शान्ति पर्व · अध्याय 35
भक्ष्य-अभक्ष्य और दान का विचार: मनु का उपदेश
युधिष्ठिर व्यासजी से पूछते हैं कि क्या खाने योग्य है और क्या नहीं, कौन-सा दान प्रशंसनीय है और कौन पात्र है। व्यासजी बताते हैं कि ऋषियों ने कभी स्वायम्भुव मनु से यही प्रश्न किए थे, और मनु का उत्तर सुनाते हैं: धर्म के लक्षण, प्रायश्चित्त, ब्राह्मणों के लिए निषिद्ध मछली, पक्षी, दूध और अन्न, गृहस्थ का देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों और पितरों को पूजकर भोजन करने का कर्तव्य, तथा यह चेतावनी कि अपात्र और अज्ञानी को दिया गया दान दाता और ग्रहीता दोनों को डुबो देता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.35.1)
किं भक्ष्यं चाप्यभक्ष्यं च किंच देयं प्रशस्यते । किंच पात्रमपात्रं वा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kiṃ bhakṣyaṃ cāpyabhakṣyaṃ ca kiṃca deyaṃ praśasyate | kiṃca pātramapātraṃ vā tanme brūhi pitāmaha
क्या खाने योग्य है और क्या नहीं? किस प्रकार का दान प्रशंसनीय माना जाता है? और कौन पात्र है तथा कौन अपात्र? पितामह, यह मुझे बताइए।
व्यास उवाच
श्लोक 2 (12.35.2)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । सिद्धानां चैव संवादं मनोश्चैव प्रजापतेः ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | siddhānāṃ caiva saṃvādaṃ manoścaiva prajāpateḥ
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं: सिद्धों और प्रजापति मनु के बीच हुआ संवाद।
श्लोक 3 (12.35.3)
ऋषयस्तु व्रतपराः समागम्य पुरा विभुम् । धर्मं पप्रच्छुरासीनमादिकाले प्रजापतिम् ॥
ṛṣayastu vrataparāḥ samāgamya purā vibhum | dharmaṃ papracchurāsīnamādikāle prajāpatim
बहुत पहले, आदिकाल में, व्रतों में दृढ़ ऋषियों ने एकत्र होकर बैठे हुए समर्थ प्रजापति से धर्म के विषय में पूछा।
ऋषय ऊचुः
श्लोक 4 (12.35.4)
कथमन्नं कथं दानं गम्यागम्याः कथं स्त्रियः । कार्याकार्यं च यत्सर्वं शंस वै त्वं प्रजापते ॥
kathamannaṃ kathaṃ dānaṃ gamyāgamyāḥ kathaṃ striyaḥ | kāryākāryaṃ ca yatsarvaṃ śaṃsa vai tvaṃ prajāpate
"अन्न कैसा हो और दान कैसा हो? कौन-सी स्त्रियाँ गम्य हैं और कौन अगम्य? हे प्रजापति, जो कुछ करने योग्य है और जो नहीं, वह सब हमें बताइए।"
व्यास उवाच
श्लोक 5 (12.35.5)
तैरेवमुक्तो भगवान्मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत् । शुश्रूषध्वं यथावृत्तं धर्मं व्याससमासतः ॥
tairevamukto bhagavānmanuḥ svāyaṃbhuvo'bravīt | śuśrūṣadhvaṃ yathāvṛttaṃ dharmaṃ vyāsasamāsataḥ
उनके यों कहने पर भगवान् स्वायम्भुव मनु ने कहा: "धर्म को, जैसा वह वास्तव में है, संक्षेप और विस्तार दोनों रूपों में सुनिए।"
मनुरुवाच
श्लोक 6 (12.35.6)
अनादेशे जपो होम उपवासस्तथैव च । आत्मज्ञानं पुण्यनद्यो यत्र प्रायश्च तत्पराः ॥
anādeśe japo homa upavāsastathaiva ca | ātmajñānaṃ puṇyanadyo yatra prāyaśca tatparāḥ
जहाँ कोई विशेष प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है, वहाँ जप, होम, उपवास, आत्मज्ञान, पुण्य नदियाँ, और वे स्थान जहाँ लोग प्रायः इन्हीं में लगे रहते हैं —
श्लोक 7 (12.35.7)
अनादिष्टं तथैतानि पुण्यानि धरणीभृतः । सुवर्णप्राशनमपि रत्नादिस्नानमेव च ॥
anādiṣṭaṃ tathaitāni puṇyāni dharaṇībhṛtaḥ | suvarṇaprāśanamapi ratnādisnānameva ca
— जहाँ कुछ निर्दिष्ट नहीं है, वहाँ ये पवित्र हैं; इसी प्रकार पर्वत, सोने का प्राशन और रत्न आदि से स्नान भी;
श्लोक 8 (12.35.8)
देवस्थानाभिगमनमाज्यप्राशनमेव च । एतानि मेध्यं पुरुषं कुर्वन्त्याशु न संशयः ॥
devasthānābhigamanamājyaprāśanameva ca | etāni medhyaṃ puruṣaṃ kurvantyāśu na saṃśayaḥ
देवस्थानों में जाना और घी का प्राशन करना भी। ये मनुष्य को शीघ्र शुद्ध कर देते हैं, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 9 (12.35.9)
न गर्वेण भवेत्प्राज्ञः कदाचिदपि मानवः । दीर्घमायुरथेच्छन्हि त्रिरात्रं चोष्णपो भवेत् ॥
na garveṇa bhavetprājñaḥ kadācidapi mānavaḥ | dīrghamāyurathecchanhi trirātraṃ coṣṇapo bhavet
विवेकी मनुष्य को कभी गर्व नहीं करना चाहिए। और यदि वह दीर्घ आयु चाहे, तो तीन रात केवल गरम जल पीकर रहे।
श्लोक 10 (12.35.10)
अदत्तस्यानुपादानं दानमध्ययनं तपः । अहिंसा सत्यमक्रोधं क्षमा धर्मस्य लक्षणम् ॥
adattasyānupādānaṃ dānamadhyayanaṃ tapaḥ | ahiṃsā satyamakrodhaṃ kṣamā dharmasya lakṣaṇam
बिना दी हुई वस्तु न लेना, दान, अध्ययन, तप, अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव और क्षमा: ये धर्म के लक्षण हैं।
श्लोक 11 (12.35.11)
स एव धर्मः सोऽधर्मो देशकाले प्रतिष्ठितः । आदानमनृतं हिंसा धर्मो ह्यात्यन्तिकः स्मृतः ॥
sa eva dharmaḥ so'dharmo deśakāle pratiṣṭhitaḥ | ādānamanṛtaṃ hiṃsā dharmo hyātyantikaḥ smṛtaḥ
जो वस्तु धर्म है, वही देश और काल के अनुसार अधर्म बन जाती है। दूसरे का धन लेना, असत्य और हिंसा भी चरम संकट की स्थिति में धर्म मानी गई हैं।
श्लोक 12 (12.35.12)
द्विविधौ चाप्युभावेतौ धर्माधर्मौ विजानताम् । अप्रवृत्तिः प्रवृत्तिश्च द्वैविध्यं लोकवेदयोः ॥
dvividhau cāpyubhāvetau dharmādharmau vijānatām | apravṛttiḥ pravṛttiśca dvaividhyaṃ lokavedayoḥ
जानने वालों के लिए धर्म और अधर्म दोनों दो-दो प्रकार के हैं: निवृत्ति और प्रवृत्ति। यह द्वैविध्य लोक और वेद दोनों में है।
श्लोक 13 (12.35.13)
अप्रवृत्तेरमर्त्यत्वं मर्त्यत्वं कर्मणः फलम् । अशुभस्याशुभं विद्याच्छुभस्य शुभमेव च । एतयोश्चोभयोः स्यातां शुभाशुभतया तथा ॥
apravṛtteramartyatvaṃ martyatvaṃ karmaṇaḥ phalam | aśubhasyāśubhaṃ vidyācchubhasya śubhameva ca | etayoścobhayoḥ syātāṃ śubhāśubhatayā tathā
निवृत्ति से अमरता मिलती है और प्रवृत्ति से मरणशीलता, जो कर्म का फल है। जानो कि अशुभ का फल अशुभ होता है और शुभ का फल शुभ। इन दोनों में भी इसी प्रकार शुभ और अशुभ का भेद हो सकता है।
श्लोक 14 (12.35.14)
दैवं च दैवसंयुक्तं प्राणश्च प्रलयस्तथा । अप्रेक्षापूर्वकरणादशुभानां शुभं फलम् ॥
daivaṃ ca daivasaṃyuktaṃ prāṇaśca pralayastathā | aprekṣāpūrvakaraṇādaśubhānāṃ śubhaṃ phalam
दैव और दैव से जुड़ा हुआ, प्राण और प्रलय: बिना विचारे किए गए कर्म से अशुभ लोगों को भी शुभ फल मिल सकता है।
श्लोक 15 (12.35.15)
ऊर्ध्वं भवति संदेहादिहादिष्टार्थमेव च । अप्रेक्षापूर्वकरणात्प्रायश्चित्तं विधीयते ॥
ūrdhvaṃ bhavati saṃdehādihādiṣṭārthameva ca | aprekṣāpūrvakaraṇātprāyaścittaṃ vidhīyate
संशय से भी ऊँचा फल हो सकता है, और यहाँ निर्दिष्ट प्रयोजन के लिए भी; और बिना विचारे किए गए कर्म के लिए प्रायश्चित्त का विधान है।
श्लोक 16 (12.35.16)
क्रोधमोहकृते चैव दृष्टान्तागमहेतुभिः । शरीराणामुपक्लेशो मनसश्च प्रियाप्रिये । तदौषधैश्च मन्त्रैश्च प्रायश्चित्तैश्च शाम्यति ॥
krodhamohakṛte caiva dṛṣṭāntāgamahetubhiḥ | śarīrāṇāmupakleśo manasaśca priyāpriye | tadauṣadhaiśca mantraiśca prāyaścittaiśca śāmyati
क्रोध या मोह से किए गए कर्म के विषय में, दृष्टान्त, शास्त्र और युक्तियों के अनुसार, शरीर के कष्ट और मन के प्रिय-अप्रिय औषधियों, मन्त्रों और प्रायश्चित्तों से शान्त हो जाते हैं।
श्लोक 17 (12.35.17)
उपवासेनैकरात्रं दण्डोत्सर्गे नराधिपः । विशुद्ध्येदात्मशुद्ध्यर्थं त्रिरात्रं तु पुरोहितः ॥
upavāsenaikarātraṃ daṇḍotsarge narādhipaḥ | viśuddhyedātmaśuddhyarthaṃ trirātraṃ tu purohitaḥ
दण्ड देने पर राजा एक रात के उपवास से शुद्ध होता है; पुरोहित अपनी शुद्धि के लिए तीन रात के उपवास से।
श्लोक 18 (12.35.18)
क्षयं शोकं प्रकुर्वाणो न म्रियेत यदा नरः । शस्त्रादिभिरुपाविष्टस्त्रिरात्रं तत्र निर्दिशेत् ॥
kṣayaṃ śokaṃ prakurvāṇo na mriyeta yadā naraḥ | śastrādibhirupāviṣṭastrirātraṃ tatra nirdiśet
जब कोई मनुष्य हानि के शोक में शस्त्र आदि लेकर बैठ जाए और फिर भी न मरे, तब उसके लिए तीन रात का उपवास बताना चाहिए।
श्लोक 19 (12.35.19)
जातिश्रेण्यधिवासानां कुलधर्मांश्च शाश्वतान् । वर्जयन्ति च ये धर्मं तेषां धर्मो न विद्यते ॥
jātiśreṇyadhivāsānāṃ kuladharmāṃśca śāśvatān | varjayanti ca ye dharmaṃ teṣāṃ dharmo na vidyate
जो लोग जाति, श्रेणी और निवास-स्थान के आचारों को तथा कुल के सनातन धर्मों को छोड़ देते हैं, उनके लिए कोई धर्म नहीं रहता।
श्लोक 20 (12.35.20)
दश वा वेदशास्त्रज्ञास्त्रयो वा धर्मपाठकाः । यद्ब्रूयुः कार्य उत्पन्ने स धर्मो धर्मसंशये ॥
daśa vā vedaśāstrajñāstrayo vā dharmapāṭhakāḥ | yadbrūyuḥ kārya utpanne sa dharmo dharmasaṃśaye
वेद और शास्त्र के ज्ञाता दस, अथवा धर्म का पाठ करने वाले तीन, कोई कार्य उपस्थित होने पर जो कहें, धर्म के संशय में वही धर्म है।
श्लोक 21 (12.35.21)
अनुष्णा मृत्तिका चैव तथा क्षुद्रपिपीलिकाः । श्लेष्मातकस्तथा विप्रैरभक्ष्यं विषमेव च ॥
anuṣṇā mṛttikā caiva tathā kṣudrapipīlikāḥ | śleṣmātakastathā viprairabhakṣyaṃ viṣameva ca
ठंडी मिट्टी, छोटी चींटियाँ, श्लेष्मातक फल और विष: ब्राह्मणों के लिए ये अभक्ष्य हैं।
श्लोक 22 (12.35.22)
अभक्ष्या ब्राह्मणैर्मत्स्याः शकलैर्ये विवर्जिताः । चतुष्पात्कच्छपादन्यो मण्डूका जलजाश्च ये ॥
abhakṣyā brāhmaṇairmatsyāḥ śakalairye vivarjitāḥ | catuṣpātkacchapādanyo maṇḍūkā jalajāśca ye
ब्राह्मणों के लिए बिना शल्कों वाली मछलियाँ अभक्ष्य हैं, कछुए को छोड़कर चार पैरों वाले जलचर, मेंढक और जल में उत्पन्न होने वाले अन्य जीव भी।
श्लोक 23 (12.35.23)
भासा हंसाः सुपर्णाश्च चक्रवाकाः प्लवा बकाः । काको मद्रुश्च गृध्रश्च श्येनोलूकस्तथैव च ॥
bhāsā haṃsāḥ suparṇāśca cakravākāḥ plavā bakāḥ | kāko madruśca gṛdhraśca śyenolūkastathaiva ca
भास, हंस, सुपर्ण, चक्रवाक, प्लव और बगुले, कौआ, मद्गु, गिद्ध, बाज और उल्लू भी।
श्लोक 24 (12.35.24)
क्रव्यादा दंष्ट्रिणः सर्वे चतुष्पात्पक्षिणश्च ये । येषां चोभयतो दन्ताश्चतुर्दंष्ट्राश्च सर्वशः ॥
kravyādā daṃṣṭriṇaḥ sarve catuṣpātpakṣiṇaśca ye | yeṣāṃ cobhayato dantāścaturdaṃṣṭrāśca sarvaśaḥ
सभी मांसभक्षी और दाढ़ वाले जीव, चौपाये और पक्षी, जिनके दोनों जबड़ों में दाँत हैं और जिनके चार दाढ़ें हैं, वे सब।
श्लोक 25 (12.35.25)
एडकाश्च मृगोष्ट्राणां सूकराणां गवामपि । मानुषीणां खरीणां च न पिबेद्ब्राह्मणः पयः ॥
eḍakāśca mṛgoṣṭrāṇāṃ sūkarāṇāṃ gavāmapi | mānuṣīṇāṃ kharīṇāṃ ca na pibedbrāhmaṇaḥ payaḥ
ब्राह्मण भेड़, हरिणी, ऊँटनी, सूअरी, गाय, स्त्री और गधी का दूध न पिए।
श्लोक 26 (12.35.26)
प्रेतान्नं सूतकान्नं च यच्च किंचिदनिर्दशम् । अभोज्यं चाप्यपेयं च धेनोर्दुग्धमनिर्दशम् ॥
pretānnaṃ sūtakānnaṃ ca yacca kiṃcidanirdaśam | abhojyaṃ cāpyapeyaṃ ca dhenordugdhamanirdaśam
प्रेतकर्म का अन्न, सूतक का अन्न और जो कुछ भी दस दिन से पहले का हो, वह न खाने योग्य है, न पीने योग्य; ब्यायी हुई गाय का दस दिन के भीतर का दूध भी।
श्लोक 27 (12.35.27)
राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम् । आयुः सुवर्णकारान्नमवीरायाश्च योषितः ॥
rājānnaṃ teja ādatte śūdrānnaṃ brahmavarcasam | āyuḥ suvarṇakārānnamavīrāyāśca yoṣitaḥ
राजा का अन्न तेज हर लेता है, शूद्र का अन्न ब्रह्मतेज, सुनार का अन्न आयु; और पति-पुत्र से रहित स्त्री का अन्न भी।
श्लोक 28 (12.35.28)
विष्ठा वार्धुषिकस्यान्नं गणिकान्नमथेन्द्रियम् । मृष्यन्ति ये चोपपतिं स्त्रीजितान्नं च सर्वशः ॥
viṣṭhā vārdhuṣikasyānnaṃ gaṇikānnamathendriyam | mṛṣyanti ye copapatiṃ strījitānnaṃ ca sarvaśaḥ
सूदखोर का अन्न विष्ठा है, गणिका का अन्न वीर्य; जो पत्नी के उपपति को सह लेते हैं उनका अन्न, और स्त्री के वश में रहने वाले का अन्न भी सर्वथा वर्जित है।
श्लोक 29 (12.35.29)
दीक्षितस्य कदर्यस्य क्रतुविक्रयिकस्य च । तक्ष्णश्चर्मावकर्तुश्च पुंश्चल्या रजकस्य च ॥
dīkṣitasya kadaryasya kratuvikrayikasya ca | takṣṇaścarmāvakartuśca puṃścalyā rajakasya ca
दीक्षित का, कंजूस का, यज्ञ बेचने वाले का, बढ़ई का, चमड़ा काटने वाले का, कुलटा स्त्री का और धोबी का अन्न,
श्लोक 30 (12.35.30)
चिकित्सकस्य यच्चान्नमभोज्यं रक्षिणस्तथा । गणग्रामाभिशस्तानां रङ्गस्त्रीजीविनां तथा ॥
cikitsakasya yaccānnamabhojyaṃ rakṣiṇastathā | gaṇagrāmābhiśastānāṃ raṅgastrījīvināṃ tathā
और वैद्य का: इनका जो भी अन्न हो, वह अभोज्य है। रक्षक का, गण या ग्राम द्वारा दण्डित लोगों का और रंगमंच की स्त्रियों से जीविका चलाने वालों का अन्न भी।
श्लोक 31 (12.35.31)
परिवित्तीनामपुंसां च बन्दिद्यूतविदां तथा । वामहस्ताहृतं चान्नं शुष्कं पर्युषितं च यत् ॥
parivittīnāmapuṃsāṃ ca bandidyūtavidāṃ tathā | vāmahastāhṛtaṃ cānnaṃ śuṣkaṃ paryuṣitaṃ ca yat
बड़े भाई से पहले विवाह करने वालों का, नपुंसकों का, बन्दियों का और जुआरियों का अन्न; बाएँ हाथ से लाया हुआ अन्न, और जो सूखा या बासी हो।
श्लोक 32 (12.35.32)
सुरानुगतमुच्छिष्टमभोज्यं शेषितं च यत् । पिष्टमांसेक्षुशाकानामाविकाजापयस्तथा । सक्तु धाना करम्भाश्च नोपभोग्याश्चिरस्थिताः ॥
surānugatamucchiṣṭamabhojyaṃ śeṣitaṃ ca yat | piṣṭamāṃsekṣuśākānāmāvikājāpayastathā | saktu dhānā karambhāśca nopabhogyāścirasthitāḥ
जो मद्य के संसर्ग में आया हो, उच्छिष्ट, और जो अलग रखकर बचाया गया हो, वह अभोज्य है; आटे, मांस, ईख और शाक की बनी वस्तुएँ तथा भेड़-बकरी का दूध भी; सत्तू, भुने अन्न और दही-सत्तू के मिश्रण देर तक रखे हों तो खाने योग्य नहीं।
श्लोक 33 (12.35.33)
पायसं कृसरं मांसमपूपाश्च वृथा कृताः । अपेयाश्चाप्यभक्ष्याश्च ब्राह्मणैर्गृहमेधिभिः ॥
pāyasaṃ kṛsaraṃ māṃsamapūpāśca vṛthā kṛtāḥ | apeyāścāpyabhakṣyāśca brāhmaṇairgṛhamedhibhiḥ
खीर, तिल-खिचड़ी, मांस और व्यर्थ बनाए गए पूए गृहस्थ ब्राह्मणों के लिए न पीने योग्य हैं, न खाने योग्य।
श्लोक 34 (12.35.34)
देवानृषीन्मनुष्यांश्च पितॄन्गृह्याश्च देवताः । पूजयित्वा ततः पश्चाद्गृहस्थो भोक्तुमर्हति ॥
devānṛṣīnmanuṣyāṃśca pitṝngṛhyāśca devatāḥ | pūjayitvā tataḥ paścādgṛhastho bhoktumarhati
देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों, पितरों और गृहदेवताओं की पूजा करने के बाद ही गृहस्थ भोजन करने का अधिकारी होता है।
श्लोक 35 (12.35.35)
यथा प्रव्रजितो भिक्षुस्तथैव स्वे गृहे वसेत् । एवंवृत्तः प्रियैर्दारैः संवसन्धर्ममाप्नुयात् ॥
yathā pravrajito bhikṣustathaiva sve gṛhe vaset | evaṃvṛttaḥ priyairdāraiḥ saṃvasandharmamāpnuyāt
जैसे संन्यासी भिक्षु रहता है, वैसे ही वह अपने घर में रहे। इस प्रकार के आचरण से प्रिय पत्नी के साथ रहता हुआ वह धर्म प्राप्त करता है।
श्लोक 36 (12.35.36)
न दद्याद्यशसे दानं न भयान्नोपकारिणे । न नृत्यगीतशीलेषु हासकेषु च धार्मिकः ॥
na dadyādyaśase dānaṃ na bhayānnopakāriṇe | na nṛtyagītaśīleṣu hāsakeṣu ca dhārmikaḥ
धर्मात्मा मनुष्य यश के लिए दान न दे, न भय से, न उपकारी को; न नाचने-गाने वालों को और न हँसाने वाले विदूषकों को।
श्लोक 37 (12.35.37)
न मत्ते चैव नोन्मत्ते न स्तेने न च कुत्सके । न वाग्घीने विवर्णे वा नाङ्गहीने न वामने ॥
na matte caiva nonmatte na stene na ca kutsake | na vāgghīne vivarṇe vā nāṅgahīne na vāmane
मतवाले को नहीं, पागल को नहीं, चोर को नहीं, निन्दक को नहीं; गूँगे या वाणीहीन को नहीं, विवर्ण को नहीं, अंगहीन को नहीं और बौने को नहीं।
श्लोक 38 (12.35.38)
न दुर्जने दौष्कुले वा व्रतैर्यो वा न संस्कृतः । न श्रोत्रियमृते दानं ब्राह्मणे ब्रह्मवर्जिते ॥
na durjane dauṣkule vā vratairyo vā na saṃskṛtaḥ | na śrotriyamṛte dānaṃ brāhmaṇe brahmavarjite
न दुष्ट को, न दुष्कुल वाले को, न उसको जो व्रतों से संस्कृत नहीं है। वेदहीन ब्राह्मण को, श्रोत्रिय को छोड़कर, दान नहीं देना चाहिए।
श्लोक 39 (12.35.39)
असम्यक्चैव यद्दत्तमसम्यक् च प्रतिग्रहः । उभयं स्यादनर्थाय दातुरादातुरेव च ॥
asamyakcaiva yaddattamasamyak ca pratigrahaḥ | ubhayaṃ syādanarthāya dāturādātureva ca
जो दान अनुचित रीति से दिया जाए और जो प्रतिग्रह अनुचित रीति से लिया जाए, दोनों दाता और ग्रहीता के लिए अनर्थ के कारण बनते हैं।
श्लोक 40 (12.35.40)
यथा खदिरमालम्ब्य शिलां वाप्यर्णवं तरन् । मञ्जेत मञ्जतस्तद्वद्दाता यश्च प्रतिग्रही ॥
yathā khadiramālambya śilāṃ vāpyarṇavaṃ taran | mañjeta mañjatastadvaddātā yaśca pratigrahī
जैसे समुद्र पार करने वाला खैर की लकड़ी या शिला का सहारा लेकर डूब जाता है, वैसे ही दाता और ग्रहीता दोनों डूब जाते हैं।
श्लोक 41 (12.35.41)
काष्ठैरार्द्रैर्यथा वह्निरुपस्तीर्णो न दीप्यते । तपःस्वाध्यायचारित्रैरेवं हीनः प्रतिग्रही ॥
kāṣṭhairārdrairyathā vahnirupastīrṇo na dīpyate | tapaḥsvādhyāyacāritrairevaṃ hīnaḥ pratigrahī
जैसे गीली लकड़ियों से ढकी हुई आग नहीं जलती, वैसे ही तप, स्वाध्याय और सदाचार से हीन प्रतिग्रह लेने वाला होता है।
श्लोक 42 (12.35.42)
कपाले यद्वदापः स्युः श्वदृतौ च यथा पयः । आश्रयस्थानदोषेण वृत्तहीने तथा श्रुतम् ॥
kapāle yadvadāpaḥ syuḥ śvadṛtau ca yathā payaḥ | āśrayasthānadoṣeṇa vṛttahīne tathā śrutam
जैसे कपाल में रखा जल और कुत्ते की खाल के थैले में रखा दूध पात्र के दोष से बिगड़ जाता है, वैसे ही आचारहीन मनुष्य में शास्त्र-ज्ञान व्यर्थ हो जाता है।
श्लोक 43 (12.35.43)
निर्मन्त्रो निर्व्रतो यः स्यादशास्त्रज्ञोऽनसूयकः । अनुक्रोशात्प्रदातव्यं हीनेष्वव्रतिकेषु च ॥
nirmantro nirvrato yaḥ syādaśāstrajño'nasūyakaḥ | anukrośātpradātavyaṃ hīneṣvavratikeṣu ca
जो मन्त्रहीन, व्रतहीन और शास्त्र से अनभिज्ञ हो, पर ईर्ष्यालु न हो, ऐसे दीन और व्रतहीन लोगों को भी दया से कुछ देना चाहिए।
श्लोक 44 (12.35.44)
न वै देयमनुक्रोशाद्दीनायापगुणाय तु । आप्ताचरित इत्येव धर्म इत्येव वा पुनः ॥
na vai deyamanukrośāddīnāyāpaguṇāya tu | āptācarita ityeva dharma ityeva vā punaḥ
परन्तु दुर्गुणी दीन को केवल इसलिए दया से कुछ नहीं देना चाहिए कि श्रेष्ठजनों का ऐसा आचरण है, अथवा यह धर्म है।
श्लोक 45 (12.35.45)
निष्कारणं स्मृतं दत्तं ब्राह्मणे ब्रह्मवर्जिते । न फलेत्पात्रदोषेण न चात्रास्ति विचारणा ॥
niṣkāraṇaṃ smṛtaṃ dattaṃ brāhmaṇe brahmavarjite | na phaletpātradoṣeṇa na cātrāsti vicāraṇā
वेदहीन ब्राह्मण को दिया हुआ दान निष्प्रयोजन माना गया है; पात्र के दोष से वह फल नहीं देता, और इसमें कोई विचार करने की बात नहीं।
श्लोक 46 (12.35.46)
यथा दारुमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । ब्राह्मणश्चानधीयानस्त्रयस्ते नामधारकाः ॥
yathā dārumayo hastī yathā carmamayo mṛgaḥ | brāhmaṇaścānadhīyānastrayaste nāmadhārakāḥ
लकड़ी का हाथी, चमड़े का हिरन और अध्ययन न करने वाला ब्राह्मण: ये तीनों केवल नाम धारण करने वाले हैं।
श्लोक 47 (12.35.47)
यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौर्गवि चाफला । शकुनिर्वाप्यपक्षः स्यान्निर्मन्त्रो ब्राह्मणस्तथा ॥
yathā ṣaṇḍho'phalaḥ strīṣu yathā gaurgavi cāphalā | śakunirvāpyapakṣaḥ syānnirmantro brāhmaṇastathā
जैसे नपुंसक स्त्रियों में निष्फल है, जैसे गाय गाय के साथ निष्फल है, जैसे बिना पंख का पक्षी निरर्थक है, वैसे ही मन्त्रहीन ब्राह्मण है।
श्लोक 48 (12.35.48)
ग्रामस्थानं यथा शून्यं यथा कूपश्च निर्जलः । यथा हुतमनग्नौ च तथैव स्यान्निराकृतौ ॥
grāmasthānaṃ yathā śūnyaṃ yathā kūpaśca nirjalaḥ | yathā hutamanagnau ca tathaiva syānnirākṛtau
जैसे गाँव का स्थान सूना है, जैसे कुआँ जलहीन है, जैसे बिना अग्नि के किया हुआ हवन व्यर्थ है, वैसे ही अज्ञानी मूर्ख के विषय में है।
श्लोक 49 (12.35.49)
देवतानां पितॄणां च हव्यकव्यविनाशकः । सर्वथाऽर्थहरो मूर्खो न लोकान्प्राप्तुमर्हति ॥
devatānāṃ pitṝṇāṃ ca havyakavyavināśakaḥ | sarvathā'rthaharo mūrkho na lokānprāptumarhati
जो मूर्ख देवताओं और पितरों के हव्य-कव्य का नाश करता है और सब प्रकार से धन हर लेता है, वह लोकों को पाने योग्य नहीं है।
व्यास उवाच
श्लोक 50 (12.35.50)
एतत्ते कथितं सर्वं यथावृत्तं युधिष्ठिर । समासेन महद्ध्येतच्छ्रोतव्यं भरतर्षभ ॥
etatte kathitaṃ sarvaṃ yathāvṛttaṃ yudhiṣṭhira | samāsena mahaddhyetacchrotavyaṃ bharatarṣabha
युधिष्ठिर, यह सब मैंने तुम्हें यथावत् संक्षेप में कह सुनाया। यह विषय बहुत बड़ा है और सुनने योग्य है, हे भरतश्रेष्ठ।