शान्ति पर्व · अध्याय 46
भीष्म द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति
जनमेजय पूछते हैं कि भीष्म ने किस प्रकार देह का त्याग किया, और वैशम्पायन बताते हैं कि जब सूर्य उत्तरायण में आया, तब शरशय्या पर पड़े भीष्म ने एकत्र हुए ऋषियों के बीच कृष्ण का ध्यान कर उनकी स्तुति की। स्तवराज नामक इस स्तोत्र में वे नारायण को अज्ञेय परम तत्त्व और वह सूत्र बताते हैं जिसमें लोक पिरोए हैं, और सूर्य, चन्द्र, वेद, यज्ञ, धर्म, काल आदि अनेक नामों से तथा मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, तीनों राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि अवतारों के रूप में उन्हें नमस्कार करते हैं। अन्त में भीष्म "नमः" कहकर कृष्ण को प्रणाम करते हैं; ऋषि अश्रुपूर्ण वाणी से उनकी प्रशंसा करते हैं, कृष्ण उन्हें तीनों लोकों के दर्शन का दिव्य ज्ञान देकर पाण्डवों के साथ लौट जाते हैं, और अध्याय इस स्तोत्र के पाठ का फल बताकर समाप्त होता है।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (12.46.1)
शरतल्पे शयानस्तु भरतानां पितामहः । कथमुत्सृष्टवान्देहं कं च योगमधारयत् ॥
śaratalpe śayānastu bharatānāṃ pitāmahaḥ | kathamutsṛṣṭavāndehaṃ kaṃ ca yogamadhārayat
भरतवंशियों के पितामह शरशय्या पर लेटे हुए थे। उन्होंने किस प्रकार अपना शरीर छोड़ा, और किस योग को धारण किया?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (12.46.2)
शृणुष्वावहितो राजञ्शुचिर्भूत्वा समाहितः । भीष्मस्य कुरुशार्दूल देहोत्सर्गं महात्मनः ॥
śṛṇuṣvāvahito rājañśucirbhūtvā samāhitaḥ | bhīṣmasya kuruśārdūla dehotsargaṃ mahātmanaḥ
हे राजन्, हे कुरुश्रेष्ठ, पवित्र होकर एकाग्र और सावधान मन से सुनो कि महात्मा भीष्म ने किस प्रकार अपने शरीर का त्याग किया।
श्लोक 3 (12.46.3)
प्रवृत्तमात्रे त्वयनमुत्तरेण दिवाकरे । शुक्लपक्षस्य चाष्टभ्यां माघमासस्य पार्थिव ॥
pravṛttamātre tvayanamuttareṇa divākare | śuklapakṣasya cāṣṭabhyāṃ māghamāsasya pārthiva
हे राजन्, जैसे ही सूर्य उत्तर की ओर चलने लगा, माघ मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी को,
श्लोक 4 (12.46.4)
प्राजापत्ये च नक्षत्रे मध्यं प्राप्ते दिवाकरे । समावेशयदात्मानमात्मन्येव समाहितः ॥
prājāpatye ca nakṣatre madhyaṃ prāpte divākare | samāveśayadātmānamātmanyeva samāhitaḥ
प्रजापति के नक्षत्र में, जब सूर्य आकाश के मध्य में पहुँच गया, तब भीष्म ने समाहित होकर अपने आपको आत्मा में ही लीन कर दिया।
श्लोक 5 (12.46.5)
विकीर्णांशुरिवादित्यो भीष्मः शरशतैश्चितः । शुशुभे परया लक्ष्म्या वृतो ब्राह्मणसत्तमैः ॥
vikīrṇāṃśurivādityo bhīṣmaḥ śaraśataiścitaḥ | śuśubhe parayā lakṣmyā vṛto brāhmaṇasattamaiḥ
सैकड़ों बाणों से बिंधे हुए भीष्म, किरणें बिखेरे हुए सूर्य के समान, श्रेष्ठ ब्राह्मणों से घिरे हुए परम शोभा से दीप्त हो रहे थे:
श्लोक 6 (12.46.6)
व्यासेन देवश्रवसा नारदेन सुरर्षिणा । देवस्थानेन वात्स्येन तथाऽश्मकसुमन्तुना ॥
vyāsena devaśravasā nāradena surarṣiṇā | devasthānena vātsyena tathā'śmakasumantunā
व्यास, देवश्रवा, देवर्षि नारद, देवस्थान, वात्स्य, अश्मक और सुमन्तु,
श्लोक 7 (12.46.7)
तथा जैमिनिना चैव पैलेन च महात्मना । शाण्डिल्यदेवलाभ्यां च मैत्रेयेण च धीमता ॥
tathā jaimininā caiva pailena ca mahātmanā | śāṇḍilyadevalābhyāṃ ca maitreyeṇa ca dhīmatā
तथा जैमिनि, महात्मा पैल, शाण्डिल्य और देवल, और बुद्धिमान् मैत्रेय,
श्लोक 8 (12.46.8)
असितेन वसिष्ठेन कौशिकेन महात्मना । हारितलोमशाभ्यां च तथाऽऽत्रेयेण धीमता ॥
asitena vasiṣṭhena kauśikena mahātmanā | hāritalomaśābhyāṃ ca tathā''treyeṇa dhīmatā
असित, वसिष्ठ, महात्मा कौशिक, हारित और लोमश, तथा बुद्धिमान् आत्रेय,
श्लोक 9 (12.46.9)
बृहस्पतिश्च शुक्रश्च च्यवनश्च महामुनिः । सनत्कुमारः कपिलो वाल्मीकिस्तुम्बुरुः कुरुः ॥
bṛhaspatiśca śukraśca cyavanaśca mahāmuniḥ | sanatkumāraḥ kapilo vālmīkistumburuḥ kuruḥ
बृहस्पति, शुक्र, महामुनि च्यवन, सनत्कुमार, कपिल, वाल्मीकि, तुम्बुरु, कुरु,
श्लोक 10 (12.46.10)
मौद्गल्यो भार्गवो रामस्तृणबिन्दुर्महामुनिः । पिप्पलादोऽथ वायुश्च संवर्तः पुलहः कचः ॥
maudgalyo bhārgavo rāmastṛṇabindurmahāmuniḥ | pippalādo'tha vāyuśca saṃvartaḥ pulahaḥ kacaḥ
मौद्गल्य, भार्गव, राम, महामुनि तृणबिन्दु, पिप्पलाद, वायु, संवर्त, पुलह, कच,
श्लोक 11 (12.46.11)
काश्यपश्च पुलस्त्यश्च क्रतुर्दक्षः पराशरः । मरीचिरङ्गिराः काश्यो गौतमो गालवो मुनिः ॥
kāśyapaśca pulastyaśca kraturdakṣaḥ parāśaraḥ | marīciraṅgirāḥ kāśyo gautamo gālavo muniḥ
काश्यप, पुलस्त्य, क्रतु, दक्ष, पराशर, मरीचि, अङ्गिरा, काश्य, गौतम और मुनि गालव,
श्लोक 12 (12.46.12)
धौम्यो विभाण्डो माण्डव्योधौम्रः कृष्णानुभौतिकः । उलूकः परमो विप्रो मार्कण्डेयो महामुनिः । भास्करिः पूरणः कृष्णः सूतः परमधार्मिकः ॥
dhaumyo vibhāṇḍo māṇḍavyodhaumraḥ kṛṣṇānubhautikaḥ | ulūkaḥ paramo vipro mārkaṇḍeyo mahāmuniḥ | bhāskariḥ pūraṇaḥ kṛṣṇaḥ sūtaḥ paramadhārmikaḥ
धौम्य, विभाण्ड, माण्डव्य, धौम्र, कृष्णानुभौतिक, उलूक, श्रेष्ठ ब्राह्मण महामुनि मार्कण्डेय, तथा भास्करि, पूरण, कृष्ण और परम धार्मिक सूत।
श्लोक 13 (12.46.13)
एतैश्चान्यैर्मुनिगणैर्महाभागैर्महात्मभिः । श्रद्धादमशमोपेतैर्वृतश्चन्द्र इव ग्रहैः ॥
etaiścānyairmunigaṇairmahābhāgairmahātmabhiḥ | śraddhādamaśamopetairvṛtaścandra iva grahaiḥ
श्रद्धा, दम और शम से युक्त इन तथा अन्य महाभाग, महात्मा मुनिगणों से घिरे हुए वे ग्रहों से घिरे चन्द्रमा के समान प्रतीत होते थे।
श्लोक 14 (12.46.14)
भीष्मस्तु पुरुषव्याघ्रः कर्मणा मनसा गिरा । शरतल्पगतः कृष्णं प्रदध्यौ प्राञ्जलिः शुचिः ॥
bhīṣmastu puruṣavyāghraḥ karmaṇā manasā girā | śaratalpagataḥ kṛṣṇaṃ pradadhyau prāñjaliḥ śuciḥ
पुरुषों में व्याघ्र के समान भीष्म ने शरशय्या पर लेटे हुए, हाथ जोड़कर, कर्म, मन और वाणी से पवित्र होकर कृष्ण का ध्यान किया।
श्लोक 15 (12.46.15)
स्वरेण हृष्टपुष्टेन तुष्टाव मधुसूदनम् । योगेश्वरं पद्मनाभं विष्णुं जिष्णुं जगत्पतिम् । अनादिनिधनं विष्णुमात्मयोनिं सनातनम् ॥
svareṇa hṛṣṭapuṣṭena tuṣṭāva madhusūdanam | yogeśvaraṃ padmanābhaṃ viṣṇuṃ jiṣṇuṃ jagatpatim | anādinidhanaṃ viṣṇumātmayoniṃ sanātanam
उन्होंने हर्ष और बल से भरे स्वर में मधुसूदन की स्तुति की, जो योगेश्वर, पद्मनाभ, विजयी विष्णु और जगत् के स्वामी हैं, जो आदि और अन्त से रहित, स्वयंभू और सनातन विष्णु हैं।
श्लोक 16 (12.46.16)
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा वाग्विदां प्रवरः प्रभुः । भीष्मः परमधर्मात्मा वासुदेवमथास्तुवत् ॥
kṛtāñjalipuṭo bhūtvā vāgvidāṃ pravaraḥ prabhuḥ | bhīṣmaḥ paramadharmātmā vāsudevamathāstuvat
हाथ जोड़कर, वाग्मियों में श्रेष्ठ, परम धर्मात्मा समर्थ भीष्म ने तब वासुदेव की स्तुति की।
भीष्म उवाच
श्लोक 17 (12.46.17)
आरिराधयिषुः कृष्णं वाचं जिगदिषामि याम् । तया व्याससमासिन्या प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥
ārirādhayiṣuḥ kṛṣṇaṃ vācaṃ jigadiṣāmi yām | tayā vyāsasamāsinyā prīyatāṃ puruṣottamaḥ
कृष्ण को प्रसन्न करने की इच्छा से मैं जो वाणी बोलना चाहता हूँ, विस्तार और संक्षेप से युक्त उसी वाणी से पुरुषोत्तम प्रसन्न हों।
श्लोक 18 (12.46.18)
शुचिं शुचिपदं हंसं तत्परं परमेष्ठिनम् । युक्त्वा सर्वात्मनाऽऽत्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ॥
śuciṃ śucipadaṃ haṃsaṃ tatparaṃ parameṣṭhinam | yuktvā sarvātmanā''tmānaṃ taṃ prapadye prajāpatim
जो शुद्ध हैं, जिनका निवास शुद्ध है, जो हंस हैं, सबसे परे परमेष्ठी हैं, उन प्रजापति की मैं पूरे मन से अपने आपको उनमें लगाकर शरण लेता हूँ।
श्लोक 19 (12.46.19)
अनाद्यन्तं परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः । एकोऽयं वेद भगवान्धाता नारायणो हरिः ॥
anādyantaṃ paraṃ brahma na devā narṣayo viduḥ | eko'yaṃ veda bhagavāndhātā nārāyaṇo hariḥ
जो आदि और अन्त से रहित परब्रह्म हैं, उन्हें न देवता जानते हैं, न ऋषि। केवल वे ही भगवान् धाता नारायण हरि स्वयं अपने को जानते हैं।
श्लोक 20 (12.46.20)
नारायणादृषिगणास्तथा सिद्धमहोरगाः । देवा देवर्षयश्चैव यं विदुर्दुःखभेषजम् ॥
nārāyaṇādṛṣigaṇāstathā siddhamahoragāḥ | devā devarṣayaścaiva yaṃ vidurduḥkhabheṣajam
नारायण के द्वारा ही ऋषिगण, सिद्ध और महानाग, देवता और देवर्षि उन्हें दुःख की औषधि के रूप में जानते हैं।
श्लोक 21 (12.46.21)
देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । यं न जानन्ति को ह्येष कुतो वा भगवानिति ॥
devadānavagandharvā yakṣarākṣasapannagāḥ | yaṃ na jānanti ko hyeṣa kuto vā bhagavāniti
देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग उन्हें नहीं जानते; वे पूछते हैं, "यह भगवान् कौन हैं, और कहाँ से आए हैं?"
श्लोक 22 (12.46.22)
यमाहुर्जगतः कोशं यस्मिंश्च निहिताः प्रजाः । यस्मिँल्लोकाः स्फुरन्त्येते जाले शकुनयो यथा ॥
yamāhurjagataḥ kośaṃ yasmiṃśca nihitāḥ prajāḥ | yasmim̐llokāḥ sphurantyete jāle śakunayo yathā
उन्हें जगत् का कोश कहते हैं, जिनमें प्राणी रखे हुए हैं, जिनमें ये लोक जाल में फँसे पक्षियों के समान फड़कते हैं।
श्लोक 23 (12.46.23)
यस्मिन्विश्वानि भूतानि तिष्ठन्ति च विशन्ति च । गुणभूतानि भूतेशे सूत्रे मणिगणा इव ॥
yasminviśvāni bhūtāni tiṣṭhanti ca viśanti ca | guṇabhūtāni bhūteśe sūtre maṇigaṇā iva
जिनमें सब प्राणी स्थित रहते हैं और प्रवेश करते हैं, और जो उन भूतों के स्वामी के अधीन उसी प्रकार हैं जैसे सूत्र में पिरोए मणियों के समूह।
श्लोक 24 (12.46.24)
यं च विश्वस्य कर्तारं जगतस्तस्थुषां पतिम् । वदन्ति जगतोऽध्यक्षमध्यात्मपरिचिन्तकाः ॥
yaṃ ca viśvasya kartāraṃ jagatastasthuṣāṃ patim | vadanti jagato'dhyakṣamadhyātmaparicintakāḥ
जिन्हें अध्यात्म का चिन्तन करनेवाले विश्व का कर्ता, चर और अचर का स्वामी तथा जगत् का अध्यक्ष कहते हैं।
श्लोक 25 (12.46.25)
यस्मिन्नित्ये तते तन्तौ दृढे स्रगिव तिष्ठति । सदसद्ग्रथितं विश्वं विश्वाङ्गे विश्वकर्मणि ॥
yasminnitye tate tantau dṛḍhe sragiva tiṣṭhati | sadasadgrathitaṃ viśvaṃ viśvāṅge viśvakarmaṇi
जिन नित्य में, फैले हुए दृढ़ धागे पर माला के समान, सत् और असत् से गुँथा हुआ यह विश्व टिका है, उन विश्व को अपना शरीर बनानेवाले विश्वकर्मा में।
श्लोक 26 (12.46.26)
हरिं सहस्रशिरसं सहस्रचरणेक्षणम् । सहस्रबाहुमकुटं सहस्रवदनोज्ज्वलम् ॥
hariṃ sahasraśirasaṃ sahasracaraṇekṣaṇam | sahasrabāhumakuṭaṃ sahasravadanojjvalam
हजार सिरों, हजार चरणों और नेत्रों, हजार भुजाओं और मुकुटों तथा हजार मुखों से दीप्त हरि को,
श्लोक 27 (12.46.27)
प्राहुर्नारायणं देवं यं विश्वस्य परायणम् । अणीयसामणीयांसं स्थविष्ठं च स्थवीयसाम् । गरीयसां गरिष्ठं च श्रेष्ठं च श्रेयसामपि ॥
prāhurnārāyaṇaṃ devaṃ yaṃ viśvasya parāyaṇam | aṇīyasāmaṇīyāṃsaṃ sthaviṣṭhaṃ ca sthavīyasām | garīyasāṃ gariṣṭhaṃ ca śreṣṭhaṃ ca śreyasāmapi
वे नारायण देव कहते हैं, जो विश्व के परम आश्रय हैं; सूक्ष्मों में सबसे सूक्ष्म, स्थूलों में सबसे स्थूल, भारी वस्तुओं में सबसे भारी और श्रेष्ठों में भी सबसे श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 28 (12.46.28)
यं वाकेष्वनुवाकेषु निषत्सूपनिषत्सु च । गृणन्ति सत्यकर्माणं सत्यं सत्येषु सामसु ॥
yaṃ vākeṣvanuvākeṣu niṣatsūpaniṣatsu ca | gṛṇanti satyakarmāṇaṃ satyaṃ satyeṣu sāmasu
जिन सत्यकर्मा को, जो सत्यों में सत्य हैं, वाक्यों और अनुवाकों में, निषदों और उपनिषदों में तथा सामों में गाया जाता है।
श्लोक 29 (12.46.29)
चतुर्भिश्चतुरात्मानं सत्वस्थं सात्वतां पतिम् । यं दिव्यैर्देवमर्चन्ति गुह्यैः परमनामभिः ॥
caturbhiścaturātmānaṃ satvasthaṃ sātvatāṃ patim | yaṃ divyairdevamarcanti guhyaiḥ paramanāmabhiḥ
जो चारों के द्वारा चतुर्विध स्वरूपवाले हैं, सत्त्व में स्थित हैं और सात्वतों के स्वामी हैं, उन देव की दिव्य, गुप्त और परम नामों से अर्चना की जाती है।
श्लोक 30 (12.46.30)
यस्मिन्नित्यं तपस्तप्तं यदङ्गेष्वनुतिष्ठति । सर्वात्मा सर्ववित्सर्वः सर्वज्ञः सर्वभावनः ॥
yasminnityaṃ tapastaptaṃ yadaṅgeṣvanutiṣṭhati | sarvātmā sarvavitsarvaḥ sarvajñaḥ sarvabhāvanaḥ
जिनमें नित्य तप किया गया है और जो अंगों में स्थित हैं; जो सबके आत्मा, सर्वविद्, सर्वरूप, सर्वज्ञ और सबको उत्पन्न करनेवाले हैं।
श्लोक 31 (12.46.31)
यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत् । भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै दीप्तमग्निमिवारणिः ॥
yaṃ devaṃ devakī devī vasudevādajījanat | bhaumasya brahmaṇo guptyai dīptamagnimivāraṇiḥ
जिन देव को देवी देवकी ने पृथ्वी पर ब्रह्म (वेद) की रक्षा के लिए वसुदेव से जन्म दिया, जैसे अरणी से प्रज्वलित अग्नि प्रकट होती है।
श्लोक 32 (12.46.32)
यमनन्यो व्यपेताशीरात्मानं वीतकल्मषम् । इष्ट्वानन्त्याय गोविन्दं पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥
yamananyo vyapetāśīrātmānaṃ vītakalmaṣam | iṣṭvānantyāya govindaṃ paśyatyātmānamātmani
जिन निष्पाप आत्मस्वरूप गोविन्द की अनन्य भाव से, आशा से रहित होकर अनन्त की प्राप्ति के लिए उपासना करके मनुष्य उन्हें अपने भीतर देखता है।
श्लोक 33 (12.46.33)
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं हरिं नारायणं विभुम् । अतिवाय्विन्द्रकर्माणमतिसूर्याग्नितेजसम् । अतिबुद्धीन्द्रियात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ॥
apratarkyamavijñeyaṃ hariṃ nārāyaṇaṃ vibhum | ativāyvindrakarmāṇamatisūryāgnitejasam | atibuddhīndriyātmānaṃ taṃ prapadye prajāpatim
जो तर्क से परे और ज्ञान की पहुँच से बाहर हैं, वे सर्वव्यापी हरि नारायण; जो कर्म में वायु और इन्द्र से बढ़कर हैं, तेज में सूर्य और अग्नि से बढ़कर हैं, और बुद्धि तथा इन्द्रियों से भी परे आत्मस्वरूप हैं, उन प्रजापति की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक 34 (12.46.34)
पुराणे पुरुषं प्रोक्तं ब्रह्मप्रोक्तं युगादिषु । क्षये संकर्षणं प्रोक्तं तमुपास्यमुपास्महे ॥
purāṇe puruṣaṃ proktaṃ brahmaproktaṃ yugādiṣu | kṣaye saṃkarṣaṇaṃ proktaṃ tamupāsyamupāsmahe
पुराण में उन्हें पुरुष कहा गया है, युगों के आरम्भ में ब्रह्मा कहा गया है और प्रलय में संकर्षण कहा गया है; उन उपास्य की हम उपासना करते हैं।
श्लोक 35 (12.46.35)
यमेकं बहुधात्मानं प्रादुर्भूतमधोक्षजम् । नान्यभक्ताः क्रियावन्तो यजन्ते सर्वकामदम् ॥
yamekaṃ bahudhātmānaṃ prādurbhūtamadhokṣajam | nānyabhaktāḥ kriyāvanto yajante sarvakāmadam
जो एक होकर भी अनेक रूपों में प्रकट हुए हैं, उन अधोक्षज, सब कामनाओं के दाता की, अन्य किसी के भक्त न होनेवाले कर्मनिष्ठ लोग पूजा करते हैं।
श्लोक 36 (12.46.36)
ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म यत्तत्सदसतः परम् । अनादिमध्यपर्यन्तं न देवा नर्षयो विदुः ॥
ṛtamekākṣaraṃ brahma yattatsadasataḥ param | anādimadhyaparyantaṃ na devā narṣayo viduḥ
जो ऋत हैं, एकाक्षर ब्रह्म हैं, सत् और असत् से परे हैं, आदि, मध्य और अन्त से रहित हैं, उन्हें न देवता जानते हैं, न ऋषि।
श्लोक 37 (12.46.37)
यं सुरासुरगन्धर्वाः सिद्धा ऋषिमहोरगाः । प्रयता नित्यमर्चन्ति परमं सुखभेषजम् ॥
yaṃ surāsuragandharvāḥ siddhā ṛṣimahoragāḥ | prayatā nityamarcanti paramaṃ sukhabheṣajam
जिनकी सुर, असुर, गन्धर्व, सिद्ध, ऋषि और महानाग संयमित होकर सदा अर्चना करते हैं, जो सुख की परम औषधि हैं।
श्लोक 38 (12.46.38)
अनादिनिधनं देवमात्मयोनिं सनातनम् । अप्रेक्ष्यमनभिज्ञेयं हरिं नारायणं प्रभुम् ॥
anādinidhanaṃ devamātmayoniṃ sanātanam | aprekṣyamanabhijñeyaṃ hariṃ nārāyaṇaṃ prabhum
जो आदि और अन्त से रहित देव हैं, स्वयंभू और सनातन हैं; वे हरि नारायण प्रभु, जो देखे नहीं जा सकते और पूरी तरह जाने नहीं जा सकते।
श्लोक 39 (12.46.39)
हिरण्यवर्णं यं गर्भमदितिर्दैत्यनाशनम् । एकं द्वादशधा जज्ञे तस्मै सूर्यात्मने नमः ॥
hiraṇyavarṇaṃ yaṃ garbhamaditirdaityanāśanam | ekaṃ dvādaśadhā jajñe tasmai sūryātmane namaḥ
उन सूर्यात्मा को नमस्कार, जिन स्वर्णवर्ण, दैत्यों के नाशक बालक को अदिति ने जन्म दिया और जो एक होकर बारह रूपों में प्रकट हुए।
श्लोक 40 (12.46.40)
शुक्ले देवान्पितॄन्कृष्णे तर्पयत्यमृतेन यः । यश्च राजा द्विजातीनां तस्मै सोमात्मने नमः ॥
śukle devānpitṝnkṛṣṇe tarpayatyamṛtena yaḥ | yaśca rājā dvijātīnāṃ tasmai somātmane namaḥ
जो शुक्लपक्ष में देवताओं को और कृष्णपक्ष में पितरों को अमृत से तृप्त करते हैं और द्विजों के राजा हैं, उन सोमात्मा को नमस्कार।
श्लोक 41 (12.46.41)
हुताशनमुखैर्देवैर्धार्यते सकलं जगत् । हविः प्रथमभोक्ता यस्तस्मै होत्रात्मने नमः ॥
hutāśanamukhairdevairdhāryate sakalaṃ jagat | haviḥ prathamabhoktā yastasmai hotrātmane namaḥ
अग्नि जिनका मुख है, उन देवताओं के द्वारा सारा जगत् धारण किया जाता है; जो हवि के प्रथम भोक्ता हैं, उन होत्रात्मा को नमस्कार।
श्लोक 42 (12.46.42)
महतस्तमसः पारे पुरुषं ह्यतितेजसम् । यं ज्ञात्वा मृत्युमत्येति तस्मै ज्ञेयात्मने नमः ॥
mahatastamasaḥ pāre puruṣaṃ hyatitejasam | yaṃ jñātvā mṛtyumatyeti tasmai jñeyātmane namaḥ
जो महान् अन्धकार के पार अत्यन्त तेजस्वी पुरुष हैं, जिन्हें जानकर मनुष्य मृत्यु को पार कर जाता है, उन ज्ञेयात्मा को नमस्कार।
श्लोक 43 (12.46.43)
यं बृहन्तं बृहत्युक्थे यमग्नौ यं महाध्वरे । यं विप्रसङ्घा गायन्ति तस्मै वेदात्मने नमः ॥
yaṃ bṛhantaṃ bṛhatyukthe yamagnau yaṃ mahādhvare | yaṃ viprasaṅghā gāyanti tasmai vedātmane namaḥ
जिन महान् को ब्राह्मणों के समूह बृहत् उक्थ में, अग्नि में और महान् यज्ञ में गाते हैं, उन वेदात्मा को नमस्कार।
श्लोक 44 (12.46.44)
पादाङ्गं संधिपर्वाणं स्वरव्यञ्जनभूषितम् । यमाहुरक्षरं विप्रास्तस्मै वागात्मने नमः ॥
pādāṅgaṃ saṃdhiparvāṇaṃ svaravyañjanabhūṣitam | yamāhurakṣaraṃ viprāstasmai vāgātmane namaḥ
जिनके अंग पाद हैं, जिनके जोड़ और पर्व सन्धियाँ हैं, जो स्वरों और व्यंजनों से सजे हैं और जिन्हें ब्राह्मण अक्षर कहते हैं, उन वागात्मा को नमस्कार।
श्लोक 45 (12.46.45)
यज्ञाङ्गो यो वराहो वै भूत्वा गामुज्जहारह । लोकत्रयहितार्थाय तस्मै वीर्यात्मने नमः ॥
yajñāṅgo yo varāho vai bhūtvā gāmujjahāraha | lokatrayahitārthāya tasmai vīryātmane namaḥ
जिन्होंने तीनों लोकों के हित के लिए यज्ञ के अंगोंवाला वराह बनकर पृथ्वी का उद्धार किया, उन वीर्यात्मा को नमस्कार।
श्लोक 46 (12.46.46)
ऋग्यजुःसामधामानं दशार्धहविराकृतिम् । यं सप्ततन्तुं तन्वन्ति तस्मै यज्ञात्मने नमः ॥
ṛgyajuḥsāmadhāmānaṃ daśārdhahavirākṛtim | yaṃ saptatantuṃ tanvanti tasmai yajñātmane namaḥ
जिनका धाम ऋक्, यजुः और साम हैं, जिनका स्वरूप पाँच प्रकार की हवि है और जिन्हें सात तन्तुओंवाले यज्ञ के रूप में फैलाते हैं, उन यज्ञात्मा को नमस्कार।
श्लोक 47 (12.46.47)
चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तस्मै होमात्मने नमः ॥
caturbhiśca caturbhiśca dvābhyāṃ pañcabhireva ca | hūyate ca punardvābhyāṃ tasmai homātmane namaḥ
चार और चार से, दो और पाँच से, और फिर दो से जिनके लिए आहुति दी जाती है, उन होमात्मा को नमस्कार।
श्लोक 48 (12.46.48)
यः सुपर्णो यजुर्नाम च्छन्दोगात्रस्त्रिवृच्छिराः । रथन्तरबृहत्पक्षस्तस्मै स्तोत्रात्मने नमः ॥
yaḥ suparṇo yajurnāma cchandogātrastrivṛcchirāḥ | rathantarabṛhatpakṣastasmai stotrātmane namaḥ
जो सुपर्ण हैं, यजुः जिनका नाम है, छन्द जिनका शरीर हैं, त्रिवृत् जिनका सिर है, और रथन्तर तथा बृहत् जिनके पंख हैं, उन स्तोत्रात्मा को नमस्कार।
श्लोक 49 (12.46.49)
यः सहस्रसवे सत्रे जज्ञे विश्वसृजामृषिः । हिरण्यपक्षः शकुनिस्तस्मै तार्क्ष्यात्मने नमः ॥
yaḥ sahasrasave satre jajñe viśvasṛjāmṛṣiḥ | hiraṇyapakṣaḥ śakunistasmai tārkṣyātmane namaḥ
जो हजार सवनोंवाले यज्ञसत्र में विश्व के रचयिताओं के ऋषि के रूप में उत्पन्न हुए, उन स्वर्णपंखवाले पक्षी तार्क्ष्यात्मा को नमस्कार।
श्लोक 50 (12.46.50)
यश्चिनोति सतां सेतुमृतेनामृतयोनिना । धर्मार्थव्यवहाराङ्गैस्तस्मै सत्यात्मने नमः ॥
yaścinoti satāṃ setumṛtenāmṛtayoninā | dharmārthavyavahārāṅgaistasmai satyātmane namaḥ
जो अमृत के स्रोत ऋत के द्वारा, धर्म, अर्थ और व्यवहार के अंगों से सज्जनों का सेतु बनाते हैं, उन सत्यात्मा को नमस्कार।
श्लोक 51 (12.46.51)
यं पृथग्धर्मचरणाः पृथग्धर्मफलैषिणः । पृथग्धर्मैः समर्चन्ति तस्मै धर्मात्मने नमः ॥
yaṃ pṛthagdharmacaraṇāḥ pṛthagdharmaphalaiṣiṇaḥ | pṛthagdharmaiḥ samarcanti tasmai dharmātmane namaḥ
जिनकी अलग-अलग धर्मों का आचरण करनेवाले और अलग-अलग धर्मफल चाहनेवाले लोग अलग-अलग धर्मों से पूजा करते हैं, उन धर्मात्मा को नमस्कार।
श्लोक 52 (12.46.52)
यतः सर्वे प्रसूयन्ते ह्यनङ्गात्माङ्गदेहिनः । उन्मादः सर्वभूतानां तस्मै कामात्मने नमः ॥
yataḥ sarve prasūyante hyanaṅgātmāṅgadehinaḥ | unmādaḥ sarvabhūtānāṃ tasmai kāmātmane namaḥ
जिनसे सब देहधारी उत्पन्न होते हैं, जो अपने स्वरूप से अनंग हैं और सब प्राणियों के उन्माद हैं, उन कामात्मा को नमस्कार।
श्लोक 53 (12.46.53)
यं तं व्यक्तस्थमव्यक्तं विचिन्वन्ति महर्षयः । क्षेत्रे क्षेत्रज्ञमासीनं तस्मै क्षेत्रात्मने नमः ॥
yaṃ taṃ vyaktasthamavyaktaṃ vicinvanti maharṣayaḥ | kṣetre kṣetrajñamāsīnaṃ tasmai kṣetrātmane namaḥ
जिन अव्यक्त को, जो व्यक्त में स्थित हैं, महर्षि खोजते हैं, जो क्षेत्र में विराजमान क्षेत्रज्ञ हैं, उन क्षेत्रात्मा को नमस्कार।
श्लोक 54 (12.46.54)
यं दृगात्मानमात्मस्थं वृतं षोडशभिर्गुणैः । प्राहुः सप्तदशंसाङ्ख्यास्तस्मै साङ्ख्यात्मने नमः ॥
yaṃ dṛgātmānamātmasthaṃ vṛtaṃ ṣoḍaśabhirguṇaiḥ | prāhuḥ saptadaśaṃsāṅkhyāstasmai sāṅkhyātmane namaḥ
जिन्हें सांख्यवादी सत्रहवाँ कहते हैं, जो दृक्स्वरूप आत्मा हैं, आत्मा में स्थित हैं और सोलह गुणों से घिरे हैं, उन साङ्ख्यात्मा को नमस्कार।
श्लोक 55 (12.46.55)
यं विनिद्रा जितश्वासाः संतुष्टाः संयतेन्द्रियाः । ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ॥
yaṃ vinidrā jitaśvāsāḥ saṃtuṣṭāḥ saṃyatendriyāḥ | jyotiḥ paśyanti yuñjānāstasmai yogātmane namaḥ
जिन्हें निद्रा जीतनेवाले, श्वास को जीते हुए, सन्तुष्ट और इन्द्रियों को वश में रखनेवाले योगी ध्यान लगाकर ज्योति के रूप में देखते हैं, उन योगात्मा को नमस्कार।
श्लोक 56 (12.46.56)
अपुण्यपुण्योपरमे यं पुनर्भवनिर्भयाः । शान्ताः संन्यासिनो यान्ति तस्मै मोक्षात्मने नमः ॥
apuṇyapuṇyoparame yaṃ punarbhavanirbhayāḥ | śāntāḥ saṃnyāsino yānti tasmai mokṣātmane namaḥ
पुण्य और पाप के शान्त हो जाने पर पुनर्जन्म के भय से मुक्त शान्त संन्यासी जिनके पास पहुँचते हैं, उन मोक्षात्मा को नमस्कार।
श्लोक 57 (12.46.57)
यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षुर्दिशः श्रोत्रं तस्मै लोकात्मने नमः ॥
yasyāgnirāsyaṃ dyaurmūrdhā khaṃ nābhiścaraṇau kṣitiḥ | sūryaścakṣurdiśaḥ śrotraṃ tasmai lokātmane namaḥ
अग्नि जिनका मुख है, द्युलोक सिर, आकाश नाभि, पृथ्वी चरण, सूर्य नेत्र और दिशाएँ कान हैं, उन लोकात्मा को नमस्कार।
श्लोक 58 (12.46.58)
युगेष्वावर्तते योऽंशैर्मासर्त्वयनहायनैः । सर्गप्रलययोः कर्ता तस्मै कालात्मने नमः ॥
yugeṣvāvartate yo'ṃśairmāsartvayanahāyanaiḥ | sargapralayayoḥ kartā tasmai kālātmane namaḥ
जो अपने अंशों, अर्थात् मास, ऋतु, अयन और वर्षों के साथ युगों में चक्कर लगाते हैं और सृष्टि तथा प्रलय के कर्ता हैं, उन कालात्मा को नमस्कार।
श्लोक 59 (12.46.59)
योऽसौ युगसहस्रान्ते प्रदीप्तार्चिर्विभावसुः । संभक्षयति भूतानि तस्मै घोरात्मने नमः ॥
yo'sau yugasahasrānte pradīptārcirvibhāvasuḥ | saṃbhakṣayati bhūtāni tasmai ghorātmane namaḥ
जो हजार युगों के अन्त में प्रज्वलित ज्वालाओंवाले अग्नि के रूप में प्राणियों को भक्षण कर जाते हैं, उन घोरात्मा को नमस्कार।
श्लोक 60 (12.46.60)
संभक्ष्य सर्वभूतानि कृत्वा चैकार्णवं जगत् । बालः स्वपिति यश्चैकस्तस्मै मायात्मने नमः ॥
saṃbhakṣya sarvabhūtāni kṛtvā caikārṇavaṃ jagat | bālaḥ svapiti yaścaikastasmai māyātmane namaḥ
जो सब प्राणियों को भक्षण कर और जगत् को एक समुद्र बनाकर अकेले बालक के रूप में सोते हैं, उन मायात्मा को नमस्कार।
श्लोक 61 (12.46.61)
सहस्रशिरसे तस्मै पुरुषायामितात्मने । चतुःसमुद्रपयसि योगनिद्रात्मने नमः ॥
sahasraśirase tasmai puruṣāyāmitātmane | catuḥsamudrapayasi yoganidrātmane namaḥ
हजार सिरोंवाले उन अपार आत्मावाले पुरुष को, जो चार समुद्रों के जल पर योगनिद्रा में स्थित हैं, उन योगनिद्रात्मा को नमस्कार।
श्लोक 62 (12.46.62)
अजस्य नाभावध्येकं यस्मिन्विश्वं प्रतिष्ठितम् । पुष्करं पुष्कराक्षस्य तस्मै पद्मात्मने नमः ॥
ajasya nābhāvadhyekaṃ yasminviśvaṃ pratiṣṭhitam | puṣkaraṃ puṣkarākṣasya tasmai padmātmane namaḥ
अजन्मा की नाभि पर वह एकमात्र कमल, जिसमें विश्व स्थित है, कमलनयन का कमल; उन पद्मात्मा को नमस्कार।
श्लोक 63 (12.46.63)
यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसंधिषु । कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नमः ॥
yasya keśeṣu jīmūtā nadyaḥ sarvāṅgasaṃdhiṣu | kukṣau samudrāścatvārastasmai toyātmane namaḥ
जिनके केशों में मेघ हैं, सब अंगों की सन्धियों में नदियाँ हैं और उदर में चारों समुद्र हैं, उन तोयात्मा को नमस्कार।
श्लोक 64 (12.46.64)
यस्मात्सर्गाः प्रवर्तन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः । यस्मिंश्चैव प्रलीयन्ते तस्मै हेत्वात्मने नमः ॥
yasmātsargāḥ pravartante sargapralayavikriyāḥ | yasmiṃścaiva pralīyante tasmai hetvātmane namaḥ
जिनसे सृष्टि और प्रलय के विकारों के साथ सर्ग प्रकट होते हैं और जिनमें वे फिर लीन हो जाते हैं, उन हेत्वात्मा को नमस्कार।
श्लोक 65 (12.46.65)
यो निषण्णो भवेद्रात्रौ दिवा भवति विष्ठितः । इष्टानिष्टस्य च द्रष्टा तस्मै द्रष्ट्रात्मने नमः ॥
yo niṣaṇṇo bhavedrātrau divā bhavati viṣṭhitaḥ | iṣṭāniṣṭasya ca draṣṭā tasmai draṣṭrātmane namaḥ
जो रात में बैठे रहते हैं और दिन में खड़े रहते हैं, और इष्ट तथा अनिष्ट के द्रष्टा हैं, उन द्रष्ट्रात्मा को नमस्कार।
श्लोक 66 (12.46.66)
अकार्यः सर्वकार्येषु धर्मकार्यार्थमुद्यतः । वैकुण्ठस्य हि तद्रूपं तस्मै कार्यात्मने नमः ॥
akāryaḥ sarvakāryeṣu dharmakāryārthamudyataḥ | vaikuṇṭhasya hi tadrūpaṃ tasmai kāryātmane namaḥ
जिनके लिए किसी भी कार्य में करने को कुछ नहीं है, फिर भी जो धर्मकार्य के लिए सदा तत्पर रहते हैं; वह वैकुण्ठ का ही रूप है, उन कार्यात्मा को नमस्कार।
श्लोक 67 (12.46.67)
ब्रह्म वक्त्रं भुजौ क्षत्रं कृत्स्नमूरूदरं विशः । पादौ यस्याश्रिताः शूद्रास्तस्मैवर्णात्मने नमः ॥
brahma vaktraṃ bhujau kṣatraṃ kṛtsnamūrūdaraṃ viśaḥ | pādau yasyāśritāḥ śūdrāstasmaivarṇātmane namaḥ
ब्राह्मण जिनका मुख हैं, क्षत्रिय भुजाएँ, वैश्य सम्पूर्ण जाँघें और उदर, और जिनके चरणों के आश्रित शूद्र हैं, उन वर्णात्मा को नमस्कार।
श्लोक 68 (12.46.68)
अन्नपानेन्धनमयो रसप्राणविवर्धनः । यो धारयति भूतानि तस्मै प्राणात्मने नमः ॥
annapānendhanamayo rasaprāṇavivardhanaḥ | yo dhārayati bhūtāni tasmai prāṇātmane namaḥ
जो अन्न, पान और ईंधन से बने हैं, रस और प्राण को बढ़ाते हैं और सब प्राणियों को धारण करते हैं, उन प्राणात्मा को नमस्कार।
श्लोक 69 (12.46.69)
प्राणानां धारणार्थाय योऽन्नं भुङ्क्ते चतुर्विधम् । अन्तर्भूतः पचत्यग्निस्तस्मै पाकात्मने नमः ॥
prāṇānāṃ dhāraṇārthāya yo'nnaṃ bhuṅkte caturvidham | antarbhūtaḥ pacatyagnistasmai pākātmane namaḥ
जो प्राणों को धारण करने के लिए चार प्रकार का अन्न खाते हैं और भीतर स्थित अग्नि बनकर उसे पचाते हैं, उन पाकात्मा को नमस्कार।
श्लोक 70 (12.46.70)
विषये वर्तमानानां यं तं वैषयिकैर्गुणैः । प्राहुर्विषयगोप्तारं तस्मै गोप्त्रात्मने नमः ॥
viṣaye vartamānānāṃ yaṃ taṃ vaiṣayikairguṇaiḥ | prāhurviṣayagoptāraṃ tasmai goptrātmane namaḥ
विषयों में रहनेवालों के लिए जिन्हें वे विषयों के गुणों के द्वारा विषयों का रक्षक कहते हैं, उन गोप्त्रात्मा को नमस्कार।
श्लोक 71 (12.46.71)
अप्रमेयशरीराय सर्वतो बुद्धिचक्षुषे । अपारपरिमाणाय तस्मै दिव्यात्मने नमः ॥
aprameyaśarīrāya sarvato buddhicakṣuṣe | apāraparimāṇāya tasmai divyātmane namaḥ
जिनका शरीर अप्रमेय है, जिनकी बुद्धिरूपी आँखें सब ओर हैं और जिनका परिमाण अपार है, उन दिव्यात्मा को नमस्कार।
श्लोक 72 (12.46.72)
परः कालात्परो यज्ञात्परः सदसतश्च यः । अनादिरादिर्विश्वस्य तस्मै विश्वात्मने नमः ॥
paraḥ kālātparo yajñātparaḥ sadasataśca yaḥ | anādirādirviśvasya tasmai viśvātmane namaḥ
जो काल से परे हैं, यज्ञ से परे हैं, सत् और असत् से परे हैं, और विश्व के अनादि आदि हैं, उन विश्वात्मा को नमस्कार।
श्लोक 73 (12.46.73)
वैद्युतो जाठरश्चैव पावकः शुचिरेव च । दहनः सर्वभक्षाणां तस्मै वह्न्यात्मने नमः ॥
vaidyuto jāṭharaścaiva pāvakaḥ śucireva ca | dahanaḥ sarvabhakṣāṇāṃ tasmai vahnyātmane namaḥ
जो विद्युत् की अग्नि हैं, जठराग्नि हैं, पावक और शुचि हैं और सब भक्षकों में दहन करनेवाले हैं, उन वह्न्यात्मा को नमस्कार।
श्लोक 74 (12.46.74)
रसातलगतः श्रीमाननन्तो भगवान्प्रभुः । जगद्धारयते योऽसौ तस्मै शेषात्मने नमः ॥
rasātalagataḥ śrīmānananto bhagavānprabhuḥ | jagaddhārayate yo'sau tasmai śeṣātmane namaḥ
जो श्रीमान्, अनन्त, ऐश्वर्यशाली प्रभु रसातल में स्थित होकर जगत् को धारण करते हैं, उन शेषस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 75 (12.46.75)
ज्वलनार्केन्दुताराणां ज्योतिषां दिव्यमूर्तिनाम् । यस्तेजयति तेजांसि तस्मै तेजात्मने नमः ॥
jvalanārkendutārāṇāṃ jyotiṣāṃ divyamūrtinām | yastejayati tejāṃsi tasmai tejātmane namaḥ
जो अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा और तारों जैसे दिव्य स्वरूप वाले ज्योतिर्मय पिण्डों के तेज को प्रज्वलित करते हैं, उन तेजःस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 76 (12.46.76)
आत्मज्ञानमिदं ज्ञानं ज्ञात्वा पञ्चस्ववस्थितम् । यं ज्ञानेनाधिगच्छन्ति तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥
ātmajñānamidaṃ jñānaṃ jñātvā pañcasvavasthitam | yaṃ jñānenādhigacchanti tasmai jñānātmane namaḥ
पाँचों में स्थित इस आत्मज्ञान को जानकर लोग जिन्हें ज्ञान के द्वारा प्राप्त करते हैं, उन ज्ञानस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 77 (12.46.77)
साङ्ख्यैर्योगैर्विनिश्चित्य साध्यैश्च परमर्षिभिः । यस्य तु ज्ञायते तत्वं तस्मै गुह्यात्मने नमः ॥
sāṅkhyairyogairviniścitya sādhyaiśca paramarṣibhiḥ | yasya tu jñāyate tatvaṃ tasmai guhyātmane namaḥ
साङ्ख्यों, योगियों, साध्यों और परमर्षियों द्वारा विचारपूर्वक निश्चय करने पर ही जिनका तत्त्व जाना जाता है, उन गुह्यस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 78 (12.46.78)
जटिने दण्डिने नित्यं लम्बोदरशरीरिणे । कमण्डलुनिषङ्गाय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥
jaṭine daṇḍine nityaṃ lambodaraśarīriṇe | kamaṇḍaluniṣaṅgāya tasmai brahmātmane namaḥ
जो जटाधारी हैं, दण्ड धारण करते हैं, सदा लम्बोदर शरीर वाले हैं और कमण्डलु तथा तूणीर धारण करते हैं, उन ब्रह्मस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 79 (12.46.79)
शूलिने त्रिदशेशाय त्र्यम्बकाय महात्मने । भस्मदिग्धोर्ध्वलिङ्गाय तस्मै रुद्रात्मने नमः ॥
śūline tridaśeśāya tryambakāya mahātmane | bhasmadigdhordhvaliṅgāya tasmai rudrātmane namaḥ
जो त्रिशूलधारी हैं, तैंतीस देवताओं के स्वामी हैं, त्र्यम्बक और महात्मा हैं, जिनका ऊर्ध्वलिङ्ग भस्म से लिप्त है, उन रुद्रस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 80 (12.46.80)
चन्द्रार्धकृतशीर्षाय व्यालयज्ञोपवीतिने । पिनाकशूलहस्ताय तस्मै उग्रात्मने नमः ॥
candrārdhakṛtaśīrṣāya vyālayajñopavītine | pinākaśūlahastāya tasmai ugrātmane namaḥ
जिनके मस्तक पर अर्धचन्द्र सुशोभित है, जिन्होंने सर्प को यज्ञोपवीत बना रखा है और जिनके हाथों में पिनाक धनुष तथा त्रिशूल हैं, उन उग्रस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 81 (12.46.81)
यो जातो वसुदेवेन देवक्यां यदुनन्दनः । शङ्खचक्रगदापाणिर्वासुदेवात्मने नमः ॥
yo jāto vasudevena devakyāṃ yadunandanaḥ | śaṅkhacakragadāpāṇirvāsudevātmane namaḥ
जो देवकी के गर्भ से वसुदेव द्वारा उत्पन्न हुए यदुनन्दन हैं और हाथों में शङ्ख, चक्र और गदा धारण करते हैं, उन वासुदेवस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 82 (12.46.82)
शिरःकपालमालाय व्याघ्रचर्मनिवासिने । भस्मदिग्धशरीराय तस्मै रुद्रात्मने नमः ॥
śiraḥkapālamālāya vyāghracarmanivāsine | bhasmadigdhaśarīrāya tasmai rudrātmane namaḥ
जो कपाल-मालाधारी हैं, व्याघ्रचर्म पर निवास करते हैं और जिनका शरीर भस्म से लिप्त है, उन रुद्रस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 83 (12.46.83)
यो मोहयति भूतानि सर्वपाशानुबन्धनैः । सर्वस्य रक्षणार्थाय तस्मै मोहात्मने नमः ॥
yo mohayati bhūtāni sarvapāśānubandhanaiḥ | sarvasya rakṣaṇārthāya tasmai mohātmane namaḥ
जो सबकी रक्षा के लिए सब प्रकार के बन्धनों के पाशों से प्राणियों को मोह में डालते हैं, उन मोहस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 84 (12.46.84)
चैतन्यं सर्वतो नित्यं सर्वप्राणिहृदि स्थितम् । सर्वातीततरं सूक्ष्मं तस्मै सूक्ष्मात्मने नमः ॥
caitanyaṃ sarvato nityaṃ sarvaprāṇihṛdi sthitam | sarvātītataraṃ sūkṣmaṃ tasmai sūkṣmātmane namaḥ
जो चैतन्यरूप से सर्वत्र और सदा विद्यमान हैं, सब प्राणियों के हृदय में स्थित हैं और सबसे परे तथा अत्यन्त सूक्ष्म हैं, उन सूक्ष्मस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 85 (12.46.85)
पञ्चभूतात्मभूताय भूतादिनिधनाय च । अक्रोधद्रोहमोहाय तस्मै शान्तात्मने नमः ॥
pañcabhūtātmabhūtāya bhūtādinidhanāya ca | akrodhadrohamohāya tasmai śāntātmane namaḥ
जो पाँचों महाभूतों के आत्मरूप हुए हैं, प्राणियों के आदि और अन्त हैं तथा क्रोध, द्रोह और मोह से रहित हैं, उन शान्तस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 86 (12.46.86)
यस्मिन्सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वतश्च यः । यश्च सर्वमयो देवस्तस्मै सर्वात्मने नमः ॥
yasminsarvaṃ yataḥ sarvaṃ yaḥ sarvaṃ sarvataśca yaḥ | yaśca sarvamayo devastasmai sarvātmane namaḥ
जिनमें सब कुछ स्थित है, जिनसे सब कुछ उत्पन्न हुआ है, जो स्वयं सब कुछ हैं, सब ओर व्याप्त हैं और सर्वमय देव हैं, उन सर्वस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 87 (12.46.87)
यः शेते क्षीरपर्यङ्के दिव्यनागविभूषिते । फणासहस्ररचिते तस्मै निद्रात्मने नमः ॥
yaḥ śete kṣīraparyaṅke divyanāgavibhūṣite | phaṇāsahasraracite tasmai nidrātmane namaḥ
जो दिव्य नाग से सुशोभित, सहस्र फणों से रचित क्षीरशय्या पर शयन करते हैं, उन निद्रास्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 88 (12.46.88)
विश्वे च मरुतश्चैव रुद्रादित्याश्विनावपि । वसवः सिद्धसाध्याश्च तस्मै देवात्मने नमः ॥
viśve ca marutaścaiva rudrādityāśvināvapi | vasavaḥ siddhasādhyāśca tasmai devātmane namaḥ
विश्वेदेव, मरुद्गण, रुद्र, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमार, वसु, सिद्ध और साध्य, जिनके स्वरूप हैं, उन देवस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 89 (12.46.89)
अव्यक्तं बुद्ध्यहंकारो मनोबुद्धीन्द्रियाणि च । तन्मात्राणि विशेषाश्च तस्मै तत्वात्मने नमः ॥
avyaktaṃ buddhyahaṃkāro manobuddhīndriyāṇi ca | tanmātrāṇi viśeṣāśca tasmai tatvātmane namaḥ
अव्यक्त, बुद्धि और अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ, तन्मात्राएँ और विशेष (स्थूल) भूत, जिनके स्वरूप हैं, उन तत्त्वस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 90 (12.46.90)
भूतं भव्यं भविष्यच्च भूतादिप्रभवाव्ययः । योऽग्रजः सर्वभूतानां तस्मै भूतात्मने नमः ॥
bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyacca bhūtādiprabhavāvyayaḥ | yo'grajaḥ sarvabhūtānāṃ tasmai bhūtātmane namaḥ
जो भूत, वर्तमान और भविष्य हैं, प्राणियों की उत्पत्ति के अविनाशी मूल हैं और सब प्राणियों से पहले उत्पन्न हुए हैं, उन भूतस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 91 (12.46.91)
यं हि सूक्ष्मं विचिन्वन्ति परं सूक्ष्मविदो जनाः । सूक्ष्मात्सूक्ष्मं च यद्ब्रह्म तस्मै सूक्ष्मात्मने नमः ॥
yaṃ hi sūkṣmaṃ vicinvanti paraṃ sūkṣmavido janāḥ | sūkṣmātsūkṣmaṃ ca yadbrahma tasmai sūkṣmātmane namaḥ
सूक्ष्म तत्त्व को जानने वाले लोग जिन्हें परम सूक्ष्म के रूप में खोजते हैं, जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म ब्रह्म हैं, उन सूक्ष्मस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 92 (12.46.92)
मत्स्यो भूत्वा विरिञ्चाय येन वेदाः समाहृताः । रसातलगतः शीघ्रं तस्मै मत्स्यात्मने नमः ॥
matsyo bhūtvā viriñcāya yena vedāḥ samāhṛtāḥ | rasātalagataḥ śīghraṃ tasmai matsyātmane namaḥ
जिन्होंने मत्स्य होकर रसातल में शीघ्र जाकर ब्रह्मा के लिए वेदों का उद्धार किया, उन मत्स्यस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 93 (12.46.93)
मन्दराद्रिर्धृतो येन प्राप्ते ह्यमृतमन्थने । अतिकर्कशदेहाय तस्मै कूर्मात्मने नमः ॥
mandarādrirdhṛto yena prāpte hyamṛtamanthane | atikarkaśadehāya tasmai kūrmātmane namaḥ
अमृत-मन्थन के समय जिन्होंने मन्दराचल को धारण किया, जिनका शरीर अत्यन्त कठोर है, उन कूर्मस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 94 (12.46.94)
वाराहं रूपमास्थाय महीं सवनपर्वताम् । उद्धरत्येकदंष्ट्रेण तस्मै क्रोडात्मने नमः ॥
vārāhaṃ rūpamāsthāya mahīṃ savanaparvatām | uddharatyekadaṃṣṭreṇa tasmai kroḍātmane namaḥ
वराह का रूप धारण करके जो वनों और पर्वतों सहित पृथ्वी को एक दाँत पर उठा लेते हैं, उन वराहस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 95 (12.46.95)
नारसिंहवपुः कृत्वा सर्वलोकभयंकरम् । हिरण्यकशिपुं जघ्ने तस्मै सिंहात्मने नमः ॥
nārasiṃhavapuḥ kṛtvā sarvalokabhayaṃkaram | hiraṇyakaśipuṃ jaghne tasmai siṃhātmane namaḥ
सब लोकों को भयभीत करने वाला नृसिंह का शरीर धारण करके जिन्होंने हिरण्यकशिपु का वध किया, उन सिंहस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 96 (12.46.96)
पिङ्गेक्षणसटं यस्य रूपं दंष्ट्रानखैर्युतम् । दानवेन्द्रान्तकरणं तस्मै दृप्तात्मने नमः ॥
piṅgekṣaṇasaṭaṃ yasya rūpaṃ daṃṣṭrānakhairyutam | dānavendrāntakaraṇaṃ tasmai dṛptātmane namaḥ
जिनका रूप पीली आँखों और अयाल वाला तथा दाढ़ों और नखों से युक्त है और जो दानवेन्द्रों का अन्त करने वाला है, उन दृप्तस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 97 (12.46.97)
यं न देवा न गन्धर्वा न दैत्या न च दानवाः । तत्वतो हि विजानन्ति तस्मै सूक्ष्मात्मने नमः ॥
yaṃ na devā na gandharvā na daityā na ca dānavāḥ | tatvato hi vijānanti tasmai sūkṣmātmane namaḥ
जिन्हें न देवता, न गन्धर्व, न दैत्य और न दानव यथार्थ रूप में जानते हैं, उन सूक्ष्मस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 98 (12.46.98)
वामनं रूपमास्थाय बलिं संयम्य मायया । त्रैलोक्यं क्रान्तवान्यस्तु तस्मै क्रान्तात्मने नमः ॥
vāmanaṃ rūpamāsthāya baliṃ saṃyamya māyayā | trailokyaṃ krāntavānyastu tasmai krāntātmane namaḥ
वामन का रूप धारण करके जिन्होंने माया से बलि को बाँधा और तीनों लोकों को अपने पगों से नाप लिया, उन क्रान्तस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 99 (12.46.99)
जमदग्निसुतो भूत्वा रामः शस्त्रभृतां वरः । महीं निःक्षत्रियां चक्रे तस्मै रामात्मने नमः ॥
jamadagnisuto bhūtvā rāmaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | mahīṃ niḥkṣatriyāṃ cakre tasmai rāmātmane namaḥ
जमदग्नि के पुत्र शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राम होकर जिन्होंने पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दिया, उन रामस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 100 (12.46.100)
त्रिःसप्तकृत्वो यश्चैको धर्मे व्युत्क्रान्तिगौरवात् । जघान क्षत्रियान्सङ्ख्ये तस्मै क्रोधात्मने नमः ॥
triḥsaptakṛtvo yaścaiko dharme vyutkrāntigauravāt | jaghāna kṣatriyānsaṅkhye tasmai krodhātmane namaḥ
जिन्होंने अकेले ही धर्म के उल्लंघन की गम्भीरता के कारण इक्कीस बार युद्ध में क्षत्रियों का संहार किया, उन क्रोधस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 101 (12.46.101)
विभज्य पञ्चधाऽऽत्मानं वायुर्भूत्वा शरीरगः । यश्चेष्टयति भूतानि तस्मै वाय्वात्मने नमः ॥
vibhajya pañcadhā''tmānaṃ vāyurbhūtvā śarīragaḥ | yaśceṣṭayati bhūtāni tasmai vāyvātmane namaḥ
अपने को पाँच भागों में बाँटकर और शरीरों के भीतर वायु होकर जो प्राणियों को चेष्टा देते हैं, उन वायुस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 102 (12.46.102)
रामो दाशरथिर्भूत्वा पुलस्त्यकुलनन्दनम् । जघान रावणं सङ्ख्ये तस्मै क्षत्रात्मने नमः ॥
rāmo dāśarathirbhūtvā pulastyakulanandanam | jaghāna rāvaṇaṃ saṅkhye tasmai kṣatrātmane namaḥ
दशरथपुत्र राम होकर जिन्होंने पुलस्त्य के कुल को आनन्द देने वाले रावण को युद्ध में मारा, उन क्षत्रस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 103 (12.46.103)
यो हली मुसली श्रीमान्नीलाम्बरधरः स्थितः । रामाय रौहिणेयाय तस्मै भोगात्मने नमः ॥
yo halī musalī śrīmānnīlāmbaradharaḥ sthitaḥ | rāmāya rauhiṇeyāya tasmai bhogātmane namaḥ
जो हल और मूसल धारण करने वाले, श्रीमान् और नीले वस्त्र पहनने वाले रोहिणीपुत्र राम हैं, उन भोगात्मा (शेषस्वरूप) को नमस्कार है।
श्लोक 104 (12.46.104)
शङ्खिने चक्रिणे नित्यं शार्ङ्गिणे पीतवाससे । वनमालाधरायैव तस्मै कृष्णात्मने नमः ॥
śaṅkhine cakriṇe nityaṃ śārṅgiṇe pītavāsase | vanamālādharāyaiva tasmai kṛṣṇātmane namaḥ
जो सदा शङ्ख, चक्र और शार्ङ्ग धनुष धारण करते हैं, पीताम्बर पहनते हैं और वनमाला धारण किए रहते हैं, उन कृष्णस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 105 (12.46.105)
वसुदेवसुतः श्रीमान्क्रीडितो नन्दगोकुले । कंसस्य निधनार्थाय तस्मै क्रीडात्मने नमः ॥
vasudevasutaḥ śrīmānkrīḍito nandagokule | kaṃsasya nidhanārthāya tasmai krīḍātmane namaḥ
जिन श्रीमान् वसुदेवपुत्र ने कंस के वध के लिए नन्द के गोकुल में लीला की, उन क्रीडास्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 106 (12.46.106)
वासुदेवत्वमागम्य यदोर्वंशसमुद्भवः । भूभारहरणं चक्रे तस्मै कृष्णात्मने नमः ॥
vāsudevatvamāgamya yadorvaṃśasamudbhavaḥ | bhūbhāraharaṇaṃ cakre tasmai kṛṣṇātmane namaḥ
यदुवंश में उत्पन्न होकर और वासुदेव का रूप पाकर जिन्होंने पृथ्वी का भार उतारा, उन कृष्णस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 107 (12.46.107)
सारथ्यमर्जुनस्याजौ कुर्वन्गीतामृतं ददौ । लोकत्रयोपकाराय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥
sārathyamarjunasyājau kurvangītāmṛtaṃ dadau | lokatrayopakārāya tasmai brahmātmane namaḥ
युद्ध में अर्जुन का सारथ्य करते हुए जिन्होंने तीनों लोकों के उपकार के लिए गीतारूपी अमृत दिया, उन ब्रह्मस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 108 (12.46.108)
दानवांस्तु वशे कृत्वा पुनर्बुद्धत्वमागतः । सर्गस्य रक्षणार्थाय तस्मै बुद्धात्मने नमः ॥
dānavāṃstu vaśe kṛtvā punarbuddhatvamāgataḥ | sargasya rakṣaṇārthāya tasmai buddhātmane namaḥ
दानवों को वश में करके जो सृष्टि की रक्षा के लिए फिर बुद्ध के रूप में आए, उन बुद्धस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 109 (12.46.109)
हनिष्यति कलौ प्राप्ते म्लेच्छांस्तुरगवाहनः । धर्मसंस्थापको यस्तु तस्मै कल्क्यात्मने नमः ॥
haniṣyati kalau prāpte mlecchāṃsturagavāhanaḥ | dharmasaṃsthāpako yastu tasmai kalkyātmane namaḥ
जो कलियुग आने पर घोड़े पर सवार होकर म्लेच्छों का संहार करेंगे और धर्म की स्थापना करेंगे, उन कल्किस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 110 (12.46.110)
तारान्वये कालनेमिं हत्वा दानवपुङ्गवम् । ददौ राज्यं महेन्द्राय तस्मै साङ्ख्यात्मने नमः ॥
tārānvaye kālanemiṃ hatvā dānavapuṅgavam | dadau rājyaṃ mahendrāya tasmai sāṅkhyātmane namaḥ
तारा-सम्बन्धी युद्ध में दानवश्रेष्ठ कालनेमि को मारकर जिन्होंने राज्य महेन्द्र को दिया, उन साङ्ख्यस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 111 (12.46.111)
यः सर्वप्राणिनां देहे साक्षिभूतो ह्यवस्थितः । अक्षरः क्षरमाणानां तस्मै साक्ष्यात्मने नमः ॥
yaḥ sarvaprāṇināṃ dehe sākṣibhūto hyavasthitaḥ | akṣaraḥ kṣaramāṇānāṃ tasmai sākṣyātmane namaḥ
जो सब प्राणियों के शरीर में साक्षीरूप से स्थित हैं और नश्वर वस्तुओं के बीच अविनाशी हैं, उन साक्षिस्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 112 (12.46.112)
नमोस्तु ते महादेव नमस्ते भक्तवत्सल । सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु प्रसीद परमेश्वर ॥
namostu te mahādeva namaste bhaktavatsala | subrahmaṇya namaste'stu prasīda parameśvara
हे महादेव, आपको नमस्कार है; हे भक्तवत्सल, आपको नमस्कार है। हे सुब्रह्मण्य, आपको नमस्कार है; हे परमेश्वर, प्रसन्न हों।
श्लोक 113 (12.46.113)
अव्यक्तव्यक्तरूपेण व्याप्तं सर्वं त्वया विभो । नारायणं सहस्राक्षं सर्वलोकमहेश्वरम् ॥
avyaktavyaktarūpeṇa vyāptaṃ sarvaṃ tvayā vibho | nārāyaṇaṃ sahasrākṣaṃ sarvalokamaheśvaram
हे विभो, आपने अव्यक्त और व्यक्त रूप से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है: आप नारायण हैं, सहस्र नेत्रों वाले और सब लोकों के महान् ईश्वर हैं,
श्लोक 114 (12.46.114)
हिरण्यनाभ यज्ञाङ्गममृतं विश्वतोमुखम् । सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् ॥
hiraṇyanābha yajñāṅgamamṛtaṃ viśvatomukham | sarvadā sarvakāryeṣu nāsti teṣāmamaṅgalam
हिरण्यनाभ, यज्ञ के अङ्गस्वरूप, अमृतस्वरूप और सब ओर मुख वाले उन भगवान् को जो हृदय में धारण करते हैं, उनके लिए सब कार्यों में कभी अमङ्गल नहीं होता।
श्लोक 115 (12.46.115)
येषां हृदिस्थो देवेशो मङ्गलायतनं हरिः । मङ्गलं भगवान्विष्णुर्मङ्गलं मधुसूदनः ॥
yeṣāṃ hṛdistho deveśo maṅgalāyatanaṃ hariḥ | maṅgalaṃ bhagavānviṣṇurmaṅgalaṃ madhusūdanaḥ
जिनके हृदय में देवेश्वर, मङ्गलों के आश्रय हरि विराजमान हैं, उनके लिए भगवान् विष्णु मङ्गलरूप हैं और मधुसूदन मङ्गलरूप हैं।
श्लोक 116 (12.46.116)
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलं गरुडध्वजः । विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन्विश्वसंभव ॥
maṅgalaṃ puṇḍarīkākṣo maṅgalaṃ garuḍadhvajaḥ | viśvakarmannamaste'stu viśvātmanviśvasaṃbhava
कमलनयन मङ्गलरूप हैं, गरुडध्वज मङ्गलरूप हैं। हे विश्वकर्मन्, हे विश्वात्मन्, हे जगत् के उत्पत्तिस्थान, आपको नमस्कार है।
श्लोक 117 (12.46.117)
अपवर्गस्थभूतानां पञ्चानां परमास्थित । नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस्त्रिषु ॥
apavargasthabhūtānāṃ pañcānāṃ paramāsthita | namaste triṣu lokeṣu namaste paratastriṣu
हे परम पद में स्थित, मोक्ष में स्थित प्राणियों के पाँचों भूतों से परे विराजमान प्रभो, तीनों लोकों में आपको नमस्कार है, तीनों से परे भी आपको नमस्कार है।
श्लोक 118 (12.46.118)
नमस्ते दिक्षु सर्वासु त्वं हि सर्वपरायणम् । नमस्ते भगवन्विष्णो लोकानां प्रभवाव्यय ॥
namaste dikṣu sarvāsu tvaṃ hi sarvaparāyaṇam | namaste bhagavanviṣṇo lokānāṃ prabhavāvyaya
सब दिशाओं में आपको नमस्कार है, क्योंकि आप ही सबके परम आश्रय हैं। हे भगवन् विष्णु, हे लोकों के उत्पत्तिस्थान और अविनाशी प्रभो, आपको नमस्कार है।
श्लोक 119 (12.46.119)
त्वं हि कर्ता हृषीकेशः संहर्ता चापराजितः । तेन पश्यामि ते दिव्यान्भावान्हि त्रिषुवर्त्मसु ॥
tvaṃ hi kartā hṛṣīkeśaḥ saṃhartā cāparājitaḥ | tena paśyāmi te divyānbhāvānhi triṣuvartmasu
हे हृषीकेश, आप ही कर्ता हैं और आप ही अपराजित संहारक हैं। इसी कारण मैं तीनों मार्गों में आपके दिव्य भावों को देखता हूँ।
श्लोक 120 (12.46.120)
तच्च पश्यामि तत्वेन यत्ते रूपं सनातनम् । दिवं ते शिरसा व्याप्तं पद्भ्यां देवी वसुंधरा । विक्रमेण त्रयो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ॥
tacca paśyāmi tatvena yatte rūpaṃ sanātanam | divaṃ te śirasā vyāptaṃ padbhyāṃ devī vasuṃdharā | vikrameṇa trayo lokāḥ puruṣo'si sanātanaḥ
और मैं यथार्थ रूप में आपके उस सनातन रूप को देखता हूँ: आपके मस्तक से स्वर्ग व्याप्त है, आपके चरणों से देवी पृथ्वी, और आपके पगों से तीनों लोक। आप सनातन पुरुष हैं।
श्लोक 121 (12.46.121)
दिशो भुजा रविश्चक्षुर्वीर्ये शुक्रः प्रतिष्ठितः । सप्तमार्गा निरुद्धास्ते वायोरमिततेजसः ॥
diśo bhujā raviścakṣurvīrye śukraḥ pratiṣṭhitaḥ | saptamārgā niruddhāste vāyoramitatejasaḥ
दिशाएँ आपकी भुजाएँ हैं, सूर्य आपका नेत्र है, आपके वीर्य में शुक्र प्रतिष्ठित है। असीम तेज वाले वायु के सातों मार्ग आपके द्वारा रोक दिए गए हैं।
श्लोक 122 (12.46.122)
व्यक्ताव्यक्तस्वरूपेण व्याप्तं सर्वं त्वया विभो । अव्यक्तं ब्राह्मणं रूपं व्यक्तमेतच्चराचरम् ॥
vyaktāvyaktasvarūpeṇa vyāptaṃ sarvaṃ tvayā vibho | avyaktaṃ brāhmaṇaṃ rūpaṃ vyaktametaccarācaram
हे विभो, आपने व्यक्त और अव्यक्त स्वरूप से सबको व्याप्त कर रखा है; अव्यक्त ब्रह्म का रूप है और यह चराचर जगत् व्यक्त रूप है।
श्लोक 123 (12.46.123)
अतसीपुष्पसंकाशं पीतवाससमच्युतम् । ये नमस्यन्ति गोविन्दं न तेषां विद्यते भयम् ॥
atasīpuṣpasaṃkāśaṃ pītavāsasamacyutam | ye namasyanti govindaṃ na teṣāṃ vidyate bhayam
अलसी के फूल के समान कान्ति वाले, पीताम्बरधारी अच्युत गोविन्द को जो प्रणाम करते हैं, उन्हें कोई भय नहीं होता।
श्लोक 124 (12.46.124)
एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो । दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः । दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म । कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ॥
eko'pi kṛṣṇasya kṛtaḥ praṇāmo | daśāśvamedhāvabhṛthena tulyaḥ | daśāśvamedhī punareti janma | kṛṣṇapraṇāmī na punarbhavāya
कृष्ण को किया गया एक ही प्रणाम दस अश्वमेध यज्ञों के अवभृथ स्नान के बराबर है। दस अश्वमेध करने वाला फिर जन्म लेता है, पर कृष्ण को प्रणाम करने वाला पुनर्जन्म नहीं पाता।
श्लोक 125 (12.46.125)
कृष्णव्रताः कृष्णमनुस्मरन्तो । रात्रौ च कृष्णं पुनरुत्थिता ये । ते कृष्णदेहाः प्रविशन्ति कृष्ण । माज्यं यथा मन्त्रहुतं हुताशे ॥
kṛṣṇavratāḥ kṛṣṇamanusmaranto | rātrau ca kṛṣṇaṃ punarutthitā ye | te kṛṣṇadehāḥ praviśanti kṛṣṇa | mājyaṃ yathā mantrahutaṃ hutāśe
जो कृष्णव्रती कृष्ण का स्मरण करते हुए रात में उठकर फिर कृष्ण का ही स्मरण करते हैं, वे कृष्णरूप शरीर वाले होकर कृष्ण में उसी प्रकार प्रवेश करते हैं जैसे मन्त्र से हवन किया हुआ घी अग्नि में समा जाता है।
श्लोक 126 (12.46.126)
नमो नरकसंत्रासरक्षामण्डलकारिणे । संसारनिम्नगावर्ततरिकाष्ठाय विष्णवे ॥
namo narakasaṃtrāsarakṣāmaṇḍalakāriṇe | saṃsāranimnagāvartatarikāṣṭhāya viṣṇave
नरक के भय से रक्षा का घेरा बनाने वाले और संसाररूपी नदी के भँवरों को पार कराने वाली नौका की काष्ठ के समान विष्णु को नमस्कार है।
श्लोक 127 (12.46.127)
नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमोनमः ॥
namo brahmaṇyadevāya gobrāhmaṇahitāya ca | jagaddhitāya kṛṣṇāya govindāya namonamaḥ
ब्राह्मणों के हितैषी देव को, गौओं और ब्राह्मणों का हित करने वाले को, जगत् का कल्याण करने वाले कृष्ण और गोविन्द को बारम्बार नमस्कार है।
श्लोक 128 (12.46.128)
प्राणकान्तारपाथेयं संसारोच्छेदभेषजम् । दुःखशोकपरित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥
prāṇakāntārapātheyaṃ saṃsārocchedabheṣajam | duḥkhaśokaparitrāṇaṃ harirityakṣaradvayam
"हरि" ये दो अक्षर प्राणों की दुर्गम यात्रा के लिए पाथेय हैं, संसार का उच्छेद करने वाली औषधि हैं और दुःख तथा शोक से रक्षा करने वाले हैं।
श्लोक 129 (12.46.129)
नारायणपरं ब्रह्म नारायणपरं तपः । नारायणपरं सत्यं नारायणपरं परम् ॥
nārāyaṇaparaṃ brahma nārāyaṇaparaṃ tapaḥ | nārāyaṇaparaṃ satyaṃ nārāyaṇaparaṃ param
नारायण ही परब्रह्म हैं, नारायण ही परम तप हैं, नारायण ही परम सत्य हैं, नारायण ही परों में भी परम हैं।
श्लोक 130 (12.46.130)
यथा विष्णुमयं सत्यं यथा विष्णुमयं हविः । तथा विष्णुमयं सर्वं पाप्मा मे नश्यतां तथा ॥
yathā viṣṇumayaṃ satyaṃ yathā viṣṇumayaṃ haviḥ | tathā viṣṇumayaṃ sarvaṃ pāpmā me naśyatāṃ tathā
जैसे सत्य विष्णुमय है, जैसे हवि विष्णुमय है, वैसे ही सब कुछ विष्णुमय है; उसी प्रकार मेरा पाप नष्ट हो जाए।
श्लोक 131 (12.46.131)
तस्य यज्ञवराहस्य विष्णोरमिततेजसः । प्रणामं येऽपि कुर्वन्ति तेषामपि नमोनमः ॥
tasya yajñavarāhasya viṣṇoramitatejasaḥ | praṇāmaṃ ye'pi kurvanti teṣāmapi namonamaḥ
अमित तेज वाले उन यज्ञवराह विष्णु को जो प्रणाम करते हैं, उन्हें भी बारम्बार नमस्कार है।
श्लोक 132 (12.46.132)
त्वां प्रपन्नाय भक्ताय गतिमिष्टां जिगीषवे । यच्छ्रेयः पुण्डरीकाक्ष तद्ध्यायस्व सुरोत्तम ॥
tvāṃ prapannāya bhaktāya gatimiṣṭāṃ jigīṣave | yacchreyaḥ puṇḍarīkākṣa taddhyāyasva surottama
आपकी शरण में आए हुए, इष्ट गति को पाने की इच्छा वाले आपके भक्त के लिए जो श्रेयस्कर हो, हे पुण्डरीकाक्ष, हे देवश्रेष्ठ, उसका आप चिन्तन कीजिए।
श्लोक 133 (12.46.133)
इति विद्यातपोयोनिरयोनिर्विष्णुरीडितः । वाग्यज्ञेनार्चितो देवः प्रीयतां मे जनार्दनः ॥
iti vidyātapoyonirayonirviṣṇurīḍitaḥ | vāgyajñenārcito devaḥ prīyatāṃ me janārdanaḥ
इस प्रकार विद्या और तप के उत्पत्तिस्थान, स्वयं अयोनि विष्णु की स्तुति की गई। वाणीरूपी यज्ञ से पूजित देव जनार्दन मुझ पर प्रसन्न हों।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 134 (12.46.134)
एतावदुक्त्वा वचनं भीष्मस्तद्रतमानसः । नम इत्येव कृष्णाय प्रणाममकरोत्तदा ॥
etāvaduktvā vacanaṃ bhīṣmastadratamānasaḥ | nama ityeva kṛṣṇāya praṇāmamakarottadā
इतना कहकर, उन्हीं में मन लगाए हुए भीष्म ने तब "नमः" कहकर कृष्ण को प्रणाम किया।
श्लोक 135 (12.46.135)
तस्मिन्नुपरते वाक्ये ततस्ते ब्रह्मवादिनः । भीष्मं वाग्भिर्वाष्पगलास्तमानर्चुर्महाद्युतिम् ॥
tasminnuparate vākye tataste brahmavādinaḥ | bhīṣmaṃ vāgbhirvāṣpagalāstamānarcurmahādyutim
उस वाणी के समाप्त होने पर आँसुओं से रुँधे कण्ठ वाले उन ब्रह्मवादियों ने महातेजस्वी भीष्म का वचनों से सत्कार किया।
श्लोक 136 (12.46.136)
ते स्तुवन्तश्च विप्रेन्द्राः केशवं पुरुषोत्तमम् । भीष्मं च शनकैः सर्वे प्रशशंसुः पुनः पुनः ॥
te stuvantaśca viprendrāḥ keśavaṃ puruṣottamam | bhīṣmaṃ ca śanakaiḥ sarve praśaśaṃsuḥ punaḥ punaḥ
वे श्रेष्ठ ब्राह्मण पुरुषोत्तम केशव की स्तुति करते हुए धीरे-धीरे बार-बार भीष्म की भी प्रशंसा करने लगे।
श्लोक 137 (12.46.137)
अधिगम्य तु योगेन भक्तिं भीष्मस्य माधवः । त्रैलोक्यदर्शनं ज्ञानं दिव्यं दत्त्वा ययौ हरिः ॥
adhigamya tu yogena bhaktiṃ bhīṣmasya mādhavaḥ | trailokyadarśanaṃ jñānaṃ divyaṃ dattvā yayau hariḥ
योग से भीष्म की भक्ति को जानकर माधव हरि उन्हें तीनों लोकों को देखने वाला दिव्य ज्ञान देकर चल पड़े।
श्लोक 138 (12.46.138)
विदित्वा भक्तियोगं तं भीष्मस्य पुरुषोत्तमः । सहसोत्थाय तं हृष्टो यानमेवान्वपद्यत ॥
viditvā bhaktiyogaṃ taṃ bhīṣmasya puruṣottamaḥ | sahasotthāya taṃ hṛṣṭo yānamevānvapadyata
भीष्म के भक्तियोग को जानकर पुरुषोत्तम हर्षित होकर सहसा उठे और अपने रथ के पास गए।
श्लोक 139 (12.46.139)
केशवः सात्यकिश्चैव रथेनैकेन जग्मतुः । अपरेण महात्मानौ युधिष्ठिरधनञ्जयौ ॥
keśavaḥ sātyakiścaiva rathenaikena jagmatuḥ | apareṇa mahātmānau yudhiṣṭhiradhanañjayau
केशव और सात्यकि एक रथ में गए, और दोनों महात्मा युधिष्ठिर तथा धनञ्जय दूसरे रथ में।
श्लोक 140 (12.46.140)
भीमसेनो यमौ चोभौ रथमेकं समास्थिताः । कृपो युयुत्सुः सूतश्च सञ्जयश्चापरं रथम् ॥
bhīmaseno yamau cobhau rathamekaṃ samāsthitāḥ | kṛpo yuyutsuḥ sūtaśca sañjayaścāparaṃ ratham
भीमसेन और दोनों जुड़वाँ भाई एक रथ पर सवार हुए; कृप, युयुत्सु, सूत और सञ्जय दूसरे रथ पर।
श्लोक 141 (12.46.141)
ते रथैर्नगराकारैः प्रयाताः पुरुषर्षभाः । नेमिघोषेण महता कम्पयन्ते वसुंधराम् ॥
te rathairnagarākāraiḥ prayātāḥ puruṣarṣabhāḥ | nemighoṣeṇa mahatā kampayante vasuṃdharām
नगरों के समान विशाल रथों में बैठे हुए वे पुरुषश्रेष्ठ पहियों की भारी घरघराहट से पृथ्वी को कँपाते हुए चले।
श्लोक 142 (12.46.142)
ततो गिरः पुरुषवरस्तवेरितां । द्विजेरिताः पथिषु मनाक् स शुश्रुवे । कृताञ्जलिं प्रणतमथापरं जनं । स केशिहा मुदितमनाभ्यनन्दत ॥
tato giraḥ puruṣavarastaveritāṃ | dvijeritāḥ pathiṣu manāk sa śuśruve | kṛtāñjaliṃ praṇatamathāparaṃ janaṃ | sa keśihā muditamanābhyanandata
तब मार्ग में चलते हुए पुरुषश्रेष्ठ ने ब्राह्मणों द्वारा कही गई अपनी स्तुति की वाणी को थोड़ा-थोड़ा सुना; और हाथ जोड़कर झुके हुए अन्य लोगों का केशिहन्ता केशव ने प्रसन्न मन से अभिनन्दन किया।
श्लोक 143 (12.46.143)
इति स्मरन्पठति च शार्ङ्गधन्वनः । शृणोतु वा यदुकुलनन्दनस्तवम् । स चक्रभृत्प्रतिहतसर्वकिल्विषो । जनार्दनं प्रविशति देहसंक्षये ॥
iti smaranpaṭhati ca śārṅgadhanvanaḥ | śṛṇotu vā yadukulanandanastavam | sa cakrabhṛtpratihatasarvakilviṣo | janārdanaṃ praviśati dehasaṃkṣaye
जो इस प्रकार शार्ङ्गधन्वा यदुकुलनन्दन की इस स्तुति का स्मरण करते हुए पाठ करता है या उसे सुनता है, उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं और वह देह के छूटने पर चक्रधारी जनार्दन में प्रवेश करता है।
श्लोक 144 (12.46.144)
यं योगिनः प्राणवियोगकाले । यत्नेन चित्ते विनिवेशयन्ति । स तं पुरस्ताद्धरिमीक्षमाणः । प्राणाञ्जहौ प्राप्तफलो हि भीष्मः ॥
yaṃ yoginaḥ prāṇaviyogakāle | yatnena citte viniveśayanti | sa taṃ purastāddharimīkṣamāṇaḥ | prāṇāñjahau prāptaphalo hi bhīṣmaḥ
प्राणों के वियोग के समय योगी जिन्हें प्रयत्नपूर्वक चित्त में स्थापित करते हैं, उन्हीं हरि को सामने देखते हुए भीष्म ने फल पाकर प्राण त्याग दिए।
श्लोक 145 (12.46.145)
स्तवराजः समाप्तोऽयं विष्णोरद्भुतकर्मणः । गाङ्गेयेन पुरा गीतो महापातकनाशनः ॥
stavarājaḥ samāpto'yaṃ viṣṇoradbhutakarmaṇaḥ | gāṅgeyena purā gīto mahāpātakanāśanaḥ
अद्भुत कर्म करने वाले विष्णु का यह स्तवराज समाप्त हुआ, जिसे पूर्वकाल में गङ्गापुत्र भीष्म ने गाया था; यह महापापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 146 (12.46.146)
इमं नरः स्तवराजं मुमुक्षुः । पठञ्शुचिः कलुषितकल्मषापहम् । अतीत्य लोकान्मलिनः समागता । न्पदं स गच्छत्यमृतं महात्मनः ॥
imaṃ naraḥ stavarājaṃ mumukṣuḥ | paṭhañśuciḥ kaluṣitakalmaṣāpaham | atītya lokānmalinaḥ samāgatā | npadaṃ sa gacchatyamṛtaṃ mahātmanaḥ
जो मनुष्य मोक्ष की इच्छा से पवित्र होकर इस स्तवराज का पाठ करता है, जो मलिनों के पापों को हर लेता है, वह स्वयं मलिन होने पर भी समागत लोकों को लाँघकर महात्मा के अमृत पद को प्राप्त होता है।