शान्ति पर्व · अध्याय 48
परशुराम का जन्म और क्षत्रिय-वंश का पुनः उदय
कृष्ण युधिष्ठिर को परशुराम की कथा सुनाते हैं: ऋचीक द्वारा बनाए गए दो चरुओं की अदला-बदली से गाधि की पुत्री सत्यवती और उसकी माता के कारण जमदग्नि-पुत्र राम क्षत्रिय-स्वभाव के उग्र पुरुष के रूप में जन्मे; राजा कार्तवीर्य अर्जुन और उसके पुत्रों ने अपने ही विनाश को निमन्त्रण दिया; और राम ने पिता के वध का बदला लेने के लिए पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित करके उसे कश्यप को दे दिया। रक्षकों के अभाव में पृथ्वी रसातल में धँसने लगी तो कश्यप ने उसे अपनी जंघा पर थामा; उसकी प्रार्थना पर उन्होंने छिपे हुए क्षत्रिय-वंशजों को खोजकर राजा के रूप में अभिषिक्त किया, जिनसे आगे क्षत्रिय-वंश चले।
वासुदेव उवाच
श्लोक 1 (12.48.1)
शृणु कौन्तेय रामस्य प्रभावो यो मया श्रुतः । महर्षीणां कथयतां कारणं तस्य जन्म च ॥
śṛṇu kaunteya rāmasya prabhāvo yo mayā śrutaḥ | maharṣīṇāṃ kathayatāṃ kāraṇaṃ tasya janma ca
हे कुन्तीपुत्र! राम का प्रभाव जैसा मैंने महर्षियों से सुना है, जब वे उनके जन्म के कारण और जन्म की कथा कहते थे, वह सुनो,
श्लोक 2 (12.48.2)
यथा च जामदग्न्येन कोटिशः क्षत्रिया हताः । उद्भूता राजवंशेषु ये भूयो भारते हताः ॥
yathā ca jāmadagnyena koṭiśaḥ kṣatriyā hatāḥ | udbhūtā rājavaṃśeṣu ye bhūyo bhārate hatāḥ
और यह भी कि जमदग्नि-पुत्र ने किस प्रकार करोड़ों क्षत्रियों का वध किया, और राजवंशों में जो फिर उत्पन्न हुए, वे भारत-युद्ध में किस प्रकार फिर मारे गए।
श्लोक 3 (12.48.3)
जह्नोरजस्तु तनयो बलाकाश्वस्तु तत्सुतः । कुशिको नाम धर्मज्ञस्तस्य पुत्रो महीपते ॥
jahnorajastu tanayo balākāśvastu tatsutaḥ | kuśiko nāma dharmajñastasya putro mahīpate
जह्नु का पुत्र अजक था और उसका पुत्र बलाकाश्व; हे पृथ्वीपति! बलाकाश्व का पुत्र कुशिक नाम का धर्मज्ञ राजा हुआ।
श्लोक 4 (12.48.4)
अग्र्यं तपः समातिष्ठत्सहस्राक्षसमो भुवि । पुत्रं लभेयमजितं त्रिलोकेश्वरमित्युत ॥
agryaṃ tapaḥ samātiṣṭhatsahasrākṣasamo bhuvi | putraṃ labheyamajitaṃ trilokeśvaramityuta
वह इन्द्र के समान इस लोक में उत्तम तपस्या करने लगा; उसका संकल्प था कि मुझे अजेय और तीनों लोकों का स्वामी पुत्र प्राप्त हो।
श्लोक 5 (12.48.5)
तमुग्रतपसं दृष्ट्वा सहस्राक्षः पुरंदरः । समर्थं पुत्रजनने स्वयमेवैत्य भारत ॥
tamugratapasaṃ dṛṣṭvā sahasrākṣaḥ puraṃdaraḥ | samarthaṃ putrajanane svayamevaitya bhārata
हे भारत! उसकी उग्र तपस्या को देखकर पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ सहस्राक्ष पुरन्दर इन्द्र स्वयं ही वहाँ आए,
श्लोक 6 (12.48.6)
पुत्रत्वमगमद्राजंस्तस्य लोकेश्वरेश्वरः । गाधिर्नामाभवत्पुत्रः कौशिकः पाकशासनः ॥
putratvamagamadrājaṃstasya lokeśvareśvaraḥ | gādhirnāmābhavatputraḥ kauśikaḥ pākaśāsanaḥ
और हे राजन्! लोकेश्वरों के भी ईश्वर वे उसके पुत्र बन गए। वे पाकशासन कौशिक गाधि नाम के पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए।
श्लोक 7 (12.48.7)
तस्य कन्याऽभवद्राजन्नाम्ना सत्यवती प्रभो । तां गाधिर्भृगुपुत्राय ऋचीकाय ददौ प्रभुः ॥
tasya kanyā'bhavadrājannāmnā satyavatī prabho | tāṃ gādhirbhṛguputrāya ṛcīkāya dadau prabhuḥ
हे राजन्! हे प्रभो! उनकी एक कन्या हुई, जिसका नाम सत्यवती था। गाधि ने उसे भृगु के पुत्र ऋचीक को दे दिया।
श्लोक 8 (12.48.8)
ततस्तया हि कौन्तेय भार्गवः कुरुनन्दनः । पुत्रार्थं श्रपयामास चरुं गाधेस्तथैव च ॥
tatastayā hi kaunteya bhārgavaḥ kurunandanaḥ | putrārthaṃ śrapayāmāsa caruṃ gādhestathaiva ca
तब हे कुन्तीपुत्र! हे कुरुनन्दन! भार्गव ऋचीक ने पुत्र की प्राप्ति के लिए चरु पकाया, एक सत्यवती के लिए और वैसे ही एक गाधि के लिए।
श्लोक 9 (12.48.9)
आहूय चाह तां भार्यामृचीको भार्गवस्तदा । उपयोज्यश्चरुरयं त्वया मात्राऽप्ययं तव ॥
āhūya cāha tāṃ bhāryāmṛcīko bhārgavastadā | upayojyaścarurayaṃ tvayā mātrā'pyayaṃ tava
तब भार्गव ऋचीक ने अपनी पत्नी को बुलाकर उससे कहा, "यह चरु तुम खाना और यह दूसरा तुम्हारी माता खाएँ।"
ऋचीक उवाच
श्लोक 10 (12.48.10)
तस्या जनिष्यते पुत्रो दीप्तिमान्क्षत्रियर्षभः । अजय्यः क्षत्रियैर्लोके क्षत्रियर्षभसूदनः ॥
tasyā janiṣyate putro dīptimānkṣatriyarṣabhaḥ | ajayyaḥ kṣatriyairloke kṣatriyarṣabhasūdanaḥ
उनसे एक पुत्र उत्पन्न होगा, तेजस्वी, क्षत्रियों में श्रेष्ठ, जगत् में क्षत्रियों से अजेय और श्रेष्ठ क्षत्रियों का संहार करने वाला।
श्लोक 11 (12.48.11)
तवापि पुत्रं कल्याणि धृतिमन्तं शमात्मकम् । तपोन्वितं द्विजश्रेष्ठं चरुरेष विधास्यति ॥
tavāpi putraṃ kalyāṇi dhṛtimantaṃ śamātmakam | taponvitaṃ dvijaśreṣṭhaṃ carureṣa vidhāsyati
और हे कल्याणी! तुम्हें भी यह चरु धैर्यवान्, तपस्वी, शान्त स्वभाव का और द्विजों में श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करेगा।
वासुदेव उवाच
श्लोक 12 (12.48.12)
इत्येवमुक्त्वा तां भार्यां ऋचीको भृगुनन्दनः । तपस्यभिरतः श्रीमाञ्जगामारण्यमेव हि ॥
ityevamuktvā tāṃ bhāryāṃ ṛcīko bhṛgunandanaḥ | tapasyabhirataḥ śrīmāñjagāmāraṇyameva hi
अपनी पत्नी से यह कहकर भृगुनन्दन ऋचीक, जो तपस्या में तत्पर और तेजस्वी थे, वन को चले गए।
श्लोक 13 (12.48.13)
एतस्मिन्नेव काले तु तीर्थयात्रापरो नृपः । गाधिः सदारः संप्राप्त ऋचीकस्याश्रमं प्रति ॥
etasminneva kāle tu tīrthayātrāparo nṛpaḥ | gādhiḥ sadāraḥ saṃprāpta ṛcīkasyāśramaṃ prati
उसी समय तीर्थयात्रा में लगे राजा गाधि पत्नी के साथ ऋचीक के आश्रम में पहुँचे।
श्लोक 14 (12.48.14)
चरुद्वयं गृहीत्वा तु राजन्सत्यवती तदा । भर्त्रा दत्तं प्रसन्नेन मात्रे हृष्टा न्यवेदयत् ॥
carudvayaṃ gṛhītvā tu rājansatyavatī tadā | bhartrā dattaṃ prasannena mātre hṛṣṭā nyavedayat
तब हे राजन्! सत्यवती ने अपने प्रसन्न पति के दिए हुए दोनों चरु लिए और प्रसन्न होकर अपनी माता को दे दिए।
श्लोक 15 (12.48.15)
माता तु तस्याः कौन्तेय दुहित्रे स्वं चरुं ददौ । तस्याश्चरुमथाज्ञातमात्मसंस्थं चकार ह ॥
mātā tu tasyāḥ kaunteya duhitre svaṃ caruṃ dadau | tasyāścarumathājñātamātmasaṃsthaṃ cakāra ha
परन्तु हे कुन्तीपुत्र! माता ने अपना चरु पुत्री को दे दिया और पुत्री का चरु, उसे बिना बताए, स्वयं ग्रहण कर लिया।
श्लोक 16 (12.48.16)
अथ सत्यवती गर्भं क्षत्रियान्तकरं तदा । धारयामास दीप्तेन वपुषा घोरदर्शनम् ॥
atha satyavatī garbhaṃ kṣatriyāntakaraṃ tadā | dhārayāmāsa dīptena vapuṣā ghoradarśanam
तब सत्यवती ने दीप्त शरीर से युक्त होकर क्षत्रियों का अन्त करने वाला भयंकर गर्भ धारण किया।
श्लोक 17 (12.48.17)
तामृचीकस्तदा दृष्ट्वा ध्यानयोगेन भारत । अब्रवीद्भृगुशार्दूलः स्वां भार्यां देवरूपिणीम् ॥
tāmṛcīkastadā dṛṣṭvā dhyānayogena bhārata | abravīdbhṛguśārdūlaḥ svāṃ bhāryāṃ devarūpiṇīm
हे भारत! तब ध्यानयोग से उसे देखकर भृगुश्रेष्ठ ऋचीक ने देवी-जैसे रूप वाली अपनी पत्नी से कहा:
ऋचीक उवाच
श्लोक 18 (12.48.18)
मात्राऽसि व्यंसिता भद्रे चरुव्यत्यासहेतुना । तस्माज्जनिष्यते पुत्रः क्रूरकर्माऽत्यमर्षणः । जनयिष्यति माता ते ब्रह्मभूतं तपोधनम् ॥
mātrā'si vyaṃsitā bhadre caruvyatyāsahetunā | tasmājjaniṣyate putraḥ krūrakarmā'tyamarṣaṇaḥ | janayiṣyati mātā te brahmabhūtaṃ tapodhanam
हे भद्रे! चरुओं की अदला-बदली से तुम्हारी माता ने तुम्हें ठग लिया है। इसलिए तुम्हारे क्रूर कर्म करने वाला और अत्यन्त क्रोधी पुत्र होगा। और तुम्हारी माता ब्रह्मस्वरूप तपोधन पुत्र को जन्म देगी।
श्लोक 19 (12.48.19)
विश्वं हि ब्रह्म सुमहच्चरौ तव समाहितम् । क्षत्रवीर्यं च सकलं तव मात्रे समर्पितम् ॥
viśvaṃ hi brahma sumahaccarau tava samāhitam | kṣatravīryaṃ ca sakalaṃ tava mātre samarpitam
समस्त महान् ब्रह्मतेज तुम्हारे चरु में रखा गया था, और सारा क्षत्रिय-वीर्य तुम्हारी माता के चरु में रखा गया।
श्लोक 20 (12.48.20)
विपर्ययेण ते भद्रे नैतदेवं भविष्यति । मातुस्ते ब्राह्मणो भूयात्तव च क्षत्रियः सुतः ॥
viparyayeṇa te bhadre naitadevaṃ bhaviṣyati | mātuste brāhmaṇo bhūyāttava ca kṣatriyaḥ sutaḥ
हे भद्रे! इस उलट-फेर से वैसा नहीं होगा जैसा सोचा गया था: तुम्हारी माता का पुत्र ब्राह्मण होगा और तुम्हारा पुत्र क्षत्रिय।
वासुदेव उवाच
श्लोक 21 (12.48.21)
सैवमुक्ता महाभागा भर्त्रा सत्यवती तदा । पपात शिरसा तस्मै वेपन्ती चाब्रवीदिदम् ॥
saivamuktā mahābhāgā bhartrā satyavatī tadā | papāta śirasā tasmai vepantī cābravīdidam
पति के ऐसा कहने पर महाभागा सत्यवती काँपती हुई उनके चरणों में सिर रखकर गिर पड़ी और यह बोली:
सत्यवत्युवाच
श्लोक 22 (12.48.22)
नार्होऽसि भगवन्नद्य वक्तुमेवंविधं वचः । ब्राह्मणापशदं पुत्रं प्राप्स्यसीति हि मां प्रभो ॥
nārho'si bhagavannadya vaktumevaṃvidhaṃ vacaḥ | brāhmaṇāpaśadaṃ putraṃ prāpsyasīti hi māṃ prabho
हे भगवन्! अब आपको ऐसी बात कहना उचित नहीं। हे प्रभो! आप कहते हैं कि मुझे ब्राह्मणों का कलंक बनने वाला पुत्र प्राप्त होगा।
ऋचीक उवाच
श्लोक 23 (12.48.23)
नैष संकल्पितः कामो मया भद्रे तथा त्वयि । उग्रकर्मा भवेत्पुत्रश्चरुव्यत्यासहेतुना ॥
naiṣa saṃkalpitaḥ kāmo mayā bhadre tathā tvayi | ugrakarmā bhavetputraścaruvyatyāsahetunā
हे भद्रे! मैंने तुम्हारे लिए ऐसी कामना नहीं की थी। उग्र कर्म करने वाला पुत्र तो चरुओं की अदला-बदली के कारण होगा।
सत्यवत्युवाच
श्लोक 24 (12.48.24)
इच्छँल्लोकानपि मुने सृजेथाः किं पुनः सुतम् । शमात्मकमृजुं पुत्रं दातुमर्हसि मे प्रभो ॥
iccham̐llokānapi mune sṛjethāḥ kiṃ punaḥ sutam | śamātmakamṛjuṃ putraṃ dātumarhasi me prabho
हे मुने! आप चाहें तो लोकों की भी सृष्टि कर सकते हैं, फिर पुत्र की तो बात ही क्या! हे प्रभो! आपको मुझे शान्त और सरल स्वभाव का पुत्र देना चाहिए।
ऋचीक उवाच
श्लोक 25 (12.48.25)
नोक्तपूर्वं मया भद्रे स्वैरेष्वप्यनृतं वचः । किमुताग्निं समाधाय मन्त्रवच्चरुसाधने ॥
noktapūrvaṃ mayā bhadre svaireṣvapyanṛtaṃ vacaḥ | kimutāgniṃ samādhāya mantravaccarusādhane
हे भद्रे! मैंने पहले कभी हँसी में भी झूठी बात नहीं कही; फिर अग्नि स्थापित करके मन्त्रों के साथ चरु पकाते समय असत्य कैसे कहता!
श्लोक 26 (12.48.26)
दृष्टमेतत्पुरा भद्रे ज्ञातं च तपसा मया । ब्रह्मभूतं हि सकलं पितुस्तव कुलं भवेत् ॥
dṛṣṭametatpurā bhadre jñātaṃ ca tapasā mayā | brahmabhūtaṃ hi sakalaṃ pitustava kulaṃ bhavet
हे भद्रे! यह मैंने पहले ही देखा था और तप से जाना था: तुम्हारे पिता का सारा कुल ब्रह्मस्वरूप हो जाएगा।
सत्यवत्युवाच
श्लोक 27 (12.48.27)
काममेवं भवेत्पौत्रो मामैवं तनयः प्रभो । शमात्मकमृजुं पुत्रं लभेयं जपतां वर ॥
kāmamevaṃ bhavetpautro māmaivaṃ tanayaḥ prabho | śamātmakamṛjuṃ putraṃ labheyaṃ japatāṃ vara
ऐसा ही सही: वैसा स्वभाव मेरे पौत्र का हो, पुत्र का नहीं, हे प्रभो! हे जप करने वालों में श्रेष्ठ! मुझे शान्त और सरल स्वभाव का पुत्र प्राप्त हो।
ऋचीक उवाच
श्लोक 28 (12.48.28)
पुत्रे नास्ति विशेषो मे पौत्रे च वरवर्णिनि । यथा त्वयोक्तं वचनं तथा भद्रे भविष्यति ॥
putre nāsti viśeṣo me pautre ca varavarṇini | yathā tvayoktaṃ vacanaṃ tathā bhadre bhaviṣyati
हे वरवर्णिनी! मेरे लिए पुत्र और पौत्र में कोई भेद नहीं है। हे भद्रे! जैसा तुमने कहा है, वैसा ही होगा।
वासुदेव उवाच
श्लोक 29 (12.48.29)
ततः सत्यवती पुत्रं जनयामास भार्गवम् । तपस्यभिरतं शान्तं जमदग्निं यतव्रतम् ॥
tataḥ satyavatī putraṃ janayāmāsa bhārgavam | tapasyabhirataṃ śāntaṃ jamadagniṃ yatavratam
तब सत्यवती ने तपस्या में लगे रहने वाले, शान्त और व्रतनिष्ठ भार्गव पुत्र जमदग्नि को जन्म दिया।
श्लोक 30 (12.48.30)
विश्वामित्रं च दायादं गाधिः कुशिकनन्दनः । प्राप ब्रह्मर्षिसमितं विश्वेन ब्रह्मणा युतम् ॥
viśvāmitraṃ ca dāyādaṃ gādhiḥ kuśikanandanaḥ | prāpa brahmarṣisamitaṃ viśvena brahmaṇā yutam
और कुशिक-वंशी गाधि को विश्वामित्र नाम का उत्तराधिकारी प्राप्त हुआ, जो सम्पूर्ण ब्रह्मतेज से युक्त होकर ब्रह्मर्षियों की मण्डली में सम्मिलित हुआ।
श्लोक 31 (12.48.31)
ऋचीको जनयामास जमदग्निं तपोनिधिम् । सोऽपि पुत्रं ह्यजनयज्जमदग्निः सुदारुणम् ॥
ṛcīko janayāmāsa jamadagniṃ taponidhim | so'pi putraṃ hyajanayajjamadagniḥ sudāruṇam
ऋचीक ने तपोनिधि जमदग्नि को उत्पन्न किया और उसने भी एक अत्यन्त भयंकर पुत्र को जन्म दिया,
श्लोक 32 (12.48.32)
सर्वविद्यान्तगं श्रेष्ठं धनुर्वेदस्य पारगम् । रामं क्षत्रियहन्तारं प्रदीप्तमिव पावकम् ॥
sarvavidyāntagaṃ śreṣṭhaṃ dhanurvedasya pāragam | rāmaṃ kṣatriyahantāraṃ pradīptamiva pāvakam
जो समस्त विद्याओं का पारगामी, श्रेष्ठ और धनुर्वेद में निपुण था: अग्नि के समान प्रज्वलित, क्षत्रियों का संहार करने वाला राम।
श्लोक 33 (12.48.33)
तोषयित्वा महादेवं पर्वते गन्धमादने । अस्त्राणि वरयामास परशुं चातितेजसम् ॥
toṣayitvā mahādevaṃ parvate gandhamādane | astrāṇi varayāmāsa paraśuṃ cātitejasam
गन्धमादन पर्वत पर महादेव को प्रसन्न करके उसने दिव्य अस्त्र और अत्यन्त तेजस्वी परशु माँग लिया।
श्लोक 34 (12.48.34)
स तेनाकुण्ठधारेण ज्वलितानलवर्चसा । कुठारेणाप्रमेयेण लोकेष्वप्रतिमोऽभवत् ॥
sa tenākuṇṭhadhāreṇa jvalitānalavarcasā | kuṭhāreṇāprameyeṇa lokeṣvapratimo'bhavat
प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी और कभी कुण्ठित न होने वाली धार वाले उस अप्रमेय कुठार से वह सब लोकों में अप्रतिम हो गया।
श्लोक 35 (12.48.35)
एतस्मिन्नेव काले तु कृतवीर्यात्मजो बली । अर्जुनो नाम तेजस्वी क्षत्रियो हैहयाधिपः ॥
etasminneva kāle tu kṛtavīryātmajo balī | arjuno nāma tejasvī kṣatriyo haihayādhipaḥ
उसी समय कृतवीर्य का बलवान् पुत्र अर्जुन नाम का तेजस्वी क्षत्रिय हैहयों का अधिपति था,
श्लोक 36 (12.48.36)
दत्तात्रेयप्रसादेन राजा बाहुसहस्रवान् । चक्रवर्ती महातेजा विप्राणामाश्वमेधिके ॥
dattātreyaprasādena rājā bāhusahasravān | cakravartī mahātejā viprāṇāmāśvamedhike
जो दत्तात्रेय की कृपा से सहस्रबाहु राजा, महातेजस्वी चक्रवर्ती सम्राट् हुआ; ब्राह्मणों के लिए किए गए अपने अश्वमेध में उसने
श्लोक 37 (12.48.37)
ददौ स पृथिवीं सर्वां सप्तद्वीपां सपर्वताम् । सबाह्वस्त्रबलेनाजौ जित्वा परमधर्मवित् ॥
dadau sa pṛthivīṃ sarvāṃ saptadvīpāṃ saparvatām | sabāhvastrabalenājau jitvā paramadharmavit
सात द्वीपों और पर्वतों सहित सारी पृथ्वी दान कर दी; उस परम धर्मज्ञ ने उसे अपनी भुजाओं और अस्त्रों के बल से युद्ध में जीता था।
श्लोक 38 (12.48.38)
तृषितेन च कौन्तेय भिक्षितश्चित्रभानुना । सहस्रबाहुर्विक्रान्तः प्रादाद्भिक्षामथाग्नये ॥
tṛṣitena ca kaunteya bhikṣitaścitrabhānunā | sahasrabāhurvikrāntaḥ prādādbhikṣāmathāgnaye
और हे कुन्तीपुत्र! एक बार प्यासे चित्रभानु अग्नि ने उससे भिक्षा माँगी, और पराक्रमी सहस्रबाहु ने अग्नि को वह भिक्षा दे दी।
श्लोक 39 (12.48.39)
ग्रामान्पुराणि राष्ट्राणि घोषांश्चैव तु वीर्यवान् । जज्वाल तस्य वाणेद्धचित्रभानुर्दिधक्षया ॥
grāmānpurāṇi rāṣṭrāṇi ghoṣāṃścaiva tu vīryavān | jajvāla tasya vāṇeddhacitrabhānurdidhakṣayā
गाँव, नगर, राष्ट्र और गोपालों की बस्तियाँ: उसके बाणों से प्रज्वलित हुआ बलवान् चित्रभानु उन्हें जलाने की इच्छा से भड़क उठा।
श्लोक 40 (12.48.40)
स तस्य पुरुषेन्द्रस्य प्रभावेण महौजसः । ददाह कार्तवीर्यस्य शैलानपि धरामपि ॥
sa tasya puruṣendrasya prabhāveṇa mahaujasaḥ | dadāha kārtavīryasya śailānapi dharāmapi
उस महातेजस्वी नरेन्द्र कार्तवीर्य के प्रभाव से अग्नि ने पर्वतों और भूमियों तक को जला डाला।
श्लोक 41 (12.48.41)
स शून्यमाश्रमारण्यमापवस्य महात्मनः । ददाह पवनेनेद्धश्चित्रभानुः सहैहयः ॥
sa śūnyamāśramāraṇyamāpavasya mahātmanaḥ | dadāha pavaneneddhaścitrabhānuḥ sahaihayaḥ
वायु से प्रज्वलित चित्रभानु ने हैहय के साथ महात्मा आपव के सूने आश्रम-वन को जला दिया।
श्लोक 42 (12.48.42)
आपवस्तं ततो रोषाच्छशापार्जुनमच्युत । दग्धेऽऽश्रमे महाबाहो कार्तवीर्येण वीर्यवान् ॥
āpavastaṃ tato roṣācchaśāpārjunamacyuta | dagdhe''śrame mahābāho kārtavīryeṇa vīryavān
तब हे अच्युत! कार्तवीर्य द्वारा आश्रम जला दिए जाने पर बलवान् आपव ने क्रोध में अर्जुन को शाप दिया, हे महाबाहो!
आपव उवाच
श्लोक 43 (12.48.43)
त्वया न वर्जितं यस्मान्ममेदं हि महद्वनम् । दग्धं तस्माद्रणे रामो बाहूंस्ते च्छेत्स्यतेऽर्जुन ॥
tvayā na varjitaṃ yasmānmamedaṃ hi mahadvanam | dagdhaṃ tasmādraṇe rāmo bāhūṃste cchetsyate'rjuna
तुमने मेरे इस विशाल वन को नहीं बचाया और यह जल गया, इसलिए हे अर्जुन! युद्ध में राम तुम्हारी भुजाएँ काट डालेंगे।
वासुदेव उवाच
श्लोक 44 (12.48.44)
अर्जुनस्तु महातेजा बली नित्यं शमात्मकः । ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च दाता शूरश्च भारत । नाचिन्तयत्तदा शापं तेन दत्तं महात्मना ॥
arjunastu mahātejā balī nityaṃ śamātmakaḥ | brahmaṇyaśca śaraṇyaśca dātā śūraśca bhārata | nācintayattadā śāpaṃ tena dattaṃ mahātmanā
परन्तु हे भारत! महातेजस्वी, बलवान्, सदा शान्त, ब्राह्मणों के भक्त, शरणदाता, दानी और शूर अर्जुन ने उस महात्मा के दिए हुए शाप का उस समय कुछ विचार नहीं किया।
श्लोक 45 (12.48.45)
तस्य पुत्राः सुबलिनः शापेनासन्पितुर्वधे । निमित्तमवलिप्ता वै नृशंसाश्चैव नित्यदा ॥
tasya putrāḥ subalinaḥ śāpenāsanpiturvadhe | nimittamavaliptā vai nṛśaṃsāścaiva nityadā
उसके पुत्र बड़े बलवान्, घमण्डी और सदा क्रूर थे, और उसी शाप से वे पिता के वध के निमित्त बने।
श्लोक 46 (12.48.46)
जमदग्नेस्तु धेन्वास्ते वत्समानिन्युरच्युत । अज्ञातं कार्तवीर्यस्य हैहयेन्द्रस्य धीमतः ॥
jamadagnestu dhenvāste vatsamāninyuracyuta | ajñātaṃ kārtavīryasya haihayendrasya dhīmataḥ
हे अच्युत! उन्होंने हैहयराज बुद्धिमान् कार्तवीर्य की जानकारी के बिना जमदग्नि की गाय का बछड़ा उठा लिया।
श्लोक 47 (12.48.47)
तन्निमित्तमभूद्युद्धं जामदग्नेर्महात्मनः । ततोऽर्जुनस्य बाहून्स चिच्छेद रुषितोऽनघ ॥
tannimittamabhūdyuddhaṃ jāmadagnermahātmanaḥ | tato'rjunasya bāhūnsa ciccheda ruṣito'nagha
वही महात्मा जमदग्नि-पुत्र के साथ युद्ध का कारण बना, और हे निष्पाप! उसने क्रोध में अर्जुन की भुजाएँ काट डालीं।
श्लोक 48 (12.48.48)
तं भ्रमन्तं ततो वत्सं जामदग्न्यः स्वमाश्रमम् । प्रत्यानयत राजेन्द्र तेषामन्तःपुरात्प्रभुः ॥
taṃ bhramantaṃ tato vatsaṃ jāmadagnyaḥ svamāśramam | pratyānayata rājendra teṣāmantaḥpurātprabhuḥ
तब हे राजेन्द्र! जमदग्नि-पुत्र प्रभु उस भटकते हुए बछड़े को उनके अन्तःपुर से अपने आश्रम में वापस ले आए।
श्लोक 49 (12.48.49)
अर्जुनस्य सुतास्ते तु संभूयाबुद्धयस्तदा । गत्वाऽऽश्रममसंबुद्धं जमदग्नेर्महात्मनः । अपातयन्त भल्लाग्रैः शिरः कायान्नराधिप ॥
arjunasya sutāste tu saṃbhūyābuddhayastadā | gatvā''śramamasaṃbuddhaṃ jamadagnermahātmanaḥ | apātayanta bhallāgraiḥ śiraḥ kāyānnarādhipa
परन्तु अर्जुन के पुत्र, मूर्ख होकर एक साथ मिलकर, महात्मा जमदग्नि के निःशंक आश्रम में गए और हे नराधिप! भल्ल बाणों की नोकों से उनका सिर धड़ से गिरा दिया।
श्लोक 50 (12.48.50)
समित्कुशार्थं रामस्य निर्यातस्य यशस्विनः । प्रत्यक्षं राममातुश्च तथैवाश्रमवासिनाम् ॥
samitkuśārthaṃ rāmasya niryātasya yaśasvinaḥ | pratyakṣaṃ rāmamātuśca tathaivāśramavāsinām
यशस्वी राम उस समय समिधा और कुश लाने के लिए बाहर गए हुए थे, और यह राम की माता तथा आश्रमवासियों के सामने ही हुआ।
श्लोक 51 (12.48.51)
श्रुत्वा रामस्तमर्थं च क्रुद्धः कालानलोपमः । धनुर्वेदेऽद्वितीयो हि दिव्यास्त्रैः समलंकृतः ॥
śrutvā rāmastamarthaṃ ca kruddhaḥ kālānalopamaḥ | dhanurvede'dvitīyo hi divyāstraiḥ samalaṃkṛtaḥ
यह सुनकर राम प्रलयाग्नि के समान क्रुद्ध हो उठे; वे धनुर्वेद में अद्वितीय थे और दिव्य अस्त्रों से सुसज्जित थे;
श्लोक 52 (12.48.52)
चन्द्रबिम्बार्धसंकाशं परशुं गृह्य भार्गवः । ततः पितृवधामर्षाद्रामः परममन्युमान् । निःक्षत्रियां प्रतिश्रुत्य महीं शस्त्रमगृह्णत ॥
candrabimbārdhasaṃkāśaṃ paraśuṃ gṛhya bhārgavaḥ | tataḥ pitṛvadhāmarṣādrāmaḥ paramamanyumān | niḥkṣatriyāṃ pratiśrutya mahīṃ śastramagṛhṇata
उन भार्गव ने अर्धचन्द्र के समान चमकता परशु उठाया। तब पिता के वध के क्रोध से अत्यन्त कुपित राम ने पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित करने की प्रतिज्ञा करके शस्त्र धारण किया।
श्लोक 53 (12.48.53)
ततः स भृगुशार्दूलः कार्तवीर्यस्य वीर्यवान् । विक्रम्य निजघानाशु पुत्रान्पौत्रांश्च सर्वशः ॥
tataḥ sa bhṛguśārdūlaḥ kārtavīryasya vīryavān | vikramya nijaghānāśu putrānpautrāṃśca sarvaśaḥ
फिर पराक्रमी भृगुश्रेष्ठ ने आक्रमण करके कार्तवीर्य के सभी पुत्रों और पौत्रों को शीघ्र मार डाला।
श्लोक 54 (12.48.54)
स हैहयसहस्राणि हत्वा परममन्युमान् । महीं सागरपर्यन्तां चकार रुधिरोक्षिताम् ॥
sa haihayasahasrāṇi hatvā paramamanyumān | mahīṃ sāgaraparyantāṃ cakāra rudhirokṣitām
अत्यन्त क्रोध में हज़ारों हैहयों को मारकर उसने समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी को रक्त से लथपथ कर दिया।
श्लोक 55 (12.48.55)
स तथा सुमहातेजाः कृत्वा निःक्षत्रियां महीम् । कृपया परयाऽऽविष्टो वनमेव जगाम ह ॥
sa tathā sumahātejāḥ kṛtvā niḥkṣatriyāṃ mahīm | kṛpayā parayā''viṣṭo vanameva jagāma ha
इस प्रकार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित करके महातेजस्वी राम परम करुणा से भरकर वन में चले गए।
श्लोक 56 (12.48.56)
ततो वर्षसहस्रेषु समतीतेषु केषुचित् । कोपं संप्राप्तवांस्तत्र प्रकृत्या कोपनः प्रभुः ॥
tato varṣasahasreṣu samatīteṣu keṣucit | kopaṃ saṃprāptavāṃstatra prakṛtyā kopanaḥ prabhuḥ
फिर कुछ हज़ार वर्ष बीत जाने पर स्वभाव से क्रोधी उन प्रभु को वहाँ फिर क्रोध उत्पन्न हुआ।
श्लोक 57 (12.48.57)
विश्वामित्रस्य पौत्रस्तु रैभ्यपुत्रो महातपाः । परावसुर्महाराज क्षिप्त्वाऽऽह जनसंसदि ॥
viśvāmitrasya pautrastu raibhyaputro mahātapāḥ | parāvasurmahārāja kṣiptvā''ha janasaṃsadi
हे महाराज! विश्वामित्र के पौत्र और रैभ्य के पुत्र महातपस्वी परावसु ने जनसमूह की सभा में उनका तिरस्कार करते हुए कहा:
परावसुरुवाच
श्लोक 58 (12.48.58)
ये ते ययातिपतने यज्ञे सन्तः समागताः । प्रतर्दनप्रभृतयो राम किं क्षत्रिया न ते ॥
ye te yayātipatane yajñe santaḥ samāgatāḥ | pratardanaprabhṛtayo rāma kiṃ kṣatriyā na te
ययाति के पतन के समय यज्ञ में जो सज्जन एकत्र हुए थे, वे प्रतर्दन आदि, हे राम! क्या क्षत्रिय नहीं थे?
श्लोक 59 (12.48.59)
मिथ्याप्रतिज्ञो राम त्वं कत्थसे जनसंसदि । भयात्क्षत्रियवीराणां पर्वतं समुपाश्रितः ॥
mithyāpratijño rāma tvaṃ katthase janasaṃsadi | bhayātkṣatriyavīrāṇāṃ parvataṃ samupāśritaḥ
हे राम! आप अपनी प्रतिज्ञा में झूठे हैं, जनसभा में डींग मारते हैं; क्षत्रिय वीरों के भय से आपने पर्वत की शरण ले रखी है।
वासुदेव उवाच
श्लोक 60 (12.48.60)
सा पुनः क्षत्रियशतैः पृथिवी सर्वतः स्तृता । परावसोर्वचः श्रुत्वा शस्त्रं जग्राह भार्गवः ॥
sā punaḥ kṣatriyaśataiḥ pṛthivī sarvataḥ stṛtā | parāvasorvacaḥ śrutvā śastraṃ jagrāha bhārgavaḥ
वह पृथ्वी फिर सब ओर सैकड़ों क्षत्रियों से फैल गई थी। परावसु की बात सुनकर भार्गव ने शस्त्र उठा लिया।
श्लोक 61 (12.48.61)
ततो ये क्षत्रिया राजञ्शतशस्तेन वर्जिताः । ते विवृद्धा महावीर्याः पृथिवीपतयोऽभवन् ॥
tato ye kṣatriyā rājañśataśastena varjitāḥ | te vivṛddhā mahāvīryāḥ pṛthivīpatayo'bhavan
तब हे राजन्! जिन क्षत्रियों को उसने सैकड़ों की संख्या में छोड़ दिया था, वे बढ़कर महापराक्रमी पृथ्वीपति बन गए थे।
श्लोक 62 (12.48.62)
स पुनस्ताञ्जघानाशु बालानपि नराधिप । गर्भस्थैस्तु मही व्याप्ता पुनरेवाभवत्तदा ॥
sa punastāñjaghānāśu bālānapi narādhipa | garbhasthaistu mahī vyāptā punarevābhavattadā
हे नराधिप! उसने उन्हें, बालकों तक को, फिर शीघ्र मार डाला; परन्तु तब भी पृथ्वी गर्भ में स्थित बालकों से फिर भर गई।
श्लोक 63 (12.48.63)
जातंजातं स गर्भं तु पुनरेव जघान ह । अरक्षंश्च सुतान्कांश्चित्तदा क्षत्रिययोषितः ॥
jātaṃjātaṃ sa garbhaṃ tu punareva jaghāna ha | arakṣaṃśca sutānkāṃścittadā kṣatriyayoṣitaḥ
उसने जो-जो बालक जन्मा, उसे फिर मार डाला; परन्तु क्षत्रिय स्त्रियों ने उस समय कुछ पुत्रों को बचा लिया।
श्लोक 64 (12.48.64)
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः । दक्षिणामश्वमेधान्ते कश्यपायाददत्ततः ॥
triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivīṃ kṛtvā niḥkṣatriyāṃ prabhuḥ | dakṣiṇāmaśvamedhānte kaśyapāyādadattataḥ
इस प्रकार इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित करके प्रभु ने तब अश्वमेध के अन्त में उसे कश्यप को दक्षिणा में दे दिया।
श्लोक 65 (12.48.65)
स क्षत्रियाणां शेषार्थं करेणोद्दिश्य कश्यपः । स्रुक्प्रग्रहवता राजंस्ततो वाक्यमथाब्रवीत् ॥
sa kṣatriyāṇāṃ śeṣārthaṃ kareṇoddiśya kaśyapaḥ | srukpragrahavatā rājaṃstato vākyamathābravīt
हे राजन्! तब कश्यप ने बचे हुए क्षत्रियों की रक्षा के लिए, स्रुवा थामे हुए हाथ से संकेत करके, ये वचन कहे:
कश्यप उवाच
श्लोक 66 (12.48.66)
गच्छ पारं समुद्रस्य दक्षिणस्य महामुने । न ते मद्विषये राम वस्तव्यमिह कर्हिचित् ॥
gaccha pāraṃ samudrasya dakṣiṇasya mahāmune | na te madviṣaye rāma vastavyamiha karhicit
हे महामुने! आप दक्षिण समुद्र के पार चले जाइए। हे राम! आपको मेरे राज्य में कभी नहीं रहना चाहिए।
श्लोक 67 (12.48.67)
पृथिवी दक्षिणा दत्ता वाजिमेधे मम त्वया । पुनरस्याः पृथिव्या हि दत्त्वा दातुमनीश्वरः ॥
pṛthivī dakṣiṇā dattā vājimedhe mama tvayā | punarasyāḥ pṛthivyā hi dattvā dātumanīśvaraḥ
अश्वमेध में आपने मुझे यह पृथ्वी दक्षिणा में दी है, और जो पृथ्वी दे चुका, वह उसे फिर देने का अधिकारी नहीं रहता।
वासुदेव उवाच
श्लोक 68 (12.48.68)
ततः शूर्पाकरं देशं सागरस्तस्य निर्ममे । संत्रासाज्जामदग्न्यस्य सोऽपरान्तमहीतलम् ॥
tataḥ śūrpākaraṃ deśaṃ sāgarastasya nirmame | saṃtrāsājjāmadagnyasya so'parāntamahītalam
तब जमदग्नि-पुत्र के भय से समुद्र ने उसके लिए शूर्पारक देश बनाया, जो अपरान्त की भूमि है।
श्लोक 69 (12.48.69)
कश्यपस्तां महाराज प्रतिगृह्य वसुंधराम् । कृत्वा ब्राह्मणसंस्थां वै प्रविष्टः सुमहद्वनम् ॥
kaśyapastāṃ mahārāja pratigṛhya vasuṃdharām | kṛtvā brāhmaṇasaṃsthāṃ vai praviṣṭaḥ sumahadvanam
हे महाराज! कश्यप इस पृथ्वी को स्वीकार करके और उसे ब्राह्मणों के अधिकार में रखकर एक विशाल वन में चले गए।
श्लोक 70 (12.48.70)
ततः शूद्राश्च वैश्याश्च यथा स्वैरप्रचारिणः । अवर्तन्त द्विजाग्र्याणां दारेषु भरतर्षभ ॥
tataḥ śūdrāśca vaiśyāśca yathā svairapracāriṇaḥ | avartanta dvijāgryāṇāṃ dāreṣu bharatarṣabha
तब हे भरतश्रेष्ठ! शूद्र और वैश्य स्वच्छन्द आचरण करते हुए श्रेष्ठ द्विजों की पत्नियों से सम्बन्ध करने लगे।
श्लोक 71 (12.48.71)
अराजके जीवलोके दुर्बला बलवत्तरैः । वध्यन्ते न हि वित्तेषु प्रभुत्वं कस्यचित्तदा ॥
arājake jīvaloke durbalā balavattaraiḥ | vadhyante na hi vitteṣu prabhutvaṃ kasyacittadā
राजा से रहित जगत् में निर्बल बलवानों द्वारा सताए जाने लगे और उस समय किसी का भी अपने धन पर अधिकार नहीं रहा।
श्लोक 72 (12.48.72)
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चोत्पथगामिनः । परस्परं समाश्रित्य घातयन्त्यपथस्थिताः ॥
brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrāścotpathagāminaḥ | parasparaṃ samāśritya ghātayantyapathasthitāḥ
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कुमार्ग पर चलने लगे; वे अधर्म के मार्ग पर स्थित होकर एक-दूसरे का सहारा लेकर परस्पर हत्याएँ कराने लगे।
श्लोक 73 (12.48.73)
स्वधर्मं ब्राह्मणास्त्यक्त्वा पाषण्डत्वं समाश्रिताः । चौरिकानृतमायाश्च सर्वे चैव प्रकुर्वते ॥
svadharmaṃ brāhmaṇāstyaktvā pāṣaṇḍatvaṃ samāśritāḥ | caurikānṛtamāyāśca sarve caiva prakurvate
ब्राह्मणों ने अपना धर्म छोड़कर पाखण्ड अपना लिया और सभी चोरी, झूठ और छल करने लगे।
श्लोक 74 (12.48.74)
स्वधर्मस्थान्द्विजान्हत्वा तथाऽऽश्रमनिवासिनः । वैश्याः सत्पथसंस्थाश्च शूद्रा ये चैव धार्मिकाः ॥
svadharmasthāndvijānhatvā tathā''śramanivāsinaḥ | vaiśyāḥ satpathasaṃsthāśca śūdrā ye caiva dhārmikāḥ
अपने धर्म में स्थित द्विजों और आश्रमवासियों को मारकर, तथा सन्मार्ग पर स्थित वैश्यों और धर्मात्मा शूद्रों को भी,
श्लोक 75 (12.48.75)
तान्सर्वान्घातयन्ति स्म दुराचाराः सुनिर्भयाः । यज्ञाध्ययनशीलांश्च आश्रमस्थांस्तपस्विनः ॥
tānsarvānghātayanti sma durācārāḥ sunirbhayāḥ | yajñādhyayanaśīlāṃśca āśramasthāṃstapasvinaḥ
उन निर्भय दुराचारियों ने सबको मरवा डाला, और यज्ञ-अध्ययन में लगे लोगों तथा आश्रमों में रहने वाले तपस्वियों को भी।
श्लोक 76 (12.48.76)
गोबालवृद्धनारीणां नाशं कुर्वन्ति चापरे । आन्वीक्षकी त्रयी वार्ता न च नीतिः प्रवर्तते ॥
gobālavṛddhanārīṇāṃ nāśaṃ kurvanti cāpare | ānvīkṣakī trayī vārtā na ca nītiḥ pravartate
दूसरे लोग गायों, बालकों, वृद्धों और स्त्रियों का नाश करने लगे। तर्कविद्या, त्रयी वेद, वार्ता और नीति का प्रचलन नहीं रहा।
श्लोक 77 (12.48.77)
व्रात्यतां समनुप्राप्ता बहवो हि द्विजातयः । अधरोत्तरापचारेण म्लेच्छभूताश्च सर्वशः ॥
vrātyatāṃ samanuprāptā bahavo hi dvijātayaḥ | adharottarāpacāreṇa mlecchabhūtāśca sarvaśaḥ
बहुत-से द्विजाति व्रात्य अवस्था को प्राप्त हो गए और ऊँच-नीच के उलट-फेर से सब प्रकार म्लेच्छ-जैसे हो गए।
श्लोक 78 (12.48.78)
ततः कालेन पृथिवी पीड्यमाना दुरात्मभिः । विपर्ययेण तेनाशु प्रविवेश रसातलम् । अरक्ष्यमाणा विधिवत्क्षत्रियैर्धर्मरक्षिभिः ॥
tataḥ kālena pṛthivī pīḍyamānā durātmabhiḥ | viparyayeṇa tenāśu praviveśa rasātalam | arakṣyamāṇā vidhivatkṣatriyairdharmarakṣibhiḥ
फिर समय बीतने पर दुष्टों से पीड़ित पृथ्वी, उस उलट-फेर के कारण, धर्म की रक्षा करने वाले क्षत्रियों द्वारा विधिपूर्वक रक्षित न होने से शीघ्र ही रसातल में समा गई।
श्लोक 79 (12.48.79)
तां दृष्ट्वा द्रवतीं तत्र संत्रासात्स महामनाः । ऊरुणा धारयामास कश्यपः पृथिवीं ततः । निमज्जन्तीं ततो राजंस्तेनोर्वीति मही स्मृता ॥
tāṃ dṛṣṭvā dravatīṃ tatra saṃtrāsātsa mahāmanāḥ | ūruṇā dhārayāmāsa kaśyapaḥ pṛthivīṃ tataḥ | nimajjantīṃ tato rājaṃstenorvīti mahī smṛtā
उसे भय से भागती हुई देखकर महामना कश्यप ने पृथ्वी को अपनी जंघा पर थाम लिया; हे राजन्! उस समय डूबती हुई पृथ्वी उसी कारण 'उर्वी' नाम से स्मरण की जाती है।
श्लोक 80 (12.48.80)
रक्षणार्थं समुद्दिश्य ययाचे पृथिवी तदा । प्रसाद्य कश्यपं देवी क्षत्रियान्बाहुशालिनः ॥
rakṣaṇārthaṃ samuddiśya yayāce pṛthivī tadā | prasādya kaśyapaṃ devī kṣatriyānbāhuśālinaḥ
तब देवी पृथ्वी ने अपनी रक्षा के उद्देश्य से कश्यप को प्रसन्न करके बलिष्ठ भुजाओं वाले क्षत्रियों के लिए उनसे याचना की।
पृथिव्युवाच
श्लोक 81 (12.48.81)
सन्ति ब्रह्मन्मया गुप्ताः स्त्रीषु क्षत्रियपुङ्गवाः । हैहयानां कुले जातास्ते संरक्षन्तु मां मुने ॥
santi brahmanmayā guptāḥ strīṣu kṣatriyapuṅgavāḥ | haihayānāṃ kule jātāste saṃrakṣantu māṃ mune
हे ब्रह्मन्! मैंने हैहयों के कुल में उत्पन्न कुछ श्रेष्ठ क्षत्रियों को स्त्रियों के बीच छिपाकर बचा रखा है; हे मुने! वे मेरी रक्षा करें।
श्लोक 82 (12.48.82)
अस्ति पौरवदायादो विदूरथसुतः प्रभो । ऋक्षैः संवर्धितो विप्र ऋक्षवत्यथ पर्वते ॥
asti pauravadāyādo vidūrathasutaḥ prabho | ṛkṣaiḥ saṃvardhito vipra ṛkṣavatyatha parvate
हे प्रभो! पुरुवंश का एक उत्तराधिकारी है, विदूरथ का पुत्र, जिसे हे विप्र! ऋक्षवान् पर्वत पर रीछों ने पाला है।
श्लोक 83 (12.48.83)
तथाऽनुकम्पमानेन यज्वनाथामितौजसा । पराशरेण दायादः सौदासस्याभिरक्षितः ॥
tathā'nukampamānena yajvanāthāmitaujasā | parāśareṇa dāyādaḥ saudāsasyābhirakṣitaḥ
और अपार तेज वाले यज्ञकर्ता पराशर ने दया करके सौदास के उत्तराधिकारी की रक्षा की।
श्लोक 84 (12.48.84)
सर्वकर्माणि कुरुते शूद्रवत्तस्य स द्विजः । सर्वकर्मेत्यभिख्यातः स मां रक्षतु पार्थिवः ॥
sarvakarmāṇi kurute śūdravattasya sa dvijaḥ | sarvakarmetyabhikhyātaḥ sa māṃ rakṣatu pārthivaḥ
वह द्विज उनके सब कार्य शूद्र की तरह करता है, इसलिए 'सर्वकर्मा' नाम से प्रसिद्ध है; वह राजा मेरी रक्षा करे।
श्लोक 85 (12.48.85)
शिबिपुत्रो महातेजा गोपतिर्नाम नामतः । वने संवर्धितो गोभिः सोऽभिरक्षतु मां मुने ॥
śibiputro mahātejā gopatirnāma nāmataḥ | vane saṃvardhito gobhiḥ so'bhirakṣatu māṃ mune
शिबि का महातेजस्वी पुत्र गोपति नाम का है, जो वन में गायों के बीच पला; हे मुने! वह मेरी रक्षा करे।
श्लोक 86 (12.48.86)
प्रतर्दनस्य पुत्रस्तु वत्सो नाम महाबलः । वत्सैः संवर्धितो गोष्ठे स मां रक्षतु पार्थिवः ॥
pratardanasya putrastu vatso nāma mahābalaḥ | vatsaiḥ saṃvardhito goṣṭhe sa māṃ rakṣatu pārthivaḥ
प्रतर्दन का पुत्र महाबली वत्स है, जो गोशाला में बछड़ों के बीच पला; वह राजा मेरी रक्षा करे।
श्लोक 87 (12.48.87)
दधिवाहनपुत्रस्तु पौत्रो दिविरथस्य च । अङ्गः स गौतमेनासीद्गङ्गाकूलेऽभिरक्षितः ॥
dadhivāhanaputrastu pautro divirathasya ca | aṅgaḥ sa gautamenāsīdgaṅgākūle'bhirakṣitaḥ
दधिवाहन का पुत्र और दिविरथ का पौत्र अंग है, जिसकी रक्षा गौतम ने गंगा के तट पर की थी।
श्लोक 88 (12.48.88)
बृहद्रथो महातेजा भूरिभूतिपरिष्कृतः । गोलाङ्गूलैर्महाभागो गृध्रकूटेऽभिरक्षितः ॥
bṛhadratho mahātejā bhūribhūtipariṣkṛtaḥ | golāṅgūlairmahābhāgo gṛdhrakūṭe'bhirakṣitaḥ
महातेजस्वी बृहद्रथ, जो प्रचुर वैभव से सम्पन्न है, गृध्रकूट पर गोलाङ्गूल वानरों द्वारा रक्षित हुआ।
श्लोक 89 (12.48.89)
मरुत्तस्यान्ववाये च रक्षिताः क्षत्रियात्मजाः । मरुत्पतिसमा वीर्ये समुद्रेणाभिरक्षिताः ॥
maruttasyānvavāye ca rakṣitāḥ kṣatriyātmajāḥ | marutpatisamā vīrye samudreṇābhirakṣitāḥ
मरुत्त के वंश में भी क्षत्रिय-पुत्र बचाए गए, जो पराक्रम में इन्द्र के समान हैं और जिनकी रक्षा समुद्र ने की।
श्लोक 90 (12.48.90)
एते क्षत्रियदायादास्तत्रतत्र परिश्रुताः । व्योकारहेमकारादिजातिं नित्यं समाश्रिताः ॥
ete kṣatriyadāyādāstatratatra pariśrutāḥ | vyokārahemakārādijātiṃ nityaṃ samāśritāḥ
ये क्षत्रियों के उत्तराधिकारी जहाँ-तहाँ प्रसिद्ध हैं; वे सदा व्योकार और स्वर्णकार आदि जातियों की शरण में रहे हैं।
श्लोक 91 (12.48.91)
यदि मामभिरक्षन्ति ततः स्थास्यामि निश्चला । एतेषां पितरश्चैव तथैव च पितामहाः ॥
yadi māmabhirakṣanti tataḥ sthāsyāmi niścalā | eteṣāṃ pitaraścaiva tathaiva ca pitāmahāḥ
यदि वे मेरी रक्षा करें तो मैं स्थिर रहूँगी। इनके पिता और वैसे ही पितामह
श्लोक 92 (12.48.92)
मदर्थं निहता युद्धे रामेणाक्लिष्टकर्मणा । तेषामपचितिश्चैव मया कार्या महामुने ॥
madarthaṃ nihatā yuddhe rāmeṇākliṣṭakarmaṇā | teṣāmapacitiścaiva mayā kāryā mahāmune
मेरे लिए अक्लिष्टकर्मा राम के हाथों युद्ध में मारे गए थे, और हे महामुने! मुझे उनका प्रतिदान करना है।
श्लोक 93 (12.48.93)
न ह्यहं कामये नित्यमतिक्रान्तेन रक्षणम् । वर्तमानेन वर्तेयं तत्क्षिप्रं संविधीयताम् ॥
na hyahaṃ kāmaye nityamatikrāntena rakṣaṇam | vartamānena varteyaṃ tatkṣipraṃ saṃvidhīyatām
मैं कभी भी मर्यादा का उल्लंघन करने वाले से रक्षा नहीं चाहती; मैं ऐसे के अधीन रहूँ जो सदाचार से चलता हो। यह शीघ्र व्यवस्थित किया जाए।
वासुदेव उवाच
श्लोक 94 (12.48.94)
ततः पृथिव्या निर्दिष्टांस्तान्समानीय कश्यपः । अभ्यषिञ्चन्महीपालान्क्षत्रियान्वीर्यसंमतान् ॥
tataḥ pṛthivyā nirdiṣṭāṃstānsamānīya kaśyapaḥ | abhyaṣiñcanmahīpālānkṣatriyānvīryasaṃmatān
तब कश्यप ने पृथ्वी के बताए हुए उन क्षत्रियों को एकत्र करके उन पराक्रम में मान्य क्षत्रियों को पृथ्वी के राजाओं के रूप में अभिषिक्त किया।
श्लोक 95 (12.48.95)
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च येषां वंशाः प्रतिष्ठिताः । एवमेतत्पुरावृत्तं यन्मां पृच्छसि पाण्डव ॥
teṣāṃ putrāśca pautrāśca yeṣāṃ vaṃśāḥ pratiṣṭhitāḥ | evametatpurāvṛttaṃ yanmāṃ pṛcchasi pāṇḍava
उनके पुत्र और पौत्र, जिनसे उनके वंश प्रतिष्ठित हुए: हे पाण्डव! तुम मुझसे जिस प्राचीन वृत्तान्त के विषय में पूछ रहे थे, वह यही है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 96 (12.48.96)
एवं ब्रुवंस्तं च यदुप्रवीरो । युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठम् । रथेन तेनाशु ययौ यथाऽर्को । विशन्प्रभाभिर्भगवांस्त्रिलोकीम् ॥
evaṃ bruvaṃstaṃ ca yadupravīro | yudhiṣṭhiraṃ dharmabhṛtāṃ variṣṭham | rathena tenāśu yayau yathā'rko | viśanprabhābhirbhagavāṃstrilokīm
यदुवंश के वीर कृष्ण धर्मधारियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर से इस प्रकार कहते हुए उस रथ से शीघ्र चल पड़े, जैसे भगवान् सूर्य अपनी किरणों से तीनों लोकों में प्रवेश करते हुए चलते हैं।