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शान्ति पर्व · अध्याय 36

व्यास और कृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर का नगर-प्रवेश

युधिष्ठिर राजधर्म सुनना चाहते हैं और कहते हैं कि धर्माचरण तथा राज्य उन्हें परस्पर विरोधी लगते हैं। व्यासजी उन्हें वृद्ध भीष्म के पास जाने को कहते हैं और उनके ज्ञान तथा धर्मवेत्तापन की प्रशंसा करते हैं; छल से मारे गए उन्हीं भीष्म के सामने जाने में युधिष्ठिर संकोच करते हैं, पर कृष्ण उन्हें व्यासजी की आज्ञा मानने और शोक छोड़ने को कहते हैं। सान्त्वना पाकर युधिष्ठिर उठते हैं और भाइयों, धृतराष्ट्र, गान्धारी तथा कुरुकुल की स्त्रियों के साथ भव्य रूप से सजे हुए हस्तिनापुर में प्रवेश करते हैं।

अध्याय 35अध्याय-सूचीअध्याय 37

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.36.1)

श्रोतुमिच्छामि भगवन्विस्तरेण महामुने । राजधर्मान्द्विजश्रेष्ठ चातुर्वर्ण्यस्य चाखिलान् ॥

śrotumicchāmi bhagavanvistareṇa mahāmune | rājadharmāndvijaśreṣṭha cāturvarṇyasya cākhilān

भगवन्, महामुने, द्विजश्रेष्ठ, मैं राजाओं के और चारों वर्णों के सभी धर्मों को विस्तार से सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 2 (12.36.2)

आपत्सु च यथा नीतिः प्रणेतव्या द्विजोत्तम । धर्म्यमालम्ब्य पन्थानं विजयेयं कथं महीम् ॥

āpatsu ca yathā nītiḥ praṇetavyā dvijottama | dharmyamālambya panthānaṃ vijayeyaṃ kathaṃ mahīm

द्विजोत्तम, मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि संकट के समय नीति कैसे बरती जाए, और धर्म के मार्ग पर टिककर मैं पृथ्वी को कैसे जीत सकूँ।

श्लोक 3 (12.36.3)

प्रायश्चित्तकथा ह्येषा भक्ष्याभक्ष्यसमन्विता । कौतूहलानुप्रवणा हर्षं जनयतीव मे ॥

prāyaścittakathā hyeṣā bhakṣyābhakṣyasamanvitā | kautūhalānupravaṇā harṣaṃ janayatīva me

भक्ष्य-अभक्ष्य के विचार से भरी प्रायश्चित्त की यह कथा जिज्ञासा को आगे बढ़ाने वाली है और मुझे मानो हर्ष देती है।

श्लोक 4 (12.36.4)

धर्मचर्या च राज्यं च नित्यमेव विरुध्यते । एवं मुह्यति मे चेतश्चिन्तयानस्य नित्यशः ॥

dharmacaryā ca rājyaṃ ca nityameva virudhyate | evaṃ muhyati me cetaścintayānasya nityaśaḥ

परन्तु धर्माचरण और राज्य सदा एक-दूसरे के विरोधी रहते हैं, और इसीलिए रात-दिन सोचते हुए मेरा चित्त मोह में पड़ जाता है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (12.36.5)

तमुवाच महाराज व्यासो वेदविदां वरः । नारदं समभिप्रेक्ष्य सर्वं जानन्पुरातनम् ॥

tamuvāca mahārāja vyāso vedavidāṃ varaḥ | nāradaṃ samabhiprekṣya sarvaṃ jānanpurātanam

तब, महाराज, वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ व्यासजी ने नारद की ओर देखकर, क्योंकि वे सब पुरानी बातें जानते थे, युधिष्ठिर से कहा।

व्यास उवाच

श्लोक 6 (12.36.6)

श्रोतुमिच्छसि चेद्धर्मं निखिलेन नराधिप । प्रेहि भीष्मं महाबाहो वृद्धं कुरुपितामहम् ॥

śrotumicchasi ceddharmaṃ nikhilena narādhipa | prehi bhīṣmaṃ mahābāho vṛddhaṃ kurupitāmaham

नरेश्वर, यदि तुम धर्म को पूर्ण रूप से सुनना चाहते हो, तो महाबाहो, कुरुओं के वृद्ध पितामह भीष्म के पास जाओ।

श्लोक 7 (12.36.7)

स ते धर्मरहस्येषु संशयान्मनसि स्थितान् । छेत्ता भागीरथीपुत्रः सर्वज्ञः सर्वधर्मवित् ॥

sa te dharmarahasyeṣu saṃśayānmanasi sthitān | chettā bhāgīrathīputraḥ sarvajñaḥ sarvadharmavit

सब कुछ जानने वाले, सब धर्मों के ज्ञाता गंगापुत्र भीष्म धर्म के रहस्यों के विषय में तुम्हारे मन में बैठे संशयों को काट देंगे।

श्लोक 8 (12.36.8)

जनयामास यं देवी दिव्या त्रिपथगा नदी । साक्षाद्ददर्श यो देवान्सर्वानिन्द्रपुरोगमान् ॥

janayāmāsa yaṃ devī divyā tripathagā nadī | sākṣāddadarśa yo devānsarvānindrapurogamān

जिन्हें त्रिपथगा दिव्य नदी देवी गंगा ने जन्म दिया; जिन्होंने इन्द्र आदि सब देवताओं को प्रत्यक्ष देखा;

श्लोक 9 (12.36.9)

बृहस्पतिपुरोगांस्तु देवर्षीनसकृत्प्रभुः । तोषयित्वोपचारेण राजनीतिमधीतवान् ॥

bṛhaspatipurogāṃstu devarṣīnasakṛtprabhuḥ | toṣayitvopacāreṇa rājanītimadhītavān

जिन्होंने बृहस्पति आदि देवर्षियों को बार-बार सेवा से प्रसन्न करके राजनीति का अध्ययन किया;

श्लोक 10 (12.36.10)

उशना वेद यच्छास्त्रं देवासुरगुरुर्द्विजः । स च धर्मं सवैयाख्यं प्राप्तवान्कुरुसत्तमः ॥

uśanā veda yacchāstraṃ devāsuragururdvijaḥ | sa ca dharmaṃ savaiyākhyaṃ prāptavānkurusattamaḥ

और देवताओं तथा असुरों के गुरु द्विज उशना (शुक्राचार्य) जो शास्त्र जानते थे, उसे उन कुरुश्रेष्ठ ने धर्म और उसकी व्याख्या सहित प्राप्त किया।

श्लोक 11 (12.36.11)

भार्गवाच्च्यवनाच्चापि वेदानङ्गोपबृंहितान् । प्रतिपेदे महाबुद्धिर्वसिष्ठाच्चरितव्रतः ॥

bhārgavāccyavanāccāpi vedānaṅgopabṛṃhitān | pratipede mahābuddhirvasiṣṭhāccaritavrataḥ

भृगुवंशी च्यवन से उन्होंने अंगों और उपबृंहणों सहित वेद पाए, और व्रतों में दृढ़ तथा महाबुद्धिमान वे वसिष्ठ से भी (विद्या) पाने वाले हुए।

श्लोक 12 (12.36.12)

पितामहसुतं ज्येष्ठं कुमारं दीप्ततेजसम् । अध्यात्मगतितत्त्वज्ञमुपाशिक्षत यः पुरा ॥

pitāmahasutaṃ jyeṣṭhaṃ kumāraṃ dīptatejasam | adhyātmagatitattvajñamupāśikṣata yaḥ purā

जिन्होंने पूर्वकाल में पितामह ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र, तेजस्वी कुमार से, जो अध्यात्म-मार्ग के तत्त्व को जानते हैं, शिक्षा पाई;

श्लोक 13 (12.36.13)

मार्कण्डेयमुखात्कृत्स्नं यतिधर्ममवाप्तवान् । रामादस्त्राणि शक्राच्च प्राप्तवान्पुरुषर्षभः ॥

mārkaṇḍeyamukhātkṛtsnaṃ yatidharmamavāptavān | rāmādastrāṇi śakrācca prāptavānpuruṣarṣabhaḥ

जिन्होंने मार्कण्डेय के मुख से यतिधर्म पूरा सीखा, और परशुराम तथा इन्द्र से अस्त्र प्राप्त किए, वे पुरुषश्रेष्ठ।

श्लोक 14 (12.36.14)

मृत्युरात्मेच्छया यस्य जातस्य मनुजेष्वपि । तथाऽनपत्यस्य सतः पुण्यलोकादिविश्रुताः ॥

mṛtyurātmecchayā yasya jātasya manujeṣvapi | tathā'napatyasya sataḥ puṇyalokādiviśrutāḥ

मनुष्यों में जन्म लेकर भी जिसकी मृत्यु उसकी अपनी इच्छा से होती है, और निःसन्तान होते हुए भी जिसके लिए पुण्यलोक विख्यात हैं;

श्लोक 15 (12.36.15)

यस्य ब्रह्मर्षयः पुण्या नित्यमासन्सभासदः । यस्य नाविदितं किंचिज्ज्ञानं ज्ञेयेषु दृश्यते ॥

yasya brahmarṣayaḥ puṇyā nityamāsansabhāsadaḥ | yasya nāviditaṃ kiṃcijjñānaṃ jñeyeṣu dṛśyate

जिनकी सभा में पवित्र ब्रह्मर्षि सदा बैठे रहते थे; और ज्ञेय विषयों में जिनके लिए कुछ भी अज्ञात नहीं दिखाई देता।

श्लोक 16 (12.36.16)

स ते वक्ष्यति धर्मज्ञः सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्ववित् । तमभ्येहि पुरा प्राणान्स विमुञ्चति धर्मवित् ॥

sa te vakṣyati dharmajñaḥ sūkṣmadharmārthatattvavit | tamabhyehi purā prāṇānsa vimuñcati dharmavit

सूक्ष्म धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले वे धर्मज्ञ तुम्हें बताएँगे। उनके प्राण छोड़ने से पहले उनके पास जाओ, क्योंकि वे धर्म को जानते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (12.36.17)

एवमुक्तस्तु कौन्तेयो दीर्घप्रज्ञो महामतिः । उवाच वदतां श्रेष्ठं व्यासं सत्यवतीसुतम् ॥

evamuktastu kaunteyo dīrghaprajño mahāmatiḥ | uvāca vadatāṃ śreṣṭhaṃ vyāsaṃ satyavatīsutam

यों कहे जाने पर गहरी सूझ वाले और महामति कुन्तीपुत्र ने वक्ताओं में श्रेष्ठ, सत्यवती के पुत्र व्यास से कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 18 (12.36.18)

वैशसं सुमहत्कृत्वा ज्ञातीनां रोमहर्षणम् । आगस्कृत्सर्वलोकस्य पृथिवीनाशकारकः ॥

vaiśasaṃ sumahatkṛtvā jñātīnāṃ romaharṣaṇam | āgaskṛtsarvalokasya pṛthivīnāśakārakaḥ

जो ज्ञातिजनों का रोंगटे खड़े कर देने वाला भारी संहार करके सारे संसार का अपराधी और पृथ्वी का नाश करने वाला बना हूँ,

श्लोक 19 (12.36.19)

घातयित्वा तमेवाजौ छलेनाजिह्नयोधिनम् । उपसंप्रष्टुमर्हामि तमहं केन हेतुना ॥

ghātayitvā tamevājau chalenājihnayodhinam | upasaṃpraṣṭumarhāmi tamahaṃ kena hetunā

और जिन्हें मैंने युद्ध में छल से मरवाया, जो कपट रहित होकर लड़ते थे, उन्हीं के पास जाकर मैं किस कारण से प्रश्न करने योग्य हो सकता हूँ?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 20 (12.36.20)

ततस्तं नृपतिश्रेष्ठं चातुर्वर्ण्यहितेप्सया । पुनरेव महाबाहुर्यदुश्रेष्ठोऽब्रवीद्वचः ॥

tatastaṃ nṛpatiśreṣṭhaṃ cāturvarṇyahitepsayā | punareva mahābāhuryaduśreṣṭho'bravīdvacaḥ

तब चारों वर्णों का हित चाहने वाले महाबाहु यदुश्रेष्ठ ने उन नृपश्रेष्ठ से फिर कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 21 (12.36.21)

नेदानीमतिनिर्बन्धं शोके त्वं कर्तुमर्हसि । यदाह भगवान्व्यासस्तत्कुरुष्व नृपोत्तम ॥

nedānīmatinirbandhaṃ śoke tvaṃ kartumarhasi | yadāha bhagavānvyāsastatkuruṣva nṛpottama

अब तुम्हें शोक में इतना हठ नहीं करना चाहिए। नृपश्रेष्ठ, भगवान् व्यास जो कहते हैं, वही करो।

श्लोक 22 (12.36.22)

ब्राह्मणास्त्वां महाबाहो भ्रातरश्च महौजसः । पर्जन्यमिव घर्मान्ते नाथमाना उपासते ॥

brāhmaṇāstvāṃ mahābāho bhrātaraśca mahaujasaḥ | parjanyamiva gharmānte nāthamānā upāsate

महाबाहो, ब्राह्मण और तुम्हारे महाबली भाई तुमसे याचना करते हुए तुम्हारी उपासना कर रहे हैं, जैसे ग्रीष्म के अन्त में लोग मेघ की प्रतीक्षा करते हैं।

श्लोक 23 (12.36.23)

हतशिष्टाश्च राजानः कृत्स्नं चैव समागतम् । चातुर्वर्ण्यं महाराज राष्ट्रं ते कुरुजाङ्गलम् ॥

hataśiṣṭāśca rājānaḥ kṛtsnaṃ caiva samāgatam | cāturvarṇyaṃ mahārāja rāṣṭraṃ te kurujāṅgalam

मारे जाने से बचे हुए राजा, यहाँ एकत्र हुआ चारों वर्णों का समूचा समाज, महाराज, और तुम्हारा कुरुजांगल राष्ट्र —

श्लोक 24 (12.36.24)

प्रियार्थमपि चैतेषां ब्राह्मणानां महात्मनाम् । नियोगादस्य च गुरोर्व्यासस्यामिततेजसः ॥

priyārthamapi caiteṣāṃ brāhmaṇānāṃ mahātmanām | niyogādasya ca gurorvyāsasyāmitatejasaḥ

इन महात्मा ब्राह्मणों को प्रसन्न करने के लिए और अपने गुरु अमित तेजस्वी व्यास की आज्ञा से,

श्लोक 25 (12.36.25)

सुहृदामस्मदादीनां द्रौपद्यांश्च परंतप । कुरु प्रियममित्रघ्न लोकस्य च हितं कुरु ॥

suhṛdāmasmadādīnāṃ draupadyāṃśca paraṃtapa | kuru priyamamitraghna lokasya ca hitaṃ kuru

हम जैसे मित्रों के और द्रौपदी के लिए भी, परंतप, प्रिय कार्य करो, शत्रुनाशन, और संसार का हित करो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (12.36.26)

एवमुक्तः स कृष्णेन राजा राजीवलोचनः । हितार्थं सर्वलोकस्य समुत्तस्थौ महामनाः ॥

evamuktaḥ sa kṛṣṇena rājā rājīvalocanaḥ | hitārthaṃ sarvalokasya samuttasthau mahāmanāḥ

कृष्ण के यों कहने पर कमलनयन महामना राजा सारे संसार के हित के लिए उठ खड़े हुए।

श्लोक 27 (12.36.27)

सोऽनुनीतो नरव्याघ्र विष्टरश्रवसा स्वयम् । द्वैपायनेन च तथा देवस्थानेन जिष्णुना ॥

so'nunīto naravyāghra viṣṭaraśravasā svayam | dvaipāyanena ca tathā devasthānena jiṣṇunā

नरव्याघ्र, उन्हें विष्टरश्रवा (कृष्ण) ने स्वयं सान्त्वना दी, तथा द्वैपायन, देवस्थान और अर्जुन ने भी,

श्लोक 28 (12.36.28)

एतैश्चान्यैश्च बहुभिरनुनीतो युधिष्ठिरः । व्यजहान्मानसं दुःखं संतापं च महायशाः ॥

etaiścānyaiśca bahubhiranunīto yudhiṣṭhiraḥ | vyajahānmānasaṃ duḥkhaṃ saṃtāpaṃ ca mahāyaśāḥ

और इनसे तथा अनेक अन्य लोगों से समझाए जाने पर महायशस्वी युधिष्ठिर ने मन का दुःख और सन्ताप त्याग दिया।

श्लोक 29 (12.36.29)

श्रुतवाक्यः श्रुतनिधिः श्रुतश्राव्यविशारदः । व्यवस्य मनसा शान्तिमगच्छत्पाण्डुनन्दनः ॥

śrutavākyaḥ śrutanidhiḥ śrutaśrāvyaviśāradaḥ | vyavasya manasā śāntimagacchatpāṇḍunandanaḥ

शास्त्र सुने हुए, विद्या के निधि और सुनने-सुनाने योग्य विषयों में कुशल पाण्डुपुत्र ने मन में निश्चय करके शान्ति पाई।

श्लोक 30 (12.36.30)

स तैः परिवृतो राजा नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः । धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य स्वपुरं प्रविवेश ह ॥

sa taiḥ parivṛto rājā nakṣatrairiva candramāḥ | dhṛtarāṣṭraṃ puraskṛtya svapuraṃ praviveśa ha

तारों से घिरे चन्द्रमा की तरह उनसे घिरे हुए राजा ने धृतराष्ट्र को आगे करके अपने नगर में प्रवेश किया।

श्लोक 31 (12.36.31)

प्रविविक्षुः स धर्मज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अर्चयामास देवांश्च ब्राह्मणांश्च सहस्रशः ॥

pravivikṣuḥ sa dharmajñaḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | arcayāmāsa devāṃśca brāhmaṇāṃśca sahasraśaḥ

प्रवेश करने की इच्छा से धर्मज्ञ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने हजारों देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा की।

श्लोक 32 (12.36.32)

ततो नवं रथं शुभ्रं कम्बलाजिनसंवृतम् । युक्तं षोडशभिस्त्वश्वैः पाण्डुरैः शुभलक्षणैः ॥

tato navaṃ rathaṃ śubhraṃ kambalājinasaṃvṛtam | yuktaṃ ṣoḍaśabhistvaśvaiḥ pāṇḍuraiḥ śubhalakṣaṇaiḥ

तब कम्बल और मृगचर्म से ढका हुआ, शुभ लक्षणों वाले सोलह श्वेत घोड़ों से जुता हुआ एक नया चमकता रथ आया,

श्लोक 33 (12.36.33)

मन्त्रैरभ्यर्चितं पुण्यैः स्तूयमानश्च बन्दिभिः । आरुरोह यथा देवः सोमोऽमृतमयं रथम् ॥

mantrairabhyarcitaṃ puṇyaiḥ stūyamānaśca bandibhiḥ | āruroha yathā devaḥ somo'mṛtamayaṃ ratham

जिसकी पवित्र मन्त्रों से पूजा की गई थी; और बन्दियों से स्तुति पाते हुए वे उस पर चढ़े, जैसे देव सोम अमृतमय रथ पर चढ़ते हैं।

श्लोक 34 (12.36.34)

जग्राह रश्मीन्कौन्तेयो भीमो भीमपराक्रमः । अर्जुनः पाण्डुरं छत्रं धारयामास भानुमत् ॥

jagrāha raśmīnkaunteyo bhīmo bhīmaparākramaḥ | arjunaḥ pāṇḍuraṃ chatraṃ dhārayāmāsa bhānumat

भयंकर पराक्रमी कुन्तीपुत्र भीम ने लगाम सँभाली और अर्जुन ने चमकता हुआ श्वेत छत्र धारण किया।

श्लोक 35 (12.36.35)

ध्रियमाणं च तच्छत्रं पाण्डुरं राजमूर्धनि । शुशुभे तारकाराजः सिताभ्र इव चाम्बरे ॥

dhriyamāṇaṃ ca tacchatraṃ pāṇḍuraṃ rājamūrdhani | śuśubhe tārakārājaḥ sitābhra iva cāmbare

राजा के मस्तक पर तना हुआ वह श्वेत छत्र आकाश में तारों के राजा चन्द्रमा या श्वेत बादल की तरह शोभित हुआ।

श्लोक 36 (12.36.36)

चामरव्यजने त्वस्य वीरौ जगृहतुस्तदा । चन्द्ररश्मिप्रभे शुभ्रे माद्रीपुत्रावलंकृते ॥

cāmaravyajane tvasya vīrau jagṛhatustadā | candraraśmiprabhe śubhre mādrīputrāvalaṃkṛte

तब माद्री के दोनों वीर पुत्रों ने सजकर चन्द्रकिरणों की तरह उज्ज्वल दोनों चँवर थाम लिए।

श्लोक 37 (12.36.37)

ते पञ्च रथमास्थाय भ्रातरः समलंकृताः । भूतानीव समस्तानि राजन्ददृशिरे तदा ॥

te pañca rathamāsthāya bhrātaraḥ samalaṃkṛtāḥ | bhūtānīva samastāni rājandadṛśire tadā

रथ पर सवार सजे हुए वे पाँचों भाई, राजन्, उस समय सब भूतों के समूह की तरह दिखाई दिए।

श्लोक 38 (12.36.38)

आस्थाय तु रथं शुभ्रं युक्तमश्वैर्मनोजवैः । अन्वयात्पृष्ठतो राजन्युयुत्सुः पाण्डवाग्रजम् ॥

āsthāya tu rathaṃ śubhraṃ yuktamaśvairmanojavaiḥ | anvayātpṛṣṭhato rājanyuyutsuḥ pāṇḍavāgrajam

मन के समान वेग वाले घोड़ों से जुते चमकते रथ पर सवार होकर, राजन्, युयुत्सु पाण्डवों के ज्येष्ठ के पीछे-पीछे चला।

श्लोक 39 (12.36.39)

रथं हेममयं शुभ्रं शैव्यसुग्रीवयोजितम् । सह सात्यकिना कृष्णः समास्थायान्वयात्कुरून् ॥

rathaṃ hemamayaṃ śubhraṃ śaivyasugrīvayojitam | saha sātyakinā kṛṣṇaḥ samāsthāyānvayātkurūn

कृष्ण सात्यकि के साथ शैब्य और सुग्रीव से जुते सोने के चमकते रथ पर सवार होकर कुरुओं के पीछे चले।

श्लोक 40 (12.36.40)

नरयानेन तु ज्येष्ठः पिता पार्थस्य भारत । अग्रतो धर्मराजस्य गान्धारीसहितो ययौ ॥

narayānena tu jyeṣṭhaḥ pitā pārthasya bhārata | agrato dharmarājasya gāndhārīsahito yayau

पार्थ के ज्येष्ठ पिता धृतराष्ट्र गान्धारी के साथ पालकी में बैठकर धर्मराज के आगे-आगे चले।

श्लोक 41 (12.36.41)

कुरुस्त्रियश्च ताः सर्वाः कुन्ती कृष्णा च माधवी । यानैरुच्चावचैर्जग्मुर्विदुरेण पुरस्कृताः ॥

kurustriyaśca tāḥ sarvāḥ kuntī kṛṣṇā ca mādhavī | yānairuccāvacairjagmurvidureṇa puraskṛtāḥ

और सब कुरुकुल की स्त्रियाँ, कुन्ती, कृष्णा (द्रौपदी) और माधवी, विदुर के नेतृत्व में तरह-तरह के वाहनों पर चलीं।

श्लोक 42 (12.36.42)

ततो रथाश्च बहुला नागाश्वसमलंकृताः । पादाताश्च हयाश्चैव पृष्ठतः समनुव्रजन् ॥

tato rathāśca bahulā nāgāśvasamalaṃkṛtāḥ | pādātāśca hayāścaiva pṛṣṭhataḥ samanuvrajan

फिर हाथियों और घोड़ों से सजे हुए बहुत-से रथ तथा पैदल सैनिक और घुड़सवार पीछे-पीछे चले।

श्लोक 43 (12.36.43)

ततो वैतालिकैः सूतैर्मागधैश्च सुभाषितैः । स्तूयमानो ययौ राजा नगरं नागसाह्वयम् ॥

tato vaitālikaiḥ sūtairmāgadhaiśca subhāṣitaiḥ | stūyamāno yayau rājā nagaraṃ nāgasāhvayam

तब वैतालिकों, सूतों और मागधों की सुन्दर स्तुतियाँ सुनते हुए राजा नागसाह्वय (हस्तिनापुर) नगर की ओर चले।

श्लोक 44 (12.36.44)

तत्प्रयाणं महाबाहोर्बभूवाप्रतिमं भुवि । आकुलाकुलमुत्क्रुष्टं हृष्टपुष्टजनाकुलम् ॥

tatprayāṇaṃ mahābāhorbabhūvāpratimaṃ bhuvi | ākulākulamutkruṣṭaṃ hṛṣṭapuṣṭajanākulam

महाबाहु राजा की वह यात्रा पृथ्वी पर अनुपम थी: कोलाहल से भरी, जयघोषों से गूँजती और हर्षित, हृष्ट-पुष्ट लोगों से खचाखच भरी।

श्लोक 45 (12.36.45)

अभियाने तु पार्थस्य नरैर्नगरवासिभिः । नगरं राजमार्गाश्च यथावत्समलंकृताः ॥

abhiyāne tu pārthasya narairnagaravāsibhiḥ | nagaraṃ rājamārgāśca yathāvatsamalaṃkṛtāḥ

पार्थ के आगमन पर नगरवासियों ने नगर और राजमार्गों को विधिपूर्वक सजा दिया था।

श्लोक 46 (12.36.46)

पाण्डुरेण च माल्येन पताकाभिश्च मेदिनी । संस्कृतो राजमार्गोऽभूद्धूपनैश्च प्रधूपितः ॥

pāṇḍureṇa ca mālyena patākābhiśca medinī | saṃskṛto rājamārgo'bhūddhūpanaiśca pradhūpitaḥ

श्वेत मालाओं और पताकाओं से भूमि सजी थी, और राजमार्ग संस्कारित होकर धूप से भलीभाँति सुगन्धित था।

श्लोक 47 (12.36.47)

अथ चूर्णैश्च गन्धानां नानापुष्पप्रियङ्गुभिः । माल्यदामभिरासक्तै राजवेश्माभिसंवृतम् ॥

atha cūrṇaiśca gandhānāṃ nānāpuṣpapriyaṅgubhiḥ | mālyadāmabhirāsaktai rājaveśmābhisaṃvṛtam

राजभवन चारों ओर गन्ध-चूर्णों, तरह-तरह के फूलों और प्रियंगु से तथा लटकती मालाओं की लड़ियों से ढका हुआ था।

श्लोक 48 (12.36.48)

कुम्भाश्च नगरद्वारि वारिपूर्णा नवा दृढाः । सिताः सुमनसो गौराः स्थापितास्तत्र तत्र ह ॥

kumbhāśca nagaradvāri vāripūrṇā navā dṛḍhāḥ | sitāḥ sumanaso gaurāḥ sthāpitāstatra tatra ha

नगर-द्वार पर जल से भरे नए और मजबूत घड़े रखे थे, और श्वेत फूल तथा गौर वर्ण के पुष्प जगह-जगह रखे गए थे।

श्लोक 49 (12.36.49)

तथा स्वलंकृतं द्वारं नगरं पाण्डुनन्दनः । स्तूयमानः शुभैर्वाक्यैः प्रविवेश सुहृद्वृतः ॥

tathā svalaṃkṛtaṃ dvāraṃ nagaraṃ pāṇḍunandanaḥ | stūyamānaḥ śubhairvākyaiḥ praviveśa suhṛdvṛtaḥ

इस प्रकार सुन्दर सजे हुए द्वार से शुभ वचनों में स्तुति पाते हुए और मित्रों से घिरे हुए पाण्डुपुत्र ने नगर में प्रवेश किया।

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