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शान्ति पर्व · अध्याय 33

प्रायश्चित्त के योग्य पाप

युधिष्ठिर पूछते हैं कि मनुष्य किन कर्मों से प्रायश्चित्त के योग्य हो जाता है। व्यास पहले उन पापों को गिनाते हैं जिनके लिए प्रायश्चित्त आवश्यक है, फिर लोक और वेद से निषिद्ध कर्म बताते हैं, और फिर वे परिस्थितियाँ बताते हैं जिनमें वैसे ही दिखने वाले कर्म दोष नहीं लगाते, जैसे आत्मरक्षा, गुरु की सेवा और प्राण-रक्षा। अन्त में वे प्रायश्चित्तों के उपदेश की प्रतिज्ञा करते हैं।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.33.1)

कानि कृत्वेह कर्माणि प्रायश्चित्तीयते नरः । किं कृत्वा मुच्यते तत्र तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

kāni kṛtveha karmāṇi prāyaścittīyate naraḥ | kiṃ kṛtvā mucyate tatra tanme brūhi pitāmaha

हे पितामह, मनुष्य कौन-से कर्म करके प्रायश्चित्त के योग्य हो जाता है, और क्या करके उससे मुक्त होता है? यह मुझे बताइए।

व्यास उवाच

श्लोक 2 (12.33.2)

अकुर्वन्विहितं कर्म प्रतिषिद्धानि चाचरन् । प्रायश्चित्तीयते ह्येवं नरो मिथ्याऽनुवर्तयन् ॥

akurvanvihitaṃ karma pratiṣiddhāni cācaran | prāyaścittīyate hyevaṃ naro mithyā'nuvartayan

विहित कर्म न करने से, निषिद्ध कर्म करने से और कपटपूर्ण व्यवहार करने से मनुष्य प्रायश्चित्त के योग्य हो जाता है।

श्लोक 3 (12.33.3)

सूर्येणाभ्युदितो यश्च ब्रह्मचारी भवत्युत । तथा सूर्याभिनिर्मुक्तः कुनखी श्यावदन्नपि ॥

sūryeṇābhyudito yaśca brahmacārī bhavatyuta | tathā sūryābhinirmuktaḥ kunakhī śyāvadannapi

वह ब्रह्मचारी जिसके सोते रहते सूर्य उदय हो जाए, और उसी प्रकार वह जिसके सोते रहते सूर्य अस्त हो जाए; बुरे नाखूनों वाला और काले दाँतों वाला;

श्लोक 4 (12.33.4)

परिवित्तिः परिवेत्ता ब्रह्मेज्यायाश्च दूषकः । दिधिषूपतिस्तथा यः स्यादग्रेदिधिषुरेव च ॥

parivittiḥ parivettā brahmejyāyāśca dūṣakaḥ | didhiṣūpatistathā yaḥ syādagredidhiṣureva ca

विवाह में लाँघा गया बड़ा भाई और उससे पहले विवाह करने वाला छोटा भाई; वैदिक यज्ञ की निन्दा करने वाला; छोटी बहन के बाद बड़ी बहन से विवाह करने वाला और बड़ी बहन के अविवाहित रहते छोटी से विवाह करने वाला;

श्लोक 5 (12.33.5)

अवकीर्णी भवेद्यश्च द्विजातिवधकस्तथा । अतीर्थे ब्राह्मणस्त्यागी तीर्थे चाप्रतिपादकः ॥

avakīrṇī bhavedyaśca dvijātivadhakastathā | atīrthe brāhmaṇastyāgī tīrthe cāpratipādakaḥ

ब्रह्मचर्य-व्रत भंग करने वाला, द्विज का वध करने वाला, अपात्र को दान देने वाला ब्राह्मण, और सुपात्र को दान न देने वाला;

श्लोक 6 (12.33.6)

ग्रामयाजी च कौन्तेय मांसस्य परिविक्रयी । यश्चाग्नीनपविध्येत तथैव ब्रह्मविक्रयी ॥

grāmayājī ca kaunteya māṃsasya parivikrayī | yaścāgnīnapavidhyeta tathaiva brahmavikrayī

हे कौन्तेय, ग्रामयाजक, मांस बेचने वाला, अग्नियों का त्याग करने वाला, और उसी प्रकार वेद बेचने वाला;

श्लोक 7 (12.33.7)

शूद्रस्त्रीवधको यश्च पूर्वः पूर्वस्तु गर्हितः । वृथा पशुसमालम्भी वनदाहस्य कारकः ॥

śūdrastrīvadhako yaśca pūrvaḥ pūrvastu garhitaḥ | vṛthā paśusamālambhī vanadāhasya kārakaḥ

शूद्र-स्त्री का वध करने वाला (इनमें पहले-पहले अधिक निन्दनीय हैं), व्यर्थ पशु-हिंसा करने वाला, और वन में आग लगाने वाला;

श्लोक 8 (12.33.8)

अनृतेनोपवर्ती च प्रतिषेद्धा गुरोस्तथा । स्वदत्तस्यापहर्ता च परदत्तनिरोधकः ॥

anṛtenopavartī ca pratiṣeddhā gurostathā | svadattasyāpahartā ca paradattanirodhakaḥ

झूठ के सहारे व्यवहार करने वाला, गुरु का विरोध करने वाला, अपना दिया हुआ वापस लेने वाला, और दूसरे के दिये हुए दान को रोकने वाला;

श्लोक 9 (12.33.9)

वाग्दत्तं च मनोदत्तं धारादत्तं च यो हरेत् । पाकभेदेन भोक्ता च भुञ्जानस्याप्यनादरः ॥

vāgdattaṃ ca manodattaṃ dhārādattaṃ ca yo haret | pākabhedena bhoktā ca bhuñjānasyāpyanādaraḥ

वाणी से दिया हुआ, मन से दिया हुआ, या जलधारा के साथ दिया हुआ दान वापस लेने वाला; अलग पकाकर अकेले खाने वाला, और भोजन करते हुए पुरुष का अनादर करने वाला;

श्लोक 10 (12.33.10)

स्वजनैः कलहं चैव आश्रितानामरक्षणम् । एतान्येनांसि सर्वाणि व्युत्क्रान्तसमयश्च यः ॥

svajanaiḥ kalahaṃ caiva āśritānāmarakṣaṇam | etānyenāṃsi sarvāṇi vyutkrāntasamayaśca yaḥ

अपने जनों से कलह करना और आश्रितों की रक्षा न करना, ये सब पाप हैं; और जो समय (प्रतिज्ञा-नियम) का उल्लंघन करता है, उसका भी यही पाप है।

श्लोक 11 (12.33.11)

अकार्याणि तु वक्ष्यामि यानि तानि निबोध मे । लोकवेदविरुद्धानि तान्येकाग्रमनाः शृणु ॥

akāryāṇi tu vakṣyāmi yāni tāni nibodha me | lokavedaviruddhāni tānyekāgramanāḥ śṛṇu

अब मैं वे कर्म बताऊँगा जो नहीं करने चाहिए; उन्हें मुझसे जान लो। जो लोक और वेद के विरुद्ध हैं, उन्हें एकाग्र मन से सुनो।

श्लोक 12 (12.33.12)

स्वधर्मस्य परित्यागः परधर्मस्य च क्रिया । अयाज्ययाजनं चैव तथाऽभक्ष्यस्य भक्षणम् ॥

svadharmasya parityāgaḥ paradharmasya ca kriyā | ayājyayājanaṃ caiva tathā'bhakṣyasya bhakṣaṇam

अपने धर्म का त्याग और दूसरे के धर्म का आचरण, अयोग्य से यज्ञ कराना, और अभक्ष्य का भक्षण;

श्लोक 13 (12.33.13)

शरणागतसंत्यागो भृत्यस्याभरणं तथा । रसानां विक्रयश्चापि तिर्यग्योनिवधस्तथा ॥

śaraṇāgatasaṃtyāgo bhṛtyasyābharaṇaṃ tathā | rasānāṃ vikrayaścāpi tiryagyonivadhastathā

शरण में आये हुए को छोड़ देना, अपने आश्रित का भरण-पोषण न करना, रसों की बिक्री, और पशु-पक्षी आदि तिर्यग्योनि के प्राणियों का वध;

श्लोक 14 (12.33.14)

आधानादीनि कर्माणि शक्तिमान्न करोति यः । अप्रयच्छंश्च सर्वाणि नित्यदेयानि भारत ॥

ādhānādīni karmāṇi śaktimānna karoti yaḥ | aprayacchaṃśca sarvāṇi nityadeyāni bhārata

जो समर्थ होकर भी आधान आदि कर्म नहीं करता, और हे भारत, जो नित्य देने योग्य सब दान नहीं देता;

श्लोक 15 (12.33.15)

दक्षिणानामदानं च ब्राह्मणस्वाभिमर्शनम् । सर्वाण्येतान्यकार्याणि प्राहुर्धर्मविदो जनाः ॥

dakṣiṇānāmadānaṃ ca brāhmaṇasvābhimarśanam | sarvāṇyetānyakāryāṇi prāhurdharmavido janāḥ

दक्षिणा न देना और ब्राह्मण की सम्पत्ति को हड़पना: धर्म के ज्ञाता लोग इन सबको न करने योग्य कर्म बताते हैं।

श्लोक 16 (12.33.16)

पित्रा विवदते पुत्रो यश्च स्याद्गुरुतल्पगः । अप्रजायन्नरव्याघ्र भवत्यधार्मिको नरः ॥

pitrā vivadate putro yaśca syādgurutalpagaḥ | aprajāyannaravyāghra bhavatyadhārmiko naraḥ

जो पुत्र पिता से विवाद करता है, जो गुरु की शय्या को अपवित्र करता है, और हे नरव्याघ्र, जो अपनी धर्मपत्नी से सन्तान उत्पन्न नहीं करता, वह मनुष्य अधार्मिक हो जाता है।

श्लोक 17 (12.33.17)

उक्तान्येतानि कर्माणि विस्तरेणेतरेण च ॥

uktānyetāni karmāṇi vistareṇetareṇa ca

ये कर्म विस्तार से भी और संक्षेप से भी कहे जा चुके।

श्लोक 18 (12.33.18)

यानि कुर्वन्नकुर्वंश्च प्रायश्चित्तीयते नरः । एतान्येव तु कर्माणि क्रियमाणानि मानवैः । येषुयेषु निमित्तेषु न लिप्यन्तेऽथ ताञ्शृणु ॥

yāni kurvannakurvaṃśca prāyaścittīyate naraḥ | etānyeva tu karmāṇi kriyamāṇāni mānavaiḥ | yeṣuyeṣu nimitteṣu na lipyante'tha tāñśṛṇu

जिन कर्मों को करने या न करने से मनुष्य प्रायश्चित्त के योग्य हो जाता है, वे ही कर्म जब मनुष्य करते हैं तो कुछ परिस्थितियों में उन्हें दोष नहीं लगाते; अब उन्हें सुनो।

श्लोक 19 (12.33.19)

प्रगृह्य शस्त्रमायान्तमपि वेदान्तगं रणे । जिघांसन्तं जिघांसीयान्न तेन ब्रह्महा भवेत् ॥

pragṛhya śastramāyāntamapi vedāntagaṃ raṇe | jighāṃsantaṃ jighāṃsīyānna tena brahmahā bhavet

यदि कोई शस्त्र उठाकर रण में आये, वह वेदान्त का ज्ञाता ही क्यों न हो, और मारने की इच्छा रखने वाले पर उसे मारने की इच्छा से कोई चढ़ दौड़े, तो इससे वह ब्रह्महत्यारा नहीं होता।

श्लोक 20 (12.33.20)

इति चाप्यत्र कौन्तेय मन्त्रो वेदेषु पठ्यते । वेदप्रमाणविहितं धर्मं च प्रब्रवीमि ते ॥

iti cāpyatra kaunteya mantro vedeṣu paṭhyate | vedapramāṇavihitaṃ dharmaṃ ca prabravīmi te

हे कौन्तेय, इस विषय में वेदों में एक मन्त्र भी पढ़ा जाता है; वेद के प्रमाण से विहित धर्म भी मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 21 (12.33.21)

अपेतं ब्राह्मणं वृत्ताद्यो हन्यादाततायिनम् । न तेन ब्रह्महा स स्यान्मन्युस्तन्मन्युमृच्छति ॥

apetaṃ brāhmaṇaṃ vṛttādyo hanyādātatāyinam | na tena brahmahā sa syānmanyustanmanyumṛcchati

जो मनुष्य आचरण से गिरे हुए आततायी ब्राह्मण को मारता है, वह इससे ब्रह्महत्यारा नहीं होता; क्रोध ही उस क्रोध से जा मिलता है।

श्लोक 22 (12.33.22)

प्राणात्यये तथाऽज्ञानादाचरन्मदिरामपि । आदेशितो धर्मपरैः पुनः संस्कारमर्हति ॥

prāṇātyaye tathā'jñānādācaranmadirāmapi | ādeśito dharmaparaiḥ punaḥ saṃskāramarhati

प्राणों पर संकट आने पर, या अज्ञान से जो मदिरा तक पी ले, वह धर्मपरायण लोगों के कहने पर फिर से संस्कार (शुद्धि) के योग्य होता है।

श्लोक 23 (12.33.23)

एतत्ते सर्वमाख्यातं कौन्तेयाभक्ष्यभक्षणम् । प्रायश्चित्तविधानेन सर्वमेतेन शुद्ध्यति ॥

etatte sarvamākhyātaṃ kaunteyābhakṣyabhakṣaṇam | prāyaścittavidhānena sarvametena śuddhyati

हे कौन्तेय, अभक्ष्य-भक्षण के विषय में यह सब तुम्हें बता दिया; प्रायश्चित्त की इस विधि से सब कुछ शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 24 (12.33.24)

गुरुतल्पं हि गुर्वर्थं न दूषयति मानवम् । उद्दालकः श्वेतकेतुं जनयामास शिष्यतः ॥

gurutalpaṃ hi gurvarthaṃ na dūṣayati mānavam | uddālakaḥ śvetaketuṃ janayāmāsa śiṣyataḥ

गुरु के प्रयोजन से गुरु की शय्या पर जाना मनुष्य को दूषित नहीं करता: उद्दालक ने शिष्य के द्वारा श्वेतकेतु को उत्पन्न कराया था।

श्लोक 25 (12.33.25)

स्तेयं कुर्वंश्च गुर्वर्थमापत्सु न निषिध्यते । बहुशः कामकारेण न चेद्यः संप्रवर्तते ॥

steyaṃ kurvaṃśca gurvarthamāpatsu na niṣidhyate | bahuśaḥ kāmakāreṇa na cedyaḥ saṃpravartate

संकट के समय गुरु के लिए चोरी करना निषिद्ध नहीं है, यदि कोई बार-बार अपनी इच्छा से उसमें प्रवृत्त न हो।

श्लोक 26 (12.33.26)

अन्यत्र ब्राह्मणस्वेभ्य आददानो न दुष्यति । स्वयमप्राशिता यश्च न स पापेन लिप्यते ॥

anyatra brāhmaṇasvebhya ādadāno na duṣyati | svayamaprāśitā yaśca na sa pāpena lipyate

ब्राह्मणों की सम्पत्ति को छोड़कर अन्यत्र से लेने वाला दोषी नहीं होता, और जिसने स्वयं उसका उपभोग न किया हो, वह पाप से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 27 (12.33.27)

प्राणत्राणेऽनृतं वाच्यमात्मनो वा परस्य च । गुर्वर्थे स्त्रीषु चैव स्याद्विवाहकरणेषु च ॥

prāṇatrāṇe'nṛtaṃ vācyamātmano vā parasya ca | gurvarthe strīṣu caiva syādvivāhakaraṇeṣu ca

प्राण बचाने के लिए अपने या दूसरे के हित में झूठ बोला जा सकता है; गुरु के प्रयोजन से, स्त्रियों के विषय में और विवाह कराने में भी।

श्लोक 28 (12.33.28)

नावर्तते व्रतं स्वप्ने शुक्रमोक्षे कथंचन । आज्यहोमः समिद्धेऽग्नौ प्रायश्चित्तं विधीयते ॥

nāvartate vrataṃ svapne śukramokṣe kathaṃcana | ājyahomaḥ samiddhe'gnau prāyaścittaṃ vidhīyate

स्वप्न में वीर्यपात होने पर व्रत किसी भी प्रकार भंग नहीं होता; प्रायश्चित्त के रूप में प्रज्वलित अग्नि में घी की आहुति देने का विधान है।

श्लोक 29 (12.33.29)

पारिवित्त्यं तु पतिते नास्ति प्रव्रजिते तथा । भिक्षिते पारदार्यं च तद्धर्मस्य न दूषकम् ॥

pārivittyaṃ tu patite nāsti pravrajite tathā | bhikṣite pāradāryaṃ ca taddharmasya na dūṣakam

बड़ा भाई पतित हो या संन्यासी हो गया हो तो उससे पहले विवाह करने का दोष नहीं लगता; और दूसरे की स्त्री के स्वयं माँगने पर उसके पास जाना भी धर्म को दूषित नहीं करता।

श्लोक 30 (12.33.30)

वृथा पशुसमालम्भं नैव कुर्यान्न कारयेत् । अनुग्रहः पशूनां हि संस्कारो विधिनोदितः ॥

vṛthā paśusamālambhaṃ naiva kuryānna kārayet | anugrahaḥ paśūnāṃ hi saṃskāro vidhinoditaḥ

व्यर्थ पशु-वध न स्वयं करे, न कराए; पशुओं पर दया (उनकी हिंसा न करना) ही विधि से कहा हुआ संस्कार है।

श्लोक 31 (12.33.31)

अनर्हे ब्राह्मणे दत्तमज्ञानात्तन्न दूषकम् । सत्काराणां तथा तीर्थे नित्यं वा प्रतिपादनम् ॥

anarhe brāhmaṇe dattamajñānāttanna dūṣakam | satkārāṇāṃ tathā tīrthe nityaṃ vā pratipādanam

अनजाने में अयोग्य ब्राह्मण को दिया हुआ दान दोष नहीं है; और सुपात्र को सत्कार देते रहना या नित्य दान देना भी दोष नहीं।

श्लोक 32 (12.33.32)

स्त्रियास्तथापचारिण्या निष्कृतिः स्याददूषिका । अपि सा पूयते तेन न तु भर्ता प्रदुष्यति ॥

striyāstathāpacāriṇyā niṣkṛtiḥ syādadūṣikā | api sā pūyate tena na tu bhartā praduṣyati

भटकी हुई स्त्री के लिए ऐसा प्रायश्चित्त है जो दोष नहीं लगाता; वह भी उससे शुद्ध हो जाती है और उसका पति दूषित नहीं होता।

श्लोक 33 (12.33.33)

तत्त्वं ज्ञात्वा तु सोमस्य विक्रयः स्याददोषवान् । असमर्थस्य भृत्यस्य विसर्गः स्याददोषवान् ॥

tattvaṃ jñātvā tu somasya vikrayaḥ syādadoṣavān | asamarthasya bhṛtyasya visargaḥ syādadoṣavān

जो सोम के यथार्थ स्वरूप को जानता है, उसके द्वारा सोम बेचना निर्दोष है; और असमर्थ सेवक को छोड़ देना भी निर्दोष है।

श्लोक 34 (12.33.34)

वनदाहो गवामर्थे क्रियमाणो न दूषकः । उक्तान्येतानि कर्माणि यानि कुर्वन्न दुष्यति ॥

vanadāho gavāmarthe kriyamāṇo na dūṣakaḥ | uktānyetāni karmāṇi yāni kurvanna duṣyati

गौओं के लिए वन जलाना दोष नहीं है। ये वे कर्म कहे गये हैं जिन्हें करने पर मनुष्य दूषित नहीं होता।

श्लोक 35 (12.33.35)

प्रायश्चित्तानि वक्ष्यामि विस्तरेणैव भारत । यानि कृत्वा नरः पूतो भविष्यति नराधिप ॥

prāyaścittāni vakṣyāmi vistareṇaiva bhārata | yāni kṛtvā naraḥ pūto bhaviṣyati narādhipa

हे भारत, अब मैं विस्तार से प्रायश्चित्त बताऊँगा; हे नराधिप, जिन्हें करके मनुष्य पवित्र हो जाता है।

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