शान्ति पर्व · अध्याय 29
नारद और पर्वत का परस्पर शाप
युधिष्ठिर पूछते हैं कि सृञ्जय का पुत्र 'काञ्चनष्ठीवी' कैसे कहलाया और इतनी छोटी आयु में क्यों मर गया। श्रीकृष्ण कथा आरम्भ करते हैं: मामा-भानजे नारद और पर्वत यह नियम करते हैं कि हृदय की हर कामना एक-दूसरे को बताएँगे, और वे राजा सृञ्जय के यहाँ रहते हैं, जिनकी पुत्री सुकुमारी उनकी सेवा करती है। नारद उस पर मोहित होकर बात छिपाते हैं; पर्वत जान लेते हैं और उन्हें शाप देते हैं, बदले में नारद भी पर्वत को शाप देते हैं, और बाद में दोनों शाप हट जाते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि शेष कथा नारद स्वयं बताएँगे।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.29.1)
स कथं काञ्चनष्ठीवी सृञ्जयस्य सुतोऽभवत् । पर्वतेन किमर्थं वा दत्तस्तेन ममार च ॥
sa kathaṃ kāñcanaṣṭhīvī sṛñjayasya suto'bhavat | parvatena kimarthaṃ vā dattastena mamāra ca
वह सृञ्जय का पुत्र 'काञ्चनष्ठीवी' कैसे हुआ? और पर्वत ने उसे किस प्रयोजन से दिया — और क्या वह उसी कारण मर गया?
श्लोक 2 (12.29.2)
यदा वर्षसहस्रायुस्तदा भवति मानवः । कथमप्राप्तकौमारः सृञ्जयस्य सुतो मृतः ॥
yadā varṣasahasrāyustadā bhavati mānavaḥ | kathamaprāptakaumāraḥ sṛñjayasya suto mṛtaḥ
मनुष्य की आयु तो हज़ार वर्ष की कही गई है; फिर सृञ्जय का पुत्र किशोरावस्था तक पहुँचे बिना ही कैसे मर गया?
श्लोक 3 (12.29.3)
उताहो नाममात्रं वै सुवर्णष्ठीविनोऽभवत् । कथं वा काञ्चनष्ठीवीत्येतदिच्छामि वेदितुम् ॥
utāho nāmamātraṃ vai suvarṇaṣṭhīvino'bhavat | kathaṃ vā kāñcanaṣṭhīvītyetadicchāmi veditum
अथवा 'सुवर्णष्ठीवी' केवल एक नाम ही था? या वह सचमुच 'काञ्चनष्ठीवी' कैसे कहलाया? यह मैं जानना चाहता हूँ।
श्रीकृष्ण उवाच
श्लोक 4 (12.29.4)
अत्र ते वर्णयिष्यामि यथावृत्तं जनेश्वर । नारदः पर्वतश्चैव द्वावृषी लोकसत्तमौ ॥
atra te varṇayiṣyāmi yathāvṛttaṃ janeśvara | nāradaḥ parvataścaiva dvāvṛṣī lokasattamau
हे जनेश्वर, इस विषय में मैं तुम्हें बताऊँगा कि यह जैसा हुआ था। नारद और पर्वत — ये दो ऋषि लोक में सर्वश्रेष्ठ थे।
श्लोक 5 (12.29.5)
मातुलो भागिनेयश्च देवलोकादिहागतौ । विहर्तुकामौ संप्रीत्या मानुषेषु पुरा विभो ॥
mātulo bhāgineyaśca devalokādihāgatau | vihartukāmau saṃprītyā mānuṣeṣu purā vibho
मामा और भानजे वे दोनों, हे प्रभो, प्राचीन काल में देवलोक से यहाँ आए; वे प्रसन्नतापूर्वक मनुष्यों के बीच विचरना चाहते थे।
श्लोक 6 (12.29.6)
हविःपवित्रभोज्येन देवभोज्येन चैव हि । नारदो मातुलस्तत्र भागिनेयश्च पर्वतः ॥
haviḥpavitrabhojyena devabhojyena caiva hi | nārado mātulastatra bhāgineyaśca parvataḥ
हवि के योग्य पवित्र भोजन और देवताओं के योग्य भोजन पर निर्वाह करते हुए वहाँ मामा नारद और भानजे पर्वत रहे।
श्लोक 7 (12.29.7)
तावुभौ तपसोपेताववनीतलचारिणौ । भुञ्जानौ मानुषान्भोगान्यथावत्पर्यधावताम् ॥
tāvubhau tapasopetāvavanītalacāriṇau | bhuñjānau mānuṣānbhogānyathāvatparyadhāvatām
तप से सम्पन्न वे दोनों पृथ्वीतल पर विचरते हुए मनुष्यों के भोगों को यथोचित भोगते हुए घूमते रहे।
श्लोक 8 (12.29.8)
प्रीतिमन्तौ मुदा युक्तौ समयं चैव चक्रतुः । यो भवेद्धृदि संकल्पः शुभो वा यदि वाऽशुभः ॥
prītimantau mudā yuktau samayaṃ caiva cakratuḥ | yo bhaveddhṛdi saṃkalpaḥ śubho vā yadi vā'śubhaḥ
प्रसन्न और आनन्दित होकर उन्होंने यह नियम किया कि हृदय में जो भी संकल्प उठे, शुभ हो या अशुभ,
श्लोक 9 (12.29.9)
अन्योन्यस्य च आख्येयो मृषा शापोऽन्यथा भवेत् । तौ तथेति प्रतिज्ञाय महर्षी लोकपूजितौ ॥
anyonyasya ca ākhyeyo mṛṣā śāpo'nyathā bhavet | tau tatheti pratijñāya maharṣī lokapūjitau
वह एक-दूसरे को बताना होगा; नहीं तो झूठ का शाप लगेगा। 'ऐसा ही हो' कहकर प्रतिज्ञा करके लोकपूजित वे दोनों महर्षि
श्लोक 10 (12.29.10)
सृञ्जयं श्वैत्यमभ्येत्य राजानमिदमूचतुः । आवां भवति वत्स्यावः कंचित्कालं हिताय ते ॥
sṛñjayaṃ śvaityamabhyetya rājānamidamūcatuḥ | āvāṃ bhavati vatsyāvaḥ kaṃcitkālaṃ hitāya te
श्वैत्य सृञ्जय राजा के पास जाकर उनसे बोले: 'हे राजन्, हम दोनों आपके हित के लिए कुछ समय आपके यहाँ रहेंगे।
श्लोक 11 (12.29.11)
यथावत्पृथिवीपाल आवयोः प्रगुणीभव । तथेति कृत्वा राजा तौ सत्कृत्योपचचार ह ॥
yathāvatpṛthivīpāla āvayoḥ praguṇībhava | tatheti kṛtvā rājā tau satkṛtyopacacāra ha
हे पृथ्वीपाल, आप हमारे लिए यथोचित अनुकूल रहिए।' 'ऐसा ही हो' कहकर राजा ने उन दोनों का सत्कार करते हुए उनकी सेवा की।
श्लोक 12 (12.29.12)
ततः कदाचित्तौ राजा महात्मानौ तपोधनौ । अब्रवीत्परमप्रीतः सुतेयं देवरूपिणी ॥
tataḥ kadācittau rājā mahātmānau tapodhanau | abravītparamaprītaḥ suteyaṃ devarūpiṇī
फिर एक बार राजा ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन दोनों महात्मा तपस्वियों से कहा: 'यह मेरी कन्या देवी के समान रूपवाली है,
सृञ्जय उवाच
श्लोक 13 (12.29.13)
एकैव मम कन्यैषा युवां परिचरिष्यति । दर्शनीयानवद्याङ्गी शीलवृत्तसमाहिता । सुकुमारी कुमारी च पद्मकिञ्जल्कसुप्रभा ॥
ekaiva mama kanyaiṣā yuvāṃ paricariṣyati | darśanīyānavadyāṅgī śīlavṛttasamāhitā | sukumārī kumārī ca padmakiñjalkasuprabhā
यही मेरी एकमात्र कन्या है, यह आप दोनों की सेवा करेगी। यह सुन्दर है, इसके अंग निर्दोष हैं, यह शील और सदाचार से युक्त है; यह कोमल कुमारी सुकुमारी कमल के केसर के समान कान्तिमती है।'
श्रीकृष्ण उवाच
श्लोक 14 (12.29.14)
परमं सौम्यमित्युक्तं ताभ्यां राजा शशास ताम् । कन्ये विप्रावुपचर देववत्पितृवच्च ह ॥
paramaṃ saumyamityuktaṃ tābhyāṃ rājā śaśāsa tām | kanye viprāvupacara devavatpitṛvacca ha
उन दोनों के 'बहुत उत्तम' कह देने पर राजा ने उसे आज्ञा दी: 'बेटी, इन दोनों ब्राह्मणों की देवताओं और पिताओं के समान सेवा करो।'
श्लोक 15 (12.29.15)
सा तु कन्या तथेत्युक्त्वा पितरं धर्मचारिणी । यथानिदेशं राज्ञस्तौ सत्कृत्योपचचार ह ॥
sā tu kanyā tathetyuktvā pitaraṃ dharmacāriṇī | yathānideśaṃ rājñastau satkṛtyopacacāra ha
धर्म का आचरण करनेवाली उस कन्या ने पिता से 'ऐसा ही हो' कहा और राजा की आज्ञा के अनुसार उन दोनों का सत्कार करते हुए सेवा की।
श्लोक 16 (12.29.16)
तस्यास्तेनोपचारेण रूपेणाप्रतिमेन च । नारदं हृच्छयस्तूर्णं सहसैवाभ्यपद्यत ॥
tasyāstenopacāreṇa rūpeṇāpratimena ca | nāradaṃ hṛcchayastūrṇaṃ sahasaivābhyapadyata
उसकी उस सेवा और अनुपम रूप के कारण हृदय में जन्म लेनेवाला कामदेव तुरन्त, एकाएक नारद पर छा गया।
श्लोक 17 (12.29.17)
ववृधे हि ततस्तस्य हृदि कामो महात्मनः । यथा शुक्लस्य पक्षस्य प्रवृत्तौ चन्द्रमाः शनैः ॥
vavṛdhe hi tatastasya hṛdi kāmo mahātmanaḥ | yathā śuklasya pakṣasya pravṛttau candramāḥ śanaiḥ
तब उन महात्मा के हृदय में काम बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्ष के आरम्भ में चन्द्रमा धीरे-धीरे बढ़ता है।
श्लोक 18 (12.29.18)
न च तं भागिनेयाय पर्वताय महात्मने । शशंस मन्मथं तीव्रं व्रीडमानः स धर्मवित् ॥
na ca taṃ bhāgineyāya parvatāya mahātmane | śaśaṃsa manmathaṃ tīvraṃ vrīḍamānaḥ sa dharmavit
पर धर्म को जाननेवाले नारद ने लज्जा के कारण अपनी तीव्र कामना अपने भानजे महात्मा पर्वत को नहीं बताई।
श्लोक 19 (12.29.19)
तपसा चेङ्गितैश्चैव पर्वतोऽथ बुबोध तम् । कामार्तं नारदं क्रुद्धः शशापैनं ततो भृशम् ॥
tapasā ceṅgitaiścaiva parvato'tha bubodha tam | kāmārtaṃ nāradaṃ kruddhaḥ śaśāpainaṃ tato bhṛśam
तप के बल से और संकेतों से पर्वत ने उन्हें जान लिया; नारद को कामपीड़ित देखकर क्रुद्ध पर्वत ने उन्हें कठोर शाप दिया।
पर्वत उवाच
श्लोक 20 (12.29.20)
कृत्वा समयमव्यग्रो भवान्वै सहितो मया । यो भवेद्धृदि संकल्पः शुभो वा यदि वाऽशुभः ॥
kṛtvā samayamavyagro bhavānvai sahito mayā | yo bhaveddhṛdi saṃkalpaḥ śubho vā yadi vā'śubhaḥ
'आपने स्थिर चित्त से मेरे साथ यह नियम किया था कि हृदय में जो भी संकल्प उठे, शुभ हो या अशुभ,
श्लोक 21 (12.29.21)
अन्योन्यस्य स आख्येय इति तद्वै मृषा कृतम् । भवता वचनं ब्रह्मंस्तस्मादेष शपाम्यहम् ॥
anyonyasya sa ākhyeya iti tadvai mṛṣā kṛtam | bhavatā vacanaṃ brahmaṃstasmādeṣa śapāmyaham
वह एक-दूसरे को बताना होगा। हे ब्रह्मन्, आपने अपना वह वचन झूठा कर दिया; इसलिए मैं आपको शाप देता हूँ।
श्लोक 22 (12.29.22)
न हि कामं प्रवर्तन्तं भवानाचष्ट मे पुरा । सुकुमार्यां कुमार्यां ते तस्मान्नैष क्षमाम्यहम् ॥
na hi kāmaṃ pravartantaṃ bhavānācaṣṭa me purā | sukumāryāṃ kumāryāṃ te tasmānnaiṣa kṣamāmyaham
आपने सुकुमारी कुमारी के प्रति उठती हुई अपनी कामना मुझे पहले नहीं बताई; इसलिए मैं इसे क्षमा नहीं करता।
श्लोक 23 (12.29.23)
ब्रह्मचारी गुरुर्यस्मात्तपस्वी ब्राह्मणश्च सन् । अकार्षीः समयभ्रंशमावाभ्यां यः कृतो मिथः ॥
brahmacārī gururyasmāttapasvī brāhmaṇaśca san | akārṣīḥ samayabhraṃśamāvābhyāṃ yaḥ kṛto mithaḥ
आप ब्रह्मचारी, गुरु, तपस्वी और ब्राह्मण होकर भी, हम दोनों ने आपस में जो नियम किया था उसे आपने तोड़ा।
श्लोक 24 (12.29.24)
शप्स्ये तस्मात्सुसंक्रुद्धो भवन्तं तं निबोध मे ॥
śapsye tasmātsusaṃkruddho bhavantaṃ taṃ nibodha me
इसलिए मैं अत्यन्त क्रोध में आपको शाप दूँगा; मुझसे सुनिए।
श्लोक 25 (12.29.25)
सुकुमारी च ते भार्या भविष्यति न संशयः । वानरत्वं च ते कन्या विवाहात्प्रभृति प्रभो । संद्रक्ष्यन्ति नराश्चान्ये स्वरूपेण विनाकृतम् ॥
sukumārī ca te bhāryā bhaviṣyati na saṃśayaḥ | vānaratvaṃ ca te kanyā vivāhātprabhṛti prabho | saṃdrakṣyanti narāścānye svarūpeṇa vinākṛtam
सुकुमारी निश्चय ही आपकी पत्नी होगी; परन्तु हे प्रभो, विवाह के समय से वह कन्या आपको वानर के रूप में देखेगी, और दूसरे मनुष्य आपको अपने रूप से रहित देखेंगे।'
श्रीकृष्ण उवाच
श्लोक 26 (12.29.26)
स तद्वाक्यं तु विज्ञाय नारदः पर्वतं तथा । अशपत्तमपि क्रोधाद्भागिनेयं स मातुलः ॥
sa tadvākyaṃ tu vijñāya nāradaḥ parvataṃ tathā | aśapattamapi krodhādbhāgineyaṃ sa mātulaḥ
उन वचनों को समझकर मामा नारद ने भी क्रोध में अपने भानजे पर्वत को शाप दिया:
नारद उवाच
श्लोक 27 (12.29.27)
तपसा ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च । युक्तोऽपि नित्यधर्मश्च न वै स्वर्गमवाप्स्यसि ॥
tapasā brahmacaryeṇa satyena ca damena ca | yukto'pi nityadharmaśca na vai svargamavāpsyasi
'तप, ब्रह्मचर्य, सत्य और इन्द्रिय-संयम से युक्त और सदा धर्म में स्थित होकर भी तुम स्वर्ग को नहीं पाओगे।'
श्रीकृष्ण उवाच
श्लोक 28 (12.29.28)
तौ तु शप्त्वा भृशं क्रुद्धौ परस्परममर्षणौ । प्रतिजग्मतुरन्योन्यं क्रुद्धाविव गजोत्तमौ ॥
tau tu śaptvā bhṛśaṃ kruddhau parasparamamarṣaṇau | pratijagmaturanyonyaṃ kruddhāviva gajottamau
इस प्रकार एक-दूसरे को शाप देकर अत्यन्त क्रुद्ध और असहिष्णु वे दोनों, क्रोधित श्रेष्ठ हाथियों की भाँति, एक-दूसरे से रुष्ट होकर अपनी-अपनी राह चल पड़े।
श्लोक 29 (12.29.29)
पर्वतः पृथिवीं कृत्स्नां विचचार महामतिः । पूज्यमानो यथान्यायं तेजसा स्वेन भारत ॥
parvataḥ pṛthivīṃ kṛtsnāṃ vicacāra mahāmatiḥ | pūjyamāno yathānyāyaṃ tejasā svena bhārata
हे भारत, बुद्धिमान पर्वत अपने तेज के कारण यथोचित सम्मान पाते हुए सारी पृथ्वी पर घूमते रहे।
श्लोक 30 (12.29.30)
अथ तामलभत्कन्यां नारदः सृञ्जयात्मजाम् । धर्मेण विप्रप्रवरः सुकुमारीमनिन्दिताम् ॥
atha tāmalabhatkanyāṃ nāradaḥ sṛñjayātmajām | dharmeṇa viprapravaraḥ sukumārīmaninditām
तब विप्रश्रेष्ठ नारद ने धर्मपूर्वक सृञ्जय की उस पुत्री, निर्दोष सुकुमारी को पत्नी रूप में पाया।
श्लोक 31 (12.29.31)
सा तु कन्या यथाशापं नारदं तं ददर्श ह । पाणिग्रहणमन्त्राणां नियोगादेव नारदम् ॥
sā tu kanyā yathāśāpaṃ nāradaṃ taṃ dadarśa ha | pāṇigrahaṇamantrāṇāṃ niyogādeva nāradam
और उस कन्या ने शाप के अनुसार, पाणिग्रहण के मन्त्रों के प्रभाव से ही, नारद को उसी रूप में देखा।
श्लोक 32 (12.29.32)
सुकुमारी च देवर्षि वानरप्रतिमाननम् । नैवावमन्यत तदा प्रीतिमत्येव चाभवत् ॥
sukumārī ca devarṣi vānarapratimānanam | naivāvamanyata tadā prītimatyeva cābhavat
फिर भी सुकुमारी ने वानर-जैसे मुखवाले उन देवर्षि का अनादर नहीं किया; वह उनसे प्रसन्न ही रही।
श्लोक 33 (12.29.33)
उपतस्थे च भर्तारं न चान्यं मनसाऽप्यगात् । देवं मुनिं वा यक्षं वा पतित्वे पतिवत्सला ॥
upatasthe ca bhartāraṃ na cānyaṃ manasā'pyagāt | devaṃ muniṃ vā yakṣaṃ vā patitve pativatsalā
वह अपने पति की सेवा करती रही; पतिव्रता होकर उसने किसी दूसरे की ओर मन से भी ध्यान नहीं दिया, चाहे वह देवता हो, मुनि हो या यक्ष।
श्लोक 34 (12.29.34)
ततः कदाचिद्भगवान्पर्वतोऽनुचचार ह । वनं विरहितं किंचित्तत्रापश्यत्स नारदम् ॥
tataḥ kadācidbhagavānparvato'nucacāra ha | vanaṃ virahitaṃ kiṃcittatrāpaśyatsa nāradam
फिर एक बार भगवान् पर्वत घूमते हुए एक निर्जन वन-प्रदेश में पहुँचे, और वहाँ उन्होंने नारद को देखा।
श्लोक 35 (12.29.35)
ततोऽभिवाद्य प्रोवाच नारदं पर्वतस्तदा । भवान्प्रसादं कुरुतात्स्वर्गादेशाय मे प्रभो ॥
tato'bhivādya provāca nāradaṃ parvatastadā | bhavānprasādaṃ kurutātsvargādeśāya me prabho
तब पर्वत ने नारद को प्रणाम करके कहा: 'हे प्रभो, मुझ पर कृपा कीजिए, जिससे मुझे स्वर्ग जाने का आदेश मिल सके।'
श्लोक 36 (12.29.36)
तमुवाच ततो दृष्ट्वा पर्वतं नारदस्तथा । कृताञ्जलिमुपासीनं दीनं दीनतरः स्वयम् ॥
tamuvāca tato dṛṣṭvā parvataṃ nāradastathā | kṛtāñjalimupāsīnaṃ dīnaṃ dīnataraḥ svayam
हाथ जोड़े पास बैठे दीन पर्वत को देखकर, उनसे भी अधिक दीन होकर, नारद ने स्वयं उनसे कहा:
नारद उवाच
श्लोक 37 (12.29.37)
त्वयाऽहं प्रथमं शप्तो वानरस्त्वं भविष्यसि । इत्युक्तेन मया पश्चाच्छप्तस्त्वमपि मत्सरात् ॥
tvayā'haṃ prathamaṃ śapto vānarastvaṃ bhaviṣyasi | ityuktena mayā paścācchaptastvamapi matsarāt
'तुमने पहले मुझे शाप दिया था: "तुम वानर हो जाओगे।" यह सुनकर मैंने बाद में डाह से तुम्हें भी शाप दिया:
श्लोक 38 (12.29.38)
अद्यप्रभृति वै वासं स्वर्गे नावाप्स्यसीति ह । तव नैतद्विसदृशं पुत्रस्थाने हि मे भवान् ॥
adyaprabhṛti vai vāsaṃ svarge nāvāpsyasīti ha | tava naitadvisadṛśaṃ putrasthāne hi me bhavān
"आज से तुम स्वर्ग में निवास नहीं पाओगे।" यह तुम्हारे स्वभाव के विपरीत नहीं है, क्योंकि तुम मेरे लिए पुत्र के स्थान पर हो।'
श्रीकृष्ण उवाच
श्लोक 39 (12.29.39)
निवर्तयेतां तौ शापावन्योन्येन तदा मुनी ॥
nivartayetāṃ tau śāpāvanyonyena tadā munī
तब उन दोनों मुनियों ने एक-दूसरे के द्वारा दोनों शाप वापस ले लिए।
श्लोक 40 (12.29.40)
श्रीसमृद्धं तदा दृष्ट्वा नारदं देवरूपिणम् । सुकुमारी प्रदुद्राव परपुंसविशङ्कया ॥
śrīsamṛddhaṃ tadā dṛṣṭvā nāradaṃ devarūpiṇam | sukumārī pradudrāva parapuṃsaviśaṅkayā
तेज और शोभा से सम्पन्न, देवता के समान रूपवाले नारद को देखकर सुकुमारी पराए पुरुष की आशंका से भाग खड़ी हुई।
श्लोक 41 (12.29.41)
तां पर्वतस्ततो दृष्ट्वा प्रद्रवन्तीमनिन्दिताम् । अब्रवीत्तव भर्तैष नात्र कार्या विचारणा ॥
tāṃ parvatastato dṛṣṭvā pradravantīmaninditām | abravīttava bhartaiṣa nātra kāryā vicāraṇā
उस निर्दोष को भागते देखकर पर्वत ने कहा: 'ये तुम्हारे ही पति हैं; इसमें विचार करने की कोई बात नहीं।
पर्वत उवाच
श्लोक 42 (12.29.42)
ऋषिः परमधर्मात्मा नारदो भगवान्प्रभुः । तवैवाभेद्यहृदयो मा ते भूदत्र संशयः ॥
ṛṣiḥ paramadharmātmā nārado bhagavānprabhuḥ | tavaivābhedyahṛdayo mā te bhūdatra saṃśayaḥ
ये परम धर्मात्मा, पूज्य और प्रभु ऋषि नारद हैं। इनका हृदय केवल तुम्हारे प्रति अटल है; यहाँ तुम्हें कोई संशय न हो।'
श्रीकृष्ण उवाच
श्लोक 43 (12.29.43)
सानुनीता बहुविधं पर्वतेन महात्मना । शापदोषं च तं भर्तुः श्रुत्वा प्रकृतिमागता । पर्वतोऽथ ययौ स्वर्गं नारदोऽभ्यगमद्गृहान् ॥
sānunītā bahuvidhaṃ parvatena mahātmanā | śāpadoṣaṃ ca taṃ bhartuḥ śrutvā prakṛtimāgatā | parvato'tha yayau svargaṃ nārado'bhyagamadgṛhān
महात्मा पर्वत द्वारा अनेक प्रकार से समझाई जाने पर और अपने पति के शाप-दोष की बात सुनकर वह अपनी स्वाभाविक अवस्था में लौट आई। तब पर्वत स्वर्ग चले गए और नारद अपने घर लौटे।
वासुदेव उवाच
श्लोक 44 (12.29.44)
प्रत्यक्षकर्ता सर्वस्य नारदो भगवानृषिः । एष वक्ष्यति ते पृष्टो यथावृत्तं नरोत्तम ॥
pratyakṣakartā sarvasya nārado bhagavānṛṣiḥ | eṣa vakṣyati te pṛṣṭo yathāvṛttaṃ narottama
भगवान् ऋषि नारद सब बातों के प्रत्यक्षदर्शी हैं। हे नरश्रेष्ठ, पूछे जाने पर वे तुम्हें जैसा हुआ था वैसा ही बताएँगे।