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शान्ति पर्व · अध्याय 345

उपरिचर वसु का आकाश से पतन

युधिष्ठिर पूछते हैं कि भगवान् का भक्त राजा वसु पृथ्वी के विवर में क्यों जा गिरा। भीष्म बताते हैं कि ऋषियों और देवताओं में विवाद हुआ कि यज्ञ "अज" से किया जाए, अर्थात् बकरे से या बीजों से; निर्णायक बनाए गए वसु ने देवताओं का पक्ष लिया और ऋषियों ने उन्हें गिरने का शाप दिया। फिर देवता उन्हें पोषण और मुक्ति का वर देते हैं, और विष्णु की आज्ञा से गरुड़ उन्हें पृथ्वी से उठा लेते हैं, जिससे वे ब्रह्मलोक पहुँचते हैं। अन्त में भीष्म नारद के श्वेतद्वीप जाने की कथा सुनाने का वचन देते हैं।

अध्याय 344अध्याय-सूचीअध्याय 346

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.345.1)

यदा भक्तो भगवति आसीद्राजा महान्वसुः । किमर्थं स परिभ्रष्टो विवेश विवरं भुवः ॥

yadā bhakto bhagavati āsīdrājā mahānvasuḥ | kimarthaṃ sa paribhraṣṭo viveśa vivaraṃ bhuvaḥ

जब महान् राजा वसु भगवान् के भक्त थे, तब वे अपने पद से क्यों गिरे और पृथ्वी के विवर (छिद्र) में क्यों जा समाए?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.345.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ऋषीणां चैव संवादं त्रिदशानां च भारत ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | ṛṣīṇāṃ caiva saṃvādaṃ tridaśānāṃ ca bhārata

इस विषय में ऋषियों और देवताओं के संवाद का एक पुराना इतिहास सुनाया जाता है, हे भारत।

श्लोक 3 (12.345.3)

इयं वै कर्मभूमिः स्यात्स्वर्गो भोगाय कल्पितः । तस्मादिन्द्रो महीं प्राप्य यजमानस्तु दीक्षितः ॥

iyaṃ vai karmabhūmiḥ syātsvargo bhogāya kalpitaḥ | tasmādindro mahīṃ prāpya yajamānastu dīkṣitaḥ

यह भूमि कर्मभूमि है और स्वर्ग भोग के लिए बना है। इसलिए इन्द्र पृथ्वी पर आकर यजमान के रूप में यज्ञ की दीक्षा में बैठे।

श्लोक 4 (12.345.4)

सवनीयपशोः काल आगते तु बृहस्पतिः । पिष्टमानीयतामत्र पश्वर्थमिति भाषत ॥

savanīyapaśoḥ kāla āgate tu bṛhaspatiḥ | piṣṭamānīyatāmatra paśvarthamiti bhāṣata

सवनीय पशु का समय आने पर बृहस्पति ने कहा, "यहाँ पशु के लिए पिसा हुआ अन्न (पिष्ट) लाया जाए।"

श्लोक 5 (12.345.5)

तच्छ्रुत्वा देवताः सर्वा इदमूचुर्द्विजोत्तमम् । बृहस्पतिं मांसगृद्धाः पृथक्पृथगिदं पुनः ॥

tacchrutvā devatāḥ sarvā idamūcurdvijottamam | bṛhaspatiṃ māṃsagṛddhāḥ pṛthakpṛthagidaṃ punaḥ

यह सुनकर मांस के लोभी सब देवता द्विजश्रेष्ठ बृहस्पति से बारी-बारी से फिर यह बोले:

श्लोक 6 (12.345.6)

अजेन यष्टव्यमिति प्राहुर्देवा द्विजोत्तमान् । स च छागोप्यजो ज्ञेयो नान्यः पशुरिति स्थितिः ॥

ajena yaṣṭavyamiti prāhurdevā dvijottamān | sa ca chāgopyajo jñeyo nānyaḥ paśuriti sthitiḥ

देवताओं ने ब्राह्मणों से कहा, "यज्ञ अज से करना चाहिए"; और वह अज बकरा ही समझना चाहिए, कोई दूसरा पशु नहीं: ऐसी व्यवस्था है।

ऋषय ऊचुः

श्लोक 7 (12.345.7)

बीजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति वै वैदिकी श्रुतिः । अजसंज्ञानि बीजानि च्छागं नो हन्तुमर्हथ ॥

bījairyajñeṣu yaṣṭavyamiti vai vaidikī śrutiḥ | ajasaṃjñāni bījāni cchāgaṃ no hantumarhatha

वेद की श्रुति कहती है कि यज्ञों में बीजों से यजन करना चाहिए। "अज" नाम बीजों का है; आपको बकरे को मारना उचित नहीं।

श्लोक 8 (12.345.8)

नैष धर्मः सतां देवा यत्र बध्येत वै पशुः । इदं कृतयुगं श्रेष्ठं कथं वध्येत वै पशुः ॥

naiṣa dharmaḥ satāṃ devā yatra badhyeta vai paśuḥ | idaṃ kṛtayugaṃ śreṣṭhaṃ kathaṃ vadhyeta vai paśuḥ

हे देवताओ! जहाँ पशु का वध किया जाए, वह सज्जनों का धर्म नहीं है। यह श्रेष्ठ कृतयुग है; इसमें पशु का वध कैसे हो सकता है?

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (12.345.9)

तेषां संवदतामेवमृषीणां विबुधैः सह । मार्गागतो नृपश्रेष्ठस्तं देशं प्राप्तवान्वसुः ॥

teṣāṃ saṃvadatāmevamṛṣīṇāṃ vibudhaiḥ saha | mārgāgato nṛpaśreṣṭhastaṃ deśaṃ prāptavānvasuḥ

ऋषि और देवता इस प्रकार विवाद कर ही रहे थे कि मार्ग में चलते हुए नृपश्रेष्ठ वसु उस स्थान पर आ पहुँचे।

श्लोक 10 (12.345.10)

अन्तरिक्षचरः श्रीमान्सहस्रबलवाहनः । तं दृष्ट्वा सहसाऽऽयान्तं वसुं ते त्वन्तरिक्षगम् ॥

antarikṣacaraḥ śrīmānsahasrabalavāhanaḥ | taṃ dṛṣṭvā sahasā''yāntaṃ vasuṃ te tvantarikṣagam

वे आकाश में चलने वाले, श्रीमान्, हज़ारों की सेना और वाहनों से युक्त थे। आकाश में चलते हुए वसु को सहसा आते देखकर वे ब्राह्मण

श्लोक 11 (12.345.11)

ऊचुर्द्विजातयो देवानेष च्छेत्स्यति संशयम् । यज्वा दानपतिः श्रेष्ठः सर्वभूतहितप्रियः । कथंस्विदन्यथा ब्रूयादेष वाक्यं महान्वसुः ॥

ūcurdvijātayo devāneṣa cchetsyati saṃśayam | yajvā dānapatiḥ śreṣṭhaḥ sarvabhūtahitapriyaḥ | kathaṃsvidanyathā brūyādeṣa vākyaṃ mahānvasuḥ

देवताओं से कहा, "ये हमारा संशय मिटा देंगे। ये यज्ञ करने वाले, दानपतियों में श्रेष्ठ और सब प्राणियों के हित में रत हैं; ये महान् वसु भला अन्यथा कैसे बोलेंगे?"

श्लोक 12 (12.345.12)

एवं ते संविदं कृत्वा विबुधा ऋषयस्तथा । अपृच्छन्सहिताऽभ्येत्य वसुं राजानमन्तिकात् ॥

evaṃ te saṃvidaṃ kṛtvā vibudhā ṛṣayastathā | apṛcchansahitā'bhyetya vasuṃ rājānamantikāt

इस प्रकार आपस में निश्चय करके देवता और ऋषि मिलकर राजा वसु के पास गए और उनसे पूछा:

देवा ऋषयश्चोचुः

श्लोक 13 (12.345.13)

भो राजन्केन यष्टव्यमजेनाहोस्विदौषधैः । एतन्नः संशयं छिन्धि प्रमाणं नो भवान्मतः ॥

bho rājankena yaṣṭavyamajenāhosvidauṣadhaiḥ | etannaḥ saṃśayaṃ chindhi pramāṇaṃ no bhavānmataḥ

"हे राजन्! यज्ञ अज से करना चाहिए या औषधियों (अन्न) से? हमारा यह संशय दूर कीजिए; आप हमारे लिए प्रमाण माने गए हैं।"

भीष्म उवाच

श्लोक 14 (12.345.14)

स तान्कृताञ्जलिर्भूत्वा परिपप्रच्छ वै वसुः । कस्य वै को मतः पक्षो ब्रूत सत्यं द्विजोत्तमाः ॥

sa tānkṛtāñjalirbhūtvā paripapraccha vai vasuḥ | kasya vai ko mataḥ pakṣo brūta satyaṃ dvijottamāḥ

हाथ जोड़कर वसु ने उनसे पूछा, "हे द्विजश्रेष्ठो! सत्य बताइए: आप में से किसका कौन-सा पक्ष है?"

ऋषय ऊचुः

श्लोक 15 (12.345.15)

धान्यैर्यष्टव्यमित्येव पक्षोऽस्माकं नराधिप । देवानां तु पशुः पक्षो मतो राजन्वदस्व नः ॥

dhānyairyaṣṭavyamityeva pakṣo'smākaṃ narādhipa | devānāṃ tu paśuḥ pakṣo mato rājanvadasva naḥ

"हे नरेश्वर! हमारा पक्ष यह है कि यज्ञ अन्न से करना चाहिए; और देवताओं का मत है कि पशु से। हे राजन्! अब आप अपना मत हमें बताइए।"

भीष्म उवाच

श्लोक 16 (12.345.16)

देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसंश्रयात् । छागेनाजेन यष्टव्यमेवमुक्तं वचस्तदा ॥

devānāṃ tu mataṃ jñātvā vasunā pakṣasaṃśrayāt | chāgenājena yaṣṭavyamevamuktaṃ vacastadā

तब देवताओं का मत जानकर वसु ने उनके पक्ष का आश्रय लेते हुए कहा कि यज्ञ अज, अर्थात् बकरे से करना चाहिए।

श्लोक 17 (12.345.17)

कुपितास्ते ततः सर्वे मुनयः सूर्यवर्चसः । ऊचुर्वसुं विमानस्थं देवपक्षार्थवादिनम् ॥

kupitāste tataḥ sarve munayaḥ sūryavarcasaḥ | ūcurvasuṃ vimānasthaṃ devapakṣārthavādinam

इस पर सूर्य के समान तेजस्वी वे सब मुनि क्रुद्ध हो गए और विमान में बैठे, देवताओं के पक्ष की बात कहने वाले वसु से बोले:

ऋषय ऊचुः

श्लोक 18 (12.345.18)

सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात्तस्माद्दिवः पत । अद्यप्रभृति ते राजन्नाकाशे विहता गतिः ॥

surapakṣo gṛhītaste yasmāttasmāddivaḥ pata | adyaprabhṛti te rājannākāśe vihatā gatiḥ

"तुमने देवताओं का पक्ष लिया है, इसलिए स्वर्ग से गिर पड़ो। हे राजन्! आज से आकाश में तुम्हारी गति रुक गई।"

श्लोक 19 (12.345.19)

अस्माच्छापाभिघातेन महीं भित्त्वा प्रवेक्ष्यसि । विरुद्धं वेदसूत्राणामुक्तं यदि भवेन्नृप । वयं विरुद्धवचना यदि तत्र पतामहे ॥

asmācchāpābhighātena mahīṃ bhittvā pravekṣyasi | viruddhaṃ vedasūtrāṇāmuktaṃ yadi bhavennṛpa | vayaṃ viruddhavacanā yadi tatra patāmahe

"हमारे इस शाप के आघात से तुम पृथ्वी को फाड़कर उसमें प्रवेश करोगे। हे राजन्! यदि हमारा कहा हुआ वेदसूत्रों के विरुद्ध हो और हमारी बात दोषपूर्ण ठहरे, तो हम भी वहाँ गिर पड़ें।"

भीष्म उवाच

श्लोक 20 (12.345.20)

ततस्तस्मिन्मुहूर्तेऽथ राजोपरिचरस्तदा । अधो वै संबभूवाशु भूमेर्विवरगो नृप ॥

tatastasminmuhūrte'tha rājoparicarastadā | adho vai saṃbabhūvāśu bhūmervivarago nṛpa

उसी क्षण राजा उपरिचर तुरन्त नीचे गिरा और पृथ्वी के विवर में जा पहुँचा।

श्लोक 21 (12.345.21)

स्मृतिस्त्वेवं न विजहौ तदा नारायणाज्ञया ॥

smṛtistvevaṃ na vijahau tadā nārāyaṇājñayā

फिर भी नारायण की आज्ञा से उसकी स्मृति उसे छोड़कर नहीं गई।

श्लोक 22 (12.345.22)

देवास्तु सहिताः सर्वे वसोः शापविमोक्षणम् । चिन्तयामासुरव्यग्राः सुकृतं हि नृपस्य तत् ॥

devāstu sahitāḥ sarve vasoḥ śāpavimokṣaṇam | cintayāmāsuravyagrāḥ sukṛtaṃ hi nṛpasya tat

तब सब देवता मिलकर शान्त मन से वसु को शाप से छुड़ाने का उपाय सोचने लगे; क्योंकि उस राजा का कर्म उत्तम था।

श्लोक 23 (12.345.23)

अनेनास्मत्कृते राज्ञा शापः प्राप्तो महात्मना । अस्य प्रतिप्रियं कार्यं सहितैर्नो दिवौकसः ॥

anenāsmatkṛte rājñā śāpaḥ prāpto mahātmanā | asya pratipriyaṃ kāryaṃ sahitairno divaukasaḥ

"इन महात्मा राजा ने हमारे लिए यह शाप पाया है। हम देवताओं को सब मिलकर इनका प्रत्युपकार करना चाहिए।"

श्लोक 24 (12.345.24)

इति बुद्ध्या व्यवस्याशु गत्वा निश्चयमीश्वराः । ऊचुः संहृष्टमनसो राजोपरिचरं तदा ॥

iti buddhyā vyavasyāśu gatvā niścayamīśvarāḥ | ūcuḥ saṃhṛṣṭamanaso rājoparicaraṃ tadā

मन में यह निश्चय करके, निर्णय पर पहुँचकर वे ईश्वर-स्वरूप देवता प्रसन्न मन से राजा उपरिचर से बोले:

देवा ऊचुः

श्लोक 25 (12.345.25)

ब्रह्मण्य देवभक्तस्त्वं सुरासुरगुरुर्हरिः । कामं स तव तुष्टात्मा कुर्याच्छापविमोक्षणम् ॥

brahmaṇya devabhaktastvaṃ surāsuragururhariḥ | kāmaṃ sa tava tuṣṭātmā kuryācchāpavimokṣaṇam

"आप ब्राह्मणों और देवताओं के भक्त हैं, और हरि देवताओं तथा असुरों के गुरु हैं। वे प्रसन्न होकर अपनी इच्छा से आपको शाप से मुक्त करें।"

श्लोक 26 (12.345.26)

मानना तु द्विजातीनां कर्तव्या वै महात्मनाम् । अवश्यं तपसा तेषां फलितव्यं नृपोत्तम ॥

mānanā tu dvijātīnāṃ kartavyā vai mahātmanām | avaśyaṃ tapasā teṣāṃ phalitavyaṃ nṛpottama

"महात्मा ब्राह्मणों का सम्मान करना चाहिए। हे नृपोत्तम! उनकी तपस्या का फल अवश्य होना ही चाहिए।"

श्लोक 27 (12.345.27)

यतस्त्वं सहसा भ्रष्ट आकाशान्मेदिनीतलम् । विरुद्धं वेदसूत्राणां न वक्तव्यं हितार्थिना ॥

yatastvaṃ sahasā bhraṣṭa ākāśānmedinītalam | viruddhaṃ vedasūtrāṇāṃ na vaktavyaṃ hitārthinā

"आप जो सहसा आकाश से पृथ्वी की सतह पर गिरे हैं (हित चाहने वाले को वेदसूत्रों के विरुद्ध नहीं बोलना चाहिए),"

श्लोक 28 (12.345.28)

अस्मत्पक्षनिमित्तेन व्यसनं प्राप्तमीदृशम् । एकं त्वनुग्रहं तुभ्यं दद्मो वै नृपसत्तम । यावत्त्वं शापदोषेण कालमासिष्यसेऽनघ ॥

asmatpakṣanimittena vyasanaṃ prāptamīdṛśam | ekaṃ tvanugrahaṃ tubhyaṃ dadmo vai nṛpasattama | yāvattvaṃ śāpadoṣeṇa kālamāsiṣyase'nagha

"हमारे पक्ष के कारण आप पर ऐसी विपत्ति आई है। हे नृपश्रेष्ठ! हम आपको एक अनुग्रह देते हैं। हे निष्पाप! शाप के दोष से जितने समय तक आपको रहना है,"

श्लोक 29 (12.345.29)

भूमेर्विवरगो भूत्वा तावत्त्वं कालमाप्स्यसि । यज्ञेषु सुहुतां विप्रैर्वसोर्धारां समाहितैः ॥

bhūmervivarago bhūtvā tāvattvaṃ kālamāpsyasi | yajñeṣu suhutāṃ viprairvasordhārāṃ samāhitaiḥ

"उतने समय तक आप पृथ्वी के विवर में रहकर समय बिताएँगे, और यज्ञों में सावधान ब्राह्मणों द्वारा भली-भाँति आहुत की गई वसोर्धारा (घी की धारा) को पाते रहेंगे।"

श्लोक 30 (12.345.30)

प्राप्स्यसेऽस्मदनुध्यानान्मा च त्वां ग्लानिराविशेत् । न क्षुत्पिपासे राजेन्द्र भूमेश्छिद्रे भविष्यतः ॥

prāpsyase'smadanudhyānānmā ca tvāṃ glānirāviśet | na kṣutpipāse rājendra bhūmeśchidre bhaviṣyataḥ

"हमारे चिन्तन से आप उसे पाएँगे और थकावट आपको नहीं घेरेगी। हे राजेन्द्र! पृथ्वी के उस छिद्र में आपको न भूख सताएगी, न प्यास।"

श्लोक 31 (12.345.31)

वसोर्धारानुपीतत्वात्तेजसाऽऽप्यायितेन च । स देवोऽस्मद्वरात्प्रीतो ब्रह्मलोकं हि नेष्यति ॥

vasordhārānupītatvāttejasā''pyāyitena ca | sa devo'smadvarātprīto brahmalokaṃ hi neṣyati

"वसोर्धारा का पान करने और उसके तेज से पुष्ट होने पर, हमारे वरदान से प्रसन्न होकर वे देव आपको ब्रह्मलोक पहुँचा देंगे।"

भीष्म उवाच

श्लोक 32 (12.345.32)

एवं दत्त्वा वरं राज्ञे सर्वे ते च दिवौकसः । क्रतुं समाप्य पिष्टेन मुनीनां वचनात्तदा ॥

evaṃ dattvā varaṃ rājñe sarve te ca divaukasaḥ | kratuṃ samāpya piṣṭena munīnāṃ vacanāttadā

राजा को इस प्रकार वर देकर वे सब स्वर्गवासी देवता मुनियों के कहने पर पिष्ट से यज्ञ पूरा करके

श्लोक 33 (12.345.33)

गताः स्वभवनं देवा ऋषयश्च तपोधनाः । गृहीत्वा दक्षिणां सर्वे गताः स्वानाश्रमान्पुनः ॥

gatāḥ svabhavanaṃ devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ | gṛhītvā dakṣiṇāṃ sarve gatāḥ svānāśramānpunaḥ

अपने-अपने धाम को चले गए; और तपस्वी ऋषि दक्षिणा लेकर सब अपने आश्रमों को लौट गए।

श्लोक 34 (12.345.34)

वसुं विचिन्त्य शक्रश्च प्रविवेशामरावतीम् । वसुर्विवरगस्तत्र व्यलीकस्य फलं गुरोः ॥

vasuṃ vicintya śakraśca praviveśāmarāvatīm | vasurvivaragastatra vyalīkasya phalaṃ guroḥ

इन्द्र वसु का स्मरण करते हुए अमरावती में प्रविष्ट हुए; और वसु वहीं पृथ्वी के विवर में रहे, अपने पूज्यजनों के प्रति किए अपराध का फल भोगते हुए।

श्लोक 35 (12.345.35)

चक्रे वसुस्ततः पूजां विष्वक्सेनाय भारत । जप्यं जगौ च सततं नारायणमुखोद्गवम् ॥

cakre vasustataḥ pūjāṃ viṣvaksenāya bhārata | japyaṃ jagau ca satataṃ nārāyaṇamukhodgavam

हे भारत! तब वसु निरन्तर विष्वक्सेन की पूजा करते और नारायण के मुख से निकले जप का सदा पाठ करते रहे।

श्लोक 36 (12.345.36)

तत्रापि पञ्चभिर्यज्ञैः पञ्चकालानरिंदम । अयजद्धरिं सुरपतिं भूमेर्विवरगोऽपि सन् ॥

tatrāpi pañcabhiryajñaiḥ pañcakālānariṃdama | ayajaddhariṃ surapatiṃ bhūmervivarago'pi san

हे शत्रुदमन! वहाँ पृथ्वी के विवर में रहते हुए भी वे दिन के पाँच कालों में पाँच यज्ञों से देवताओं के स्वामी हरि का यजन करते रहे।

श्लोक 37 (12.345.37)

ततोऽस्य तुष्टो भगवान्भक्त्या नारायणो हरिः । अनन्यभक्तस्य सतस्तत्परस्य जितात्मनः ॥

tato'sya tuṣṭo bhagavānbhaktyā nārāyaṇo hariḥ | ananyabhaktasya satastatparasya jitātmanaḥ

तब उनकी भक्ति से भगवान् नारायण हरि प्रसन्न हुए; क्योंकि वे अनन्य भक्त, उन्हीं में तत्पर और जितेन्द्रिय थे;

श्लोक 38 (12.345.38)

वरदो भगवान्विष्णुः समीपस्थं द्विजोत्तमम् । गरुत्मन्तं महावेगमावभाषेऽप्सितं तदा ॥

varado bhagavānviṣṇuḥ samīpasthaṃ dvijottamam | garutmantaṃ mahāvegamāvabhāṣe'psitaṃ tadā

और वर देने वाले भगवान् विष्णु ने पास खड़े पक्षिश्रेष्ठ, महान् वेग वाले गरुड़ से तब अपना अभीष्ट वचन कहा:

विष्णुरुवाच

श्लोक 39 (12.345.39)

द्विजोत्तम महाभाग पश्यतां वचनान्मम । सम्राड्राजा वसुर्नाम धर्मात्मा संशितव्रतः ॥

dvijottama mahābhāga paśyatāṃ vacanānmama | samrāḍrājā vasurnāma dharmātmā saṃśitavrataḥ

"हे पक्षिश्रेष्ठ! हे महाभाग! मेरे वचन से देखो: वसु नाम के एक सम्राट् राजा हैं, धर्मात्मा और दृढ़ व्रत वाले।"

श्लोक 40 (12.345.40)

ब्राह्मणानां प्रकोपेन प्रविष्टो वसुधातलम् । मानितास्ते तु विप्रेन्द्रास्त्वं तु गच्छ द्विजोत्तम ॥

brāhmaṇānāṃ prakopena praviṣṭo vasudhātalam | mānitāste tu viprendrāstvaṃ tu gaccha dvijottama

"ब्राह्मणों के कोप से वे पृथ्वी के तल में चले गए हैं। उन विप्रश्रेष्ठों का मान रख लिया गया; अब हे पक्षिश्रेष्ठ, तुम जाओ।"

श्लोक 41 (12.345.41)

भूमेर्विवरसंगुप्तं गरुडेह ममाज्ञया । अधश्चरं नृपश्रेष्ठं खेचरं कुरु माचिरम् ॥

bhūmervivarasaṃguptaṃ garuḍeha mamājñayā | adhaścaraṃ nṛpaśreṣṭhaṃ khecaraṃ kuru māciram

"हे गरुड़! मेरी आज्ञा से पृथ्वी के विवर में छिपे हुए, नीचे चलने वाले उस नृपश्रेष्ठ को शीघ्र ही फिर आकाशचारी बना दो।"

भीष्म उवाच

श्लोक 42 (12.345.42)

गरुत्मानथ विक्षिप्य पक्षौ मारुतवेगवान् । विवेश विवरं भूमेर्यत्रास्ते वाग्यतो वसुः ॥

garutmānatha vikṣipya pakṣau mārutavegavān | viveśa vivaraṃ bhūmeryatrāste vāgyato vasuḥ

तब वायु के समान वेग वाले गरुड़ ने पंख फैलाकर पृथ्वी के उस विवर में प्रवेश किया जहाँ वसु मौन होकर बैठे थे।

श्लोक 43 (12.345.43)

तत एनं समुत्क्षिप्य सहसा विनतासुतः । उत्पपात नभस्तूर्णं तत्र चैनममुञ्चत ॥

tata enaṃ samutkṣipya sahasā vinatāsutaḥ | utpapāta nabhastūrṇaṃ tatra cainamamuñcata

फिर विनता के पुत्र ने सहसा उन्हें उठा लिया और तुरन्त आकाश में उड़ गया, और वहाँ उन्हें छोड़ दिया।

श्लोक 44 (12.345.44)

अस्मिन्मुहूर्ते संजज्ञे राजोपरिचरः पुनः । सशरीरो गतश्चैव ब्रह्मलोकं नृपोत्तमः ॥

asminmuhūrte saṃjajñe rājoparicaraḥ punaḥ | saśarīro gataścaiva brahmalokaṃ nṛpottamaḥ

उसी क्षण राजा उपरिचर फिर पहले जैसा हो गया, और वह नृपश्रेष्ठ शरीर सहित ब्रह्मलोक चला गया।

श्लोक 45 (12.345.45)

एवं तेनापि कौन्तेय वाग्दोषाद्देवताज्ञया । प्राप्ता गतिरधस्तात्तु द्विजशापान्महात्मना ॥

evaṃ tenāpi kaunteya vāgdoṣāddevatājñayā | prāptā gatiradhastāttu dvijaśāpānmahātmanā

हे कुन्तीपुत्र! इस प्रकार उन महात्मा को भी वाणी के दोष से, देवताओं की आज्ञा और ब्राह्मणों के शाप के कारण नीचे की गति मिली।

श्लोक 46 (12.345.46)

केवलं पुरुषस्तेन सेवितो हरिरीश्वरः । ततः शीघ्रं जहौ शापं ब्रह्मलोकमवाप च ॥

kevalaṃ puruṣastena sevito harirīśvaraḥ | tataḥ śīghraṃ jahau śāpaṃ brahmalokamavāpa ca

परन्तु केवल पुरुष ईश्वर हरि की सेवा करने के कारण उन्होंने शीघ्र ही शाप को त्याग दिया और ब्रह्मलोक पा लिया।

श्लोक 47 (12.345.47)

एतत्ते सर्वमाख्यातं संभूता मानवा यथा । नारदोऽपि यथा श्वेतं द्वीपं स गतवानृषिः । तत्ते सर्वं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ॥

etatte sarvamākhyātaṃ saṃbhūtā mānavā yathā | nārado'pi yathā śvetaṃ dvīpaṃ sa gatavānṛṣiḥ | tatte sarvaṃ pravakṣyāmi śṛṇuṣvaikamanā nṛpa

मैंने तुम्हें यह सब कह दिया: वे मनुष्य कैसे उत्पन्न हुए और ऋषि नारद श्वेतद्वीप कैसे गए। हे राजन्! वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा; एकाग्र मन से सुनो।

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