शान्ति पर्व · अध्याय 44
जनमेजय का प्रश्न; युधिष्ठिर का कृष्ण के पास जाना
जनमेजय वैशम्पायन से पूछते हैं कि राज्य पाने के बाद युधिष्ठिर और कृष्ण ने क्या किया। वैशम्पायन बताते हैं कि युधिष्ठिर ने वर्णों को व्यवस्थित किया, हज़ारों ब्राह्मणों, धौम्य, कृप और विदुर को प्रचुर दान दिया, युयुत्सु का सम्मान किया, राज्य के कार्य धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुर को सौंपे और फिर कृष्ण के पास गए। उन्होंने कृष्ण को मणिजटित पलंग पर बैठे देखा, मेरु पर्वत पर बादल की तरह श्याम और तेजस्वी; उन्होंने उनकी रात और कुशल के बारे में पूछा, पर कृष्ण ने कुछ उत्तर नहीं दिया और ध्यान में डूब गए।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (12.44.1)
प्राप्य राज्यं महाबाहुर्धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । यदन्यदकरोद्विप्र तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥
prāpya rājyaṃ mahābāhurdharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | yadanyadakarodvipra tanme vaktumihārhasi
"हे विप्र, राज्य पाकर महाबाहु धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने और क्या किया? कृपया मुझे यह बताइए।"
श्लोक 2 (12.44.2)
भगवान्वा हृषीकेशस्त्रैलोक्यस्य परो गुरुः । ऋषे यदकरोद्वीरस्तच्च व्याख्यातुमर्हसि ॥
bhagavānvā hṛṣīkeśastrailokyasya paro guruḥ | ṛṣe yadakarodvīrastacca vyākhyātumarhasi
"और हे ऋषि, तीनों लोकों के परम गुरु भगवान् हृषीकेश ने, उस वीर ने, क्या किया? वह भी बताइए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (12.44.3)
शृणु तत्त्वेन राजेन्द्र कीर्त्यमानं मयाऽनघ । वासुदेवं पुरस्कृत्य यदकुर्वत पाण्डवाः ॥
śṛṇu tattvena rājendra kīrtyamānaṃ mayā'nagha | vāsudevaṃ puraskṛtya yadakurvata pāṇḍavāḥ
"हे राजेन्द्र, हे निष्पाप, सुनिए; मैं यथार्थ रूप से बताता हूँ कि वासुदेव को आगे रखकर पाण्डवों ने क्या किया।"
श्लोक 4 (12.44.4)
प्राप्य राज्यं महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । वर्णान्संस्थापयामास नयेन विनयेन च ॥
prāpya rājyaṃ mahārāja kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | varṇānsaṃsthāpayāmāsa nayena vinayena ca
हे महाराज, राज्य पाकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने नीति और विनय से वर्णों को अपने-अपने स्थान पर स्थापित किया।
श्लोक 5 (12.44.5)
ब्राह्मणानां सहस्रं च स्नातकानां महात्मनाम् । सहस्रनिष्कैरेकैकं तर्पयामास पाण्डवः ॥
brāhmaṇānāṃ sahasraṃ ca snātakānāṃ mahātmanām | sahasraniṣkairekaikaṃ tarpayāmāsa pāṇḍavaḥ
पाण्डव ने एक हज़ार महात्मा स्नातक ब्राह्मणों में से प्रत्येक को एक-एक हज़ार निष्क देकर तृप्त किया।
श्लोक 6 (12.44.6)
तथाऽनुजीविनो भृत्यान्संश्रितानतिथीनपि । कामैः संतर्पयामास कृपणांस्तार्किकानपि ॥
tathā'nujīvino bhṛtyānsaṃśritānatithīnapi | kāmaiḥ saṃtarpayāmāsa kṛpaṇāṃstārkikānapi
इसी प्रकार उसने अपने आश्रितों, सेवकों, शरण में आए लोगों, अतिथियों, दीनों और तर्क करने वालों तक को भी उनकी इच्छित वस्तुओं से सन्तुष्ट किया।
श्लोक 7 (12.44.7)
पुरोहिताय धौम्याय प्रादादयुतशः स गाः । धनं सुवर्णं रजतं वासांसि विविधान्यपि ॥
purohitāya dhaumyāya prādādayutaśaḥ sa gāḥ | dhanaṃ suvarṇaṃ rajataṃ vāsāṃsi vividhānyapi
अपने पुरोहित धौम्य को उसने दसियों हज़ार गौएँ, धन, सोना, चाँदी और अनेक प्रकार के वस्त्र दिए।
श्लोक 8 (12.44.8)
कृपाय च महाराज पितृवत्तमतर्पयत् । विदुराय च राजाऽसौ पूजां चक्रे यतव्रतः ॥
kṛpāya ca mahārāja pitṛvattamatarpayat | vidurāya ca rājā'sau pūjāṃ cakre yatavrataḥ
हे महाराज, उसने कृप को पिता की तरह आदर देकर सन्तुष्ट किया; और संयमी व्रत वाले उस राजा ने विदुर का भी सम्मान किया।
श्लोक 9 (12.44.9)
भक्ष्यान्नपानैर्विविधैर्वासोभिः शयनासनैः । सर्वान्संतोषयामास संश्रितान्ददतां वरः ॥
bhakṣyānnapānairvividhairvāsobhiḥ śayanāsanaiḥ | sarvānsaṃtoṣayāmāsa saṃśritāndadatāṃ varaḥ
अनेक प्रकार के भोज्य अन्न-पान, वस्त्र, शय्या और आसनों से दाताओं में श्रेष्ठ उसने अपने सब आश्रितों को सन्तुष्ट किया।
श्लोक 10 (12.44.10)
लब्धप्रशमनं कृत्वा स राजा राजसत्तम । युयुत्सोर्धार्तराष्ट्रस्य पूजां चक्रे महायशाः ॥
labdhapraśamanaṃ kṛtvā sa rājā rājasattama | yuyutsordhārtarāṣṭrasya pūjāṃ cakre mahāyaśāḥ
प्राप्त धन का यथोचित बाँटकर उसे शान्त करके, हे राजसत्तम, उस महायशस्वी राजा ने धृतराष्ट्र के पुत्र युयुत्सु का सम्मान किया।
श्लोक 11 (12.44.11)
धृतराष्ट्राय तद्राज्यं गान्धार्यै विदुराय च । निवेद्य सुस्थवद्राजा सुखमास्ते युधिष्ठिरः ॥
dhṛtarāṣṭrāya tadrājyaṃ gāndhāryai vidurāya ca | nivedya susthavadrājā sukhamāste yudhiṣṭhiraḥ
उस राज्य को धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुर को सौंपकर राजा युधिष्ठिर निश्चिन्त की तरह सुख से रहने लगे।
श्लोक 12 (12.44.12)
तथा सर्वं स नगरं प्रसाद्य भरतर्षभ । वासुदेवं महात्मानमभ्यगच्छत्कृताञ्जलिः ॥
tathā sarvaṃ sa nagaraṃ prasādya bharatarṣabha | vāsudevaṃ mahātmānamabhyagacchatkṛtāñjaliḥ
तब सारे नगर को सन्तुष्ट करके, हे भरतश्रेष्ठ, वह हाथ जोड़कर महात्मा वासुदेव के पास गया।
श्लोक 13 (12.44.13)
ततो महति पर्यङ्के मणिकाञ्चनभूषिते । ददर्श कृष्णमासीनं नीलं मेराविवाम्बुदम् ॥
tato mahati paryaṅke maṇikāñcanabhūṣite | dadarśa kṛṣṇamāsīnaṃ nīlaṃ merāvivāmbudam
वहाँ मणियों और सोने से सजे एक विशाल पलंग पर उसने कृष्ण को बैठे देखा, जो मेरु पर्वत पर बादल की तरह श्याम थे।
श्लोक 14 (12.44.14)
जाज्वल्यमानं वपुषा दिव्याभरणभूषितम् । पीतकौशेयवसनं हेम्नेवोपगतं मणिम् ॥
jājvalyamānaṃ vapuṣā divyābharaṇabhūṣitam | pītakauśeyavasanaṃ hemnevopagataṃ maṇim
शरीर से जगमगाते, दिव्य आभूषणों से सजे, पीले रेशमी वस्त्र पहने, सोने में जड़े मणि के समान,
श्लोक 15 (12.44.15)
कौस्तुभेनोरसिस्थेन मणिनाऽभिविराजितम् । उद्यतेवोदयं शैलं सूर्येणाभिविराजितम् ॥
kaustubhenorasisthena maṇinā'bhivirājitam | udyatevodayaṃ śailaṃ sūryeṇābhivirājitam
वक्षःस्थल पर स्थित कौस्तुभ मणि से शोभित, उदयाचल पर्वत की तरह जो सूर्य से सुशोभित हो।
श्लोक 16 (12.44.16)
नौपम्यं विद्यते तस्य त्रिषु लोकेषु किंचन ॥
naupamyaṃ vidyate tasya triṣu lokeṣu kiṃcana
तीनों लोकों में उसकी कोई उपमा नहीं है।
श्लोक 17 (12.44.17)
सोऽभिगम्य महात्मानं विष्णुं पुरुषसत्तमम् । उवाच मधुरं राजा स्मितपूर्वमिदं तदा ॥
so'bhigamya mahātmānaṃ viṣṇuṃ puruṣasattamam | uvāca madhuraṃ rājā smitapūrvamidaṃ tadā
पुरुषोत्तम महात्मा विष्णु के पास पहुँचकर राजा ने तब पहले मुस्कराकर मधुर वाणी में उनसे कहा:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 18 (12.44.18)
सुखेन ते निशा कच्चिद्व्युष्टा बुद्धिमतां वर । कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि तवाच्युत ॥
sukhena te niśā kaccidvyuṣṭā buddhimatāṃ vara | kaccijjñānāni sarvāṇi prasannāni tavācyuta
"हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, आपकी रात सुख से बीती? हे अच्युत, आपके सब ज्ञान-साधन प्रसन्न तो हैं?"
श्लोक 19 (12.44.19)
तथैवोपश्रिता देवी बुद्धिर्बुद्धिमतां वर । वयं राज्यमनुप्राप्ताः पृथिवी च वशे स्थिता ॥
tathaivopaśritā devī buddhirbuddhimatāṃ vara | vayaṃ rājyamanuprāptāḥ pṛthivī ca vaśe sthitā
"इसी प्रकार, हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, बुद्धि-देवी आपमें आश्रय पाए हुए है; हमने राज्य पा लिया है और पृथ्वी हमारे वश में है।"
श्लोक 20 (12.44.20)
तव प्रसादाद्भगवंस्त्रिलोकगतिविक्रम । जयं प्राप्ता यशश्चाग्र्यं न च धर्मच्युता वयम् ॥
tava prasādādbhagavaṃstrilokagativikrama | jayaṃ prāptā yaśaścāgryaṃ na ca dharmacyutā vayam
"हे त्रिलोकी में पराक्रम करने वाले भगवान्, आपकी कृपा से हमने विजय और श्रेष्ठ यश पाया है, और हम धर्म से च्युत नहीं हुए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (12.44.21)
तं तथा भाषमाणं तु धर्मराजमरिंदमम् । नोवाच भगवान्किंचिद्ध्यानमेवान्वपद्यत ॥
taṃ tathā bhāṣamāṇaṃ tu dharmarājamariṃdamam | novāca bhagavānkiṃciddhyānamevānvapadyata
इस प्रकार बोलते हुए शत्रुदमन धर्मराज से भगवान् ने कुछ नहीं कहा और ध्यान में लीन हो गए।