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शान्ति पर्व · अध्याय 50

भीष्म द्वारा कृष्ण की स्तुति; कृष्ण द्वारा शेष दिनों का कथन

कृष्ण की बात सुनकर भीष्म हाथ जोड़कर उन्हें लोकों का रचयिता और संहारक कहकर प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि वे उनका दिव्य, सर्वव्यापी रूप देख रहे हैं। कृष्ण उत्तर देते हैं कि यह रूप उन्होंने भीष्म की भक्ति के कारण दिखाया है; भीष्म के जीवन के छप्पन दिन शेष हैं, वसुगण सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में उन्हें लेने के लिए खड़े हैं, और सब लोग इसलिए आए हैं कि भीष्म युधिष्ठिर को धर्म का उपदेश देकर उनका शोक दूर करें।

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.50.1)

श्रुत्वा तु वचनं भीष्मो वासुदेवस्य धीमतः । किंचिदुन्नाम्य वदनं प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥

śrutvā tu vacanaṃ bhīṣmo vāsudevasya dhīmataḥ | kiṃcidunnāmya vadanaṃ prāñjalirvākyamabravīt

बुद्धिमान वासुदेव के वचन सुनकर भीष्म ने अपना मुख थोड़ा ऊपर उठाया और हाथ जोड़कर कहा।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.50.2)

नमस्ते भगवन्कृष्ण लोकानां प्रभवाप्यय । त्वं हि कर्ता हृषीकेश संहर्ता चापराजितः ॥

namaste bhagavankṛṣṇa lokānāṃ prabhavāpyaya | tvaṃ hi kartā hṛṣīkeśa saṃhartā cāparājitaḥ

हे भगवान् कृष्ण, लोकों की उत्पत्ति और लय के कारण, आपको नमस्कार! हे हृषीकेश, आप ही रचयिता हैं और आप ही अपराजित संहारक भी।

श्लोक 3 (12.50.3)

विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन्विश्वसंभव । अपवर्गस्थ भूतानां पञ्चानां परतः स्थित ॥

viśvakarmannamaste'stu viśvātmanviśvasaṃbhava | apavargastha bhūtānāṃ pañcānāṃ parataḥ sthita

हे विश्वकर्मा, आपको नमस्कार! हे विश्वात्मा, हे विश्व के उद्गम, आपको नमस्कार! हे अपवर्ग में स्थित, हे पाँच भूतों से परे स्थित, आपको नमस्कार!

श्लोक 4 (12.50.4)

नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस्त्रिषु । योगेश्वर नमस्तेऽस्तु त्वं हि सर्वपरायणः ॥

namaste triṣu lokeṣu namaste paratastriṣu | yogeśvara namaste'stu tvaṃ hi sarvaparāyaṇaḥ

तीनों लोकों में आपको नमस्कार, तीनों से परे भी आपको नमस्कार! हे योगेश्वर, आपको नमस्कार, क्योंकि आप ही सबके परम आश्रय हैं।

श्लोक 5 (12.50.5)

मत्संश्रितं यदात्थ त्वं वचः पुरुषसत्तम । तेन पश्यामि ते दिव्यान्भावांस्त्रिषु च वर्त्मसु ॥

matsaṃśritaṃ yadāttha tvaṃ vacaḥ puruṣasattama | tena paśyāmi te divyānbhāvāṃstriṣu ca vartmasu

हे पुरुषोत्तम, मेरे विषय में आपने जो वचन कहा, उसके द्वारा मैं तीनों मार्गों में आपके दिव्य भावों को देख रहा हूँ।

श्लोक 6 (12.50.6)

तच्च पश्यामि तत्वेन यत्ते रूपं सनातनम् । सप्त मार्गा निरुद्धास्ते वायोरमिततेजसः ॥

tacca paśyāmi tatvena yatte rūpaṃ sanātanam | sapta mārgā niruddhāste vāyoramitatejasaḥ

और मैं यथार्थ रूप में आपका वह सनातन रूप देख रहा हूँ, जिसने अपरिमित तेज वाले वायु के सातों मार्ग रोक रखे हैं।

श्लोक 7 (12.50.7)

दिवं ते शिरसा व्याप्तं पद्भ्यां देवी वसुंधरा । दिशो भुजा रविश्चक्षुर्वीर्ये शक्रः प्रतिष्ठितः ॥

divaṃ te śirasā vyāptaṃ padbhyāṃ devī vasuṃdharā | diśo bhujā raviścakṣurvīrye śakraḥ pratiṣṭhitaḥ

आपके मस्तक से स्वर्ग व्याप्त है और चरणों से देवी पृथ्वी; दिशाएँ आपकी भुजाएँ हैं, सूर्य आपका नेत्र है और आपके पराक्रम में इन्द्र प्रतिष्ठित है।

श्लोक 8 (12.50.8)

अतसीपुष्पसंकाशं पीतवाससमच्युतम् । वपुर्ह्यनुमिमीमस्ते मेघस्येव सविद्युतः ॥

atasīpuṣpasaṃkāśaṃ pītavāsasamacyutam | vapurhyanumimīmaste meghasyeva savidyutaḥ

हे अच्युत, आपका शरीर अलसी के फूल के रंग का और पीताम्बर से ढका है; हम उसे बिजली से युक्त मेघ के समान अनुभव करते हैं।

श्लोक 9 (12.50.9)

त्वां प्रपन्नाय भक्ताय गतिमिष्टां जिगीषवे । यच्छ्रेयः पुण्डरीकाक्ष तद्ध्यायस्व सुरोत्तम ॥

tvāṃ prapannāya bhaktāya gatimiṣṭāṃ jigīṣave | yacchreyaḥ puṇḍarīkākṣa taddhyāyasva surottama

आपकी शरण में आए हुए, आपके भक्त और अभीष्ट गति के इच्छुक मेरे लिए, हे कमलनयन, हे देवश्रेष्ठ, जो भी कल्याणकारी हो, उसका आप चिन्तन कीजिए।

वासुदेव उवाच

श्लोक 10 (12.50.10)

यतः खलु परा भक्तिर्मयि ते पुरुषर्षभ । ततो मया वपुर्दिव्यं तव राजन्प्रदर्शितम् ॥

yataḥ khalu parā bhaktirmayi te puruṣarṣabha | tato mayā vapurdivyaṃ tava rājanpradarśitam

हे पुरुषश्रेष्ठ, क्योंकि मुझमें आपकी परम भक्ति है, इसीलिए हे राजन्, मैंने आपको अपना दिव्य रूप दिखाया है।

श्लोक 11 (12.50.11)

न ह्यभक्ताय राजेन्द्र भक्तायानृजवे न च । दर्शयाम्यहमात्मानं न चादान्ताय भारत ॥

na hyabhaktāya rājendra bhaktāyānṛjave na ca | darśayāmyahamātmānaṃ na cādāntāya bhārata

हे राजेन्द्र, मैं भक्तिहीन को अपना स्वरूप नहीं दिखाता, न कुटिल भक्त को, और हे भारत, न असंयमी को।

श्लोक 12 (12.50.12)

भवांस्तु मम भक्तश्च नित्यं चार्जवमास्थितः । दमे तपसि सत्ये च दाने च निरतः शुचिः ॥

bhavāṃstu mama bhaktaśca nityaṃ cārjavamāsthitaḥ | dame tapasi satye ca dāne ca nirataḥ śuciḥ

पर आप मेरे भक्त हैं, सदा सरलता में स्थित हैं, और संयम, तप, सत्य तथा दान में लगे हुए शुद्ध पुरुष हैं।

श्लोक 13 (12.50.13)

अर्हस्त्वं भीष्म मां द्रष्टुं तपसा स्वेन पार्थिव । तव ह्युपस्थिता लोका येभ्यो नावर्तते पुनः ॥

arhastvaṃ bhīṣma māṃ draṣṭuṃ tapasā svena pārthiva | tava hyupasthitā lokā yebhyo nāvartate punaḥ

हे भीष्म, आप अपने तप से मुझे देखने के योग्य हैं; क्योंकि वे लोक आपके लिए प्रस्तुत हैं जहाँ से फिर लौटना नहीं होता।

श्लोक 14 (12.50.14)

पञ्चाशतं षट् च कुरुप्रवीर । शेषं दिनानां तव जीवितस्य । ततः शुभैः कर्मफलोदयैस्त्वं । समेष्यसे भीष्म विमुच्य देहम् ॥

pañcāśataṃ ṣaṭ ca kurupravīra | śeṣaṃ dinānāṃ tava jīvitasya | tataḥ śubhaiḥ karmaphalodayaistvaṃ | sameṣyase bhīṣma vimucya deham

हे कुरुवीरों में श्रेष्ठ, आपके जीवन के छप्पन दिन शेष हैं। उसके बाद हे भीष्म, देह छोड़कर आप अपने शुभ कर्मों के फलों के उदय से युक्त होंगे।

श्लोक 15 (12.50.15)

एते हि देवा वसवो विमाना । न्यास्थाय सर्वे ज्वलिताग्निकल्पाः । अन्तर्हितास्त्वां प्रतिपालयन्ति । काष्ठां प्रपद्यन्तमुदक्पतङ्गम् ॥

ete hi devā vasavo vimānā | nyāsthāya sarve jvalitāgnikalpāḥ | antarhitāstvāṃ pratipālayanti | kāṣṭhāṃ prapadyantamudakpataṅgam

अग्नि के समान जाज्वल्यमान ये सब वसु देवता अपने विमानों पर चढ़कर अदृश्य रूप से आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, कि सूर्य उत्तर दिशा में प्रवेश करे।

श्लोक 16 (12.50.16)

व्यावृत्तमात्रे भगवत्युदीचीं । सूर्ये जगत्कालवशं प्रपन्ने । गन्तासि लोकान्पुरुषप्रवीर । नावर्तते यानुपलभ्य विद्वान् ॥

vyāvṛttamātre bhagavatyudīcīṃ | sūrye jagatkālavaśaṃ prapanne | gantāsi lokānpuruṣapravīra | nāvartate yānupalabhya vidvān

जब भगवान् सूर्य जगत् को काल के वश में करते हुए उत्तर दिशा की ओर लौट आएँगे, तब हे पुरुषश्रेष्ठ, आप उन लोकों को जाएँगे जिन्हें पा लेने पर ज्ञानी फिर नहीं लौटता।

श्लोक 17 (12.50.17)

अमुं च लोकं त्वयि भीष्म याते । ज्ञानानि सर्वाणि पराभविष्यन् । अतस्तु सर्वे तव सन्निकर्षं । समागता धर्मविवेचनाय ॥

amuṃ ca lokaṃ tvayi bhīṣma yāte | jñānāni sarvāṇi parābhaviṣyan | atastu sarve tava sannikarṣaṃ | samāgatā dharmavivecanāya

और हे भीष्म, जब आप उस लोक को चले जाएँगे, तब सारा ज्ञान क्षीण हो जाएगा। इसीलिए हम सब धर्म का निर्णय करने के लिए आपके समीप आए हैं।

श्लोक 18 (12.50.18)

तज्ज्ञातिशोकोपहतश्रुताय । सत्याभिसन्धाय युधिष्ठिराय । प्रब्रूषि धर्मार्थसमाधियुक्तं । सत्यं वचोऽस्यापनुदेच्छुचं यत् ॥

tajjñātiśokopahataśrutāya | satyābhisandhāya yudhiṣṭhirāya | prabrūṣi dharmārthasamādhiyuktaṃ | satyaṃ vaco'syāpanudecchucaṃ yat

अपने बन्धुओं के शोक से जिसका शास्त्रज्ञान दब गया है, उस सत्य-प्रतिज्ञ युधिष्ठिर से आप धर्म और अर्थ के निश्चय से युक्त ऐसी सत्य बात कहेंगे जो उसके शोक को दूर कर दे।

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