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शान्ति पर्व · अध्याय 41

मृतकों के श्राद्ध और दान

युधिष्ठिर युद्ध में मारे गए बन्धुओं और मित्रों के श्राद्ध करवाते हैं: धृतराष्ट्र अपने पुत्रों के लिए दान देते हैं, और युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ द्रोण, कर्ण, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, हैडिम्ब, विराट, द्रुपद और द्रौपदी के पुत्रों के लिए, तथा उन राजाओं के लिए भी जिनका कोई सुहृद् नहीं बचा था। वे हज़ारों ब्राह्मणों को तृप्त करते हैं, सभाएँ, प्याऊ और तालाब बनवाते हैं, धृतराष्ट्र, गान्धारी, विदुर और विधवा स्त्रियों का सम्मान करते हैं, दीनों की सहायता करते हैं, और फिर पृथ्वी जीतकर तथा ऋण से मुक्त होकर राजा के रूप में सुखपूर्वक रहते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.41.1)

ततो युधिष्ठिरो राजा ज्ञातीनां ये हता युधि । श्राद्धानि कारयामास तेषां पृथगुदारधीः ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā jñātīnāṃ ye hatā yudhi | śrāddhāni kārayāmāsa teṣāṃ pṛthagudāradhīḥ

तब उदार बुद्धि वाले राजा युधिष्ठिर ने युद्ध में मारे गए अपने जाति-बन्धुओं के श्राद्ध अलग-अलग करवाए।

श्लोक 2 (12.41.2)

धृतराष्ट्रो ददौ राजा पुत्राणामौर्ध्वदेहिकम् । सर्वकामगुणोपेतमन्नं गाश्च धनानि च । रत्नानि च विचित्राणि महार्हाणि महायशाः ॥

dhṛtarāṣṭro dadau rājā putrāṇāmaurdhvadehikam | sarvakāmaguṇopetamannaṃ gāśca dhanāni ca | ratnāni ca vicitrāṇi mahārhāṇi mahāyaśāḥ

राजा धृतराष्ट्र ने, महायशस्वी होकर, अपने पुत्रों के लिए ऊर्ध्वदैहिक दान दिया: सब मनचाहे गुणों से युक्त अन्न, गौएँ और धन, और अनेक प्रकार के बहुमूल्य रत्न।

श्लोक 3 (12.41.3)

युधिष्ठिरस्तु द्रोणस्य कर्णस्य च महात्मनः । धृष्टद्युम्नाभिमन्युभ्यां हेडिम्बस्य च रक्षसः ॥

yudhiṣṭhirastu droṇasya karṇasya ca mahātmanaḥ | dhṛṣṭadyumnābhimanyubhyāṃ heḍimbasya ca rakṣasaḥ

और युधिष्ठिर ने द्रोण, महात्मा कर्ण, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु और राक्षस हैडिम्ब के लिए भी ऐसा ही किया।

श्लोक 4 (12.41.4)

विराटप्रभृतीनां च सुहृदामुपकारिणाम् । द्रुपदद्रौपदेयानां द्रौपद्या सहितो ददौ ॥

virāṭaprabhṛtīnāṃ ca suhṛdāmupakāriṇām | drupadadraupadeyānāṃ draupadyā sahito dadau

विराट आदि अपने उपकारी मित्रों के लिए, और द्रुपद तथा द्रौपदी के पुत्रों के लिए भी, उसने द्रौपदी के साथ मिलकर दान दिया।

श्लोक 5 (12.41.5)

ब्राह्मणानां सहस्राणि पृथगेकैकमुद्दिशन् । धनै रत्नैश्च गोभिश्च वस्त्रैश्च समतर्पयत् ॥

brāhmaṇānāṃ sahasrāṇi pṛthagekaikamuddiśan | dhanai ratnaiśca gobhiśca vastraiśca samatarpayat

एक-एक का नाम लेकर उद्देश्य करते हुए उसने धन, रत्न, गौओं और वस्त्रों से हज़ारों ब्राह्मणों को तृप्त किया।

श्लोक 6 (12.41.6)

ये चान्ये पृथिवीपाला येषां नास्ति सुहृज्जनः । उद्दिश्योद्दिश्य तेषां च चक्रे राजौर्ध्वदेहिकम् ॥

ye cānye pṛthivīpālā yeṣāṃ nāsti suhṛjjanaḥ | uddiśyoddiśya teṣāṃ ca cakre rājaurdhvadehikam

और उन अन्य राजाओं के लिए भी, जिनका कोई सुहृद् नहीं बचा था, राजा ने एक-एक का उद्देश्य करके उनका और्ध्वदैहिक कर्म किया।

श्लोक 7 (12.41.7)

सभाः प्रपाश्च विविधास्तटाकानि च पाण्डवः । सुहृदां कारयामास सर्वेषामौर्ध्वदेहिकम् ॥

sabhāḥ prapāśca vividhāstaṭākāni ca pāṇḍavaḥ | suhṛdāṃ kārayāmāsa sarveṣāmaurdhvadehikam

पाण्डव ने अपने सब सुहृदों के और्ध्वदैहिक कर्म के रूप में सभाएँ, प्याऊ और अनेक तालाब भी बनवाए।

श्लोक 8 (12.41.8)

स तेषामनृणो भूत्वा गत्वा लोकेष्ववाच्यताम् । कृतकृत्योऽभवद्राजा प्रजा धर्मेण पालयन् ॥

sa teṣāmanṛṇo bhūtvā gatvā lokeṣvavācyatām | kṛtakṛtyo'bhavadrājā prajā dharmeṇa pālayan

उनके ऋण से उऋण होकर और लोकों में निन्दा से परे होकर राजा कृतकृत्य हुआ और धर्म से प्रजा का पालन करने लगा।

श्लोक 9 (12.41.9)

धृतराष्ट्रं यथापूर्वं गान्धारीं विदुरं तथा । सर्वांश्च कौरवान्मान्यान्भृत्यांश्च समपूजयत् ॥

dhṛtarāṣṭraṃ yathāpūrvaṃ gāndhārīṃ viduraṃ tathā | sarvāṃśca kauravānmānyānbhṛtyāṃśca samapūjayat

धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुर का उसने पहले की तरह सत्कार किया, तथा सब माननीय कौरवों और सेवकों का भी।

श्लोक 10 (12.41.10)

याश्च तत्र स्त्रियः काश्चिद्धतवीरा हतात्मजाः । सर्वास्ताः कौरवो राजा संपूज्यापालयद्धृणी ॥

yāśca tatra striyaḥ kāściddhatavīrā hatātmajāḥ | sarvāstāḥ kauravo rājā saṃpūjyāpālayaddhṛṇī

और वहाँ जो-जो स्त्रियाँ थीं जिनके वीर पति और पुत्र मारे जा चुके थे, उन सबका दयालु कुरुराज ने सम्मान करके पालन किया।

श्लोक 11 (12.41.11)

दीनान्धकृपणानां च गृहाच्छादनभोजनैः । आनृशंस्यपरो राजा चकारानुग्रहं प्रभुः ॥

dīnāndhakṛpaṇānāṃ ca gṛhācchādanabhojanaiḥ | ānṛśaṃsyaparo rājā cakārānugrahaṃ prabhuḥ

दीनों, अन्धों और कंगालों पर उस प्रभु ने घर, वस्त्र और भोजन देकर दया की; वह राजा कोमल स्वभाव में लीन था।

श्लोक 12 (12.41.12)

स विजित्य महीं कृत्स्नामानृण्यं प्राप्य वैरिषु । निःसपत्नः सुखी राजा विजहार युधिष्ठिरः ॥

sa vijitya mahīṃ kṛtsnāmānṛṇyaṃ prāpya vairiṣu | niḥsapatnaḥ sukhī rājā vijahāra yudhiṣṭhiraḥ

सारी पृथ्वी को जीतकर और शत्रुओं के प्रति वैर का ऋण चुकाकर राजा युधिष्ठिर निष्कण्टक और सुखी होकर विहार करने लगा।

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