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शान्ति पर्व · अध्याय 32

व्यास का युधिष्ठिर को आश्वासन

व्यास शोकग्रस्त युधिष्ठिर से कहते हैं कि विषाद न करें: क्षत्रिय अपने ही धर्म से मारे गये हैं और काल, जो प्राणियों के कर्मों के द्वारा काम करता है, ही वास्तविक संहारक है। वे देवासुर-संग्राम की कथा सुनाकर बताते हैं कि अधर्म फैलाने वालों का दमन उचित है, और प्रायश्चित्त के रूप में अश्वमेध यज्ञ का विधान करते हैं। वे राजा से कहते हैं कि जीते हुए राज्यों की व्यवस्था करें, प्रजा को आश्वस्त करें और अपने क्षत्रिय-धर्म में स्थिर रहें।

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.32.1)

युधिष्ठिरस्य तद्वाक्यं श्रुत्वा द्वैपायनस्तदा । परीक्ष्य निपुणं बुद्ध्या ऋषिः प्रोवाच पाण्डवम् ॥

yudhiṣṭhirasya tadvākyaṃ śrutvā dvaipāyanastadā | parīkṣya nipuṇaṃ buddhyā ṛṣiḥ provāca pāṇḍavam

युधिष्ठिर की वह बात सुनकर द्वैपायन ने तब बुद्धि से उस पर भली-भाँति विचार किया और ऋषि ने पाण्डव से कहा।

व्यास उवाच

श्लोक 2 (12.32.2)

मा विषादं कृथा राजन्क्षत्रधर्ममनुस्मरन् । स्वधर्मेण हता ह्येते क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ॥

mā viṣādaṃ kṛthā rājankṣatradharmamanusmaran | svadharmeṇa hatā hyete kṣatriyāḥ kṣatriyarṣabha

हे राजन्, क्षत्रिय-धर्म का स्मरण करके विषाद मत करो। हे क्षत्रियश्रेष्ठ, ये क्षत्रिय अपने ही धर्म से मारे गये हैं।

श्लोक 3 (12.32.3)

काङ्क्षमाणाः श्रियं कृत्स्नां पृथिव्यां च महद्यशः । कृतान्तविधिसंयुक्ताः कालेन निधनं गताः ॥

kāṅkṣamāṇāḥ śriyaṃ kṛtsnāṃ pṛthivyāṃ ca mahadyaśaḥ | kṛtāntavidhisaṃyuktāḥ kālena nidhanaṃ gatāḥ

पृथ्वी की सम्पूर्ण श्री और महान् यश की कामना करते हुए, कृतान्त (यम) के विधान से बँधे हुए वे काल के द्वारा मृत्यु को प्राप्त हुए।

श्लोक 4 (12.32.4)

न त्वं हन्ता न भीमोऽयं नार्जुनो न यमावपि । कालः पर्यायधर्मेण प्राणानादत्त देहिनाम् ॥

na tvaṃ hantā na bhīmo'yaṃ nārjuno na yamāvapi | kālaḥ paryāyadharmeṇa prāṇānādatta dehinām

न तुम मारने वाले हो, न भीम, न अर्जुन, और न दोनों जुड़वाँ भाई ही; काल अपने क्रम के नियम से देहधारियों के प्राण हर लेता है।

श्लोक 5 (12.32.5)

न तस्य मातापितरौ नानुग्राह्यो हि कश्चन । कर्मसाक्षी प्रजानां यस्तेन कालेन संहृताः ॥

na tasya mātāpitarau nānugrāhyo hi kaścana | karmasākṣī prajānāṃ yastena kālena saṃhṛtāḥ

उसके न माता है न पिता, और कोई उसकी कृपा का पात्र नहीं है; वह प्राणियों के कर्मों का साक्षी है, और उसी काल ने उन्हें समेट लिया है।

श्लोक 6 (12.32.6)

हेतुमात्रमिदं तस्य विहितं भरतर्षभ । यद्धन्ति भूतैर्भूतानि तदस्मै रूपमैश्वरम् ॥

hetumātramidaṃ tasya vihitaṃ bharatarṣabha | yaddhanti bhūtairbhūtāni tadasmai rūpamaiśvaram

हे भरतश्रेष्ठ, यह तो उसका ठहराया हुआ निमित्तमात्र है; जो प्राणी प्राणियों को मारते हैं, वही उसका ईश्वरीय रूप है।

श्लोक 7 (12.32.7)

कर्म मूर्त्यात्मकं विद्धि साक्षिणं शुभपापयोः । सुखदुःखगुणोदर्कं कालं कालफलप्रदम् ॥

karma mūrtyātmakaṃ viddhi sākṣiṇaṃ śubhapāpayoḥ | sukhaduḥkhaguṇodarkaṃ kālaṃ kālaphalapradam

काल को कर्म का ही मूर्त रूप जानो; वह शुभ और अशुभ का साक्षी है, उसका परिणाम सुख और दुःख के रूप में प्रकट होता है, और वही समय पर फल देने वाला है।

श्लोक 8 (12.32.8)

तेषामपि महाबाहो कर्माणि परिचिन्तय । विनाशहेतुकानि त्वं यैस्ते कालवशं गताः ॥

teṣāmapi mahābāho karmāṇi paricintaya | vināśahetukāni tvaṃ yaiste kālavaśaṃ gatāḥ

हे महाबाहो, उनके उन कर्मों पर भी विचार करो जो उनके विनाश के कारण बने और जिनसे वे काल के वश में पड़ गये।

श्लोक 9 (12.32.9)

आत्मनश्च विजानीहि नियतव्रतशीलताम् । यदा त्वमीदृशं कर्म विधिनाऽऽक्रम्य कारितः ॥

ātmanaśca vijānīhi niyatavrataśīlatām | yadā tvamīdṛśaṃ karma vidhinā''kramya kāritaḥ

और अपने भी नियत व्रत और शील को पहचानो; जब विधाता ने तुम्हें विवश करके ऐसा कर्म करवाया।

श्लोक 10 (12.32.10)

त्वष्ट्रेव विहितं यन्त्रं यथा चेष्टयितुर्वशे । कर्मणा कालयुक्तेन तथेदं भ्राम्यते जगत् ॥

tvaṣṭreva vihitaṃ yantraṃ yathā ceṣṭayiturvaśe | karmaṇā kālayuktena tathedaṃ bhrāmyate jagat

जैसे त्वष्टा का बनाया हुआ यन्त्र चलाने वाले के वश में रहता है, वैसे ही यह जगत् काल से युक्त कर्म द्वारा घुमाया जाता है।

श्लोक 11 (12.32.11)

पुरुषस्य हि दृष्ट्वेमामुत्पत्तिमनिमित्ततः । यदृच्छया विनाशं च शोकहर्षावनर्थकौ ॥

puruṣasya hi dṛṣṭvemāmutpattimanimittataḥ | yadṛcchayā vināśaṃ ca śokaharṣāvanarthakau

मनुष्य की उत्पत्ति को बिना कारण और उसके विनाश को संयोग से होते देखकर शोक और हर्ष दोनों व्यर्थ हैं।

श्लोक 12 (12.32.12)

व्यलीकमपि यत्त्वत्र चित्तवैतंसिकं तव । तदर्थमिष्यते राजन्प्रायश्चित्तं तदाचर ॥

vyalīkamapi yattvatra cittavaitaṃsikaṃ tava | tadarthamiṣyate rājanprāyaścittaṃ tadācara

हे राजन्, इस विषय में तुम्हारे मन में जो भी दोष अब भी अटका है, उसी के लिए प्रायश्चित्त अपेक्षित है; उसे करो।

श्लोक 13 (12.32.13)

इदं तु श्रूयते पार्थ युद्धे देवासुरे पुरा । असुरा भ्रातरो ज्येष्ठा देवाश्चापि यवीयसः ॥

idaṃ tu śrūyate pārtha yuddhe devāsure purā | asurā bhrātaro jyeṣṭhā devāścāpi yavīyasaḥ

हे पार्थ, यह भी सुना जाता है कि प्राचीन काल के देवासुर-संग्राम में असुर बड़े भाई थे और देवता छोटे।

श्लोक 14 (12.32.14)

तेषामपि श्रीनिमित्तं महानासीत्समुच्छ्रयः । युद्धं वर्षसहस्राणि द्वात्रिंशदभवत्किल ॥

teṣāmapi śrīnimittaṃ mahānāsītsamucchrayaḥ | yuddhaṃ varṣasahasrāṇi dvātriṃśadabhavatkila

उनके बीच भी श्री के लिए बड़ा विरोध हुआ; कहते हैं वह युद्ध बत्तीस हज़ार वर्ष चला।

श्लोक 15 (12.32.15)

एकार्णवां महीं कृत्वा रुधिरेण परिप्लुताम् । जघ्नुर्दैत्यांस्तथा देवास्त्रिदिवं चाभिलेभिरे ॥

ekārṇavāṃ mahīṃ kṛtvā rudhireṇa pariplutām | jaghnurdaityāṃstathā devāstridivaṃ cābhilebhire

पृथ्वी को रक्त से सराबोर करके एक ही महासागर-सी बना देने के बाद देवताओं ने दैत्यों को मार डाला और स्वर्ग प्राप्त किया।

श्लोक 16 (12.32.16)

तथैव पृथिवीं लब्ध्वा ब्राह्मणा वेदपारगाः । संश्रिता दानवानां वै साह्यार्थं दर्पमोहिताः ॥

tathaiva pṛthivīṃ labdhvā brāhmaṇā vedapāragāḥ | saṃśritā dānavānāṃ vai sāhyārthaṃ darpamohitāḥ

इसी प्रकार पृथ्वी पाकर वेदों में पारंगत ब्राह्मण भी अभिमान से मोहित होकर दानवों की सहायता के लिए उनके पक्ष में जा मिले।

श्लोक 17 (12.32.17)

शालावृका इति ख्यातास्त्रिषु लोकेषु भारत । अष्टाशीतिसहस्राणि ते चापि विबुधैर्हताः ॥

śālāvṛkā iti khyātāstriṣu lokeṣu bhārata | aṣṭāśītisahasrāṇi te cāpi vibudhairhatāḥ

हे भारत, तीनों लोकों में वे शालावृक नाम से प्रसिद्ध थे; उन अट्ठासी हज़ार को भी देवताओं ने मार डाला।

श्लोक 18 (12.32.18)

धर्मव्युच्छित्तिमिच्छतो येऽधर्मस्य प्रवर्तकाः । हन्तव्यास्ते दुरात्मानो देवैर्दैत्या इवोल्वणाः ॥

dharmavyucchittimicchato ye'dharmasya pravartakāḥ | hantavyāste durātmāno devairdaityā ivolvaṇāḥ

जो धर्म का नाश चाहते हुए अधर्म को बढ़ाने वाले हैं, उन दुरात्माओं का वध करना चाहिए, जैसे देवताओं ने उग्र दैत्यों का वध किया।

श्लोक 19 (12.32.19)

एकं हत्वा यदि कुले शिष्टानां स्यादनामयम् । कुलं हत्वा च राष्ट्रे च न तद्वृत्तोपघातकम् ॥

ekaṃ hatvā yadi kule śiṣṭānāṃ syādanāmayam | kulaṃ hatvā ca rāṣṭre ca na tadvṛttopaghātakam

यदि कुल में एक को मारने से शेष सज्जन निर्भय हो सकें, या एक कुल को मारने से राष्ट्र के सज्जन निर्भय हो सकें, तो वह सदाचार का घात नहीं है।

श्लोक 20 (12.32.20)

अधर्मरूपो धर्मो हि कश्चिदस्ति नराधिप । धर्मरूपो ह्यधर्मश्च तच्च ज्ञेयं विपश्चिता ॥

adharmarūpo dharmo hi kaścidasti narādhipa | dharmarūpo hyadharmaśca tacca jñeyaṃ vipaścitā

हे नरेश्वर, कोई धर्म अधर्म का रूप लिये होता है और कोई अधर्म धर्म का रूप लिये होता है; विवेकी पुरुष को यह जानना चाहिए।

श्लोक 21 (12.32.21)

तस्मात्संस्तम्भयात्मानं श्रुतवानसि पाण्डव । देवैः पूर्वगतं मार्गमनुयातोऽसि भारत ॥

tasmātsaṃstambhayātmānaṃ śrutavānasi pāṇḍava | devaiḥ pūrvagataṃ mārgamanuyāto'si bhārata

इसलिए अपने को स्थिर करो, हे पाण्डव; तुम शास्त्र के ज्ञाता हो। हे भारत, तुम उसी मार्ग पर चले हो जिस पर पहले देवता चले थे।

श्लोक 22 (12.32.22)

न हीदृशा गमिष्यन्ति नरकं पाण्डवर्षभ । भ्रातॄनाश्वासयैतांस्त्वं सुहृदश्च परंतप ॥

na hīdṛśā gamiṣyanti narakaṃ pāṇḍavarṣabha | bhrātṝnāśvāsayaitāṃstvaṃ suhṛdaśca paraṃtapa

हे पाण्डवश्रेष्ठ, तुम जैसे लोग नरक में नहीं जाते। हे परंतप, अपने इन भाइयों और मित्रों को ढाढ़स बँधाओ।

श्लोक 23 (12.32.23)

यो हि पापसमारम्भे कार्ये तद्भावभावितः । कुर्वन्नपि तथैव स्यात्कृत्वा च निरपत्रपः ॥

yo hi pāpasamārambhe kārye tadbhāvabhāvitaḥ | kurvannapi tathaiva syātkṛtvā ca nirapatrapaḥ

जो पुरुष पाप-कर्म के आरम्भ में उसी भाव से भरा हो, उसे करते हुए भी वैसा ही रहे, और करके भी निर्लज्ज बना रहे,

श्लोक 24 (12.32.24)

तस्मिंस्तत्कलुषं सर्वं समस्तमिति शब्दितम् । प्रायश्चित्तं न तस्यास्ति ह्रासो वा पापकर्मणः ॥

tasmiṃstatkaluṣaṃ sarvaṃ samastamiti śabditam | prāyaścittaṃ na tasyāsti hrāso vā pāpakarmaṇaḥ

उसमें वह सारा कलुष पूर्ण रूप से रहता है, ऐसा कहा गया है; उसके लिए न प्रायश्चित्त है और न उसके पाप-कर्म में कोई कमी।

श्लोक 25 (12.32.25)

त्वं तु शुक्लाभिजातीयः परदोषेण कारितः । अनिच्छमानः कर्मेदं कृत्वा च परितप्यसे ॥

tvaṃ tu śuklābhijātīyaḥ paradoṣeṇa kāritaḥ | anicchamānaḥ karmedaṃ kṛtvā ca paritapyase

किन्तु तुम शुद्ध कुल में उत्पन्न हो और दूसरे के दोष से प्रेरित किये गये हो; तुमने यह कर्म अनिच्छा से किया और अब करके पछता रहे हो।

श्लोक 26 (12.32.26)

अश्वमेधो महायज्ञः प्रायश्चित्तमुदाहृतम् । तमाहर महाराज विपाप्मैवं भविष्यसि ॥

aśvamedho mahāyajñaḥ prāyaścittamudāhṛtam | tamāhara mahārāja vipāpmaivaṃ bhaviṣyasi

अश्वमेध महायज्ञ को प्रायश्चित्त बताया गया है। हे महाराज, उसे करो; इस प्रकार तुम पापरहित हो जाओगे।

श्लोक 27 (12.32.27)

मरुद्भिः सह जित्वाऽरीन्भगवान्पाकशासनः । एकैकं क्रतुमाहृत्य शतकृत्वः शतक्रतुः ॥

marudbhiḥ saha jitvā'rīnbhagavānpākaśāsanaḥ | ekaikaṃ kratumāhṛtya śatakṛtvaḥ śatakratuḥ

मरुद्गणों के साथ शत्रुओं को जीतकर भगवान् पाकशासन इन्द्र ने एक-एक यज्ञ सौ-सौ बार करके 'शतक्रतु' नाम पाया।

श्लोक 28 (12.32.28)

धूतपाप्मा जितस्वर्गो लोकान्प्राप्य सुखोदयान् । मरुद्गणैर्वृतः शक्रः शुशुभे भासयन्दिशः ॥

dhūtapāpmā jitasvargo lokānprāpya sukhodayān | marudgaṇairvṛtaḥ śakraḥ śuśubhe bhāsayandiśaḥ

पाप को झाड़कर, स्वर्ग जीतकर और सुख बढ़ाने वाले लोकों को पाकर इन्द्र मरुद्गणों से घिरे हुए दिशाओं को प्रकाशित करते हुए शोभित हुए।

श्लोक 29 (12.32.29)

स्वर्गे लोके महीयन्तमप्सरोभिः शचीपतिम् । ऋषयः पर्युपासन्ते देवाश्च विबुधेश्वरम् ॥

svarge loke mahīyantamapsarobhiḥ śacīpatim | ṛṣayaḥ paryupāsante devāśca vibudheśvaram

स्वर्गलोक में पूजित होते हुए शचीपति की अप्सराएँ सेवा करती हैं, और ऋषि तथा देवता उन देवेश्वर की उपासना करते हैं।

श्लोक 30 (12.32.30)

सेयं त्वामनुसंप्राप्ता विक्रमेण वसुंधरा । निर्जिताश्च महीपाला विक्रमेण त्वयाऽनध ॥

seyaṃ tvāmanusaṃprāptā vikrameṇa vasuṃdharā | nirjitāśca mahīpālā vikrameṇa tvayā'nadha

हे अनघ, यह पृथ्वी तुम्हें पराक्रम से प्राप्त हुई है, और पराक्रम से ही तुमने राजाओं को जीता है।

श्लोक 31 (12.32.31)

तेषां पुराणि राष्ट्राणि गत्वा राजन्सुहृद्वृतः । भ्रातॄन्पुत्रांश्च पौत्रांश्च स्वेस्वे राज्येऽभिषेचय ॥

teṣāṃ purāṇi rāṣṭrāṇi gatvā rājansuhṛdvṛtaḥ | bhrātṝnputrāṃśca pautrāṃśca svesve rājye'bhiṣecaya

हे राजन्, मित्रों से घिरकर उनके नगरों और राष्ट्रों में जाओ और अपने भाइयों, पुत्रों तथा पौत्रों का उनके-उनके राज्य में अभिषेक करो।

श्लोक 32 (12.32.32)

बालानपि च गर्भस्थान्सांत्वेन समुदाचरन् । रञ्जयन्प्रकृतीः सर्वाः परिपाहि वसुंधराम् ॥

bālānapi ca garbhasthānsāṃtvena samudācaran | rañjayanprakṛtīḥ sarvāḥ paripāhi vasuṃdharām

बालकों और गर्भ में स्थित शिशुओं तक के साथ भी सान्त्वनापूर्ण व्यवहार करते हुए और सारी प्रजा को प्रसन्न रखते हुए पृथ्वी का पालन करो।

श्लोक 33 (12.32.33)

कुमारो नास्ति येषां च कन्यास्तत्राभिषेचय । कामाशयो हि स्त्रीवर्गः शोकमेवं प्रहास्यसि ॥

kumāro nāsti yeṣāṃ ca kanyāstatrābhiṣecaya | kāmāśayo hi strīvargaḥ śokamevaṃ prahāsyasi

जिन कुलों में कुमार नहीं है, वहाँ कन्याओं का अभिषेक करो; स्त्रियों का मन अपनी कामनाओं में लगा रहता है, इस प्रकार तुम शोक को दूर कर दोगे।

श्लोक 34 (12.32.34)

एवमाश्वासनं कृत्वा सर्वराष्ट्रेषु भारत । यजस्व वाजिमेधेन यथेन्द्रो विजयी पुरा ॥

evamāśvāsanaṃ kṛtvā sarvarāṣṭreṣu bhārata | yajasva vājimedhena yathendro vijayī purā

हे भारत, सब राज्यों में इस प्रकार आश्वासन देकर अश्वमेध यज्ञ करो, जैसे प्राचीन काल में विजयी इन्द्र ने किया था।

श्लोक 35 (12.32.35)

अशोच्यास्ते महात्मानः क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ । स्वकर्मभिर्गता नाशं कृतान्तबलमोहिताः ॥

aśocyāste mahātmānaḥ kṣatriyāḥ kṣatriyarṣabha | svakarmabhirgatā nāśaṃ kṛtāntabalamohitāḥ

हे क्षत्रियश्रेष्ठ, वे महात्मा क्षत्रिय शोक के योग्य नहीं हैं; वे अपने ही कर्मों से, कृतान्त के बल से मोहित होकर विनाश को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 36 (12.32.36)

अवाप्तः क्षत्रधर्मस्ते राज्यं प्राप्तमकण्टकम् । रक्ष स्वधर्मं कौन्तेय श्रेयान्यः प्रेत्यभाविकः ॥

avāptaḥ kṣatradharmaste rājyaṃ prāptamakaṇṭakam | rakṣa svadharmaṃ kaunteya śreyānyaḥ pretyabhāvikaḥ

तुमने क्षत्रिय-धर्म को निभाया और निष्कण्टक राज्य पा लिया है। हे कौन्तेय, अपने धर्म की रक्षा करो; श्रेयस्कर वही है जो परलोक में फल देता है।

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