शान्ति पर्व · अध्याय 350
श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को अपने नामों की व्याख्या
जनमेजय वैशम्पायन से उन नामों का अर्थ पूछते हैं जिनसे व्यास और उनके शिष्यों ने श्रीकृष्ण की स्तुति की थी, और वैशम्पायन बताते हैं कि श्रीकृष्ण ने वे नाम अर्जुन को कैसे समझाए। श्रीकृष्ण नारायण को ब्रह्मा और रुद्र का मूल बताते हैं, रुद्र की अपनी पूजा का कारण कहते हैं, चार प्रकार के भक्तों का वर्णन करते हैं, और अपने तथा अर्जुन के नर-नारायण होने की बात कहते हैं। फिर वे नारायण, वासुदेव, विष्णु, दामोदर, पृश्निगर्भ और केशव नामों की उत्पत्ति बताते हैं — केशव की दीर्घतमा की कथा के साथ — और अग्नि-सोम की एकता पर अध्याय समाप्त होता है।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (12.350.1)
अस्तौषीद्वैदिकैर्व्यासः सशिष्यो मधुसूदनम् । नामभिर्विविधैरेषां निरुक्तं भगवन्मम ॥
astauṣīdvaidikairvyāsaḥ saśiṣyo madhusūdanam | nāmabhirvividhaireṣāṃ niruktaṃ bhagavanmama
व्यास ने अपने शिष्यों के साथ जिन वैदिक नामों से मधुसूदन की स्तुति की थी, हे भगवन्, उन अनेक नामों की व्याख्या मुझे बताइए।
श्लोक 2 (12.350.2)
वक्तुमर्हसि शुश्रूषोः प्रजापतिपतेर्हरेः । श्रुत्वा भवेयं यत्पूतः शरच्चन्द्र इवामलः ॥
vaktumarhasi śuśrūṣoḥ prajāpatipaterhareḥ | śrutvā bhaveyaṃ yatpūtaḥ śaraccandra ivāmalaḥ
मैं सुनना चाहता हूँ; आप प्रजापति के भी स्वामी हरि के विषय में मुझे बताने योग्य हैं। उसे सुनकर मैं शरद् ऋतु के चन्द्रमा की तरह निर्मल और पवित्र हो जाऊँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (12.350.3)
शृणु राजन्यथाचष्ट फल्गुनस्य हरिः प्रभुः । प्रसन्नात्मात्मनो नाम्नां निरुक्तं गुणकर्मजम् ॥
śṛṇu rājanyathācaṣṭa phalgunasya hariḥ prabhuḥ | prasannātmātmano nāmnāṃ niruktaṃ guṇakarmajam
हे राजन्, सुनो कि सर्वसमर्थ प्रभु हरि ने प्रसन्न मन से फल्गुन को अपने गुणों और कर्मों से उत्पन्न अपने नामों का अर्थ किस प्रकार समझाया।
श्लोक 4 (12.350.4)
नामभिः कीर्तितैस्तस्य केशवस्य महात्मनः । पृष्टवान्केशवं राजन्फल्गुनः परवीरहा ॥
nāmabhiḥ kīrtitaistasya keśavasya mahātmanaḥ | pṛṣṭavānkeśavaṃ rājanphalgunaḥ paravīrahā
हे राजन्, महात्मा केशव के उन कीर्तित नामों के विषय में शत्रु-वीरों का संहार करने वाले फल्गुन ने केशव से पूछा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 5 (12.350.5)
भगवन्भूतभव्येश सर्वभूतसृगव्यय । लोकधाम जगन्नाथ लोकानामभयप्रद ॥
bhagavanbhūtabhavyeśa sarvabhūtasṛgavyaya | lokadhāma jagannātha lokānāmabhayaprada
हे भगवन्, भूत और भविष्य के स्वामी, सब प्राणियों के सृष्टा, अविनाशी, लोकों के आधार, जगन्नाथ, लोकों को अभय देने वाले!
श्लोक 6 (12.350.6)
यानि नामानि ते देव कीर्तितानि महर्षिभिः । वेदेषु सपुराणेषु यानि गुह्यानि कर्मभिः ॥
yāni nāmāni te deva kīrtitāni maharṣibhiḥ | vedeṣu sapurāṇeṣu yāni guhyāni karmabhiḥ
हे देव, महर्षियों ने वेदों और पुराणों में आपके जो नाम गाए हैं, और आपके कर्मों के कारण जो नाम गुप्त हैं,
श्लोक 7 (12.350.7)
तेषां निरुक्तं त्वत्तोऽहं श्रोतुमिच्छामि केशव । न ह्यन्यो वर्णयेन्नाम्नां निरुक्तं त्वामृते प्रभो ॥
teṣāṃ niruktaṃ tvatto'haṃ śrotumicchāmi keśava | na hyanyo varṇayennāmnāṃ niruktaṃ tvāmṛte prabho
हे केशव, उनकी व्याख्या मैं आपसे ही सुनना चाहता हूँ; क्योंकि हे प्रभो, आपके सिवा और कोई इन नामों का अर्थ नहीं बता सकता।
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 8 (12.350.8)
ऋग्वेदे सयजुर्वेदे तथैवाथर्वसामसु । पुराणे सोपनिषदे तथैव ज्योतिषेऽर्जुन ॥
ṛgvede sayajurvede tathaivātharvasāmasu | purāṇe sopaniṣade tathaiva jyotiṣe'rjuna
हे अर्जुन, यजुर्वेद सहित ऋग्वेद में, अथर्ववेद और सामवेद में, उपनिषदों सहित पुराण में, और ज्योतिष में भी,
श्लोक 9 (12.350.9)
साङ्ख्ये च योगशास्त्रे च आयुर्वेदे तथैव च । बहूनि मम नामानि कीर्तितानि महर्षिभिः ॥
sāṅkhye ca yogaśāstre ca āyurvede tathaiva ca | bahūni mama nāmāni kīrtitāni maharṣibhiḥ
साङ्ख्य में, योगशास्त्र में और आयुर्वेद में भी महर्षियों ने मेरे बहुत-से नाम गाए हैं।
श्लोक 10 (12.350.10)
गौणानि तत्र नामानि कर्मजानि च कानिचित् । निरुक्तं कर्मजानां त्वं शृणुष्व प्रयतोऽनघ ॥
gauṇāni tatra nāmāni karmajāni ca kānicit | niruktaṃ karmajānāṃ tvaṃ śṛṇuṣva prayato'nagha
उनमें कुछ नाम मेरे गुणों से बने हैं और कुछ कर्मों से। हे निष्पाप, कर्मों से बने नामों की व्याख्या ध्यान से सुनो।
श्लोक 11 (12.350.11)
कथ्यमानं मया तात त्वं हि मेऽर्धं स्मृतः पुरा । नमोऽतियशसे तस्मै देवानां परमात्मने ॥
kathyamānaṃ mayā tāta tvaṃ hi me'rdhaṃ smṛtaḥ purā | namo'tiyaśase tasmai devānāṃ paramātmane
प्रिय अर्जुन, जैसे मैं बता रहा हूँ वैसे सुनो; क्योंकि पूर्वकाल में तुम मेरे अर्धांश माने गए हो। अत्यन्त यशस्वी, देवों के परमात्मा को नमस्कार,
श्लोक 12 (12.350.12)
नारायणाय विश्वाय निर्गुणाय गुणात्मने । यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रस्य क्रोधसंभवः ॥
nārāyaṇāya viśvāya nirguṇāya guṇātmane | yasya prasādajo brahmā rudrasya krodhasaṃbhavaḥ
विश्वरूप नारायण को नमस्कार, जो गुणरहित होकर भी गुणों के आत्मा हैं; जिनकी कृपा से ब्रह्मा उत्पन्न हुए और जिनके क्रोध से रुद्र की उत्पत्ति हुई,
श्लोक 13 (12.350.13)
योऽसौ योनिर्हि सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य च । अष्टादशगुणं यत्तत्सत्वं सत्ववतांवर ॥
yo'sau yonirhi sarvasya sthāvarasya carasya ca | aṣṭādaśaguṇaṃ yattatsatvaṃ satvavatāṃvara
जो स्थावर और जंगम सबकी योनि हैं। हे सत्त्वशालियों में श्रेष्ठ, अठारह गुणों वाला जो वह सत्त्व है,
श्लोक 14 (12.350.14)
प्रकृतिः सा परा मह्यं रोदसी लोकधारिणी । ऋता सत्यामराजय्या लोकानामात्मसंज्ञिता ॥
prakṛtiḥ sā parā mahyaṃ rodasī lokadhāriṇī | ṛtā satyāmarājayyā lokānāmātmasaṃjñitā
वही मेरी परा प्रकृति है, जो द्युलोक और पृथ्वी को धारण करती और लोकों को सँभालती है। वह ऋत है, सत्य है, अमर और अजेय है, और लोकों की आत्मा कही जाती है।
श्लोक 15 (12.350.15)
तस्मात्सर्वाः प्रवर्तन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः । तपो यज्ञश्च यष्टा च पुराणः पुरुषो विराट् ॥
tasmātsarvāḥ pravartante sargapralayavikriyāḥ | tapo yajñaśca yaṣṭā ca purāṇaḥ puruṣo virāṭ
उसी से सृष्टि और प्रलय के सारे विकार चलते हैं। उसी से तप, यज्ञ, यजमान और पुराण पुरुष विराट् प्रकट होते हैं,
श्लोक 16 (12.350.16)
अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकानां प्रभवाप्ययः । ब्राह्मे रात्रिक्षये प्राप्ते तस्य ह्यमिततेजसः ॥
aniruddha iti prokto lokānāṃ prabhavāpyayaḥ | brāhme rātrikṣaye prāpte tasya hyamitatejasaḥ
जिन्हें अनिरुद्ध कहा गया है और जिनसे लोकों की उत्पत्ति और लय होता है। जब ब्रह्मा की रात्रि समाप्त हुई, तब उन अपार तेज वाले की
श्लोक 17 (12.350.17)
प्रसादात्प्रादुरभवत्पद्ममर्कनिभं क्षणात् । तत्र ब्रह्मा समभवत्स तस्यैव प्रसादजः ॥
prasādātprādurabhavatpadmamarkanibhaṃ kṣaṇāt | tatra brahmā samabhavatsa tasyaiva prasādajaḥ
कृपा से क्षणभर में सूर्य के समान दीप्त एक कमल प्रकट हुआ। उसी में ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जो उन्हीं की कृपा से जन्मे थे।
श्लोक 18 (12.350.18)
अह्नः क्षये ललाटाच्च सुतो देवस्य वै तथा । क्रोधाविष्टस्य संजज्ञे रुद्रः संहारकारकः ॥
ahnaḥ kṣaye lalāṭācca suto devasya vai tathā | krodhāviṣṭasya saṃjajñe rudraḥ saṃhārakārakaḥ
दिन के अन्त में क्रोध से भरे उन देव के ललाट से उनका पुत्र उत्पन्न हुआ — रुद्र, जो संहार करने वाला है।
श्लोक 19 (12.350.19)
एतौ द्वौ विबुधश्रेष्ठौ प्रसादक्रोधजावुभौ । तदादर्शितपन्थानौ सृष्टिसंहारकारकौ ॥
etau dvau vibudhaśreṣṭhau prasādakrodhajāvubhau | tadādarśitapanthānau sṛṣṭisaṃhārakārakau
ये दोनों देवश्रेष्ठ — एक कृपा से और दूसरा क्रोध से उत्पन्न माना गया — उन्हीं के दिखाए मार्ग पर चलकर सृष्टि और संहार करते हैं।
श्लोक 20 (12.350.20)
निमित्तमात्रं तावत्र सर्वप्राणिवरप्रदौ । कपर्दी जटिलो मुण्डः श्मशानगृहसेवकः ॥
nimittamātraṃ tāvatra sarvaprāṇivarapradau | kapardī jaṭilo muṇḍaḥ śmaśānagṛhasevakaḥ
वे दोनों यहाँ केवल निमित्त हैं और सब प्राणियों को वर देने वाले हैं। रुद्र जटाजूट धारण करने वाले, जटाधारी, मुण्डित सिर वाले और श्मशान को घर बनाने वाले हैं;
श्लोक 21 (12.350.21)
उग्रव्रतचरो रुद्रो योगी त्रिपुरदारणः । दक्षक्रतुहरश्चैव भगनेत्रहरस्तथा ॥
ugravratacaro rudro yogī tripuradāraṇaḥ | dakṣakratuharaścaiva bhaganetraharastathā
वे उग्र व्रतों का पालन करने वाले, योगी और त्रिपुर का भीषण संहार करने वाले हैं; उन्होंने दक्ष का यज्ञ नष्ट किया और भग के नेत्र हर लिए।
श्लोक 22 (12.350.22)
नारायणात्मको ज्ञेयः पाण्डवेय युगेयुगे । तस्मिन्हि पूज्यमाने वै देवदेवे महेश्वरे ॥
nārāyaṇātmako jñeyaḥ pāṇḍaveya yugeyuge | tasminhi pūjyamāne vai devadeve maheśvare
हे पाण्डवेय, उन्हें युग-युग में नारायण-स्वरूप ही जानना चाहिए। देवाधिदेव महेश्वर की पूजा होने पर
श्लोक 23 (12.350.23)
संपूजितो भवेत्पार्थ देवो नारायणः प्रभुः । अहमात्मा हि लोकानां विश्वेषां पाण्डुनन्दन ॥
saṃpūjito bhavetpārtha devo nārāyaṇaḥ prabhuḥ | ahamātmā hi lokānāṃ viśveṣāṃ pāṇḍunandana
हे पार्थ, प्रभु देव नारायण की भी भली-भाँति पूजा हो जाती है। हे पाण्डुनन्दन, मैं सब लोकों का आत्मा हूँ;
श्लोक 24 (12.350.24)
तस्मादात्मानमेवाग्रे रुद्रं संपूजयाम्यहम् । यद्यहं नार्चयेयं वै ईशानं वरदं शिवम् ॥
tasmādātmānamevāgre rudraṃ saṃpūjayāmyaham | yadyahaṃ nārcayeyaṃ vai īśānaṃ varadaṃ śivam
इसीलिए मैं सबसे पहले अपने ही आत्मा की, रुद्र के रूप में, पूजा करता हूँ। यदि मैं वरदायक ईशान शिव की पूजा न करूँ,
श्लोक 25 (12.350.25)
आत्मानं नार्चयेत्कश्चिदिति मे भावितात्मनः । मया प्रमाणं हि कृतं लोकः समनुवर्तते ॥
ātmānaṃ nārcayetkaściditi me bhāvitātmanaḥ | mayā pramāṇaṃ hi kṛtaṃ lokaḥ samanuvartate
तो कोई भी अपने आत्मा की पूजा न करेगा — ऐसा मेरे संयत मन का विचार है। मैंने जो प्रमाण स्थापित किया है, लोक उसी का अनुसरण करता है।
श्लोक 26 (12.350.26)
प्रमाणानि हि पूज्यानि ततस्तं पूजयाम्यहम् । यस्तं वेत्ति स मां वेत्ति योऽनु तं स हि मामनु ॥
pramāṇāni hi pūjyāni tatastaṃ pūjayāmyaham | yastaṃ vetti sa māṃ vetti yo'nu taṃ sa hi māmanu
प्रमाण आदर के योग्य होते हैं, इसलिए मैं उनकी पूजा करता हूँ। जो उन्हें जानता है वह मुझे जानता है, और जो उनका अनुगामी है वह मेरा ही अनुगामी है।
श्लोक 27 (12.350.27)
रुद्रो नारायणश्चैव सत्वमेकं द्विधा कृतम् । लोके चरति कौन्तेय व्यक्तिस्थं सर्वकर्मसु ॥
rudro nārāyaṇaścaiva satvamekaṃ dvidhā kṛtam | loke carati kaunteya vyaktisthaṃ sarvakarmasu
रुद्र और नारायण एक ही सत्त्व हैं जो दो रूपों में बँट गया है। हे कौन्तेय, वह सब कर्मों में व्यक्त रूप से लोक में विचरता है।
श्लोक 28 (12.350.28)
न हि मे केनचिद्देयो वरः पाण्डवनन्दन । इति संचिन्त्य मनसा पुराणं रुद्रमीश्वरम् ॥
na hi me kenaciddeyo varaḥ pāṇḍavanandana | iti saṃcintya manasā purāṇaṃ rudramīśvaram
हे पाण्डवनन्दन, कोई मुझे वर नहीं दे सकता। मन में ऐसा विचार करके मैंने पुराण पुरुष, ईश्वर रुद्र की
श्लोक 29 (12.350.29)
पुत्रार्थमाराधितवानहमात्मानमात्मना । न हि विष्णुः प्रणमति कस्मैचिद्विबुधाय च ॥
putrārthamārādhitavānahamātmānamātmanā | na hi viṣṇuḥ praṇamati kasmaicidvibudhāya ca
पुत्र के लिए आराधना की — अपने ही द्वारा अपने ही आत्मा की आराधना की। विष्णु अपने आत्मा के सिवा किसी देवता को प्रणाम नहीं करते;
श्लोक 30 (12.350.30)
ऋते आत्मानमेवेति ततो रुद्रं नमाम्यहम् । सब्रह्मकाः सरुद्राश्च सेन्द्रा देवाः सहर्षिभिः ॥
ṛte ātmānameveti tato rudraṃ namāmyaham | sabrahmakāḥ sarudrāśca sendrā devāḥ saharṣibhiḥ
इसलिए मैं रुद्र को प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र और ऋषियों सहित देवता
श्लोक 31 (12.350.31)
अर्चयन्ति सुरश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् । भविष्यतां वर्ततां च भूतानां चैव भारत ॥
arcayanti suraśreṣṭhaṃ devaṃ nārāyaṇaṃ harim | bhaviṣyatāṃ vartatāṃ ca bhūtānāṃ caiva bhārata
सुरश्रेष्ठ देव नारायण हरि की पूजा करते हैं। हे भारत, जो प्राणी होने वाले हैं और जो अभी हैं, उन सबमें
श्लोक 32 (12.350.32)
सर्वेषामग्रणीर्विष्णुः सेव्यः पूज्यश्च नित्यशः । नमस्व हव्यदं विष्णुं तथा शरणदं नमः ॥
sarveṣāmagraṇīrviṣṇuḥ sevyaḥ pūjyaśca nityaśaḥ | namasva havyadaṃ viṣṇuṃ tathā śaraṇadaṃ namaḥ
विष्णु सबके अग्रणी हैं और सदा सेवनीय और पूजनीय हैं। हव्य देने वाले विष्णु को नमस्कार करो; शरण देने वाले को भी नमस्कार करो;
श्लोक 33 (12.350.33)
वरदं नमस्व कौन्तेय हव्यकव्यभुजं नमः । चतुर्विधा मम जना भक्ता एव हि मे श्रुतम् ॥
varadaṃ namasva kaunteya havyakavyabhujaṃ namaḥ | caturvidhā mama janā bhaktā eva hi me śrutam
हे कौन्तेय, वरदाता को नमस्कार करो; देवों और पितरों के हव्य-कव्य के भोक्ता को नमस्कार करो। मेरे भक्त चार प्रकार के हैं — ऐसा मैंने सुना है।
श्लोक 34 (12.350.34)
तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठा ये चैवानन्यदेवताः । अहमेव गतिस्तेषां निराशीः कर्मकारिणाम् ॥
teṣāmekāntinaḥ śreṣṭhā ye caivānanyadevatāḥ | ahameva gatisteṣāṃ nirāśīḥ karmakāriṇām
इनमें एकान्तभक्त श्रेष्ठ हैं, जिनका कोई और देवता नहीं है। फल की आशा के बिना कर्म करने वाले उन भक्तों की गति मैं ही हूँ।
श्लोक 35 (12.350.35)
ये च शिष्टास्त्रयो भक्ताः फलकामा हि ते मताः । सर्वे च्यवनधर्माणः प्रतिबुद्धस्तु श्रेष्ठभाक् ॥
ye ca śiṣṭāstrayo bhaktāḥ phalakāmā hi te matāḥ | sarve cyavanadharmāṇaḥ pratibuddhastu śreṣṭhabhāk
शेष तीन प्रकार के भक्त फल की कामना करने वाले माने गए हैं; वे सब पतनशील हैं, किन्तु जागृत भक्त श्रेष्ठ फल का भागी है।
श्लोक 36 (12.350.36)
ब्रह्माणं शितिकण्ठं च याश्चान्या देवताः स्मृताः । प्रबुद्धचर्याः सेवन्तो मामेवैष्यन्ति यत्फलम् ॥
brahmāṇaṃ śitikaṇṭhaṃ ca yāścānyā devatāḥ smṛtāḥ | prabuddhacaryāḥ sevanto māmevaiṣyanti yatphalam
जागृत आचरण वाले साधक ब्रह्मा, नीलकण्ठ शिव और जो अन्य देवता माने गए हैं, उनकी सेवा करते हुए भी मुझे ही प्राप्त करते हैं; वही फल है।
श्लोक 37 (12.350.37)
भक्तं प्रति विशेषस्ते एष पार्थानुकीर्तितः । त्वं चैवाहं च कौन्तेय नरनारायणौ स्मृतौ ॥
bhaktaṃ prati viśeṣaste eṣa pārthānukīrtitaḥ | tvaṃ caivāhaṃ ca kaunteya naranārāyaṇau smṛtau
हे पार्थ, भक्त के विषय में यह भेद तुम्हें बता दिया गया। हे कौन्तेय, तुम और मैं नर और नारायण माने गए हैं;
श्लोक 38 (12.350.38)
भारावतरणार्थं तु प्रविष्टौ मानुषीं तनुम् । जानाम्यध्यात्मयोगांश्च योऽहं यस्माच्च भारत ॥
bhārāvataraṇārthaṃ tu praviṣṭau mānuṣīṃ tanum | jānāmyadhyātmayogāṃśca yo'haṃ yasmācca bhārata
पृथ्वी का भार उतारने के लिए हम दोनों ने मानव शरीर धारण किया है। हे भारत, मैं अध्यात्मयोगों को जानता हूँ, और यह भी कि मैं कौन हूँ और किसलिए हूँ।
श्लोक 39 (12.350.39)
निवृत्तिलक्षणो धर्मस्तथाभ्युदयिकोऽपि च । नराणामयनं ख्यातमहमेकः सनातनः ॥
nivṛttilakṣaṇo dharmastathābhyudayiko'pi ca | narāṇāmayanaṃ khyātamahamekaḥ sanātanaḥ
मैं निवृत्ति-लक्षण धर्म को जानता हूँ और अभ्युदय देने वाले धर्म को भी। मनुष्यों का आश्रय (अयन) कहा गया मैं ही हूँ — मैं एकमात्र सनातन हूँ।
श्लोक 40 (12.350.40)
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः । अयनं मम ताः पूर्वमतो नारायणोऽस्म्यहम् ॥
āpo nārā iti proktā āpo vai narasūnavaḥ | ayanaṃ mama tāḥ pūrvamato nārāyaṇo'smyaham
जल को ‘नार’ कहा गया है, क्योंकि जल नर की सन्तान है। वह जल आरम्भ में मेरा अयन (निवास) था, इसीलिए मैं नारायण हूँ।
श्लोक 41 (12.350.41)
छादयामि जगद्विश्वं भूत्वा सूर्य इवांशुभिः । सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम् ॥
chādayāmi jagadviśvaṃ bhūtvā sūrya ivāṃśubhiḥ | sarvabhūtādhivāsaśca vāsudevastato hyaham
सूर्य जैसे अपनी किरणों से, वैसे ही मैं सारे जगत् को आच्छादित करता हूँ, और मैं सब प्राणियों का निवास हूँ; इसीलिए मैं वासुदेव हूँ।
श्लोक 42 (12.350.42)
गतिश्च सर्वभूतानां प्रजनश्चापि भारत । व्याप्ता मे रोदसी पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम ॥
gatiśca sarvabhūtānāṃ prajanaścāpi bhārata | vyāptā me rodasī pārtha kāntiścābhyadhikā mama
हे भारत, मैं सब प्राणियों की गति हूँ और प्रजाओं की उत्पत्ति का आधार भी हूँ। हे पार्थ, द्यावापृथ्वी मुझमें व्याप्त हैं और मेरी कान्ति सबसे बढ़कर है।
श्लोक 43 (12.350.43)
अधिभूतनिविष्टश्च तद्विश्वं चास्मि भारत । क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसंज्ञितः ॥
adhibhūtaniviṣṭaśca tadviśvaṃ cāsmi bhārata | kramaṇāccāpyahaṃ pārtha viṣṇurityabhisaṃjñitaḥ
हे भारत, मैं भूतों में प्रविष्ट हूँ और वही सारा विश्व भी हूँ। और हे पार्थ, क्रमण (डग भरने) के कारण मैं विष्णु नाम से कहा जाता हूँ।
श्लोक 44 (12.350.44)
दमात्सिद्धिं परीप्सन्तो मां जनाः कामयन्ति ह । दिवं चोर्वीं च मध्यं च तस्माद्दामोदरो ह्यहम् ॥
damātsiddhiṃ parīpsanto māṃ janāḥ kāmayanti ha | divaṃ corvīṃ ca madhyaṃ ca tasmāddāmodaro hyaham
दम (आत्मसंयम) से सिद्धि पाना चाहने वाले लोग मुझे चाहते हैं; और स्वर्ग, पृथ्वी तथा अन्तरिक्ष मेरे उदर में स्थित हैं। इसीलिए मैं दामोदर हूँ।
श्लोक 45 (12.350.45)
पृश्निरित्युच्यते चान्नं वेदा आपोऽमृतं तथा । ममैतानि सदा गर्भः पृश्निगर्भस्ततो ह्यहम् ॥
pṛśnirityucyate cānnaṃ vedā āpo'mṛtaṃ tathā | mamaitāni sadā garbhaḥ pṛśnigarbhastato hyaham
अन्न को ‘पृश्नि’ कहा जाता है, और वेद, जल तथा अमृत को भी। ये सब सदा मेरा गर्भ (अन्तःस्थल) हैं, इसीलिए मैं पृश्निगर्भ हूँ।
श्लोक 46 (12.350.46)
ऋषयः प्राहुरेवं मां त्रितं कूपनिपातितम् । पृश्निगर्भ त्रितं पाहीत्येकतद्वितपातितम् ॥
ṛṣayaḥ prāhurevaṃ māṃ tritaṃ kūpanipātitam | pṛśnigarbha tritaṃ pāhītyekatadvitapātitam
कुएँ में गिराए गए त्रित के विषय में ऋषियों ने मुझे इस प्रकार पुकारा — ‘हे पृश्निगर्भ, त्रित की रक्षा करो!’ — उस त्रित के लिए, जिसे एकत और द्वित ने गिरा दिया था।
श्लोक 47 (12.350.47)
ततः स ब्रह्मणः पुत्र आद्यो ह्यृषिवरस्त्रितः । उत्ततारोदपानाद्वै पृश्निगर्भानुकीर्तनात् ॥
tataḥ sa brahmaṇaḥ putra ādyo hyṛṣivarastritaḥ | uttatārodapānādvai pṛśnigarbhānukīrtanāt
तब ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र, ऋषियों में श्रेष्ठ त्रित पृश्निगर्भ का नाम पुकारने से कुएँ से बाहर निकल आए।
श्लोक 48 (12.350.48)
सूर्यस्य तपतो लोकानग्नेः सोमस्य चाप्युत । अंशवो यत्प्रकाशन्ते ममैते केशसंज्ञिताः ॥
sūryasya tapato lokānagneḥ somasya cāpyuta | aṃśavo yatprakāśante mamaite keśasaṃjñitāḥ
लोकों को तपाने वाले सूर्य की, तथा अग्नि और चन्द्रमा की जो किरणें प्रकाशित होती हैं, वे मेरे केश कहलाती हैं।
श्लोक 49 (12.350.49)
सर्वज्ञाः केशवं तस्मान्मामाहुर्द्विजसत्तमाः । स्वपत्न्यामाहितो गर्भ उचथ्येन महात्मना ॥
sarvajñāḥ keśavaṃ tasmānmāmāhurdvijasattamāḥ | svapatnyāmāhito garbha ucathyena mahātmanā
इसीलिए सर्वज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझे केशव कहते हैं। महात्मा उतथ्य ने अपनी पत्नी में गर्भ स्थापित किया था।
श्लोक 50 (12.350.50)
उचथ्येऽन्तर्हिते चैव कदाचिद्देवताज्ञया । बृहस्पतिरथाविन्दत्तां पत्नीं तस्य धीमतः ॥
ucathye'ntarhite caiva kadāciddevatājñayā | bṛhaspatirathāvindattāṃ patnīṃ tasya dhīmataḥ
एक बार उतथ्य के अन्तर्हित हो जाने पर देवताओं की आज्ञा से बृहस्पति ने उन बुद्धिमान की उस पत्नी को अपना लिया, हे भारत।
श्लोक 51 (12.350.51)
ततो वै तमृषिश्रेष्ठं मैथुनोपगतं तथा । उवाच गर्भः कौन्तेय पञ्चभूतगुणात्मकः ॥
tato vai tamṛṣiśreṣṭhaṃ maithunopagataṃ tathā | uvāca garbhaḥ kaunteya pañcabhūtaguṇātmakaḥ
तब उन ऋषिश्रेष्ठ के मैथुन के लिए उद्यत होने पर, हे कौन्तेय, पाँच भूतों के गुणों से बना वह गर्भ बोल उठा —
श्लोक 52 (12.350.52)
पूर्वागतोऽहं वरद नार्हस्यम्बां प्रबाधितुम् । एतद्बृहस्पतिः श्रुत्वा चुक्रोध च शशाप च ॥
pūrvāgato'haṃ varada nārhasyambāṃ prabādhitum | etadbṛhaspatiḥ śrutvā cukrodha ca śaśāpa ca
‘हे वरद, मैं पहले आया हूँ; आपको मेरी माता को पीड़ा नहीं देनी चाहिए।’ यह सुनकर बृहस्पति क्रुद्ध हुए और उन्होंने शाप दिया —
श्लोक 53 (12.350.53)
मैथुनायागतो यस्मात्त्वयाऽहं विनिवारितः । तस्मादन्धो यास्यसि त्वं मच्छापान्नात्र संशयः ॥
maithunāyāgato yasmāttvayā'haṃ vinivāritaḥ | tasmādandho yāsyasi tvaṃ macchāpānnātra saṃśayaḥ
‘मैं मैथुन के लिए आया था और तुमने मुझे रोक दिया; इसलिए तुम अन्धे हो जाओगे — मेरे शाप से इसमें सन्देह नहीं।’
श्लोक 54 (12.350.54)
स शापादृषिमुख्यस्य दीर्घं तम उपेयिवान् । स हि दीर्घतमा नाम नाम्ना ह्यासीदृषिः पुरा ॥
sa śāpādṛṣimukhyasya dīrghaṃ tama upeyivān | sa hi dīrghatamā nāma nāmnā hyāsīdṛṣiḥ purā
उन ऋषिमुख्य के शाप से वह दीर्घ अन्धकार में पड़ गया; इसीलिए वह प्राचीन ऋषि दीर्घतमा नाम से प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 55 (12.350.55)
वेदानवाप्य चतुरः साङ्गोपाङ्गान्सनातनान् । प्रयोजयामास तदा नाम गुह्यमिदं मम ॥
vedānavāpya caturaḥ sāṅgopāṅgānsanātanān | prayojayāmāsa tadā nāma guhyamidaṃ mama
सांगोपांग चारों सनातन वेदों को प्राप्त करके उसने तब मेरे इस गुप्त नाम का प्रयोग किया —
श्लोक 56 (12.350.56)
आनुपूर्व्येण विधिना केशवेति पुनः पुनः । स चक्षुष्मान्समभवद्गौतमश्चाभवत्पुनः ॥
ānupūrvyeṇa vidhinā keśaveti punaḥ punaḥ | sa cakṣuṣmānsamabhavadgautamaścābhavatpunaḥ
विधिपूर्वक, क्रम से, बार-बार ‘केशव’ कहते हुए। तब वह चक्षुष्मान् हो गया और फिर गौतम कहलाया।
श्लोक 57 (12.350.57)
एवं हि वरदं नाम केशवेति ममार्जुन । देवानामथ सर्वेषामृषीणां च महात्मनाम् ॥
evaṃ hi varadaṃ nāma keśaveti mamārjuna | devānāmatha sarveṣāmṛṣīṇāṃ ca mahātmanām
हे अर्जुन, इस प्रकार ‘केशव’ नाम मेरा वरदायक नाम है — सभी देवताओं और महात्मा ऋषियों के लिए।
श्लोक 58 (12.350.58)
अग्निः सोमेन संयुक्त एकयोनिर्मुखं कृतम् । अग्नीषोममयं तस्माज्जगत्कृत्स्नं चराचरम् ॥
agniḥ somena saṃyukta ekayonirmukhaṃ kṛtam | agnīṣomamayaṃ tasmājjagatkṛtsnaṃ carācaram
अग्नि सोम से संयुक्त है; दोनों एक ही योनि के हैं और देवताओं का मुख बनाए गए हैं; इसलिए यह सारा चराचर जगत् अग्नि-सोममय है।
श्लोक 59 (12.350.59)
अपि हि पुराणे भवति एकयोन्यावग्नीषोमौ देवाश्चाग्निमुखा इति। एकयोनित्वाच्च परस्परं हर्षयन्तो लोकान्धारयन्त इति ॥
api hi purāṇe bhavati ekayonyāvagnīṣomau devāścāgnimukhā iti | ekayonitvācca parasparaṃ harṣayanto lokāndhārayanta iti
पुराण में भी कहा गया है: अग्नि और सोम एक ही योनि वाले हैं; देवता अग्निमुख हैं; और एक ही योनि होने के कारण वे एक-दूसरे को हर्षित करते हुए लोकों को धारण करते हैं।