शान्ति पर्व · अध्याय 344
वसु के यज्ञ में बृहस्पति का क्रोध; ऋषियों का नारायण-दर्शन का वृत्तान्त
भीष्म आगे कहते हैं: बृहस्पति के शिष्य राजा उपरिचर वसु सोलह ऋषियों के साथ अश्वमेध यज्ञ करते हैं, जिसमें पशु-हिंसा नहीं होती। अदृश्य भगवान् स्वयं अपना भाग ग्रहण करते हैं, और उन्हें न देख पाने वाले बृहस्पति क्रोध में यज्ञ छोड़ने की धमकी देते हैं। एकत, द्वित और त्रित नामक ऋषि उन्हें शान्त करते हैं और बताते हैं कि उन्होंने उत्तर में तप किया, आकाशवाणी से श्वेतद्वीप भेजे गए, और वहाँ की ज्योति से मोहित होकर भगवान् को न देख सके, केवल उनके भक्तों को देखा। बृहस्पति मान जाते हैं और यज्ञ पूरा करते हैं; वसु बाद में ब्राह्मण के शाप से स्वर्ग से गिरते हैं, पर नारायण की भक्ति से फिर उठकर ब्रह्मलोक को जाते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.344.1)
ततोऽतीते महाकल्पे उत्पन्नेऽङ्गिरसः सुते । बभूवुर्निर्वृता देवा जाते देवपुरोहिते ॥
tato'tīte mahākalpe utpanne'ṅgirasaḥ sute | babhūvurnirvṛtā devā jāte devapurohite
तदनन्तर महाकल्प बीत जाने पर जब अङ्गिरा के पुत्र का जन्म हुआ, तो देवताओं के पुरोहित के उत्पन्न होने से देवता सन्तुष्ट हो गए।
श्लोक 2 (12.344.2)
बृहद्ब्रह्म महच्चेति शब्दाः पर्यायवाचकाः । एभिः समन्वितो राजन्गुणैर्विद्वान्बृहस्पतिः ॥
bṛhadbrahma mahacceti śabdāḥ paryāyavācakāḥ | ebhiḥ samanvito rājanguṇairvidvānbṛhaspatiḥ
बृहत्, ब्रह्म और महत् ये शब्द पर्यायवाची हैं। हे राजन्, विद्वान् बृहस्पति इन गुणों से युक्त थे।
श्लोक 3 (12.344.3)
तस्य शिष्यो बभूवाग्र्यो राजोपरिचरो वसुः । अधीतवांस्तदा शास्त्रं सम्यक्चित्रशिखण्डिजं ॥
tasya śiṣyo babhūvāgryo rājoparicaro vasuḥ | adhītavāṃstadā śāstraṃ samyakcitraśikhaṇḍijaṃ
उनका प्रमुख शिष्य राजा उपरिचर वसु था, जिसने तब चित्रशिखण्डियों से उत्पन्न उस शास्त्र का भली-भाँति अध्ययन किया।
श्लोक 4 (12.344.4)
स राजा भावितः पूर्वं दैवेन विधिना वसुः । पालयामास पृथिवीं दिवमाखण्डलो यथा ॥
sa rājā bhāvitaḥ pūrvaṃ daivena vidhinā vasuḥ | pālayāmāsa pṛthivīṃ divamākhaṇḍalo yathā
दैवी विधान से पहले ही संस्कारित वह राजा वसु पृथ्वी का पालन उसी प्रकार करता था जैसे इन्द्र स्वर्ग का।
श्लोक 5 (12.344.5)
तस्य यज्ञो महानासीदश्वमेधो महात्मनः । बृहस्पतिरुपाध्यायस्तत्र होता बभूव ह ॥
tasya yajño mahānāsīdaśvamedho mahātmanaḥ | bṛhaspatirupādhyāyastatra hotā babhūva ha
उस महात्मा राजा ने एक बड़ा यज्ञ, अश्वमेध, किया, और उसके उपाध्याय बृहस्पति उसमें होता बने।
श्लोक 6 (12.344.6)
प्रजापतिसुताश्चात्र सदस्याश्चाभवंस्त्रयः । एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षयः ॥
prajāpatisutāścātra sadasyāścābhavaṃstrayaḥ | ekataśca dvitaścaiva tritaścaiva maharṣayaḥ
वहाँ प्रजापति के तीन पुत्र भी सदस्य थे: एकत, द्वित और त्रित, ये महर्षि।
श्लोक 7 (12.344.7)
धनुषाख्योऽथ रैभ्यश्च अर्वावसुपरावसू । ऋषिर्मेधातिथिश्चैव ताण्ड्यश्चैव महानृषिः ॥
dhanuṣākhyo'tha raibhyaśca arvāvasuparāvasū | ṛṣirmedhātithiścaiva tāṇḍyaścaiva mahānṛṣiḥ
धनुष, रैभ्य, अर्वावसु और परावसु, ऋषि मेधातिथि और महर्षि ताण्ड्य,
श्लोक 8 (12.344.8)
ऋषिः शान्तिर्महाभागस्तथा वेदशिराश्च यः । ऋषिश्रेष्ठश्च कपिलः शालिहोत्रपिता स्मृतः ॥
ṛṣiḥ śāntirmahābhāgastathā vedaśirāśca yaḥ | ṛṣiśreṣṭhaśca kapilaḥ śālihotrapitā smṛtaḥ
महाभाग ऋषि शान्ति और वेदशिरा, तथा ऋषियों में श्रेष्ठ कपिल, जो शालिहोत्र के पिता कहे गए हैं,
श्लोक 9 (12.344.9)
आद्यः कठस्तैत्तिरिश्च वैशंपायनपूर्वजः । कण्वोऽथ देवहोत्रश्च एते षोडश कीर्तिताः ॥
ādyaḥ kaṭhastaittiriśca vaiśaṃpāyanapūrvajaḥ | kaṇvo'tha devahotraśca ete ṣoḍaśa kīrtitāḥ
आद्य कठ, वैशम्पायन के पूर्वज तैत्तिरि, कण्व और देवहोत्र, ये सोलह नाम गिनाए गए हैं।
श्लोक 10 (12.344.10)
संभूताः सर्वसंभारास्तस्मिन्राजन्महाक्रतौ । न तत्र पशुघातोऽभूत्स राजैवं स्थितोऽभवत् ॥
saṃbhūtāḥ sarvasaṃbhārāstasminrājanmahākratau | na tatra paśughāto'bhūtsa rājaivaṃ sthito'bhavat
हे राजन्, उस महायज्ञ में सब सामग्री एकत्र हुई। वहाँ किसी पशु का वध नहीं हुआ, और राजा इसी निश्चय पर स्थिर रहा।
श्लोक 11 (12.344.11)
अहिंस्रः शुचिरक्षुद्रो निराशीः कर्मसंस्तुतः । आरण्यकपदोद्भूता भागास्तत्रोपकल्पिताः ॥
ahiṃsraḥ śucirakṣudro nirāśīḥ karmasaṃstutaḥ | āraṇyakapadodbhūtā bhāgāstatropakalpitāḥ
वह अहिंसक, पवित्र, उदार और निष्काम था तथा अपने कर्मों के कारण प्रशंसित था। वहाँ यज्ञ-भाग आरण्यक (वन में उत्पन्न) पदार्थों से तैयार किए गए।
श्लोक 12 (12.344.12)
प्रीतस्ततोऽस्य भगवान्देवदेवः पुरातनः । साक्षात्तं दर्शयामास सोऽदृश्योऽन्येन केनचित् ॥
prītastato'sya bhagavāndevadevaḥ purātanaḥ | sākṣāttaṃ darśayāmāsa so'dṛśyo'nyena kenacit
तब प्राचीन देवाधिदेव भगवान् उस पर प्रसन्न हुए और उसे साक्षात् दर्शन दिए, यद्यपि वे किसी और को दिखाई नहीं देते थे।
श्लोक 13 (12.344.13)
स्वयं भागमुपाघ्राय पुरोडाशं गृहीतवान् । अदृश्येन हृतो भागो देवेन हरिमेधसा ॥
svayaṃ bhāgamupāghrāya puroḍāśaṃ gṛhītavān | adṛśyena hṛto bhāgo devena harimedhasā
उन्होंने स्वयं अपने भाग को सूँघा और पुरोडाश ग्रहण किया। प्रखर बुद्धि वाले अदृश्य देव द्वारा वह भाग हर लिया गया।
श्लोक 14 (12.344.14)
बृहस्पतिस्ततः क्रुद्धः स्रुचमुद्यम्य वेगितः । आकाशं घ्नन्स्रुचः पातै रोषादश्रूण्यवर्तयत् ॥
bṛhaspatistataḥ kruddhaḥ srucamudyamya vegitaḥ | ākāśaṃ ghnansrucaḥ pātai roṣādaśrūṇyavartayat
तब बृहस्पति क्रुद्ध होकर वेग से स्रुवा उठाकर आकाश पर स्रुवा के प्रहार करते हुए क्रोध से आँसू बहाने लगे।
श्लोक 15 (12.344.15)
उवाच चोपरिचरं मया भागोऽयमुद्यतः । ग्राह्यः स्वयं हि देवेन मत्प्रत्यक्षं न संशयः ॥
uvāca coparicaraṃ mayā bhāgo'yamudyataḥ | grāhyaḥ svayaṃ hi devena matpratyakṣaṃ na saṃśayaḥ
और उसने उपरिचर से कहा: ‘यह भाग मैंने अर्पित किया था; इसे देवता को मेरे सामने स्वयं ग्रहण करना चाहिए था, इसमें कोई संशय नहीं।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 16 (12.344.16)
उद्यता यज्ञभागा हि साक्षात्प्राप्ताः सुरैरिह । किमर्थमिह न प्राप्तो दर्शनं मे हरिर्नृप ॥
udyatā yajñabhāgā hi sākṣātprāptāḥ surairiha | kimarthamiha na prāpto darśanaṃ me harirnṛpa
यहाँ मेरे अर्पित यज्ञ-भाग देवताओं ने साक्षात् ग्रहण कर लिए हैं। हे राजन्, फिर हरि मुझे दर्शन देने क्यों नहीं आए?’
भीष्म उवाच
श्लोक 17 (12.344.17)
ततः स तं समुद्भूतं भूमिपालो महान्वसुः । प्रसादयामास मुनिं सदस्यास्ते च सर्वशः ॥
tataḥ sa taṃ samudbhūtaṃ bhūmipālo mahānvasuḥ | prasādayāmāsa muniṃ sadasyāste ca sarvaśaḥ
तब महान् राजा वसु ने और सभी सदस्यों ने भी उस क्रुद्ध मुनि को शान्त करने का प्रयत्न किया।
वसुरुवाच
श्लोक 18 (12.344.18)
हुतं त्वयावदानीह पुरोडाशस्य यावती । गृहीता देवदेवेन मत्प्रत्यक्षं न संशयः ॥
hutaṃ tvayāvadānīha puroḍāśasya yāvatī | gṛhītā devadevena matpratyakṣaṃ na saṃśayaḥ
‘आपके द्वारा हवन किए गए पुरोडाश का जितना अवदान (काटा हुआ भाग) था, वह देवों के देव ने मेरे सामने ही ग्रहण कर लिया; इसमें कोई संशय नहीं।’
भीष्म उवाच
श्लोक 19 (12.344.19)
इत्येवमुक्ते वसुना सरोषश्चाब्रवीद्गुरुः । न यजेयमहं चात्र परिभूतस्त्वया नृप ॥
ityevamukte vasunā saroṣaścābravīdguruḥ | na yajeyamahaṃ cātra paribhūtastvayā nṛpa
वसु के ऐसा कहने पर क्रोधित गुरु ने उत्तर दिया: ‘हे राजन्, तुमने मेरा अपमान किया है, इसलिए मैं अब इस यज्ञ में यजन नहीं करूँगा।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 20 (12.344.20)
त्वया पशुर्वारितश्च कृतः पिष्टमयः पशुः । त्वं देवं पश्यसे नित्यं न पश्येयमहं कथम् ॥
tvayā paśurvāritaśca kṛtaḥ piṣṭamayaḥ paśuḥ | tvaṃ devaṃ paśyase nityaṃ na paśyeyamahaṃ katham
तुमने पशु का निषेध किया और आटे का पशु बनवाया। तुम तो देवता को सदा देखते हो; फिर मैं उन्हें क्यों न देख सकूँ?’
वसुरुवाच
श्लोक 21 (12.344.21)
पशुहिंसा वारिता च यजुर्वेदादिमन्त्रतः । अहं न वारये हिंसां द्रक्ष्याम्येकान्तिको हरिम् । तस्मात्कोपो न कर्तव्यो भवता गुरुणा मयि ॥
paśuhiṃsā vāritā ca yajurvedādimantrataḥ | ahaṃ na vāraye hiṃsāṃ drakṣyāmyekāntiko harim | tasmātkopo na kartavyo bhavatā guruṇā mayi
पशुहिंसा का निषेध यजुर्वेद आदि के मन्त्रों से हुआ है; मैं स्वयं हिंसा का निषेध नहीं करता। एकनिष्ठ भक्त होने के नाते मैं हरि के दर्शन करूँगा। इसलिए आप जैसे गुरु को मुझ पर क्रोध नहीं करना चाहिए।
भीष्म उवाच
श्लोक 22 (12.344.22)
वसुमेवं ब्रुवाणं तु क्रुद्ध एव बृहस्पतिः । उवाच ऋत्विजश्चैव किं नः कर्मेति वारयन् ॥
vasumevaṃ bruvāṇaṃ tu kruddha eva bṛhaspatiḥ | uvāca ṛtvijaścaiva kiṃ naḥ karmeti vārayan
वसु के ऐसा कहने पर भी क्रुद्ध बृहस्पति ने ऋत्विजों को रोकते हुए कहा: ‘हमें इस कर्म से क्या प्रयोजन?’
श्लोक 23 (12.344.23)
अथैकतो द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षयः । ऊचुश्चैनमसंभ्रान्ता न रोषं कर्तुमर्हसि ॥
athaikato dvitaścaiva tritaścaiva maharṣayaḥ | ūcuścainamasaṃbhrāntā na roṣaṃ kartumarhasi
तब एकत, द्वित और त्रित, इन महर्षियों ने शान्त भाव से उनसे कहा: ‘आपको क्रोध नहीं करना चाहिए।
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
श्लोक 24 (12.344.24)
शृणु त्वं वचनं पुत्र अस्माभिः समुदाहृतम् । नैष धर्मः कृतयुगे यत्त्वं रोषमिहाहिथाः ॥
śṛṇu tvaṃ vacanaṃ putra asmābhiḥ samudāhṛtam | naiṣa dharmaḥ kṛtayuge yattvaṃ roṣamihāhithāḥ
पुत्र, हमारी कही हुई बात सुनो। कृतयुग का यह धर्म नहीं है कि तुम यहाँ क्रोध को आश्रय दो।
श्लोक 25 (12.344.25)
अरोषणो ह्यसौ देवो यस्य भागोऽयमुद्यतः । न शक्यः स त्वया द्रष्टुमस्माभिर्वा बृहस्पते । यस्य प्रसादं कुरुते स वै तं द्रष्टुमर्हति ॥
aroṣaṇo hyasau devo yasya bhāgo'yamudyataḥ | na śakyaḥ sa tvayā draṣṭumasmābhirvā bṛhaspate | yasya prasādaṃ kurute sa vai taṃ draṣṭumarhati
जिनके लिए यह भाग अर्पित हुआ है, वे देव क्रोधरहित हैं। हे बृहस्पति, न आप उन्हें देख सकते हैं, न हम; जिस पर वे कृपा करते हैं, वही उन्हें देखने योग्य होता है।
श्लोक 26 (12.344.26)
वयं हि ब्रह्मणः पुत्रा मानसाः परिकीर्तिताः । गता निःश्रेयसार्थं हि कदाचिद्दिशमुत्तराम् ॥
vayaṃ hi brahmaṇaḥ putrā mānasāḥ parikīrtitāḥ | gatā niḥśreyasārthaṃ hi kadāciddiśamuttarām
हम ब्रह्मा के मानस पुत्र कहे जाते हैं। एक बार परम कल्याण की खोज में हम उत्तर दिशा को गए।
श्लोक 27 (12.344.27)
तप्त्वा वर्षसहस्राणि चत्वारि तप उत्तमम् । एकपादा स्थिताः सम्यक्काष्ठभूताः समाहिताः ॥
taptvā varṣasahasrāṇi catvāri tapa uttamam | ekapādā sthitāḥ samyakkāṣṭhabhūtāḥ samāhitāḥ
वहाँ हमने चार हज़ार वर्ष तक उत्तम तप किया, एक पैर पर खड़े रहकर, काष्ठ के समान अचल और एकाग्र चित्त होकर।
श्लोक 28 (12.344.28)
मेरोरुत्तरभागे तु क्षीरोदस्यानुकूलतः । स देशो यत्र नस्तप्तं तपः परमदारुणम् ॥
meroruttarabhāge tu kṣīrodasyānukūlataḥ | sa deśo yatra nastaptaṃ tapaḥ paramadāruṇam
मेरु के उत्तर में, क्षीरसागर के समीप, वह स्थान है जहाँ हमने वह अत्यन्त कठोर तप किया।
श्लोक 29 (12.344.29)
वरेण्यं वरदं तं वै देवदेवं सनातनम् । कथं पश्येमहि वयं देवं नारायणं त्विति ॥
vareṇyaṃ varadaṃ taṃ vai devadevaṃ sanātanam | kathaṃ paśyemahi vayaṃ devaṃ nārāyaṇaṃ tviti
हमने सोचा: ‘उन वरेण्य, वरदाता, सनातन देवाधिदेव नारायण को हम कैसे देख सकें?’
श्लोक 30 (12.344.30)
अथ व्रतस्यावभृथे वागुवाचाशरीरिणी । स्निग्धगम्भीरया वाचा प्रहर्षणकरी विभो ॥
atha vratasyāvabhṛthe vāguvācāśarīriṇī | snigdhagambhīrayā vācā praharṣaṇakarī vibho
तब व्रत की समाप्ति पर एक अशरीरी वाणी बोली, कोमल और गम्भीर स्वर में, जो बड़ा हर्ष देने वाली थी, हे विभो।
अशरीरिणी वागुवाच
श्लोक 31 (12.344.31)
सुतप्तं वस्तपो विप्राः प्रसन्नेनान्तरात्मना । यूयं जिज्ञासवो भक्ताः कथं द्रक्ष्यथ तं विभुम् ॥
sutaptaṃ vastapo viprāḥ prasannenāntarātmanā | yūyaṃ jijñāsavo bhaktāḥ kathaṃ drakṣyatha taṃ vibhum
‘हे ब्राह्मणो, आपने प्रसन्न अन्तःकरण से भलीभाँति तप किया है। आप जिज्ञासु और भक्त हैं; उन सर्वव्यापी को आप कैसे देख पाएँगे?
श्लोक 32 (12.344.32)
क्षीरोदधेरुत्तरतः श्वेतद्वीपो महाप्रभः । तत्र नारायणपरा मानवाश्चन्द्रवर्चसः ॥
kṣīrodadheruttarataḥ śvetadvīpo mahāprabhaḥ | tatra nārāyaṇaparā mānavāścandravarcasaḥ
क्षीरसागर के उत्तर में महान् प्रभा वाला श्वेतद्वीप है। वहाँ चन्द्रमा के समान कान्ति वाले, नारायण-परायण मनुष्य रहते हैं।
श्लोक 33 (12.344.33)
एकान्तभावोपगतास्ते भक्ताः पुरुषोत्तमम् । ते सहस्रार्चिषं देवं प्रविशन्ति सनातनम् ॥
ekāntabhāvopagatāste bhaktāḥ puruṣottamam | te sahasrārciṣaṃ devaṃ praviśanti sanātanam
एकनिष्ठ भाव को प्राप्त हुए वे भक्त पुरुषोत्तम को पाते हैं; वे सहस्र किरणों वाले सनातन देव में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 34 (12.344.34)
अनिन्द्रिया निराहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः । एकान्तिनस्ते पुरुषाः श्वेतद्वीपनिवासिनः । गच्छध्वं तत्र मुनयस्तत्रात्मा मे प्रकाशितः ॥
anindriyā nirāhārā aniṣpandāḥ sugandhinaḥ | ekāntinaste puruṣāḥ śvetadvīpanivāsinaḥ | gacchadhvaṃ tatra munayastatrātmā me prakāśitaḥ
इन्द्रियरहित, निराहार, निश्चल और सुगन्धित, ऐसे वे एकनिष्ठ पुरुष श्वेतद्वीप के निवासी हैं। हे मुनियो, वहाँ जाओ; वहीं मेरा आत्मस्वरूप प्रकट हुआ है।’
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
श्लोक 35 (12.344.35)
अथ श्रुत्वा वयं सर्वे वाचं तामशरीरिणीम् । यथाख्यातेन मार्गेण तं देशं प्रविशेमहि ॥
atha śrutvā vayaṃ sarve vācaṃ tāmaśarīriṇīm | yathākhyātena mārgeṇa taṃ deśaṃ praviśemahi
उस अशरीरी वाणी को सुनकर हम सब बताए हुए मार्ग से उस देश में पहुँचे।
श्लोक 36 (12.344.36)
प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं तच्चित्तास्तद्दिदृक्षवः । सहसा हि गताः सर्वे तेजसा तस्य मोहिताः ॥
prāpya śvetaṃ mahādvīpaṃ taccittāstaddidṛkṣavaḥ | sahasā hi gatāḥ sarve tejasā tasya mohitāḥ
महान् श्वेतद्वीप में पहुँचकर, उन्हीं में चित्त लगाए और उनके दर्शन की इच्छा से हम सब सहसा आगे बढ़े, पर उनके तेज से मोहित हो गए।
श्लोक 37 (12.344.37)
ततोऽस्मद्दृष्टिविषयस्तदा प्रतिहतोऽभवत् । न च पश्याम पुरुषं तत्तेजोहतदर्शनाः ॥
tato'smaddṛṣṭiviṣayastadā pratihato'bhavat | na ca paśyāma puruṣaṃ tattejohatadarśanāḥ
तब हमारी दृष्टि की सीमा अवरुद्ध हो गई, और उनके तेज से दर्शन-शक्ति छिन जाने के कारण हम उस पुरुष को नहीं देख सके।
श्लोक 38 (12.344.38)
ततो नः प्रादुरभवद्विज्ञानं देवयोगजम् । न किलातप्ततपसा शक्यते द्रष्टुमञ्जसा ॥
tato naḥ prādurabhavadvijñānaṃ devayogajam | na kilātaptatapasā śakyate draṣṭumañjasā
तब हममें देवयोग से उत्पन्न ज्ञान प्रकट हुआ: ‘जिसने कठोर तप नहीं किया, वह उन्हें सहज ही नहीं देख सकता।’
श्लोक 39 (12.344.39)
ततः पुनर्वर्षशतं तप्त्वा तात्कालिकं महत् । व्रतावसाने च शुभान्नरान्ददृशिमो वयम् ॥
tataḥ punarvarṣaśataṃ taptvā tātkālikaṃ mahat | vratāvasāne ca śubhānnarāndadṛśimo vayam
तब उस समय के योग्य महान् तप हमने फिर सौ वर्ष तक किया, और व्रत के अन्त में हमने उन शुभ पुरुषों को देखा,
श्लोक 40 (12.344.40)
श्वेतांश्चन्द्रप्रतीकाशान्सर्वलक्षणलक्षितान् । नित्याञ्जलिकृतान्ब्रह्म जपतः प्रागुदङ्मुखान् ॥
śvetāṃścandrapratīkāśānsarvalakṣaṇalakṣitān | nityāñjalikṛtānbrahma japataḥ prāgudaṅmukhān
श्वेत, चन्द्रमा के समान दीप्त, सब शुभ लक्षणों से युक्त, सदा हाथ जोड़े हुए, ब्रह्म का जप करते हुए, पूर्वोत्तर दिशा की ओर मुख किए हुए।
श्लोक 41 (12.344.41)
मानसो नाम स जपो जप्यते तैर्महात्मभिः । तेनैकाग्रमनस्त्वेन प्रीतो भवति वै हरिः ॥
mānaso nāma sa japo japyate tairmahātmabhiḥ | tenaikāgramanastvena prīto bhavati vai hariḥ
वे महात्मा जो जप करते हैं, वह मानस जप कहलाता है। उनकी एकाग्रता से हरि प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 42 (12.344.42)
याऽभवन्मुनिशार्दूल भाः सूर्यस्य युगक्षये । एकैकस्य प्रभा तादृक्साऽभवन्मानवस्य ह ॥
yā'bhavanmuniśārdūla bhāḥ sūryasya yugakṣaye | ekaikasya prabhā tādṛksā'bhavanmānavasya ha
हे मुनिश्रेष्ठ, युग के अन्त में सूर्य की जो प्रभा होती है, वैसी ही प्रभा वहाँ प्रत्येक मनुष्य की थी।
श्लोक 43 (12.344.43)
तेजोनिवासः स द्वीप इति वै मेनिरे वयम् । न तत्राभ्यधिकः कश्चित्सर्वे ते समतेजसः ॥
tejonivāsaḥ sa dvīpa iti vai menire vayam | na tatrābhyadhikaḥ kaścitsarve te samatejasaḥ
हमने उस द्वीप को तेज का निवास माना। वहाँ कोई किसी से बढ़कर न था; सब समान तेज वाले थे।
श्लोक 44 (12.344.44)
अथ सूर्यसहस्रस्य प्रभां युगपदुत्थिताम् । सहसा दृष्टवन्तः स्म पुनरेव बृहस्पते ॥
atha sūryasahasrasya prabhāṃ yugapadutthitām | sahasā dṛṣṭavantaḥ sma punareva bṛhaspate
तब, हे बृहस्पति, हमने फिर सहसा एक ही क्षण में उदित हुई सहस्र सूर्यों की प्रभा देखी।
श्लोक 45 (12.344.45)
सहिताश्चाभ्यधावन्त ततस्ते मानवा द्रुतम् । कृताञ्जलिपुटा हृष्टा नम इत्येव वादिनः ॥
sahitāścābhyadhāvanta tataste mānavā drutam | kṛtāñjalipuṭā hṛṣṭā nama ityeva vādinaḥ
तब वे मनुष्य एक साथ शीघ्रता से दौड़े, हर्षित, हाथ जोड़े हुए और केवल ‘नमः’ कहते हुए।
श्लोक 46 (12.344.46)
ततो हि वदतां तेषामश्रौष्म विपुलं ध्वनिम् । बलिः किलोपह्रियते तस्य देवस्य तैर्नरैः ॥
tato hi vadatāṃ teṣāmaśrauṣma vipulaṃ dhvanim | baliḥ kilopahriyate tasya devasya tairnaraiḥ
जब वे बोल रहे थे, तब हमने एक बड़ी ध्वनि सुनी: उन मनुष्यों द्वारा उस देव को बलि अर्पित की जा रही थी।
श्लोक 47 (12.344.47)
वयं तु तेजसा तस्य सहसा हृतचेतसः । न किंचिदपि पश्यामो हतचक्षुर्बलेन्द्रियाः ॥
vayaṃ tu tejasā tasya sahasā hṛtacetasaḥ | na kiṃcidapi paśyāmo hatacakṣurbalendriyāḥ
पर उनके तेज से हमारे चित्त सहसा हर लिए गए और हम कुछ भी नहीं देख सके; हमारी दृष्टि, बल और इन्द्रियाँ क्षीण हो गई थीं।
श्लोक 48 (12.344.48)
एकस्तु शब्दो विततः श्रुतोऽस्माभिरुदीरितः । आकाशं पूरयन्सर्वं शिक्षाक्षरसमन्वितः ॥
ekastu śabdo vitataḥ śruto'smābhirudīritaḥ | ākāśaṃ pūrayansarvaṃ śikṣākṣarasamanvitaḥ
हमने केवल एक ही ध्वनि सुनी, जो उच्चरित होकर फैली हुई थी, सारे आकाश को भरती हुई और शिक्षा के अक्षरों से युक्त।
श्लोक 49 (12.344.49)
जितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुष पूर्वज । इति शब्दः श्रुतोऽस्माभिः शिक्षाक्षरसमन्वितः ॥
jitaṃ te puṇḍarīkākṣa namaste viśvabhāvana | namaste'stu hṛṣīkeśa mahāpuruṣa pūrvaja | iti śabdaḥ śruto'smābhiḥ śikṣākṣarasamanvitaḥ
‘हे कमलनयन, आपकी जय हो! हे विश्व के रचयिता, आपको नमस्कार! हे हृषीकेश, हे महापुरुष, हे पूर्वज, आपको नमस्कार!’ शिक्षा के अक्षरों से युक्त यह ध्वनि हमने सुनी।
श्लोक 50 (12.344.50)
एतस्मिन्नन्तरे वायुः सर्वगन्धवहः शुचिः । दिव्यान्युवाह पुष्पाणि कर्मण्याश्चौषधीस्तथा ॥
etasminnantare vāyuḥ sarvagandhavahaḥ śuciḥ | divyānyuvāha puṣpāṇi karmaṇyāścauṣadhīstathā
इसी बीच सब गन्धों को वहन करने वाली पवित्र वायु दिव्य पुष्प और कर्म के योग्य ओषधियाँ ले आई।
श्लोक 51 (12.344.51)
तैरिष्टः पञ्चकालज्ञैर्हरिरेकान्तिभिर्नरैः । भक्त्या परमया युक्तैर्मनोवाक्कर्मभिस्तदा ॥
tairiṣṭaḥ pañcakālajñairharirekāntibhirnaraiḥ | bhaktyā paramayā yuktairmanovākkarmabhistadā
पाँच कालों (पूजा-समयों) को जानने वाले उन एकनिष्ठ पुरुषों ने तब परम भक्ति से, मन, वचन और कर्म द्वारा हरि का पूजन किया।
श्लोक 52 (12.344.52)
नूनं तत्रागतो देवो यथा तैर्वागुदीरिता । वयं त्वेनं न पश्यामो मोहितास्तस्य मायया ॥
nūnaṃ tatrāgato devo yathā tairvāgudīritā | vayaṃ tvenaṃ na paśyāmo mohitāstasya māyayā
‘निश्चय ही देव वहाँ आए हैं, जैसा उनकी उच्चरित वाणी से जान पड़ता है।’ पर उनकी माया से मोहित होकर हम उन्हें नहीं देख सके।
श्लोक 53 (12.344.53)
मारुते सन्निवृत्ते च बलौ च प्रतिपादिते । चिन्ताव्याकुलितात्मानो जाताः स्मोऽङ्गिरसां वर ॥
mārute sannivṛtte ca balau ca pratipādite | cintāvyākulitātmāno jātāḥ smo'ṅgirasāṃ vara
वायु के थम जाने और बलि अर्पित हो जाने पर हम चिन्ता से व्याकुल हो गए, हे अङ्गिरसों में श्रेष्ठ।
श्लोक 54 (12.344.54)
मानवानां सहस्रेषु तेषु वै शुद्धयोनिषु । अस्मान्न कश्चिन्मनसा चक्षुषा वाऽप्यपूजयत् ॥
mānavānāṃ sahasreṣu teṣu vai śuddhayoniṣu | asmānna kaścinmanasā cakṣuṣā vā'pyapūjayat
शुद्ध योनि वाले उन सहस्रों मनुष्यों में से किसी ने भी न मन से, न दृष्टि से हमारा सत्कार किया।
श्लोक 55 (12.344.55)
तेऽपि स्वस्था मुनिगणा एकभावमनुव्रताः । नास्मासु दधिरे भावं ब्रह्मभावमनुष्ठिताः ॥
te'pi svasthā munigaṇā ekabhāvamanuvratāḥ | nāsmāsu dadhire bhāvaṃ brahmabhāvamanuṣṭhitāḥ
वे मुनिगण भी स्वस्थ, एकभाव में तत्पर और ब्रह्मभाव में स्थित थे, उन्होंने हमारी ओर कोई ध्यान नहीं दिया।
श्लोक 56 (12.344.56)
ततोऽस्मान्सुपरिश्रान्तांस्तपसा चातिकर्शितान् । उवाच स्वस्थं किमपि भूतं तत्राशरीरकम् ॥
tato'smānsupariśrāntāṃstapasā cātikarśitān | uvāca svasthaṃ kimapi bhūtaṃ tatrāśarīrakam
तब हम तप से अत्यन्त थके और क्षीण हो चुके थे; उस समय वहाँ किसी अशरीरी प्राणी ने शान्त भाव से हमसे कहा।
देव उवाच
श्लोक 57 (12.344.57)
दृष्टा वः पुरुषाः श्वेताः सर्वेन्द्रियविवर्जिताः । दृष्टो भवति देवेश एभिर्दृष्टैर्द्विजोत्तमैः ॥
dṛṣṭā vaḥ puruṣāḥ śvetāḥ sarvendriyavivarjitāḥ | dṛṣṭo bhavati deveśa ebhirdṛṣṭairdvijottamaiḥ
‘तुमने उन श्वेत पुरुषों को देख लिया, जो सब इन्द्रियों से रहित हैं। इन द्विजश्रेष्ठों के दर्शन से देवेश के ही दर्शन हो जाते हैं।
श्लोक 58 (12.344.58)
गच्छध्वं मुनयः सर्वे यथागतमितोऽचिरात् । न स शक्यस्त्वभक्तेन द्रष्टुं देवः कथंचन ॥
gacchadhvaṃ munayaḥ sarve yathāgatamito'cirāt | na sa śakyastvabhaktena draṣṭuṃ devaḥ kathaṃcana
हे मुनियो, तुम सब जैसे आए थे वैसे ही शीघ्र लौट जाओ। भक्तिहीन के द्वारा उस देव को किसी प्रकार नहीं देखा जा सकता।
श्लोक 59 (12.344.59)
कामं कालेन महता एकान्तित्वमुपागतैः । शक्यो द्रष्टुं स भगवान्प्रभामण्डलदुर्दृशः ॥
kāmaṃ kālena mahatā ekāntitvamupāgataiḥ | śakyo draṣṭuṃ sa bhagavānprabhāmaṇḍaladurdṛśaḥ
बहुत लम्बे समय के बाद, एकनिष्ठ भाव को प्राप्त हुए लोग ही प्रभामण्डल के कारण दुर्दर्श उन भगवान् को देख सकते हैं।
श्लोक 60 (12.344.60)
महत्कार्यं च कर्तव्यं युष्माभिर्द्विजसत्तमाः । इतः कृतयुगेऽतीते विपर्यासं गतेऽपि च ॥
mahatkāryaṃ ca kartavyaṃ yuṣmābhirdvijasattamāḥ | itaḥ kṛtayuge'tīte viparyāsaṃ gate'pi ca
हे द्विजश्रेष्ठो, तुम्हें एक महान् कार्य करना है। इस कृतयुग के बीत जाने और विपर्यय को प्राप्त हो जाने पर,
श्लोक 61 (12.344.61)
वैवस्वतेऽन्तरे विप्राः प्राप्ते त्रेतायुगे पुनः । सुराणां कार्यसिद्ध्यर्थं सहाया वै भविष्यथ ॥
vaivasvate'ntare viprāḥ prāpte tretāyuge punaḥ | surāṇāṃ kāryasiddhyarthaṃ sahāyā vai bhaviṣyatha
वैवस्वत मन्वन्तर में जब त्रेतायुग पुनः आएगा, तब तुम देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए सहायक बनोगे।’
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
श्लोक 62 (12.344.62)
ततस्तदद्भुतं वाक्यं निशम्यैवामृतोपमम् । तस्य प्रसादात्प्राप्ताः स्मो देशमीप्सितमञ्जसा ॥
tatastadadbhutaṃ vākyaṃ niśamyaivāmṛtopamam | tasya prasādātprāptāḥ smo deśamīpsitamañjasā
अमृत के समान उस अद्भुत वाणी को सुनकर, उनकी कृपा से हम बिना कठिनाई अपने इच्छित स्थान पर पहुँच गए।
श्लोक 63 (12.344.63)
एवं सुतपसा चैव हव्यकव्यैस्तथैव च । देवोऽस्माभिर्न दृष्टः स कथं त्वं द्रष्टुमर्हसि ॥
evaṃ sutapasā caiva havyakavyaistathaiva ca | devo'smābhirna dṛṣṭaḥ sa kathaṃ tvaṃ draṣṭumarhasi
इस प्रकार इतने तप और हव्य-कव्य के होते हुए भी हमने उस देव को नहीं देखा। फिर आप उन्हें कैसे देख सकेंगे?
श्लोक 64 (12.344.64)
नारायणो महद्भूतं विश्वसृग्घव्यकव्यभुक् । अनादिनिधनोऽव्यक्तो देवदानवपूजितः ॥
nārāyaṇo mahadbhūtaṃ viśvasṛgghavyakavyabhuk | anādinidhano'vyakto devadānavapūjitaḥ
नारायण महान् भूत हैं, विश्व के रचयिता और हव्य-कव्य के भोक्ता हैं; वे आदि और अन्त से रहित, अव्यक्त तथा देवों और दानवों द्वारा पूजित हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 65 (12.344.65)
एवमेकतवाक्येन द्वितत्रितमतेन च । अनुनीतः सदस्यैश्च बृहस्पतिरुदारधीः । समापयत्ततो यज्ञं दैवतं समपूजयत् ॥
evamekatavākyena dvitatritamatena ca | anunītaḥ sadasyaiśca bṛhaspatirudāradhīḥ | samāpayattato yajñaṃ daivataṃ samapūjayat
इस प्रकार एकत के एकमत वचन, द्वित और त्रित के मत तथा सदस्यों के समझाने से उदार बुद्धि बृहस्पति शान्त हुए; उन्होंने यज्ञ पूरा किया और देवता का पूजन किया।
श्लोक 66 (12.344.66)
समाप्तयज्ञो राजाऽपि प्रजां पालितवान्वसुः । ब्रह्मशापाद्दिवो भ्रष्टः प्रविवेश महीं ततः ॥
samāptayajño rājā'pi prajāṃ pālitavānvasuḥ | brahmaśāpāddivo bhraṣṭaḥ praviveśa mahīṃ tataḥ
यज्ञ पूर्ण करके राजा वसु प्रजा का पालन करते रहे; पर ब्राह्मण के शाप से वे स्वर्ग से गिर गए और पृथ्वी में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 67 (12.344.67)
स राजा राजशार्दूल सत्यधर्मपरायणः । अन्तर्भूमिगतश्चैव सततं धर्मवत्सलः ॥
sa rājā rājaśārdūla satyadharmaparāyaṇaḥ | antarbhūmigataścaiva satataṃ dharmavatsalaḥ
हे राजशार्दूल, सत्य और धर्म में तत्पर वह राजा भूमि के भीतर चला गया, फिर भी सदा धर्म से प्रेम करता रहा।
श्लोक 68 (12.344.68)
नारायणपरो भूत्वा नारायणजपं जपन् । तस्यैव च प्रसादेन पुनरेवोत्थितस्तु सः ॥
nārāyaṇaparo bhūtvā nārāyaṇajapaṃ japan | tasyaiva ca prasādena punarevotthitastu saḥ
नारायण-परायण होकर, नारायण का जप करते हुए, उन्हीं की कृपा से वह फिर ऊपर उठा।
श्लोक 69 (12.344.69)
महीतलाद्गतः स्थानं ब्रह्मणः समनन्तरम् । परां गतिमनुप्राप्त इति नैष्ठिकमञ्जसा ॥
mahītalādgataḥ sthānaṃ brahmaṇaḥ samanantaram | parāṃ gatimanuprāpta iti naiṣṭhikamañjasā
पृथ्वी तल से निकलकर वह ब्रह्मा के निकटवर्ती स्थान को गया; इस प्रकार निष्ठावान् की परम गति उसने सहज ही प्राप्त की।