शान्ति पर्व · अध्याय 45
कृष्ण का भीष्म-ध्यान और रथ की तैयारी
युधिष्ठिर कृष्ण से पूछते हैं कि वे गहरे ध्यान में निश्चल क्यों बैठे हैं। कृष्ण बताते हैं कि उनका मन बाणशय्या पर पड़े भीष्म की ओर गया था, जिनके जाने पर पृथ्वी चन्द्रहीन रात्रि जैसी हो जाएगी, और वे युधिष्ठिर को प्रेरित करते हैं कि भीष्म के जाने से पहले उनसे राजधर्म और चतुर्विध ज्ञान के विषय में पूछें। युधिष्ठिर सहमत होकर कृष्ण से आगे चलने को कहते हैं; कृष्ण रथ जुतवाते हैं और दारुक उसके तैयार होने की सूचना देता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.45.1)
किमिदं परमाश्चर्यं ध्यायस्यमितविक्रम । कच्चिल्लोकत्रयस्यास्य स्वस्ति लोकपरायण ॥
kimidaṃ paramāścaryaṃ dhyāyasyamitavikrama | kaccillokatrayasyāsya svasti lokaparāyaṇa
हे अमित पराक्रमी कृष्ण! यह कैसा परम आश्चर्य है कि आप ध्यान में लीन बैठे हैं? हे लोकों के आश्रय! तीनों लोकों का कुशल तो है न?
श्लोक 2 (12.45.2)
इन्द्रियाणि मनश्चैव बुद्धौ संवेशितानि ते । चतुर्थं ध्यानमार्गं त्वमालम्ब्य पुरुषर्षभ । अपक्रान्तो यतो जीवस्तेन मे विस्मितं मनः ॥
indriyāṇi manaścaiva buddhau saṃveśitāni te | caturthaṃ dhyānamārgaṃ tvamālambya puruṣarṣabha | apakrānto yato jīvastena me vismitaṃ manaḥ
आपकी इन्द्रियाँ और आपका मन बुद्धि में समाहित हो गए हैं; हे पुरुषश्रेष्ठ! ध्यान के चौथे मार्ग का आश्रय लेकर आप उस अवस्था से परे चले गए हैं जिसमें जीव रहता है, इसीलिए मेरा मन विस्मय से भर गया है।
श्लोक 3 (12.45.3)
निगृहीतो हि वायुस्ते पञ्चकर्मा शरीरगः । इन्द्रियाणि च सर्वाणि मनसि स्थापितानि ते ॥
nigṛhīto hi vāyuste pañcakarmā śarīragaḥ | indriyāṇi ca sarvāṇi manasi sthāpitāni te
आपके शरीर में विचरने वाला पाँच कर्मों वाला प्राणवायु रुका हुआ है और आपकी समस्त इन्द्रियाँ मन में स्थापित हो गई हैं।
श्लोक 4 (12.45.4)
वाक्च सत्वं च गोविन्द बुद्धौ संवेशितानि ते । सर्वे चैव गुणा देवाः क्षेत्रज्ञे ते निवेशिताः ॥
vākca satvaṃ ca govinda buddhau saṃveśitāni te | sarve caiva guṇā devāḥ kṣetrajñe te niveśitāḥ
हे गोविन्द! आपकी वाणी और आपका मन बुद्धि में लीन हो गए हैं, और सब गुण तथा इन्द्रियों के देवता आपके भीतर क्षेत्रज्ञ में स्थापित हो गए हैं।
श्लोक 5 (12.45.5)
नेङ्गन्ति तव रोमाणि स्थिरा बुद्धिस्तथा मनः । काष्ठकुड्यशिलाभूतो निरीहश्चासि माधव ॥
neṅganti tava romāṇi sthirā buddhistathā manaḥ | kāṣṭhakuḍyaśilābhūto nirīhaścāsi mādhava
हे माधव! आपके रोम नहीं हिलते, आपकी बुद्धि और मन स्थिर हैं; आप काठ, दीवार या पत्थर के समान निश्चेष्ट हो गए हैं।
श्लोक 6 (12.45.6)
यथा दीपो निवातस्थो निरिङ्गो ज्वलतेऽच्युत । तथाऽसि भगवन्देव निश्चलो योगनिश्चयात् ॥
yathā dīpo nivātastho niriṅgo jvalate'cyuta | tathā'si bhagavandeva niścalo yoganiścayāt
हे अच्युत! जैसे वायुरहित स्थान में रखा दीपक बिना काँपे जलता है, वैसे ही हे भगवन्! आप योग के दृढ़ निश्चय से अचल हैं।
श्लोक 7 (12.45.7)
यदि श्रोतुमिहार्हामि न रहस्यं च ते यदि । छिन्धि मे संशयं देव प्रपन्नायाभियाचते ॥
yadi śrotumihārhāmi na rahasyaṃ ca te yadi | chindhi me saṃśayaṃ deva prapannāyābhiyācate
यदि मैं सुनने के योग्य हूँ और यदि यह आपका गोपनीय रहस्य नहीं है, तो हे देव! मेरा संशय दूर कीजिए; मैं शरण में आकर आपसे यह माँगता हूँ।
श्लोक 8 (12.45.8)
त्वं हि कर्ता विकर्ता च त्वं क्षरश्चाक्षरश्च ह । अनादिनिधनो ह्याद्यस्त्वमेकः पुरुषोत्तम ॥
tvaṃ hi kartā vikartā ca tvaṃ kṣaraścākṣaraśca ha | anādinidhano hyādyastvamekaḥ puruṣottama
आप ही कर्ता और विकर्ता हैं, आप ही क्षर और अक्षर हैं; हे पुरुषोत्तम! आप अनादि, अनन्त और आदिपुरुष हैं, आप एक ही हैं।
श्लोक 9 (12.45.9)
त्वं प्रपन्नाय भक्ताय शिरसा प्रणताय च । ध्यानस्यास्य यथातत्त्वं ब्रूहि धर्मभृतां वर ॥
tvaṃ prapannāya bhaktāya śirasā praṇatāya ca | dhyānasyāsya yathātattvaṃ brūhi dharmabhṛtāṃ vara
हे धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ! मैं आपकी शरण में आया हुआ, आपका भक्त हूँ और सिर झुकाकर आपको प्रणाम करता हूँ; मुझे इस ध्यान का यथार्थ रहस्य बताइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (12.45.10)
ततः स्वगोचरे न्यस्य मनोबुद्धीन्द्रियाणि च । स्मितपूर्वमुवाचेदं भगवान्वासवानुजः ॥
tataḥ svagocare nyasya manobuddhīndriyāṇi ca | smitapūrvamuvācedaṃ bhagavānvāsavānujaḥ
तब मन, बुद्धि और इन्द्रियों को अपने-अपने स्थान में स्थापित करके इन्द्र के छोटे भाई भगवान् ने मुस्कराते हुए यह कहा।
वासुदेव उवाच
श्लोक 11 (12.45.11)
शरतल्पगतो भीष्मः शाम्यन्निव हुताशनः । मां ध्याति पुरुषव्याघ्रस्ततो मे तद्गतं मनः ॥
śaratalpagato bhīṣmaḥ śāmyanniva hutāśanaḥ | māṃ dhyāti puruṣavyāghrastato me tadgataṃ manaḥ
हे पुरुषसिंह! बाणों की शय्या पर पड़े भीष्म बुझती हुई अग्नि के समान शान्त होते जा रहे हैं और मेरा ध्यान कर रहे हैं; इसीलिए मेरा मन उनकी ओर चला गया था।
श्लोक 12 (12.45.12)
यस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । न सहेद्देवराजोऽपि तमस्मि मनसा गतः ॥
yasya jyātalanirghoṣaṃ visphūrjitamivāśaneḥ | na saheddevarājo'pi tamasmi manasā gataḥ
जिनके धनुष की प्रत्यंचा का घोष वज्र की कड़क के समान है और जिसे देवराज इन्द्र भी सहन नहीं कर सकते, मेरा मन उन्हीं के पास चला गया था।
श्लोक 13 (12.45.13)
येनाभिजित्य तरसा समस्तं राजमण्डलम् । ऊढास्तिस्रः पुरा कन्यास्तमस्मि मनसा गतः ॥
yenābhijitya tarasā samastaṃ rājamaṇḍalam | ūḍhāstisraḥ purā kanyāstamasmi manasā gataḥ
जिन्होंने पूर्वकाल में वेग से समस्त राजमण्डल को जीतकर तीन कन्याओं का हरण किया था, मेरा मन उन्हीं के पास चला गया था।
श्लोक 14 (12.45.14)
त्रयोविंशतिरात्रं यो योधयामास भार्गवम् । न च रामेण निस्तीर्णस्तमस्मि मनसा गतः ॥
trayoviṃśatirātraṃ yo yodhayāmāsa bhārgavam | na ca rāmeṇa nistīrṇastamasmi manasā gataḥ
जिन्होंने तेईस रात तक भृगुवंशी परशुराम से युद्ध किया और जो परशुराम से भी पराजित नहीं हुए, मेरा मन उन्हीं के पास चला गया था।
श्लोक 15 (12.45.15)
यं गङ्गा गर्भविधिना धारयामास भारतम् । वसिष्ठशिष्यं तं तात गतोऽस्मि मनसा नृप ॥
yaṃ gaṅgā garbhavidhinā dhārayāmāsa bhāratam | vasiṣṭhaśiṣyaṃ taṃ tāta gato'smi manasā nṛpa
हे तात! हे राजन्! जिन भरतवंशी को गंगा ने गर्भविधि से धारण किया था और जो वसिष्ठ के शिष्य हैं, मेरा मन उन्हीं के पास चला गया था।
श्लोक 16 (12.45.16)
दिव्यास्त्राणि महातेजा यो धारयति बुद्धिमान् । साङ्गांश्च चतुरो वेदांस्तमस्मि मनसा गतः ॥
divyāstrāṇi mahātejā yo dhārayati buddhimān | sāṅgāṃśca caturo vedāṃstamasmi manasā gataḥ
जो महातेजस्वी और बुद्धिमान् दिव्य अस्त्रों को तथा अंगों सहित चारों वेदों को धारण करते हैं, मेरा मन उन्हीं के पास चला गया था।
श्लोक 17 (12.45.17)
रामस्य दयितं शिष्यं जामदग्न्यस्य पाण्डव । आधारं सर्वविद्यानां तमस्मि मनसा गतः ॥
rāmasya dayitaṃ śiṣyaṃ jāmadagnyasya pāṇḍava | ādhāraṃ sarvavidyānāṃ tamasmi manasā gataḥ
हे पाण्डव! जो जमदग्निपुत्र परशुराम के प्रिय शिष्य और समस्त विद्याओं के आधार हैं, मेरा मन उन्हीं के पास चला गया था।
श्लोक 18 (12.45.18)
एकीकृत्येन्द्रियग्रामं मनः संयम्य मेधया । शरणं मामुपागच्छत्ततो मे तद्गतं मनः ॥
ekīkṛtyendriyagrāmaṃ manaḥ saṃyamya medhayā | śaraṇaṃ māmupāgacchattato me tadgataṃ manaḥ
इन्द्रियों के समूह को एक करके और बुद्धि से मन को संयत करके वे मेरी शरण में आए थे; इसीलिए मेरा मन उनकी ओर चला गया था।
श्लोक 19 (12.45.19)
स हि भूतं भविष्यच्च भवच्च भरतर्षभ । वेत्ति धर्मविदां श्रेष्ठस्तमस्मि मनसा गतः ॥
sa hi bhūtaṃ bhaviṣyacca bhavacca bharatarṣabha | vetti dharmavidāṃ śreṣṭhastamasmi manasā gataḥ
हे भरतश्रेष्ठ! वे धर्म जानने वालों में श्रेष्ठ भीष्म भूत, भविष्य और वर्तमान को जानते हैं; मेरा मन उन्हीं के पास चला गया था।
श्लोक 20 (12.45.20)
तस्मिन्हि पुरुषव्याघ्रे शान्ते भीष्मे महात्मनि । भविष्यति मही पार्थ नष्टचन्द्रेव शर्वरी ॥
tasminhi puruṣavyāghre śānte bhīṣme mahātmani | bhaviṣyati mahī pārtha naṣṭacandreva śarvarī
हे पार्थ! उन महात्मा पुरुषसिंह भीष्म के शान्त हो जाने पर यह पृथ्वी चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर रात्रि के समान हो जाएगी।
श्लोक 21 (12.45.21)
तद्युधिष्ठिर गाङ्गेयं भीष्मं भीमपराक्रमम् । अभिगम्योपसंगृह्य पृच्छ यत्ते मनोगतम् ॥
tadyudhiṣṭhira gāṅgeyaṃ bhīṣmaṃ bhīmaparākramam | abhigamyopasaṃgṛhya pṛccha yatte manogatam
इसलिए हे युधिष्ठिर! भयंकर पराक्रम वाले गंगापुत्र भीष्म के पास जाकर उनके चरणों में प्रणाम करो और जो तुम्हारे मन में है, उसे पूछो।
श्लोक 22 (12.45.22)
चातुर्विद्यं चातुर्होत्रं चातुराश्रम्यमेव च । राजधर्मांश्च निखिलान्पृच्छैनं पृथिवीपते ॥
cāturvidyaṃ cāturhotraṃ cāturāśramyameva ca | rājadharmāṃśca nikhilānpṛcchainaṃ pṛthivīpate
हे पृथ्वीपति! चारों विद्याओं, चार होताओं के कर्म, चारों आश्रमों और राजाओं के सब धर्मों के विषय में उनसे पूछो।
श्लोक 23 (12.45.23)
तस्मिन्नस्तमिते भीष्मे कौरवाणां धुरंधरे । ज्ञानान्यल्पीभविष्यन्ति तस्मात्त्वां चोदयाम्यहम् ॥
tasminnastamite bhīṣme kauravāṇāṃ dhuraṃdhare | jñānānyalpībhaviṣyanti tasmāttvāṃ codayāmyaham
कौरवों का भार वहन करने वाले भीष्म के अस्त हो जाने पर ज्ञान क्षीण हो जाएगा; इसीलिए मैं तुम्हें प्रेरित कर रहा हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (12.45.24)
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य तथ्यं वचनमुत्तमम् । साश्रुकण्ठः स धर्मज्ञो जनार्दनमुवाच ह ॥
tacchrutvā vāsudevasya tathyaṃ vacanamuttamam | sāśrukaṇṭhaḥ sa dharmajño janārdanamuvāca ha
वासुदेव का यह सच्चा और उत्तम वचन सुनकर धर्म के ज्ञाता राजा ने भरे हुए कण्ठ और आँखों में आँसू लिए जनार्दन से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 25 (12.45.25)
यद्भवानाह भीष्मस्य प्रभावं प्रति माधव । तथा तन्नात्र संदेहो विद्यते मम माधव ॥
yadbhavānāha bhīṣmasya prabhāvaṃ prati mādhava | tathā tannātra saṃdeho vidyate mama mādhava
हे माधव! भीष्म के प्रभाव के विषय में आपने जो कहा, वह वैसा ही है; हे माधव! इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं है।
श्लोक 26 (12.45.26)
महाभाग्यं च भीष्मस्य प्रभावश्च महाद्युते । श्रुतं मया कथयतां ब्राह्मणानां महात्मनाम् ॥
mahābhāgyaṃ ca bhīṣmasya prabhāvaśca mahādyute | śrutaṃ mayā kathayatāṃ brāhmaṇānāṃ mahātmanām
हे महातेजस्वी! भीष्म का महान् सौभाग्य और प्रभाव मैंने भी महात्मा ब्राह्मणों के कहते हुए सुना है।
श्लोक 27 (12.45.27)
भवांश्च कर्ता लोकानां यद्ब्रवीत्यरिसूदन । तथा तदनभिध्येयं वाक्यं यादवनन्दन ॥
bhavāṃśca kartā lokānāṃ yadbravītyarisūdana | tathā tadanabhidhyeyaṃ vākyaṃ yādavanandana
हे शत्रुसूदन! आप लोकों के कर्ता हैं और जो कुछ आप कहते हैं, हे यादवनन्दन! वह वचन विचार से परे है, उस पर सन्देह नहीं किया जा सकता।
श्लोक 28 (12.45.28)
यदि त्वनुग्रहवती बुद्धिस्ते मयि माधव । त्वामग्रतः पुरस्कृत्य भीष्मं यास्यामहे वयम् ॥
yadi tvanugrahavatī buddhiste mayi mādhava | tvāmagrataḥ puraskṛtya bhīṣmaṃ yāsyāmahe vayam
हे माधव! यदि मुझ पर आपकी कृपा-बुद्धि है, तो हम आपको आगे करके भीष्म के पास चलेंगे।
श्लोक 29 (12.45.29)
आवृत्ते भगवत्यर्के स हि लोकान्गमिष्यति । त्वद्दर्शनं महाबाहो तस्मादर्हति कौरवः ॥
āvṛtte bhagavatyarke sa hi lokāngamiṣyati | tvaddarśanaṃ mahābāho tasmādarhati kauravaḥ
भगवान् सूर्य के लौट आने पर वे लोकों को चले जाएँगे; इसलिए हे महाबाहो! कुरुवंश के वे वृद्ध आपके दर्शन के योग्य हैं।
श्लोक 30 (12.45.30)
तव ह्याद्यस्य देवस्य क्षरस्यैवाक्षरस्य च । दर्शनं त्वस्य लाभः स्यात्त्वं हि ब्रह्ममयो निधिः ॥
tava hyādyasya devasya kṣarasyaivākṣarasya ca | darśanaṃ tvasya lābhaḥ syāttvaṃ hi brahmamayo nidhiḥ
आप आदिदेव हैं, क्षर भी हैं और अक्षर भी; आपका दर्शन उनके लिए बड़ा लाभ होगा, क्योंकि आप ब्रह्ममय निधि हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 31 (12.45.31)
श्रुत्वैवं धर्मराजस्य वचनं मधुसूदनः । पार्श्वस्थं सात्यकिं प्राह रथो मे युज्यतामिति ॥
śrutvaivaṃ dharmarājasya vacanaṃ madhusūdanaḥ | pārśvasthaṃ sātyakiṃ prāha ratho me yujyatāmiti
धर्मराज की यह बात सुनकर मधुसूदन ने पास खड़े सात्यकि से कहा, "मेरा रथ जोता जाए।"
श्लोक 32 (12.45.32)
सात्यकिस्त्वाशु निष्क्रम्य केशवस्य समीपतः । दारुकं प्राह कृष्णस्य युज्यतां रथ इत्युत ॥
sātyakistvāśu niṣkramya keśavasya samīpataḥ | dārukaṃ prāha kṛṣṇasya yujyatāṃ ratha ityuta
सात्यकि ने तुरंत केशव के पास से निकलकर दारुक से कहा, "कृष्ण का रथ जोता जाए।"
श्लोक 33 (12.45.33)
स सात्यकेराशु वचो निशम्य । रथोत्तमं काञ्चनभूषिताङ्गम् । मसारगल्वर्कमयैर्विभङ्गै । र्विभूषितं हेमनिबद्धचक्रम् ॥
sa sātyakerāśu vaco niśamya | rathottamaṃ kāñcanabhūṣitāṅgam | masāragalvarkamayairvibhaṅgai | rvibhūṣitaṃ hemanibaddhacakram
सात्यकि के शीघ्र वचन सुनकर दारुक ने उत्तम रथ तैयार किया, जिसका ढाँचा सोने से सजा था, जो मरकत, चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त मणियों के अलंकरणों से विभूषित था और जिसके पहिये सोने से मढ़े थे,
श्लोक 34 (12.45.34)
दिवाकरांशुप्रभमाशुगामिनं । विचित्रनानामणिभूषितान्तरम् । नवोदितं सूर्यमिव प्रतापिनं । विचित्रतार्क्ष्यध्वजिनं पताकिनम् ॥
divākarāṃśuprabhamāśugāminaṃ | vicitranānāmaṇibhūṣitāntaram | navoditaṃ sūryamiva pratāpinaṃ | vicitratārkṣyadhvajinaṃ patākinam
जो सूर्य की किरणों के समान दीप्तिमान् और तीव्र गति वाला था, जिसका भीतरी भाग नाना प्रकार की विचित्र मणियों से सजा था, जो नवोदित सूर्य के समान तेजस्वी था और जिस पर विचित्र गरुड़-ध्वज तथा पताकाएँ थीं,
श्लोक 35 (12.45.35)
सुग्रीवशैब्यप्रमुखैर्वराश्वै । र्मनोजवैः काञ्चनभूषिताङ्गैः । संयुक्तमावेदयदच्युताय । कृताञ्जलिर्दारुको राजसिंह ॥
sugrīvaśaibyapramukhairvarāśvai | rmanojavaiḥ kāñcanabhūṣitāṅgaiḥ | saṃyuktamāvedayadacyutāya | kṛtāñjalirdāruko rājasiṃha
जिसमें सुग्रीव और शैब्य आदि श्रेष्ठ, मन के समान वेगवान् और सोने से सजे अंगों वाले घोड़े जुते थे; हे राजसिंह! दारुक ने हाथ जोड़कर अच्युत को इसकी सूचना दी।