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शान्ति पर्व · अध्याय 347

भगवान् का नारद को दर्शन देना

नारद के स्तोत्र से प्रसन्न होकर भगवान् उन्हें अनेक रंगों वाला, सहस्र नेत्रों वाला और वेदों का गान करता हुआ रूप दिखाते हैं और कहते हैं कि उन्हें केवल श्रेष्ठ एकान्त भक्त ही देख सकते हैं। वे बताते हैं कि वासुदेव गुणों से परे पुरुष हैं और उनका चतुर्विध प्राकट्य वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध है; नारद जो रूप देख रहे हैं वह उनकी अपनी रची माया है। वे अपने में स्थित रुद्र, आदित्य, वसु आदि को दिखाते हैं, ब्रह्मा को दिए वर, अपनी निवृत्ति और युग-युग में दोहराई जाने वाली सृष्टि का वर्णन करते हैं, और नारद को विदा करते हैं।

अध्याय 346अध्याय-सूचीअध्याय 348

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.347.1)

एवं स्तुतः स भगवान् गुह्यैस्तथ्यैश्च नामभिः । भगवान्विश्वसृक्सिंहः सर्वमूर्तिमयः प्रभुः । दर्शयामास मुनये रूपं तत्परमं हरिः ॥

evaṃ stutaḥ sa bhagavān guhyaistathyaiśca nāmabhiḥ | bhagavānviśvasṛksiṃhaḥ sarvamūrtimayaḥ prabhuḥ | darśayāmāsa munaye rūpaṃ tatparamaṃ hariḥ

इस प्रकार रहस्यमय और सत्य नामों से स्तुति किए जाने पर वे भगवान् हरि, जो विश्व के रचयिता, सिंहरूप और सर्वरूपमय प्रभु हैं, मुनि को अपना परम रूप दिखाने लगे।

श्लोक 2 (12.347.2)

किंचिच्चन्द्राद्विशुद्धात्मा किंचिच्चन्द्राद्विशेषवान् । कृशानुवर्णः किंचिच्च किंचिद्धिष्ण्याकृतिः प्रभुः ॥

kiṃciccandrādviśuddhātmā kiṃciccandrādviśeṣavān | kṛśānuvarṇaḥ kiṃcicca kiṃciddhiṣṇyākṛtiḥ prabhuḥ

वे कहीं चन्द्रमा से भी अधिक विशुद्ध थे, कहीं चन्द्रमा से भी विशिष्ट; कहीं अग्नि के रंग के थे और कहीं प्रभु तारे के आकार के।

श्लोक 3 (12.347.3)

शुकपत्रनिभः किंचित्किंचित्स्फटिकसन्निभः । नीलाञ्जनचयप्रख्यो जातरूपप्रभः क्वचित् ॥

śukapatranibhaḥ kiṃcitkiṃcitsphaṭikasannibhaḥ | nīlāñjanacayaprakhyo jātarūpaprabhaḥ kvacit

कहीं तोते के पंख जैसे थे, कहीं स्फटिक जैसे; कहीं काजल के ढेर जैसे नीले थे, और कहीं सोने की आभा वाले।

श्लोक 4 (12.347.4)

प्रबालाङ्कुरवर्णश्च श्वेतवर्णस्तथा क्वचित् । क्वचित्सुवर्णवर्णाभो वैदूर्यसदृशः क्वचित् ॥

prabālāṅkuravarṇaśca śvetavarṇastathā kvacit | kvacitsuvarṇavarṇābho vaidūryasadṛśaḥ kvacit

वे मूँगे के अंकुर के रंग के थे, और कहीं श्वेत वर्ण के; कहीं सुनहरे रंग की आभा वाले, कहीं वैदूर्य के समान।

श्लोक 5 (12.347.5)

नीलवैदूर्यसदृश इन्द्रनीलनिभः क्वचित् । मयूरग्रीववर्णाभो मुक्ताहारनिभः क्वचित् ॥

nīlavaidūryasadṛśa indranīlanibhaḥ kvacit | mayūragrīvavarṇābho muktāhāranibhaḥ kvacit

कहीं वे नीले वैदूर्य जैसे थे, कहीं इन्द्रनील मणि जैसे; वे मोर की गर्दन के रंग के थे और कहीं मोतियों के हार जैसे।

श्लोक 6 (12.347.6)

एतान्बहुविधान्वर्णान्रूपैर्बिभ्रत्सनातनः । सहस्रनयनः श्रीमाञ्छतशीर्षः सहस्रपात् ॥

etānbahuvidhānvarṇānrūpairbibhratsanātanaḥ | sahasranayanaḥ śrīmāñchataśīrṣaḥ sahasrapāt

इन अनेक प्रकार के रंगों को अपने रूपों में धारण करते हुए वे सनातन श्रीमान् सहस्र नेत्रों, सौ सिरों और सहस्र चरणों वाले थे,

श्लोक 7 (12.347.7)

सहस्रोदरबाहुश्च अव्यक्त इति च क्वचित् । ओंकारमुद्गिरन्वक्रात्सावित्रीं च तदन्वयाम् ॥

sahasrodarabāhuśca avyakta iti ca kvacit | oṃkāramudgiranvakrātsāvitrīṃ ca tadanvayām

सहस्र उदरों और भुजाओं वाले, और कहीं अव्यक्त भी; अपने मुख से वे ओंकार का और उसके पीछे आने वाली सावित्री का उच्चारण कर रहे थे,

श्लोक 8 (12.347.8)

शेषेभ्यश्चैव वक्रेभ्यश्चतुर्वेदान्गिरन्बहून् । आरण्यकं जगौ देवो हरिर्नारायणो वशी ॥

śeṣebhyaścaiva vakrebhyaścaturvedāngiranbahūn | āraṇyakaṃ jagau devo harirnārāyaṇo vaśī

और अपने शेष मुखों से चारों वेदों को अनेक रूप में उच्चारित करते हुए संयमी देव हरि नारायण ने आरण्यक का गान किया।

श्लोक 9 (12.347.9)

वेदिं कमण्डलुं दर्भान्मणिरूपांस्तथा कुशान् । अजिनं दण्डकाष्ठं च ज्वलितं च हुताशनम् । धारयामास देवेशो हस्तैर्यज्ञपतिस्तदा ॥

vediṃ kamaṇḍaluṃ darbhānmaṇirūpāṃstathā kuśān | ajinaṃ daṇḍakāṣṭhaṃ ca jvalitaṃ ca hutāśanam | dhārayāmāsa deveśo hastairyajñapatistadā

उन यज्ञपति देवेश ने अपने हाथों में वेदी, कमण्डलु, दर्भ, मणि-जैसे कुश, मृगचर्म, काष्ठ का दण्ड और प्रज्वलित अग्नि धारण कर रखी थी।

श्लोक 10 (12.347.10)

तं प्रसन्नं प्रसन्नात्मा नारदो द्विजसत्तमः । वाग्यतः प्रणतो भूत्वा ववन्दे परमेश्वरम् ॥

taṃ prasannaṃ prasannātmā nārado dvijasattamaḥ | vāgyataḥ praṇato bhūtvā vavande parameśvaram

उन प्रसन्न भगवान् को देखकर प्रसन्नचित्त द्विजश्रेष्ठ नारद ने मौन और विनत होकर परमेश्वर को प्रणाम किया।

श्लोक 11 (12.347.11)

तमुवाच नतं मूर्ध्ना देवानामादिरव्ययः ॥

tamuvāca nataṃ mūrdhnā devānāmādiravyayaḥ

सिर झुकाए हुए उनसे देवों के आदि, अविनाशी भगवान् ने कहा:

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 12 (12.347.12)

एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षयः । इमं देशमनुप्राप्ता मम दर्शनलालसाः ॥

ekataśca dvitaścaiva tritaścaiva maharṣayaḥ | imaṃ deśamanuprāptā mama darśanalālasāḥ

"एकत, द्वित और त्रित, ये महर्षि मेरे दर्शन की लालसा से इस स्थान पर आए थे।"

श्लोक 13 (12.347.13)

न च मां ते ददृशिरे न च द्रक्ष्यति कश्चन । ऋते ह्यैकान्तिकश्रेष्ठात्त्वं चैवैकान्तिकोत्तम ॥

na ca māṃ te dadṛśire na ca drakṣyati kaścana | ṛte hyaikāntikaśreṣṭhāttvaṃ caivaikāntikottama

"परन्तु न उन्होंने मुझे देखा, न कोई और देख सकेगा, केवल श्रेष्ठ एकान्तिक भक्त को छोड़कर; और हे एकान्तिकों में उत्तम! तुम भी वैसे ही हो।"

श्लोक 14 (12.347.14)

ममैतास्तनवः श्रेष्ठा जाता धर्मगृहे द्विज । तास्त्वं भजस्व सततं साधयस्व यथागतम् ॥

mamaitāstanavaḥ śreṣṭhā jātā dharmagṛhe dvija | tāstvaṃ bhajasva satataṃ sādhayasva yathāgatam

"हे द्विज! धर्म के घर में उत्पन्न ये मेरे श्रेष्ठ शरीर (रूप) हैं; तुम इनका निरन्तर भजन करो और जिस उद्देश्य से आए हो उसे सिद्ध करो।"

श्लोक 15 (12.347.15)

वृणीष्व च वरं प्रिय मत्तस्त्वं यदिहेच्छसि । प्रसन्नोऽहं तवाद्येह विश्वमूर्तिरिहाव्ययः ॥

vṛṇīṣva ca varaṃ priya mattastvaṃ yadihecchasi | prasanno'haṃ tavādyeha viśvamūrtirihāvyayaḥ

"हे प्रिय! मुझसे यहाँ जो चाहो वर माँग लो। आज मैं तुम पर प्रसन्न हूँ; यहाँ मैं विश्वरूप और अविनाशी हूँ।"

नारद उवाच

श्लोक 16 (12.347.16)

अद्य मे तपसो देव यमस्य नियमस्य च । सद्यः फलमवाप्तं वै दृष्टो यद्भगवान्मया ॥

adya me tapaso deva yamasya niyamasya ca | sadyaḥ phalamavāptaṃ vai dṛṣṭo yadbhagavānmayā

"हे देव! आज मेरे तप, यम और नियम का फल तत्काल मिल गया, क्योंकि मैंने भगवान् के दर्शन कर लिए।"

श्लोक 17 (12.347.17)

वर एष ममात्यन्तं दृष्टस्त्वं यत्सनातनः । भगवन्विश्वदृक् सिंहः सर्वमूर्तिर्महान्प्रभुः ॥

vara eṣa mamātyantaṃ dṛṣṭastvaṃ yatsanātanaḥ | bhagavanviśvadṛk siṃhaḥ sarvamūrtirmahānprabhuḥ

"मेरा परम वर यही है कि मैंने आपको, सनातन को, देखा: हे भगवन्, विश्वद्रष्टा, सिंह, सर्वरूप, महान् प्रभु!"

भीष्म उवाच

श्लोक 18 (12.347.18)

एवं संदर्शयित्वा तु नारदं परमेष्ठिजम् । उवाच वचनं भूयो गच्छ नारद माचिरम् ॥

evaṃ saṃdarśayitvā tu nāradaṃ parameṣṭhijam | uvāca vacanaṃ bhūyo gaccha nārada māciram

इस प्रकार ब्रह्मा के पुत्र नारद को दर्शन देकर उन्होंने फिर कहा, "हे नारद, जाओ, देर मत करो।"

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 19 (12.347.19)

इमे ह्यनिन्द्रियाहारा मद्भक्ताश्चन्द्रवर्चसः । एकाग्राश्चिन्तयेयुर्मां नैषां विघ्नो भवेदिति ॥

ime hyanindriyāhārā madbhaktāścandravarcasaḥ | ekāgrāścintayeyurmāṃ naiṣāṃ vighno bhavediti

"ये इन्द्रियों और आहार से रहित, चन्द्रमा के समान तेजस्वी मेरे भक्त एकाग्र होकर मेरा चिन्तन करेंगे; इनके लिए कोई विघ्न न हो।"

श्लोक 20 (12.347.20)

सिद्धा ह्येते महाभागाः पुरा ह्येकान्तिनोऽभवन् । तमोरजोभिर्निर्मुक्ता मां प्रवेक्ष्यन्त्यसंशयम् ॥

siddhā hyete mahābhāgāḥ purā hyekāntino'bhavan | tamorajobhirnirmuktā māṃ pravekṣyantyasaṃśayam

"ये सिद्ध, महाभाग पुरुष पहले एकान्त भक्त हुए थे; तमोगुण और रजोगुण से मुक्त होकर ये निश्चय ही मुझमें प्रवेश करेंगे।"

श्लोक 21 (12.347.21)

न दृश्यश्चक्षुषा योऽसौ न स्पृश्यः स्पर्शनेन च । न घ्रेयश्चैव गन्धेन रसेन च विवर्जितः ॥

na dṛśyaścakṣuṣā yo'sau na spṛśyaḥ sparśanena ca | na ghreyaścaiva gandhena rasena ca vivarjitaḥ

"जो आँख से नहीं देखा जा सकता, स्पर्श से नहीं छुआ जा सकता, गन्ध से नहीं सूँघा जा सकता और रस से रहित है;"

श्लोक 22 (12.347.22)

सत्वं रजस्तमश्चैव न गुणास्तं भजन्ति वै । यश्च सर्वगतः साक्षी लोकस्यात्मेति कथ्यते ॥

satvaṃ rajastamaścaiva na guṇāstaṃ bhajanti vai | yaśca sarvagataḥ sākṣī lokasyātmeti kathyate

"सत्त्व, रज और तम, ये गुण जिसे नहीं भजते; और जो सर्वव्यापी, साक्षी तथा लोक का आत्मा कहा जाता है;"

श्लोक 23 (12.347.23)

भूतग्रामशरीरेषु नश्यत्सु न विनश्यति । अजो नित्यः शाश्वतश्च निर्गुणो निष्कलस्तथा ॥

bhūtagrāmaśarīreṣu naśyatsu na vinaśyati | ajo nityaḥ śāśvataśca nirguṇo niṣkalastathā

"जो प्राणिसमूह के शरीरों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता; जो अजन्मा, नित्य, शाश्वत, निर्गुण और निष्कल है;"

श्लोक 24 (12.347.24)

द्विर्द्वादशेभ्यस्तत्त्वेभ्यः ख्यातो यः पञ्चविंशकः । पुरुषो निष्क्रियश्चैव ज्ञानदृश्यश्च कथ्यते ॥

dvirdvādaśebhyastattvebhyaḥ khyāto yaḥ pañcaviṃśakaḥ | puruṣo niṣkriyaścaiva jñānadṛśyaśca kathyate

"जो बारह के दुगने (चौबीस) तत्त्वों से परे पच्चीसवाँ कहकर प्रसिद्ध है; वह पुरुष निष्क्रिय और ज्ञान से दिखाई देने वाला कहा जाता है।"

श्लोक 25 (12.347.25)

यं प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता वै द्विजसत्तमाः । स वासुदेवो विज्ञेयः परमात्मा सनातनः ॥

yaṃ praviśya bhavantīha muktā vai dvijasattamāḥ | sa vāsudevo vijñeyaḥ paramātmā sanātanaḥ

"हे द्विजश्रेष्ठ! जिसमें प्रवेश करके मुक्त जन यहाँ मुक्त होते हैं, उसी को वासुदेव, सनातन परमात्मा जानना चाहिए।"

श्लोक 26 (12.347.26)

पश्य देवस्य माहात्म्यं महिमानं च नारद । शुभाशुभैः कर्मभिर्यो न लिप्यति कदाचन ॥

paśya devasya māhātmyaṃ mahimānaṃ ca nārada | śubhāśubhaiḥ karmabhiryo na lipyati kadācana

"हे नारद! देव की महिमा और माहात्म्य को देखो: वे शुभ-अशुभ कर्मों से कभी लिप्त नहीं होते।"

श्लोक 27 (12.347.27)

सत्वं रजस्तमश्चेति गुणानेतान्प्रचक्षते । एते सर्वशरीरेषु तिष्ठन्ति विचरन्ति च ॥

satvaṃ rajastamaśceti guṇānetānpracakṣate | ete sarvaśarīreṣu tiṣṭhanti vicaranti ca

"सत्त्व, रज और तम, इन्हें गुण कहा जाता है। ये सब शरीरों में रहते और विचरते हैं।"

श्लोक 28 (12.347.28)

एतान्गुणांस्तु क्षेत्रज्ञो भुङ्क्ते नैभिः स भुज्यते । निर्गुणो गुणभुक्चैव गुणस्रष्टा गुणातिगः ॥

etānguṇāṃstu kṣetrajño bhuṅkte naibhiḥ sa bhujyate | nirguṇo guṇabhukcaiva guṇasraṣṭā guṇātigaḥ

"क्षेत्रज्ञ इन गुणों का भोग करता है, पर इनसे वह भोगा नहीं जाता; वह निर्गुण होकर भी गुणों का भोक्ता, गुणों का स्रष्टा और गुणों से अतीत है।"

श्लोक 29 (12.347.29)

जगत्प्रतिष्ठा देवर्षे पृथिव्यप्सु प्रलीयते । ज्योतिष्यापः प्रलीयन्ते ज्योतिर्वायौ प्रलीयते ॥

jagatpratiṣṭhā devarṣe pṛthivyapsu pralīyate | jyotiṣyāpaḥ pralīyante jyotirvāyau pralīyate

"हे देवर्षि! जगत् की आधार पृथ्वी जल में लीन होती है; जल तेज में लीन होता है और तेज वायु में लीन होता है।"

श्लोक 30 (12.347.30)

खे वायुः प्रलयं याति मनस्याकाशमेव च । मनो हि परमं भूतं तदव्यक्ते प्रलीयते ॥

khe vāyuḥ pralayaṃ yāti manasyākāśameva ca | mano hi paramaṃ bhūtaṃ tadavyakte pralīyate

"वायु आकाश में लय को प्राप्त होता है और आकाश मन में; मन परम भूत है, वह अव्यक्त में लीन होता है।"

श्लोक 31 (12.347.31)

अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन्निष्क्रिये संप्रलीयते । नास्ति तस्मात्परतरः पुरुषाद्वै सनातनात् ॥

avyaktaṃ puruṣe brahmanniṣkriye saṃpralīyate | nāsti tasmātparataraḥ puruṣādvai sanātanāt

"हे ब्रह्मन्! अव्यक्त निष्क्रिय पुरुष में लीन होता है; उस सनातन पुरुष से परे कुछ नहीं है।"

श्लोक 32 (12.347.32)

नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम् । ऋते तमेकं पुरुषं वासुदेवं सनातनम् । सर्वभूतात्मभूतो हि वासुदेवो महाबलः ॥

nityaṃ hi nāsti jagati bhūtaṃ sthāvarajaṅgamam | ṛte tamekaṃ puruṣaṃ vāsudevaṃ sanātanam | sarvabhūtātmabhūto hi vāsudevo mahābalaḥ

"जगत् में स्थावर-जंगम कोई भी प्राणी नित्य नहीं है, केवल उस एक सनातन पुरुष वासुदेव को छोड़कर। महाबली वासुदेव सब प्राणियों के आत्मा हैं।"

श्लोक 33 (12.347.33)

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । ते समेता महात्मानः शरीरमिति संज्ञितम् ॥

pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam | te sametā mahātmānaḥ śarīramiti saṃjñitam

"पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज: ये महान् तत्त्व मिलकर "शरीर" कहलाते हैं।"

श्लोक 34 (12.347.34)

तदाविशति यो ब्रह्मन्न दृश्यो लघुविक्रमः । उत्पन्न एव भवति शरीरं चेष्टयन्प्रभुः ॥

tadāviśati yo brahmanna dṛśyo laghuvikramaḥ | utpanna eva bhavati śarīraṃ ceṣṭayanprabhuḥ

"हे ब्रह्मन्! जो अदृश्य और शीघ्र पराक्रम वाला उसमें प्रवेश करता है, वह प्रभु शरीर को चलाता हुआ उसके उत्पन्न होते ही वहाँ उपस्थित हो जाता है।"

श्लोक 35 (12.347.35)

न विना धातुसंघातं शरीरं भवति क्वचित् । न च जीवं विना ब्रह्मन्वायवश्चेष्टयन्त्युत ॥

na vinā dhātusaṃghātaṃ śarīraṃ bhavati kvacit | na ca jīvaṃ vinā brahmanvāyavaśceṣṭayantyuta

"धातुओं के समूह के बिना शरीर कभी नहीं होता; और हे ब्रह्मन्! जीव के बिना वायुएँ उसे चेष्टा नहीं करातीं।"

श्लोक 36 (12.347.36)

स जीवः परिसंख्यातः शेषः संकर्षणः प्रभुः । तस्मात्सनत्कुमारत्वं योऽलभत्स्वेन कर्मणा ॥

sa jīvaḥ parisaṃkhyātaḥ śeṣaḥ saṃkarṣaṇaḥ prabhuḥ | tasmātsanatkumāratvaṃ yo'labhatsvena karmaṇā

"वह जीव शेष, प्रभु संकर्षण गिना गया है; उसी से सनत्कुमार-भाव हुआ, जिसे उसने अपने कर्म से पाया।"

श्लोक 37 (12.347.37)

यस्मिंश्च सर्वभूतानि प्रद्युम्नः परिपठ्यते । तस्मात्प्रसूतो यः कर्ता कारणं कार्यमेव च ॥

yasmiṃśca sarvabhūtāni pradyumnaḥ paripaṭhyate | tasmātprasūto yaḥ kartā kāraṇaṃ kāryameva ca

"जिसमें सब प्राणी स्थित हैं, वह प्रद्युम्न कहा जाता है; उससे कर्ता उत्पन्न हुआ, तथा कारण और कार्य भी।"

श्लोक 38 (12.347.38)

तस्मात्सर्वं संभवति जगत्स्थावरजङ्गमम् । सोऽनिरुद्धः स ईशानो व्यक्तिः सा सर्वकर्मसु ॥

tasmātsarvaṃ saṃbhavati jagatsthāvarajaṅgamam | so'niruddhaḥ sa īśāno vyaktiḥ sā sarvakarmasu

"उससे यह सारा स्थावर-जंगम जगत् उत्पन्न होता है; वही अनिरुद्ध है, वही ईशान है, और सब कर्मों में वही प्रकट होता है।"

श्लोक 39 (12.347.39)

यो वासुदेवो भगवान्क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः । ज्ञेयः स एव राजेन्द्र जीवः संकर्षणः प्रभुः ॥

yo vāsudevo bhagavānkṣetrajño nirguṇātmakaḥ | jñeyaḥ sa eva rājendra jīvaḥ saṃkarṣaṇaḥ prabhuḥ

"जो वासुदेव भगवान्, निर्गुण स्वरूप वाले क्षेत्रज्ञ हैं, उन्हीं को, हे राजेन्द्र, जीव संकर्षण प्रभु जानना चाहिए।"

श्लोक 40 (12.347.40)

संकर्षणाच्च प्रद्युम्नो मनोभूतः स उच्यते । प्रद्युम्नाद्योऽनिरुद्धस्तु सोहंकारः स ईश्वरः ॥

saṃkarṣaṇācca pradyumno manobhūtaḥ sa ucyate | pradyumnādyo'niruddhastu sohaṃkāraḥ sa īśvaraḥ

"संकर्षण से प्रद्युम्न उत्पन्न होता है, जो मनोरूप कहा जाता है; और प्रद्युम्न से अनिरुद्ध, जो अहंकार है, वही ईश्वर है।"

श्लोक 41 (12.347.41)

मत्तः सर्वं संभवति जगत्स्थावरजङ्गमम् । अक्षरं च क्षरं चैव सच्चासच्चैव नारद ॥

mattaḥ sarvaṃ saṃbhavati jagatsthāvarajaṅgamam | akṣaraṃ ca kṣaraṃ caiva saccāsaccaiva nārada

"मुझसे यह सारा स्थावर-जंगम जगत् उत्पन्न होता है; हे नारद! अक्षर और क्षर, सत् और असत्, सब मुझसे ही।"

श्लोक 42 (12.347.42)

मां प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता भक्तास्तु ये मम । अहं हि पुरुषो ज्ञेयो निष्क्रियः पञ्चविंशकः ॥

māṃ praviśya bhavantīha muktā bhaktāstu ye mama | ahaṃ hi puruṣo jñeyo niṣkriyaḥ pañcaviṃśakaḥ

"जो मेरे भक्त मुक्त हैं, वे मुझमें प्रवेश करते हैं। मैं ही निष्क्रिय पच्चीसवाँ पुरुष जानने योग्य हूँ।"

श्लोक 43 (12.347.43)

निर्गुणो निष्कलश्चैव निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः । एतत्त्वया न विज्ञेयं रूपवानिति दृश्यते ॥

nirguṇo niṣkalaścaiva nirdvandvo niṣparigrahaḥ | etattvayā na vijñeyaṃ rūpavāniti dṛśyate

"मैं निर्गुण, निष्कल, द्वन्द्वरहित और परिग्रहरहित हूँ। जो रूपवान् दिखाई देता हूँ, इसे तुम सत्य न समझना।"

श्लोक 44 (12.347.44)

इच्छन्मुहूर्तान्नश्येयमीशोऽहं जगतो गुरुः । माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद ॥

icchanmuhūrtānnaśyeyamīśo'haṃ jagato guruḥ | māyā hyeṣā mayā sṛṣṭā yanmāṃ paśyasi nārada

"मैं चाहूँ तो एक क्षण में अदृश्य हो सकता हूँ; मैं ईश्वर और जगत् का गुरु हूँ। हे नारद! तुम मुझे जो देख रहे हो, यह मेरी रची हुई माया है,"

श्लोक 45 (12.347.45)

सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि । मयैतत्कथितं सम्यक्तव मूर्तिचतुष्टयम् ॥

sarvabhūtaguṇairyuktaṃ naivaṃ tvaṃ jñātumarhasi | mayaitatkathitaṃ samyaktava mūrticatuṣṭayam

"सब प्राणियों के गुणों से युक्त। तुम्हें मुझे ऐसा नहीं समझना चाहिए। मेरे चार रूपों वाला यह स्वरूप मैंने तुम्हें ठीक-ठीक बता दिया।"

श्लोक 46 (12.347.46)

अहं हि जीवसंज्ञो वै मयि जीवः समाहितः । मैवं ते बुद्धिरत्राभूद्दृष्टो जीवो मयेति वै ॥

ahaṃ hi jīvasaṃjño vai mayi jīvaḥ samāhitaḥ | maivaṃ te buddhiratrābhūddṛṣṭo jīvo mayeti vai

"मैं ही जीव नाम वाला हूँ और जीव मुझमें स्थित है। तुम्हारे मन में यहाँ यह भाव न आए कि मैंने जीव को देखा।"

श्लोक 47 (12.347.47)

अहं सर्वत्रगो ब्रह्मन्भूतग्रामान्तरात्मकः । भूतग्रामशरीरेषु नश्यत्सु न नशाम्यहम् ॥

ahaṃ sarvatrago brahmanbhūtagrāmāntarātmakaḥ | bhūtagrāmaśarīreṣu naśyatsu na naśāmyaham

"हे ब्रह्मन्! मैं सर्वत्र जाने वाला और प्राणिसमूह का अन्तरात्मा हूँ; प्राणियों के शरीर नष्ट होते हैं, पर मैं नष्ट नहीं होता।"

श्लोक 48 (12.347.48)

सिद्धा हि ते महाभागा नरा ह्येकान्तिनोऽभवन् । तमोरजोभ्यां निर्मुक्ताः प्रवेक्ष्यन्ति च मां मुने ॥

siddhā hi te mahābhāgā narā hyekāntino'bhavan | tamorajobhyāṃ nirmuktāḥ pravekṣyanti ca māṃ mune

"हे मुनि! वे सिद्ध महाभाग पुरुष एकान्त भक्त हो गए; तमोगुण और रजोगुण से मुक्त होकर वे मुझमें प्रवेश करेंगे।"

श्लोक 49 (12.347.49)

अहं कर्ता च कार्यं च कारणं चापि नारद । न दृश्यश्चक्षुषा देवः स्पृश्यो न स्पर्शनेन च । आघ्रेयो नैव गन्धेन रसेन च विसर्जितः ॥

ahaṃ kartā ca kāryaṃ ca kāraṇaṃ cāpi nārada | na dṛśyaścakṣuṣā devaḥ spṛśyo na sparśanena ca | āghreyo naiva gandhena rasena ca visarjitaḥ

"हे नारद! मैं कर्ता, कार्य और कारण भी हूँ। देव आँख से नहीं देखा जाता, स्पर्श से नहीं छुआ जाता, गन्ध से नहीं सूँघा जाता और रस से रहित है।"

श्लोक 50 (12.347.50)

सत्वं रजस्तमश्चैव न गुणास्ते भवन्ति हि । स हि सर्वगतः साक्षी लोकस्यात्मेति कथ्यते ॥

satvaṃ rajastamaścaiva na guṇāste bhavanti hi | sa hi sarvagataḥ sākṣī lokasyātmeti kathyate

"सत्त्व, रज और तम, ये गुण उसमें नहीं हैं; क्योंकि वह सर्वव्यापी, साक्षी और लोक का आत्मा कहा जाता है।"

श्लोक 51 (12.347.51)

हिरण्यगर्भो लोकादिश्चतुर्वक्रोऽनिरुक्तगः । ब्रह्मा सनातनो देवो मम बह्वर्थचिन्तकः ॥

hiraṇyagarbho lokādiścaturvakro'niruktagaḥ | brahmā sanātano devo mama bahvarthacintakaḥ

"हिरण्यगर्भ, लोकों के आदि, चतुर्मुख, अनिर्वचनीय गति वाले सनातन देव ब्रह्मा मेरे बहुत-से प्रयोजनों का चिन्तन करने वाले हैं।"

श्लोक 52 (12.347.52)

ललाटाच्चैव मे रुद्रो देवः क्रोधाद्विनिःसृतः । पश्यैकादश मे रुद्रान्दक्षिणं पार्श्वमास्थितान् ॥

lalāṭāccaiva me rudro devaḥ krodhādviniḥsṛtaḥ | paśyaikādaśa me rudrāndakṣiṇaṃ pārśvamāsthitān

"मेरे ललाट से क्रोध के कारण रुद्र देव निकले। मेरे दाहिने पार्श्व में खड़े ग्यारह रुद्रों को देखो,"

श्लोक 53 (12.347.53)

द्वादशैव तथाऽऽदित्यान्वामपार्श्वे समास्थितान् । अग्रतश्चैव मे पश्य वसूनष्टौ सुरोत्तमान् ॥

dvādaśaiva tathā''dityānvāmapārśve samāsthitān | agrataścaiva me paśya vasūnaṣṭau surottamān

"और मेरे बाएँ पार्श्व में खड़े बारह आदित्यों को, और मेरे सामने आठ वसुओं, उन श्रेष्ठ देवताओं को देखो,"

श्लोक 54 (12.347.54)

नासत्यं चैव दस्रं च भिषजौ पश्य पृष्ठतः । सर्वान्प्रजापतीन्पश्य पश्य सप्तऋर्षीस्तथा ॥

nāsatyaṃ caiva dasraṃ ca bhiṣajau paśya pṛṣṭhataḥ | sarvānprajāpatīnpaśya paśya saptaṛrṣīstathā

"मेरे पीछे नासत्य और दस्र, दोनों वैद्यों (अश्विनीकुमारों) को देखो; सब प्रजापतियों को और सप्तर्षियों को भी देखो;"

श्लोक 55 (12.347.55)

वेदान्यज्ञांश्च शतशः पश्यामृतमथौषधीः । तपांसि नियमांश्चैव यमानपि पृथग्विधान् ॥

vedānyajñāṃśca śataśaḥ paśyāmṛtamathauṣadhīḥ | tapāṃsi niyamāṃścaiva yamānapi pṛthagvidhān

"सैकड़ों वेदों और यज्ञों को, अमृत और औषधियों को देखो; तप, नियम और अनेक प्रकार के यमों को भी देखो;"

श्लोक 56 (12.347.56)

तथाऽष्टगुणमैश्वर्यमेकस्थं पश्य मूर्तिमत् । श्रियं लक्ष्मीं च कीर्तिं च पृथिवीं च ककुद्मिनीम् ॥

tathā'ṣṭaguṇamaiśvaryamekasthaṃ paśya mūrtimat | śriyaṃ lakṣmīṃ ca kīrtiṃ ca pṛthivīṃ ca kakudminīm

"अष्टगुण ऐश्वर्य को भी एक स्थान पर मूर्तिमान् देखो; श्री, लक्ष्मी, कीर्ति और ऊँचे शिखरों वाली पृथ्वी को देखो;"

श्लोक 57 (12.347.57)

वेदानां मातरं पश्य मत्स्थां देवीं सरस्वतीम् । ध्रुवं च ज्योतिषां श्रेष्ठं पश्य नारद खेचरम् ॥

vedānāṃ mātaraṃ paśya matsthāṃ devīṃ sarasvatīm | dhruvaṃ ca jyotiṣāṃ śreṣṭhaṃ paśya nārada khecaram

"मुझमें स्थित वेदों की माता देवी सरस्वती को देखो; और हे नारद! आकाश में चलने वाले ज्योतियों में श्रेष्ठ ध्रुव को देखो;"

श्लोक 58 (12.347.58)

अम्भोधरान्समुद्रांश्च सरांसि सरितस्तथा । मूर्तिमन्तः पितृगणांश्चतुरः पश्य सत्तम ॥

ambhodharānsamudrāṃśca sarāṃsi saritastathā | mūrtimantaḥ pitṛgaṇāṃścaturaḥ paśya sattama

"मेघों, समुद्रों, सरोवरों और नदियों को देखो; और हे सत्तम! मूर्तिमान् चार पितृगणों को देखो;"

श्लोक 59 (12.347.59)

त्रींश्चैवेमान्गुणान्पश्य मत्स्थान्मूर्तिविवर्जितान् । देवकार्यादपि मुने पितृकार्यं विशिष्यते ॥

trīṃścaivemānguṇānpaśya matsthānmūrtivivarjitān | devakāryādapi mune pitṛkāryaṃ viśiṣyate

"मुझमें स्थित इन तीन गुणों को भी देखो, जो रूपरहित हैं। हे मुने! देवकार्य से भी पितृकार्य श्रेष्ठ माना जाता है।"

श्लोक 60 (12.347.60)

देवानां च पितृणां च पिता ह्येकोऽहमादितः । अहं हयशिरा भूत्वा समुद्रे पश्चिमोत्तरे ॥

devānāṃ ca pitṛṇāṃ ca pitā hyeko'hamāditaḥ | ahaṃ hayaśirā bhūtvā samudre paścimottare

"देवताओं और पितरों का आदि से मैं ही एकमात्र पिता हूँ। मैं हयशिरा होकर उत्तर-पश्चिम के समुद्र में"

श्लोक 61 (12.347.61)

पिबामि सुहुतं हव्यं कव्यं च श्रद्धयाऽन्वितम् । मया सृष्टः पुरा ब्रह्मा मां यज्ञमयजत्स्वयम् ॥

pibāmi suhutaṃ havyaṃ kavyaṃ ca śraddhayā'nvitam | mayā sṛṣṭaḥ purā brahmā māṃ yajñamayajatsvayam

"श्रद्धापूर्वक अर्पित और भली-भाँति आहुत हव्य तथा कव्य मैं पीता हूँ। मेरे द्वारा पहले रचे गए ब्रह्मा ने स्वयं मेरा यजन किया।"

श्लोक 62 (12.347.62)

ततस्तस्मै वरान्प्रीतो दत्तवानस्म्यनुत्तमान् । मत्पुत्रत्वं च कल्पादौ लोकाध्यक्षत्वमेव च ॥

tatastasmai varānprīto dattavānasmyanuttamān | matputratvaṃ ca kalpādau lokādhyakṣatvameva ca

"तब मैंने प्रसन्न होकर उन्हें सर्वोत्तम वर दिए: कल्प के आदि में मेरा पुत्र होना और लोकों का अध्यक्ष होना,"

श्लोक 63 (12.347.63)

अहंकारकृतं चैव नामपर्यायवाचकम् । त्वया कृतां च मर्यादां नातिक्रंस्यति कश्चन ॥

ahaṃkārakṛtaṃ caiva nāmaparyāyavācakam | tvayā kṛtāṃ ca maryādāṃ nātikraṃsyati kaścana

"और अहंकार से रचा हुआ नामों और उनके पर्यायों का व्यवहार भी। तुम्हारी बाँधी हुई मर्यादा को कोई नहीं लाँघेगा।"

श्लोक 64 (12.347.64)

त्वं चैव वरदो ब्रह्मन्वरेप्सूनां भविष्यसि । सुरासुरगणानां च ऋषीणां च तपोधन ॥

tvaṃ caiva varado brahmanvarepsūnāṃ bhaviṣyasi | surāsuragaṇānāṃ ca ṛṣīṇāṃ ca tapodhana

"और हे ब्रह्मन्! तुम वर चाहने वालों को वर देने वाले होगे: सुर-असुरों के गणों के, ऋषियों के, हे तपोधन,"

श्लोक 65 (12.347.65)

पितृणां च महाभाग सततं संशितव्रत । विविधानां च भूतानां त्वमुपास्यो भविष्यसि ॥

pitṛṇāṃ ca mahābhāga satataṃ saṃśitavrata | vividhānāṃ ca bhūtānāṃ tvamupāsyo bhaviṣyasi

"और पितरों के भी, हे महाभाग, दृढ़ व्रत वाले! तुम अनेक प्रकार के प्राणियों के उपास्य होगे।"

श्लोक 66 (12.347.66)

प्रादुर्भावगतश्चाहं सुरकार्येषु नित्यदा । अनुशास्यस्त्वया ब्रह्मन्नियोज्यश्च सुतो यथा ॥

prādurbhāvagataścāhaṃ surakāryeṣu nityadā | anuśāsyastvayā brahmanniyojyaśca suto yathā

"देवकार्यों में मैं सदा अवतार लेकर प्रकट होता हूँ; हे ब्रह्मन्! तुम मुझे पुत्र की भाँति अनुशासन दोगे और आज्ञा दे सकोगे।"

श्लोक 67 (12.347.67)

एतांश्चान्यांश्च रुचिरान्ब्रह्मणेऽमिततेजसे । एवं रुद्राय मनवे इन्द्रायामिततेजसे । अहं दत्त्वा वरान्प्रीतो निवृत्तिपरमोऽभवम् ॥

etāṃścānyāṃśca rucirānbrahmaṇe'mitatejase | evaṃ rudrāya manave indrāyāmitatejase | ahaṃ dattvā varānprīto nivṛttiparamo'bhavam

"ब्रह्मा को, जिनका तेज अपार है, ये और अन्य मनोहर वर देकर, वैसे ही रुद्र, मनु और अपार तेज वाले इन्द्र को भी देकर, मैं प्रसन्न होकर निवृत्ति में परायण हो गया।"

श्लोक 68 (12.347.68)

निर्वाणं सर्वधर्माणां निवृत्तिः परमा स्मृता । तस्मान्निवृत्तिमापन्नश्चरेत्सर्वाङ्गनिर्वृतः ॥

nirvāṇaṃ sarvadharmāṇāṃ nivṛttiḥ paramā smṛtā | tasmānnivṛttimāpannaścaretsarvāṅganirvṛtaḥ

"निवृत्ति सब धर्मों का निर्वाण और परम (लक्ष्य) कही गई है; इसलिए निवृत्ति को प्राप्त होकर सब अंगों से शान्त होकर विचरना चाहिए।"

श्लोक 69 (12.347.69)

विद्यासहायवन्तं मामादित्यस्थं सनातनम् । कपिलं प्राहुराचार्याः साङ्ख्यनिश्चितनिश्चयाः ॥

vidyāsahāyavantaṃ māmādityasthaṃ sanātanam | kapilaṃ prāhurācāryāḥ sāṅkhyaniścitaniścayāḥ

"विद्या के साथ रहने वाले, आदित्य में स्थित मुझ सनातन को सांख्य के निश्चित सिद्धान्त वाले आचार्य कपिल कहते हैं।"

श्लोक 70 (12.347.70)

हिरण्यगर्भो भगवानेष च्छन्दसि संस्तुतः । सोहं योगगतिर्ब्रह्मन्योगशास्त्रेषु शब्दितः ॥

hiraṇyagarbho bhagavāneṣa cchandasi saṃstutaḥ | sohaṃ yogagatirbrahmanyogaśāstreṣu śabditaḥ

"यह भगवान् हिरण्यगर्भ वेदों में स्तुत हैं; और हे ब्रह्मन्! योगशास्त्रों में जिसे योगगति कहा गया है, वह मैं ही हूँ।"

श्लोक 71 (12.347.71)

एषोऽहं व्यक्तिमाश्रित्य तिष्ठामि दिवि शाश्वतः । ततो युगसहस्रान्ते संहरिष्ये जगत्पुनः ॥

eṣo'haṃ vyaktimāśritya tiṣṭhāmi divi śāśvataḥ | tato yugasahasrānte saṃhariṣye jagatpunaḥ

"व्यक्त रूप धारण कर मैं स्वर्ग में शाश्वत स्थित हूँ। फिर हज़ार युगों के अन्त में मैं जगत् का फिर संहार करूँगा,"

श्लोक 72 (12.347.72)

कृत्वाऽऽत्मस्थानि भूतानि स्थावराणि चराणि च । एकाकी विद्यया सार्धं विहरिष्ये जगत्पुनः ॥

kṛtvā''tmasthāni bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca | ekākī vidyayā sārdhaṃ vihariṣye jagatpunaḥ

"स्थावर और जंगम प्राणियों को अपने में स्थित करके अकेला, विद्या के साथ मैं फिर जगत् में विहार करूँगा।"

श्लोक 73 (12.347.73)

ततो भूयो जगत्सर्वं करिष्यामीह विद्यया । अस्मिन्मूर्तिश्चतुर्थी या साऽसृजच्छेषमव्ययम् ॥

tato bhūyo jagatsarvaṃ kariṣyāmīha vidyayā | asminmūrtiścaturthī yā sā'sṛjaccheṣamavyayam

"फिर मैं विद्या से यहाँ पुनः सारे जगत् की रचना करूँगा। इस क्रम में जो चौथी मूर्ति है, उसने अविनाशी शेष को रचा;"

श्लोक 74 (12.347.74)

स हि संकर्षणः प्रोक्तः प्रद्युम्नः सोप्यजीजनत् । प्रद्युम्नादनिरुद्धोऽहं सर्गो मम पुनः पुनः ॥

sa hi saṃkarṣaṇaḥ proktaḥ pradyumnaḥ sopyajījanat | pradyumnādaniruddho'haṃ sargo mama punaḥ punaḥ

"वही संकर्षण कहा गया है; उसने प्रद्युम्न को उत्पन्न किया। प्रद्युम्न से अनिरुद्ध उत्पन्न होता है, जो मैं हूँ; मेरी सृष्टि बार-बार होती है।"

श्लोक 75 (12.347.75)

अनिरुद्धात्तथा ब्रह्मा तन्नाभिकमलोद्भवः । ब्रह्मणः सर्वभूतानि चराणि स्थावराणि च ॥

aniruddhāttathā brahmā tannābhikamalodbhavaḥ | brahmaṇaḥ sarvabhūtāni carāṇi sthāvarāṇi ca

"अनिरुद्ध से, उसी प्रकार, ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, जो उसकी नाभि के कमल से प्रकट होते हैं; और ब्रह्मा से सब चर-अचर प्राणी उत्पन्न होते हैं।"

श्लोक 76 (12.347.76)

एतां सृष्टिं विजानीहि कल्पादिषु पुनः पुनः । यथा सूर्यस्य गगनादुदयास्तमने इह । नष्टे पुनर्वलात्काल आनयत्यमितद्युते । तथा बलादहं पृथ्वीं सर्वभूतहिताय वै ॥

etāṃ sṛṣṭiṃ vijānīhi kalpādiṣu punaḥ punaḥ | yathā sūryasya gaganādudayāstamane iha | naṣṭe punarvalātkāla ānayatyamitadyute | tathā balādahaṃ pṛthvīṃ sarvabhūtahitāya vai

"कल्पों के आदि में बार-बार होने वाली इस सृष्टि को ऐसे जानो। हे अमित तेजस्वी! जैसे यहाँ आकाश से सूर्य का उदय और अस्त लुप्त हो जाने पर काल उन्हें फिर बलपूर्वक लौटा लाता है, वैसे ही मैं बलपूर्वक सब प्राणियों के हित के लिए पृथ्वी को लौटा लाता हूँ।"

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