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शान्ति पर्व · अध्याय 349

यज्ञ के स्वामी और देवताओं के भाग

शौनक सौति से पूछते हैं कि भगवान् एक ही समय यज्ञ में पहला भाग लेने वाले और निवृत्ति के उपदेशक कैसे हैं; सौति जनमेजय का वही प्रश्न और वैशम्पायन का उत्तर सुनाते हैं, जो मेरु पर व्यास ने अपने पाँच शिष्यों को बताया था। व्यास अव्यक्त से अनिरुद्ध और ब्रह्मा के द्वारा सृष्टि का वर्णन करते हैं, और बताते हैं कि क्षीरसागर के तट पर एक हजार दिव्य वर्ष के तप के बाद देवताओं और ऋषियों ने अशरीर वाणी सुनी, जिसने उन्हें यज्ञ में भाग दिए और चारों युगों का वर्णन किया। फिर भगवान् ने अश्वशिर रूप में ब्रह्मा को दर्शन देकर लोक का भार उन्हें सौंपा और देवताओं का कार्य कठिन होने पर प्रकट होने का वचन दिया। अध्याय के अन्त में इसके श्रवण का फल बताया गया है।

अध्याय 348अध्याय-सूचीअध्याय 350

शौनक उवाच

श्लोक 1 (12.349.1)

कथं स भगवान्देवो यज्ञेष्वग्रहरः प्रभुः । यज्ञधारी च सततं वेदवेदाङ्गवित्तथा ॥

kathaṃ sa bhagavāndevo yajñeṣvagraharaḥ prabhuḥ | yajñadhārī ca satataṃ vedavedāṅgavittathā

वह भगवान् देव, प्रभु, यज्ञों में सबसे पहला भाग कैसे ग्रहण करते हैं, सदा यज्ञ को धारण करने वाले कैसे हैं, और वेद तथा वेदांगों के ज्ञाता भी कैसे हैं,

श्लोक 2 (12.349.2)

निवृत्तं चास्थितो धर्मं क्षेमी भागवतः प्रभुः । निवृत्तिधर्मान्विदधे स एव भगवान्प्रभुः ॥

nivṛttaṃ cāsthito dharmaṃ kṣemī bhāgavataḥ prabhuḥ | nivṛttidharmānvidadhe sa eva bhagavānprabhuḥ

जबकि वे स्वयं निवृत्ति-धर्म में स्थित हैं, वे क्षेमवान् भागवत प्रभु? और यही भगवान् प्रभु निवृत्ति के धर्मों का विधान कैसे करते हैं?

श्लोक 3 (12.349.3)

कथं प्रवृत्तिधर्मेषु भागार्हा देवताः कृताः । कथं निवृत्तिधर्माश्च कृता व्यावृत्तबुद्धयः ॥

kathaṃ pravṛttidharmeṣu bhāgārhā devatāḥ kṛtāḥ | kathaṃ nivṛttidharmāśca kṛtā vyāvṛttabuddhayaḥ

प्रवृत्ति-धर्मों में देवताओं को भाग के योग्य कैसे ठहराया गया? और निवृत्ति-धर्मों के अनुयायी, जिनकी बुद्धि संसार से लौट आई है, कैसे बनाए गए?

श्लोक 4 (12.349.4)

एतं नः संशयं सौते छिन्धि गुह्यं सनातनम् । त्वया नारायणकथाः श्रुता वै धर्मसंहिताः ॥

etaṃ naḥ saṃśayaṃ saute chindhi guhyaṃ sanātanam | tvayā nārāyaṇakathāḥ śrutā vai dharmasaṃhitāḥ

सौति, हमारे इस गुप्त और सनातन संशय को दूर कीजिए, क्योंकि आपने नारायण की धर्मसंहिता-रूप कथाएँ सुनी हैं।

सौतिरुवाच

श्लोक 5 (12.349.5)

जनमेजयेन यत्पृष्टः शिष्यो व्यासस्य धीमतः । तत्तेऽहं कथयिष्यामि पौराणं शौनकोत्तम ॥

janamejayena yatpṛṣṭaḥ śiṣyo vyāsasya dhīmataḥ | tatte'haṃ kathayiṣyāmi paurāṇaṃ śaunakottama

शौनकों में श्रेष्ठ, बुद्धिमान् व्यास के शिष्य से जनमेजय ने जो पूछा था, वह पुरानी कथा मैं आपको सुनाऊँगा।

श्लोक 6 (12.349.6)

श्रुत्वा माहात्म्यमेतस्य देहिनां परमात्मनः । जनमेजयो महाप्राज्ञो वैशंपायनमब्रवीत् ॥

śrutvā māhātmyametasya dehināṃ paramātmanaḥ | janamejayo mahāprājño vaiśaṃpāyanamabravīt

देहधारियों के इस परमात्मा की महिमा सुनकर परम बुद्धिमान् जनमेजय ने वैशम्पायन से कहा।

जनमेजय उवाच

श्लोक 7 (12.349.7)

इमे सब्रह्मका लोकाः ससुरासुरमानवाः । क्रियास्वभ्युदयोक्तासु सक्ता दृश्यन्ति सर्वशः ॥

ime sabrahmakā lokāḥ sasurāsuramānavāḥ | kriyāsvabhyudayoktāsu saktā dṛśyanti sarvaśaḥ

ब्रह्मा सहित ये लोक, देवताओं, असुरों और मनुष्यों समेत, सब ओर अभ्युदय देने वाली बताई गई क्रियाओं में आसक्त दिखाई देते हैं।

श्लोक 8 (12.349.8)

मोक्षश्चोक्तस्त्वया ब्रह्मन्निर्वाणं परमं सुखम् । ये तु मुक्ता भवन्तीह पुण्यपापविवर्जिताः । ते सहस्रार्चिषं देवं प्रविशन्तीह शुश्रुम ॥

mokṣaścoktastvayā brahmannirvāṇaṃ paramaṃ sukham | ye tu muktā bhavantīha puṇyapāpavivarjitāḥ | te sahasrārciṣaṃ devaṃ praviśantīha śuśruma

ब्रह्मन्, आपने मोक्ष को भी बताया है, जो निर्वाण और परम सुख है। हमने सुना है कि जो यहाँ मुक्त हो जाते हैं, पुण्य और पाप से रहित होकर, वे सहस्र किरणों वाले देव में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 9 (12.349.9)

अयं हि दुरनुष्ठेयो मोक्षधर्मः सनातनः । यं हित्वा देवताः सर्वा हव्यकव्यभुजोऽभवन् ॥

ayaṃ hi duranuṣṭheyo mokṣadharmaḥ sanātanaḥ | yaṃ hitvā devatāḥ sarvā havyakavyabhujo'bhavan

मोक्ष का यह सनातन धर्म आचरण में बहुत कठिन है; इसे छोड़कर सभी देवता हव्य और कव्य के भोक्ता बन गए।

श्लोक 10 (12.349.10)

किंच ब्रह्मा च रुद्रश्च बलभित्प्रभुः । सूर्यस्ताराधिपो वायुरग्निर्वरुण एव च ॥

kiṃca brahmā ca rudraśca balabhitprabhuḥ | sūryastārādhipo vāyuragnirvaruṇa eva ca

और ब्रह्मा, रुद्र, बल का नाश करने वाले प्रभु इन्द्र, सूर्य, तारों के स्वामी चन्द्रमा, वायु, अग्नि और वरुण के विषय में क्या कहें,

श्लोक 11 (12.349.11)

आकाशं जगती चैव ये च शेषा दिवौकसः । प्रलयं न विजानन्ति आत्मनः परिनिर्मितम् ॥

ākāśaṃ jagatī caiva ye ca śeṣā divaukasaḥ | pralayaṃ na vijānanti ātmanaḥ parinirmitam

आकाश, पृथ्वी और शेष स्वर्गवासी देवताओं के विषय में क्या? वे अपने लिए निश्चित किए गए प्रलय को नहीं जानते।

श्लोक 12 (12.349.12)

ततस्तेनास्थिता मार्गं ध्रुवमक्षरमव्ययम् । स्मृत्वा कालपरीमाणं प्रवृत्तिं ये समास्थिताः । दोषः कालपरीमाणो महानेष क्रियावताम् ॥

tatastenāsthitā mārgaṃ dhruvamakṣaramavyayam | smṛtvā kālaparīmāṇaṃ pravṛttiṃ ye samāsthitāḥ | doṣaḥ kālaparīmāṇo mahāneṣa kriyāvatām

इसलिए उन्होंने उस ध्रुव, अक्षर और अव्यय मार्ग का अनुसरण नहीं किया। जो काल के परिमाण को स्मरण करके प्रवृत्ति के मार्ग पर स्थित हैं, उन कर्म करने वालों के लिए यह काल का परिमाण ही बड़ा दोष है।

श्लोक 13 (12.349.13)

एतन्मे संशयं विप्र हृदि शल्यमिवार्पितम् । छिन्धीतिहासकथनात्परं कौतूहलं हि मे ॥

etanme saṃśayaṃ vipra hṛdi śalyamivārpitam | chindhītihāsakathanātparaṃ kautūhalaṃ hi me

विप्र, हृदय में काँटे की तरह धँसे मेरे इस संशय को काट दीजिए; इस इतिहास को सुनने की मेरी उत्सुकता बहुत बड़ी है।

श्लोक 14 (12.349.14)

कथं भागहराः प्रोक्ता देवताः क्रतुषु द्विज । किमर्थं चाध्वरे ब्रह्मन्निज्यन्ते त्रिदिवौकसः ॥

kathaṃ bhāgaharāḥ proktā devatāḥ kratuṣu dvija | kimarthaṃ cādhvare brahmannijyante tridivaukasaḥ

द्विज, यज्ञों में देवताओं को भाग लेने वाला कैसे कहा गया है? और ब्रह्मन्, यज्ञ में स्वर्गवासियों की पूजा किसलिए की जाती है?

श्लोक 15 (12.349.15)

ये च भागं प्रगृह्णन्ति यज्ञेषु द्विजसत्तम । ते यजन्तो महायज्ञैः कस्य भागं ददन्ति वै ॥

ye ca bhāgaṃ pragṛhṇanti yajñeṣu dvijasattama | te yajanto mahāyajñaiḥ kasya bhāgaṃ dadanti vai

द्विजश्रेष्ठ, जो यज्ञों में भाग ग्रहण करते हैं, वे स्वयं महायज्ञों से यजन करते हुए किसे भाग देते हैं?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (12.349.16)

अहो गूढतमः प्रश्नस्त्वया पृष्टो जनेश्वर । नातप्ततपसा ह्येष नावेदविदुषा तथा । नापुराणविदा चैव शक्यो व्याहर्तुमञ्जसा ॥

aho gūḍhatamaḥ praśnastvayā pṛṣṭo janeśvara | nātaptatapasā hyeṣa nāvedaviduṣā tathā | nāpurāṇavidā caiva śakyo vyāhartumañjasā

अहो, जनेश्वर, आपने अत्यन्त गूढ़ प्रश्न पूछा है। जिसने तप नहीं किया, जो वेद नहीं जानता, और जो पुराणों का ज्ञाता नहीं है, वह इसका सहज उत्तर नहीं दे सकता।

श्लोक 17 (12.349.17)

हन्त ते कथयिष्यामि यन्मे पृष्टः पुरा गुरुः । कृष्णद्वैपायनो व्यासो वेदव्यासो महानृषिः ॥

hanta te kathayiṣyāmi yanme pṛṣṭaḥ purā guruḥ | kṛṣṇadvaipāyano vyāso vedavyāso mahānṛṣiḥ

अच्छा, मैं तुम्हें वह बताता हूँ जो मैंने पहले अपने गुरु से पूछा था, उन महान् ऋषि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास से।

श्लोक 18 (12.349.18)

सुमन्तुर्जैमिनिश्चैव पैलश्च सुदृढव्रतः । अहं चतुर्थः शिष्यो वै पञ्चमश्च शुकः स्मृतः ॥

sumanturjaiminiścaiva pailaśca sudṛḍhavrataḥ | ahaṃ caturthaḥ śiṣyo vai pañcamaśca śukaḥ smṛtaḥ

सुमन्तु, जैमिनि और दृढ़ व्रत वाले पैल; मैं चौथा शिष्य था, और पाँचवें शुकदेव माने जाते हैं।

श्लोक 19 (12.349.19)

एतान्समागतान्सर्वान्पञ्च शिष्यान्दमान्वितान् । शौचाचारसमायुक्ताञ्जितक्रोधाञ्जितेन्द्रियान् ॥

etānsamāgatānsarvānpañca śiṣyāndamānvitān | śaucācārasamāyuktāñjitakrodhāñjitendriyān

ये पाँचों शिष्य एक साथ आए थे, संयमी, शौच और सदाचार से युक्त, क्रोध और इन्द्रियों को जीते हुए,

श्लोक 20 (12.349.20)

वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् । मेरौ गिरिवरे रम्ये सिद्धचारणसेविते ॥

vedānadhyāpayāmāsa mahābhāratapañcamān | merau girivare ramye siddhacāraṇasevite

और उन्हें उन्होंने वेद पढ़ाए, जिनमें महाभारत पाँचवाँ था। यह पर्वतश्रेष्ठ मेरु पर हुआ, जो रमणीय था और सिद्धों तथा चारणों से सेवित था।

श्लोक 21 (12.349.21)

तेषामभ्यस्यतां वेदान्कदाचित्संशयोऽभवत् । एष वै यस्त्वया पृष्टस्तेन तेषां प्रकीर्तितः ॥

teṣāmabhyasyatāṃ vedānkadācitsaṃśayo'bhavat | eṣa vai yastvayā pṛṣṭastena teṣāṃ prakīrtitaḥ

वेदों का अभ्यास करते हुए एक बार उनके मन में संशय उठा। यह वही प्रश्न है जो तुमने पूछा है; उसी समय उन्होंने उन्हें इसका उत्तर बताया।

श्लोक 22 (12.349.22)

ततः श्रुतो मया चापि तवाख्येयोऽद्य भारत ॥

tataḥ śruto mayā cāpi tavākhyeyo'dya bhārata

तब मैंने भी उसे सुना, और भारत, आज वही मैं तुम्हें सुनाऊँगा।

श्लोक 23 (12.349.23)

शिष्याणां वचनं श्रुत्वा सर्वाज्ञानतमोनुदः । पराशरसुतः श्रीमान्व्यासो वाक्यमथाब्रवीत् ॥

śiṣyāṇāṃ vacanaṃ śrutvā sarvājñānatamonudaḥ | parāśarasutaḥ śrīmānvyāso vākyamathābravīt

अपने शिष्यों की बात सुनकर समस्त अज्ञान के अन्धकार को मिटाने वाले, पराशर के पुत्र श्रीमान् व्यास ने तब यह कहा।

व्यास उवाच

श्लोक 24 (12.349.24)

मया हि सुमहत्तप्तं तपः परमदारुणम् । भूतं भव्यं भविष्यं च जानीयामिति सत्तमाः ॥

mayā hi sumahattaptaṃ tapaḥ paramadāruṇam | bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyaṃ ca jānīyāmiti sattamāḥ

सज्जनो, मैंने बहुत बड़ा और अत्यन्त कठोर तप किया था, कि मैं भूत, वर्तमान और भविष्य को जान सकूँ।

श्लोक 25 (12.349.25)

तस्य मे तप्ततपसो निगृहीतेन्द्रियस्य च । नारायणप्रसादेन क्षीरोदस्यानुकूलतः ॥

tasya me taptatapaso nigṛhītendriyasya ca | nārāyaṇaprasādena kṣīrodasyānukūlataḥ

जब मैंने तप कर लिया और इन्द्रियों को वश में कर लिया, तब क्षीरसागर में स्थित नारायण की कृपा से, जो मुझ पर अनुकूल हुए,

श्लोक 26 (12.349.26)

त्रैकालिकमिदं ज्ञानं प्रादुर्भूतं यथेप्सितम् । तच्छृणुध्वं यथान्यायं वक्ष्ये संशयमुत्तमम् ॥

traikālikamidaṃ jñānaṃ prādurbhūtaṃ yathepsitam | tacchṛṇudhvaṃ yathānyāyaṃ vakṣye saṃśayamuttamam

तीनों कालों का यह ज्ञान मेरी इच्छा के अनुसार प्रकट हुआ। उसे यथाक्रम सुनो; मैं इस उत्तम प्रश्न का समाधान कहूँगा।

श्लोक 27 (12.349.27)

यथा वृत्तं हि कल्पादौ दृष्टं मे ज्ञानचक्षुषा । परमात्मेति यं प्राहुः साङ्ख्ययोगविदो जनाः ॥

yathā vṛttaṃ hi kalpādau dṛṣṭaṃ me jñānacakṣuṣā | paramātmeti yaṃ prāhuḥ sāṅkhyayogavido janāḥ

कल्प के आदि में जैसा हुआ था, उसे मैंने ज्ञानचक्षु से देखा। सांख्य और योग के जानने वाले लोग जिसे परमात्मा कहते हैं,

श्लोक 28 (12.349.28)

महापुरुषसंज्ञां स लभते स्वेन कर्मणा । तस्मात्प्रसूतमव्यक्तं प्रधानं तं विदुर्बुधाः ॥

mahāpuruṣasaṃjñāṃ sa labhate svena karmaṇā | tasmātprasūtamavyaktaṃ pradhānaṃ taṃ vidurbudhāḥ

वह अपने ही कर्म से महापुरुष नाम पाता है। उससे अव्यक्त उत्पन्न हुआ, जिसे विद्वान् प्रधान जानते हैं।

श्लोक 29 (12.349.29)

अव्यक्ताद्व्यक्तमुत्पन्नं लोकसृष्ट्यर्थमीश्वरात् । अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मेति कथ्यते ॥

avyaktādvyaktamutpannaṃ lokasṛṣṭyarthamīśvarāt | aniruddho hi lokeṣu mahānātmeti kathyate

अव्यक्त से, लोकों की सृष्टि के लिए, ईश्वर से व्यक्त उत्पन्न हुआ। लोकों में अनिरुद्ध ही महान् आत्मा, महत् कहा जाता है।

श्लोक 30 (12.349.30)

योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् । योऽहंकार इति प्रोक्तः सर्वतेजोमयो हि सः ॥

yo'sau vyaktatvamāpanno nirmame ca pitāmaham | yo'haṃkāra iti proktaḥ sarvatejomayo hi saḥ

जिसने व्यक्त होकर पितामह को रचा, वही अहंकार कहा गया है; वह सब प्रकार के तेज से परिपूर्ण है।

श्लोक 31 (12.349.31)

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । अहंकारप्रसूतानि महाभूतानि पञ्चधा ॥

pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam | ahaṃkāraprasūtāni mahābhūtāni pañcadhā

पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज: अहंकार से ये पाँच महाभूत पाँच प्रकार से उत्पन्न हुए।

श्लोक 32 (12.349.32)

महाभूतानि सृष्ट्वैव तान्गुणान्निर्ममे पुनः । भूतेभ्यश्चैव निष्पन्ना मूर्तिमन्तश्च ताञ्शृणु ॥

mahābhūtāni sṛṣṭvaiva tānguṇānnirmame punaḥ | bhūtebhyaścaiva niṣpannā mūrtimantaśca tāñśṛṇu

महाभूतों को रचकर उसने फिर उनके गुणों को रचा। अब उन देहधारी प्राणियों के विषय में सुनो जो भूतों से उत्पन्न हुए।

श्लोक 33 (12.349.33)

मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठश्च महात्मा वै मनुः स्वायंभुवस्तथा । ज्ञेयाः प्रकृतयोऽष्टौ ता यासु लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥

marīciraṅgirāścātriḥ pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ | vasiṣṭhaśca mahātmā vai manuḥ svāyaṃbhuvastathā | jñeyāḥ prakṛtayo'ṣṭau tā yāsu lokāḥ pratiṣṭhitāḥ

मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, महात्मा वसिष्ठ और स्वायम्भुव मनु: इन्हें आठ प्रकृतियाँ जानना चाहिए, जिनमें लोक प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 34 (12.349.34)

वेदान्वेदाङ्गसंयुक्तान्यज्ञयज्ञाङ्गसंयुतान् । निर्ममे लोकसिद्ध्यर्थं ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

vedānvedāṅgasaṃyuktānyajñayajñāṅgasaṃyutān | nirmame lokasiddhyarthaṃ brahmā lokapitāmahaḥ

लोकों की सिद्धि के लिए लोकपितामह ब्रह्मा ने वेदांगों सहित वेदों को और यज्ञांगों सहित यज्ञों को रचा।

श्लोक 35 (12.349.35)

अष्टाभ्यः प्रकृतिभ्यश्च जातं विश्वमिदं जगत् ॥

aṣṭābhyaḥ prakṛtibhyaśca jātaṃ viśvamidaṃ jagat

आठ प्रकृतियों से यह सारा विश्व-जगत् उत्पन्न हुआ।

श्लोक 36 (12.349.36)

रुद्रो रोषात्मको जातो दशान्यान्सोऽसृजत्स्वयम् । एकादशैते रुद्रास्तु विकाराः पुरुषाः स्मृताः ॥

rudro roṣātmako jāto daśānyānso'sṛjatsvayam | ekādaśaite rudrāstu vikārāḥ puruṣāḥ smṛtāḥ

क्रोध-स्वरूप रुद्र उत्पन्न हुआ, और उसने स्वयं दस अन्य को रचा। ये ग्यारह रुद्र विकार-रूप पुरुष माने गए हैं।

श्लोक 37 (12.349.37)

ते रुद्राः प्रकृतिश्चैव सर्वे चैव सुरर्षयः । उत्पन्ना लोकसिद्ध्यर्थं ब्रह्माणं समुपस्थिताः ॥

te rudrāḥ prakṛtiścaiva sarve caiva surarṣayaḥ | utpannā lokasiddhyarthaṃ brahmāṇaṃ samupasthitāḥ

वे रुद्र, प्रकृतियाँ और सभी देवर्षि, लोकों की सिद्धि के लिए उत्पन्न होकर, ब्रह्मा के पास पहुँचे।

देवा ऊचुः

श्लोक 38 (12.349.38)

वयं सृष्टा हि भगवंस्त्वया च प्रभविष्णुना । येन यस्मिन्नधीकारे वर्तितव्यं पितामह ॥

vayaṃ sṛṣṭā hi bhagavaṃstvayā ca prabhaviṣṇunā | yena yasminnadhīkāre vartitavyaṃ pitāmaha

भगवन्, समर्थ आपने ही हमें रचा है; पितामह, हममें से किसे किस अधिकार में कार्य करना है, यह बताइए।

श्लोक 39 (12.349.39)

योऽसौ त्वयाऽभिनिर्दिष्टो ह्यधिकारोऽर्थचिन्तकः । परिपाल्यः कथं तेन साहंकारेण कर्तृणा ॥

yo'sau tvayā'bhinirdiṣṭo hyadhikāro'rthacintakaḥ | paripālyaḥ kathaṃ tena sāhaṃkāreṇa kartṛṇā

जो अधिकार, जो प्रयोजनों का चिन्तन करने वाला है, आपने निर्दिष्ट किया है, उसे अहंकार से युक्त वह कर्ता कैसे सँभालेगा?

व्यास उवाच

श्लोक 40 (12.349.40)

प्रदिशस्व बलं तस्य योऽधिकारार्थचिन्तकः । एवमुक्तो महादेवो देवांस्तानिदमब्रवीत् ॥

pradiśasva balaṃ tasya yo'dhikārārthacintakaḥ | evamukto mahādevo devāṃstānidamabravīt

जो अधिकार के प्रयोजन का चिन्तन करता है, उसे बल दीजिए। इस प्रकार कहे जाने पर महादेव ने उन देवताओं से यह कहा।

ब्रह्मोवाच

श्लोक 41 (12.349.41)

साध्वहं ज्ञापितो देवा युष्माभिर्भद्रमस्तु वः । ममाप्येषा समुत्पन्ना चिन्ता या भवतामिह ॥

sādhvahaṃ jñāpito devā yuṣmābhirbhadramastu vaḥ | mamāpyeṣā samutpannā cintā yā bhavatāmiha

देवताओ, तुमने मुझे यह जताया, यह अच्छा किया; तुम्हारा कल्याण हो। जो चिन्ता तुम्हारी है, वही मुझे भी उत्पन्न हुई है।

श्लोक 42 (12.349.42)

लोकतन्त्रस्य कृत्स्नस्य कथं कार्यः परिग्रहः । कथं बलक्षयो न स्याद्युष्माकं ह्यात्मनश्च वै ॥

lokatantrasya kṛtsnasya kathaṃ kāryaḥ parigrahaḥ | kathaṃ balakṣayo na syādyuṣmākaṃ hyātmanaśca vai

समस्त लोक-व्यवस्था का भार कैसे उठाया जाए? और तुम्हारे तथा मेरे बल का क्षय कैसे न हो?

श्लोक 43 (12.349.43)

इतः सर्वेऽपि गच्छामः शरणं लोकसाक्षिणम् । महापुरुषमव्यक्तं स नो वक्ष्यति यद्धितम् ॥

itaḥ sarve'pi gacchāmaḥ śaraṇaṃ lokasākṣiṇam | mahāpuruṣamavyaktaṃ sa no vakṣyati yaddhitam

चलो, हम सब यहाँ से लोकों के साक्षी, अव्यक्त महापुरुष की शरण में चलें; वे हमें हितकर बात बताएँगे।

व्यास उवाच

श्लोक 44 (12.349.44)

ततस्ते ब्रह्मणा सार्धमृषयो विबुधास्तथा । क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जग्मूर्लोकहितार्थिनः ॥

tataste brahmaṇā sārdhamṛṣayo vibudhāstathā | kṣīrodasyottaraṃ kūlaṃ jagmūrlokahitārthinaḥ

तब लोकहित की इच्छा से ऋषि और देवता ब्रह्मा के साथ क्षीरसागर के उत्तरी तट पर गए।

श्लोक 45 (12.349.45)

ते तपः समुपातिष्ठन्ब्रह्मोक्तं वेदकल्पितम् । स महानियमो नाम तपश्चर्या सुदारुणा ॥

te tapaḥ samupātiṣṭhanbrahmoktaṃ vedakalpitam | sa mahāniyamo nāma tapaścaryā sudāruṇā

उन्होंने ब्रह्मा के बताए, वेद-विहित तप का आरम्भ किया; वह महानियम नामक अत्यन्त कठोर तपश्चर्या थी।

श्लोक 46 (12.349.46)

ऊर्ध्वदृग्बाहवश्चैव एकाग्रमनसोऽभवन् । एकपादस्थिताः सर्वे काष्ठभूताः समाहिताः ॥

ūrdhvadṛgbāhavaścaiva ekāgramanaso'bhavan | ekapādasthitāḥ sarve kāṣṭhabhūtāḥ samāhitāḥ

दृष्टि ऊपर और भुजाएँ उठाए, वे सब एकाग्र मन से, एक पैर पर खड़े रहे, लकड़ी के ठूँठ की तरह स्थिर और समाहित।

श्लोक 47 (12.349.47)

दिव्यं वर्षसहस्रं ते तपस्तप्त्वा सुदारुणम् । शुश्रुवुर्मधुरां वाणीं वेदवेदाङ्गभूषिताम् ॥

divyaṃ varṣasahasraṃ te tapastaptvā sudāruṇam | śuśruvurmadhurāṃ vāṇīṃ vedavedāṅgabhūṣitām

दिव्य एक हजार वर्ष तक वह कठोर तप करके उन्होंने वेद और वेदांगों से सुशोभित एक मधुर वाणी सुनी।

वागुवाच

श्लोक 48 (12.349.48)

भोभोः सब्रह्मका देवा ऋषयश्च तपोधनाः । स्वागतेनार्च्य वः सर्वाञ्श्रावये वाक्यमुत्तमम् ॥

bhobhoḥ sabrahmakā devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ | svāgatenārcya vaḥ sarvāñśrāvaye vākyamuttamam

हे ब्रह्मा सहित देवताओ और तपोधन ऋषियो! स्वागत से आप सबका सत्कार करके मैं आपको उत्तम वचन सुनाता हूँ।

श्लोक 49 (12.349.49)

विज्ञातं वो मया कार्यं तच्च लोकहितं महत् । प्रवृत्तियुक्तं कर्तव्यं युष्मत्प्राणोपबृंहणम् ॥

vijñātaṃ vo mayā kāryaṃ tacca lokahitaṃ mahat | pravṛttiyuktaṃ kartavyaṃ yuṣmatprāṇopabṛṃhaṇam

मैं आपके कार्य को जान गया हूँ, और वह लोकहित का बड़ा कार्य है। जो करना है, वह प्रवृत्ति से युक्त है और आपकी प्राणशक्ति को बढ़ाने वाला है।

श्लोक 50 (12.349.50)

सुतप्तं वस्तपो देवा ममाराधनकाम्यया । भोक्ष्यथास्य महासत्वास्तपसः फलमुत्तमम् ॥

sutaptaṃ vastapo devā mamārādhanakāmyayā | bhokṣyathāsya mahāsatvāstapasaḥ phalamuttamam

देवताओ, मुझे प्रसन्न करने की कामना से आपने भली-भाँति तप किया है। महाबलियो, आप इस तप का उत्तम फल भोगेंगे।

श्लोक 51 (12.349.51)

एष ब्रह्मा लोकगुरुः सर्वलोकपितामहः । यूयं च विबुधश्रेष्ठा मां यजध्वं समाहिताः ॥

eṣa brahmā lokaguruḥ sarvalokapitāmahaḥ | yūyaṃ ca vibudhaśreṣṭhā māṃ yajadhvaṃ samāhitāḥ

ये ब्रह्मा हैं, लोकों के गुरु, सब लोकों के पितामह; और देवश्रेष्ठो, आप समाहित मन से मेरा यजन कीजिए।

श्लोक 52 (12.349.52)

सर्वे भागान्कल्पयध्वं यज्ञेषु मम नित्यशः । तत्र श्रेयोऽभिधास्यामि यथाऽधीकारमीश्वराः ॥

sarve bhāgānkalpayadhvaṃ yajñeṣu mama nityaśaḥ | tatra śreyo'bhidhāsyāmi yathā'dhīkāramīśvarāḥ

आप सब यज्ञों में मेरे लिए सदा भाग निश्चित कीजिए। वहाँ, ईश्वरो, मैं प्रत्येक के अधिकार के अनुसार कल्याण का उपदेश दूँगा।

व्यास उवाच

श्लोक 53 (12.349.53)

श्रुत्वैतद्देवदेवस्य वाक्यं हृष्टतनूरुहाः । ततस्ते विबुधाः सर्वे ब्रह्मा ते च महर्षयः ॥

śrutvaitaddevadevasya vākyaṃ hṛṣṭatanūruhāḥ | tataste vibudhāḥ sarve brahmā te ca maharṣayaḥ

देवों के देव के इस वचन को सुनकर, आनन्द से रोमांचित होकर, वे सब देवता, ब्रह्मा और वे महर्षि

श्लोक 54 (12.349.54)

वेददृष्टेन विधिना वैष्णवं क्रतुमाहरन् । तस्मिन्सत्रे सदा ब्रह्मा स्वयं भागमकल्पयत् ॥

vedadṛṣṭena vidhinā vaiṣṇavaṃ kratumāharan | tasminsatre sadā brahmā svayaṃ bhāgamakalpayat

वेद में देखी गई विधि से वैष्णव यज्ञ करने लगे। उस सत्र में ब्रह्मा ने स्वयं सदा की भाँति भाग निश्चित किया।

श्लोक 55 (12.349.55)

देवा देवर्षयश्चैव स्वंस्वं भागमकल्पयन् । ते कार्तयुगधर्माणो भागाः परमसत्कृताः ॥

devā devarṣayaścaiva svaṃsvaṃ bhāgamakalpayan | te kārtayugadharmāṇo bhāgāḥ paramasatkṛtāḥ

देवताओं और देवर्षियों ने भी अपना-अपना भाग निश्चित किया। कृतयुग के धर्म के अनुसार वे भाग परम सम्मानित हुए,

श्लोक 56 (12.349.56)

प्राहुरादित्यवर्णं तं पुरुषं तमसः परम् । बृहन्तं सर्वगं देवमीशानं वरदं प्रभुम् ॥

prāhurādityavarṇaṃ taṃ puruṣaṃ tamasaḥ param | bṛhantaṃ sarvagaṃ devamīśānaṃ varadaṃ prabhum

और उन्होंने उस पुरुष को, जो सूर्य के वर्ण का और अन्धकार से परे है, उस विराट्, सर्वव्यापी, ईशान, वरदाता प्रभु देव को ही बताया।

श्लोक 57 (12.349.57)

ततोऽथ वरदो देवस्तान्सर्वानमरान्स्थितान् । अशरीरो बभाषेदं वाक्यं स्वस्थो महेश्वरः ॥

tato'tha varado devastānsarvānamarānsthitān | aśarīro babhāṣedaṃ vākyaṃ svastho maheśvaraḥ

तब वरदाता देव महेश्वर ने, बिना शरीर के, स्वस्थ भाव से, वहाँ खड़े उन सब अमर देवताओं से यह वचन कहा।

वागुवाच

श्लोक 58 (12.349.58)

येन यः कल्पितो भागः स तथा मामुपागतः । प्रीतोऽहं प्रदिशाम्यद्य फलमावृत्तिलक्षणम् । एतद्वो लक्षणं देवा मत्प्रसादसमुद्भवम् ॥

yena yaḥ kalpito bhāgaḥ sa tathā māmupāgataḥ | prīto'haṃ pradiśāmyadya phalamāvṛttilakṣaṇam | etadvo lakṣaṇaṃ devā matprasādasamudbhavam

जिसने जैसा भाग निश्चित किया, वह वैसा ही मुझे प्राप्त हुआ। मैं प्रसन्न हूँ; आज मैं आवृत्ति के लक्षण वाला फल देता हूँ। देवताओ, मेरी कृपा से उत्पन्न यही आपके लिए चिह्न है।

श्लोक 59 (12.349.59)

यूयं यज्ञैरिज्यमानाः समाप्तवरदक्षिणैः । युगेयुगे भविष्यध्वं प्रवृत्तिफलभागिनः ॥

yūyaṃ yajñairijyamānāḥ samāptavaradakṣiṇaiḥ | yugeyuge bhaviṣyadhvaṃ pravṛttiphalabhāginaḥ

उत्तम दक्षिणा के साथ पूर्ण हुए यज्ञों से पूजे जाने वाले आप युग-युग में प्रवृत्ति के फल के भागी होंगे।

श्लोक 60 (12.349.60)

यज्ञैर्ये चापि यक्ष्यन्ति सर्वलोकेषु वै सुराः । कल्पयिष्यन्ति वो भागांस्ते नरा वेदकल्पितान् ॥

yajñairye cāpi yakṣyanti sarvalokeṣu vai surāḥ | kalpayiṣyanti vo bhāgāṃste narā vedakalpitān

और देवताओ, सब लोकों में जो मनुष्य यज्ञों से यजन करेंगे, वे वेद में निश्चित किए गए आपके भाग आपके लिए निश्चित करेंगे।

श्लोक 61 (12.349.61)

यो मे यथा कल्पितवान्भागमस्मिन्महाक्रतौ । स तथा यज्ञभागार्हो वेदसूत्रे मया कृतः ॥

yo me yathā kalpitavānbhāgamasminmahākratau | sa tathā yajñabhāgārho vedasūtre mayā kṛtaḥ

इस महायज्ञ में जिसने जिस प्रकार अपना भाग निश्चित किया है, वह उसी प्रकार यज्ञभाग का अधिकारी होगा; यह मैंने वेद-सूत्र में ठहरा दिया है।

श्लोक 62 (12.349.62)

यूयं लोकान्भावयध्वं यज्ञभागफलोचिताः । सर्वार्थचिन्तका लोके मयाऽधीकारनिर्मिताः ॥

yūyaṃ lokānbhāvayadhvaṃ yajñabhāgaphalocitāḥ | sarvārthacintakā loke mayā'dhīkāranirmitāḥ

यज्ञभाग के फल के योग्य आप लोकों का पोषण कीजिए; जगत् में सब प्रयोजनों का चिन्तन करने वाले आप मेरे द्वारा अधिकार देकर रचे गए हैं।

श्लोक 63 (12.349.63)

याः क्रियाः प्रचरिष्यन्ति प्रवृत्तिफलसत्कृताः । ताभिराप्यायितबला लोकान्वै धारयिष्यथ ॥

yāḥ kriyāḥ pracariṣyanti pravṛttiphalasatkṛtāḥ | tābhirāpyāyitabalā lokānvai dhārayiṣyatha

जो क्रियाएँ की जाएँगी और जो प्रवृत्ति के फल से सम्मानित होंगी, उनसे बल पाकर आप लोकों को धारण करेंगे।

श्लोक 64 (12.349.64)

यूयं हि भाविता यज्ञैः सर्वयज्ञेषु मानवैः । मां ततो भावयिष्यध्वमेषा वो भावना मम ॥

yūyaṃ hi bhāvitā yajñaiḥ sarvayajñeṣu mānavaiḥ | māṃ tato bhāvayiṣyadhvameṣā vo bhāvanā mama

मनुष्य सब यज्ञों में यज्ञों से आपका पोषण करते हैं; उसके बाद आप मेरा पोषण करेंगे। मेरे प्रति आपकी यही भावना है।

श्लोक 65 (12.349.65)

इत्यर्थं निर्मिता वेदा यज्ञाश्चौषधिभिः सह । एभिः सम्यक्प्रयुक्तैर्हि प्रीयन्ते देवताः क्षितौ ॥

ityarthaṃ nirmitā vedā yajñāścauṣadhibhiḥ saha | ebhiḥ samyakprayuktairhi prīyante devatāḥ kṣitau

इसी के लिए वेद बनाए गए, और औषधियों सहित यज्ञ भी। इनका ठीक से प्रयोग होने पर पृथ्वी पर देवता तृप्त होते हैं।

श्लोक 66 (12.349.66)

निर्माणमेतद्युष्माकं प्रवृत्तिगुणकल्पितम् । मया कृतं सुरश्रेष्ठा यावत्कल्पक्षयादिह । चिन्तयध्वं लोकहितं यथाधीकारमीश्वराः ॥

nirmāṇametadyuṣmākaṃ pravṛttiguṇakalpitam | mayā kṛtaṃ suraśreṣṭhā yāvatkalpakṣayādiha | cintayadhvaṃ lokahitaṃ yathādhīkāramīśvarāḥ

प्रवृत्ति के गुण से रचा गया आपका यह विधान मैंने, देवश्रेष्ठो, कल्प के क्षय तक के लिए किया है। ईश्वरो, अपने-अपने अधिकार के अनुसार लोकहित का चिन्तन कीजिए।

श्लोक 67 (12.349.67)

मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठ इति सप्तैते मनसा निर्मिता हि ते ॥

marīciraṅgirāścātriḥ pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ | vasiṣṭha iti saptaite manasā nirmitā hi te

मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ: ये सात मन से रचे गए हैं।

श्लोक 68 (12.349.68)

एते वेदविदो मुख्या वेदाचार्याश्च कल्पिताः । प्रवृत्तिधर्मिणश्चैव प्राजापत्ये च कल्पिताः ॥

ete vedavido mukhyā vedācāryāśca kalpitāḥ | pravṛttidharmiṇaścaiva prājāpatye ca kalpitāḥ

ये वेदवेत्ताओं में प्रमुख वेद के आचार्य ठहराए गए हैं; ये प्रवृत्ति-धर्म का पालन करने वाले हैं और प्रजापति के पद पर नियुक्त किए गए हैं।

श्लोक 69 (12.349.69)

अयं क्रियावतां पन्था व्यक्तीभूतः सनातनः । अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकसर्गकरः प्रभुः ॥

ayaṃ kriyāvatāṃ panthā vyaktībhūtaḥ sanātanaḥ | aniruddha iti prokto lokasargakaraḥ prabhuḥ

यह कर्म करने वालों का मार्ग है, जो व्यक्त होकर सनातन हुआ; इसे अनिरुद्ध कहा गया है, जो लोकों की सृष्टि करने वाले प्रभु हैं।

श्लोक 70 (12.349.70)

सनः सनत्सुजातश्च सनकः ससनन्दनः । सनत्कुमारः कपिलः सप्तमश्च सनातनः ॥

sanaḥ sanatsujātaśca sanakaḥ sasanandanaḥ | sanatkumāraḥ kapilaḥ saptamaśca sanātanaḥ

सन, सनत्सुजात, सनक और सनन्दन के साथ, सनत्कुमार, कपिल, और सातवें सनातन।

श्लोक 71 (12.349.71)

सप्तैते मानसाः प्रोक्ता ऋषयो ब्रह्मणः सुताः । स्वयमागतविज्ञाना निवृत्तिं धर्ममास्थिताः ॥

saptaite mānasāḥ proktā ṛṣayo brahmaṇaḥ sutāḥ | svayamāgatavijñānā nivṛttiṃ dharmamāsthitāḥ

ये सात ब्रह्मा के मानस पुत्र ऋषि कहे गए हैं, जिन्हें ज्ञान स्वयं प्राप्त हुआ और जो निवृत्ति-धर्म में स्थित हैं।

श्लोक 72 (12.349.72)

एते योगविदो मुख्याः साङ्ख्यशास्त्रविशारदाः । आचार्या धर्मशास्त्रेषु मोक्षधर्मप्रवर्तकाः ॥

ete yogavido mukhyāḥ sāṅkhyaśāstraviśāradāḥ | ācāryā dharmaśāstreṣu mokṣadharmapravartakāḥ

ये योग के जानने वालों में प्रमुख हैं, सांख्यशास्त्र में निपुण हैं, धर्मशास्त्रों में आचार्य हैं और मोक्षधर्म के प्रवर्तक हैं।

श्लोक 73 (12.349.73)

यतोऽहं प्रसृतः पूर्वमव्यक्तात्त्रिगुणो महान् । तस्मात्परतरो योऽसौ क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः ॥

yato'haṃ prasṛtaḥ pūrvamavyaktāttriguṇo mahān | tasmātparataro yo'sau kṣetrajña iti kalpitaḥ

पहले अव्यक्त से मैं महान् त्रिगुण रूप में प्रकट हुआ; और उससे भी परे जो क्षेत्रज्ञ कहकर कल्पित किया गया है,

श्लोक 74 (12.349.74)

सोऽहं क्रियावतां पन्थाः पुनरावृत्तिदुर्लभः । यो यथा निर्मितो जन्तुर्यस्मिन्यस्मिंश्च कर्मणि ॥

so'haṃ kriyāvatāṃ panthāḥ punarāvṛttidurlabhaḥ | yo yathā nirmito janturyasminyasmiṃśca karmaṇi

वही मैं हूँ, कर्म करने वालों का मार्ग, जिससे लौटना दुर्लभ है। जो प्राणी जिस कर्म के लिए जैसे रचा गया है,

श्लोक 75 (12.349.75)

प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा तत्फलं सोऽश्नुतेऽवशः । एष लोकगुरुर्ब्रह्मा जगदादिकरः प्रभुः ॥

pravṛttau vā nivṛttau vā tatphalaṃ so'śnute'vaśaḥ | eṣa lokagururbrahmā jagadādikaraḥ prabhuḥ

चाहे प्रवृत्ति में हो या निवृत्ति में, वह विवश होकर उसका फल भोगता है। ये ब्रह्मा लोकों के गुरु हैं, जगत् के आदि के रचयिता प्रभु हैं।

श्लोक 76 (12.349.76)

एष माता पिता चैव युष्माकं च पितामहः । मयाऽनुशिष्टो भविता सर्वभूतवरप्रदः ॥

eṣa mātā pitā caiva yuṣmākaṃ ca pitāmahaḥ | mayā'nuśiṣṭo bhavitā sarvabhūtavarapradaḥ

ये माता और पिता हैं और आपके पितामह भी; मेरे अनुशासन में रहकर ये सब प्राणियों को वर देने वाले होंगे।

श्लोक 77 (12.349.77)

अस्य चैवात्मजो रुद्रो ललाटाद्यः समुत्थितः । ब्रह्मानुशिष्टो भविता सर्वभूतधरः प्रभुः ॥

asya caivātmajo rudro lalāṭādyaḥ samutthitaḥ | brahmānuśiṣṭo bhavitā sarvabhūtadharaḥ prabhuḥ

इनके पुत्र रुद्र, जो इनके ललाट से प्रकट हुए, ब्रह्मा के अनुशासन में रहकर सब प्राणियों को धारण करने वाले प्रभु होंगे।

श्लोक 78 (12.349.78)

गच्छध्वं स्वानधीकारांश्चिन्तयध्वं यथाविधि । प्रवर्तन्तां क्रियाः सर्वाः सर्वलोकेषु माचिरम् ॥

gacchadhvaṃ svānadhīkārāṃścintayadhvaṃ yathāvidhi | pravartantāṃ kriyāḥ sarvāḥ sarvalokeṣu māciram

अपने-अपने अधिकारों पर जाओ और विधि के अनुसार उनका चिन्तन करो। सब लोकों में सारी क्रियाएँ बिना देर किए चलती रहें।

श्लोक 79 (12.349.79)

प्रदिश्यन्तां च कर्माणि प्राणिनां गतयस्तथा । परिनिष्ठितकालानि आयूंषीह सुरोत्तमाः ॥

pradiśyantāṃ ca karmāṇi prāṇināṃ gatayastathā | pariniṣṭhitakālāni āyūṃṣīha surottamāḥ

प्राणियों के कर्म और उनकी गतियाँ निर्दिष्ट की जाएँ, और देवश्रेष्ठो, यहाँ की आयु भी, जिनके काल निश्चित हैं।

श्लोक 80 (12.349.80)

इदं कृतयुगं नाम कालः श्रेष्ठः प्रवर्तितः । अहिंस्या यज्ञपशवो युगेऽस्मिन्न तदन्यथा ॥

idaṃ kṛtayugaṃ nāma kālaḥ śreṣṭhaḥ pravartitaḥ | ahiṃsyā yajñapaśavo yuge'sminna tadanyathā

यह कृतयुग नाम का श्रेष्ठ काल प्रवर्तित हुआ है। इस युग में यज्ञ के पशु अहिंस्य हैं; इसके विपरीत नहीं होता।

श्लोक 81 (12.349.81)

चतुष्पात्सकलो धर्मो भविष्यत्यत्र वै सुराः । ततस्त्रेतायुगं नाम त्रयी यत्र भविष्यति ॥

catuṣpātsakalo dharmo bhaviṣyatyatra vai surāḥ | tatastretāyugaṃ nāma trayī yatra bhaviṣyati

देवताओ, इस युग में धर्म चारों पैरों से पूर्ण रहेगा। फिर त्रेता नाम का युग होगा, जिसमें त्रयी प्रतिष्ठित होगी,

श्लोक 82 (12.349.82)

प्रोक्षिता यत्र पशवो वधं प्राप्स्यन्ति वै मखे । यत्र पादश्चतुर्थो वै धर्मस्य न भविष्यति ॥

prokṣitā yatra paśavo vadhaṃ prāpsyanti vai makhe | yatra pādaścaturtho vai dharmasya na bhaviṣyati

जिसमें प्रोक्षित किए गए पशु यज्ञ में वध को प्राप्त होंगे, और जिसमें धर्म का चौथा पैर नहीं रहेगा।

श्लोक 83 (12.349.83)

ततो वै द्वापरं नाम मिश्रः कालो भविष्यति । द्विपादहीनो धर्मश्च युगे तस्मिन्भविष्यति ॥

tato vai dvāparaṃ nāma miśraḥ kālo bhaviṣyati | dvipādahīno dharmaśca yuge tasminbhaviṣyati

फिर द्वापर नाम का मिश्रित काल आएगा, और उस युग में धर्म दो पैरों से हीन होगा।

श्लोक 84 (12.349.84)

ततस्तिष्येऽथ संप्राप्ते युगे कलिपुरस्कृते । एकपादस्थितो धर्मो यत्र तत्र भविष्यति ॥

tatastiṣye'tha saṃprāpte yuge kalipuraskṛte | ekapādasthito dharmo yatra tatra bhaviṣyati

फिर जब कलि से आगे किया गया तिष्य युग आएगा, तब धर्म एक पैर पर स्थित रहेगा और यहाँ-वहाँ ही मिलेगा।

देवा ऊचुः

श्लोक 85 (12.349.85)

देवा देवर्षयश्चोचुस्तमेवंवादिनं गुरुम् । एकपादस्थिते धर्मे यत्र क्वचन गामिनि । कथं कर्तव्यमस्माभिर्भगवंस्तद्वदस्व नः ॥

devā devarṣayaścocustamevaṃvādinaṃ gurum | ekapādasthite dharme yatra kvacana gāmini | kathaṃ kartavyamasmābhirbhagavaṃstadvadasva naḥ

इस प्रकार कहते हुए गुरु से देवताओं और देवर्षियों ने कहा: जब धर्म एक पैर पर स्थित हो और जहाँ-तहाँ ही चलता हो, तब भगवन्, हमें क्या करना चाहिए? यह हमें बताइए।

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 86 (12.349.86)

गुरवो यत्र पूज्यन्ते साधुवृत्तसमन्विताः । वस्तव्यं तत्र युष्माभिर्यत्र धर्मो न हीयते ॥

guravo yatra pūjyante sādhuvṛttasamanvitāḥ | vastavyaṃ tatra yuṣmābhiryatra dharmo na hīyate

जहाँ सदाचारी गुरुजनों की पूजा होती है, और जहाँ धर्म क्षीण नहीं होता, वहीं आपको रहना चाहिए।

श्लोक 87 (12.349.87)

यत्र वेदाश्च यज्ञाश्च तपः सत्यं दमस्तथा । अहिंसा धर्मसंयुक्ताः प्रचरेयुः सुरोत्तमाः । स वो देशः सेवितव्यो मा वोऽधर्मः पदा स्पृशेत् ॥

yatra vedāśca yajñāśca tapaḥ satyaṃ damastathā | ahiṃsā dharmasaṃyuktāḥ pracareyuḥ surottamāḥ | sa vo deśaḥ sevitavyo mā vo'dharmaḥ padā spṛśet

देवश्रेष्ठो, जहाँ वेद और यज्ञ, तप, सत्य और दम, अहिंसा और धर्म से युक्त होकर आचरण में आते हों, उसी देश का आपको सेवन करना चाहिए। अधर्म आपको अपने पैर से भी न छुए।

व्यास उवाच

श्लोक 88 (12.349.88)

तेऽनुशिष्टा भगवता देवाः सर्षिगणास्तथा । नमस्कृत्वा भगवते जग्मुर्देशान्यथेप्सितान् ॥

te'nuśiṣṭā bhagavatā devāḥ sarṣigaṇāstathā | namaskṛtvā bhagavate jagmurdeśānyathepsitān

भगवान् के इस प्रकार उपदेश देने पर देवता और ऋषिगण उन्हें प्रणाम करके अपनी इच्छा के अनुसार स्थानों को चले गए।

श्लोक 89 (12.349.89)

गतेषु त्रिदिवौकस्सु ब्रह्मैकः पर्यवस्थितः । दिदृक्षुर्भगवन्तं तमनिरुद्धतनौ स्थितम् ॥

gateṣu tridivaukassu brahmaikaḥ paryavasthitaḥ | didṛkṣurbhagavantaṃ tamaniruddhatanau sthitam

स्वर्गवासियों के चले जाने पर ब्रह्मा अकेले रह गए; वे अनिरुद्ध के शरीर में स्थित उन भगवान् को देखना चाहते थे।

श्लोक 90 (12.349.90)

तं देवो दर्शयामास कृत्वा हयशिरो महत् । साङ्गानावर्तयन्वेदान्कमण्डलुत्रिदण्डधृक् ॥

taṃ devo darśayāmāsa kṛtvā hayaśiro mahat | sāṅgānāvartayanvedānkamaṇḍalutridaṇḍadhṛk

देव ने बड़ा अश्व-मस्तक धारण करके उन्हें दर्शन दिए; वे अंगों सहित वेदों का पाठ कर रहे थे और कमण्डलु तथा त्रिदण्ड धारण किए हुए थे।

श्लोक 91 (12.349.91)

ततोऽश्वशिरसं दृष्ट्वा तं देवममितौजसम् । लोककर्ता प्रभुर्ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ॥

tato'śvaśirasaṃ dṛṣṭvā taṃ devamamitaujasam | lokakartā prabhurbrahmā lokānāṃ hitakāmyayā

तब उन अपरिमित तेज वाले अश्वशिर देव को देखकर लोकों के कर्ता प्रभु ब्रह्मा ने लोकहित की कामना से

श्लोक 92 (12.349.92)

मूर्ध्ना प्रणम्य वरदं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः । स परिष्वज्य देवेन वचनं श्रावितस्तदा ॥

mūrdhnā praṇamya varadaṃ tasthau prāñjaliragrataḥ | sa pariṣvajya devena vacanaṃ śrāvitastadā

वरदाता को सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गए; तब देव ने उन्हें गले लगाकर यह वचन सुनाया।

भगवानुवाच

श्लोक 93 (12.349.93)

लोककार्यगतीः सर्वास्त्वं चिन्तय यथाविधि । धाता त्वं सर्वभूतानां त्वं प्रभुर्जगतो गुरुः । त्वय्यावेशितभारोऽहं धृतिं प्राप्स्याम्यथाञ्जसा ॥

lokakāryagatīḥ sarvāstvaṃ cintaya yathāvidhi | dhātā tvaṃ sarvabhūtānāṃ tvaṃ prabhurjagato guruḥ | tvayyāveśitabhāro'haṃ dhṛtiṃ prāpsyāmyathāñjasā

लोक-कार्यों की सब गतियों का विधिपूर्वक चिन्तन करो। तुम सब प्राणियों के धाता हो, तुम जगत् के प्रभु और गुरु हो। तुम पर भार रखकर मैं शीघ्र ही निश्चिन्त हो जाऊँगा।

श्लोक 94 (12.349.94)

यदा च सुरकार्यं ते अविषह्यं भविष्यति । प्रादुर्भावं गमिष्यामि तदात्मज्ञानदैशिकः ॥

yadā ca surakāryaṃ te aviṣahyaṃ bhaviṣyati | prādurbhāvaṃ gamiṣyāmi tadātmajñānadaiśikaḥ

और जब देवताओं का कोई कार्य तुम्हारे लिए असह्य हो जाएगा, तब मैं आत्मज्ञान का उपदेशक बनकर प्रकट होऊँगा।

व्यास उवाच

श्लोक 95 (12.349.95)

एवमुक्त्वा हयशिरास्तत्रैवान्तरधीयत । तेनानुशिष्टो ब्रह्मापि स्वं लोकमचिराद्गतः ॥

evamuktvā hayaśirāstatraivāntaradhīyata | tenānuśiṣṭo brahmāpi svaṃ lokamacirādgataḥ

ऐसा कहकर अश्वशिर देव वहीं अन्तर्धान हो गए; और उनसे अनुशासित होकर ब्रह्मा भी शीघ्र ही अपने लोक को चले गए।

श्लोक 96 (12.349.96)

एवमेष महाभागः पद्मनाभः सनातनः । यज्ञेष्वग्रहरः प्रोक्तो यज्ञधारी च नित्यदा ॥

evameṣa mahābhāgaḥ padmanābhaḥ sanātanaḥ | yajñeṣvagraharaḥ prokto yajñadhārī ca nityadā

इस प्रकार ये महाभाग, सनातन पद्मनाभ यज्ञों में सबसे पहले भाग लेने वाले और सदा यज्ञ को धारण करने वाले कहे गए हैं।

श्लोक 97 (12.349.97)

निवृत्तिं चास्थितो धर्मं गतिमक्षयधर्मिणाम् । प्रवृत्तिधर्मान्विदधे कृत्वा लोकस्य चित्रताम् ॥

nivṛttiṃ cāsthito dharmaṃ gatimakṣayadharmiṇām | pravṛttidharmānvidadhe kṛtvā lokasya citratām

वे अक्षय धर्म वालों की गति, निवृत्ति-धर्म में स्थित हैं; और लोक की विविधता रचकर उन्होंने प्रवृत्ति-धर्मों का विधान किया।

श्लोक 98 (12.349.98)

स आदिः स मध्यः स चान्तः प्रजानां । स धाता स धेयं स कर्ता स कार्यम् । युगान्ते प्रसुप्तः सुसंक्षिप्य लोकान् । युगादौ प्रबुद्धो जगद्ध्युत्ससर्ज ॥

sa ādiḥ sa madhyaḥ sa cāntaḥ prajānāṃ | sa dhātā sa dheyaṃ sa kartā sa kāryam | yugānte prasuptaḥ susaṃkṣipya lokān | yugādau prabuddho jagaddhyutsasarja

वही प्राणियों का आदि, मध्य और अन्त है; वही धाता है और वही धेय, वही कर्ता है और वही कार्य। युग के अन्त में वह लोकों को समेटकर सो जाता है, और युग के आदि में जागकर जगत् को रच देता है।

श्लोक 99 (12.349.99)

तस्मै नमध्वं देवाय निर्गुणाय महात्मने । अजाय विश्वरूपाय धाम्ने सर्वदिवौकसाम् ॥

tasmai namadhvaṃ devāya nirguṇāya mahātmane | ajāya viśvarūpāya dhāmne sarvadivaukasām

उस निर्गुण, महात्मा, अजन्मा, विश्वरूप देव को प्रणाम करो, जो सब स्वर्गवासियों का धाम है,

श्लोक 100 (12.349.100)

महाभूताधिपतये रुद्राणां पतये तथा । आदित्यपतये चैव वसूनां पतये तथा ॥

mahābhūtādhipataye rudrāṇāṃ pataye tathā | ādityapataye caiva vasūnāṃ pataye tathā

जो महाभूतों का अधिपति है, रुद्रों का पति है, आदित्यों का पति है और वसुओं का पति है,

श्लोक 101 (12.349.101)

अश्विभ्यां पतये चैव मरुतां पतये तथा । वेदयज्ञाधिपतये वेदाङ्गपतयेऽपि च ॥

aśvibhyāṃ pataye caiva marutāṃ pataye tathā | vedayajñādhipataye vedāṅgapataye'pi ca

जो दोनों अश्विनों का पति है, मरुद्गणों का पति है, वेद और यज्ञ का अधिपति है और वेदांगों का भी पति है,

श्लोक 102 (12.349.102)

समुद्रवासिने नित्यं हरये मुञ्जकेशिने । शान्ताय सर्वभूतानां मोक्षधर्मानुभाषिणे ॥

samudravāsine nityaṃ haraye muñjakeśine | śāntāya sarvabhūtānāṃ mokṣadharmānubhāṣiṇe

जो सदा समुद्र में निवास करता है, मुञ्ज के समान केशों वाले हरि, जो सब प्राणियों के लिए शान्त है और मोक्षधर्म का उपदेश करने वाला है,

श्लोक 103 (12.349.103)

तपसां तेजसां चैव पतये यशसामपि । वचसां पतये नित्यं सरितां पतये तथा ॥

tapasāṃ tejasāṃ caiva pataye yaśasāmapi | vacasāṃ pataye nityaṃ saritāṃ pataye tathā

जो तप और तेज का पति है, यश का भी पति है, सदा वाणी का पति है और नदियों का पति है,

श्लोक 104 (12.349.104)

कपर्दिने वराहाय एकशृङ्गाय धीमते । विवस्वतेऽश्वशिरसे चतुर्मूर्तिधृते सदा । सूक्ष्माय ज्ञानदृश्याय अजरायाक्षयाय च ॥

kapardine varāhāya ekaśṛṅgāya dhīmate | vivasvate'śvaśirase caturmūrtidhṛte sadā | sūkṣmāya jñānadṛśyāya ajarāyākṣayāya ca

जो कपर्दी है, वराह है, एकशृंग है और धीमान् है, जो विवस्वान् है, अश्वशिर है और सदा चार मूर्तियाँ धारण करता है, जो सूक्ष्म है, ज्ञान से दिखाई देता है, अजर और अक्षय है।

श्लोक 105 (12.349.105)

एष देवः संचरति सर्वत्र गतिरव्ययः । एष चैतत्परं ब्रह्म ज्ञेयो विज्ञानचक्षुषा ॥

eṣa devaḥ saṃcarati sarvatra gatiravyayaḥ | eṣa caitatparaṃ brahma jñeyo vijñānacakṣuṣā

यह देव सर्वत्र विचरता है, इसकी गति अव्यय है। और यही वह परब्रह्म है, जो विज्ञान के नेत्र से जानने योग्य है।

श्लोक 106 (12.349.106)

एवमेतत्पुरा दृष्टं मया वै ज्ञानचक्षुषा । कथितं तच्च वै सर्वं मया पृष्टेन तत्त्वतः ॥

evametatpurā dṛṣṭaṃ mayā vai jñānacakṣuṣā | kathitaṃ tacca vai sarvaṃ mayā pṛṣṭena tattvataḥ

इस प्रकार मैंने पहले ज्ञानचक्षु से यह देखा था; और तुम्हारे पूछने पर मैंने यह सब तत्त्व से कह दिया।

श्लोक 107 (12.349.107)

क्रियतां मद्वचः शिष्याः सेव्यतां हरिरीश्वरः । गीयतां वेदशब्दैश्च पूज्यतां च यथाविधि ॥

kriyatāṃ madvacaḥ śiṣyāḥ sevyatāṃ harirīśvaraḥ | gīyatāṃ vedaśabdaiśca pūjyatāṃ ca yathāvidhi

शिष्यो, मेरी बात मानो: ईश्वर हरि की सेवा करो; वेद के शब्दों से उनका गान करो और विधिपूर्वक उनकी पूजा करो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 108 (12.349.108)

इत्युक्तास्तु वयं तेन वेदव्यासेन धीमता । सर्वे शिष्याः सुतश्चास्य शुकः परमधर्मवित् ॥

ityuktāstu vayaṃ tena vedavyāsena dhīmatā | sarve śiṣyāḥ sutaścāsya śukaḥ paramadharmavit

बुद्धिमान् वेदव्यास के इस प्रकार कहने पर हम सब शिष्य और उनके पुत्र शुकदेव, जो परम धर्मज्ञ हैं,

श्लोक 109 (12.349.109)

स चास्माकमुपाध्यायः सहास्माभिर्विशांपते । चतुर्वेदोद्गताभिस्तमृग्भिः समभितुष्टुवे ॥

sa cāsmākamupādhyāyaḥ sahāsmābhirviśāṃpate | caturvedodgatābhistamṛgbhiḥ samabhituṣṭuve

और वे हमारे उपाध्याय भी, हमारे साथ, हे राजन्, चारों वेदों से निकली ऋचाओं से उनकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 110 (12.349.110)

एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । एवं मेऽकथयद्राजन्पुरा द्वैपायनो गुरुः ॥

etatte sarvamākhyātaṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi | evaṃ me'kathayadrājanpurā dvaipāyano guruḥ

तुम जो मुझसे पूछ रहे थे, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। राजन्, मुझे पहले मेरे गुरु द्वैपायन ने इसी प्रकार सुनाया था।

श्लोक 111 (12.349.111)

यश्चेदं शृणुयान्नित्यं यश्चैनं परिकीर्तयेत् । नमो भगवते कृत्वा समाहितमतिर्नरः ॥

yaścedaṃ śṛṇuyānnityaṃ yaścainaṃ parikīrtayet | namo bhagavate kṛtvā samāhitamatirnaraḥ

जो मनुष्य भगवान् को नमस्कार करके, समाहित चित्त से, इसे नित्य सुनता है अथवा इसका कीर्तन करता है,

श्लोक 112 (12.349.112)

भवत्यरोगो मतिमान्बलरूपसमन्वितः । आतुरो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥

bhavatyarogo matimānbalarūpasamanvitaḥ | āturo mucyate rogādbaddho mucyeta bandhanāt

वह नीरोग, बुद्धिमान्, बल और रूप से युक्त होता है; रोगी रोग से मुक्त होता है और बँधा हुआ बन्धन से छूट जाता है।

श्लोक 113 (12.349.113)

कामकामी लभेत्कामं दीर्घं चायुरवाप्नुयात् । ब्राह्मणः सर्ववेदी स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ॥

kāmakāmī labhetkāmaṃ dīrghaṃ cāyuravāpnuyāt | brāhmaṇaḥ sarvavedī syātkṣatriyo vijayī bhavet

कामना करने वाला अपनी कामना पाता है और दीर्घ आयु प्राप्त करता है; ब्राह्मण सब वेदों का ज्ञाता होता है, क्षत्रिय विजयी होता है,

श्लोक 114 (12.349.114)

वैश्यो विपुललाभः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् । अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या चैवेप्सितं पतिम् ॥

vaiśyo vipulalābhaḥ syācchūdraḥ sukhamavāpnuyāt | aputro labhate putraṃ kanyā caivepsitaṃ patim

वैश्य को बड़ा लाभ होता है, शूद्र सुख पाता है; पुत्रहीन पुत्र पाता है और कन्या मनचाहा पति,

श्लोक 115 (12.349.115)

लग्नगर्भा विमुच्येत गर्भिणी जनयेत्सुतम् । बन्ध्या प्रसवमाप्नोति पुत्रपौत्रसमृद्धिमत् ॥

lagnagarbhā vimucyeta garbhiṇī janayetsutam | bandhyā prasavamāpnoti putrapautrasamṛddhimat

प्रसव में अटकी हुई स्त्री मुक्त हो जाती है, गर्भवती पुत्र को जन्म देती है, और बाँझ स्त्री पुत्र-पौत्रों की समृद्धि से युक्त सन्तान पाती है।

श्लोक 116 (12.349.116)

क्षेमेण गच्छेदध्वानमिदं यः पठते पथि । यो यं कामं कामयते स तमाप्नोति च ध्रुवम् ॥

kṣemeṇa gacchedadhvānamidaṃ yaḥ paṭhate pathi | yo yaṃ kāmaṃ kāmayate sa tamāpnoti ca dhruvam

जो इसे मार्ग में पढ़ता है, वह कुशलपूर्वक यात्रा करता है; और जो जिस कामना की इच्छा करता है, वह उसे निश्चय ही पा लेता है।

श्लोक 117 (12.349.117)

इदं महर्षेर्वचनं विनिश्चितं । महात्मनः पुरुषवरस्य कीर्तितम् । समागमं चर्षिदिवौकसामिमं । निशम्य भक्ताः सुसुखं लभन्ते ॥

idaṃ maharṣervacanaṃ viniścitaṃ | mahātmanaḥ puruṣavarasya kīrtitam | samāgamaṃ carṣidivaukasāmimaṃ | niśamya bhaktāḥ susukhaṃ labhante

यह महर्षि का निश्चित वचन है, उन महात्मा पुरुषश्रेष्ठ का कीर्तन। ऋषियों और स्वर्गवासियों के इस समागम को सुनकर भक्त परम सुख पाते हैं।

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