शान्ति पर्व · अध्याय 47
कुरुक्षेत्र की यात्रा और परशुराम के विषय में युधिष्ठिर का प्रश्न
कृष्ण, युधिष्ठिर, कृप और चारों छोटे पाण्डव रथों में बैठकर कुरुक्षेत्र जाते हैं और उस भूमि को हड्डियों, खोपड़ियों और चिताओं के अवशेषों से भरा देखते हैं। मार्ग में कृष्ण रामह्रद नामक पाँच सरोवर दिखाकर बताते हैं कि जमदग्नि-पुत्र परशुराम ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित किया था। युधिष्ठिर अपना संशय रखते हैं कि यदि क्षत्रिय-वर्ग का ऐसा संहार हुआ था तो वह फिर कैसे उठ खड़ा हुआ, और परशुराम ने कुरुक्षेत्र में उसका संहार क्यों किया। कृष्ण उन्हें सारा वृत्तान्त सुनाने लगते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.47.1)
ततः स च हृषीकेशः स च राजा युधिष्ठिरः । कृपादयश्च ते सर्वे चत्वारः पाण्डवाश्च ते ॥
tataḥ sa ca hṛṣīkeśaḥ sa ca rājā yudhiṣṭhiraḥ | kṛpādayaśca te sarve catvāraḥ pāṇḍavāśca te
तब हृषीकेश कृष्ण और राजा युधिष्ठिर, कृप आदि वे सब, और वे चारों पाण्डव भी,
श्लोक 2 (12.47.2)
रथैस्तैर्नगरप्रख्यैः पताकाध्वजशोभितैः । ययुराशु कुरुक्षेत्रं वाजिभिः शीघ्रगामिभिः ॥
rathaistairnagaraprakhyaiḥ patākādhvajaśobhitaiḥ | yayurāśu kurukṣetraṃ vājibhiḥ śīghragāmibhiḥ
नगरों के समान विशाल, पताकाओं और ध्वजाओं से सुशोभित रथों में, तेज चलने वाले घोड़ों के साथ, शीघ्र ही कुरुक्षेत्र की ओर चल पड़े।
श्लोक 3 (12.47.3)
तेऽवतीर्य कुरुक्षेत्रे केशमज्जास्थिसंकुले । देहन्यासः कृतो यत्र क्षत्रियैस्तैर्महारथैः ॥
te'vatīrya kurukṣetre keśamajjāsthisaṃkule | dehanyāsaḥ kṛto yatra kṣatriyaistairmahārathaiḥ
वे कुरुक्षेत्र में उतरे, जो केश, मज्जा और हड्डियों से पटा हुआ था और जहाँ उन महारथी क्षत्रियों ने अपने शरीर छोड़े थे।
श्लोक 4 (12.47.4)
गजाश्वदेहास्थिचयैः पर्वतैरिव संचितम् । नरशीर्षकपालैश्च हंसैरिव च सर्वशः ॥
gajāśvadehāsthicayaiḥ parvatairiva saṃcitam | naraśīrṣakapālaiśca haṃsairiva ca sarvaśaḥ
वह हाथियों और घोड़ों की हड्डियों के पर्वत-जैसे ढेरों से भरा था और चारों ओर मनुष्यों की खोपड़ियाँ हंसों के झुंड की तरह बिखरी थीं।
श्लोक 5 (12.47.5)
चितासहस्रैर्निचितं वर्मशस्त्रसमाकुलम् । आपानभूमिं कालस्य तदा भुक्तोज्झितामिव ॥
citāsahasrairnicitaṃ varmaśastrasamākulam | āpānabhūmiṃ kālasya tadā bhuktojjhitāmiva
हज़ारों चिताओं से भरा और कवचों-शस्त्रों से अटा हुआ वह स्थान ऐसा लगता था मानो काल की पानभूमि हो, जिसे भोज के बाद छोड़ दिया गया हो।
श्लोक 6 (12.47.6)
भूतसङ्घानुचरितं रक्षोगणनिषेवितम् । पश्यन्तस्ते कुरुक्षेत्रं ययुराशु महारथाः ॥
bhūtasaṅghānucaritaṃ rakṣogaṇaniṣevitam | paśyantaste kurukṣetraṃ yayurāśu mahārathāḥ
भूतों के गणों से विचरित और राक्षसों के समूहों से सेवित उस कुरुक्षेत्र को देखते हुए वे महारथी शीघ्रता से आगे बढ़ते गए।
श्लोक 7 (12.47.7)
गच्छन्नेव महाबाहुः सर्वं यादवनन्दनः । युधिष्ठिराय प्रोवाच जामदग्न्यस्य विक्रमम् ॥
gacchanneva mahābāhuḥ sarvaṃ yādavanandanaḥ | yudhiṣṭhirāya provāca jāmadagnyasya vikramam
चलते-चलते महाबाहु यादवनन्दन कृष्ण ने युधिष्ठिर को जमदग्नि-पुत्र परशुराम के पराक्रम का सारा वृत्तान्त सुनाया।
वासुदेव उवाच
श्लोक 8 (12.47.8)
अमी रामह्रदाः पञ्च दृश्यन्ते पार्थ दूरतः । येषु संतर्पयामास पितॄन्क्षत्रियशोणितैः ॥
amī rāmahradāḥ pañca dṛśyante pārtha dūrataḥ | yeṣu saṃtarpayāmāsa pitṝnkṣatriyaśoṇitaiḥ
हे पार्थ! दूर से ये रामह्रद नामक पाँच सरोवर दिखाई दे रहे हैं। इन्हीं में उन्होंने क्षत्रियों के रक्त से अपने पितरों का तर्पण किया था।
श्लोक 9 (12.47.9)
त्रिःसप्तकृत्वो वसुधां कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः । इहेदानीं ततो रामः कर्मणो विरराम ह ॥
triḥsaptakṛtvo vasudhāṃ kṛtvā niḥkṣatriyāṃ prabhuḥ | ihedānīṃ tato rāmaḥ karmaṇo virarāma ha
पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित करके प्रभु परशुराम ने तब यहीं आकर उस कर्म से विराम लिया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 10 (12.47.10)
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा । रामेणेति यदात्थ त्वमत्र मे संशयो महान् ॥
triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivī kṛtā niḥkṣatriyā purā | rāmeṇeti yadāttha tvamatra me saṃśayo mahān
आप कहते हैं कि प्राचीन काल में परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित किया था। इस विषय में मुझे बड़ा संशय है।
श्लोक 11 (12.47.11)
क्षत्रबीजं यथा दग्धं रामेण यदुपुङ्गव । कथं भूयः समुत्पत्तिः क्षत्रस्यामितविक्रम ॥
kṣatrabījaṃ yathā dagdhaṃ rāmeṇa yadupuṅgava | kathaṃ bhūyaḥ samutpattiḥ kṣatrasyāmitavikrama
हे यदुश्रेष्ठ! यदि परशुराम ने क्षत्रियों का बीज जला डाला था, तो हे अमित पराक्रमी! क्षत्रिय-वर्ग की फिर उत्पत्ति कैसे हुई?
श्लोक 12 (12.47.12)
महात्मना भगवता रामेण यदुपुङ्गव । कथमुत्सादितं क्षत्रं कथमृद्धिगतं पुनः ॥
mahātmanā bhagavatā rāmeṇa yadupuṅgava | kathamutsāditaṃ kṣatraṃ kathamṛddhigataṃ punaḥ
हे यदुश्रेष्ठ! महात्मा भगवान् परशुराम ने क्षत्रिय-वर्ग का संहार कैसे किया, और वह फिर समृद्धि को कैसे प्राप्त हुआ?
श्लोक 13 (12.47.13)
महता रथयुद्धेन कोटिशः क्षत्रिया हताः । तथाऽभूच्च मही कीर्णा क्षत्रियैर्वदतां वर ॥
mahatā rathayuddhena koṭiśaḥ kṣatriyā hatāḥ | tathā'bhūcca mahī kīrṇā kṣatriyairvadatāṃ vara
हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! महान् रथयुद्ध में करोड़ों क्षत्रिय मारे गए और पृथ्वी क्षत्रियों से पट गई थी।
श्लोक 14 (12.47.14)
किमर्थं भार्गवेणेदं क्षत्रमुत्सादितं पुरा । रामेण यदुशार्दूल कुरुक्षेत्रे महात्मना ॥
kimarthaṃ bhārgaveṇedaṃ kṣatramutsāditaṃ purā | rāmeṇa yaduśārdūla kurukṣetre mahātmanā
हे यदुशार्दूल! महात्मा भार्गव परशुराम ने पूर्वकाल में कुरुक्षेत्र में क्षत्रिय-वर्ग का संहार किसलिए किया था?
श्लोक 15 (12.47.15)
एतन्मे छिन्धि वार्ष्णेय संशयं तार्क्ष्यकेतन । आगमो हि परः कृष्ण त्वत्तो नो वासवानुज ॥
etanme chindhi vārṣṇeya saṃśayaṃ tārkṣyaketana | āgamo hi paraḥ kṛṣṇa tvatto no vāsavānuja
हे वार्ष्णेय! हे गरुड़-ध्वज! मेरे इस संशय को दूर कीजिए। हे कृष्ण, हे इन्द्र के अनुज! हमारे लिए आपसे बढ़कर प्रमाण कोई नहीं है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (12.47.16)
ततो व्रजन्नेव गदाग्रजः प्रभुः । शशंस तस्मै निखिलेन तत्त्वतः । युधिष्ठिरायाप्रतिमौजसे तदा । यथाऽभवत्क्षत्रियसंकुला मही ॥
tato vrajanneva gadāgrajaḥ prabhuḥ | śaśaṃsa tasmai nikhilena tattvataḥ | yudhiṣṭhirāyāpratimaujase tadā | yathā'bhavatkṣatriyasaṃkulā mahī
तब रथ पर चलते-चलते गद के अग्रज प्रभु कृष्ण ने अप्रतिम तेज वाले युधिष्ठिर को पूरा वृत्तान्त ठीक-ठीक सुनाया कि पृथ्वी क्षत्रियों से कैसे भर गई थी।