शान्ति पर्व · अध्याय 42
युधिष्ठिर द्वारा कृष्ण की स्तुति
अभिषेक के बाद युधिष्ठिर कृष्ण के सामने हाथ जोड़कर कहते हैं कि अपना पैतृक राज्य उन्होंने कृष्ण की कृपा और नीति से पाया है। फिर वे विश्वकर्मा, विष्णु और हरि से लेकर केशव तक कृष्ण के नामों और रूपों की लम्बी सूची के साथ उनकी स्तुति करते हैं और उन्हें जगत् की उत्पत्ति और प्रलय का कारण बताते हैं। कृष्ण प्रसन्न होकर सभा के बीच उन्हें स्नेह से उत्तर देते हैं, और अन्तिम श्लोक में कहा गया है कि इन सौ नामों का पाठ या श्रवण करने वाला सब पापों से छूट जाता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.42.1)
अभिषिक्तो महाप्राज्ञो राज्यं प्राप्य युधिष्ठिरः । दाशार्हं पुण्डरीकाक्षमुवाच प्राञ्जलिः शुचिः ॥
abhiṣikto mahāprājño rājyaṃ prāpya yudhiṣṭhiraḥ | dāśārhaṃ puṇḍarīkākṣamuvāca prāñjaliḥ śuciḥ
अभिषिक्त होकर और राज्य पाकर महाबुद्धिमान् युधिष्ठिर ने शुद्ध भाव से हाथ जोड़कर कमलनयन दाशार्ह से कहा:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (12.42.2)
तव कृष्ण प्रसादेन नयेन न बलेन च । बुद्ध्या च यदुशार्दूल तथा विक्रमणेन च ॥
tava kṛṣṇa prasādena nayena na balena ca | buddhyā ca yaduśārdūla tathā vikramaṇena ca
"हे कृष्ण, आपकी कृपा से, नीति से, बल से नहीं, हे यदुश्रेष्ठ, बुद्धि से और पराक्रम से,"
श्लोक 3 (12.42.3)
पुनः प्राप्तमिदं राज्यं पितृपैतामहं मया । नमस्ते पुण्डरीकाक्ष पुनः पुनररिंदम ॥
punaḥ prāptamidaṃ rājyaṃ pitṛpaitāmahaṃ mayā | namaste puṇḍarīkākṣa punaḥ punarariṃdama
"मैंने अपने पिता-पितामह का यह राज्य फिर पा लिया है। हे कमलनयन, हे शत्रुदमन, आपको बार-बार नमस्कार है।"
श्लोक 4 (12.42.4)
त्वामेकमाहुः पुरुषं त्वामाहुः सात्वतां पतिम् । नामभिस्त्वां बहुविधैः स्तुवन्ति प्रयता द्विजाः ॥
tvāmekamāhuḥ puruṣaṃ tvāmāhuḥ sātvatāṃ patim | nāmabhistvāṃ bahuvidhaiḥ stuvanti prayatā dvijāḥ
"आपको एकमात्र पुरुष कहते हैं, आपको सात्वतों का स्वामी कहते हैं। शुद्ध द्विज आपकी अनेक नामों से स्तुति करते हैं।"
श्लोक 5 (12.42.5)
विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन्विश्वसंभव । विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ॥
viśvakarmannamaste'stu viśvātmanviśvasaṃbhava | viṣṇo jiṣṇo hare kṛṣṇa vaikuṇṭha puruṣottama
"हे विश्वकर्मन्, हे विश्वात्मन्, हे विश्व के उत्पत्तिस्थान, हे विष्णु, जिष्णु, हरि, कृष्ण, वैकुण्ठ, पुरुषोत्तम, आपको नमस्कार है!"
श्लोक 6 (12.42.6)
अदित्याः सप्तधा त्वं तु पुराणो गर्भतां गतः । पृश्निगर्भस्त्वमेवैकस्त्रियुगं त्वां वदन्त्यपि ॥
adityāḥ saptadhā tvaṃ tu purāṇo garbhatāṃ gataḥ | pṛśnigarbhastvamevaikastriyugaṃ tvāṃ vadantyapi
"आप पुराण पुरुष ने सात रूपों में अदिति के गर्भ में प्रवेश किया; आप ही अकेले पृश्निगर्भ हैं; और आपको त्रियुग भी कहते हैं।"
श्लोक 7 (12.42.7)
शुचिश्रवा हृषीकेशो घृतार्चिर्हंस उच्यते । त्रिचक्षुः शंभुरेकस्त्वं विभुर्दामोदरोऽपि च ॥
śuciśravā hṛṣīkeśo ghṛtārcirhaṃsa ucyate | tricakṣuḥ śaṃbhurekastvaṃ vibhurdāmodaro'pi ca
"आप शुचिश्रवा, हृषीकेश, घृतार्चि और हंस कहे जाते हैं; आप अकेले त्रिचक्षु और शम्भु हैं; आप विभु हैं, और दामोदर भी।"
श्लोक 8 (12.42.8)
वराहोऽग्निर्बृहद्भानुर्वृषभस्तार्क्ष्यलक्षणः । अनीकसाहः पुरुषः शिपिविष्ट उरुक्रमः ॥
varāho'gnirbṛhadbhānurvṛṣabhastārkṣyalakṣaṇaḥ | anīkasāhaḥ puruṣaḥ śipiviṣṭa urukramaḥ
"वराह, अग्नि, बृहद्भानु, वृषभ, तार्क्ष्यलक्षण, अनीकसाह, पुरुष, शिपिविष्ट, उरुक्रम।"
श्लोक 9 (12.42.9)
वरिष्ठ उग्रसेनानीः सत्यो वाजसनिर्गुहः । अच्युतश्च्यावनोऽरीणां संस्कृतो विकृतिर्वृषः ॥
variṣṭha ugrasenānīḥ satyo vājasanirguhaḥ | acyutaścyāvano'rīṇāṃ saṃskṛto vikṛtirvṛṣaḥ
"वरिष्ठ, उग्रसेनानी, सत्य, वाजसनि, गुह, अच्युत, शत्रुओं को च्युत करने वाले, संस्कृत, विकृति, वृष।"
श्लोक 10 (12.42.10)
कृष्णधर्मस्त्वमेवादिर्वृषदर्भो वृषाकपिः । सिन्धुर्विधूर्मिस्त्रिककुप् त्रिधामा त्रिवृदच्युतः ॥
kṛṣṇadharmastvamevādirvṛṣadarbho vṛṣākapiḥ | sindhurvidhūrmistrikakup tridhāmā trivṛdacyutaḥ
"कृष्णधर्म, आप ही आदि हैं; वृषदर्भ, वृषाकपि; सिन्धु, विधूर्मि, त्रिककुप्, त्रिधामा, त्रिवृत्, अच्युत।"
श्लोक 11 (12.42.11)
सम्राड् विराट् स्वराट् चैव स्वराड्भूतमयो भवः । विभूर्भूरतिभूः कृष्णः कृष्णवर्त्मा त्वमेव च ॥
samrāḍ virāṭ svarāṭ caiva svarāḍbhūtamayo bhavaḥ | vibhūrbhūratibhūḥ kṛṣṇaḥ kṛṣṇavartmā tvameva ca
"सम्राट्, विराट् और स्वराट्; प्राणियों से बना स्वयंराजा; भव; विभु, भू, अतिभू, कृष्ण, और कृष्णवर्त्मा भी आप ही हैं।"
श्लोक 12 (12.42.12)
स्विष्टकृद्भिषजावर्तः कपिलस्त्वं च वामनः । यज्ञो ध्रुवः पतङ्गश्च जयत्सेनस्त्वमुच्यसे ॥
sviṣṭakṛdbhiṣajāvartaḥ kapilastvaṃ ca vāmanaḥ | yajño dhruvaḥ pataṅgaśca jayatsenastvamucyase
"स्विष्टकृत्, भिषज्, आवर्त, कपिल और वामन आप हैं; यज्ञ, ध्रुव, पतङ्ग और जयत्सेन आप कहे जाते हैं।"
श्लोक 13 (12.42.13)
शिखण्डी नहुषो बभ्रुर्दिविस्पृक् त्वं पुनर्वसुः । सुबभ्रू रुक्मयज्ञश्च सुषेणो दुन्दुभिस्तथा ॥
śikhaṇḍī nahuṣo babhrurdivispṛk tvaṃ punarvasuḥ | subabhrū rukmayajñaśca suṣeṇo dundubhistathā
"शिखण्डी, नहुष, बभ्रु, दिविस्पृक्, आप पुनर्वसु हैं; सुबभ्रु, रुक्मयज्ञ, सुषेण और दुन्दुभि भी।"
श्लोक 14 (12.42.14)
गभस्तिनेमिः श्रीपद्मः पुष्करः शुष्मधारणः । ऋभुर्विभुः सर्वसूक्ष्मस्त्वं धरित्री च पठ्यसे ॥
gabhastinemiḥ śrīpadmaḥ puṣkaraḥ śuṣmadhāraṇaḥ | ṛbhurvibhuḥ sarvasūkṣmastvaṃ dharitrī ca paṭhyase
"गभस्तिनेमि, श्रीपद्म, पुष्कर, शुष्मधारण, ऋभु, विभु, सर्वसूक्ष्म; और आप धरित्री, पृथ्वी के रूप में भी पढ़े जाते हैं।"
श्लोक 15 (12.42.15)
अम्भोनिधिस्त्वं ब्रह्मा त्वं पवित्रं धाम धामवित् । हिरण्यगर्भः पुरुषः स्वधा स्वाहा च केशवः ॥
ambhonidhistvaṃ brahmā tvaṃ pavitraṃ dhāma dhāmavit | hiraṇyagarbhaḥ puruṣaḥ svadhā svāhā ca keśavaḥ
"आप अम्भोनिधि हैं, आप ब्रह्मा हैं, पवित्र धाम और धाम के ज्ञाता हैं; हिरण्यगर्भ, पुरुष, स्वधा और स्वाहा, केशव।"
श्लोक 16 (12.42.16)
योनिस्त्वमस्य प्रलयश्च कृष्ण । त्वमेवेदं सृजसि विश्वमग्रे । विश्वं चेदं त्वद्वशे विश्वयोने । नमोस्तु ते शार्ङ्गचक्रासिपाणे ॥
yonistvamasya pralayaśca kṛṣṇa | tvamevedaṃ sṛjasi viśvamagre | viśvaṃ cedaṃ tvadvaśe viśvayone | namostu te śārṅgacakrāsipāṇe
"हे कृष्ण, आप इस जगत् की योनि और इसके प्रलय भी हैं; आप ही पहले इस विश्व की सृष्टि करते हैं; यह विश्व आपके वश में है, हे विश्वयोने। हे शार्ङ्ग, चक्र और खड्ग धारण करने वाले, आपको नमस्कार है!"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (12.42.17)
एवं स्तुतो धर्मराजेन कृष्णः । सभामध्ये प्रीतिमान्पुष्कराक्षः । तमभ्यनन्दद्भारतं पुष्कलाभि । र्वाग्भिर्ज्येष्ठं पाण्डवं यादवाग्र्यः ॥
evaṃ stuto dharmarājena kṛṣṇaḥ | sabhāmadhye prītimānpuṣkarākṣaḥ | tamabhyanandadbhārataṃ puṣkalābhi | rvāgbhirjyeṣṭhaṃ pāṇḍavaṃ yādavāgryaḥ
धर्मराज की इस प्रकार स्तुति सुनकर कमलनयन कृष्ण ने सभा के बीच प्रसन्न होकर, यादवों में श्रेष्ठ उन्होंने, ज्येष्ठ पाण्डव भरतवंशी का भरे-पूरे वचनों से अभिनन्दन किया।
श्लोक 18 (12.42.18)
एतन्नामशतं विष्णोर्धर्मराजेन कीर्तितम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
etannāmaśataṃ viṣṇordharmarājena kīrtitam | yaḥ paṭhecchṛṇuyādvāpi sarvapāpaiḥ pramucyate
धर्मराज द्वारा कहे गए विष्णु के ये सौ नाम: जो इन्हें पढ़ता या सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।