शान्ति पर्व · अध्याय 348
नारायण द्वारा नारद को अपने अवतारों का वर्णन
भीष्म बताते हैं कि नारद के पूछने पर भगवान् ने अपने दस प्रादुर्भाव गिनाए: मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, बलि को नीचा दिखाने वाले वामन, दो राम, कंस से लेकर महायुद्ध तक के कर्मों वाले कृष्ण, और कलियुग में बुद्ध तथा कल्कि। फिर भगवान् अन्तर्धान हो जाते हैं और नारद बदरी में नर-नारायण के पास जाते हैं। युधिष्ठिर पूछते हैं कि ब्रह्मा को यह नारद से क्यों सुनना पड़ा; भीष्म इसकी परम्परा और इसे सुनने के फल का वर्णन करके उत्तर देते हैं। वैशम्पायन पाण्डवों की नारायण-भक्ति और व्यास के जप की बात जोड़ते हैं, और सौति शौनक के सत्र में आए ऋषियों से परमेश्वर का यजन करने का आग्रह करके नारायणीय को समाप्त करते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.348.1)
नारदः परिप्रपच्छ भगवन्तं जनार्दनम् । एकार्णवे महाघोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे ॥
nāradaḥ pariprapaccha bhagavantaṃ janārdanam | ekārṇave mahāghore naṣṭe sthāvarajaṅgame
नारद ने भगवान् जनार्दन से पूछा, उस समय के विषय में जब सब कुछ एक महाभयंकर एकार्णव हो गया था और चर-अचर सभी कुछ नष्ट हो चुका था।
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 2 (12.348.2)
शृणु नारद तत्वेन प्रादुर्भावान्महामुने । मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः । रामो रामश्च रामश्च कृष्णः कल्कीति ते दश ॥
śṛṇu nārada tatvena prādurbhāvānmahāmune | matsyaḥ kūrmo varāhaśca narasiṃho'tha vāmanaḥ | rāmo rāmaśca rāmaśca kṛṣṇaḥ kalkīti te daśa
हे महामुनि नारद, मेरे प्रादुर्भावों को यथार्थ रूप से सुनो: मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह और वामन; राम, राम और राम; कृष्ण और कल्कि। ये दस हैं।
श्लोक 3 (12.348.3)
पूर्वं मीनो भविष्यामि स्थापयिष्याम्यहं प्रजाः । लोकान्वै धारयिष्यामि मज्जमानान्महार्णवे ॥
pūrvaṃ mīno bhaviṣyāmi sthāpayiṣyāmyahaṃ prajāḥ | lokānvai dhārayiṣyāmi majjamānānmahārṇave
पहले मैं मत्स्य बनूँगा और प्रजाओं को स्थापित करूँगा; महासागर में डूबते हुए लोकों को धारण करूँगा।
श्लोक 4 (12.348.4)
द्वितीयः कूर्मरूपो मे हेमकूटनिभः स्मृतः । मन्दरं धारयिष्यामि अमृतार्थं द्विजोत्तम ॥
dvitīyaḥ kūrmarūpo me hemakūṭanibhaḥ smṛtaḥ | mandaraṃ dhārayiṣyāmi amṛtārthaṃ dvijottama
मेरा दूसरा रूप कूर्म का स्मरण किया गया है, जो स्वर्ण-शिखर के समान दीप्त है। हे द्विजोत्तम, अमृत के लिए मैं मन्दर पर्वत को धारण करूँगा।
श्लोक 5 (12.348.5)
मग्नां महार्णवे घोरे भाराक्रान्तां भुवं पुनः । ततो बलादहं विद्वन्सर्वभूतहिताय वै ॥
magnāṃ mahārṇave ghore bhārākrāntāṃ bhuvaṃ punaḥ | tato balādahaṃ vidvansarvabhūtahitāya vai
महाभयंकर महासागर में डूबी हुई, भार से दबी हुई पृथ्वी को फिर; तब हे विद्वान्, बल से, सब प्राणियों के हित के लिए,
श्लोक 6 (12.348.6)
सत्वैराक्रान्तसर्वाङ्गां नष्टां सागरमेखलाम् । आनयिष्यामि स्वं स्थानं वाराहं रूपमास्थितः । हिरण्याक्षं हनिष्यामि दैतेयं बलगर्वितम् ॥
satvairākrāntasarvāṅgāṃ naṣṭāṃ sāgaramekhalām | ānayiṣyāmi svaṃ sthānaṃ vārāhaṃ rūpamāsthitaḥ | hiraṇyākṣaṃ haniṣyāmi daiteyaṃ balagarvitam
जिसके सारे अंग प्राणियों के भार से दब गए हैं, जो नष्ट हो गई है और जिसकी मेखला समुद्र है, उसे मैं वराह का रूप धारण करके उसके अपने स्थान पर ले आऊँगा। बल के घमण्ड में चूर दैत्य हिरण्याक्ष को मैं मारूँगा।
श्लोक 7 (12.348.7)
नारसिंहं वपुः कृत्वा हिरण्यकशिपुं पुनः । सुरकार्ये हनिष्यामि यज्ञघ्नं दितिनन्दनम् ॥
nārasiṃhaṃ vapuḥ kṛtvā hiraṇyakaśipuṃ punaḥ | surakārye haniṣyāmi yajñaghnaṃ ditinandanam
नृसिंह का शरीर धारण करके मैं देवताओं के कार्य के लिए यज्ञ का विघ्न करने वाले दिति-पुत्र हिरण्यकशिपु को फिर मारूँगा।
श्लोक 8 (12.348.8)
विरोचनस्य बलवान्बलिः पुत्रो महासुरः । अवध्यः सर्वलोकानां सदेवासुररक्षसाम् । भविष्यति स शक्रं च स्वराज्याच्च्यावयिष्यति ॥
virocanasya balavānbaliḥ putro mahāsuraḥ | avadhyaḥ sarvalokānāṃ sadevāsurarakṣasām | bhaviṣyati sa śakraṃ ca svarājyāccyāvayiṣyati
विरोचन का पुत्र बलवान् महान् असुर बलि समस्त लोकों के लिए, देवता, असुर और राक्षसों सहित, अवध्य होगा; और वह इन्द्र को उसके अपने राज्य से च्युत कर देगा।
श्लोक 9 (12.348.9)
त्रैलोक्येऽपहृते तेन विमुखे च शचीपतौ । अदित्यां द्वादशः पुत्रः संभविष्यामि कश्यपात् ॥
trailokye'pahṛte tena vimukhe ca śacīpatau | adityāṃ dvādaśaḥ putraḥ saṃbhaviṣyāmi kaśyapāt
जब उसने तीनों लोक छीन लिए होंगे और शची के स्वामी इन्द्र विमुख हो गए होंगे, तब मैं कश्यप से अदिति के बारहवें पुत्र के रूप में जन्म लूँगा।
श्लोक 10 (12.348.10)
वटुर्गत्वा यज्ञसदः स्तूयमानो द्विजोत्तमैः । यज्ञस्तुतिं करिष्यामि श्रुत्वा प्रीतो भवेद्बलिः ॥
vaṭurgatvā yajñasadaḥ stūyamāno dvijottamaiḥ | yajñastutiṃ kariṣyāmi śrutvā prīto bhavedbaliḥ
ब्रह्मचारी बालक बनकर मैं यज्ञशाला में जाऊँगा, जहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मण उसकी स्तुति कर रहे होंगे; वहाँ मैं यज्ञ की स्तुति करूँगा, जिसे सुनकर बलि प्रसन्न हो जाएगा।
श्लोक 11 (12.348.11)
किमिच्छसि वटो ब्रूहीत्युक्तो याचे महद्वरम् । दीयतां त्रिपदीमात्रमिति याचे महासुरम् ॥
kimicchasi vaṭo brūhītyukto yāce mahadvaram | dīyatāṃ tripadīmātramiti yāce mahāsuram
"बटु, तुम क्या चाहते हो? कहो," ऐसा कहे जाने पर मैं एक बड़ा वर माँगूँगा: "तीन पग भूमि दे दी जाए," इस प्रकार मैं उस महान् असुर से याचना करूँगा।
श्लोक 12 (12.348.12)
स दद्यान्मयि संप्रीतः प्रतिषिद्धश्च मन्त्रिभिः । यावज्जलं हस्तगतं त्रिभिर्विक्रमणैर्युतम् ॥
sa dadyānmayi saṃprītaḥ pratiṣiddhaśca mantribhiḥ | yāvajjalaṃ hastagataṃ tribhirvikramaṇairyutam
मंत्रियों के रोकने पर भी वह मुझसे प्रसन्न होकर दान देगा: जब तक जल उसके हाथ में है, तब तक तीन पगों से युक्त वह दान।
श्लोक 13 (12.348.13)
ततो राज्यं प्रदास्यामि शक्रायामिततेजसे । देवताः स्थापयिष्यामि स्वस्वस्थानेषु नारद ॥
tato rājyaṃ pradāsyāmi śakrāyāmitatejase | devatāḥ sthāpayiṣyāmi svasvasthāneṣu nārada
तब मैं अपार तेज वाले इन्द्र को राज्य दूँगा और हे नारद, देवताओं को उनके अपने-अपने स्थानों पर प्रतिष्ठित करूँगा।
श्लोक 14 (12.348.14)
बलिं चैव करिष्यामि पातालतलवासिनम् । दानवं च बलिश्रेष्ठमबध्यं सर्वदैवतैः ॥
baliṃ caiva kariṣyāmi pātālatalavāsinam | dānavaṃ ca baliśreṣṭhamabadhyaṃ sarvadaivataiḥ
और मैं बलि को पाताल-तल का निवासी बना दूँगा, उस दानव को जो बलवानों में श्रेष्ठ है और जिसे कोई भी देवता नहीं मार सकता।
श्लोक 15 (12.348.15)
त्रेतायुगे भविष्यामि रामो भृगुकुलोद्वहः । क्षत्रं चोत्सादयिष्यामि समृद्धबलवाहनम् ॥
tretāyuge bhaviṣyāmi rāmo bhṛgukulodvahaḥ | kṣatraṃ cotsādayiṣyāmi samṛddhabalavāhanam
त्रेतायुग में मैं भृगुकुल का उद्धारक राम होऊँगा और सेना तथा वाहनों से समृद्ध क्षत्रिय वर्ग का उन्मूलन करूँगा।
श्लोक 16 (12.348.16)
संधौ तु समनुप्राप्ते त्रेतायां द्वापरस्य च । रामो दाशरथिर्भूत्वा भविष्यामि जगत्पतिः ॥
saṃdhau tu samanuprāpte tretāyāṃ dvāparasya ca | rāmo dāśarathirbhūtvā bhaviṣyāmi jagatpatiḥ
त्रेता और द्वापर की सन्धि आने पर मैं दशरथ-पुत्र राम होकर जगत् का स्वामी होऊँगा।
श्लोक 17 (12.348.17)
त्रितोपघाताद्वैरूप्यमेकतोऽथ द्वितस्तथा । प्राप्स्येते वानरत्वं हि प्रजापतिसुतावृषी ॥
tritopaghātādvairūpyamekato'tha dvitastathā | prāpsyete vānaratvaṃ hi prajāpatisutāvṛṣī
त्रित के द्वारा किए गए अपकार के कारण प्रजापति के पुत्र दो ऋषि, एकत और द्वित, कुरूपता को प्राप्त होकर वानर-भाव को पाएँगे।
श्लोक 18 (12.348.18)
तयोर्ये त्वन्वये जाता भविष्यन्ति वनौकसः । महाबला महावीर्याः शक्रतुल्यपराक्रमाः ॥
tayorye tvanvaye jātā bhaviṣyanti vanaukasaḥ | mahābalā mahāvīryāḥ śakratulyaparākramāḥ
उन दोनों के वंश में जो उत्पन्न होंगे, वे वनवासी होंगे, महाबली, महापराक्रमी और इन्द्र के समान पराक्रम वाले।
श्लोक 19 (12.348.19)
ते सहाया भविष्यन्ति सुरकार्ये मम द्विज । ततो रक्षःपतिं घोरं पुलस्त्यकुलपांसनम् । हनिष्ये रावणं रौद्रं सगणं लोककण्टकम् ॥
te sahāyā bhaviṣyanti surakārye mama dvija | tato rakṣaḥpatiṃ ghoraṃ pulastyakulapāṃsanam | haniṣye rāvaṇaṃ raudraṃ sagaṇaṃ lokakaṇṭakam
हे ब्राह्मण, वे देवताओं के कार्य में मेरे सहायक होंगे। तब मैं राक्षसों के भयंकर स्वामी, पुलस्त्य-कुल के कलंक, रौद्र रावण को, उसके गणों सहित, जो लोक का काँटा है, मारूँगा।
श्लोक 20 (12.348.20)
विभीषणाय दास्यामि राज्यं तस्य यथाक्रमम् । अयोध्यावासिनः सर्वान्नेष्येऽहं लोकमव्ययम् ॥
vibhīṣaṇāya dāsyāmi rājyaṃ tasya yathākramam | ayodhyāvāsinaḥ sarvānneṣye'haṃ lokamavyayam
मैं विभीषण को उसका राज्य यथाक्रम दूँगा; और अयोध्या के सब निवासियों को मैं अविनाशी लोक में ले जाऊँगा।
श्लोक 21 (12.348.21)
द्वापरस्य कलेश्चैव संधौ पार्यवसानिके । प्रादुर्भावः कंसहेतोर्मथुरायां भविष्यति ॥
dvāparasya kaleścaiva saṃdhau pāryavasānike | prādurbhāvaḥ kaṃsahetormathurāyāṃ bhaviṣyati
द्वापर और कलि की अन्तिम सन्धि में कंस के कारण मथुरा में मेरा प्रादुर्भाव होगा।
श्लोक 22 (12.348.22)
तत्राहं दानवान्हत्वा सुबहून्देवकण्टकान् । कुशस्थलीं करिष्यामि निवासं द्वारकां पुरीम् ॥
tatrāhaṃ dānavānhatvā subahūndevakaṇṭakān | kuśasthalīṃ kariṣyāmi nivāsaṃ dvārakāṃ purīm
वहाँ मैं देवताओं के काँटे बने हुए बहुत से दानवों को मारकर कुशस्थली को, द्वारका नगरी को, अपना निवास बनाऊँगा।
श्लोक 23 (12.348.23)
वसानस्तत्र वै पुर्यामदितेर्विप्रियंकरम् । हनिष्ये नरकं भौमं मुरं पीठं च दानवम् ॥
vasānastatra vai puryāmaditervipriyaṃkaram | haniṣye narakaṃ bhaumaṃ muraṃ pīṭhaṃ ca dānavam
उस पुरी में रहते हुए मैं अदिति का अहित करने वाले भूमि-पुत्र नरक को और मुर तथा पीठ नामक दानवों को मारूँगा।
श्लोक 24 (12.348.24)
प्राग्ज्योतिषं पुरं रम्यं नानाधनसमन्वितम् । कुशस्थलीं नयिष्यामि हत्वा वै दानवोत्तमान् ॥
prāgjyotiṣaṃ puraṃ ramyaṃ nānādhanasamanvitam | kuśasthalīṃ nayiṣyāmi hatvā vai dānavottamān
दानवों में श्रेष्ठों को मारकर मैं नाना धन से भरी हुई रमणीय प्राग्ज्योतिष नगरी को कुशस्थली में ले जाऊँगा।
श्लोक 25 (12.348.25)
कृकलासभूतं च नृगं मोचयिष्ये च वै पुनः ॥
kṛkalāsabhūtaṃ ca nṛgaṃ mocayiṣye ca vai punaḥ
और मैं गिरगिट बने हुए नृग को भी मुक्त करूँगा।
श्लोक 26 (12.348.26)
तत्र पौत्रनिमित्तेन गत्वा वै शोणितं पुरम् । बाणस्य च पुरं गत्वा करिष्ये कदनं महत् ॥
tatra pautranimittena gatvā vai śoṇitaṃ puram | bāṇasya ca puraṃ gatvā kariṣye kadanaṃ mahat
वहाँ पौत्र के कारण मैं शोणितपुर जाऊँगा और बाण की नगरी में जाकर भारी संहार करूँगा।
श्लोक 27 (12.348.27)
शंकरं च महासेनं बाणप्रियहिते रतम् । पराजेष्याम्यथोद्युक्तौ देवौ लोकनमस्कृतौ ॥
śaṃkaraṃ ca mahāsenaṃ bāṇapriyahite ratam | parājeṣyāmyathodyuktau devau lokanamaskṛtau
बाण के प्रिय और हित में लगे हुए शंकर और महासेन को, लोक से नमस्कृत उन दोनों देवों को, जब वे उद्यत होंगे, तब मैं पराजित करूँगा।
श्लोक 28 (12.348.28)
ततः सुतं बलेर्जित्वा बाणं बाहुसहस्रिणम् । विनाशयिष्यामि ततः सर्वान्सौभनिवासिनः ॥
tataḥ sutaṃ balerjitvā bāṇaṃ bāhusahasriṇam | vināśayiṣyāmi tataḥ sarvānsaubhanivāsinaḥ
फिर बलि के पुत्र हज़ार भुजाओं वाले बाण को जीतकर मैं सौभ नगर के सब निवासियों का नाश करूँगा।
श्लोक 29 (12.348.29)
यः कालयवनः ख्यातो गर्गतेजोभिसंवृतः । भविष्यति वधस्तस्य मत्त एव द्विजोत्तम ॥
yaḥ kālayavanaḥ khyāto gargatejobhisaṃvṛtaḥ | bhaviṣyati vadhastasya matta eva dvijottama
जो कालयवन नाम से प्रसिद्ध है और गर्ग के तेज से घिरा हुआ है, हे द्विजोत्तम, उसका वध मुझसे ही होगा।
श्लोक 30 (12.348.30)
कंसं केशिं तथा क्रूरमरिष्टं च महासुरम् । चाणूरं च महावीर्यं मुष्टिकं च महाबलम् ॥
kaṃsaṃ keśiṃ tathā krūramariṣṭaṃ ca mahāsuram | cāṇūraṃ ca mahāvīryaṃ muṣṭikaṃ ca mahābalam
कंस और केशी, क्रूर और महान् असुर अरिष्ट, महापराक्रमी चाणूर और महाबली मुष्टिक,
श्लोक 31 (12.348.31)
प्रलम्बं धेनुकं चैव अरिष्टं वृषरूपिणम् । कालीयं च वशे कृत्वा यमुनाया महाह्रदे ॥
pralambaṃ dhenukaṃ caiva ariṣṭaṃ vṛṣarūpiṇam | kālīyaṃ ca vaśe kṛtvā yamunāyā mahāhrade
प्रलम्ब और धेनुक, और बैल के रूप वाले अरिष्ट को; और यमुना के महान् कुण्ड में कालिय को वश में करके,
श्लोक 32 (12.348.32)
गोकुलेषु ततः पश्चाद्भवार्थे तु महागिरिम् । सप्तरात्रं धरिष्यामि वर्षमाणे तु वासवे ॥
gokuleṣu tataḥ paścādbhavārthe tu mahāgirim | saptarātraṃ dhariṣyāmi varṣamāṇe tu vāsave
फिर उसके बाद गोकुलों में उनके कल्याण के लिए, जब इन्द्र वर्षा कर रहे होंगे, मैं सात रात तक महान् पर्वत को धारण करूँगा।
श्लोक 33 (12.348.33)
अपक्रान्ते ततो वर्षे गिरिमूर्ध्नि व्यवस्थितः । इन्द्रेण सह संवादं करिष्यामि तदा द्विज । लघ्वाच्छिद्य धनं सर्वं वासुदेवं च पौण्ड्रकम् ॥
apakrānte tato varṣe girimūrdhni vyavasthitaḥ | indreṇa saha saṃvādaṃ kariṣyāmi tadā dvija | laghvācchidya dhanaṃ sarvaṃ vāsudevaṃ ca pauṇḍrakam
वर्षा बीत जाने पर पर्वत के शिखर पर खड़े होकर, हे द्विज, मैं तब इन्द्र के साथ संवाद करूँगा; सारा धन सहज ही छीनकर, और वासुदेव कहलाने वाले पौण्ड्रक को भी।
श्लोक 34 (12.348.34)
जरासन्धश्च बलवान्सर्वराजविरोधनः । भविष्यत्यसुरः स्फीतो भूमिपालो गिरिव्रजे ॥
jarāsandhaśca balavānsarvarājavirodhanaḥ | bhaviṣyatyasuraḥ sphīto bhūmipālo girivraje
और बलवान् जरासन्ध, जो सब राजाओं का विरोधी है, गिरिव्रज में एक अहंकार से फूला हुआ असुर-स्वभाव का भूपति होगा।
श्लोक 35 (12.348.35)
मम बुद्धिपरिस्पन्दाद्वधस्तस्य भविष्यति । शिशुपालं वधिष्यामि यज्ञे धर्मसुतस्य वै ॥
mama buddhiparispandādvadhastasya bhaviṣyati | śiśupālaṃ vadhiṣyāmi yajñe dharmasutasya vai
मेरी बुद्धि के एक स्पन्दन से ही उसका वध होगा। धर्मराज के पुत्र के यज्ञ में मैं शिशुपाल का वध करूँगा।
श्लोक 36 (12.348.36)
दुर्योधनापराधेन युधिष्ठिरगुणेन च । समागतेषु बलिषु पृथिव्यां सर्वराजसु ॥
duryodhanāparādhena yudhiṣṭhiraguṇena ca | samāgateṣu baliṣu pṛthivyāṃ sarvarājasu
दुर्योधन के अपराध से और युधिष्ठिर के गुणों से, जब पृथ्वी के सब बलवान् राजा एकत्र हो चुके होंगे,
श्लोक 37 (12.348.37)
वासविः सुसहायो वै मम त्वेको भविष्यति । युधिष्ठिरं स्थापयिष्ये स्वराज्ये भ्रातृभिः सह ॥
vāsaviḥ susahāyo vai mama tveko bhaviṣyati | yudhiṣṭhiraṃ sthāpayiṣye svarājye bhrātṛbhiḥ saha
इन्द्र का पुत्र अर्जुन अकेला ही मेरा उत्तम सहायक होगा। मैं युधिष्ठिर को भाइयों सहित उनके अपने राज्य में प्रतिष्ठित करूँगा।
श्लोक 38 (12.348.38)
एवं लोका वदिष्यन्ति नरनारायणावृषी । उद्युक्तौ दहतः क्षत्रं लोककार्यार्थमीश्वरौ ॥
evaṃ lokā vadiṣyanti naranārāyaṇāvṛṣī | udyuktau dahataḥ kṣatraṃ lokakāryārthamīśvarau
तब लोग कहेंगे: "ऋषि नर और नारायण, ये दोनों ईश्वर, लोक के कार्य के लिए उद्यत होकर क्षत्रियों को भस्म कर रहे हैं।"
श्लोक 39 (12.348.39)
शस्त्रैर्निपतिताः सर्वे नृपा यास्यन्ति वै दिवम् ॥
śastrairnipatitāḥ sarve nṛpā yāsyanti vai divam
सब राजा शस्त्रों से मारे जाकर स्वर्ग को जाएँगे।
श्लोक 40 (12.348.40)
कृत्वा भारावतरणं वसुधाया यथेप्सितम् । सर्वसात्वतमुख्यानां द्वारकायाश्च सत्तम ॥
kṛtvā bhārāvataraṇaṃ vasudhāyā yathepsitam | sarvasātvatamukhyānāṃ dvārakāyāśca sattama
पृथ्वी का भार यथेच्छ उतार चुकने के बाद, हे सत्तम, सब सात्वत प्रमुखों और द्वारका के लिए,
श्लोक 41 (12.348.41)
करिष्ये प्रलयं घोरमात्मज्ञानाभिसंश्रयः । द्वारकामात्मसात्कृत्वा समुद्रं गमयाम्यहम् ॥
kariṣye pralayaṃ ghoramātmajñānābhisaṃśrayaḥ | dvārakāmātmasātkṛtvā samudraṃ gamayāmyaham
मैं आत्मज्ञान का आश्रय लेकर भयंकर प्रलय करूँगा। द्वारका को अपने में लीन करके मैं उसे समुद्र में भेज दूँगा।
श्लोक 42 (12.348.42)
ततः कलियुगस्यादौ द्विजराजतरुं श्रितः । भाषया मागधेनैव धर्मराजगृहे वसन् ॥
tataḥ kaliyugasyādau dvijarājataruṃ śritaḥ | bhāṣayā māgadhenaiva dharmarājagṛhe vasan
फिर कलियुग के आरम्भ में द्विजराज के वृक्ष का आश्रय लेकर, मगध की भाषा में, धर्मराज के घर में रहता हुआ,
श्लोक 43 (12.348.43)
काषायवस्त्रसंवीतो मुण्डितः शुक्लदन्तवान् । शुद्धोदनसुतो बुद्धो मोहयिष्यामि मानवान् ॥
kāṣāyavastrasaṃvīto muṇḍitaḥ śukladantavān | śuddhodanasuto buddho mohayiṣyāmi mānavān
गेरुए वस्त्र में लिपटा हुआ, मुण्डित सिर और श्वेत दाँतों वाला, शुद्धोदन का पुत्र बुद्ध बनकर मैं मनुष्यों को मोहित करूँगा।
श्लोक 44 (12.348.44)
शूद्राः श्राद्धेषु भुज्यन्ते मयि बुद्धत्वमागते । भविष्यन्ति नराः सर्वे बुद्धाः काषायसंवृताः ॥
śūdrāḥ śrāddheṣu bhujyante mayi buddhatvamāgate | bhaviṣyanti narāḥ sarve buddhāḥ kāṣāyasaṃvṛtāḥ
जब मैं बुद्धत्व को प्राप्त हो जाऊँगा, तब श्राद्धों में शूद्रों को भोजन कराया जाएगा और सब मनुष्य गेरुआ वस्त्र ओढ़े हुए बुद्ध हो जाएँगे।
श्लोक 45 (12.348.45)
अनध्याया भविष्यन्ति विप्रा यागविवर्जिताः । अग्निहोत्राणि सीदन्ति गुरुपूजा च नश्यति ॥
anadhyāyā bhaviṣyanti viprā yāgavivarjitāḥ | agnihotrāṇi sīdanti gurupūjā ca naśyati
ब्राह्मण वेदाध्ययन छोड़ देंगे और यज्ञ से रहित होंगे; अग्निहोत्र क्षीण हो जाएँगे और गुरुजनों की पूजा नष्ट हो जाएगी।
श्लोक 46 (12.348.46)
न शृण्वन्ति पितुः पुत्रा न स्नुषा नैव भ्रातरः । न पौत्रा न कलत्रा वा वर्तन्तेऽप्यधमोत्तमाः ॥
na śṛṇvanti pituḥ putrā na snuṣā naiva bhrātaraḥ | na pautrā na kalatrā vā vartante'pyadhamottamāḥ
पुत्र पिता की नहीं सुनेंगे, न पुत्रवधुएँ, न भाई; न पौत्र और न पत्नियाँ ही; छोटे और बड़े सभी ऐसा ही आचरण करेंगे।
श्लोक 47 (12.348.47)
एवंभूतं जगत्सर्वं श्रुतिस्मृतिविवर्जितम् । भविष्यति कलौ पूर्णे ह्यशुद्धो धर्मसंकरः ॥
evaṃbhūtaṃ jagatsarvaṃ śrutismṛtivivarjitam | bhaviṣyati kalau pūrṇe hyaśuddho dharmasaṃkaraḥ
इस प्रकार का सारा जगत् श्रुति और स्मृति से रहित हो जाएगा; कलियुग के पूर्ण होने पर अशुद्ध धर्म-संकर होगा।
श्लोक 48 (12.348.48)
तेषां सकाशाद्धर्मज्ञा देवब्रह्मविदो नराः । भविष्यन्ति ह्यशुद्धाश्च न्यायच्छलविभाषिणः ॥
teṣāṃ sakāśāddharmajñā devabrahmavido narāḥ | bhaviṣyanti hyaśuddhāśca nyāyacchalavibhāṣiṇaḥ
उनके संसर्ग से धर्म को जानने वाले और देवताओं तथा ब्रह्म को जानने वाले लोग भी अशुद्ध हो जाएँगे और न्याय की आड़ में छल-भरी बातें कहने वाले बन जाएँगे।
श्लोक 49 (12.348.49)
ये नष्टधर्मश्रोतारस्ते समाः पापनिश्चये । तस्मादेते न संभाष्या न स्पृश्याश्च हितार्थिभिः । उपवासत्रयं कुर्यात्तत्संसर्गविशुद्धये ॥
ye naṣṭadharmaśrotāraste samāḥ pāpaniścaye | tasmādete na saṃbhāṣyā na spṛśyāśca hitārthibhiḥ | upavāsatrayaṃ kuryāttatsaṃsargaviśuddhaye
जो इस नष्ट हुए धर्म को सुनने वाले हैं, वे पाप के निश्चय में उन्हीं के समान हैं। इसलिए अपना हित चाहने वालों को न इनसे बात करनी चाहिए, न इन्हें छूना चाहिए। उनके संसर्ग की शुद्धि के लिए तीन दिन का उपवास करना चाहिए।
श्लोक 50 (12.348.50)
ततः कलियुगस्यान्ते ब्राह्मणो हरिपिङ्गलः । कल्किर्विष्णुयशः पुत्रो याज्ञवल्क्यः पुरोहितः ॥
tataḥ kaliyugasyānte brāhmaṇo haripiṅgalaḥ | kalkirviṣṇuyaśaḥ putro yājñavalkyaḥ purohitaḥ
फिर कलियुग के अन्त में हरिपिंगल वर्ण के ब्राह्मण कल्कि होंगे, जो विष्णुयश के पुत्र होंगे और जिनके पुरोहित याज्ञवल्क्य होंगे।
श्लोक 51 (12.348.51)
तस्मिन्नाशे वनग्रामे तिष्ठेत्सोन्नासिमो हयः । सहया ब्राह्मणाः सर्वे तैरहं सहितः पुनः । म्लेच्छानुत्सादयिष्यामि पाषण्डांश्चैव सर्वशः ॥
tasminnāśe vanagrāme tiṣṭhetsonnāsimo hayaḥ | sahayā brāhmaṇāḥ sarve tairahaṃ sahitaḥ punaḥ | mlecchānutsādayiṣyāmi pāṣaṇḍāṃścaiva sarvaśaḥ
उस प्रदेश में, वन के एक गाँव में, ऊपर को नाक उठाए हुए वह घोड़ा खड़ा होगा। घोड़ों सहित सब ब्राह्मणों के साथ, उनके संग मैं फिर म्लेच्छों का और सब पाखण्डियों का उन्मूलन करूँगा।
श्लोक 52 (12.348.52)
पाषण्डश्च कलौ तत्र माययैव विनश्यते । पाषण्डकांश्चैव हत्वा तत्रान्तं प्रलये ह्यहम् ॥
pāṣaṇḍaśca kalau tatra māyayaiva vinaśyate | pāṣaṇḍakāṃścaiva hatvā tatrāntaṃ pralaye hyaham
कलियुग में वहाँ पाखण्ड माया से ही नष्ट हो जाएगा; और पाखण्डियों को मारकर मैं वहीं प्रलय में अन्त कर दूँगा।
श्लोक 53 (12.348.53)
ततः पश्चाद्भविष्यामि यज्ञेषु निरतः सदा । राज्यं प्रशासति पुनः कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरे ॥
tataḥ paścādbhaviṣyāmi yajñeṣu nirataḥ sadā | rājyaṃ praśāsati punaḥ kuntīputra yudhiṣṭhire
उसके बाद, जब कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर फिर राज्य का शासन करेंगे, तब मैं सदा यज्ञों में लगा रहूँगा।
श्लोक 54 (12.348.54)
कर्माण्यपरिमेयानि चतुर्मूर्तिधरो ह्यहम् । कृत्वा लोकान्गमिष्यामि स्वानहं ब्रह्मसत्कृतान् ॥
karmāṇyaparimeyāni caturmūrtidharo hyaham | kṛtvā lokāngamiṣyāmi svānahaṃ brahmasatkṛtān
चतुर्मूर्ति धारण करने वाला मैं असंख्य कर्म करके ब्रह्मा से सम्मानित अपने लोकों को जाऊँगा।
श्लोक 55 (12.348.55)
हंसः कूर्मश्च मत्स्यश्च प्रादुर्भावा द्विजोत्तम । वराहो नरसिंहश्च वामनो राम एव च । रामो दाशरथिश्चैव सात्वतः कल्किरेव च ॥
haṃsaḥ kūrmaśca matsyaśca prādurbhāvā dvijottama | varāho narasiṃhaśca vāmano rāma eva ca | rāmo dāśarathiścaiva sātvataḥ kalkireva ca
हे द्विजोत्तम, हंस, कूर्म और मत्स्य मेरे प्रादुर्भाव हैं; वराह, नृसिंह, वामन और राम; दशरथ-पुत्र राम; सात्वत (कृष्ण); और कल्कि।
श्लोक 56 (12.348.56)
यदा वेदश्रुतिर्नष्टा मया प्रत्याहृता पुनः । सवेदाः सश्रुतीकाश्च कृताः पूर्वं कृते युगे ॥
yadā vedaśrutirnaṣṭā mayā pratyāhṛtā punaḥ | savedāḥ saśrutīkāśca kṛtāḥ pūrvaṃ kṛte yuge
जब वेद-श्रुति नष्ट हो गई थी, तब मैंने उसे फिर वापस ला दिया; पहले कृतयुग में लोग वेदों और श्रुति से युक्त बनाए गए थे।
श्लोक 57 (12.348.57)
अतिक्रान्ताः पुराणेषु श्रुतास्ते यदि वा क्वचित् । अतिक्रान्ताश्च बहवः प्रादुर्भावा ममोत्तमाः ॥
atikrāntāḥ purāṇeṣu śrutāste yadi vā kvacit | atikrāntāśca bahavaḥ prādurbhāvā mamottamāḥ
जो प्रादुर्भाव बीत चुके हैं, वे पुराणों में कहीं-कहीं सुने जाते हैं; और मेरे बहुत-से उत्तम प्रादुर्भाव बीत चुके हैं।
श्लोक 58 (12.348.58)
लोककार्याणि कृत्वा च पुनः स्वां प्रकृतिं गताः । न ह्येतद्ब्रह्मणा प्राप्तमीदृशं मम दर्शनम् ॥
lokakāryāṇi kṛtvā ca punaḥ svāṃ prakṛtiṃ gatāḥ | na hyetadbrahmaṇā prāptamīdṛśaṃ mama darśanam
लोक के कार्य पूरे करके वे फिर अपने स्वरूप को लौट गए। मेरा ऐसा दर्शन ब्रह्मा को भी प्राप्त नहीं हुआ है,
श्लोक 59 (12.348.59)
यत्त्वया प्राप्तमद्येह एकान्तगतबुद्धिना । एतत्ते सर्वमाख्यातं ब्रह्मन्भक्तिमतो मया । पुराणं च भविष्यं च सरहस्यं च सत्तम ॥
yattvayā prāptamadyeha ekāntagatabuddhinā | etatte sarvamākhyātaṃ brahmanbhaktimato mayā | purāṇaṃ ca bhaviṣyaṃ ca sarahasyaṃ ca sattama
जैसा आज तुमने यहाँ एकाग्र बुद्धि से पाया है। हे ब्राह्मण, यह सब मैंने तुम भक्त से कह दिया: भूत और भविष्य, रहस्य सहित, हे सत्तम।
भीष्म उवाच
श्लोक 60 (12.348.60)
एवं स भगवान्देवो विश्वमूर्तिधरोऽव्ययः । एतावदुक्त्वा वचनं तत्रैवान्तर्दधे पुनः ॥
evaṃ sa bhagavāndevo viśvamūrtidharo'vyayaḥ | etāvaduktvā vacanaṃ tatraivāntardadhe punaḥ
इतना कहकर विश्व-मूर्तिधारी, अविनाशी भगवान् देव उसी स्थान पर फिर अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 61 (12.348.61)
नारदोऽपि महातेजाः प्राप्यानुग्रहमीप्सितम् । नरनारायणौ द्रष्टुं बदर्याश्रममाद्रवत् ॥
nārado'pi mahātejāḥ prāpyānugrahamīpsitam | naranārāyaṇau draṣṭuṃ badaryāśramamādravat
महातेजस्वी नारद भी इच्छित अनुग्रह पाकर नर और नारायण के दर्शन के लिए बदरी-आश्रम की ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 62 (12.348.62)
इदं महोपनिषदं चतुर्वेदसमन्वितम् । सांख्ययोगकृतं तेन पञ्चरात्रानुशब्दितम् ॥
idaṃ mahopaniṣadaṃ caturvedasamanvitam | sāṃkhyayogakṛtaṃ tena pañcarātrānuśabditam
चारों वेदों से युक्त, सांख्य और योग से रचित तथा पाञ्चरात्र के अनुसार उद्घोषित इस महान् उपनिषद् को,
श्लोक 63 (12.348.63)
नारायणमुखोदीतं नारदोऽश्रावयत्पुनः । ब्रह्मणः सदने तात यथादृष्टं यथाश्रुतम् ॥
nārāyaṇamukhodītaṃ nārado'śrāvayatpunaḥ | brahmaṇaḥ sadane tāta yathādṛṣṭaṃ yathāśrutam
जो नारायण के मुख से निकला था, उसे नारद ने ब्रह्मा के लोक में, हे तात, जैसा देखा था और जैसा सुना था, वैसा ही फिर सुनाया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 64 (12.348.64)
एतदाश्चर्यभूतं हि माहात्म्यं तस्य धीमतः । किं वै ब्रह्मा न जानीते यतः शुश्राव नारदात् ॥
etadāścaryabhūtaṃ hi māhātmyaṃ tasya dhīmataḥ | kiṃ vai brahmā na jānīte yataḥ śuśrāva nāradāt
उन बुद्धिमान् की यह महिमा सचमुच आश्चर्यजनक है। क्या ब्रह्मा इसे नहीं जानते कि उन्होंने इसे नारद से सुना?
श्लोक 65 (12.348.65)
पितामहोऽपि भगवांस्तस्माद्देवादनन्तरः । कथं स न विजानीयात्प्रभावममितौजसः ॥
pitāmaho'pi bhagavāṃstasmāddevādanantaraḥ | kathaṃ sa na vijānīyātprabhāvamamitaujasaḥ
पितामह भगवान् भी तो उन देव के ठीक बाद उत्पन्न हैं। वे अपरिमित तेज वाले उन देव के प्रभाव को कैसे न जानते होंगे?
भीष्म उवाच
श्लोक 66 (12.348.66)
महाकल्पसहस्राणि महाकल्पशतानि च । समतीतानि राजेन्द्र सर्गाश्च प्रलयाश्च ह ॥
mahākalpasahasrāṇi mahākalpaśatāni ca | samatītāni rājendra sargāśca pralayāśca ha
हे राजेन्द्र, हज़ारों महाकल्प और सैकड़ों महाकल्प बीत चुके हैं, सृष्टियाँ और प्रलय भी।
श्लोक 67 (12.348.67)
सर्गस्यादौ स्मृतो ब्रह्मा प्रजासर्गकरः प्रभुः । जानाति देवप्रवरं भूयश्चातोधिकं नृप । परमात्मानमीशानमात्मनः प्रभवं तथा ॥
sargasyādau smṛto brahmā prajāsargakaraḥ prabhuḥ | jānāti devapravaraṃ bhūyaścātodhikaṃ nṛpa | paramātmānamīśānamātmanaḥ prabhavaṃ tathā
सृष्टि के आदि में प्रजा की सृष्टि करने वाले प्रभु ब्रह्मा का स्मरण किया जाता है। हे राजन्, वे देवों में श्रेष्ठ को जानते हैं और उससे भी अधिक: परमात्मा को, ईश्वर को और अपने उद्भव के कारण को।
श्लोक 68 (12.348.68)
ये त्वन्ये ब्रह्मसदने सिद्धसङ्घाः समागताः । तेभ्यस्तच्छ्रावयामास पुराणं वेदसंमितम् ॥
ye tvanye brahmasadane siddhasaṅghāḥ samāgatāḥ | tebhyastacchrāvayāmāsa purāṇaṃ vedasaṃmitam
ब्रह्मा के लोक में जो अन्य सिद्धों के समूह एकत्र हुए थे, उन्हें उसने वेद के समान वह पुराण सुनाया।
श्लोक 69 (12.348.69)
अष्टाविंशत्सहस्राणि ऋषीणां भावितात्मनाम् । आत्मानुगामिनां ब्रह्मा श्रावयामास तत्वतः । एवं पुरा प्राप्तमिदं भानुना मुनिभाषितम् ॥
aṣṭāviṃśatsahasrāṇi ṛṣīṇāṃ bhāvitātmanām | ātmānugāmināṃ brahmā śrāvayāmāsa tatvataḥ | evaṃ purā prāptamidaṃ bhānunā munibhāṣitam
ब्रह्मा ने अपने अनुगामी, शुद्ध आत्मा वाले अट्ठाईस हज़ार ऋषियों को इसे यथार्थ रूप से सुनाया। इस प्रकार यह मुनियों द्वारा कहा हुआ ज्ञान पूर्वकाल में सूर्य को प्राप्त हुआ।
श्लोक 70 (12.348.70)
वर्षषष्टिसहस्राणि षष्टिवर्षशतानि च । सूर्यस्य तपतो लोकान्निर्मिता ये पुरःसराः । तेषामकथयत्सूर्यः सर्वेषां भावितात्मनाम् ॥
varṣaṣaṣṭisahasrāṇi ṣaṣṭivarṣaśatāni ca | sūryasya tapato lokānnirmitā ye puraḥsarāḥ | teṣāmakathayatsūryaḥ sarveṣāṃ bhāvitātmanām
साठ हज़ार वर्ष और साठ सौ वर्ष तक, जब सूर्य लोकों को तपा रहा था, जो शुद्ध आत्मा वाले उसके अग्रगामी बनाए गए थे, उन सबको सूर्य ने इसे सुनाया।
श्लोक 71 (12.348.71)
सूर्यानुगामिभिस्तात ऋषिभिस्तैर्महात्मभिः । मेरौ समागता देवाः श्राविताश्चेदनुत्तमम् ॥
sūryānugāmibhistāta ṛṣibhistairmahātmabhiḥ | merau samāgatā devāḥ śrāvitāścedanuttamam
हे तात, सूर्य के अनुगामी उन महात्मा ऋषियों ने मेरु पर एकत्र हुए देवताओं को यह परम उत्तम ज्ञान सुनाया।
श्लोक 72 (12.348.72)
देवानां तु सकाशाद्वै ततः श्रुत्वाऽसितो द्विजः । श्रावयामास राजेन्द्र पितॄन्वै मुनिसत्तमः ॥
devānāṃ tu sakāśādvai tataḥ śrutvā'sito dvijaḥ | śrāvayāmāsa rājendra pitṝnvai munisattamaḥ
तब द्विज असित, मुनियों में श्रेष्ठ, ने देवताओं से इसे सुनकर, हे राजेन्द्र, पितरों को सुनाया।
श्लोक 73 (12.348.73)
मम चापि पिता तात कथयामास शंतनुः । ततो मयापि श्रुत्वा च कीर्तितं तव भारत ॥
mama cāpi pitā tāta kathayāmāsa śaṃtanuḥ | tato mayāpi śrutvā ca kīrtitaṃ tava bhārata
हे तात, मेरे पिता शन्तनु ने भी मुझे यह सुनाया; तब उसे सुनकर मैंने भी, हे भारत, तुम्हें यह कहा है।
श्लोक 74 (12.348.74)
सुरैर्वा मुनिभिर्वापि पुराणं यैरिदं श्रुतम् । सर्वे ते परमात्मानं पूजयन्ते समन्ततः ॥
surairvā munibhirvāpi purāṇaṃ yairidaṃ śrutam | sarve te paramātmānaṃ pūjayante samantataḥ
देवताओं या मुनियों में से जिन्होंने भी इस पुराण को सुना है, वे सब सब ओर परमात्मा की पूजा करते हैं।
श्लोक 75 (12.348.75)
इदमाख्यानमार्षेयं पारम्पर्यागतं नृप । नावासुदेवभक्ताय त्वया देयं कथंचन ॥
idamākhyānamārṣeyaṃ pāramparyāgataṃ nṛpa | nāvāsudevabhaktāya tvayā deyaṃ kathaṃcana
हे राजन्, ऋषियों का यह आख्यान परम्परा से चला आया है। जो वासुदेव का भक्त न हो, उसे तुम इसे कभी मत देना।
श्लोक 76 (12.348.76)
आख्यानमुत्तमं चेदं श्रावयेद्यः सदा नृप । तदैव मनुजो भक्तः शुचिर्भूत्वा समाहितः । प्राप्नुयादचिराद्राजन्विष्णुलोकं च शाश्वतम् ॥
ākhyānamuttamaṃ cedaṃ śrāvayedyaḥ sadā nṛpa | tadaiva manujo bhaktaḥ śucirbhūtvā samāhitaḥ | prāpnuyādacirādrājanviṣṇulokaṃ ca śāśvatam
हे राजन्, जो इस उत्तम आख्यान को सदा सुनाता है, वह भक्त मनुष्य तुरन्त शुद्ध और एकाग्र होकर, हे राजन्, शीघ्र ही शाश्वत विष्णुलोक को प्राप्त करेगा।
श्लोक 77 (12.348.77)
मत्तोन्यानि च ते राजन्नुपाख्यानशतानि वै । यानि श्रुतानि सर्वाणि तेषां सारोयमुद्धृतः ॥
mattonyāni ca te rājannupākhyānaśatāni vai | yāni śrutāni sarvāṇi teṣāṃ sāroyamuddhṛtaḥ
हे राजन्, इसके अतिरिक्त तुमने मुझसे सैकड़ों और उपाख्यान सुने हैं; जो कुछ तुमने सुना, उन सबका यह सार निकाला गया है।
श्लोक 78 (12.348.78)
सुरासुरैर्यथा राजन्निर्मथ्यामृतमुद्धृतम् । एवमेतत्पुरा विप्रैः कथामृतमिहोद्धृतम् ॥
surāsurairyathā rājannirmathyāmṛtamuddhṛtam | evametatpurā vipraiḥ kathāmṛtamihoddhṛtam
हे राजन्, जैसे देवताओं और असुरों ने मथकर अमृत निकाला, वैसे ही पूर्वकाल में विप्रों ने यहाँ यह कथा-रूपी अमृत निकाला।
श्लोक 79 (12.348.79)
यश्चेदं पठते नित्यं यश्चेदं शृणुयान्नरः । एकान्तभावोपगत एकान्ते सुसमाहितः ॥
yaścedaṃ paṭhate nityaṃ yaścedaṃ śṛṇuyānnaraḥ | ekāntabhāvopagata ekānte susamāhitaḥ
जो मनुष्य इसे नित्य पढ़ता है या सुनता है, एकान्त में, एकनिष्ठ भक्ति से और भली-भाँति एकाग्र होकर,
श्लोक 80 (12.348.80)
प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं भूत्वा चन्द्रप्रभो नरः । स सहस्रार्चिषं देवं प्रविशेन्नात्र संशयः ॥
prāpya śvetaṃ mahādvīpaṃ bhūtvā candraprabho naraḥ | sa sahasrārciṣaṃ devaṃ praviśennātra saṃśayaḥ
वह महान् श्वेतद्वीप को पहुँचकर चन्द्रमा के समान कान्तिमान् हो जाएगा और निःसन्देह सहस्र किरणों वाले देव में प्रवेश करेगा।
श्लोक 81 (12.348.81)
मुच्येदार्तस्तथा रोगाच्छ्रुत्वेमामादितः कथाम् । जिज्ञासुर्लभते कामान्भक्तो भक्तगतिं व्रजेत् ॥
mucyedārtastathā rogācchrutvemāmāditaḥ kathām | jijñāsurlabhate kāmānbhakto bhaktagatiṃ vrajet
इस कथा को आरम्भ से सुनकर पीड़ित मनुष्य रोग से मुक्त हो जाता है; जिज्ञासु अपनी कामनाएँ पाता है; भक्त भक्तों की गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 82 (12.348.82)
त्वयापि सततं राजन्नभ्यर्च्यः पुरुषोत्तमः । स हि माता पिता चैव कृत्स्नस्य जगतो गुरुः ॥
tvayāpi satataṃ rājannabhyarcyaḥ puruṣottamaḥ | sa hi mātā pitā caiva kṛtsnasya jagato guruḥ
हे राजन्, तुम्हें भी निरन्तर पुरुषोत्तम की पूजा करनी चाहिए; वे ही सारे जगत् के माता, पिता और गुरु हैं।
श्लोक 83 (12.348.83)
ब्रह्मण्यदेवो भगवान्प्रीयतां ते सनातनः । युधिष्ठिर महाबाहो महाबुद्धिर्जनार्दनः ॥
brahmaṇyadevo bhagavānprīyatāṃ te sanātanaḥ | yudhiṣṭhira mahābāho mahābuddhirjanārdanaḥ
हे महाबाहु युधिष्ठिर, ब्राह्मणों के प्रिय देव, सनातन भगवान्, महाबुद्धिमान् जनार्दन तुम पर प्रसन्न हों।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 84 (12.348.84)
श्रुत्वैतदाख्यानवरं धर्मराड्जनमेजय । भ्रातरश्चास्य ते सर्वे नारायणपराभवन् ॥
śrutvaitadākhyānavaraṃ dharmarāḍjanamejaya | bhrātaraścāsya te sarve nārāyaṇaparābhavan
हे जनमेजय, इस उत्तम आख्यान को सुनकर धर्मराज और उनके सब भाई नारायण-परायण हो गए।
श्लोक 85 (12.348.85)
जितं भगवता तेन पुरुषेणेति भारत । नित्यं जप्यपरा भूत्वा सारस्वतमुदीरयन् ॥
jitaṃ bhagavatā tena puruṣeṇeti bhārata | nityaṃ japyaparā bhūtvā sārasvatamudīrayan
"उन भगवान् पुरुष की ही विजय हुई है," ऐसा उन्होंने कहा, हे भारत; वे सदा जप में लगे रहकर सारस्वत का उच्चारण करते थे।
श्लोक 86 (12.348.86)
यो ह्यस्माकं गुरुः श्रेष्ठः कृष्णद्वैपायनो मुनिः । जगौ परमकं जप्यं नारायणमुदीरयन् ॥
yo hyasmākaṃ guruḥ śreṣṭhaḥ kṛṣṇadvaipāyano muniḥ | jagau paramakaṃ japyaṃ nārāyaṇamudīrayan
जो हमारे श्रेष्ठ गुरु मुनि कृष्ण द्वैपायन हैं, उन्होंने नारायण का नाम उच्चारण करते हुए परम जप का गान किया।
श्लोक 87 (12.348.87)
गत्वान्तरिक्षात्सततं क्षीरोदममृताशयम् । पूजयित्वा च देवेशं पुनरायात्स्वगाश्रमम् ॥
gatvāntarikṣātsatataṃ kṣīrodamamṛtāśayam | pūjayitvā ca deveśaṃ punarāyātsvagāśramam
वे निरन्तर आकाश-मार्ग से अमृत के निवास क्षीरसागर को जाकर और देवाधिदेव की पूजा करके फिर अपने आश्रम में लौट आते थे।
भीष्म उवाच
श्लोक 88 (12.348.88)
एतत्ते सर्वमाख्यातं नारदोक्तं मयेरितम् । पारम्पर्यागतं ह्येतत्पित्रा मे कथितं पुरा ॥
etatte sarvamākhyātaṃ nāradoktaṃ mayeritam | pāramparyāgataṃ hyetatpitrā me kathitaṃ purā
यह सब जो नारद ने कहा था, मैंने तुम्हें सुना दिया; यह परम्परा से चला आया है, मेरे पिता ने इसे मुझे बहुत पहले सुनाया था।
सौतिरुवाच
श्लोक 89 (12.348.89)
एतत्ते सर्वमाख्यातं वैशंपायनकीर्तितम् । जनमेजयेन तच्छ्रुत्वा कृतं सम्यग्यथाविधि ॥
etatte sarvamākhyātaṃ vaiśaṃpāyanakīrtitam | janamejayena tacchrutvā kṛtaṃ samyagyathāvidhi
यह सब जो वैशम्पायन ने कहा था, तुम्हें सुना दिया; उसे सुनकर जनमेजय ने विधिपूर्वक यथोचित कार्य किया।
श्लोक 90 (12.348.90)
यूयं हि तप्ततपसः सर्वे च चरितव्रताः । शौनकस्य महासत्रं प्राप्ताः सर्वे द्विजोत्तमाः ॥
yūyaṃ hi taptatapasaḥ sarve ca caritavratāḥ | śaunakasya mahāsatraṃ prāptāḥ sarve dvijottamāḥ
आप सब तपस्या कर चुके हैं और व्रतों का पालन कर चुके हैं; हे द्विजोत्तम, आप सब शौनक के महायज्ञ में आए हैं।
श्लोक 91 (12.348.91)
यजध्वं सुहुतैर्यज्ञैः शाश्वतं परमेश्वरम् । पारम्पर्यागतं ह्येतत्पित्रा मे कथितं पुरा ॥
yajadhvaṃ suhutairyajñaiḥ śāśvataṃ parameśvaram | pāramparyāgataṃ hyetatpitrā me kathitaṃ purā
भली-भाँति आहुति दिए गए यज्ञों से शाश्वत परमेश्वर का यजन कीजिए। यह परम्परा से चला आया है; मेरे पिता ने इसे मुझे बहुत पहले सुनाया था।