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शान्ति पर्व · अध्याय 39

युधिष्ठिर का राज्याभिषेक

युधिष्ठिर स्वर्ण-आसन पर बैठते हैं और उनके चारों ओर कृष्ण, सात्यकि, भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव, कुन्ती, धृतराष्ट्र, गान्धारी आदि बैठते हैं। पुरोहित धौम्य वेदी और अग्नि तैयार करते हैं, और कृष्ण, धृतराष्ट्र तथा प्रजा पाञ्चजन्य शंख के जल से, नगाड़ों की ध्वनि के बीच, युधिष्ठिर का अभिषेक करते हैं। ब्राह्मण उन्हें आशीर्वाद देते हैं और कहते हैं कि अब सामने आए कार्यों को शीघ्र करें, और राजा मित्रों सहित अपना विशाल राज्य सँभालते हैं।

अध्याय 38अध्याय-सूचीअध्याय 40

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.39.1)

ततः कुन्तीसुतो राजा गतमन्युर्गतज्वरः । काञ्चने प्राड्भुखो हृष्टो न्यषीदत्परमासने ॥

tataḥ kuntīsuto rājā gatamanyurgatajvaraḥ | kāñcane prāḍbhukho hṛṣṭo nyaṣīdatparamāsane

तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर, क्रोध और शोक-ज्वर से मुक्त होकर, प्रसन्न मन से पूर्व की ओर मुख करके एक स्वर्ण-आसन पर बैठे।

श्लोक 2 (12.39.2)

तमेवाभिमुखौ पीठे प्रदीप्ते काञ्चने शुभे । सात्यकिर्वासुदेवश्च निषीदतुररिंदमौ ॥

tamevābhimukhau pīṭhe pradīpte kāñcane śubhe | sātyakirvāsudevaśca niṣīdaturariṃdamau

उनके सामने एक दीप्तिमान्, सुन्दर स्वर्ण-पीठ पर शत्रुओं का दमन करने वाले सात्यकि और वासुदेव बैठे।

श्लोक 3 (12.39.3)

मध्ये कृत्वा तु राजानं भीमसेनार्जुनावुभौ । निषीदतुर्महात्मानौ श्लक्ष्णयोर्मणिपीठयोः ॥

madhye kṛtvā tu rājānaṃ bhīmasenārjunāvubhau | niṣīdaturmahātmānau ślakṣṇayormaṇipīṭhayoḥ

राजा को बीच में करके दोनों महात्मा, भीमसेन और अर्जुन, दो चिकने मणिजटित आसनों पर बैठे।

श्लोक 4 (12.39.4)

दान्ते शय्यासने शुभ्रे जाम्बूनदविभूषिते । पृथाऽपि सहदेवेन सहास्ते नकुलेन च ॥

dānte śayyāsane śubhre jāmbūnadavibhūṣite | pṛthā'pi sahadevena sahāste nakulena ca

जाम्बूनद सोने से सजे, हाथीदाँत के बने श्वेत शय्यासन पर पृथा भी सहदेव और नकुल के साथ बैठीं।

श्लोक 5 (12.39.5)

सुधर्मा विदुरो धौम्यो धृतराष्ट्रश्च कौरवः । निषेदुर्ज्वलनाकारेष्वासनेषु पृथक्पृथक् ॥

sudharmā viduro dhaumyo dhṛtarāṣṭraśca kauravaḥ | niṣedurjvalanākāreṣvāsaneṣu pṛthakpṛthak

सुधर्मा, विदुर, धौम्य और कुरुवंशी धृतराष्ट्र अग्नि के समान जगमगाते अलग-अलग आसनों पर बैठे।

श्लोक 6 (12.39.6)

युयुत्सुः सञ्जयश्चैव गान्धारी च यशस्विनी । धृतराष्ट्रो यतो राजा ततः सर्वे समाविशन् ॥

yuyutsuḥ sañjayaścaiva gāndhārī ca yaśasvinī | dhṛtarāṣṭro yato rājā tataḥ sarve samāviśan

युयुत्सु, सञ्जय और यशस्विनी गान्धारी भी बैठे; जहाँ राजा धृतराष्ट्र थे, वहीं सब लोग उनके आसपास बैठ गए।

श्लोक 7 (12.39.7)

तत्रोपविष्टो धर्मात्मा श्वेताः सुमनसोऽस्पृशत् । स्वस्तिकानक्षतान्भूमिं सुवर्णं रजतं मणीन् ॥

tatropaviṣṭo dharmātmā śvetāḥ sumanaso'spṛśat | svastikānakṣatānbhūmiṃ suvarṇaṃ rajataṃ maṇīn

वहाँ बैठे धर्मात्मा राजा ने श्वेत पुष्पों, स्वस्तिक-चिह्नों, अक्षतों, भूमि, सोने, चाँदी और मणियों का स्पर्श किया।

श्लोक 8 (12.39.8)

ततः प्रकृतयः सर्वाः पुरस्कृत्य पुरोहितम् । ददृशुर्धर्मराजानमादाय बहुमङ्गलम् ॥

tataḥ prakṛtayaḥ sarvāḥ puraskṛtya purohitam | dadṛśurdharmarājānamādāya bahumaṅgalam

तब सब प्रजाजन पुरोहित को आगे करके अनेक मंगल-वस्तुएँ लेकर धर्मराज के सामने आए:

श्लोक 9 (12.39.9)

पृथिवीं च सुवर्णं च रत्नानि विविधानि च । आभिषेचनिकं भाण्डं सर्वसंभारसंभृतम् ॥

pṛthivīṃ ca suvarṇaṃ ca ratnāni vividhāni ca | ābhiṣecanikaṃ bhāṇḍaṃ sarvasaṃbhārasaṃbhṛtam

पृथ्वी, सोना, अनेक प्रकार के रत्न, और सब सामग्री से भरा हुआ अभिषेक का पात्र।

श्लोक 10 (12.39.10)

काञ्चनौदुम्बरास्तत्र राजताः पृथिवीमयाः । पूर्णकुम्भाः सुमनसो लाजा बर्हीषि गोरसाः ॥

kāñcanaudumbarāstatra rājatāḥ pṛthivīmayāḥ | pūrṇakumbhāḥ sumanaso lājā barhīṣi gorasāḥ

वहाँ सोने, ताँबे, चाँदी और मिट्टी के पात्र थे, भरे हुए कलश, फूल, लाजा, कुश और गोरस थे।

श्लोक 11 (12.39.11)

शमीपिप्पलपालाशसमिधो मधुसर्पिषी । स्रुव औदुम्बरः शङ्खस्तथा हेमविभूषितः ॥

śamīpippalapālāśasamidho madhusarpiṣī | sruva audumbaraḥ śaṅkhastathā hemavibhūṣitaḥ

शमी, पीपल और पलाश की समिधाएँ, मधु और घी, उदुम्बर की लकड़ी की स्रुवा, और सोने से मढ़ा हुआ शंख था।

श्लोक 12 (12.39.12)

दाशार्हेणाभ्यनुज्ञातस्तत्र धौम्यः पुरोहितः । प्रागुदक्प्रवणे वेदीं लक्षणेनोपलिख्य च ॥

dāśārheṇābhyanujñātastatra dhaumyaḥ purohitaḥ | prāgudakpravaṇe vedīṃ lakṣaṇenopalikhya ca

दाशार्ह की अनुमति से पुरोहित धौम्य ने उत्तर-पूर्व की ओर ढालू भूमि पर विधि के अनुसार रेखाएँ खींचकर वेदी बनाई।

श्लोक 13 (12.39.13)

व्याघ्रचर्मोत्तरे शुक्ले सर्वतोभद्र आसने । दृढपादप्रतिष्ठाने हुताशनसमत्विषि ॥

vyāghracarmottare śukle sarvatobhadra āsane | dṛḍhapādapratiṣṭhāne hutāśanasamatviṣi

उस पर बाघ की खाल बिछा हुआ, पक्के पायों वाला, अग्नि के समान दीप्त, श्वेत सर्वतोभद्र आसन था।

श्लोक 14 (12.39.14)

उपवेश्य महात्मानं कृष्णां च द्रुपदात्मजाम् । जुहाव पावकं धीमान्विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ॥

upaveśya mahātmānaṃ kṛṣṇāṃ ca drupadātmajām | juhāva pāvakaṃ dhīmānvidhimantrapuraskṛtam

उस महात्मा राजा को द्रुपद की पुत्री कृष्णा के साथ वहाँ बिठाकर बुद्धिमान् पुरोहित ने विधि और मन्त्रों के साथ अग्नि में आहुति दी।

श्लोक 15 (12.39.15)

तत उत्थाय दाशार्हः शङ्खमादाय पूरितम् । अभ्यषिञ्चत्पतिं पृथ्व्याः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । धृतराष्ट्रश्च राजर्षिः सर्वाः प्रकृतयस्तथा ॥

tata utthāya dāśārhaḥ śaṅkhamādāya pūritam | abhyaṣiñcatpatiṃ pṛthvyāḥ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | dhṛtarāṣṭraśca rājarṣiḥ sarvāḥ prakṛtayastathā

तब दाशार्ह ने उठकर भरा हुआ शंख लिया और कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर का पृथ्वीपति के रूप में अभिषेक किया; राजर्षि धृतराष्ट्र और सब प्रजाजनों ने भी किया।

श्लोक 16 (12.39.16)

अनुज्ञातोऽथ कृष्णेन भ्रातृभिः सह पाण्डवः । पाञ्चजन्याभिषिक्तश्च राजाऽमृतमुखोऽभवत् ॥

anujñāto'tha kṛṣṇena bhrātṛbhiḥ saha pāṇḍavaḥ | pāñcajanyābhiṣiktaśca rājā'mṛtamukho'bhavat

कृष्ण की अनुमति पाकर, भाइयों सहित, पाञ्चजन्य के जल से अभिषिक्त होकर पाण्डव राजा अमृत के समान सुन्दर मुख वाले हो गए।

श्लोक 17 (12.39.17)

ततोऽनुवादयामासुः पणवानकदुन्दुभीन् ॥

tato'nuvādayāmāsuḥ paṇavānakadundubhīn

तब उन्होंने पणव, आनक और दुन्दुभि बजवाए।

श्लोक 18 (12.39.18)

धर्मराजोऽपि तत्सर्वं प्रतिजग्राह धर्मतः । पूजयामास तांश्चापि विधिवद्भूरिदक्षिणः ॥

dharmarājo'pi tatsarvaṃ pratijagrāha dharmataḥ | pūjayāmāsa tāṃścāpi vidhivadbhūridakṣiṇaḥ

धर्मराज ने वह सब विधि के अनुसार स्वीकार किया और बड़ी दक्षिणा देकर विधिपूर्वक उनका सत्कार भी किया।

श्लोक 19 (12.39.19)

ततो निष्कसहस्रेण ब्राह्मणान्स्वस्त्यवाचयन् । वेदाध्ययनसंपन्नान्धृतिशीलसमन्वितान् ॥

tato niṣkasahasreṇa brāhmaṇānsvastyavācayan | vedādhyayanasaṃpannāndhṛtiśīlasamanvitān

तब एक हज़ार निष्क देकर उन्होंने वेदाध्ययन से सम्पन्न, धैर्य और शील वाले ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवाया।

श्लोक 20 (12.39.20)

ते प्रीता ब्राह्मणा राजन्स्वस्त्यूचुर्जयमेव च । हंसा इव च नर्दन्तः प्रशशंसुर्युधिष्ठिरम् ॥

te prītā brāhmaṇā rājansvastyūcurjayameva ca | haṃsā iva ca nardantaḥ praśaśaṃsuryudhiṣṭhiram

हे राजन्, प्रसन्न हुए उन ब्राह्मणों ने स्वस्ति और जय बोली, और हंसों की तरह नाद करते हुए युधिष्ठिर की प्रशंसा की।

ब्राह्मणा ऊचुः

श्लोक 21 (12.39.21)

युधिष्ठिर महाबाहो दिष्ट्या जयसि पाण्डव । दिष्ट्या स्वधर्मं प्राप्तोऽसि विक्रमेण महाद्युते ॥

yudhiṣṭhira mahābāho diṣṭyā jayasi pāṇḍava | diṣṭyā svadharmaṃ prāpto'si vikrameṇa mahādyute

"हे महाबाहु युधिष्ठिर, सौभाग्य से आपने विजय पाई है, हे पाण्डव। हे महातेजस्वी, सौभाग्य से आप अपने पराक्रम से अपने धर्म-स्थान को प्राप्त हुए हैं।"

श्लोक 22 (12.39.22)

दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च भीमसेनश्च पाण्डवः । त्वं चापि कुशली राजन्माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥

diṣṭyā gāṇḍīvadhanvā ca bhīmasenaśca pāṇḍavaḥ | tvaṃ cāpi kuśalī rājanmādrīputrau ca pāṇḍavau

"सौभाग्य से गाण्डीवधारी अर्जुन और पाण्डव भीमसेन कुशल हैं, और हे राजन्, आप भी तथा माद्री के दोनों पुत्र पाण्डव भी कुशल हैं।"

श्लोक 23 (12.39.23)

मुक्ता वीरक्षयात्तस्मात्संग्रामाद्विजितद्विषः । क्षिप्रमुत्तरकार्याणि कुरु सर्वाणि भारत ॥

muktā vīrakṣayāttasmātsaṃgrāmādvijitadviṣaḥ | kṣipramuttarakāryāṇi kuru sarvāṇi bhārata

"वीरों के उस विनाश से, उस संग्राम से मुक्त होकर और शत्रुओं को जीतकर, हे भारत, आप आगे के सब कार्य शीघ्र कीजिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 24 (12.39.24)

ततः प्रीत्याऽर्चितः सद्भिर्धर्मराजो युधिष्ठिरः । प्रतिपेदे महद्राज्यं सुहृद्भिः सह भारत ॥

tataḥ prītyā'rcitaḥ sadbhirdharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | pratipede mahadrājyaṃ suhṛdbhiḥ saha bhārata

तब सज्जनों से प्रेमपूर्वक सम्मानित होकर धर्मराज युधिष्ठिर ने, हे भारत, मित्रों सहित अपना विशाल राज्य सँभाला।

अध्याय 38अध्याय-सूचीअध्याय 40