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शान्ति पर्व · अध्याय 30

स्वर्णष्ठीवी का जन्म और मृत्यु

युधिष्ठिर के अनुरोध पर नारद कथा पूरी करते हैं। राजा सृञ्जय के यहाँ रहने के बाद नारद और पर्वत उन्हें वर देते हैं; पर्वत ऐसा पुत्र देते हैं जो सोना थूकेगा, पर दीर्घायु नहीं होगा, क्योंकि यह कामना इन्द्र के लिए संकट है। इन्द्र बाघ के रूप में अपना वज्र भेजते हैं, जो गंगा-तट पर बालक को मार डालता है। राजा नारद को स्मरण करते हैं, नारद उन्हें श्रीकृष्ण की बातें सुनाकर सान्त्वना देते हैं और इन्द्र की अनुमति से बालक को जिला देते हैं; वह आगे ग्यारह सौ वर्ष राज्य करता है। नारद युधिष्ठिर से शोक त्यागकर राज्य सँभालने को कहते हैं।

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.30.1)

ततो राजा पाण्डुसुतो नारदं प्रत्यभाषत । भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि सुवर्णष्ठीविसंभवम् ॥

tato rājā pāṇḍusuto nāradaṃ pratyabhāṣata | bhagavañchrotumicchāmi suvarṇaṣṭhīvisaṃbhavam

तब पाण्डुपुत्र राजा ने नारद से कहा: 'भगवन्, मैं सुवर्णष्ठीवी के जन्म की कथा सुनना चाहता हूँ।'

श्लोक 2 (12.30.2)

एवमुक्तस्तु स मुनिर्धर्मराजेन नारदः । आचचक्षे यथावृत्तं सुवर्णष्ठीविनं प्रति ॥

evamuktastu sa munirdharmarājena nāradaḥ | ācacakṣe yathāvṛttaṃ suvarṇaṣṭhīvinaṃ prati

धर्मराज के ऐसा कहने पर मुनि नारद ने सुवर्णष्ठीवी के विषय में जैसा हुआ था वैसा ही कह सुनाया।

नारद उवाच

श्लोक 3 (12.30.3)

एवमेतन्महाबाहो यथाऽयं केशवोऽब्रवीत् । कार्यस्यास्य तु यच्छेषं तत्ते वक्ष्यामि पृच्छतः ॥

evametanmahābāho yathā'yaṃ keśavo'bravīt | kāryasyāsya tu yaccheṣaṃ tatte vakṣyāmi pṛcchataḥ

'हे महाबाहो, यह वैसा ही है जैसा इन केशव ने कहा है। इस विषय में जो शेष है, वह तुम्हारे पूछने पर मैं तुम्हें बताऊँगा।

श्लोक 4 (12.30.4)

अहं च पर्वतश्चैव स्वस्रीयो मे महामुनिः । वस्तुकामावभिगतौ सृञ्जयं जयतां वरम् ॥

ahaṃ ca parvataścaiva svasrīyo me mahāmuniḥ | vastukāmāvabhigatau sṛñjayaṃ jayatāṃ varam

मैं और मेरी बहन का पुत्र महामुनि पर्वत, विजयी राजाओं में श्रेष्ठ सृञ्जय के यहाँ निवास करने की इच्छा से गए।

श्लोक 5 (12.30.5)

तत्रावां पूजितौ तेन विधिदृष्टेन कर्मणा । सर्वकामैः सुविहितौ निवसावोऽस्य वेश्मनि ॥

tatrāvāṃ pūjitau tena vidhidṛṣṭena karmaṇā | sarvakāmaiḥ suvihitau nivasāvo'sya veśmani

वहाँ उसने विधि-विहित कर्म से हमारा सत्कार किया, और सब कामनाओं से भली-भाँति सम्पन्न हम उसके घर में रहे।

श्लोक 6 (12.30.6)

व्यतिक्रान्तासु वर्षासु समये गमनस्य च । पर्वतो मामुवाचेदं काले वचनमर्थवत् ॥

vyatikrāntāsu varṣāsu samaye gamanasya ca | parvato māmuvācedaṃ kāle vacanamarthavat

वर्षा ऋतु बीत जाने पर, प्रस्थान के समय, पर्वत ने मुझसे ये समयोचित और अर्थपूर्ण वचन कहे:

पर्वत उवाच

श्लोक 7 (12.30.7)

आवामस्य नरेन्द्रस्य गृहे परमपूजितौ । उषितौ समये ब्रह्मंस्तद्विचिन्तय सांप्रतम् ॥

āvāmasya narendrasya gṛhe paramapūjitau | uṣitau samaye brahmaṃstadvicintaya sāṃpratam

'हम दोनों इस राजा के घर परम सम्मान के साथ उचित समय तक रहे हैं। हे ब्रह्मन्, अब विचार कीजिए कि क्या करना चाहिए।'

नारद उवाच

श्लोक 8 (12.30.8)

ततोऽहमब्रुवं राजन्पर्वतं शुभदर्शनम् । सर्वमेतत्त्वयि विभो भागिनेयोपपद्यते ॥

tato'hamabruvaṃ rājanparvataṃ śubhadarśanam | sarvametattvayi vibho bhāgineyopapadyate

हे राजन्, तब मैंने सुन्दर रूपवाले पर्वत से कहा: 'हे प्रभो, हे भानजे, यह सब निर्णय करना तुम्हीं को शोभा देता है।

श्लोक 9 (12.30.9)

वरेण च्छन्द्यतां राजा लभतां यद्यदिच्छति । आवयोस्तपसा सिद्धिं प्राप्नोतु यदि मन्यसे ॥

vareṇa cchandyatāṃ rājā labhatāṃ yadyadicchati | āvayostapasā siddhiṃ prāpnotu yadi manyase

राजा को वर देकर प्रसन्न किया जाए; वह जो चाहे पाए। यदि तुम ठीक समझो तो हमारे तप के बल से उसे सिद्धि प्राप्त हो।'

श्लोक 10 (12.30.10)

तत आहूय राजानं सृञ्जयं जयतां वरम् । पर्वतोऽनुमतो वाक्यमुवाच कुरुपुङ्गव ॥

tata āhūya rājānaṃ sṛñjayaṃ jayatāṃ varam | parvato'numato vākyamuvāca kurupuṅgava

हे कुरुश्रेष्ठ, तब मेरी सम्मति पाकर पर्वत ने विजयी राजाओं में श्रेष्ठ राजा सृञ्जय को बुलाकर यह कहा:

पर्वत उवाच

श्लोक 11 (12.30.11)

प्रीतौ स्वो नृप सत्कारैर्भवदार्जवसंभृतैः । आवाभ्यामभ्यनुज्ञातो वरं नृवर चिन्तय ॥

prītau svo nṛpa satkārairbhavadārjavasaṃbhṛtaiḥ | āvābhyāmabhyanujñāto varaṃ nṛvara cintaya

'हे राजन्, तुम्हारी सरलता से भरे सत्कारों से हम दोनों प्रसन्न हैं। हमारी अनुमति पाकर, हे नरश्रेष्ठ, कोई वर सोचो।

श्लोक 12 (12.30.12)

देवानामविहिंसायां न भवेन्मानुषे क्षमम् । तद्गृहाण महाराज पूजार्हो नौ मतो भवान् ॥

devānāmavihiṃsāyāṃ na bhavenmānuṣe kṣamam | tadgṛhāṇa mahārāja pūjārho nau mato bhavān

हे महाराज, ऐसा वर चुनो जिसमें देवताओं की कोई हानि न हो और जो मनुष्य के योग्य सीमा से बाहर न हो; हमारी दृष्टि में तुम सम्मान के पात्र हो।'

सृञ्जय उवाच

श्लोक 13 (12.30.13)

प्रीतौ भवन्तौ यदि मे कृतमेतावता मम । एष एव परो लाभो निर्वृत्तो मे महाफलः ॥

prītau bhavantau yadi me kṛtametāvatā mama | eṣa eva paro lābho nirvṛtto me mahāphalaḥ

'यदि आप दोनों मुझसे प्रसन्न हैं तो मेरे लिए यही बहुत है। यही मेरा परम लाभ है; मुझे महान फल मिल गया।'

नारद उवाच

श्लोक 14 (12.30.14)

तमेवंवादिनं भूयः पर्वतः प्रत्यभाषत । शृणु राजन्सुसंकल्पं यत्ते हृदि चिरं स्थितम् ॥

tamevaṃvādinaṃ bhūyaḥ parvataḥ pratyabhāṣata | śṛṇu rājansusaṃkalpaṃ yatte hṛdi ciraṃ sthitam

इस प्रकार कहनेवाले उन राजा से पर्वत ने फिर कहा: 'हे राजन्, तुम्हारे हृदय में जो उत्तम संकल्प बहुत समय से है, उसे सुनो।

पर्वत उवाच

श्लोक 15 (12.30.15)

अभीप्ससि सुतं वीरं वीर्यवन्तं दृढव्रतम् । आयुष्मतं महाभागं देवराजसमद्युतिम् ॥

abhīpsasi sutaṃ vīraṃ vīryavantaṃ dṛḍhavratam | āyuṣmataṃ mahābhāgaṃ devarājasamadyutim

तुम वीर, पराक्रमी, दृढ़व्रती, दीर्घायु, महाभाग्यशाली और देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी पुत्र चाहते हो।

श्लोक 16 (12.30.16)

भविष्यत्येष ते कामो न त्वायुष्मान्भविष्यति । देवराजाभिभूत्यर्थं संकल्पो ह्ये ते हृदि ॥

bhaviṣyatyeṣa te kāmo na tvāyuṣmānbhaviṣyati | devarājābhibhūtyarthaṃ saṃkalpo hye te hṛdi

तुम्हारी यह कामना पूरी होगी, पर वह पुत्र दीर्घायु नहीं होगा; क्योंकि तुम्हारे हृदय का यह संकल्प देवराज को परास्त करने के लिए है।

श्लोक 17 (12.30.17)

सुवर्णष्ठीवनाच्चैव स्वर्णष्ठीवी भविष्यति । रक्ष्यश्च देवराजात्स देवराजसमद्युतिः ॥

suvarṇaṣṭhīvanāccaiva svarṇaṣṭhīvī bhaviṣyati | rakṣyaśca devarājātsa devarājasamadyutiḥ

वह सोना थूकने के कारण 'स्वर्णष्ठीवी' कहलाएगा; इन्द्र के समान तेजस्वी होने पर भी देवराज से उसकी रक्षा करनी होगी।'

नारद उवाच

श्लोक 18 (12.30.18)

तच्छ्रुत्वा सृञ्जयो वाक्यं पर्वतस्य महात्मनः । प्रसादयामास तदा नैतदेवं भवेदिति ॥

tacchrutvā sṛñjayo vākyaṃ parvatasya mahātmanaḥ | prasādayāmāsa tadā naitadevaṃ bhavediti

महात्मा पर्वत की वह बात सुनकर सृञ्जय ने तब प्रार्थना की कि ऐसा न हो।

श्लोक 19 (12.30.19)

आयुष्मान्मे भवेत्पुत्रो भवतोस्तपसा मुने । न च तं पर्वतः किंचिदुवाचेन्द्रव्यपेक्षया ॥

āyuṣmānme bhavetputro bhavatostapasā mune | na ca taṃ parvataḥ kiṃciduvācendravyapekṣayā

'हे मुनि, आप दोनों के तप से मेरा पुत्र दीर्घायु हो।' किन्तु इन्द्र का विचार करके पर्वत ने उससे कुछ नहीं कहा।

श्लोक 20 (12.30.20)

तमहं नृपतिं दीनमब्रवं पुनरेव च । स्मर्तव्योऽस्मि महाराज दर्शयिष्यामि ते सुतम् ॥

tamahaṃ nṛpatiṃ dīnamabravaṃ punareva ca | smartavyo'smi mahārāja darśayiṣyāmi te sutam

उस दुखी राजा से मैंने फिर कहा: 'हे महाराज, मुझे स्मरण करना; स्मरण करने पर मैं तुम्हें तुम्हारा पुत्र दिखाऊँगा।

श्लोक 21 (12.30.21)

अहं ते दयितं पुत्रं प्रेतराजवशं गतम् । पुनर्दास्यामि तद्रूपं मा शुचः पृथिवीपते ॥

ahaṃ te dayitaṃ putraṃ pretarājavaśaṃ gatam | punardāsyāmi tadrūpaṃ mā śucaḥ pṛthivīpate

तुम्हारा प्रिय पुत्र यमराज के वश में भी चला जाए, तो मैं उसे उसी रूप में तुम्हें लौटा दूँगा। हे पृथ्वीपति, शोक मत करो।'

श्लोक 22 (12.30.22)

एवमुक्त्वा तु नृपतिं प्रयातौ स्वो यथेप्सितम् । सृञ्जयश्च यथाकामं प्रविवेश स्वमन्दिरम् ॥

evamuktvā tu nṛpatiṃ prayātau svo yathepsitam | sṛñjayaśca yathākāmaṃ praviveśa svamandiram

राजा से ऐसा कहकर हम दोनों अपनी इच्छा से चल दिए, और सृञ्जय भी इच्छानुसार अपने महल में चले गए।

श्लोक 23 (12.30.23)

सृञ्जयस्याथ राजर्षेः कस्मिंश्चित्कालपर्यये । जज्ञे पुत्रो महावीर्यस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥

sṛñjayasyātha rājarṣeḥ kasmiṃścitkālaparyaye | jajñe putro mahāvīryastejasā prajvalanniva

फिर कुछ समय बाद राजर्षि सृञ्जय के यहाँ महान पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुआ, जो तेज से मानो जलता हुआ-सा था।

श्लोक 24 (12.30.24)

ववृधे स यथाकालं सरसीव महोत्पलम् । बभूव काञ्चनष्ठीवी यथार्थं नाम तस्य तत् ॥

vavṛdhe sa yathākālaṃ sarasīva mahotpalam | babhūva kāñcanaṣṭhīvī yathārthaṃ nāma tasya tat

वह समय के साथ सरोवर में महाकमल की भाँति बढ़ा, और 'काञ्चनष्ठीवी' हुआ; उसका वह नाम सार्थक था।

श्लोक 25 (12.30.25)

तदद्भुततमं लोके पप्रथे कुरुसत्तम । बुबुधे तच्च देवेन्द्रो वरदानं मनीषिणोः ॥

tadadbhutatamaṃ loke paprathe kurusattama | bubudhe tacca devendro varadānaṃ manīṣiṇoḥ

हे कुरुश्रेष्ठ, यह अत्यन्त अद्भुत बात लोक में फैल गई, और इन्द्र ने उन दोनों विद्वान् ऋषियों के दिए हुए वर को जान लिया।

श्लोक 26 (12.30.26)

ततः स्वाभिभवाद्भीतो बृहस्पतिमते स्थितः । कुमारस्यान्तरप्रेक्षी नित्यमेवाभ्यवर्तत ॥

tataḥ svābhibhavādbhīto bṛhaspatimate sthitaḥ | kumārasyāntaraprekṣī nityamevābhyavartata

तब अपने पराभव से डरे हुए इन्द्र बृहस्पति की सम्मति पर स्थित रहकर सदा उस बालक के पास मँडराते हुए अवसर की ताक में रहे।

श्लोक 27 (12.30.27)

चोदयामास तद्वज्रं दिव्यास्त्रं मूर्तिमत्स्थितम् । व्याघ्रो भूत्वा जहीमं त्वं राजपुत्रमिति प्रभो ॥

codayāmāsa tadvajraṃ divyāstraṃ mūrtimatsthitam | vyāghro bhūtvā jahīmaṃ tvaṃ rājaputramiti prabho

उन्होंने मूर्तिमान होकर खड़े अपने दिव्य अस्त्र वज्र को प्रेरित किया: 'हे प्रभो, तुम बाघ बनकर इस राजकुमार को मार डालो।

इन्द्र उवाच

श्लोक 28 (12.30.28)

प्रवृद्धः किल वीर्येण मामेषोऽभिभविष्यति । सृञ्जयस्य सुतो वज्र यथैनं पर्वतोऽब्रवीत् ॥

pravṛddhaḥ kila vīryeṇa māmeṣo'bhibhaviṣyati | sṛñjayasya suto vajra yathainaṃ parvato'bravīt

बल से बढ़ जाने पर यह मुझे परास्त कर देगा। हे वज्र, यह सृञ्जय का पुत्र है, जैसा पर्वत ने इसके विषय में कहा था।'

नारद उवाच

श्लोक 29 (12.30.29)

एवमुक्तस्तु शक्रेण वज्रः परपुरंजयः । कुमारमन्तरप्रेक्षी नित्यमेवान्वपद्यत ॥

evamuktastu śakreṇa vajraḥ parapuraṃjayaḥ | kumāramantaraprekṣī nityamevānvapadyata

इन्द्र के ऐसा कहने पर शत्रुओं के नगरों को जीतनेवाला वज्र निरन्तर उस बालक का अवसर ताकता रहा।

श्लोक 30 (12.30.30)

सृञ्जयोऽपि सुतं प्राप्य देवराजसमद्युतिम् । हृष्टः सान्तःपुरो राजा वननित्यो बभूव ह ॥

sṛñjayo'pi sutaṃ prāpya devarājasamadyutim | hṛṣṭaḥ sāntaḥpuro rājā vananityo babhūva ha

इन्द्र के समान तेजस्वी पुत्र पाकर सृञ्जय भी हर्षित हुए, और वे राजा अन्तःपुर-सहित सदा वन में ही रहने लगे।

श्लोक 31 (12.30.31)

ततो भागीरथीतीरे कदाचिन्निर्जने वने । धात्रीद्वितीयो बालः स क्रीडार्थं पर्यधावत ॥

tato bhāgīrathītīre kadācinnirjane vane | dhātrīdvitīyo bālaḥ sa krīḍārthaṃ paryadhāvata

फिर एक बार भागीरथी के तट पर निर्जन वन में वह बालक केवल धाय के साथ खेलने के लिए इधर-उधर दौड़ रहा था।

श्लोक 32 (12.30.32)

पञ्चवर्षकदेशीयो बालो नागेन्द्रविक्रमः । सहसोत्पतितं व्याघ्रमाससाद महाबलम् ॥

pañcavarṣakadeśīyo bālo nāgendravikramaḥ | sahasotpatitaṃ vyāghramāsasāda mahābalam

लगभग पाँच वर्ष का वह बालक, जिसकी चाल गजराज जैसी थी, एकाएक कूदकर आए महाबली बाघ के सामने पहुँच गया।

श्लोक 33 (12.30.33)

स बालस्तेन निष्पिष्टो वेपमानो नृपात्मजः । व्यसुः पपात मेदिन्यां ततो धात्री विचुक्रुशे ॥

sa bālastena niṣpiṣṭo vepamāno nṛpātmajaḥ | vyasuḥ papāta medinyāṃ tato dhātrī vicukruśe

उसके द्वारा कुचला गया वह राजकुमार काँपता हुआ प्राणहीन होकर धरती पर गिर पड़ा, और धाय चीख उठी।

श्लोक 34 (12.30.34)

हत्वा तु राजपुत्रं स तत्रैवान्तरधीयत । शार्दूलो देवराजस्य माययान्तर्हितस्तदा ॥

hatvā tu rājaputraṃ sa tatraivāntaradhīyata | śārdūlo devarājasya māyayāntarhitastadā

राजकुमार को मारकर वह बाघ वहीं अन्तर्धान हो गया; देवराज की माया से वह तब अदृश्य हो गया।

श्लोक 35 (12.30.35)

धात्र्यास्तु निनदं श्रुत्वा रुदत्याः परमार्तवत् । अभ्यधावत तं देशं स्वयमेव महीपतिः ॥

dhātryāstu ninadaṃ śrutvā rudatyāḥ paramārtavat | abhyadhāvata taṃ deśaṃ svayameva mahīpatiḥ

अत्यन्त दुःख से रोती हुई धाय की चीख सुनकर राजा स्वयं उस स्थान की ओर दौड़े।

श्लोक 36 (12.30.36)

स ददर्श शयानं तं गतासुं पीतशोणितम् । कुमारं विगतानन्दं निशाकरमिव च्युतम् ॥

sa dadarśa śayānaṃ taṃ gatāsuṃ pītaśoṇitam | kumāraṃ vigatānandaṃ niśākaramiva cyutam

उन्होंने देखा कि बालक प्राणहीन पड़ा है, उसका रक्त पी लिया गया है, उसका सारा आनन्द चला गया है, मानो चन्द्रमा गिर पड़ा हो।

श्लोक 37 (12.30.37)

स तमुत्सङ्गमारोप्य परिपीडितवक्षसम् । पुत्रं रुधिरसंसिक्तं पर्यदेवयदातुरः ॥

sa tamutsaṅgamāropya paripīḍitavakṣasam | putraṃ rudhirasaṃsiktaṃ paryadevayadāturaḥ

छाती कुचली हुई और रक्त से भीगे हुए पुत्र को गोद में उठाकर व्याकुल राजा विलाप करने लगे।

श्लोक 38 (12.30.38)

ततस्ता मातरस्तस्य रुदत्यः शोककर्शिताः । अभ्यधावन्त तं देशं यत्र राजा स सृञ्जयः ॥

tatastā mātarastasya rudatyaḥ śokakarśitāḥ | abhyadhāvanta taṃ deśaṃ yatra rājā sa sṛñjayaḥ

तब उसकी माताएँ रोती हुई, शोक से दुर्बल होकर उस स्थान की ओर दौड़ीं जहाँ राजा सृञ्जय थे।

श्लोक 39 (12.30.39)

ततः स राजा सस्मार मामेव गतमानसः । तदाऽहं चिन्तनं ज्ञात्वा गतवांस्तस्य दर्शनम् ॥

tataḥ sa rājā sasmāra māmeva gatamānasaḥ | tadā'haṃ cintanaṃ jñātvā gatavāṃstasya darśanam

तब राजा ने अन्तर्मुख होकर मुझे ही स्मरण किया, और उसकी चिन्ता जानकर मैं उससे मिलने गया।

श्लोक 40 (12.30.40)

मयैतानि च वाक्यानि श्रावितः शोकलालसः । यानि ते यदुवीरेण कथितानि महीपते ॥

mayaitāni ca vākyāni śrāvitaḥ śokalālasaḥ | yāni te yaduvīreṇa kathitāni mahīpate

हे पृथ्वीपति, शोक में डूबे हुए उसे मैंने वे ही बातें सुनाईं जो यदुवीर ने तुमसे कही हैं।

श्लोक 41 (12.30.41)

संजीवितश्चापि पुनर्वासवानुमते तदा । भवितव्यं तथा तच्च न तच्छक्यमतोऽन्यथा ॥

saṃjīvitaścāpi punarvāsavānumate tadā | bhavitavyaṃ tathā tacca na tacchakyamato'nyathā

और तब इन्द्र की अनुमति से वह फिर जीवित हो गया। ऐसा ही होना था; इससे अन्यथा नहीं हो सकता था।

श्लोक 42 (12.30.42)

तत ऊर्ध्वं कुमारस्तु स्वर्णष्ठीवी महायशाः । चित्तं प्रसादयामास पितृर्मातुश्च वीर्यवान् ॥

tata ūrdhvaṃ kumārastu svarṇaṣṭhīvī mahāyaśāḥ | cittaṃ prasādayāmāsa pitṛrmātuśca vīryavān

इसके बाद महायशस्वी, पराक्रमी बालक स्वर्णष्ठीवी ने अपने माता-पिता के चित्त को प्रसन्न किया।

श्लोक 43 (12.30.43)

कारयामास राज्यं च पितरि स्वर्गते नृप । वर्षाणां शतमेकं च सहस्रं भीमविक्रमः ॥

kārayāmāsa rājyaṃ ca pitari svargate nṛpa | varṣāṇāṃ śatamekaṃ ca sahasraṃ bhīmavikramaḥ

हे राजन्, पिता के स्वर्ग चले जाने पर उस भीमपराक्रमी ने एक हज़ार एक सौ वर्ष तक राज्य किया।

श्लोक 44 (12.30.44)

तत ईजे महायज्ञैर्बहुभिर्भूरिदक्षिणैः । तर्पयामास देवांश्च पितॄंश्चैव महाद्युतिः ॥

tata īje mahāyajñairbahubhirbhūridakṣiṇaiḥ | tarpayāmāsa devāṃśca pitṝṃścaiva mahādyutiḥ

फिर उसने प्रचुर दक्षिणावाले अनेक महायज्ञ किए, और उस महातेजस्वी ने देवताओं और पितरों को तृप्त किया।

श्लोक 45 (12.30.45)

उत्पाद्य च बहून्पुत्रान्कुलसंतानकारिणः । कालेन महता राजन्कालधर्ममुपेयिवान् ॥

utpādya ca bahūnputrānkulasaṃtānakāriṇaḥ | kālena mahatā rājankāladharmamupeyivān

वंश को आगे बढ़ानेवाले बहुत-से पुत्रों को जन्म देकर, हे राजन्, दीर्घकाल के बाद वह कालधर्म (मृत्यु) को प्राप्त हुआ।

श्लोक 46 (12.30.46)

स त्वं राजेन्द्र संजातं शोकमेकं निवर्तय । यथा त्वं केशवः प्राह व्यासश्च सुमहातपाः ॥

sa tvaṃ rājendra saṃjātaṃ śokamekaṃ nivartaya | yathā tvaṃ keśavaḥ prāha vyāsaśca sumahātapāḥ

इसलिए, हे राजेन्द्र, तुम्हें जो यह शोक हुआ है उसे त्याग दो, जैसा केशव ने और महातपस्वी व्यास ने तुमसे कहा है।

श्लोक 47 (12.30.47)

पितृपैतामहं राज्यमास्थाय धुरमुद्वह । इष्ट्वा पुण्यैर्महायज्ञैरिष्टं लोकमवाप्स्यसि ॥

pitṛpaitāmahaṃ rājyamāsthāya dhuramudvaha | iṣṭvā puṇyairmahāyajñairiṣṭaṃ lokamavāpsyasi

पिता-पितामह के राज्य को सँभालकर उसका भार उठाओ; पुण्यमय महायज्ञ करके तुम अपने इष्ट लोक को प्राप्त करोगे।'

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31