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शान्ति पर्व · अध्याय 31

व्यास का युधिष्ठिर को उपदेश

व्यास चुप बैठे शोकग्रस्त युधिष्ठिर से कहते हैं कि धर्म की रक्षा करना और अपराधियों को दण्ड देना राजा का कर्तव्य है, और जिन्हें उन्होंने मारा वे धर्म के नाशक थे। युधिष्ठिर उत्तर देते हैं कि राज्य के लिए बहुत-से अवध्य लोग भी मारे गए, और वे कर्म उन्हें जलाते हैं। व्यास कर्म के कारणों के रूप में ईश्वर, पुरुष और आकस्मिक बल पर विचार करते हैं, शोक छोड़ने को कहते हैं और जीवित रहते प्रायश्चित्त करने की सलाह देते हैं। तब युधिष्ठिर स्वजनों के संहार, विधवाओं के दुःख और नरक के भय का विलाप करते हैं और व्यास से आश्रमों के भेद समझाने को कहते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.31.1)

तूष्णींभूतं तु राजानं शोचमानं युधिष्ठिरम् । तपस्वी धर्मतत्त्वज्ञः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥

tūṣṇīṃbhūtaṃ tu rājānaṃ śocamānaṃ yudhiṣṭhiram | tapasvī dharmatattvajñaḥ kṛṣṇadvaipāyano'bravīt

शोक करते हुए चुप बैठे राजा युधिष्ठिर से धर्म के तत्त्व को जाननेवाले तपस्वी कृष्णद्वैपायन ने कहा:

व्यास उवाच

श्लोक 2 (12.31.2)

प्रजानां पालनं धर्मो राज्ञां राजीवलोचन । धर्मः प्रमाणं लोकस्य नित्यं धर्मोऽनुवर्त्यताम् ॥

prajānāṃ pālanaṃ dharmo rājñāṃ rājīvalocana | dharmaḥ pramāṇaṃ lokasya nityaṃ dharmo'nuvartyatām

'हे कमलनयन, प्रजा की रक्षा करना राजाओं का धर्म है। धर्म ही लोक का प्रमाण है; इसलिए सदा धर्म का पालन करते रहो।

श्लोक 3 (12.31.3)

अनुतिष्ठस्व तद्राजन्पितृपैतामहं पदम् । ब्राह्मणेषु तु यो धर्मः स नित्यो वेदनिश्चितः ॥

anutiṣṭhasva tadrājanpitṛpaitāmahaṃ padam | brāhmaṇeṣu tu yo dharmaḥ sa nityo vedaniścitaḥ

हे राजन्, अपने पिता-पितामह के पद का अनुसरण करो। ब्राह्मणों के विषय में जो धर्म है, वह नित्य और वेद द्वारा निश्चित है।

श्लोक 4 (12.31.4)

तत्प्रमाणं प्रमाणानां शाश्वतं भरतर्षभ । तस्य धर्मस्य कृत्स्नस्य क्षत्रियः परिरक्षिता ॥

tatpramāṇaṃ pramāṇānāṃ śāśvataṃ bharatarṣabha | tasya dharmasya kṛtsnasya kṣatriyaḥ parirakṣitā

हे भरतश्रेष्ठ, वह प्रमाणों में भी प्रमाण और शाश्वत है; और उस समस्त धर्म का रक्षक क्षत्रिय है।

श्लोक 5 (12.31.5)

तथा यः प्रतिहन्त्यस्य शासनं विषये नरः । स बाहुभ्यां विनिग्राह्यो लोकयात्राविघातकः ॥

tathā yaḥ pratihantyasya śāsanaṃ viṣaye naraḥ | sa bāhubhyāṃ vinigrāhyo lokayātrāvighātakaḥ

जो मनुष्य अपने राज्य में उस शासन का विरोध करता है, वह लोकयात्रा में बाधा डालनेवाला है; उसे बाहुबल से दबाना चाहिए।

श्लोक 6 (12.31.6)

प्रमाणमप्रमाणं यः कुर्यान्मोहवशं गतः । भृत्यो वा यदि वा पुत्रस्तपस्वी वाऽथ कश्चन ॥

pramāṇamapramāṇaṃ yaḥ kuryānmohavaśaṃ gataḥ | bhṛtyo vā yadi vā putrastapasvī vā'tha kaścana

जो कोई मोह के वश होकर प्रमाणभूत को अप्रमाण कर दे, चाहे वह सेवक हो, पुत्र हो, तपस्वी हो या और कोई,

श्लोक 7 (12.31.7)

पापान्सर्वैरुपायैस्तान्नियच्छेच्छातयीत वा । अतोऽन्यथा वर्तमानो राजा प्राप्नोति किल्विषम् ॥

pāpānsarvairupāyaistānniyacchecchātayīta vā | ato'nyathā vartamāno rājā prāpnoti kilviṣam

ऐसे पापियों को सब उपायों से रोकना चाहिए, अथवा मरवा देना चाहिए। इससे विपरीत आचरण करनेवाला राजा पाप का भागी होता है।

श्लोक 8 (12.31.8)

धर्मं विनश्यमानं हि यो न रक्षेत्स धर्महा । ते त्वया धर्महन्तारो निहताः सपदानुगाः ॥

dharmaṃ vinaśyamānaṃ hi yo na rakṣetsa dharmahā | te tvayā dharmahantāro nihatāḥ sapadānugāḥ

जो नष्ट होते हुए धर्म की रक्षा नहीं करता, वह धर्म का हत्यारा है। उन धर्म-नाशकों को तुमने उनके अनुचरों-सहित मार डाला है।

श्लोक 9 (12.31.9)

स्वधर्मे वर्तमानस्त्वं किंनु शोचसि पाण्डव । राजा हि हन्याद्दद्याच्च प्रजा रक्षेच्च धर्मतः ॥

svadharme vartamānastvaṃ kiṃnu śocasi pāṇḍava | rājā hi hanyāddadyācca prajā rakṣecca dharmataḥ

हे पाण्डव, अपने धर्म में स्थित होकर तुम शोक क्यों करते हो? राजा को धर्मपूर्वक दण्ड देना, दान देना और प्रजा की रक्षा करनी ही चाहिए।'

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 10 (12.31.10)

न तेऽतिशङ्के वचनं यद्ब्रवीषि तपोधन । अपरोक्षो हि ते धर्मः सर्वधर्मविदां वर ॥

na te'tiśaṅke vacanaṃ yadbravīṣi tapodhana | aparokṣo hi te dharmaḥ sarvadharmavidāṃ vara

'हे तपोधन, आप जो कहते हैं उसमें मुझे शंका नहीं है। हे सब धर्म जाननेवालों में श्रेष्ठ, धर्म आपके सामने प्रत्यक्ष है।

श्लोक 11 (12.31.11)

मया त्ववध्या बहवो घातिता राज्यकारणात् । तानि कर्माणि मे ब्रह्मन्दहन्ति च पचन्ति च ॥

mayā tvavadhyā bahavo ghātitā rājyakāraṇāt | tāni karmāṇi me brahmandahanti ca pacanti ca

पर राज्य के लिए मैंने बहुत-से ऐसे लोगों को मरवाया है जो वध के योग्य नहीं थे। हे ब्रह्मन्, वे कर्म मुझे जलाते और सताते हैं।'

व्यास उवाच

श्लोक 12 (12.31.12)

ईश्वरो वा भवेत्कर्ता पुरुषो वाऽपि भारत । हठो वा वर्तते लोके कर्मजं वा फलं स्मृतम् ॥

īśvaro vā bhavetkartā puruṣo vā'pi bhārata | haṭho vā vartate loke karmajaṃ vā phalaṃ smṛtam

'हे भारत, कर्ता ईश्वर हो सकता है, या पुरुष, या संसार में आकस्मिक बल चलता है; अथवा फल कर्म से उत्पन्न होता है। ऐसा माना गया है।

श्लोक 13 (12.31.13)

ईश्वरेण नियुक्तो हि साध्वसाधु च भारत । कुरुते पुरुषः कर्म फलमीश्वरगामि तत् ॥

īśvareṇa niyukto hi sādhvasādhu ca bhārata | kurute puruṣaḥ karma phalamīśvaragāmi tat

क्योंकि पुरुष ईश्वर द्वारा प्रेरित होकर भला-बुरा कर्म करता है, हे भारत; उसका फल ईश्वर को ही जाता है।

श्लोक 14 (12.31.14)

यथाहि पुरुषश्छिन्द्याद्वृक्षं परशुना वने । छेत्तुरेव भवेत्पापं परशोर्न कथंचन ॥

yathāhi puruṣaśchindyādvṛkṣaṃ paraśunā vane | chettureva bhavetpāpaṃ paraśorna kathaṃcana

जैसे कोई मनुष्य वन में कुल्हाड़ी से वृक्ष काटे, तो पाप काटनेवाले का ही होता है, कुल्हाड़ी का किसी प्रकार नहीं।

श्लोक 15 (12.31.15)

अथवा तदुपादानात्प्राप्नुयात्कर्मणः फलम् । दण्डशस्त्रकृतं पापं पुरुषे तन्न विद्यते ॥

athavā tadupādānātprāpnuyātkarmaṇaḥ phalam | daṇḍaśastrakṛtaṃ pāpaṃ puruṣe tanna vidyate

अथवा यदि उपकरण को ग्रहण करने के कारण कर्म का फल मिलता, तो दण्ड और शस्त्र से किया हुआ पाप पुरुष में नहीं रहता।

श्लोक 16 (12.31.16)

न चैतदिष्टं कौन्तेय यदन्येन कृतं फलम् । प्राप्नुयादिति तस्माच्च ईश्वरे तन्निवेशय ॥

na caitadiṣṭaṃ kaunteya yadanyena kṛtaṃ phalam | prāpnuyāditi tasmācca īśvare tanniveśaya

और यदि, हे कुन्तीपुत्र, यह मान्य नहीं है कि दूसरे के किए का फल किसी और को मिले, तो उसे ईश्वर पर ही डाल दो।

श्लोक 17 (12.31.17)

अथापि पुरुषः कर्ता कर्मणोः शुभपापयोः । न परो विद्यते तस्मादेवमप्यशुभं कुतः ॥

athāpi puruṣaḥ kartā karmaṇoḥ śubhapāpayoḥ | na paro vidyate tasmādevamapyaśubhaṃ kutaḥ

अथवा यदि पुरुष ही शुभ और अशुभ कर्मों का कर्ता है और उससे परे कोई नहीं, तो भी अशुभ कहाँ से आएगा?

श्लोक 18 (12.31.18)

न हि कश्चित्क्वचिद्राजन्दिष्टं प्रतिनिवर्तते । दण्डशस्त्रकृतं पापं पुरुषे तन्न विद्यते ॥

na hi kaścitkvacidrājandiṣṭaṃ pratinivartate | daṇḍaśastrakṛtaṃ pāpaṃ puruṣe tanna vidyate

हे राजन्, कोई भी कहीं भी विधान से पीछे नहीं हटता। दण्ड और शस्त्र से किया हुआ पाप पुरुष में नहीं रहता।

श्लोक 19 (12.31.19)

यदि वा मन्यसे राजन्हतमेकं प्रतिष्ठितम् । एवमप्यशुभं कर्म न भूतं न भविष्यति ॥

yadi vā manyase rājanhatamekaṃ pratiṣṭhitam | evamapyaśubhaṃ karma na bhūtaṃ na bhaviṣyati

अथवा हे राजन्, यदि तुम मानते हो कि किसी का मारा जाना पहले से ठहरी हुई बात है, तो इस प्रकार भी कोई अशुभ कर्म न कभी हुआ है, न होगा।

श्लोक 20 (12.31.20)

अथाभिपत्तिर्लोकस्य कर्तव्या पुण्यपापयोः । अभिपन्नमिदं लोके राज्ञामुद्यतदण्डनम् ॥

athābhipattirlokasya kartavyā puṇyapāpayoḥ | abhipannamidaṃ loke rājñāmudyatadaṇḍanam

अथवा यदि लोक को पुण्य और पाप की व्यवस्था करनी ही है, तो राजाओं का दण्ड उठाना लोक में स्वीकृत है।

श्लोक 21 (12.31.21)

तथापि लोके कर्माणि समावर्तन्ति भारत । शुभाशुभफलं चैते प्राप्नुवन्तीति मे मतिः ॥

tathāpi loke karmāṇi samāvartanti bhārata | śubhāśubhaphalaṃ caite prāpnuvantīti me matiḥ

फिर भी, हे भारत, लोक में कर्म बार-बार होते रहते हैं, और ये प्राणी शुभ और अशुभ का फल पाते हैं; ऐसा मेरा मत है।

श्लोक 22 (12.31.22)

एवं पश्य शुभादेशं कर्मणस्तत्फलं ध्रुवम् । त्यज त्वं राजशार्दूल मैवं शोके मनः कृथा ॥

evaṃ paśya śubhādeśaṃ karmaṇastatphalaṃ dhruvam | tyaja tvaṃ rājaśārdūla maivaṃ śoke manaḥ kṛthā

ऐसे देखो: कर्म का फल निश्चित है और शुभ का मार्ग बताया गया है। हे राजसिंह, इस शोक को छोड़ दो; इस प्रकार मन को शोक में मत लगाओ।

श्लोक 23 (12.31.23)

स्वधर्मे वर्तमानस्य सापवादेऽपि भारत । एवमात्मपरित्यागस्तव राजन्न शोभनः ॥

svadharme vartamānasya sāpavāde'pi bhārata | evamātmaparityāgastava rājanna śobhanaḥ

हे भारत, अपने धर्म में रहनेवाले के लिए, निन्दा का अवसर होने पर भी, इस प्रकार आत्मत्याग करना, हे राजन्, तुम्हें शोभा नहीं देता।

श्लोक 24 (12.31.24)

विहितानि हि कौन्तेय प्रायश्चित्तानि कर्मणाम् । शरीरवांस्तानि कुर्यादशरीरः पराभवेत् ॥

vihitāni hi kaunteya prāyaścittāni karmaṇām | śarīravāṃstāni kuryādaśarīraḥ parābhavet

हे कुन्तीपुत्र, कर्मों के प्रायश्चित्त विहित हैं। शरीरधारी उन्हें कर सकता है; शरीर न रहने पर वह हार जाता है।

श्लोक 25 (12.31.25)

तद्राजञ्जीवमानस्त्वं प्रायश्चित्तं करिष्यसि । प्रायश्चित्तमकृत्वा तु प्रेत्य तप्ताऽसि भारत ॥

tadrājañjīvamānastvaṃ prāyaścittaṃ kariṣyasi | prāyaścittamakṛtvā tu pretya taptā'si bhārata

इसलिए, हे राजन्, जीवित रहते हुए तुम प्रायश्चित्त करोगे; पर प्रायश्चित्त किए बिना, हे भारत, परलोक में तुम्हें कष्ट भोगना पड़ेगा।'

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 26 (12.31.26)

हताः पुत्राश्च पौत्राश्च भ्रातरः पितरस्तथा । श्वशुरा गुरवश्चैव मातुलाश्च पितामहाः ॥

hatāḥ putrāśca pautrāśca bhrātaraḥ pitarastathā | śvaśurā guravaścaiva mātulāśca pitāmahāḥ

'पुत्र और पौत्र, भाई और बड़े-बुज़ुर्ग मारे गए; श्वशुर और गुरु, मामा और पितामह भी,

श्लोक 27 (12.31.27)

क्षत्रियाश्च महात्मानः संबन्धिसुहृदस्तथा । वयस्या भागिनेयाश्च ज्ञातयश्च पितामह ॥

kṣatriyāśca mahātmānaḥ saṃbandhisuhṛdastathā | vayasyā bhāgineyāśca jñātayaśca pitāmaha

महात्मा क्षत्रिय, सम्बन्धी और मित्र, साथी, भानजे और जातिजन, हे पितामह;

श्लोक 28 (12.31.28)

बहवश्च मनुष्येन्द्रा नानादेशसमागताः । घातिता राज्यलुब्धेन मयैकेन पितामह ॥

bahavaśca manuṣyendrā nānādeśasamāgatāḥ | ghātitā rājyalubdhena mayaikena pitāmaha

और अनेक देशों से आए हुए बहुत-से राजा राज्य के लोभी मुझ अकेले के द्वारा मारे गए, हे पितामह।

श्लोक 29 (12.31.29)

तांस्तादृशानहं हत्वा धर्मनित्यान्महीक्षितः । असकृत्सोमपान्वीरान्किं प्राप्स्यामि तपोधन ॥

tāṃstādṛśānahaṃ hatvā dharmanityānmahīkṣitaḥ | asakṛtsomapānvīrānkiṃ prāpsyāmi tapodhana

सदा धर्म में लगे रहनेवाले, बार-बार सोमपान करनेवाले, ऐसे वीर राजाओं को मारकर, हे तपोधन, मैं क्या पाऊँगा?

श्लोक 30 (12.31.30)

दह्याम्यनिशमद्यापि चिन्तयानः पुनः पुनः । हीनां पार्थिवसिंहैस्तैः श्रीमद्भिः पृथिवीमिमाम् ॥

dahyāmyaniśamadyāpi cintayānaḥ punaḥ punaḥ | hīnāṃ pārthivasiṃhaistaiḥ śrīmadbhiḥ pṛthivīmimām

उन तेजस्वी राजसिंहों से रहित इस पृथ्वी को बार-बार सोचते हुए मैं आज भी निरन्तर जलता रहता हूँ।

श्लोक 31 (12.31.31)

दृष्ट्वा ज्ञातिवधं घोरं हतांश्च शतशः परान् । कोटिशश्च नरानन्यान्परितप्ये पितामह ॥

dṛṣṭvā jñātivadhaṃ ghoraṃ hatāṃśca śataśaḥ parān | koṭiśaśca narānanyānparitapye pitāmaha

स्वजनों का भयंकर वध, सैकड़ों दूसरों का मारा जाना और करोड़ों अन्य मनुष्यों का संहार देखकर, हे पितामह, मैं सन्तप्त हूँ।

श्लोक 32 (12.31.32)

का नु तासां वरस्त्रीणामवस्थाऽद्य भविष्यति । विहीनानां तु तनयैः पतिभिर्भ्रातृभिस्तथा ॥

kā nu tāsāṃ varastrīṇāmavasthā'dya bhaviṣyati | vihīnānāṃ tu tanayaiḥ patibhirbhrātṛbhistathā

पुत्रों, पतियों और भाइयों से रहित उन श्रेष्ठ स्त्रियों की अब क्या दशा होगी?

श्लोक 33 (12.31.33)

अस्मानन्तकरान्घोरान्पाण्डवान्वृष्णिसंहतान् । आक्रोशन्त्यः कृशा दीनाः प्रपतिष्यन्ति भूतले ॥

asmānantakarānghorānpāṇḍavānvṛṣṇisaṃhatān | ākrośantyaḥ kṛśā dīnāḥ prapatiṣyanti bhūtale

हमें, वृष्णियों के साथ मिले हुए पाण्डवों को, अन्त करनेवाले भयंकर कहकर कोसती हुई वे दुर्बल और दीन स्त्रियाँ धरती पर गिर पड़ेंगी।

श्लोक 34 (12.31.34)

अपश्यन्त्यः पितॄन्भ्रातॄन्पतीन्पुत्रांश्च योषितः । त्यक्त्वा प्राणान्स्त्रियः सर्वागमिष्यन्ति यमक्षयम् ॥

apaśyantyaḥ pitṝnbhrātṝnpatīnputrāṃśca yoṣitaḥ | tyaktvā prāṇānstriyaḥ sarvāgamiṣyanti yamakṣayam

अपने पिताओं, भाइयों, पतियों और पुत्रों को न देखकर वे सब स्त्रियाँ प्राण त्यागकर यमलोक चली जाएँगी।

श्लोक 35 (12.31.35)

वत्सलत्वाद्द्विजश्रेष्ठ तत्र मे नास्ति संशयः । व्यक्तं सौक्ष्म्याच्च धर्मस्य प्राप्स्यामः स्त्रीवधं वयम् ॥

vatsalatvāddvijaśreṣṭha tatra me nāsti saṃśayaḥ | vyaktaṃ saukṣmyācca dharmasya prāpsyāmaḥ strīvadhaṃ vayam

हे द्विजश्रेष्ठ, उनके स्नेह के कारण, इसमें मुझे कोई संशय नहीं, और धर्म की सूक्ष्मता से हम निश्चय ही स्त्री-वध के भागी होंगे।

श्लोक 36 (12.31.36)

ते वयं सुहृदो हत्वा कृत्वा पापमनन्तकम् । नरके निपतिष्यामो ह्यधः शिरस एव ह ॥

te vayaṃ suhṛdo hatvā kṛtvā pāpamanantakam | narake nipatiṣyāmo hyadhaḥ śirasa eva ha

अपने सुहृदों को मारकर और अनन्त पाप करके हम नरक में सिर के बल गिरेंगे।

श्लोक 37 (12.31.37)

शरीराणि विमोक्ष्यामस्तपसोग्रेण सत्तम । आश्रमाणां विशेषं त्वमथाचक्ष्व पितामह ॥

śarīrāṇi vimokṣyāmastapasogreṇa sattama | āśramāṇāṃ viśeṣaṃ tvamathācakṣva pitāmaha

हे सत्तम, हम कठोर तप से अपने शरीर त्याग देंगे। हे पितामह, अब आप मुझे आश्रमों के भेद समझाइए।'

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