शान्ति पर्व · अध्याय 49
कृष्ण का भीष्म से युधिष्ठिर को सान्त्वना देने का आग्रह
राम के कर्म को सुनकर युधिष्ठिर विस्मित होते हैं। वे और कृष्ण, अन्य पाण्डवों, सात्यकि और कृप के साथ ओघवती नदी के तट पर ऋषियों के बीच शरशय्या पर लेटे भीष्म के पास जाते हैं। कृष्ण उनका कुशल और उनकी बुद्धि की स्वच्छता पूछते हैं, सब प्रकार के धर्मों में उनके ज्ञान की प्रशंसा करते हैं और उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे बन्धुजनों के विनाश से व्यथित युधिष्ठिर का शोक दूर करें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.49.1)
ततो रामस्य तत्कर्म श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः । विस्मयं परमं गत्वा प्रत्युवाच जनार्दनम् ॥
tato rāmasya tatkarma śrutvā rājā yudhiṣṭhiraḥ | vismayaṃ paramaṃ gatvā pratyuvāca janārdanam
तब राजा युधिष्ठिर राम के उस कर्म को सुनकर अत्यन्त विस्मय से भर गए और उन्होंने जनार्दन से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (12.49.2)
अहो रामस्य वार्ष्णेय शक्रस्येव महात्मनः । विक्रमो वसुधा येन क्रोधान्निःक्षत्रिया कृता ॥
aho rāmasya vārṣṇeya śakrasyeva mahātmanaḥ | vikramo vasudhā yena krodhānniḥkṣatriyā kṛtā
अहो वार्ष्णेय, महात्मा राम का पराक्रम इन्द्र के ही समान है, जिन्होंने क्रोध में पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दिया!
श्लोक 3 (12.49.3)
गोभिः समुद्रेण तथा गोलाङ्गूलर्क्षवानरैः । गुप्ता रामभयोद्विग्नाः क्षत्रियाणां कुलोद्वहाः ॥
gobhiḥ samudreṇa tathā golāṅgūlarkṣavānaraiḥ | guptā rāmabhayodvignāḥ kṣatriyāṇāṃ kulodvahāḥ
राम के भय से घबराए हुए, क्षत्रियों के कुलों को आगे चलाने वाले वंशजों को गायों, समुद्र तथा लंगूरों, रीछों और वानरों ने आश्रय देकर बचाया।
श्लोक 4 (12.49.4)
अहो धन्यो नृलोकोऽयं सभाग्याश्च नरा भुवि । यत्र कर्मेदृशं धर्म्यं द्विजाग्र्यैः कृतमच्युत ॥
aho dhanyo nṛloko'yaṃ sabhāgyāśca narā bhuvi | yatra karmedṛśaṃ dharmyaṃ dvijāgryaiḥ kṛtamacyuta
अहो, यह मनुष्यलोक धन्य है और पृथ्वी के मनुष्य भाग्यशाली हैं, हे अच्युत, जहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने ऐसा धर्ममय कर्म किया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (12.49.5)
कथयन्तौ कथां तात तावच्युतयुधिष्ठिरौ । जग्मतुर्यत्र गाङ्गेयः शरतल्पगतः प्रभुः ॥
kathayantau kathāṃ tāta tāvacyutayudhiṣṭhirau | jagmaturyatra gāṅgeyaḥ śaratalpagataḥ prabhuḥ
हे तात, इस प्रकार बातें करते हुए वे दोनों, अच्युत और युधिष्ठिर, वहाँ गए जहाँ प्रभु गाङ्गेय शरशय्या पर पड़े थे।
श्लोक 6 (12.49.6)
ततस्ते ददृशुर्भीष्मं शरप्रस्तरशायिनम् । स्वरश्मिमालासंवीतं सायंसूर्यसमप्रभम् ॥
tataste dadṛśurbhīṣmaṃ śaraprastaraśāyinam | svaraśmimālāsaṃvītaṃ sāyaṃsūryasamaprabham
वहाँ उन्होंने भीष्म को बाणों की शय्या पर लेटे देखा; वे अपनी किरणों की माला में लिपटे हुए सायंकाल के सूर्य के समान दीप्त थे।
श्लोक 7 (12.49.7)
उपास्यमानं मुनिभिर्देवैरिव शतक्रतुम् । देशे परमधर्मिष्ठे नदीमोघवतीमनु ॥
upāsyamānaṃ munibhirdevairiva śatakratum | deśe paramadharmiṣṭhe nadīmoghavatīmanu
ओघवती नदी के किनारे, परम धर्मनिष्ठ उस स्थान पर वे मुनियों से उसी प्रकार सेवित हो रहे थे जैसे देवताओं से इन्द्र।
श्लोक 8 (12.49.8)
दूरादेव तमालोक्य कृष्णो राजा च धर्मजः । चत्वारः पाण्डवाश्चैव ते च शारद्वतादयः ॥
dūrādeva tamālokya kṛṣṇo rājā ca dharmajaḥ | catvāraḥ pāṇḍavāścaiva te ca śāradvatādayaḥ
उन्हें दूर से ही देखकर कृष्ण, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर, चारों अन्य पाण्डव और शारद्वत (कृप) आदि सब,
श्लोक 9 (12.49.9)
अवस्कन्द्याथ वाहेभ्यः संयम्य प्रचलं मनः । एकीकृत्येन्द्रियग्राममुपतस्थुर्महामुनीन् ॥
avaskandyātha vāhebhyaḥ saṃyamya pracalaṃ manaḥ | ekīkṛtyendriyagrāmamupatasthurmahāmunīn
अपने वाहनों से उतरे और चंचल मन को स्थिर करके तथा इन्द्रियों के समूह को एकाग्र करके उन महामुनियों के पास पहुँचे।
श्लोक 10 (12.49.10)
अभिवाद्य तु गोविन्दः सात्यकिस्ते च पार्थिवाः । व्यासादींस्तानृषीन्पश्चाद्गाङ्गेयमुपतस्थिरे ॥
abhivādya tu govindaḥ sātyakiste ca pārthivāḥ | vyāsādīṃstānṛṣīnpaścādgāṅgeyamupatasthire
गोविन्द, सात्यकि और वे राजा पहले व्यास आदि उन ऋषियों को प्रणाम करके फिर गाङ्गेय के समीप पहुँचे।
श्लोक 11 (12.49.11)
तपोवृद्धिं ततः पृष्ट्वा गाङ्गेयं यदुपुङ्गवः । परिवार्य ततः सर्वे निपेदुः पुरुषर्षभाः ॥
tapovṛddhiṃ tataḥ pṛṣṭvā gāṅgeyaṃ yadupuṅgavaḥ | parivārya tataḥ sarve nipeduḥ puruṣarṣabhāḥ
यदुश्रेष्ठ कृष्ण ने गाङ्गेय से उनकी तपस्या की वृद्धि के विषय में पूछा, और फिर वे सब पुरुषश्रेष्ठ उन्हें घेरकर बैठ गए।
श्लोक 12 (12.49.12)
ततो निशाम्य गाङ्गेयं शाम्यमानमिवानलम् । किंचिद्दीनमना भीष्ममितिहोवाच केशवः ॥
tato niśāmya gāṅgeyaṃ śāmyamānamivānalam | kiṃciddīnamanā bhīṣmamitihovāca keśavaḥ
तब बुझती हुई अग्नि के समान गाङ्गेय को देखकर कुछ खिन्न मन वाले केशव ने भीष्म से यह कहा।
वासुदेव उवाच
श्लोक 13 (12.49.13)
कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि यथापुरम् । कच्चिन्न व्याकुला चैव बुद्धिस्ते वदतां वर ॥
kaccijjñānāni sarvāṇi prasannāni yathāpuram | kaccinna vyākulā caiva buddhiste vadatāṃ vara
क्या आपके सब ज्ञान पहले की तरह निर्मल हैं? और हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, आपकी बुद्धि व्याकुल तो नहीं है?
श्लोक 14 (12.49.14)
शराभिघातदुःखार्तं कच्चिद्गात्रं न दूयते । मानसादपि दुःखाद्धि शारीरं बलवत्तरम् ॥
śarābhighātaduḥkhārtaṃ kaccidgātraṃ na dūyate | mānasādapi duḥkhāddhi śārīraṃ balavattaram
बाणों की चोट के दुःख से पीड़ित आपका शरीर कष्ट तो नहीं पा रहा? क्योंकि मन के दुःख से भी शरीर का दुःख अधिक बलवान होता है।
श्लोक 15 (12.49.15)
वरदानात्पितुः कामं छन्दमृत्युरसि प्रभो । शन्तनोर्धर्मनित्यस्य न त्वेतदिह कारणम् ॥
varadānātpituḥ kāmaṃ chandamṛtyurasi prabho | śantanordharmanityasya na tvetadiha kāraṇam
पिता शन्तनु ने, जो सदा धर्म में स्थिर रहते थे, आपको वर दिया है, इसलिए हे प्रभो, आप इच्छा से मरने वाले हैं; पर यहाँ वह कोई कारण नहीं है।
श्लोक 16 (12.49.16)
सुसूक्ष्मोऽपि तु देहे वै शल्यो जनयते रुजम् । किंपुनः शरसंघातैश्चितस्य तव पार्थिव ॥
susūkṣmo'pi tu dehe vai śalyo janayate rujam | kiṃpunaḥ śarasaṃghātaiścitasya tava pārthiva
अत्यन्त सूक्ष्म काँटा भी शरीर में धँस जाए तो पीड़ा देता है; फिर हे राजन्, बाणों के समूह से बिंधे हुए आपका क्या कहना?
श्लोक 17 (12.49.17)
कामं नैतत्तवाख्येयं प्राणिनां प्रभवाप्ययौ । भवानुपदिशेच्छ्रेयो देवानामपि भारत ॥
kāmaṃ naitattavākhyeyaṃ prāṇināṃ prabhavāpyayau | bhavānupadiśecchreyo devānāmapi bhārata
प्राणियों की उत्पत्ति और लय के विषय में आपको कुछ बताने की आवश्यकता निश्चय ही नहीं है; हे भारत, आप तो देवताओं को भी कल्याण का उपदेश दे सकते हैं।
श्लोक 18 (12.49.18)
यच्च भूतं भविष्यं च भवच्च पुरुषर्षभ । सर्वं तज्ज्ञानवृद्धस्य तव पाणाविवाहितम् ॥
yacca bhūtaṃ bhaviṣyaṃ ca bhavacca puruṣarṣabha | sarvaṃ tajjñānavṛddhasya tava pāṇāvivāhitam
जो कुछ बीत चुका, जो होने वाला है और जो हो रहा है, हे पुरुषश्रेष्ठ, वह सब ज्ञान में वृद्ध आपके लिए हथेली पर रखे के समान है।
श्लोक 19 (12.49.19)
संसारस्येह भूतानां धर्मस्य च फलोदयः । विदितस्ते महाप्राज्ञ त्वं हि धर्ममयो निधिः ॥
saṃsārasyeha bhūtānāṃ dharmasya ca phalodayaḥ | viditaste mahāprājña tvaṃ hi dharmamayo nidhiḥ
प्राणियों का संसार-चक्र और धर्म के फल का उदय, हे महाप्राज्ञ, आपको ज्ञात है; क्योंकि आप धर्म से ही बनी हुई निधि हैं।
श्लोक 20 (12.49.20)
त्वां हि राज्ये स्थितं स्फीते समग्राङ्गमरोगिणम् । स्त्रीसहस्रैः परिवृतं पश्यामीवोर्ध्वरेतसम् ॥
tvāṃ hi rājye sthitaṃ sphīte samagrāṅgamarogiṇam | strīsahasraiḥ parivṛtaṃ paśyāmīvordhvaretasam
मैं मानो आपको उसी रूप में देख रहा हूँ, जब आप समृद्ध राज्य में स्वस्थ और पूर्ण अंगों वाले थे और हजारों स्त्रियों से घिरे हुए भी ऊर्ध्वरेता, अखण्ड ब्रह्मचारी थे।
श्लोक 21 (12.49.21)
ऋते शान्तनवाद्भीष्मात्त्रिषु लोकेषु पार्थिवम् । सत्यधर्मान्महावीर्याच्छूराद्धर्मैकतत्परात् ॥
ṛte śāntanavādbhīṣmāttriṣu lokeṣu pārthivam | satyadharmānmahāvīryācchūrāddharmaikatatparāt
तीनों लोकों के राजाओं में शान्तनु-पुत्र भीष्म को छोड़कर, जो सत्य और धर्म में स्थित, महापराक्रमी, शूर और केवल धर्म में तत्पर हैं,
श्लोक 22 (12.49.22)
मृत्युमावार्य तपसा शरसंस्तरशायिनः । त्रिवर्गप्रभवं कंचिन्न च तातानुशुश्रुम ॥
mṛtyumāvārya tapasā śarasaṃstaraśāyinaḥ | trivargaprabhavaṃ kaṃcinna ca tātānuśuśruma
हे तात, हमने ऐसे किसी के विषय में नहीं सुना जिसने शरशय्या पर लेटे हुए तपस्या से मृत्यु को रोक रखा हो, न ही किसी और के विषय में जो त्रिवर्ग का उद्गम हो।
श्लोक 23 (12.49.23)
सत्ये तपसि दाने च यज्ञाधिकरणे तथा । धनुर्वेदे च वेदे च नित्यं चैवान्ववेक्षणे ॥
satye tapasi dāne ca yajñādhikaraṇe tathā | dhanurvede ca vede ca nityaṃ caivānvavekṣaṇe
सत्य में, तपस्या में, दान में, यज्ञ के अनुष्ठान में, धनुर्वेद और वेद में तथा निरन्तर सावधानी में—
श्लोक 24 (12.49.24)
अनृशंसं शुचिं दान्तं सर्वभूतहिते रतम् । महारथं त्वत्सदृशं न कंचिदनुशुश्रुम ॥
anṛśaṃsaṃ śuciṃ dāntaṃ sarvabhūtahite ratam | mahārathaṃ tvatsadṛśaṃ na kaṃcidanuśuśruma
हमने आपके समान कोई महारथी नहीं सुना, जो ऐसा दयालु, पवित्र, संयमी और सब प्राणियों के हित में लगा हो।
श्लोक 25 (12.49.25)
त्वं हि देवान्सगन्धर्वानसुरान्यक्षराक्षसान् । शक्तस्त्वेकरथेनैव विजेतुं नात्र संशयः ॥
tvaṃ hi devānsagandharvānasurānyakṣarākṣasān | śaktastvekarathenaiva vijetuṃ nātra saṃśayaḥ
आप अकेले एक ही रथ से देवताओं, गन्धर्वों, असुरों, यक्षों और राक्षसों को जीतने में समर्थ हैं; इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 26 (12.49.26)
स त्वं भीष्म महाबाहो वसूनां वासवोपमः । नित्यं विप्रैः समाख्यातो नवमोऽनवमो गुणैः ॥
sa tvaṃ bhīṣma mahābāho vasūnāṃ vāsavopamaḥ | nityaṃ vipraiḥ samākhyāto navamo'navamo guṇaiḥ
हे महाबाहु भीष्म, वसुओं में आप इन्द्र के समान हैं; ब्राह्मण सदा आपको नवाँ वसु कहते हैं, पर गुणों में आप किसी से कम नहीं।
श्लोक 27 (12.49.27)
अहं च त्वाऽभिजानामि स्वयं पुरुषसत्तम । त्रिदशेष्वपि विख्यातस्त्वं शक्त्या पुरुषोत्तमः ॥
ahaṃ ca tvā'bhijānāmi svayaṃ puruṣasattama | tridaśeṣvapi vikhyātastvaṃ śaktyā puruṣottamaḥ
हे पुरुषश्रेष्ठ, मैं स्वयं भी आपको जानता हूँ; आप देवताओं में भी प्रसिद्ध हैं और बल में पुरुषों में सर्वोत्तम हैं।
श्लोक 28 (12.49.28)
मनुष्येषु मनुष्येन्द्र न दृष्टो न च मे श्रुतः । भवतो हि गुणैस्तुल्यः पृथिव्यां पुरुषः क्वचित् ॥
manuṣyeṣu manuṣyendra na dṛṣṭo na ca me śrutaḥ | bhavato hi guṇaistulyaḥ pṛthivyāṃ puruṣaḥ kvacit
हे नरेन्द्र, मनुष्यों में पृथ्वी पर आपके गुणों के बराबर कोई पुरुष न मैंने कहीं देखा है, न सुना है।
श्लोक 29 (12.49.29)
त्वं हि सर्वगुणै राजन्देवानप्यतिरिच्यसे ॥
tvaṃ hi sarvaguṇai rājandevānapyatiricyase
हे राजन्, आप सब गुणों में देवताओं से भी बढ़कर हैं।
श्लोक 30 (12.49.30)
तपसा हि भवाञ्शक्तः स्रष्टुं लोकांश्चराचरान् । किंपुनश्चात्मनो लोकानुत्तमानुत्तमैर्गुणैः ॥
tapasā hi bhavāñśaktaḥ sraṣṭuṃ lokāṃścarācarān | kiṃpunaścātmano lokānuttamānuttamairguṇaiḥ
तप के बल से आप चर-अचर लोकों की सृष्टि करने में समर्थ हैं; फिर अपने लिए सर्वोत्तम लोकों की रचना तो, अपने उत्तम गुणों के कारण, और भी सहज है।
श्लोक 31 (12.49.31)
तदस्य तप्यमानस्य ज्ञातीनां संक्षयेन वै । ज्येष्ठस्य पाण्डुपुत्रस्य शोकं भीष्म व्यपानुद ॥
tadasya tapyamānasya jñātīnāṃ saṃkṣayena vai | jyeṣṭhasya pāṇḍuputrasya śokaṃ bhīṣma vyapānuda
इसलिए हे भीष्म, अपने बन्धुओं के विनाश से सन्तप्त पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र का शोक दूर कीजिए।
श्लोक 32 (12.49.32)
ये हि धर्माः समाख्याताश्चातुर्वर्ण्यस्य भारत । चातुराश्रम्यसंयुक्ताः सर्वे ते विदितास्तव ॥
ye hi dharmāḥ samākhyātāścāturvarṇyasya bhārata | cāturāśramyasaṃyuktāḥ sarve te viditāstava
हे भारत, चारों वर्णों के लिए जो धर्म कहे गए हैं, चारों आश्रमों से युक्त वे सब आपको ज्ञात हैं।
श्लोक 33 (12.49.33)
चातुर्विद्ये च ये प्रोक्ताश्चातुर्होत्रे च भारत । योगे साङ्ख्ये च नियता ये च धर्माः सनातनाः ॥
cāturvidye ca ye proktāścāturhotre ca bhārata | yoge sāṅkhye ca niyatā ye ca dharmāḥ sanātanāḥ
चारों वेदों में और चार होताओं के कर्म में जो धर्म कहे गए हैं, तथा योग और साङ्ख्य में जो सनातन धर्म निश्चित हैं, हे भारत—
श्लोक 34 (12.49.34)
चातुर्वर्ण्यस्य यश्चोक्तो धर्मो न स्म विरुध्यते । सेव्यमानः स चैवाद्यो गाङ्गेय विदितस्तव ॥
cāturvarṇyasya yaścokto dharmo na sma virudhyate | sevyamānaḥ sa caivādyo gāṅgeya viditastava
तथा चारों वर्णों के लिए कहा गया वह एक धर्म जो किसी से विरोध नहीं करता और जिसका पालन किया जाए तो वही आदि धर्म है—हे गाङ्गेय, वह भी आपको ज्ञात है।
श्लोक 35 (12.49.35)
प्रतिलोमप्रसूतानां म्लेच्छानां चैव यः स्मृतः । देशजातिकुलानां च जानीषे धर्मलक्षणम् ॥
pratilomaprasūtānāṃ mlecchānāṃ caiva yaḥ smṛtaḥ | deśajātikulānāṃ ca jānīṣe dharmalakṣaṇam
प्रतिलोम विवाहों से उत्पन्न लोगों और म्लेच्छों के लिए जो धर्म स्मरण किया गया है, तथा देश, जाति और कुल के धर्म के लक्षण—इन सबको आप जानते हैं।
श्लोक 36 (12.49.36)
वेदोक्तो यश्च शिष्टोक्तः सदैव विदितस्तव । प्रवृत्तश्च निवृत्तश्च स चापि विदितस्तव ॥
vedokto yaśca śiṣṭoktaḥ sadaiva viditastava | pravṛttaśca nivṛttaśca sa cāpi viditastava
जो वेद में कहा गया है और जो शिष्ट जनों ने कहा है, वह सदा आपको ज्ञात है; प्रवृत्ति और निवृत्ति का धर्म भी आपको विदित है।
श्लोक 37 (12.49.37)
इतिहासपुराणार्थाः कार्त्स्न्येन विदितास्तव । धर्मशास्त्रं च सकलं नित्यं मनसि ते स्थितम् ॥
itihāsapurāṇārthāḥ kārtsnyena viditāstava | dharmaśāstraṃ ca sakalaṃ nityaṃ manasi te sthitam
इतिहास और पुराणों के अर्थ आपको पूरी तरह ज्ञात हैं, और सम्पूर्ण धर्मशास्त्र सदा आपके मन में स्थित है।
श्लोक 38 (12.49.38)
ये च केचन लोकेऽस्मिन्नर्थाः संशयकारकाः । तेषां छेत्ता नास्ति लोके त्वदन्यः पुरुषर्षभः ॥
ye ca kecana loke'sminnarthāḥ saṃśayakārakāḥ | teṣāṃ chettā nāsti loke tvadanyaḥ puruṣarṣabhaḥ
इस लोक में जो भी विषय संशय उत्पन्न करने वाले हैं, उनका निवारण करने वाला आपके सिवा, हे पुरुषश्रेष्ठ, संसार में कोई नहीं है।
श्लोक 39 (12.49.39)
स पाण्डवेयस्य मनःसमुत्थितं । नरेन्द्र शोकं व्यपकर्ष मेधया । भवद्विधा ह्युत्तमबुद्धिर्विस्तरा । विमुह्यमानस्य जनस्य शान्तये ॥
sa pāṇḍaveyasya manaḥsamutthitaṃ | narendra śokaṃ vyapakarṣa medhayā | bhavadvidhā hyuttamabuddhirvistarā | vimuhyamānasya janasya śāntaye
इसलिए हे नरेन्द्र, अपनी बुद्धि से पाण्डुपुत्र के मन में उठे शोक को निकाल दीजिए; क्योंकि आप जैसे उत्तम बुद्धि और विस्तृत दृष्टि वाले लोग मोहग्रस्त मनुष्य को शान्ति देने के लिए ही होते हैं।