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शान्ति पर्व · अध्याय 38

कृष्ण द्वारा राक्षस चार्वाक का वृत्तान्त

भाइयों के बीच बैठे युधिष्ठिर से कृष्ण कहते हैं कि ब्राह्मण सदा पूजनीय हैं, और राक्षस चार्वाक की कथा सुनाते हैं, जिसने ब्रह्मा से ब्राह्मणों के अपमान को छोड़कर सब प्राणियों से अभय का वर पाया था और जो दुर्योधन का मित्र बनकर क्रुद्ध ब्राह्मणों के वाक्-बल से भस्म हो गया। वे युधिष्ठिर से कहते हैं कि शोक न करें, क्योंकि उनके मारे गए बन्धु क्षत्रिय-धर्म से स्वर्ग गए हैं; वे अपने कार्यों में लगें, शत्रुओं को मारें, प्रजा की रक्षा करें और ब्राह्मणों का सम्मान करें।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.38.1)

ततस्तत्र तु राजानं तिष्ठन्तं भ्रातृभिः सह । उवाच देवकीपुत्रः सर्वदर्शी जनार्दनः ॥

tatastatra tu rājānaṃ tiṣṭhantaṃ bhrātṛbhiḥ saha | uvāca devakīputraḥ sarvadarśī janārdanaḥ

तब वहाँ भाइयों के साथ खड़े हुए राजा से सब कुछ देखने वाले देवकीपुत्र जनार्दन ने कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (12.38.2)

ब्राह्मणास्तात लोकेऽस्मिन्नर्चनीयाः सदा मम । एते भूमिचरा देवा वाग्विषाः सुप्रसादकाः ॥

brāhmaṇāstāta loke'sminnarcanīyāḥ sadā mama | ete bhūmicarā devā vāgviṣāḥ suprasādakāḥ

हे तात, इस लोक में ब्राह्मण मेरे लिए सदा पूजनीय हैं। ये पृथ्वी पर विचरने वाले देवता हैं; इनकी वाणी विष-सी है, फिर भी ये सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं।

श्लोक 3 (12.38.3)

पुरा कृतयुगे राजंश्चार्वाको नाम राक्षसः । तपस्तेपे महाबाहो बदर्यां बहुवार्षिकम् ॥

purā kṛtayuge rājaṃścārvāko nāma rākṣasaḥ | tapastepe mahābāho badaryāṃ bahuvārṣikam

हे राजन्, बहुत पहले कृतयुग में चार्वाक नाम का एक राक्षस था। हे महाबाहो, उसने बदरी में बहुत वर्षों तक तप किया।

श्लोक 4 (12.38.4)

वरेण च्छन्द्यमानश्च ब्रह्मणा च पुनः पुनः । अभयं सर्वभूतेभ्यो वरयामास भारत ॥

vareṇa cchandyamānaśca brahmaṇā ca punaḥ punaḥ | abhayaṃ sarvabhūtebhyo varayāmāsa bhārata

ब्रह्मा के बार-बार वर माँगने को कहने पर, हे भारत, उसने सब प्राणियों से अभय का वर माँगा।

श्लोक 5 (12.38.5)

द्विजावमानादन्यत्र प्रादाद्वरमनुत्तमम् । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददौ तस्मै जगत्पतिः ॥

dvijāvamānādanyatra prādādvaramanuttamam | abhayaṃ sarvabhūtebhyo dadau tasmai jagatpatiḥ

जगत् के स्वामी ने उसे वह परम वर दिया, सब प्राणियों से अभय, केवल द्विजों के अपमान की स्थिति को छोड़कर।

श्लोक 6 (12.38.6)

स तु लब्धवरः पापो देवानमितविक्रमः । राक्षसस्तापयामास तीव्रकर्मा महाबलः ॥

sa tu labdhavaraḥ pāpo devānamitavikramaḥ | rākṣasastāpayāmāsa tīvrakarmā mahābalaḥ

वर पाकर वह पापी, अपार पराक्रम वाला, क्रूर कर्म करने वाला महाबली राक्षस देवताओं को सताने लगा।

श्लोक 7 (12.38.7)

ततो देवाः समेताश्च ब्रह्माणमिदमब्रुवन् । वधाय रक्षसस्तस्य बलविप्रकृतास्तदा ॥

tato devāḥ sametāśca brahmāṇamidamabruvan | vadhāya rakṣasastasya balaviprakṛtāstadā

तब उसके बल से पीड़ित देवता एकत्र होकर ब्रह्मा के पास गए और उस राक्षस के वध के लिए उनसे यह बोले।

श्लोक 8 (12.38.8)

तानुवाच ततो देवो विहितं तत्र वै मया । यथाऽस्य भविता मृत्युरचिरेणेति भारत ॥

tānuvāca tato devo vihitaṃ tatra vai mayā | yathā'sya bhavitā mṛtyuracireṇeti bhārata

तब देव ब्रह्मा ने उनसे कहा, "हे भारत, मैंने इसका प्रबन्ध कर दिया है, जिससे थोड़े ही समय में उसकी मृत्यु होगी।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 9 (12.38.9)

राजा दुर्योधनो नाम सखाऽस्य भविता नृषु । तस्य स्नेहावबद्धोऽसौ ब्राह्मणानवमंस्यते ॥

rājā duryodhano nāma sakhā'sya bhavitā nṛṣu | tasya snehāvabaddho'sau brāhmaṇānavamaṃsyate

"मनुष्यों में दुर्योधन नाम का एक राजा होगा, जो उसका मित्र बनेगा। उसके स्नेह में बँधा हुआ यह राक्षस ब्राह्मणों का अपमान करेगा।"

श्लोक 10 (12.38.10)

तत्रैनं रुषिता विप्रा विप्रकारप्रधर्षिताः । धक्ष्यन्ति वाग्बलाः पापं ततो नाशं गमिष्यति ॥

tatrainaṃ ruṣitā viprā viprakārapradharṣitāḥ | dhakṣyanti vāgbalāḥ pāpaṃ tato nāśaṃ gamiṣyati

"तब अपमान से क्रुद्ध हुए ब्राह्मण अपने वाणी-बल से उस पापी को भस्म कर देंगे, और इस प्रकार वह नाश को प्राप्त होगा।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 11 (12.38.11)

स एष निहतः शेते ब्रह्मदण्डेन राक्षसः । चार्वाको नृपतिश्रेष्ठ मा शुचो भरतर्षभ ॥

sa eṣa nihataḥ śete brahmadaṇḍena rākṣasaḥ | cārvāko nṛpatiśreṣṭha mā śuco bharatarṣabha

वही राक्षस चार्वाक ब्राह्मणों के ब्रह्मदण्ड से मारा हुआ पड़ा है। हे नृपश्रेष्ठ, हे भरतश्रेष्ठ, शोक मत कीजिए।

श्लोक 12 (12.38.12)

हतास्ते क्षत्रधर्मेण ज्ञातयस्तव पार्थिव । स्वर्गताश्च महात्मानो वीराः क्षत्रियपुङ्गवाः ॥

hatāste kṣatradharmeṇa jñātayastava pārthiva | svargatāśca mahātmāno vīrāḥ kṣatriyapuṅgavāḥ

हे राजन्, आपके बन्धु क्षत्रिय-धर्म के अनुसार मारे गए हैं, और वे महात्मा वीर, क्षत्रियों में श्रेष्ठ, स्वर्ग को गए हैं।

श्लोक 13 (12.38.13)

स त्वमातिष्ठ कार्याणि मा ते भूद्बुद्धिरन्यथा । शत्रूञ्जहि प्रजा रक्ष द्विजांश्च परिपूजय ॥

sa tvamātiṣṭha kāryāṇi mā te bhūdbuddhiranyathā | śatrūñjahi prajā rakṣa dvijāṃśca paripūjaya

इसलिए आप अपने कार्यों में लगिए, आपकी बुद्धि और प्रकार की न हो। शत्रुओं को मारिए, प्रजा की रक्षा कीजिए और ब्राह्मणों का भली-भाँति सम्मान कीजिए।

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