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शान्ति पर्व · अध्याय 375

उञ्छवृत्ति ब्राह्मण का वन-प्रवेश; शान्तिपर्व की समाप्ति

भीष्म युधिष्ठिर को बताते हैं कि नाग से विदा लेकर ब्राह्मण च्यवन के पास गया, जिन्होंने उसका सत्कार किया और यह कथा सुनी। फिर वे बताते हैं कि यह कथा च्यवन से जनक के घर में नारद को, नारद से इन्द्र को, वसुओं को, और अन्त में रामजी से अपने युद्ध के समय स्वयं भीष्म को कैसे प्राप्त हुई। नाग द्वारा कर्तव्य बता दिए जाने पर ब्राह्मण नपे-तुले उञ्छ पर निर्वाह करने के लिए वन में प्रविष्ट हुआ। इसके साथ शान्तिपर्व समाप्त होता है।

अध्याय 374अध्याय-सूची

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.375.1)

स चामन्त्र्योरगश्रेष्ठं ब्राह्मणः कृतनिश्चयः । दीक्षाकाङ्क्षी तदा राजंश्च्यवनं भार्गवं श्रितः ॥

sa cāmantryoragaśreṣṭhaṃ brāhmaṇaḥ kṛtaniścayaḥ | dīkṣākāṅkṣī tadā rājaṃścyavanaṃ bhārgavaṃ śritaḥ

सर्पश्रेष्ठ से विदा लेकर, निश्चय में दृढ़ वह ब्राह्मण, दीक्षा की इच्छा से, हे राजन्, भार्गव च्यवन की शरण में गया।

श्लोक 2 (12.375.2)

स तेन कृतसत्कारो धर्ममेवाधितस्थिवान् । तथैव च कथामेतां राजन्कथितवांस्तदा ॥

sa tena kṛtasatkāro dharmamevādhitasthivān | tathaiva ca kathāmetāṃ rājankathitavāṃstadā

उनसे सत्कार पाकर वह धर्म में ही लग गया; और हे राजन्, उसी प्रकार उसने तब उन्हें यही कथा सुनाई।

श्लोक 3 (12.375.3)

भार्गवेणापि राजेन्द्र जनकस्य निवेशने । कथैषा कथिता पुण्या नारदाय महात्मने ॥

bhārgaveṇāpi rājendra janakasya niveśane | kathaiṣā kathitā puṇyā nāradāya mahātmane

और हे राजेन्द्र, भार्गव ने भी जनक के भवन में महात्मा नारद को यह पुण्य कथा सुनाई।

श्लोक 4 (12.375.4)

नारदेनापि राजेन्द्र देवेन्द्रस्य निवेशने । कथिता भरतश्रेष्ठ पृष्टेनाक्लिष्टकर्मणा ॥

nāradenāpi rājendra devendrasya niveśane | kathitā bharataśreṣṭha pṛṣṭenākliṣṭakarmaṇā

और हे राजेन्द्र, हे भरतश्रेष्ठ, नारद ने भी देवराज के भवन में अक्लिष्टकर्मा के पूछने पर इसे सुनाया।

श्लोक 5 (12.375.5)

देवराजेन च पुरा कथितैषा कथा शुभा । समस्तेभ्यः प्रशस्तेभ्यो विप्रेभ्यो वसुधाधिप ॥

devarājena ca purā kathitaiṣā kathā śubhā | samastebhyaḥ praśastebhyo viprebhyo vasudhādhipa

और हे पृथ्वीपति, पूर्वकाल में देवराज ने भी यह शुभ कथा सब श्रेष्ठ विप्रों को सुनाई थी।

श्लोक 6 (12.375.6)

यदा च मम रामेण युद्धमासीत्सुदारुणम् । वसुभिश्च तदा राजन्कथेयं कथिता मम ॥

yadā ca mama rāmeṇa yuddhamāsītsudāruṇam | vasubhiśca tadā rājankatheyaṃ kathitā mama

जब रामजी के साथ मेरा अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ था, तब हे राजन्, वसुओं ने मुझे यह कथा सुनाई थी।

श्लोक 7 (12.375.7)

पृच्छमानाय तत्त्वेन मया चैवोत्तमा तव । कथेयं कथिता पुण्या धर्म्या धर्मभृतांवर ॥

pṛcchamānāya tattvena mayā caivottamā tava | katheyaṃ kathitā puṇyā dharmyā dharmabhṛtāṃvara

हे धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ, तुम्हारे तत्त्व से पूछने पर मैंने भी तुम्हें यह उत्तम, पुण्य और धर्मयुक्त कथा सुनाई है।

श्लोक 8 (12.375.8)

तदेव परमो धर्मो यन्मां पृच्छसि भारत । आसीद्धीरो ह्यनाकाङ्क्षी धर्मार्थकरणे नृप ॥

tadeva paramo dharmo yanmāṃ pṛcchasi bhārata | āsīddhīro hyanākāṅkṣī dharmārthakaraṇe nṛpa

हे भारत, तुम मुझसे जो पूछते हो, वही परम धर्म है: हे राजन्, वह धर्म और उसके प्रयोजन के कार्य में धैर्यवान और इच्छारहित था।

श्लोक 9 (12.375.9)

स च किल कृतनिश्चयो द्विजो । भुजगपतिप्रतिदेशितात्मकृत्यः । यमनियमसहो वनान्तरं । परिगणितोञ्छशिलाशनः प्रविष्टः ॥

sa ca kila kṛtaniścayo dvijo | bhujagapatipratideśitātmakṛtyaḥ | yamaniyamasaho vanāntaraṃ | parigaṇitoñchaśilāśanaḥ praviṣṭaḥ

और वह ब्राह्मण, जैसा कहा जाता है, निश्चय में दृढ़, सर्पराज द्वारा अपना कर्तव्य बता दिए जाने पर, यम-नियमों को निभाने में समर्थ, नपे-तुले उञ्छ और शिल (बीने हुए अन्न) पर निर्वाह करता हुआ वन के भीतर प्रविष्ट हो गया।

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