुत्र राजेन्द्र युधिष्ठिर के मौन हो जाने पर पाण्डव अर्जुन (गुडाकेश) ने हृषीकेश से कहा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 2 (12.28.2)
ज्ञातिशोकाभिसंतप्तो धर्मपुत्रः परंतपः । एष शोकार्णवे मग्नस्तमाश्वासय माधव ॥
jñātiśokābhisaṃtapto dharmaputraḥ paraṃtapaḥ | eṣa śokārṇave magnastamāśvāsaya mādhava
अर्जुन ने कहा — "अपने बन्धुओं के शोक से अत्यन्त सन्तप्त ये शत्रुओं को तपाने वाले धर्मपुत्र शोक के सागर में डूबे हुए हैं। हे माधव! आप इन्हें ढाढ़स बँधाइए।"
श्लोक 3 (12.28.3)
सर्वे स्म ते संशयिताः पुनरेव जनार्दन । अस्य शोकं महाप्राज्ञ प्रणाशयितुमर्हसि ॥
sarve sma te saṃśayitāḥ punareva janārdana | asya śokaṃ mahāprājña praṇāśayitumarhasi
"हे जनार्दन! हम सब फिर एक बार चिन्ता और संशय में पड़ गए हैं। हे महाप्राज्ञ! इनके शोक को आप ही दूर कर सकते हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (12.28.4)
एवमुक्तस्तु गोविन्दो विजयेन महात्मना । पर्यवर्तत राजानं पुण्डरीकेक्षणोऽच्युतः ॥
evamuktastu govindo vijayena mahātmanā | paryavartata rājānaṃ puṇḍarīkekṣaṇo'cyutaḥ
महात्मा विजय (अर्जुन) के इस प्रकार कहने पर कमलनयन अच्युत गोविन्द राजा की ओर मुड़े।
श्लोक 5 (12.28.5)
अनतिक्रमणीयो हि धर्मराजस्य केशवः । बाल्यात्प्रभृति गोविंदः प्रीत्या चाभ्यधिकोर्जुनात् ॥
anatikramaṇīyo hi dharmarājasya keśavaḥ | bālyātprabhṛti goviṃdaḥ prītyā cābhyadhikorjunāt
धर्मराज केशव की बात को कभी टाल नहीं सकते थे; बचपन से ही गोविन्द उन्हें प्रेम में अर्जुन से भी बढ़कर प्रिय थे।
श्लोक 6 (12.28.6)
संप्रगृह्य महाबाहुर्भुजं चन्दनभूषितम् । शैलस्तम्भोपमं शौरिरुवाचाभिविनोदयन् ॥
saṃpragṛhya mahābāhurbhujaṃ candanabhūṣitam | śailastambhopamaṃ śauriruvācābhivinodayan
महाबाहु शौरि ने चन्दन से सजी हुई, पत्थर के खम्भे जैसी राजा की भुजा को हाथ में लेकर उन्हें बहलाते हुए कहा।
श्लोक 7 (12.28.7)
शुशुभे वदनं तस्य सुदंष्ट्रं चारुलोचनम् । व्याकोचमिव विस्पष्टं पद्मं सूर्यविबोधितम् ॥
śuśubhe vadanaṃ tasya sudaṃṣṭraṃ cārulocanam | vyākocamiva vispaṣṭaṃ padmaṃ sūryavibodhitam
उस समय सुन्दर दाँतों और मनोहर नेत्रों वाला उनका मुख सूर्य से जगाए हुए, पूरी तरह खिले कमल के समान स्पष्ट शोभा पा रहा था।
वासुदेव उवाच
श्लोक 8 (12.28.8)
मा कृथाः पुरुषव्याघ्र शोकं त्वं गात्रशोषणम् । न हि ते सुलभा भूयो ये हताऽस्मिन्रणाजिरे ॥
mā kṛthāḥ puruṣavyāghra śokaṃ tvaṃ gātraśoṣaṇam | na hi te sulabhā bhūyo ye hatā'sminraṇājire
वासुदेव ने कहा — "हे पुरुषसिंह! शरीर को सुखा देने वाला यह शोक मत कीजिए। इस रणभूमि में जो मारे गए हैं, वे फिर सहज ही नहीं मिलते।"
श्लोक 9 (12.28.9)
स्वप्नलब्धा यथा लाभा वितथाः प्रतिबोधने । तथा ते क्षत्रिया राजन्ये व्यतीता महारणे ॥
svapnalabdhā yathā lābhā vitathāḥ pratibodhane | tathā te kṣatriyā rājanye vyatītā mahāraṇe
"जैसे स्वप्न में मिले लाभ जागने पर झूठे सिद्ध होते हैं, वैसे ही हे राजन्! महायुद्ध में जो वे क्षत्रिय चल बसे, वे अब नहीं रहे।"
श्लोक 10 (12.28.10)
सर्वे ह्यभिमुखाः शूरा निहता रणशोभिनः । नैषां कश्चित्पृष्ठतो वा पलायन्वा निपातितः ॥
sarve hyabhimukhāḥ śūrā nihatā raṇaśobhinaḥ | naiṣāṃ kaścitpṛṣṭhato vā palāyanvā nipātitaḥ
"रण की शोभा बढ़ाने वाले वे सभी शूर सामने से लड़ते हुए मारे गए। उनमें से कोई भी पीठ दिखाते हुए या भागते हुए नहीं गिराया गया।"
श्लोक 11 (12.28.11)
सर्वे त्यक्त्वाऽऽत्मनः प्राणान्युद्ध्वा वीरा महामृधे । शस्त्रपूता दिवं प्राप्ता न ताञ्छोचितुमर्हसि ॥
sarve tyaktvā''tmanaḥ prāṇānyuddhvā vīrā mahāmṛdhe | śastrapūtā divaṃ prāptā na tāñchocitumarhasi
"उन सब वीरों ने महायुद्ध में लड़कर अपने प्राण त्याग दिए और शस्त्रों से पवित्र होकर स्वर्ग को प्राप्त हुए। आपको उनके लिए शोक नहीं करना चाहिए।"
श्लोक 12 (12.28.12)
क्षत्रधर्मरताः शूरा वेदवेदाङ्गपारगाः । प्राप्ता वीरगतिं पुण्यां तान्न शोचितुमर्हसि । मृतान्महानुभावांस्त्वं श्रुत्वैव पृथिवीपतीन् ॥
kṣatradharmaratāḥ śūrā vedavedāṅgapāragāḥ | prāptā vīragatiṃ puṇyāṃ tānna śocitumarhasi | mṛtānmahānubhāvāṃstvaṃ śrutvaiva pṛthivīpatīn
"क्षत्रिय-धर्म में लगे रहने वाले, वेद-वेदाङ्गों के पारंगत वे शूर पुण्यमयी वीरगति को प्राप्त हुए हैं; आपको उनके लिए शोक नहीं करना चाहिए। उन मृत महानुभाव पृथ्वीपतियों के विषय में आप बस सुन लीजिए।"
श्लोक 13 (12.28.13)
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । सृञ्जयं पुत्रशोकार्तं यथाऽयं नारदोऽब्रवीत् ॥
atraivodāharantīmamitihāsaṃ purātanam | sṛñjayaṃ putraśokārtaṃ yathā'yaṃ nārado'bravīt
"इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, कि पुत्र-शोक से पीड़ित सृञ्जय से नारद ने किस प्रकार कहा था।"
नारद उवाच
श्लोक 14 (12.28.14)
सुखदुःखैरहं त्वं च प्रजाः सर्वाश्च सृञ्जय । अविमुक्ता मरिष्यामस्तत्र का परिदेवना ॥
sukhaduḥkhairahaṃ tvaṃ ca prajāḥ sarvāśca sṛñjaya | avimuktā mariṣyāmastatra kā paridevanā
नारद ने कहा — "हे सृञ्जय! मैं, तुम और सारी प्रजाएँ सुख-दुःख से मुक्त नहीं हैं और सभी मरेंगे; फिर विलाप किसलिए?"
श्लोक 15 (12.28.15)
महाभाग्यं पुरा राज्ञां कीर्त्यमानं मया शृणु । गच्छावधानं नृपते ततो दुःखं प्रहास्यसि ॥
mahābhāgyaṃ purā rājñāṃ kīrtyamānaṃ mayā śṛṇu | gacchāvadhānaṃ nṛpate tato duḥkhaṃ prahāsyasi
"पूर्वकाल के राजाओं की महिमा, जो मैं कहता हूँ, उसे सुनो। हे नरपति! ध्यान दो, तब तुम दुःख को त्याग दोगे।"
श्लोक 16 (12.28.16)
मृतान्महानुभावांस्त्वं श्रुत्वैव पृथिवीपतीन् । शममानय संतापं शृणु विस्तरशश्च मे । क्रूरग्रहाभिशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥
mṛtānmahānubhāvāṃstvaṃ śrutvaiva pṛthivīpatīn | śamamānaya saṃtāpaṃ śṛṇu vistaraśaśca me | krūragrahābhiśamanamāyurvardhanamuttamam
"मृत महानुभाव पृथ्वीपतियों के विषय में सुनकर अपने सन्ताप को शान्त करो, और मुझसे विस्तार से सुनो। यह वृत्तान्त क्रूर ग्रहों को शान्त करने वाला और आयु बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।"
श्लोक 17 (12.28.17)
अग्रिमाणां क्षितिभुजामुदारं च मनोहरम् । आविक्षितं मरुत्तं च मृतं सृञ्जय शुश्रुम ॥
agrimāṇāṃ kṣitibhujāmudāraṃ ca manoharam | āvikṣitaṃ maruttaṃ ca mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma
"पृथ्वी के अग्रगण्य राजाओं का यह वर्णन उदार और मनोहर है। हे सृञ्जय! हमने सुना है कि अविक्षित के पुत्र मरुत्त भी मर गए।"
श्लोक 18 (12.28.18)
यस्य सेन्द्राः सवरुणा बृहस्पतिपुरोगमाः । देवा विश्वसृजो राज्ञो यज्ञमीयुर्महात्मनः ॥
yasya sendrāḥ savaruṇā bṛhaspatipurogamāḥ | devā viśvasṛjo rājño yajñamīyurmahātmanaḥ
"उन महात्मा राजा के यज्ञ में इन्द्र, वरुण और बृहस्पति के सहित जगत् की रचना करने वाले देवता आए थे;"
श्लोक 19 (12.28.19)
यः स्पर्धामानयच्छक्रं देवराजं पुरंदरम् । शक्रप्रियैषी यं विद्वान्प्रत्याचष्ट बृहस्पतिः ॥
yaḥ spardhāmānayacchakraṃ devarājaṃ puraṃdaram | śakrapriyaiṣī yaṃ vidvānpratyācaṣṭa bṛhaspatiḥ
"जिसने देवराज पुरन्दर इन्द्र से होड़ की, और इन्द्र का हित चाहने वाले विद्वान् बृहस्पति ने जिसका यज्ञ कराने से मना कर दिया;"
श्लोक 20 (12.28.20)
संवर्तो याजयामास यं पीडार्थं बृहस्पतेः ॥
saṃvarto yājayāmāsa yaṃ pīḍārthaṃ bṛhaspateḥ
"और तब बृहस्पति को कष्ट पहुँचाने के लिए संवर्त ने जिसका यज्ञ कराया।"
श्लोक 21 (12.28.21)
यस्मिन्प्रशासति महीं नृपतौ राजसत्तम । अकृष्टपच्या पृथिवी विबभौ सस्यमालिनी ॥
yasminpraśāsati mahīṃ nṛpatau rājasattama | akṛṣṭapacyā pṛthivī vibabhau sasyamālinī
"हे राजाओं में श्रेष्ठ! उस राजा के पृथ्वी पर शासन करते समय धरती बिना जोते ही अन्न उपजाती हुई, फसलों की माला पहने-सी सुशोभित होती थी।"
श्लोक 22 (12.28.22)
आविक्षितस्य वै सत्रे विश्वेदेवाः सभासदः । मरुतः परिवेष्टारः साध्याश्चासन्महात्मनः ॥
āvikṣitasya vai satre viśvedevāḥ sabhāsadaḥ | marutaḥ pariveṣṭāraḥ sādhyāścāsanmahātmanaḥ
"अविक्षित-पुत्र उन महात्मा के यज्ञ में विश्वेदेव सभासद थे, मरुद्गण परोसने वाले थे, और साध्य भी उपस्थित थे।"
श्लोक 23 (12.28.23)
मरुद्गणा मरुत्तस्य यत्सोममपिबंस्ततः । देवान्मनुष्यान्गन्धर्वानत्यरिच्यन्त दक्षिणाः ॥
marudgaṇā maruttasya yatsomamapibaṃstataḥ | devānmanuṣyāngandharvānatyaricyanta dakṣiṇāḥ
"जब मरुद्गणों ने मरुत्त का सोम पिया, तब उस यज्ञ की दक्षिणाएँ देवताओं, मनुष्यों और गन्धर्वों की दक्षिणाओं से भी बढ़ गईं।"
श्लोक 24 (12.28.24)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
"हे सृञ्जय! यदि वे भी मर गए, जो तुमसे चौगुने कल्याणमय थे और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यात्मा थे, तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।"
श्लोक 25 (12.28.25)
सुहोत्रं च वैतिथिनं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । यस्मै हिरण्यं ववृषे मघवा परिवत्सरम् ॥
suhotraṃ ca vaitithinaṃ mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | yasmai hiraṇyaṃ vavṛṣe maghavā parivatsaram
"हे सृञ्जय! हमने सुना है कि वितिथिवंशी सुहोत्र भी मर गए, जिन पर इन्द्र ने पूरे एक वर्ष तक सोने की वर्षा की थी।"
श्लोक 26 (12.28.26)
सत्यनामा वसुमती यं प्राप्यासीञ्जनाधिपम् । हिरण्यमवहन्नद्यस्तस्मिञ्जनपदेश्वरे ॥
satyanāmā vasumatī yaṃ prāpyāsīñjanādhipam | hiraṇyamavahannadyastasmiñjanapadeśvare
"उन जनपदेश्वर को पाकर पृथ्वी सचमुच 'वसुमती' नाम वाली हो गई; उनके राज्य में नदियाँ सोना बहाकर लाती थीं।"
श्लोक 27 (12.28.27)
मत्स्यान्कर्कटकान्नक्रान्मकराञ्छिंशुकानपि । नदीष्ववासृजद्राजन्मघवा लोकपूजितः ॥
matsyānkarkaṭakānnakrānmakarāñchiṃśukānapi | nadīṣvavāsṛjadrājanmaghavā lokapūjitaḥ
"हे राजन्! लोकपूजित इन्द्र ने नदियों में मछलियाँ, केकड़े, घड़ियाल, मकर और सूँस बरसाए।"
श्लोक 28 (12.28.28)
हैरण्यान्पातितान्दृष्ट्वा मत्स्यान्मकरकच्छपान् । सहस्रशोऽथ शतशस्ततोऽस्मयत वैतिथिः ॥
hairaṇyānpātitāndṛṣṭvā matsyānmakarakacchapān | sahasraśo'tha śataśastato'smayata vaitithiḥ
"वहाँ सैकड़ों-हजारों की संख्या में गिरी हुई सोने की मछलियों, मकरों और कछुओं को देखकर वैतिथि मुस्कराए।"
श्लोक 29 (12.28.29)
तद्धिरण्यमपर्यन्तमावृतं कुरुजाङ्गले । ईजानो वितते यज्ञे ब्राह्मणेभ्यः समार्पयत् ॥
taddhiraṇyamaparyantamāvṛtaṃ kurujāṅgale | ījāno vitate yajñe brāhmaṇebhyaḥ samārpayat
"कुरुजाङ्गल देश में फैला हुआ वह असीम सोना उन्होंने अपने विशाल यज्ञ में यजन करते हुए ब्राह्मणों को दे दिया।"
श्लोक 30 (12.28.30)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः । अदक्षिणमयज्वानं श्वैत्य संशाम्य माशुचः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ | adakṣiṇamayajvānaṃ śvaitya saṃśāmya māśucaḥ
"हे सृञ्जय! यदि वे भी मर गए, जो तुमसे चौगुने कल्याणमय थे और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यात्मा थे, तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो। हे श्वैत्य! जिसने न दक्षिणा दी और न यज्ञ किया, उसके लिए शान्त हो जाओ, शोक मत करो।"
श्लोक 31 (12.28.31)
अङ्गं बृहद्रथं चैव मृतं सृञ्जय शुश्रुम । यः सहस्रं सहस्राणां श्वेतानश्वानवासृजत् ॥
aṅgaṃ bṛhadrathaṃ caiva mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | yaḥ sahasraṃ sahasrāṇāṃ śvetānaśvānavāsṛjat
"हे सृञ्जय! हमने सुना है कि अङ्ग बृहद्रथ भी मर गए, जिन्होंने दस लाख श्वेत घोड़े दान किए,"
श्लोक 32 (12.28.32)
सहस्रं च सहस्राणां कन्या हेमपरिष्कृताः । ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् ॥
sahasraṃ ca sahasrāṇāṃ kanyā hemapariṣkṛtāḥ | ījāno vitate yajñe dakṣiṇāmatyakālayat
"और सोने से सजी दस लाख कन्याएँ; अपने विशाल यज्ञ में उन्होंने इन्हें दक्षिणा में दे दिया।"
श्लोक 33 (12.28.33)
यः सहस्रं सहस्राणां गजानां पद्ममालिनाम् । ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् ॥
yaḥ sahasraṃ sahasrāṇāṃ gajānāṃ padmamālinām | ījāno vitate yajñe dakṣiṇāmatyakālayat
"अपने विशाल यज्ञ में उन्होंने कमल की मालाएँ पहने दस लाख हाथी दक्षिणा में दिए,"
श्लोक 34 (12.28.34)
शतं शतसहस्राणि वृषाणां हेममालिनाम् । गवां सहस्रानुचरं दक्षिणामत्यकालयत् ॥
śataṃ śatasahasrāṇi vṛṣāṇāṃ hemamālinām | gavāṃ sahasrānucaraṃ dakṣiṇāmatyakālayat
"और सोने की मालाओं वाले सौ गुना सौ हजार बैल, प्रत्येक के पीछे एक हजार गायों सहित; यह सब उन्होंने दक्षिणा में दिया।"
श्लोक 35 (12.28.35)
अङ्गस्य यजमानस्य तदा विष्णुपदे गिरौ । अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः ॥
aṅgasya yajamānasya tadā viṣṇupade girau | amādyadindraḥ somena dakṣiṇābhirdvijātayaḥ
"विष्णुपद पर्वत पर यजमान अङ्ग के उस यज्ञ में इन्द्र सोमरस से आनन्दित हुए और ब्राह्मण दक्षिणाओं से।"
श्लोक 36 (12.28.36)
यस्य यज्ञेषु राजेन्द्र शतसङ्ख्येषु वै पुरा । देवान्मनुष्यान्गन्धर्वानत्यरिच्यन्त दक्षिणाः ॥
yasya yajñeṣu rājendra śatasaṅkhyeṣu vai purā | devānmanuṣyāngandharvānatyaricyanta dakṣiṇāḥ
"हे राजेन्द्र! पूर्वकाल में उनके सैकड़ों यज्ञों में दक्षिणाएँ देवताओं, मनुष्यों और गन्धर्वों की दक्षिणाओं से भी बढ़ गई थीं।"
श्लोक 37 (12.28.37)
न जातो जनिता नान्यः पुमान्यः संप्रदास्यति । यदङ्गः प्रददौ वित्तं सोमसंस्थासु सप्तसु ॥
na jāto janitā nānyaḥ pumānyaḥ saṃpradāsyati | yadaṅgaḥ pradadau vittaṃ somasaṃsthāsu saptasu
"अङ्ग ने सात सोमयज्ञों में जितना धन दिया, उतना देने वाला न कोई मनुष्य हुआ है, न आगे कोई देगा।"
श्लोक 38 (12.28.38)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
"हे सृञ्जय! यदि वे भी मर गए, जो तुमसे चौगुने कल्याणमय थे और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यात्मा थे, तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।"
श्लोक 39 (12.28.39)
शिबिमौशीनरं चैव मृतं सृञ्जय शुश्रुम । य इमां पृथिवीं सर्वां चर्मवत्समवेष्टयत् ॥
śibimauśīnaraṃ caiva mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | ya imāṃ pṛthivīṃ sarvāṃ carmavatsamaveṣṭayat
"हे सृञ्जय! हमने सुना है कि उशीनर-पुत्र शिबि भी मर गए, जिन्होंने इस सारी पृथ्वी को चमड़े की तरह ढक लिया था।"
श्लोक 40 (12.28.40)
महता रथघोषेण पृथिवीमनुनादयन् । एकच्छत्रां महीं चक्रे जैत्रेणैकरथेन यः ॥
mahatā rathaghoṣeṇa pṛthivīmanunādayan | ekacchatrāṃ mahīṃ cakre jaitreṇaikarathena yaḥ
"रथ की भारी घरघराहट से पृथ्वी को गुँजाते हुए उन्होंने एक ही विजयी रथ से सारी भूमि को एक छत्र के अधीन कर दिया।"
श्लोक 41 (12.28.41)
यावदस्य गवाश्वं स्यादारण्यैः पशुभिः सह । तावतीः प्रददौ गाः स शिबिरौशीनरोऽध्वरे ॥
yāvadasya gavāśvaṃ syādāraṇyaiḥ paśubhiḥ saha | tāvatīḥ pradadau gāḥ sa śibirauśīnaro'dhvare
"वन के पशुओं सहित उनके पास जितने गाय-घोड़े थे, उतनी ही गायें उशीनर-पुत्र शिबि ने यज्ञ में दान कर दीं।"
श्लोक 42 (12.28.42)
न वोढारं धुरं तस्य कंचिन्मेने प्रजापतिः । न भूतं न भविष्यं च सर्वराजसु सृञ्जय । अन्यत्रौशीनराच्छैब्याद्राजर्षेरिन्द्रविक्रमात् ॥
na voḍhāraṃ dhuraṃ tasya kaṃcinmene prajāpatiḥ | na bhūtaṃ na bhaviṣyaṃ ca sarvarājasu sṛñjaya | anyatrauśīnarācchaibyādrājarṣerindravikramāt
"प्रजापति ने उनके भार को उठाने में किसी को समर्थ नहीं माना। हे सृञ्जय! इन्द्र के समान पराक्रमी राजर्षि उशीनर-पुत्र शिबि को छोड़कर समस्त राजाओं में न कोई वैसा हुआ, न होगा।"
श्लोक 43 (12.28.43)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
"हे सृञ्जय! यदि वे भी मर गए, जो तुमसे चौगुने कल्याणमय थे और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यात्मा थे, तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।"
श्लोक 44 (12.28.44)
अदक्षिणमयज्वानं पुत्रं संस्मृत्य मा शुचः ॥
adakṣiṇamayajvānaṃ putraṃ saṃsmṛtya mā śucaḥ
"जिसने न दक्षिणा दी और न यज्ञ किया, अपने उस पुत्र को भी स्मरण करके शोक मत करो।"
श्लोक 45 (12.28.45)
भरतं चैव दौष्यन्तिं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । शाकुन्तलं महात्मानं भूरिद्रविणतेजसम् ॥
bharataṃ caiva dauṣyantiṃ mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | śākuntalaṃ mahātmānaṃ bhūridraviṇatejasam
"हे सृञ्जय! हमने सुना है कि दुष्यन्त-पुत्र भरत भी मर गए, शकुन्तला के वे महात्मा पुत्र, जो प्रचुर धन और तेज से सम्पन्न थे,"
श्लोक 46 (12.28.46)
योऽबध्नात्त्रिंशतं चाश्वान्देवेभ्यो यमुनामनु । सरस्वतीं विंशतिं च गङ्गामनु चतुर्दश ॥
yo'badhnāttriṃśataṃ cāśvāndevebhyo yamunāmanu | sarasvatīṃ viṃśatiṃ ca gaṅgāmanu caturdaśa
"जिन्होंने देवताओं के लिए यमुना के तट पर तीस, सरस्वती के तट पर बीस और गङ्गा के तट पर चौदह घोड़े बाँधे।"
श्लोक 47 (12.28.47)
अश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च । इष्टवान्स महातेजा दौष्यन्तिर्भरतः पुरा ॥
aśvamedhasahasreṇa rājasūyaśatena ca | iṣṭavānsa mahātejā dauṣyantirbharataḥ purā
"दुष्यन्त-पुत्र महातेजस्वी भरत ने पूर्वकाल में एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ किए थे।"
श्लोक 48 (12.28.48)
भरतस्य महत्कर्म सर्वराजसु पार्थिवाः । खं मर्त्या इव बाहुभ्यां नानुगन्तुमशक्नुवन् ॥
bharatasya mahatkarma sarvarājasu pārthivāḥ | khaṃ martyā iva bāhubhyāṃ nānugantumaśaknuvan
"सब राजाओं के बीच भरत के उस महान् कर्म का अनुसरण दूसरे राजा नहीं कर सके, जैसे मरणधर्मा मनुष्य अपनी भुजाओं से आकाश को नहीं छू सकते।"
श्लोक 49 (12.28.49)
परं सहस्राद्योऽबध्नाद्धयान्वेदीर्वितत्य च । सहस्रं यत्र पद्मानां कण्वाय भरतो ददौ ॥
paraṃ sahasrādyo'badhnāddhayānvedīrvitatya ca | sahasraṃ yatra padmānāṃ kaṇvāya bharato dadau
"उन्होंने वेदियाँ बनाकर एक हजार से भी अधिक घोड़े बाँधे; और वहीं भरत ने कण्व को एक हजार पद्म दिए।"
श्लोक 50 (12.28.50)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
"हे सृञ्जय! यदि वे भी मर गए, जो तुमसे चौगुने कल्याणमय थे और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यात्मा थे, तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।"
श्लोक 51 (12.28.51)
रामं दाशरथिं चैव मृतं सृञ्जय शुश्रुम । योऽन्वकम्पत वै नित्यं प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ॥
rāmaṃ dāśarathiṃ caiva mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | yo'nvakampata vai nityaṃ prajāḥ putrānivaurasān
"हे सृञ्जय! हमने सुना है कि दशरथ-पुत्र राम भी मर गए, जो अपनी प्रजा पर सगे पुत्रों के समान सदा दया करते थे।"
श्लोक 52 (12.28.52)
नाधनो यस्य विषये नानर्थः कस्यचिद्भवेत् । सर्वस्यासीत्पितृसमो रामो राज्यं यदन्वशात् ॥
nādhano yasya viṣaye nānarthaḥ kasyacidbhavet | sarvasyāsītpitṛsamo rāmo rājyaṃ yadanvaśāt
"उनके राज्य में न कोई निर्धन था, न किसी पर विपत्ति आती थी; राज्य का शासन करते हुए राम सबके लिए पिता के समान थे।"
श्लोक 53 (12.28.53)
कालवर्षी च पर्जन्यः सस्यानि समपादयत् । नित्यं सुभिक्षमेवासीद्रामे राज्यं प्रशासति ॥
kālavarṣī ca parjanyaḥ sasyāni samapādayat | nityaṃ subhikṣamevāsīdrāme rājyaṃ praśāsati
"मेघ समय पर बरसता और फसलें उपजाता था; राम के राज्य करते समय सदा सुकाल ही रहा।"
श्लोक 54 (12.28.54)
प्राणिनो नाप्सु मञ्जन्ति नानर्थे पावकोऽदहत् । न व्यालतो भयं चासीद्रामे राज्यं प्रशासति ॥
prāṇino nāpsu mañjanti nānarthe pāvako'dahat | na vyālato bhayaṃ cāsīdrāme rājyaṃ praśāsati
"राम के राज्य करते समय प्राणी जल में नहीं डूबते थे, अग्नि बिना कारण नहीं जलाती थी, और हिंसक जीवों से भय नहीं था।"
श्लोक 55 (12.28.55)
आसन्वर्षसहस्रिण्यस्तथा वर्षसहस्रकाः । अरोगाः सर्वसिद्धार्था रामे राज्यं प्रशासति ॥
āsanvarṣasahasriṇyastathā varṣasahasrakāḥ | arogāḥ sarvasiddhārthā rāme rājyaṃ praśāsati
"स्त्रियाँ हजार वर्ष जीती थीं और पुरुष भी हजार वर्ष; सब नीरोग रहते और सबके मनोरथ सिद्ध होते थे, जब राम राज्य करते थे।"
श्लोक 56 (12.28.56)
नान्योन्येन विवादोऽभूत्स्त्रीणामपि कुतो नृणाम् । धर्मनित्याः प्रजाश्चासन्रामे राज्यं प्रशासति ॥
nānyonyena vivādo'bhūtstrīṇāmapi kuto nṛṇām | dharmanityāḥ prajāścāsanrāme rājyaṃ praśāsati
"आपस में विवाद नहीं होता था, स्त्रियों में भी नहीं, फिर पुरुषों की तो बात ही क्या; राम के राज्य करते समय प्रजा सदा धर्म में लगी रहती थी।"
श्लोक 57 (12.28.57)
संतुष्टाः सर्वसिद्धार्था निर्भयाः स्वैरचारिणः । नराः सत्यव्रताश्चासन्रामे राज्यं प्रशासति ॥
saṃtuṣṭāḥ sarvasiddhārthā nirbhayāḥ svairacāriṇaḥ | narāḥ satyavratāścāsanrāme rājyaṃ praśāsati
"राम के राज्य करते समय लोग सन्तुष्ट, सफल मनोरथ, निर्भय, स्वेच्छा से विचरने वाले और सत्य-व्रत का पालन करने वाले थे।"
श्लोक 58 (12.28.58)
नित्यपुष्पफलाश्चैव पादपा निरुपद्रवाः । सर्वा द्रोणदुघा गावो रामे राज्यं प्रशासति ॥
nityapuṣpaphalāścaiva pādapā nirupadravāḥ | sarvā droṇadughā gāvo rāme rājyaṃ praśāsati
"राम के राज्य करते समय वृक्ष सदा फूलों-फलों से लदे और उपद्रवरहित रहते थे, और सभी गायें द्रोण भर दूध देती थीं।"
श्लोक 59 (12.28.59)
स चतुर्दश वर्षाणि वने प्रोष्य महातपाः । दशाश्वमेधाञ्जारूथ्यानाजहार निरर्गलान् ॥
sa caturdaśa varṣāṇi vane proṣya mahātapāḥ | daśāśvamedhāñjārūthyānājahāra nirargalān
"उन महातपस्वी ने चौदह वर्ष वन में बिताकर जारूथ्य नामक दस अश्वमेध यज्ञ किए, जिनके द्वार सबके लिए खुले थे।"
श्लोक 60 (12.28.60)
युवा श्यामो लोहिताक्षो मातङ्ग इव यूथपः । आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ॥
yuvā śyāmo lohitākṣo mātaṅga iva yūthapaḥ | ājānubāhuḥ sumukhaḥ siṃhaskandho mahābhujaḥ
"वे युवा, श्यामवर्ण और लाल नेत्रों वाले थे, यूथपति गजराज के समान; उनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी थीं, मुख सुन्दर था, कन्धे सिंह के जैसे और भुजाएँ विशाल थीं,"
श्लोक 61 (12.28.61)
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । अयोध्याधिपतिर्भूत्वा रामो राज्यमकारयत् ॥
daśavarṣasahasrāṇi daśavarṣaśatāni ca | ayodhyādhipatirbhūtvā rāmo rājyamakārayat
"दस हजार वर्ष और दस सौ वर्ष तक अयोध्या के अधिपति बनकर राम ने राज्य किया।"
श्लोक 62 (12.28.62)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः । अयज्वानमदक्षिण्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ | ayajvānamadakṣiṇyaṃ mā putramanutapyathāḥ
"हे सृञ्जय! यदि वे भी मर गए, जो तुमसे चौगुने कल्याणमय थे और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यात्मा थे, तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो। जिसने न यज्ञ किया और न दक्षिणा दी, उस पुत्र के लिए शोक मत करो।"
श्लोक 63 (12.28.63)
भगीरथं च राजानं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । यस्येन्द्रो वितते यज्ञे सोमं पीत्वा मदोत्कटः ॥
bhagīrathaṃ ca rājānaṃ mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | yasyendro vitate yajñe somaṃ pītvā madotkaṭaḥ
"हे सृञ्जय! हमने सुना है कि राजा भगीरथ भी मर गए, जिनके विशाल यज्ञ में सोम पीकर मद से उन्मत्त हुए"
श्लोक 64 (12.28.64)
असुराणां सहस्राणि बहूनि सुरसत्तमः । अजयद्वाहुवीर्येण भगवान्पाकशासनः ॥
asurāṇāṃ sahasrāṇi bahūni surasattamaḥ | ajayadvāhuvīryeṇa bhagavānpākaśāsanaḥ
"देवश्रेष्ठ भगवान् पाकशासन (इन्द्र) ने अपनी भुजाओं के बल से हजारों असुरों को जीत लिया।"
श्लोक 65 (12.28.65)
यः सहस्रं सहस्राणां कन्या हेमविभूषिताः । ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् ॥
yaḥ sahasraṃ sahasrāṇāṃ kanyā hemavibhūṣitāḥ | ījāno vitate yajñe dakṣiṇāmatyakālayat
"अपने विशाल यज्ञ में उन्होंने सोने से सजी दस लाख कन्याएँ दक्षिणा में दीं।"
श्लोक 66 (12.28.66)
सर्वा रथगताः कन्या रथाः सर्वे चतुर्युजः । शतंशतं रथे नागाः पद्मिनो हेममालिनः ॥
sarvā rathagatāḥ kanyā rathāḥ sarve caturyujaḥ | śataṃśataṃ rathe nāgāḥ padmino hemamālinaḥ
"सब कन्याएँ रथों पर सवार थीं और सभी रथ चार घोड़ों वाले थे; प्रत्येक रथ के साथ सैकड़ों-सैकड़ों हाथी थे, जो कमल-चिह्नों से युक्त और सोने की मालाएँ पहने थे।"
श्लोक 67 (12.28.67)
सहस्रमश्वा एकैकं हस्तिनं पृष्ठतोऽन्वयुः । गवां सहस्रमश्वेऽश्वे सहस्रं गव्यजाविकम् ॥
sahasramaśvā ekaikaṃ hastinaṃ pṛṣṭhato'nvayuḥ | gavāṃ sahasramaśve'śve sahasraṃ gavyajāvikam
"प्रत्येक हाथी के पीछे एक हजार घोड़े चलते थे; प्रत्येक घोड़े के साथ एक हजार गायें थीं, और एक हजार बकरियाँ-भेड़ें भी।"
श्लोक 68 (12.28.68)
उपह्वरे निवसतो यस्याङ्के निषसाद ह । गङ्गा भागीरथी तस्मादुर्वशी चाभवत्पुरा ॥
upahvare nivasato yasyāṅke niṣasāda ha | gaṅgā bhāgīrathī tasmādurvaśī cābhavatpurā
"उपह्वर में रहते हुए जिनकी गोद में भागीरथी गङ्गा आ बैठी थीं; इसी कारण पूर्वकाल में वे उर्वशी भी कहलाईं।"
श्लोक 69 (12.28.69)
भूरिदक्षिणमिक्ष्वाकुं यजमानं भगीरथम् । त्रिलोकपथगा गङ्गा दुहितृत्वमुपेयुषी ॥
bhūridakṣiṇamikṣvākuṃ yajamānaṃ bhagīratham | trilokapathagā gaṅgā duhitṛtvamupeyuṣī
"प्रचुर दक्षिणा देने वाले यज्ञकर्ता इक्ष्वाकुवंशी भगीरथ की पुत्री बनना तीनों लोकों में बहने वाली गङ्गा ने स्वीकार किया।"
श्लोक 70 (12.28.70)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
"हे सृञ्जय! यदि वे भी मर गए, जो तुमसे चौगुने कल्याणमय थे और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यात्मा थे, तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।"
श्लोक 71 (12.28.71)
दिलीपं च महात्मानं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । यस्य कर्माणि भूरीणि कथयन्ति द्विजातयः ॥
dilīpaṃ ca mahātmānaṃ mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | yasya karmāṇi bhūrīṇi kathayanti dvijātayaḥ
"हे सृञ्जय! हमने सुना है कि महात्मा दिलीप भी मर गए, जिनके अनेक कर्मों का ब्राह्मण वर्णन करते हैं,"
श्लोक 72 (12.28.72)
य इमां वसुसंपूर्णां वसुधां वसुधाधिपः । ददौ तस्मिन्महायज्ञे ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ॥
ya imāṃ vasusaṃpūrṇāṃ vasudhāṃ vasudhādhipaḥ | dadau tasminmahāyajñe brāhmaṇebhyaḥ samāhitaḥ
"जिन पृथ्वीपति ने एकाग्र मन से इस धन से भरी पृथ्वी को उस महायज्ञ में ब्राह्मणों को दे दिया।"
श्लोक 73 (12.28.73)
यस्येह यजमानस्य यज्ञेयज्ञे पुरोहितः । सहस्रं वारणान्हैमान्दक्षिणामत्यकालयत् ॥
yasyeha yajamānasya yajñeyajñe purohitaḥ | sahasraṃ vāraṇānhaimāndakṣiṇāmatyakālayat
"यहाँ यज्ञ करते हुए उन राजा के प्रत्येक यज्ञ में पुरोहित ने एक हजार सोने के हाथी दक्षिणा में बाँटे।"
श्लोक 74 (12.28.74)
यस्य यज्ञे महानासीद्यूपः श्रीमान्हिरण्मयः । ते देवाः कर्म कुर्वाणाः शक्रज्येष्ठा उपासत ॥
yasya yajñe mahānāsīdyūpaḥ śrīmānhiraṇmayaḥ | te devāḥ karma kurvāṇāḥ śakrajyeṣṭhā upāsata
"उनके यज्ञ में सोने का एक विशाल और शोभायमान यूप खड़ा था, और इन्द्र को अग्रणी मानने वाले देवता अपने-अपने कर्म करते हुए वहाँ उपस्थित रहे।"
श्लोक 75 (12.28.75)
चषाले यस्य सौवर्णे तस्मिन्यूपे हिरण्मये । ननृतुर्देवगन्धर्वाः षट्सहस्राणि सप्तधा ॥
caṣāle yasya sauvarṇe tasminyūpe hiraṇmaye | nanṛturdevagandharvāḥ ṣaṭsahasrāṇi saptadhā
"उनके सोने के यूप की सोने की चषाल (शीर्ष-वलय) पर छह हजार देवता और गन्धर्व सात स्वरों के अनुसार नाचे।"
श्लोक 76 (12.28.76)
अवादयत्तत्र वीणां मध्ये विश्वावसुः स्वयम् । सर्वभूतान्यमन्यन्त मम वादयतीत्ययम् ॥
avādayattatra vīṇāṃ madhye viśvāvasuḥ svayam | sarvabhūtānyamanyanta mama vādayatītyayam
वहाँ सभा के बीच स्वयं विश्वावसु ने वीणा बजाई, और सब प्राणी यही समझते रहे कि "यह मेरे ही लिए बजा रहा है।"
श्लोक 77 (12.28.77)
एतद्राज्ञो दिलीपस्य राजानो नानुचक्रिरे । यस्येभा हेमसंछन्नाः पथि मत्ताः स्म शेरते ॥
etadrājño dilīpasya rājāno nānucakrire | yasyebhā hemasaṃchannāḥ pathi mattāḥ sma śerate
राजा दिलीप के इस कर्म की बराबरी दूसरे राजा नहीं कर सके; उसके राज्य में सोने से ढके मतवाले हाथी मार्गों पर पड़े रहते थे।
श्लोक 78 (12.28.78)
राजानं शतधन्वानं दिलीपं सत्यवादिनम् । येऽपश्यन्सुमहात्मानं तेऽपि स्वर्गजितो नराः ॥
rājānaṃ śatadhanvānaṃ dilīpaṃ satyavādinam | ye'paśyansumahātmānaṃ te'pi svargajito narāḥ
सौ धनुषों के स्वामी, सत्यवादी राजा दिलीप को, उस महात्मा को, जिन मनुष्यों ने केवल देखा, वे भी स्वर्ग के अधिकारी हो गए।
श्लोक 79 (12.28.79)
त्रयः शब्दा न जीर्यन्ते दिलीपस्य निवेशने । स्वाध्यायशब्दः ज्याशब्दः शब्दो वै दीयतामिति ॥
trayaḥ śabdā na jīryante dilīpasya niveśane | svādhyāyaśabdaḥ jyāśabdaḥ śabdo vai dīyatāmiti
दिलीप के घर में तीन ध्वनियाँ कभी बन्द नहीं होती थीं: वेदपाठ की ध्वनि, धनुष की डोरी की टंकार, और "दिया जाए" की पुकार।
श्लोक 80 (12.28.80)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
यदि वह भी मर गया, सृञ्जय — जो चार कल्याणों में तुमसे बढ़कर था और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यवान था — तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।
श्लोक 81 (12.28.81)
मान्धातारं यौवनाश्वं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । यं देवा मरुतो गर्भं पितुः पार्श्वादपाहरन् ॥
māndhātāraṃ yauvanāśvaṃ mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | yaṃ devā maruto garbhaṃ pituḥ pārśvādapāharan
हमने सुना है कि युवनाश्व के पुत्र मान्धाता भी मर गए, सृञ्जय — जिन्हें देवताओं और मरुतों ने गर्भ में ही पिता की कोख से निकाल लिया था।
श्लोक 82 (12.28.82)
समृद्धो युवनाश्वस्य जठरे यो महात्मनः । पृषदाज्योद्भवः श्रीमांस्त्रिलोकविजयी नृपः ॥
samṛddho yuvanāśvasya jaṭhare yo mahātmanaḥ | pṛṣadājyodbhavaḥ śrīmāṃstrilokavijayī nṛpaḥ
वे महात्मा युवनाश्व के उदर में बढ़े थे; दही मिले घी से उत्पन्न वे तेजस्वी राजा तीनों लोकों के विजेता हुए।
श्लोक 83 (12.28.83)
यं दृष्ट्वा पितुरुत्सङ्गे शयानं देवरूपिणम् । अन्योन्यमब्रुवन्देवाः कमयं धास्यतीति वै ॥
yaṃ dṛṣṭvā piturutsaṅge śayānaṃ devarūpiṇam | anyonyamabruvandevāḥ kamayaṃ dhāsyatīti vai
पिता की गोद में लेटे हुए उस देवरूप बालक को देखकर देवता आपस में कहने लगे, "यह किसका दूध पिएगा?"
श्लोक 84 (12.28.84)
मामेव धास्यतीत्येवमिन्द्रोऽथाभ्युपपद्यत । मांधातेति ततस्तस्य नाम चक्रे शतक्रतुः ॥
māmeva dhāsyatītyevamindro'thābhyupapadyata | māṃdhāteti tatastasya nāma cakre śatakratuḥ
"यह मेरा ही दूध पिएगा" — यह कहकर इन्द्र आगे आए; इसीलिए शतक्रतु ने उसका नाम मान्धाता रखा।
श्लोक 85 (12.28.85)
ततस्तु पयसो धारां पुष्टिहेतोर्महात्मनः । तस्यास्ये यौवनाश्वस्य पाणिरिन्द्रस्य चास्रवत् ॥
tatastu payaso dhārāṃ puṣṭihetormahātmanaḥ | tasyāsye yauvanāśvasya pāṇirindrasya cāsravat
तब उस महात्मा की पुष्टि के लिए इन्द्र के हाथ से दूध की धारा यौवनाश्व के मुख में बहने लगी।
श्लोक 86 (12.28.86)
तं पिवन्पाणिमिन्द्रस्य शतमह्ना व्यवर्धत । स आसीद्द्वादशसमो द्वादशाहेन पार्थिवः ॥
taṃ pivanpāṇimindrasya śatamahnā vyavardhata | sa āsīddvādaśasamo dvādaśāhena pārthivaḥ
इन्द्र के हाथ से पीते हुए वह एक ही दिन में सौ गुना बढ़ गया, और बारह दिन में वह राजा बारह वर्ष के बराबर हो गया।
श्लोक 87 (12.28.87)
तमिमं पृथिवी सर्वा एकाह्ना समपद्यत । धर्मात्मानं महात्मानं शूरमिन्द्रसमं युधि ॥
tamimaṃ pṛthivī sarvā ekāhnā samapadyata | dharmātmānaṃ mahātmānaṃ śūramindrasamaṃ yudhi
एक ही दिन में सारी पृथ्वी उसके अधीन हो गई — उस धर्मात्मा, महात्मा, युद्ध में इन्द्र के समान शूरवीर के।
श्लोक 88 (12.28.88)
यश्चाङ्गारं तु नृपतिं मरुत्तमसितं गयम् । अङ्गं बृहद्रथं चैव मान्धाता समरेऽजयत् ॥
yaścāṅgāraṃ tu nṛpatiṃ maruttamasitaṃ gayam | aṅgaṃ bṛhadrathaṃ caiva māndhātā samare'jayat
मान्धाता ने युद्ध में राजा अङ्गार, मरुत्त, असित, गय, अङ्ग और बृहद्रथ को जीत लिया।
श्लोक 89 (12.28.89)
यौवनाश्वो यदाङ्गारं समरे प्रत्ययुध्यत । विस्फारैर्धनुषो देवा द्यौरभेदीति मेनिरे ॥
yauvanāśvo yadāṅgāraṃ samare pratyayudhyata | visphārairdhanuṣo devā dyaurabhedīti menire
जब यौवनाश्व युद्ध में अङ्गार के सामने डटा, तब उसके धनुष की टंकार सुनकर देवताओं ने समझा कि आकाश फट गया।
श्लोक 90 (12.28.90)
यत्र सूर्य उदेति स्म यत्र च प्रतितिष्ठति । सर्वं तद्यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥
yatra sūrya udeti sma yatra ca pratitiṣṭhati | sarvaṃ tadyauvanāśvasya māndhātuḥ kṣetramucyate
जहाँ से सूर्य उदय होता है और जहाँ वह अस्त होता है, वह सारा प्रदेश युवनाश्व-पुत्र मान्धाता का क्षेत्र कहलाता है।
श्लोक 91 (12.28.91)
अश्वमेधशतेनेष्ट्वा राजसूयशतेन च । अददद्रोहितान्मत्स्यान्ब्राह्मणेभ्यो विशांपते ॥
aśvamedhaśateneṣṭvā rājasūyaśatena ca | adadadrohitānmatsyānbrāhmaṇebhyo viśāṃpate
सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ करके, हे प्रजापालक, उसने ब्राह्मणों को रोहित मछलियाँ दान कीं।
श्लोक 92 (12.28.92)
हैरण्यान्योजनोत्सेधानायतान्दशयोजनम् । अतिरिक्तान्द्विजातिभ्यो व्यभजंस्त्वितरे जनाः ॥
hairaṇyānyojanotsedhānāyatāndaśayojanam | atiriktāndvijātibhyo vyabhajaṃstvitare janāḥ
वे मछलियाँ सोने की थीं, एक योजन ऊँची और दस योजन लम्बी; ब्राह्मणों से जो बच गईं, उन्हें दूसरे लोगों ने आपस में बाँट लिया।
श्लोक 93 (12.28.93)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
यदि वह भी मर गया, सृञ्जय — जो चार कल्याणों में तुमसे बढ़कर था और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यवान था — तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।
श्लोक 94 (12.28.94)
ययातिं नाहुषं चैव मृतं सृञ्जय शुश्रुम । य इमां पृथिवीं कृत्स्नां विजित्य सहसागराम् ॥
yayātiṃ nāhuṣaṃ caiva mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | ya imāṃ pṛthivīṃ kṛtsnāṃ vijitya sahasāgarām
हमने सुना है कि नहुष के पुत्र ययाति भी मर गए, सृञ्जय — जिन्होंने समुद्रों सहित इस सारी पृथ्वी को जीत लिया था।
श्लोक 95 (12.28.95)
शम्यापातेनाभ्यतीयाद्वेदीभिश्चित्रयन्महीम् । ईजानः क्रतुभिर्मुख्यैः पर्यगच्छद्वसुन्धराम् ॥
śamyāpātenābhyatīyādvedībhiścitrayanmahīm | ījānaḥ kratubhirmukhyaiḥ paryagacchadvasundharām
एक-एक शम्या के फेंकने की दूरी पर यज्ञवेदियाँ बनाकर पृथ्वी को सजाते हुए, श्रेष्ठ यज्ञ करते हुए वे सारी पृथ्वी में घूमे।
श्लोक 96 (12.28.96)
इष्ट्वा क्रतुसहस्रेण वाजपेयशतेन च । तर्पयामास विप्रेन्द्रांस्त्रिभिः काञ्चनपर्वतैः ॥
iṣṭvā kratusahasreṇa vājapeyaśatena ca | tarpayāmāsa viprendrāṃstribhiḥ kāñcanaparvataiḥ
हज़ार यज्ञ और सौ वाजपेय करके उसने तीन स्वर्ण-पर्वतों से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तृप्त किया।
श्लोक 97 (12.28.97)
व्यूढेनासुरयुद्धेन हत्वा दैतेयदानवान् । व्यभजत्पृथिवीं कृत्स्नां ययातिर्नहुषात्मजः ॥
vyūḍhenāsurayuddhena hatvā daiteyadānavān | vyabhajatpṛthivīṃ kṛtsnāṃ yayātirnahuṣātmajaḥ
असुरों के साथ व्यूह बाँधकर हुए युद्ध में दैत्यों और दानवों को मारकर नहुषपुत्र ययाति ने सारी पृथ्वी बाँट दी।
श्लोक 98 (12.28.98)
अन्त्येषु पुत्रान्निक्षिप्य यदुद्रुह्युपुरोगमान् । पुरुं राज्येऽभिषिच्याथ सदारः प्राविशद्वनम् ॥
antyeṣu putrānnikṣipya yadudruhyupurogamān | puruṃ rājye'bhiṣicyātha sadāraḥ prāviśadvanam
यदु और द्रुह्यु आदि पुत्रों को सीमान्त प्रदेशों में बैठाकर और पुरु को राज्य पर अभिषिक्त करके वे पत्नी सहित वन में चले गए।
श्लोक 99 (12.28.99)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
यदि वह भी मर गया, सृञ्जय — जो चार कल्याणों में तुमसे बढ़कर था और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यवान था — तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।
श्लोक 100 (12.28.100)
अम्बरीषं च नाभागं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । यं प्रजा वव्रिरे पुण्यं गोप्तारं नृपसत्तमम् ॥
ambarīṣaṃ ca nābhāgaṃ mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | yaṃ prajā vavrire puṇyaṃ goptāraṃ nṛpasattamam
हमने सुना है कि नाभाग के पुत्र अम्बरीष भी मर गए, सृञ्जय — जिन पुण्यात्मा, रक्षक और श्रेष्ठ राजा को प्रजा ने स्वयं चुना था।
श्लोक 101 (12.28.101)
यः सहस्रं सहस्राणां राज्ञामयुतयाजिनाम् । ईजानो वितते यज्ञे ब्राह्मणेभ्यस्त्वमन्यत ॥
yaḥ sahasraṃ sahasrāṇāṃ rājñāmayutayājinām | ījāno vitate yajñe brāhmaṇebhyastvamanyata
एक विशाल यज्ञ करते हुए उन्होंने दस-दस हज़ार यज्ञ कर चुके दस लाख (हज़ार हज़ार) राजाओं को ब्राह्मणों का ही मानकर उन्हें सौंप दिया।
श्लोक 102 (12.28.102)
नैतत्पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे । इत्यम्बरीषं नाभागिमन्वमोदन्त दक्षिणाः ॥
naitatpūrve janāścakrurna kariṣyanti cāpare | ityambarīṣaṃ nābhāgimanvamodanta dakṣiṇāḥ
"ऐसा न पहले के लोगों ने किया, न आगे के लोग करेंगे" — इस प्रकार दक्षिणाओं ने नाभाग-पुत्र अम्बरीष का अभिनन्दन किया।
श्लोक 103 (12.28.103)
शतं राजसहस्राणि शतं राजशतानि च । सर्वेऽश्वमेधैरीजानास्तेऽन्वयुर्दक्षिणायनम् ॥
śataṃ rājasahasrāṇi śataṃ rājaśatāni ca | sarve'śvamedhairījānāste'nvayurdakṣiṇāyanam
एक लाख राजा और सौ-सौ (दस हज़ार) राजा और, जो सब अश्वमेध यज्ञ कर चुके थे, उसके पीछे दक्षिणायन मार्ग से चले।
श्लोक 104 (12.28.104)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
यदि वह भी मर गया, सृञ्जय — जो चार कल्याणों में तुमसे बढ़कर था और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यवान था — तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।
श्लोक 105 (12.28.105)
शशबिन्दुं चैत्ररथं मृतं शुश्रुम सृञ्जय । यस्य भार्यासहस्राणां शतमासीन्महात्मनः ॥
śaśabinduṃ caitrarathaṃ mṛtaṃ śuśruma sṛñjaya | yasya bhāryāsahasrāṇāṃ śatamāsīnmahātmanaḥ
हमने सुना है कि चैत्ररथ शशबिन्दु भी मर गए, सृञ्जय — उन महात्मा के एक लाख पत्नियाँ थीं।
श्लोक 106 (12.28.106)
सहस्रं तु सहस्राणां यस्यासञ्शाशबिन्दवाः । हिरण्यकवचाः सर्वे सर्वे चोत्तमधन्विनः ॥
sahasraṃ tu sahasrāṇāṃ yasyāsañśāśabindavāḥ | hiraṇyakavacāḥ sarve sarve cottamadhanvinaḥ
उनके शशबिन्दु-वंशी पुत्र दस लाख (हज़ार हज़ार) थे, सब सोने के कवच पहने हुए और सब श्रेष्ठ धनुर्धर।
श्लोक 107 (12.28.107)
शतं कन्या राजपुत्रमेकैकं पृथगन्वयुः । कन्यांकन्यां शतं नागा नागंनागं शतं रथाः ॥
śataṃ kanyā rājaputramekaikaṃ pṛthaganvayuḥ | kanyāṃkanyāṃ śataṃ nāgā nāgaṃnāgaṃ śataṃ rathāḥ
प्रत्येक राजकुमार के पीछे अलग-अलग सौ कन्याएँ चलती थीं; प्रत्येक कन्या के पीछे सौ हाथी; प्रत्येक हाथी के पीछे सौ रथ।
श्लोक 108 (12.28.108)
रथेरथे शतं चाश्वा देशजा हेममालिनः । अश्वेअश्वे शतं गावो गांगां तद्वदजाविकम् ॥
ratherathe śataṃ cāśvā deśajā hemamālinaḥ | aśveaśve śataṃ gāvo gāṃgāṃ tadvadajāvikam
प्रत्येक रथ के पीछे सोने की मालाओं से सजे देशी सौ घोड़े; प्रत्येक घोड़े के पीछे सौ गायें; और प्रत्येक गाय के पीछे उतने ही बकरी-भेड़।
श्लोक 109 (12.28.109)
एतद्धनमपर्यन्तमश्वमेधे महामखे । शशबिन्दुर्महाराज ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ॥
etaddhanamaparyantamaśvamedhe mahāmakhe | śaśabindurmahārāja brāhmaṇebhyo hyamanyata
यह सारा अपार धन, हे महाराज, शशबिन्दु ने अपने महान अश्वमेध यज्ञ में ब्राह्मणों को दे दिया।
श्लोक 110 (12.28.110)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
यदि वह भी मर गया, सृञ्जय — जो चार कल्याणों में तुमसे बढ़कर था और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यवान था — तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।
श्लोक 111 (12.28.111)
गयं चाधूर्तरजसं मृतं शुश्रुम सृञ्जय । यः स वर्षशतं राजा हुतशिष्टाशनोऽभवत् ॥
gayaṃ cādhūrtarajasaṃ mṛtaṃ śuśruma sṛñjaya | yaḥ sa varṣaśataṃ rājā hutaśiṣṭāśano'bhavat
हमने सुना है कि अधूर्तरजा गय भी मर गए, सृञ्जय — जो राजा सौ वर्ष तक हवन से बचे हुए अन्न पर ही रहे।
श्लोक 112 (12.28.112)
यस्मै वह्निर्वरान्प्रादात्ततो वव्रे वरान्गयः । ददतो मे क्षयो मा भूद्धर्मे श्रद्धा च वर्धताम् ॥
yasmai vahnirvarānprādāttato vavre varāngayaḥ | dadato me kṣayo mā bhūddharme śraddhā ca vardhatām
अग्नि ने उन्हें वर दिए, और गय ने ये वर माँगे: "मेरा दान कभी न घटे और धर्म में मेरी श्रद्धा बढ़ती रहे।
श्लोक 113 (12.28.113)
मनो मे रभतां सत्ये त्वत्प्रसादाद्धुताशन । लेभे च कामांस्तान्सर्वान्पावकादिति नः श्रुतम् ॥
mano me rabhatāṃ satye tvatprasādāddhutāśana | lebhe ca kāmāṃstānsarvānpāvakāditi naḥ śrutam
हे अग्नि, तुम्हारी कृपा से मेरा मन सत्य में दृढ़ रहे।" और हमने सुना है कि उन्होंने अग्नि से वे सब इच्छित वर पा लिए।
श्लोक 114 (12.28.114)
दर्शेन पूर्णमासेन चातुर्मास्यैः पुनः पुनः । अयजद्धयमेधेन सहस्रं परिवत्सरान् ॥
darśena pūrṇamāsena cāturmāsyaiḥ punaḥ punaḥ | ayajaddhayamedhena sahasraṃ parivatsarān
दर्श, पौर्णमास और चातुर्मास्य यज्ञों के साथ बार-बार, हज़ार वर्ष तक उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया।
श्लोक 115 (12.28.115)
शतं गवां सहस्राणि शतमश्वशतानि च । उत्थायोत्थाय वै प्रादात्सहस्रं परिवत्सरान् ॥
śataṃ gavāṃ sahasrāṇi śatamaśvaśatāni ca | utthāyotthāya vai prādātsahasraṃ parivatsarān
हज़ार वर्ष तक वे बार-बार उठ-उठकर एक लाख गायें और सौ-सौ (दस हज़ार) घोड़े दान करते रहे।
श्लोक 116 (12.28.116)
तर्पयामास सोमेन देवान्वित्तैर्द्विजानपि । पितॄन्स्वधाभिः कामैश्च स्त्रियः स्वाः पुरुषर्षभ ॥
tarpayāmāsa somena devānvittairdvijānapi | pitṝnsvadhābhiḥ kāmaiśca striyaḥ svāḥ puruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ, उन्होंने सोम से देवताओं को, धन से ब्राह्मणों को, स्वधा से पितरों को और मनचाही वस्तुओं से अपनी स्त्रियों को तृप्त किया।
श्लोक 117 (12.28.117)
सौवर्णां पृथिवीं कृत्वा दशव्यामां द्विरायताम् । दक्षिणामददद्राजा वाजिमेधे महाक्रतौ ॥
sauvarṇāṃ pṛthivīṃ kṛtvā daśavyāmāṃ dvirāyatām | dakṣiṇāmadadadrājā vājimedhe mahākratau
महान अश्वमेध यज्ञ में उस राजा ने दस व्याम चौड़ी और उससे दुगुनी लम्बी सोने की पृथ्वी बनाकर दक्षिणा में दे दी।
श्लोक 118 (12.28.118)
यावत्यः सिकता राजन्गङ्गायां पुरुषर्षभ । तावतीरेव गाः प्रादादाधूर्तरजसो गयः ॥
yāvatyaḥ sikatā rājangaṅgāyāṃ puruṣarṣabha | tāvatīreva gāḥ prādādādhūrtarajaso gayaḥ
हे राजन्, हे पुरुषश्रेष्ठ, गंगा में जितने बालू के कण हैं, अधूर्तरजा गय ने उतनी ही गायें दान कीं।
श्लोक 119 (12.28.119)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
यदि वह भी मर गया, सृञ्जय — जो चार कल्याणों में तुमसे बढ़कर था और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यवान था — तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।
श्लोक 120 (12.28.120)
रन्तिदेवं च सांकृत्यं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । सम्यगाराध्य यः शक्राद्वरं लेभे महातपाः ॥
rantidevaṃ ca sāṃkṛtyaṃ mṛtaṃ sṛñjaya śuśruma | samyagārādhya yaḥ śakrādvaraṃ lebhe mahātapāḥ
हमने सुना है कि सांकृति रन्तिदेव भी मर गए, सृञ्जय — जिन महातपस्वी ने इन्द्र को भली-भाँति प्रसन्न करके उनसे वर पाया था।
श्लोक 121 (12.28.121)
अन्नं च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि । श्रद्धा च नो मा व्यगमन्मा च याचिष्म कंचन ॥
annaṃ ca no bahu bhavedatithīṃśca labhemahi | śraddhā ca no mā vyagamanmā ca yāciṣma kaṃcana
"हमारे पास अन्न बहुत हो, हमें अतिथि मिलते रहें, हमारी श्रद्धा कभी न जाए और हमें किसी से कुछ माँगना न पड़े।"
श्लोक 122 (12.28.122)
उपातिष्ठन्त पशवः स्वयं तं संशितव्रतम् । ग्राम्यारण्या महात्मानं रन्तिदेवं यशस्विनम् ॥
upātiṣṭhanta paśavaḥ svayaṃ taṃ saṃśitavratam | grāmyāraṇyā mahātmānaṃ rantidevaṃ yaśasvinam
पालतू और जंगली पशु अपने आप उन दृढ़व्रत, यशस्वी, महात्मा रन्तिदेव के पास उपस्थित हो जाते थे।
श्लोक 123 (12.28.123)
महानदी चर्मराशेरुत्क्लेदात्ससृजे यतः । ततश्चर्मण्वतीत्येवं विख्याता सा महानदी ॥
mahānadī carmarāśerutkledātsasṛje yataḥ | tataścarmaṇvatītyevaṃ vikhyātā sā mahānadī
चमड़ों के ढेर के रिसाव से जो महानदी बह निकली, वही तभी से चर्मण्वती नाम से प्रसिद्ध हुई।
श्लोक 124 (12.28.124)
ब्राह्मणेभ्यो ददौ निष्कान्सदसि प्रतते नृपः । तुभ्यंतुभ्यं निष्कमिति यदा क्रोशन्ति वै द्विजाः । सहस्रं तुभ्यमित्युक्त्वा ब्राह्मणान्संप्रपद्यते ॥
brāhmaṇebhyo dadau niṣkānsadasi pratate nṛpaḥ | tubhyaṃtubhyaṃ niṣkamiti yadā krośanti vai dvijāḥ | sahasraṃ tubhyamityuktvā brāhmaṇānsaṃprapadyate
अपने विशाल यज्ञ की सभा में राजा ने ब्राह्मणों को निष्क दिए; ब्राह्मण "तुम्हें एक निष्क, तुम्हें एक निष्क" पुकारते थे, और "तुम्हें हज़ार" कहकर वह ब्राह्मणों के पास पहुँचता था।
श्लोक 125 (12.28.125)
अन्वाहार्योपकरणं द्रव्योपकरणं च यत् । घटाः पात्र्यः कटाहानि स्थाल्यश्च पिठराणि च । नासीत्किंचिदसौवर्णं रन्तिदेवस्य धीमतः ॥
anvāhāryopakaraṇaṃ dravyopakaraṇaṃ ca yat | ghaṭāḥ pātryaḥ kaṭāhāni sthālyaśca piṭharāṇi ca | nāsītkiṃcidasauvarṇaṃ rantidevasya dhīmataḥ
अन्वाहार्य (पितृ-श्राद्ध) और सामग्री के सब उपकरण, तथा घड़े, कटोरे, कड़ाहे, थालियाँ और बड़े पात्र — बुद्धिमान रन्तिदेव के घर में कुछ भी ऐसा न था जो सोने का न हो।
श्लोक 126 (12.28.126)
सांकृते रन्तिदेवस्य यां रात्रिमवसन्गृहे । आलभ्यन्त शतं गावः सहस्राणि च विंशतिः ॥
sāṃkṛte rantidevasya yāṃ rātrimavasangṛhe | ālabhyanta śataṃ gāvaḥ sahasrāṇi ca viṃśatiḥ
जिस रात अतिथि सांकृति रन्तिदेव के घर ठहरते, उस रात सौ और बीस हज़ार गायें मारी जाती थीं।
श्लोक 127 (12.28.127)
तत्र स्म सूदाः क्रोशन्ति सुमृष्टमणिकुण्डलाः । सूपं भूयिष्ठमश्नीध्वं नाद्य मांसं यथा पुरा ॥
tatra sma sūdāḥ krośanti sumṛṣṭamaṇikuṇḍalāḥ | sūpaṃ bhūyiṣṭhamaśnīdhvaṃ nādya māṃsaṃ yathā purā
वहाँ चमकते मणि-कुण्डल पहने रसोइये पुकारते थे: "आज पहले की तरह मांस नहीं है, दाल-रस ही जी भरकर खाओ।"
श्लोक 128 (12.28.128)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
यदि वह भी मर गया, सृञ्जय — जो चार कल्याणों में तुमसे बढ़कर था और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यवान था — तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।
श्लोक 129 (12.28.129)
सगरं च महात्मानं मृतं शुश्रुम सृञ्जय । ऐक्ष्वाकं पुरुषव्याघ्रमतिमानुषविक्रमम् ॥
sagaraṃ ca mahātmānaṃ mṛtaṃ śuśruma sṛñjaya | aikṣvākaṃ puruṣavyāghramatimānuṣavikramam
हमने सुना है कि महात्मा सगर भी मर गए, सृञ्जय — इक्ष्वाकुवंशी, पुरुषों में व्याघ्र, मनुष्य से बढ़कर पराक्रम वाले।
श्लोक 130 (12.28.130)
षष्टिः पुत्रसहस्राणि यं यान्तमनुजग्मिरे । नक्षत्रराजं वर्षान्ते व्यभ्रे ज्योतिर्गणा इव ॥
ṣaṣṭiḥ putrasahasrāṇi yaṃ yāntamanujagmire | nakṣatrarājaṃ varṣānte vyabhre jyotirgaṇā iva
जब वे चलते थे तो साठ हज़ार पुत्र उनके पीछे चलते थे, जैसे वर्षा के अन्त में निरभ्र आकाश में नक्षत्रराज (चन्द्रमा) के पीछे तारागण चलते हैं।
श्लोक 131 (12.28.131)
एकच्छत्रा मही यस्य प्रतापादभवत्पुरा । योऽश्वमेधसहस्रेण तर्पयामास देवताः ॥
ekacchatrā mahī yasya pratāpādabhavatpurā | yo'śvamedhasahasreṇa tarpayāmāsa devatāḥ
उनके प्रताप से कभी यह पृथ्वी एक छत्र के नीचे थी, और उन्होंने हज़ार अश्वमेध यज्ञों से देवताओं को तृप्त किया।
श्लोक 132 (12.28.132)
यः प्रादात्कनकस्तम्भं प्रासादं सर्वकाञ्चनम् । पूर्णं पद्मदलाक्षीणां स्त्रीणां शयनसंकुलम् ॥
yaḥ prādātkanakastambhaṃ prāsādaṃ sarvakāñcanam | pūrṇaṃ padmadalākṣīṇāṃ strīṇāṃ śayanasaṃkulam
उन्होंने सोने के खम्भों वाला, पूरा का पूरा सोने का एक महल दान किया, जो कमल-दल जैसी आँखों वाली स्त्रियों से भरा और शय्याओं से ठसाठस था।
श्लोक 133 (12.28.133)
द्विजातिभ्योऽनुरूपेभ्यः कामांश्च विविधान्बहून् । यस्यादेशेन तद्वित्तं व्यभजन्त द्विजातयः ॥
dvijātibhyo'nurūpebhyaḥ kāmāṃśca vividhānbahūn | yasyādeśena tadvittaṃ vyabhajanta dvijātayaḥ
उन्होंने योग्य ब्राह्मणों को नाना प्रकार की बहुत-सी मनचाही वस्तुएँ दीं, और उनकी आज्ञा से ब्राह्मणों ने वह धन आपस में बाँट लिया।
श्लोक 134 (12.28.134)
खानयामास यः कोपात्पृथिवीं सागराङ्किताम् । यस्य नाम्ना समुद्रश्च सागरत्वमुपागतः ॥
khānayāmāsa yaḥ kopātpṛthivīṃ sāgarāṅkitām | yasya nāmnā samudraśca sāgaratvamupāgataḥ
जिन्होंने क्रोध में समुद्रों से घिरी पृथ्वी को खुदवाया, और जिनके नाम से समुद्र 'सागर' कहलाया।
श्लोक 135 (12.28.135)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
यदि वह भी मर गया, सृञ्जय — जो चार कल्याणों में तुमसे बढ़कर था और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यवान था — तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।
श्लोक 136 (12.28.136)
राजानं च पृथुं वैन्यं मृतं शुश्रुम सृञ्जय । यमभ्यषिञ्चन्संभूय महारण्ये महर्षयः ॥
rājānaṃ ca pṛthuṃ vainyaṃ mṛtaṃ śuśruma sṛñjaya | yamabhyaṣiñcansaṃbhūya mahāraṇye maharṣayaḥ
हमने सुना है कि वेन के पुत्र राजा पृथु भी मर गए, सृञ्जय — जिन्हें महर्षियों ने महावन में एकत्र होकर अभिषिक्त किया था।
श्लोक 137 (12.28.137)
प्रथयिष्यति वै लोकान्पृथुरित्येव शब्दितः । क्षताद्यो वै त्रायतीति स तस्मात्क्षत्रियः स्मृतः ॥
prathayiṣyati vai lokānpṛthurityeva śabditaḥ | kṣatādyo vai trāyatīti sa tasmātkṣatriyaḥ smṛtaḥ
"वह लोकों को विस्तार देगा" — इसलिए उसका नाम पृथु पड़ा; "वह क्षत (हानि) से रक्षा करता है" — इसलिए वह क्षत्रिय कहलाया।
श्लोक 138 (12.28.138)
पृथुं वैन्यं प्रजा दृष्ट्वा रक्तास्मेति यदब्रुवन् । ततो राजेति नामास्य अनुरागादजायत ॥
pṛthuṃ vainyaṃ prajā dṛṣṭvā raktāsmeti yadabruvan | tato rājeti nāmāsya anurāgādajāyata
वेन-पुत्र पृथु को देखकर प्रजा ने कहा, "हम अनुरक्त हो गए"; उसी अनुराग से उसका नाम 'राजा' पड़ा।
श्लोक 139 (12.28.139)
अकृष्टपच्या पृथिवी पुटकेपुटके मधु । सर्वा द्रोणदुघा गावो वैन्यस्यासन्प्रशासतः ॥
akṛṣṭapacyā pṛthivī puṭakepuṭake madhu | sarvā droṇadughā gāvo vainyasyāsanpraśāsataḥ
वेनपुत्र के शासन में बिना जोते ही धरती अन्न देती थी, हर दोने में मधु भरा रहता था और सब गायें द्रोण-भर दूध देती थीं।
श्लोक 140 (12.28.140)
अरोगाः सर्वसिद्धार्था मनुष्या अकुतोभयाः । यथाऽभिकाममवसन्क्षेत्रेषु च गृहेषु च ॥
arogāḥ sarvasiddhārthā manuṣyā akutobhayāḥ | yathā'bhikāmamavasankṣetreṣu ca gṛheṣu ca
लोग निरोग, सब प्रयोजनों में सफल और सब ओर से निर्भय थे, और अपनी इच्छा के अनुसार खेतों और घरों में रहते थे।
श्लोक 141 (12.28.141)
आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः । शैलाश्चापाद्व्यदीर्यन्त ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥
āpastastambhire cāsya samudramabhiyāsyataḥ | śailāścāpādvyadīryanta dhvajabhaṅgaśca nābhavat
जब वे समुद्र की ओर चलते तो जल थम जाता था, पर्वत फट जाते थे और उनकी ध्वजा कभी टूटती नहीं थी।
श्लोक 142 (12.28.142)
हैरण्यांस्त्रिनरोत्सेधान्पर्वतानेकविंशतिम् । ब्राह्मणेभ्यो ददौ राजा योश्वमेधे महामखे ॥
hairaṇyāṃstrinarotsedhānparvatānekaviṃśatim | brāhmaṇebhyo dadau rājā yośvamedhe mahāmakhe
उस राजा ने अपने महान अश्वमेध यज्ञ में ब्राह्मणों को तीन मनुष्य ऊँचे इक्कीस सोने के पर्वत दिए।
श्लोक 143 (12.28.143)
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात्पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥
sa cenmamāra sṛñjaya caturbhadratarastvayā | putrātpuṇyataraścaiva mā putramanutapyathāḥ
यदि वह भी मर गया, सृञ्जय — जो चार कल्याणों में तुमसे बढ़कर था और तुम्हारे पुत्र से कहीं अधिक पुण्यवान था — तो तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।
श्लोक 144 (12.28.144)
किं वा तूष्णीं ध्यायसे सृञ्जय त्वं । न मे राजन्वाचिममां शृणोषि । न चेन्मोघं विप्रलप्तं ममेदं । पथ्यं मुमूर्षोरिव सुप्रयुक्तम् ॥
kiṃ vā tūṣṇīṃ dhyāyase sṛñjaya tvaṃ | na me rājanvācimamāṃ śṛṇoṣi | na cenmoghaṃ vipralaptaṃ mamedaṃ | pathyaṃ mumūrṣoriva suprayuktam
सृञ्जय, तुम चुप होकर क्या सोच रहे हो? हे राजन्, क्या तुम मेरी यह बात सुन नहीं रहे? क्या मेरा यह कथन व्यर्थ गया, जैसे मरणासन्न को दी हुई अच्छी दवा व्यर्थ जाती है?
सृञ्जय उवाच
श्लोक 145 (12.28.145)
शृणोमि ते नारद वाचमेनां । विचित्रार्थां स्रजमिव पुण्यगन्धाम् । राजर्षीणां पुण्यकृतां महात्मनां । कीर्त्या युक्तानां शोकनिर्नाशनार्थाम् ॥
śṛṇomi te nārada vācamenāṃ | vicitrārthāṃ srajamiva puṇyagandhām | rājarṣīṇāṃ puṇyakṛtāṃ mahātmanāṃ | kīrtyā yuktānāṃ śokanirnāśanārthām
नारद, मैं आपकी यह वाणी सुन रहा हूँ — विचित्र अर्थों वाली, पवित्र सुगन्ध से भरी माला के समान, पुण्य करने वाले महात्मा राजर्षियों की कीर्ति से युक्त, और शोक का नाश करने वाली।
श्लोक 146 (12.28.146)
न ते मोघं विप्रलप्तं महर्षे । दृष्ट्वैवाहं नारद त्वां विशोकः । शुश्रूषे ते वचनं ब्रह्मवादि । न्न ते तृप्याम्यमृतस्येव पानात् ॥
na te moghaṃ vipralaptaṃ maharṣe | dṛṣṭvaivāhaṃ nārada tvāṃ viśokaḥ | śuśrūṣe te vacanaṃ brahmavādi | nna te tṛpyāmyamṛtasyeva pānāt
महर्षि, आपका कथन व्यर्थ नहीं गया; नारद, आपको देखते ही मैं शोकरहित हो गया हूँ। मैं आपकी ब्रह्मविद्या से भरी बातें सुनना चाहता हूँ, और अमृत पीने की तरह उनसे मैं तृप्त नहीं होता।
श्लोक 147 (12.28.147)
अमोघदर्शिन्मम चेत्प्रसादं । संतापदग्धस्य विभो प्रकुर्याः । सुतस्य संजीवनमद्य मे स्या । त्तव प्रसादात्सुतसङ्गमाप्नुयाम् ॥
amoghadarśinmama cetprasādaṃ | saṃtāpadagdhasya vibho prakuryāḥ | sutasya saṃjīvanamadya me syā | ttava prasādātsutasaṅgamāpnuyām
हे अमोघदर्शी, हे प्रभो, यदि आप शोक से जले हुए मुझ पर कृपा करें, तो आज मेरा पुत्र फिर जी उठे, और आपकी कृपा से मैं पुत्र से मिल सकूँ।
नारद उवाच
श्लोक 148 (12.28.148)
यस्ते पुत्रः शयितोयं विजातः । स्वर्णष्ठीवी यमदात्पर्वतस्ते । पुनस्तं ते पुत्रमहं ददामि । हिरण्यनाभं वर्षसहस्रिणं च ॥
yaste putraḥ śayitoyaṃ vijātaḥ | svarṇaṣṭhīvī yamadātparvataste | punastaṃ te putramahaṃ dadāmi | hiraṇyanābhaṃ varṣasahasriṇaṃ ca
तुम्हारा यह पुत्र जो यहाँ पड़ा है, जो तुम्हें उत्पन्न हुआ था, स्वर्ण थूकने वाला, जिसे पर्वत ने तुम्हें दिया था — उसी पुत्र को मैं तुम्हें फिर देता हूँ, स्वर्ण-नाभि वाला और हज़ार वर्ष जीने वाला।