शान्ति पर्व · अध्याय 37
चार्वाक राक्षस का ब्राह्मणों द्वारा भस्म होना
युधिष्ठिर नगर-स्त्रियों की प्रशंसा और प्रजा के आशीर्वाद के बीच हस्तिनापुर में प्रवेश करते हैं, देवताओं का पूजन करते हैं और ब्राह्मणों को दान देकर सम्मानित करते हैं। तभी दुर्योधन का मित्र चार्वाक राक्षस, भिक्षु का वेश बनाकर, उपस्थित ब्राह्मणों के नाम पर राजा को ताने देता है। लज्जित ब्राह्मण उसके वचनों को अस्वीकार करते हैं, ज्ञानदृष्टि से उसे पहचान लेते हैं और अपनी क्रोधभरी हुंकारों से उसे भस्म कर देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.37.1)
प्रवेशने तु पार्थानां जनानां पुरवासिनाम् । दिदृक्षूणां सहस्राणि समाजग्मुः सहस्रशः ॥
praveśane tu pārthānāṃ janānāṃ puravāsinām | didṛkṣūṇāṃ sahasrāṇi samājagmuḥ sahasraśaḥ
पाण्डवों के प्रवेश करते समय नगरवासी जनों के हजारों-हजार दर्शनार्थी इकट्ठे हो गए।
श्लोक 2 (12.37.2)
स राजमार्गः शुशुभे समलंकृतचत्वरः । यथा चन्द्रोदये राजन्वर्धमानो महोदधिः ॥
sa rājamārgaḥ śuśubhe samalaṃkṛtacatvaraḥ | yathā candrodaye rājanvardhamāno mahodadhiḥ
राजन्, चौराहों से भलीभाँति सजा वह राजमार्ग चन्द्रोदय पर उमड़ते महासागर की तरह शोभित हुआ।
श्लोक 3 (12.37.3)
गृहाणि राजमार्गेषु रत्नवन्ति महान्ति च । प्राकम्पन्तीव भारेण स्त्रीणां पूर्णानि भारत ॥
gṛhāṇi rājamārgeṣu ratnavanti mahānti ca | prākampantīva bhāreṇa strīṇāṃ pūrṇāni bhārata
भारत, राजमार्गों के किनारे रत्नों से भरे विशाल भवन स्त्रियों से भरे होने के कारण मानो भार से काँप रहे थे।
श्लोक 4 (12.37.4)
ताः शनैरिव सव्रीडं प्रशशंसुर्युधिष्ठिरम् । भीमसेनार्जुनौ चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥
tāḥ śanairiva savrīḍaṃ praśaśaṃsuryudhiṣṭhiram | bhīmasenārjunau caiva mādrīputrau ca pāṇḍavau
वे स्त्रियाँ मानो धीरे-धीरे और लजाते हुए युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन और माद्री के दोनों पाण्डव पुत्रों की प्रशंसा करने लगीं।
स्त्रिय ऊचुः
श्लोक 5 (12.37.5)
धन्या त्वमसि पाञ्चालि या त्वं पुरुषसत्तमान् । उपतिष्ठसि कल्याणि महर्षिमिव गौतमी ॥
dhanyā tvamasi pāñcāli yā tvaṃ puruṣasattamān | upatiṣṭhasi kalyāṇi maharṣimiva gautamī
"पाञ्चाली, तुम धन्य हो, जो पुरुषश्रेष्ठों की सेवा करती हो, कल्याणि, जैसे गौतमी महर्षि की सेवा करती है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (12.37.6)
तव कर्माण्यमोघानि व्रतचर्या च भामिनि । इति कृष्णां महाराज प्रशशंसुस्तदा स्त्रियः ॥
tava karmāṇyamoghāni vratacaryā ca bhāmini | iti kṛṣṇāṃ mahārāja praśaśaṃsustadā striyaḥ
"भामिनि, तुम्हारे कर्म कभी निष्फल नहीं होते, और तुम्हारा व्रताचरण भी।" महाराज, इस प्रकार उस समय स्त्रियों ने कृष्णा (द्रौपदी) की प्रशंसा की।
श्लोक 7 (12.37.7)
प्रशंसावचनैस्तासां मिथः शब्दैश्च भारत । प्रीतिजैश्च तदा शब्दैः पुरमासीत्समाकुलम् ॥
praśaṃsāvacanaistāsāṃ mithaḥ śabdaiśca bhārata | prītijaiśca tadā śabdaiḥ puramāsītsamākulam
भारत, उनके प्रशंसा-वचनों, आपस की बातचीत और प्रसन्नता की ध्वनियों से नगर गूँज उठा।
श्लोक 8 (12.37.8)
तमतीत्य यथायुक्तं राजमार्गं युधिष्ठिरः । अलंकृतं शोभमानमुपायाद्राजवेश्म ह ॥
tamatītya yathāyuktaṃ rājamārgaṃ yudhiṣṭhiraḥ | alaṃkṛtaṃ śobhamānamupāyādrājaveśma ha
उस राजमार्ग को यथाविधि पार करके युधिष्ठिर सजे हुए, शोभायमान राजभवन में पहुँचे।
श्लोक 9 (12.37.9)
ततः प्रकृतयः सर्वाः पौरा जानपदास्तदा । ऊचुः कर्णसुखा वाचः समुपेत्य ततस्ततः ॥
tataḥ prakṛtayaḥ sarvāḥ paurā jānapadāstadā | ūcuḥ karṇasukhā vācaḥ samupetya tatastataḥ
तब सब प्रजाजन, नगरवासी और देहाती, चारों ओर से पास आकर कानों को सुख देने वाली बातें कहने लगे:
पौरजानपदा ऊचुः
श्लोक 10 (12.37.10)
दिष्ट्या जयसि राजेन्द्र शत्रूञ्छत्रुनिषूदन । दिष्ट्या राज्यं पुनः प्राप्तं धर्मेण च बलेन च ॥
diṣṭyā jayasi rājendra śatrūñchatruniṣūdana | diṣṭyā rājyaṃ punaḥ prāptaṃ dharmeṇa ca balena ca
"राजेन्द्र, शत्रुनाशन, सौभाग्य से आप विजयी हुए; सौभाग्य से धर्म और बल से राज्य फिर आपको मिला।"
श्लोक 11 (12.37.11)
भव नस्त्वं महाराज राजेह शरदां शतम् । प्रजाः पालय धर्मेण यथेन्द्रस्त्रिदिवं तथा ॥
bhava nastvaṃ mahārāja rājeha śaradāṃ śatam | prajāḥ pālaya dharmeṇa yathendrastridivaṃ tathā
"महाराज, आप यहाँ सौ शरद ऋतुओं तक हमारे राजा बने रहें; जैसे इन्द्र स्वर्ग का पालन करते हैं, वैसे ही आप धर्म से प्रजा का पालन कीजिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 12 (12.37.12)
एवं राजकुलद्वारि मङ्गलैरभिपूजितः । आशीर्वादान्द्विजैरुक्तान्प्रतिगृह्य समन्ततः ॥
evaṃ rājakuladvāri maṅgalairabhipūjitaḥ | āśīrvādāndvijairuktānpratigṛhya samantataḥ
इस प्रकार राजभवन के द्वार पर मंगल वचनों से सम्मानित होकर और चारों ओर ब्राह्मणों के कहे आशीर्वाद ग्रहण करके,
श्लोक 13 (12.37.13)
प्रविश्य भवनं राजा देवराजगृहोपमम् । श्रुत्वा विजयसंयुक्तं रथात्पश्चादवातरत् ॥
praviśya bhavanaṃ rājā devarājagṛhopamam | śrutvā vijayasaṃyuktaṃ rathātpaścādavātarat
राजा ने इन्द्रभवन के समान राजभवन में प्रवेश किया और विजय की घोषणाएँ सुनकर तब रथ से उतरे।
श्लोक 14 (12.37.14)
प्रविश्याभ्यन्तरं श्रीमान्दैवतान्यभिगम्य च । पूजयामास रत्नैश्च गन्धमाल्यैश्च सर्वशः ॥
praviśyābhyantaraṃ śrīmāndaivatānyabhigamya ca | pūjayāmāsa ratnaiśca gandhamālyaiśca sarvaśaḥ
श्रीमान् राजा भीतर गए, देवताओं के पास पहुँचे और रत्नों, गन्धों तथा मालाओं से चारों ओर उनकी पूजा की।
श्लोक 15 (12.37.15)
निश्चक्राम ततः श्रीमान्पुनरेव महायशाः । ददर्श ब्राह्मणांश्चैव सोऽभिरूपानवस्थितान् ॥
niścakrāma tataḥ śrīmānpunareva mahāyaśāḥ | dadarśa brāhmaṇāṃścaiva so'bhirūpānavasthitān
फिर श्रीमान् महायशस्वी राजा बाहर निकले और वहाँ खड़े योग्य ब्राह्मणों को देखा।
श्लोक 16 (12.37.16)
स संवृतस्तदा विप्रैराशीर्वादविवक्षुभिः । शुशुभे विमलश्चन्द्रस्तारागणवृतो यथा ॥
sa saṃvṛtastadā viprairāśīrvādavivakṣubhiḥ | śuśubhe vimalaścandrastārāgaṇavṛto yathā
आशीर्वाद देने को उत्सुक ब्राह्मणों से घिरे हुए वे तारों के समूह से घिरे निर्मल चन्द्रमा की तरह शोभित हुए।
श्लोक 17 (12.37.17)
तांस्तु वै पूजयामास कौन्तेयो विधिवद्द्विजान् । सुमनोमोदकै रत्नैर्हिरण्येन च भूरिणा । गोभिर्वस्त्रैश्च राजेन्द्र विविधैश्च किमिच्छकैः ॥
tāṃstu vai pūjayāmāsa kaunteyo vidhivaddvijān | sumanomodakai ratnairhiraṇyena ca bhūriṇā | gobhirvastraiśca rājendra vividhaiśca kimicchakaiḥ
कुन्तीपुत्र ने उन ब्राह्मणों का विधिपूर्वक सत्कार किया: फूलों और मोदकों से, रत्नों से, बहुत-से सोने से, गौओं और वस्त्रों से, राजेन्द्र, और "क्या चाहिए?" पूछते हुए तरह-तरह की वस्तुओं से।
श्लोक 18 (12.37.18)
धौम्यं गुरुं पुरस्कृत्य ज्येष्ठं पितरमेव च । प्रविवेश सभां राजा सुधर्मां वासवो यथा ॥
dhaumyaṃ guruṃ puraskṛtya jyeṣṭhaṃ pitarameva ca | praviveśa sabhāṃ rājā sudharmāṃ vāsavo yathā
गुरु धौम्य और ज्येष्ठ पितृतुल्य धृतराष्ट्र को आगे करके राजा ने सभा में प्रवेश किया, जैसे इन्द्र सुधर्मा सभा में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 19 (12.37.19)
ततः पुण्याहघोषोऽभूद्दिवं स्तब्ध्वेव भारत । सुहृदां प्रीतिजननः पुण्यः श्रुतिसुखावहः ॥
tataḥ puṇyāhaghoṣo'bhūddivaṃ stabdhveva bhārata | suhṛdāṃ prītijananaḥ puṇyaḥ śrutisukhāvahaḥ
तब पुण्याहवाचन की पवित्र ध्वनि उठी, भारत, मानो आकाश को स्तब्ध करती हुई, मित्रों को आनन्द देने वाली, कानों को सुख देने वाली।
श्लोक 20 (12.37.20)
हंसवन्नेदुषां राजन्द्विजानां तत्र भारती । शुश्रुवे वेदविदुषां पुष्कलार्थपदाक्षरा ॥
haṃsavanneduṣāṃ rājandvijānāṃ tatra bhāratī | śuśruve vedaviduṣāṃ puṣkalārthapadākṣarā
राजन्, वहाँ हंसों की तरह मधुर ध्वनि करने वाले वेदज्ञ ब्राह्मणों की वाणी सुनाई दी, जिसके पद और अक्षर अर्थ से परिपूर्ण थे।
श्लोक 21 (12.37.21)
ततो दुन्दुभिनिर्घोषः शङ्खानां च मनोरमः । जयं प्रवदतां तत्र स्वनः प्रादुरभून्नृप ॥
tato dundubhinirghoṣaḥ śaṅkhānāṃ ca manoramaḥ | jayaṃ pravadatāṃ tatra svanaḥ prādurabhūnnṛpa
फिर, राजन्, नगाड़ों और शंखों की मनोहर ध्वनि उठी, साथ में जयघोष करने वालों का शब्द भी।
श्लोक 22 (12.37.22)
निःशब्दे च स्थिते तत्र ततो विप्रजने पुनः । राजानं ब्राह्मणच्छद्मा चार्वाको राक्षसोऽब्रवीत् ॥
niḥśabde ca sthite tatra tato viprajane punaḥ | rājānaṃ brāhmaṇacchadmā cārvāko rākṣaso'bravīt
जब ब्राह्मण-समुदाय फिर शान्त और स्थिर हो गया, तब ब्राह्मण का रूप धारण किए हुए चार्वाक राक्षस ने राजा से कहा।
श्लोक 23 (12.37.23)
तत्र दुर्योधनसखा भिक्षुरूपेण संवृतः । साङ्ख्यः शिखी त्रिदण्डी च धृष्टो विगतसाध्वसः ॥
tatra duryodhanasakhā bhikṣurūpeṇa saṃvṛtaḥ | sāṅkhyaḥ śikhī tridaṇḍī ca dhṛṣṭo vigatasādhvasaḥ
दुर्योधन का वह मित्र वहाँ भिक्षु का रूप धरे खड़ा था: सांख्यमतावलम्बी, शिखाधारी, त्रिदण्डी, ढीठ और निर्भय।
श्लोक 24 (12.37.24)
वृतः सर्वैस्तथा विप्रैराशीर्वादविवक्षुभिः । परस्सहस्रै राजेन्द्र तपोनियमसंस्थितैः ॥
vṛtaḥ sarvaistathā viprairāśīrvādavivakṣubhiḥ | parassahasrai rājendra taponiyamasaṃsthitaiḥ
राजेन्द्र, आशीर्वाद देने को उत्सुक उन सब ब्राह्मणों से, जो तप और नियमों में दृढ़ थे और हजारों से भी अधिक थे, वह घिरा हुआ था।
श्लोक 25 (12.37.25)
सुदुष्टः पापमाशंसुः पाण्डवानां महात्मनाम् । अनामन्त्र्यैव तान्विप्रांस्तमुवाच महीपतिम् ॥
suduṣṭaḥ pāpamāśaṃsuḥ pāṇḍavānāṃ mahātmanām | anāmantryaiva tānviprāṃstamuvāca mahīpatim
पाण्डवों का अनिष्ट चाहने वाले उस महादुष्ट ने उन ब्राह्मणों से पूछे बिना ही राजा से कहा।
चार्वाक उवाच
श्लोक 26 (12.37.26)
इमे प्राहुर्द्विजाः सर्वे समारोप्य वचो मयि । धिग्भवन्तं कुनृपतिं ज्ञातिघातिनमस्तु वै ॥
ime prāhurdvijāḥ sarve samāropya vaco mayi | dhigbhavantaṃ kunṛpatiṃ jñātighātinamastu vai
"इन सब ब्राह्मणों ने अपने वचन मुझ पर रखकर कहा है: धिक्कार है आपको, दुष्ट राजा, ज्ञातिघाती! ऐसा ही हो।"
श्लोक 27 (12.37.27)
किं ते राज्येन कौन्तेय कृत्वेमं ज्ञातिसंक्षयम् । घातयित्वा गुरूंश्चैव मृतं श्रेयो न जीवितम् ॥
kiṃ te rājyena kaunteya kṛtvemaṃ jñātisaṃkṣayam | ghātayitvā gurūṃścaiva mṛtaṃ śreyo na jīvitam
"कुन्तीपुत्र, अपने ज्ञातियों का यह संहार करके और गुरुजनों को मरवाकर आपको राज्य से क्या प्रयोजन? मर जाना जीवित रहने से अच्छा है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 28 (12.37.28)
इति ते वै द्विजाः श्रुत्वा तस्य दुष्टस्य रक्षसः । विव्यथुश्चुक्रुशुश्चैव तस्य वाक्यप्रधर्षिताः ॥
iti te vai dvijāḥ śrutvā tasya duṣṭasya rakṣasaḥ | vivyathuścukruśuścaiva tasya vākyapradharṣitāḥ
उस दुष्ट राक्षस की ये बातें सुनकर वे ब्राह्मण व्यथित हो उठे और उसके वचनों से आहत होकर चिल्ला पड़े।
श्लोक 29 (12.37.29)
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे स च राजा युधिष्ठिरः । व्रीडिताः परमोद्विग्नास्तूष्णीमासन्विशांपते ॥
tataste brāhmaṇāḥ sarve sa ca rājā yudhiṣṭhiraḥ | vrīḍitāḥ paramodvignāstūṣṇīmāsanviśāṃpate
तब, राजन्, वे सब ब्राह्मण और राजा युधिष्ठिर भी लज्जित और अत्यन्त व्यथित होकर चुप हो गए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 30 (12.37.30)
प्रसीदन्तु भवन्तो मे प्रणतस्याभियाचतः । प्रत्यासन्नव्यसनिनं न मां धिक्कर्तुमर्हथ ॥
prasīdantu bhavanto me praṇatasyābhiyācataḥ | pratyāsannavyasaninaṃ na māṃ dhikkartumarhatha
"मैं आपके सामने झुका हुआ प्रार्थना करता हूँ; मुझ पर प्रसन्न होइए। जिस पर विपत्ति आ पड़ी है, ऐसे मुझे धिक्कारना आपके योग्य नहीं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 31 (12.37.31)
ततो राजन्ब्राह्मणास्ते सर्व एव विशांपते । ऊचुर्नैष द्विजोऽस्माकमन्यस्तु तव पार्थिव ॥
tato rājanbrāhmaṇāste sarva eva viśāṃpate | ūcurnaiṣa dvijo'smākamanyastu tava pārthiva
तब, राजन्, उन सब ब्राह्मणों ने कहा: "यह हमारा ब्राह्मण नहीं है; यह कोई और है, राजन्, और तुम्हारे ही सम्बन्ध का है।"
श्लोक 32 (12.37.32)
जज्ञुश्चैनं महात्मानस्ततस्तं ज्ञानचक्षुषा । ब्राह्मणा वेदविद्वांसस्तपोभिर्विमलीकृताः ॥
jajñuścainaṃ mahātmānastatastaṃ jñānacakṣuṣā | brāhmaṇā vedavidvāṃsastapobhirvimalīkṛtāḥ
और वेदों के ज्ञाता तथा तप से निर्मल हुए उन महात्मा ब्राह्मणों ने तब ज्ञानचक्षु से उसे पहचान लिया।
ब्राह्मणा ऊचुः
श्लोक 33 (12.37.33)
एष दुर्योधनसखा विश्रुतो ब्रह्मराक्षसः । परिव्राजकरूपेण हितं तस्य चिकीर्षति ॥
eṣa duryodhanasakhā viśruto brahmarākṣasaḥ | parivrājakarūpeṇa hitaṃ tasya cikīrṣati
"यह दुर्योधन का मित्र, प्रसिद्ध ब्रह्मराक्षस है, जो परिव्राजक का रूप धरकर उसका हित करना चाहता है।"
श्लोक 34 (12.37.34)
न वयं ब्रूम धर्मात्मन्व्येतु ते भयमीदृशम् । उपतिष्ठतु कल्याणं भवन्तं भ्रातृभिः सह ॥
na vayaṃ brūma dharmātmanvyetu te bhayamīdṛśam | upatiṣṭhatu kalyāṇaṃ bhavantaṃ bhrātṛbhiḥ saha
"धर्मात्मन्, हमने यह नहीं कहा। आपका ऐसा भय दूर हो। भाइयों सहित आपका कल्याण हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 35 (12.37.35)
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे हुंकारैः क्रोधमूर्च्छिताः । निर्भर्त्सयन्तः शुचयो निजघ्नुः पापराक्षसम् ॥
tataste brāhmaṇāḥ sarve huṃkāraiḥ krodhamūrcchitāḥ | nirbhartsayantaḥ śucayo nijaghnuḥ pāparākṣasam
तब पवित्र ब्राह्मणों ने क्रोध से अचेत-से होकर हुंकारों से उस पापी राक्षस को डाँटा और मार डाला।
श्लोक 36 (12.37.36)
स पपात विनिर्दग्धस्तेजसा ब्रह्मवादिनाम् । महेन्द्राशनिनिर्दग्धः पादपोऽङ्कुरवानिव ॥
sa papāta vinirdagdhastejasā brahmavādinām | mahendrāśaninirdagdhaḥ pādapo'ṅkuravāniva
ब्रह्मवादियों के तेज से जलकर वह गिर पड़ा, जैसे महेन्द्र के वज्र से जला हुआ अंकुरों वाला वृक्ष।
श्लोक 37 (12.37.37)
पूजिताश्च ययुर्विप्रा राजानमभिनन्द्य तम् । राजा च हर्षमापेदे पाण्डवः ससुहृज्जनः ॥
pūjitāśca yayurviprā rājānamabhinandya tam | rājā ca harṣamāpede pāṇḍavaḥ sasuhṛjjanaḥ
सम्मानित ब्राह्मण राजा को आशीर्वाद देकर चले गए, और पाण्डव राजा अपने मित्रों के साथ हर्षित हुआ।