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शान्ति पर्व · अध्याय 34

पापों के प्रायश्चित्त

व्यास युधिष्ठिर को प्रायश्चित्तों का उपदेश देते हैं: ब्रह्महत्या, मद्यपान, गुरुपत्नी-गमन और अन्य गम्भीर पापों के तप, शुद्ध करने वाले गोदान, अश्वमेध का प्रभाव, और छोटे दोषों के नियम। वे समझाते हैं कि शुभ कर्म अशुभ से अधिक होने चाहिए, कि यह विधि श्रद्धालु के लिए है, और कि राजा के रक्षा-धर्म से युधिष्ठिर पाप से मुक्त हो जाएँगे। युधिष्ठिर क्षण भर सोचकर उत्तर देते हैं।

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

व्यास उवाच

श्लोक 1 (12.34.1)

तपसा कर्मणा चैव प्रदानेन च भारत । पुनाति पापं पुरुषः पूतश्चेन्न प्रवर्तते ॥

tapasā karmaṇā caiva pradānena ca bhārata | punāti pāpaṃ puruṣaḥ pūtaścenna pravartate

हे भारत, तप, कर्म और दान से मनुष्य अपने पाप को शुद्ध कर लेता है, यदि शुद्ध होकर वह फिर पाप में प्रवृत्त न हो।

श्लोक 2 (12.34.2)

एककालं तु भुञ्जानश्चरन्भैक्षं स्वकर्मकृत् । कपालपाणिः खट्वाङ्गी ब्रह्मचारी सदोत्थितः ॥

ekakālaṃ tu bhuñjānaścaranbhaikṣaṃ svakarmakṛt | kapālapāṇiḥ khaṭvāṅgī brahmacārī sadotthitaḥ

दिन में एक बार भोजन करता हुआ, भिक्षा माँगता हुआ, अपना कर्म स्वयं करता हुआ, हाथ में कपाल और खट्वाङ्ग लिये, ब्रह्मचारी और सदा जागरूक रहकर,

श्लोक 3 (12.34.3)

अनसूयुरधः शायी कर्म लोके प्रकाशयन् । पूर्णैर्द्वादशभिर्वर्षैर्ब्रह्महा विप्रमुच्यते ॥

anasūyuradhaḥ śāyī karma loke prakāśayan | pūrṇairdvādaśabhirvarṣairbrahmahā vipramucyate

ईर्ष्या से रहित, भूमि पर सोता हुआ और अपना कर्म लोक में प्रकट करता हुआ, पूरे बारह वर्ष बीतने पर ब्रह्महत्यारा उस पाप से छूट जाता है।

श्लोक 4 (12.34.4)

लक्ष्यः शस्त्रभृतां वा स्याद्विदुषामिच्छयाऽऽत्मनः । प्रास्येदात्मानमग्नौ वा समिद्धे त्रिरवाक्शिराः ॥

lakṣyaḥ śastrabhṛtāṃ vā syādviduṣāmicchayā''tmanaḥ | prāsyedātmānamagnau vā samiddhe triravākśirāḥ

अथवा विद्वानों की और अपनी इच्छा से वह शस्त्रधारियों का लक्ष्य बने; या प्रज्वलित अग्नि में तीन बार सिर नीचे करके अपने को डाल दे।

श्लोक 5 (12.34.5)

जपन्वाऽन्यतमं वेदं योजनानां शतं व्रजेत् । सर्वस्वं वा वेदविदे ब्राह्मणायोपपादयेत् ॥

japanvā'nyatamaṃ vedaṃ yojanānāṃ śataṃ vrajet | sarvasvaṃ vā vedavide brāhmaṇāyopapādayet

अथवा किसी एक वेद का जप करता हुआ सौ योजन चले; या अपना सर्वस्व किसी वेदज्ञ ब्राह्मण को दे दे;

श्लोक 6 (12.34.6)

धनं वा जीवनायालं गृहं वा सपरिच्छदम् । मुच्यते ब्रह्महत्याया गोप्ता गोब्राह्मणस्य च ॥

dhanaṃ vā jīvanāyālaṃ gṛhaṃ vā saparicchadam | mucyate brahmahatyāyā goptā gobrāhmaṇasya ca

या जीवन-निर्वाह के लिए पर्याप्त धन, या सामान सहित घर दे दे। गौओं और ब्राह्मणों की रक्षा करने वाला भी ब्रह्महत्या से छूट जाता है।

श्लोक 7 (12.34.7)

षड्भिर्वर्षैः कृच्छ्रभोजी ब्रह्महा पूयते नरः । मासेमासे समश्नंस्तु त्रिभिर्वर्षैः प्रमुच्यते ॥

ṣaḍbhirvarṣaiḥ kṛcchrabhojī brahmahā pūyate naraḥ | māsemāse samaśnaṃstu tribhirvarṣaiḥ pramucyate

छह वर्ष तक कठोर नियम से भोजन करने पर ब्रह्महत्यारा शुद्ध हो जाता है; महीने-महीने में एक बार भोजन करे तो तीन वर्ष में छूट जाता है।

श्लोक 8 (12.34.8)

संवत्सरेण मासाशी पूयते नात्र संशयः । तथैवोपवसन्राजन्स्वल्पेनापि प्रपूयते ॥

saṃvatsareṇa māsāśī pūyate nātra saṃśayaḥ | tathaivopavasanrājansvalpenāpi prapūyate

जो महीने में एक ही बार भोजन करता है, वह एक वर्ष में शुद्ध हो जाता है, इसमें संशय नहीं; हे राजन्, इसी प्रकार उपवास करने वाला थोड़े से तप से भी शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 9 (12.34.9)

क्रतुना चाश्वमेधेन पूयते नात्र संशयः । ये चाप्यवभृथस्नाताः केचिदेवंविधा नराः । ते सर्वे धूतपाप्मानो भवन्तीति परा श्रुतिः ॥

kratunā cāśvamedhena pūyate nātra saṃśayaḥ | ye cāpyavabhṛthasnātāḥ kecidevaṃvidhā narāḥ | te sarve dhūtapāpmāno bhavantīti parā śrutiḥ

अश्वमेध यज्ञ से मनुष्य शुद्ध हो जाता है, इसमें संशय नहीं; और जो कोई ऐसे मनुष्य उसके अवभृथ-स्नान में स्नान करते हैं, वे सब पापरहित हो जाते हैं: ऐसी परम श्रुति है।

श्लोक 10 (12.34.10)

ब्राह्मणार्थे हतो युद्धे मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥

brāhmaṇārthe hato yuddhe mucyate brahmahatyayā

जो ब्राह्मण के लिए युद्ध में मारा जाता है, वह ब्रह्महत्या से छूट जाता है।

श्लोक 11 (12.34.11)

गवां शतसहस्रं तु पात्रेभ्यः प्रतिपादयेत् । ब्रह्महा विप्रमुच्येत सर्वपापेभ्य एव च ॥

gavāṃ śatasahasraṃ tu pātrebhyaḥ pratipādayet | brahmahā vipramucyeta sarvapāpebhya eva ca

जो सुपात्रों को एक लाख गौएँ दे, वह ब्रह्महत्यारा ब्रह्महत्या से और सब पापों से भी छूट जाता है।

श्लोक 12 (12.34.12)

कपिलानां सहस्राणि यो दद्यात्पञ्चविंशतिम् । दोग्ध्रीणां स च पापेभ्यः सर्वेभ्यो विप्रमुच्यते ॥

kapilānāṃ sahasrāṇi yo dadyātpañcaviṃśatim | dogdhrīṇāṃ sa ca pāpebhyaḥ sarvebhyo vipramucyate

जो पच्चीस हज़ार कपिला दुधारू गौएँ दान करता है, वह सब पापों से छूट जाता है।

श्लोक 13 (12.34.13)

गोसहस्रं सवत्सानां दोग्ध्रीणां प्राणसंशये । साधुभ्यो वै दरिद्रेभ्यो दत्त्वा मुच्येत किल्विषात् ॥

gosahasraṃ savatsānāṃ dogdhrīṇāṃ prāṇasaṃśaye | sādhubhyo vai daridrebhyo dattvā mucyeta kilviṣāt

अथवा प्राणों का संकट होने पर वह सज्जन और निर्धन पुरुषों को बछड़ों सहित एक हज़ार दुधारू गौएँ देकर पाप से छूट जाता है।

श्लोक 14 (12.34.14)

शतं वै यस्तु काम्बोजान्ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति । नियतेभ्यो महीपाल स च पापात्प्रमुच्यते ॥

śataṃ vai yastu kāmbojānbrāhmaṇebhyaḥ prayacchati | niyatebhyo mahīpāla sa ca pāpātpramucyate

हे महीपाल, जो संयमी ब्राह्मणों को सौ काम्बोज घोड़े देता है, वह भी पाप से छूट जाता है।

श्लोक 15 (12.34.15)

मनोरथं तु यो दद्यादेकस्मा अपि भारत । न कीर्तयेत दत्त्वा यः स च पापात्प्रमुच्यते ॥

manorathaṃ tu yo dadyādekasmā api bhārata | na kīrtayeta dattvā yaḥ sa ca pāpātpramucyate

हे भारत, जो किसी एक भी मनुष्य की मनचाही वस्तु देता है और देकर उसकी चर्चा नहीं करता, वह पाप से छूट जाता है।

श्लोक 16 (12.34.16)

सुरापानं सकृत्कृत्वा योऽग्निवर्णां सुरां पिबेत् । स पावयत्यथात्मानमिह लोके परत्र च ॥

surāpānaṃ sakṛtkṛtvā yo'gnivarṇāṃ surāṃ pibet | sa pāvayatyathātmānamiha loke paratra ca

जो एक बार मदिरा पीकर अग्नि के रंग की (तपी हुई) मदिरा पीता है, वह इस लोक में और परलोक में अपने को पवित्र कर लेता है।

श्लोक 17 (12.34.17)

मरुप्रपातं प्रपतञ्ज्वलनं वा समाविशन् । महाप्रस्थानमातिष्ठन्मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥

maruprapātaṃ prapatañjvalanaṃ vā samāviśan | mahāprasthānamātiṣṭhanmucyate sarvakilbiṣaiḥ

निर्जल प्रदेश में पर्वत-शिखर से गिरकर, या अग्नि में प्रवेश करके, या महाप्रस्थान करके मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।

श्लोक 18 (12.34.18)

बृहस्पतिसवेनेष्ट्वा सुरापो ब्राह्मणः पुनः । समितिं ब्राह्मणो गच्छेदिति वै ब्रह्मणः श्रुतिः ॥

bṛhaspatisaveneṣṭvā surāpo brāhmaṇaḥ punaḥ | samitiṃ brāhmaṇo gacchediti vai brahmaṇaḥ śrutiḥ

बृहस्पतिसव यज्ञ करके मद्यपान करने वाला ब्राह्मण फिर ब्राह्मणों की सभा में जा सकता है: ऐसी ब्रह्मा की श्रुति है।

श्लोक 19 (12.34.19)

भूमिप्रदानं कुर्याद्यः सुरां पीत्वा विमत्सरः । पुनर्न च पिबेद्राजन्संस्कृतः स च शुध्यति ॥

bhūmipradānaṃ kuryādyaḥ surāṃ pītvā vimatsaraḥ | punarna ca pibedrājansaṃskṛtaḥ sa ca śudhyati

हे राजन्, जो मद्य पीकर मत्सर छोड़कर भूमि का दान करता है और फिर नहीं पीता, वह संस्कारित होकर शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 20 (12.34.20)

गुरुतल्पी शिलां तप्तामायसीमभिसंविशेत् । अवकृत्यात्मनः शेफं प्रव्रजेदूर्ध्वदर्शनः ॥

gurutalpī śilāṃ taptāmāyasīmabhisaṃviśet | avakṛtyātmanaḥ śephaṃ pravrajedūrdhvadarśanaḥ

गुरुपत्नी-गामी तपाई हुई लोहे की शिला पर लेटे; अथवा अपना लिंग काटकर ऊपर की ओर देखता हुआ निकल जाए।

श्लोक 21 (12.34.21)

शरीरस्य विमोक्षेण मुच्यते कर्मणोऽशुभात् । कर्मभ्यो विप्रमुच्यन्ते यताः संवत्सरं स्त्रियः ॥

śarīrasya vimokṣeṇa mucyate karmaṇo'śubhāt | karmabhyo vipramucyante yatāḥ saṃvatsaraṃ striyaḥ

शरीर के छूटने से वह अशुभ कर्म से मुक्त हो जाता है; और स्त्रियाँ यदि एक वर्ष तक आहार-विहार छोड़कर संयम से रहें तो अपने कर्मों से छूट जाती हैं।

श्लोक 22 (12.34.22)

महाव्रतं चरेद्यस्तु दद्यात्सर्वस्वमेव तु । गुर्वर्थे वा हतो युद्धे स मुच्येत्कर्मणोऽशुभात् ॥

mahāvrataṃ caredyastu dadyātsarvasvameva tu | gurvarthe vā hato yuddhe sa mucyetkarmaṇo'śubhāt

जो महाव्रत का पालन करे, या अपना सर्वस्व दे दे, या गुरु के लिए युद्ध में मारा जाए, वह अशुभ कर्म से छूट जाता है।

श्लोक 23 (12.34.23)

अनृतेनोपवर्ती चेत्प्रतिरोद्धा गुरोस्तथा । उपाहृत्य प्रियं तस्मै तस्मात्पापात्प्रमुच्यते ॥

anṛtenopavartī cetpratiroddhā gurostathā | upāhṛtya priyaṃ tasmai tasmātpāpātpramucyate

यदि उसने झूठ का व्यवहार किया हो या गुरु का विरोध किया हो, तो उन्हें प्रिय वस्तु भेंट करके वह उस पाप से छूट जाता है।

श्लोक 24 (12.34.24)

अवकीर्णनिमित्तं तु ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् । गोचर्मवासाः षण्मासांस्तथा मुच्येत किल्बिषात् ॥

avakīrṇanimittaṃ tu brahmahatyāvrataṃ caret | gocarmavāsāḥ ṣaṇmāsāṃstathā mucyeta kilbiṣāt

ब्रह्मचर्य-भंग के निमित्त वह ब्रह्महत्या का व्रत करे: छह महीने तक गोचर्म पहने रहने से वह पाप से छूट जाता है।

श्लोक 25 (12.34.25)

परदारोपसेवी तु परस्यापहरन्वसु । संवत्सरं व्रती भूत्वा तथा मुच्येत किल्बिषात् ॥

paradāropasevī tu parasyāpaharanvasu | saṃvatsaraṃ vratī bhūtvā tathā mucyeta kilbiṣāt

जो परस्त्री का सेवन करता है या दूसरे का धन हर लेता है, वह एक वर्ष तक व्रत का पालन करके पाप से छूट जाता है।

श्लोक 26 (12.34.26)

धनं तु यस्यापहरेत्तस्मै दद्यात्समं वसु । विविधेनाभ्युपायेन तदा मुच्येत किल्बिषात् ॥

dhanaṃ tu yasyāpaharettasmai dadyātsamaṃ vasu | vividhenābhyupāyena tadā mucyeta kilbiṣāt

जिसका धन हरा हो, उसे उतना ही धन विविध उपायों से लौटा दे; तब वह पाप से छूट जाता है।

श्लोक 27 (12.34.27)

कृच्छ्राद्द्वादशरात्रेण संयतात्मा व्रते स्थितः । परिवेत्ता भवेत्पूतः परिवित्तिस्तथैव च ॥

kṛcchrāddvādaśarātreṇa saṃyatātmā vrate sthitaḥ | parivettā bhavetpūtaḥ parivittistathaiva ca

बारह रात के कृच्छ्र-व्रत से, संयत मन और व्रत में स्थिर रहकर, बड़े भाई से पहले विवाह करने वाला छोटा भाई शुद्ध हो जाता है, और वैसे ही लाँघा गया बड़ा भाई भी।

श्लोक 28 (12.34.28)

निवेश्यं तु पुनस्तेन भवेत्तारयता पितॄन् । न तु स्त्रिया भवेद्दोषो न तु सा तेन लिप्यते ॥

niveśyaṃ tu punastena bhavettārayatā pitṝn | na tu striyā bhaveddoṣo na tu sā tena lipyate

पितरों का उद्धार करने वाले उस छोटे भाई को फिर विवाह करना चाहिए; इसमें स्त्री का कोई दोष नहीं होता और वह उससे लिप्त नहीं होती।

श्लोक 29 (12.34.29)

भोजनं ह्यन्तराशुद्धं चातुर्मास्ये विधीयते । स्त्रियस्तेन प्रशुध्यन्ति इति धर्मविदो विदुः ॥

bhojanaṃ hyantarāśuddhaṃ cāturmāsye vidhīyate | striyastena praśudhyanti iti dharmavido viduḥ

चातुर्मास्य में अन्तःशुद्धि करने वाला भोजन विहित है; उससे स्त्रियाँ शुद्ध होती हैं, ऐसा धर्म को जानने वाले जानते हैं।

श्लोक 30 (12.34.30)

स्त्रियस्त्वाशङ्किताः पापे नोपगम्या विजानता । रजसा ता विशुध्यन्ते भस्मना भाजनं यथा ॥

striyastvāśaṅkitāḥ pāpe nopagamyā vijānatā | rajasā tā viśudhyante bhasmanā bhājanaṃ yathā

पाप की आशंका वाली स्त्रियों के पास जानकार पुरुष को नहीं जाना चाहिए; वे रज से शुद्ध होती हैं, जैसे बर्तन राख से।

श्लोक 31 (12.34.31)

पादजोच्छिष्टकांस्यं यद्गवा घ्रातमथापि वा । गण्डूषोच्छिष्टमपि वा विशुध्येद्दशभिस्तु तत् ॥

pādajocchiṣṭakāṃsyaṃ yadgavā ghrātamathāpi vā | gaṇḍūṣocchiṣṭamapi vā viśudhyeddaśabhistu tat

शूद्र के जूठे से दूषित काँसे का पात्र, या जिसे गाय ने सूँघ लिया हो, या जिसमें कुल्ला किया गया हो, वह दस बार शोधन करने से शुद्ध होता है।

श्लोक 32 (12.34.32)

चतुष्पात्सकलो धर्मो ब्राह्मणस्य विधीयते । पादोन इष्टो राजन्ये तथा धर्मो विधीयते ॥

catuṣpātsakalo dharmo brāhmaṇasya vidhīyate | pādona iṣṭo rājanye tathā dharmo vidhīyate

ब्राह्मण के लिए चारों पादों वाला पूरा धर्म विहित है; क्षत्रिय के लिए एक पाद कम धर्म विहित है।

श्लोक 33 (12.34.33)

तथा वैश्ये च शूद्रे च पादः पादो विधीयते । विद्यादेवंविधेनैषां गुरुलाघवनिश्चयम् ॥

tathā vaiśye ca śūdre ca pādaḥ pādo vidhīyate | vidyādevaṃvidhenaiṣāṃ gurulāghavaniścayam

इसी प्रकार वैश्य और शूद्र के लिए क्रम से एक-एक पाद घटाया जाता है; इस प्रकार इनके दोष की गुरुता और लघुता का निश्चय करना चाहिए।

श्लोक 34 (12.34.34)

तिर्यग्योनिवधं कृत्वा द्रुमांश्छित्वोत्तरान्बहून् । त्रिरात्रं वायुभक्षः स्यात्कर्म च प्रथयन्नरः ॥

tiryagyonivadhaṃ kṛtvā drumāṃśchitvottarānbahūn | trirātraṃ vāyubhakṣaḥ syātkarma ca prathayannaraḥ

तिर्यग्योनि के प्राणी का वध करके या और भी बहुत-से वृक्ष काटकर मनुष्य अपना कर्म प्रकट करता हुआ तीन रात वायु पीकर रहे।

श्लोक 35 (12.34.35)

अगम्यागमने राजन्प्रायश्चित्तं विधीयते । आर्द्रवस्त्रेण षण्मासान्विभाव्यं भस्मशायिना ॥

agamyāgamane rājanprāyaścittaṃ vidhīyate | ārdravastreṇa ṣaṇmāsānvibhāvyaṃ bhasmaśāyinā

हे राजन्, अगम्या स्त्री के पास जाने पर प्रायश्चित्त का विधान है: छह महीने गीला वस्त्र पहने, राख पर सोता हुआ रहे।

श्लोक 36 (12.34.36)

एवमेव तु सर्वेषामकार्याणां विधिर्भवेत् । ब्रह्मणोक्तेन विधिना दृष्टान्तागमहेतुभिः ॥

evameva tu sarveṣāmakāryāṇāṃ vidhirbhavet | brahmaṇoktena vidhinā dṛṣṭāntāgamahetubhiḥ

यही विधि सब अकार्यों के लिए है, जो ब्रह्मा के कहे हुए नियम के अनुसार है और दृष्टान्त, शास्त्र और युक्तियों से पुष्ट है।

श्लोक 37 (12.34.37)

सावित्रीमप्यधीयानः शुचौ देशे मिताशनः । अहिंसो मन्दकं जल्पन्मुच्यते सर्वकिल्बिषात् ॥

sāvitrīmapyadhīyānaḥ śucau deśe mitāśanaḥ | ahiṃso mandakaṃ jalpanmucyate sarvakilbiṣāt

स्वच्छ स्थान में सावित्री मन्त्र का ही जप करता हुआ, मिताहारी, अहिंसक और थोड़ा बोलने वाला पुरुष सब पापों से छूट जाता है।

श्लोक 38 (12.34.38)

अहः सु सततं तिष्ठेदभ्याकाशं निशाः स्वपन् । त्रिरह्नि त्रिर्निशायां च सवासा जलमाविशेत् ॥

ahaḥ su satataṃ tiṣṭhedabhyākāśaṃ niśāḥ svapan | trirahni trirniśāyāṃ ca savāsā jalamāviśet

दिन में निरन्तर खड़ा रहे और रात को खुले आकाश के नीचे सोए; दिन में तीन बार और रात में तीन बार वस्त्र सहित जल में प्रवेश करे।

श्लोक 39 (12.34.39)

स्त्रीशूद्रपतितांश्चापि नाभिभाषेद्व्रतान्वितः । पापान्यज्ञानतः कृत्वा मुच्येदेवंव्रतो द्विजः ॥

strīśūdrapatitāṃścāpi nābhibhāṣedvratānvitaḥ | pāpānyajñānataḥ kṛtvā mucyedevaṃvrato dvijaḥ

व्रत में लगा हुआ पुरुष स्त्रियों, शूद्रों और पतितों से बात न करे; अनजाने में पाप करके द्विज इस प्रकार के व्रत से छूट जाता है।

श्लोक 40 (12.34.40)

शुभाशुभफलं प्रेत्य लभते भूतसाक्षिकम् । अतिरिच्येत्तयोर्यस्तु तत्कर्ता लभते फलम् ॥

śubhāśubhaphalaṃ pretya labhate bhūtasākṣikam | atiricyettayoryastu tatkartā labhate phalam

मरने के बाद मनुष्य प्राणियों की साक्षी में अपने शुभ और अशुभ कर्मों का फल पाता है; उन दोनों में जो अधिक होता है, उसका कर्ता वही फल पाता है।

श्लोक 41 (12.34.41)

तस्माद्दानेन तपसा कर्मणा च फलं शुभम् । वर्धयेदशुभं कृत्वा यथा स्यादतिरेकवान् ॥

tasmāddānena tapasā karmaṇā ca phalaṃ śubham | vardhayedaśubhaṃ kṛtvā yathā syādatirekavān

इसलिए अशुभ कर्म करके मनुष्य दान, तप और कर्म से अपने शुभ फल को बढ़ाए, ताकि शुभ ही अधिक हो जाए।

श्लोक 42 (12.34.42)

कुर्याच्छुभानि कर्माणि निमित्ते पापकर्मणाम् । दद्यान्नित्यं च वित्तानि तथा मुच्येत किल्बिषात् ॥

kuryācchubhāni karmāṇi nimitte pāpakarmaṇām | dadyānnityaṃ ca vittāni tathā mucyeta kilbiṣāt

पाप-कर्मों के निमित्त वह शुभ कर्म करे और निरन्तर धन का दान करता रहे; इस प्रकार वह पाप से छूट जाता है।

श्लोक 43 (12.34.43)

अनुरूपं हि पापस्य प्रायश्चित्तमुदाहृतम् । महापातकवर्जं तु प्रायश्चित्तं विधीयते ॥

anurūpaṃ hi pāpasya prāyaścittamudāhṛtam | mahāpātakavarjaṃ tu prāyaścittaṃ vidhīyate

प्रत्येक पाप के अनुरूप प्रायश्चित्त बताया गया है; महापातकों को छोड़कर प्रायश्चित्त का विधान है।

श्लोक 44 (12.34.44)

भक्ष्याभक्ष्येषु चान्येषु वाच्यावाच्ये तथैव च । अज्ञानज्ञानयो राजन्विहितान्यनुजानतः ॥

bhakṣyābhakṣyeṣu cānyeṣu vācyāvācye tathaiva ca | ajñānajñānayo rājanvihitānyanujānataḥ

भक्ष्य-अभक्ष्य के विषय में, अन्य बातों में, कहने योग्य और न कहने योग्य के विषय में, अनजाने या जानकर किये गये दोषों में, हे राजन्, ये विधान उसके लिए हैं जो विहित का पालन करता है।

श्लोक 45 (12.34.45)

जानता तु कृतं पापं गुरु सर्वं भवत्युत । अज्ञानात्स्खलिते दोषे प्रायश्चित्तं विधीयते ॥

jānatā tu kṛtaṃ pāpaṃ guru sarvaṃ bhavatyuta | ajñānātskhalite doṣe prāyaścittaṃ vidhīyate

जानकर किया हुआ पाप सब प्रकार से भारी हो जाता है; अज्ञान से हुई चूक के दोष के लिए प्रायश्चित्त का विधान है।

श्लोक 46 (12.34.46)

शक्यते विधिना पापं यथोक्तेन व्यपोहितुम् । आस्तिके श्रद्दधाने च विधिरेष विधीयते ॥

śakyate vidhinā pāpaṃ yathoktena vyapohitum | āstike śraddadhāne ca vidhireṣa vidhīyate

विधि के अनुसार, जैसा कहा गया है, पाप दूर किया जा सकता है; यह विधि आस्तिक और श्रद्धालु के लिए विहित है।

श्लोक 47 (12.34.47)

नास्तिकाश्रद्दधानेषु पुरुषेषु कदाचन । दम्भद्वेषप्रधानेषु विधिरेष न शिष्यते ॥

nāstikāśraddadhāneṣu puruṣeṣu kadācana | dambhadveṣapradhāneṣu vidhireṣa na śiṣyate

नास्तिकों और श्रद्धाहीन पुरुषों के लिए, जो दम्भ और द्वेष से भरे हैं, यह विधि कभी नहीं बताई जाती।

श्लोक 48 (12.34.48)

शिष्टाचारश्च दिष्टश्च धर्मो धर्मभूतां वर । सेवितव्यो नरव्याघ्र प्रेत्येह च हितेप्सुना ॥

śiṣṭācāraśca diṣṭaśca dharmo dharmabhūtāṃ vara | sevitavyo naravyāghra pretyeha ca hitepsunā

हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, शिष्टों का आचरण और शास्त्र का आदेश धर्म है; हे नरव्याघ्र, इस लोक और परलोक में हित चाहने वाले को उसका पालन करना चाहिए।

श्लोक 49 (12.34.49)

स राजन्मोक्ष्यते पापात्तेन पूर्वेण हेतुना । त्राणार्थं वा वधे तेषामथवा नृपकर्मणा ॥

sa rājanmokṣyate pāpāttena pūrveṇa hetunā | trāṇārthaṃ vā vadhe teṣāmathavā nṛpakarmaṇā

हे राजन्, उसी पूर्वोक्त कारण से तुम पाप से छूट जाओगे: क्योंकि उनका वध रक्षा के लिए था, अथवा राजा का कर्तव्य था।

श्लोक 50 (12.34.50)

अथवा ते घृणा काचित्प्रायश्चित्तं चरिष्यसि । मा चैवानार्यजुष्टेन मृत्युना निधनं गमः ॥

athavā te ghṛṇā kācitprāyaścittaṃ cariṣyasi | mā caivānāryajuṣṭena mṛtyunā nidhanaṃ gamaḥ

अथवा यदि तुम्हें कुछ घृणा हो, तो प्रायश्चित्त करो; पर आर्यों के अयोग्य मृत्यु से अपना अन्त मत करो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 51 (12.34.51)

एवमुक्तो भगवता धर्मराजो युधिष्ठिरः । चिन्तयित्वा मुहूर्तेन प्रत्युवाच तपोधनम् ॥

evamukto bhagavatā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | cintayitvā muhūrtena pratyuvāca tapodhanam

भगवान् व्यास के ऐसा कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने क्षण भर सोचकर उन तपोधन को उत्तर दिया।

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