शान्ति पर्व · अध्याय 51
कृष्ण द्वारा भीष्म को कष्ट-मुक्ति का वर; नगर को वापसी
घावों से व्यथित भीष्म कृष्ण से कहते हैं कि सब शास्त्रों के मूल उनके सामने वे बोल नहीं सकते। कृष्ण उन्हें वर देते हैं कि उन्हें पीड़ा, प्यास और थकान नहीं सताएगी, उनका ज्ञान स्पष्ट रहेगा, मन सत्त्व में स्थिर रहेगा और उन्हें दिव्य दृष्टि मिलेगी। ऋषि कृष्ण का सत्कार करते हैं, आकाश से फूल बरसते हैं, और सायंकाल सब लोग अगले दिन लौटने का वचन देकर भीष्म से विदा लेते हैं और नगर को लौट जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.51.1)
ततः कृष्णस्य तद्वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् । श्रुत्वा शान्तनवः कृष्णं प्रत्युवाच कृताञ्जलिः ॥
tataḥ kṛṣṇasya tadvākyaṃ dharmārthasahitaṃ hitam | śrutvā śāntanavaḥ kṛṣṇaṃ pratyuvāca kṛtāñjaliḥ
तब कृष्ण का वह धर्म और अर्थ से युक्त हितकारी वचन सुनकर शान्तनु-पुत्र ने हाथ जोड़कर कृष्ण को उत्तर दिया।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.51.2)
लोकनाथ महाबाहो शिव नारायणाच्युत । तव वाक्यमुपश्रुत्य हर्षेणास्मि परिप्लुतः ॥
lokanātha mahābāho śiva nārāyaṇācyuta | tava vākyamupaśrutya harṣeṇāsmi pariplutaḥ
हे लोकनाथ, हे महाबाहु, हे मंगलमय नारायण, हे अच्युत! आपके वचन सुनकर मैं हर्ष में डूब गया हूँ।
श्लोक 3 (12.51.3)
किंचाहमभिधास्यामि वाक्पते तव सन्निधौ । यदा वाचोगतं सर्वं तव वाचि समाहितम् ॥
kiṃcāhamabhidhāsyāmi vākpate tava sannidhau | yadā vācogataṃ sarvaṃ tava vāci samāhitam
हे वाणी के स्वामी, आपके सामने मैं क्या कहूँगा, जब वाणी की पहुँच में आने वाली सारी बात आपकी ही वाणी में समाई हुई है?
श्लोक 4 (12.51.4)
यच्च किंचित्कृतं लोके कर्तव्यं क्रियते च यत् । त्वत्तस्तन्निःसृतं देव लोके बुद्धिमतो हिते ॥
yacca kiṃcitkṛtaṃ loke kartavyaṃ kriyate ca yat | tvattastanniḥsṛtaṃ deva loke buddhimato hite
संसार में जो कुछ किया गया है, जो किया जाना है और जो किया जा रहा है, हे देव, वह सब आपसे ही निकला है, संसार के बुद्धिमानों के हित के लिए।
श्लोक 5 (12.51.5)
कथयेद्देवलोकं यो देवराजसमीपतः । धर्मकामार्थमोक्षाणां सोऽर्थं ब्रूयात्तवाग्रतः ॥
kathayeddevalokaṃ yo devarājasamīpataḥ | dharmakāmārthamokṣāṇāṃ so'rthaṃ brūyāttavāgrataḥ
जो देवराज के पास से देवलोक का वर्णन कर सके, वही आपके सामने धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष की बातें कह सकता है।
श्लोक 6 (12.51.6)
शराभितापाद्व्यथितं मनो मे मधुसूदन । गात्राणि चावसीदन्ति न च बुद्धिः प्रसीदति ॥
śarābhitāpādvyathitaṃ mano me madhusūdana | gātrāṇi cāvasīdanti na ca buddhiḥ prasīdati
हे मधुसूदन, बाणों के ताप से मेरा मन व्यथित है, मेरे अंग शिथिल होते जा रहे हैं और मेरी बुद्धि स्वच्छ नहीं हो रही।
श्लोक 7 (12.51.7)
न च मे प्रतिभा काचिदस्ति किंचित्प्रभाषितुम् । पीड्यमानस्य गोविन्द विषानलसमैः शरैः ॥
na ca me pratibhā kācidasti kiṃcitprabhāṣitum | pīḍyamānasya govinda viṣānalasamaiḥ śaraiḥ
विष की अग्नि के समान बाणों से पीड़ित मुझमें, हे गोविन्द, कुछ भी कहने की सूझ नहीं रही।
श्लोक 8 (12.51.8)
बलं मे प्रजहातीव प्राणाः सत्वरयन्ति च । मर्माणि परितप्यन्ति भ्रान्तचित्तस्तथा ह्यहम् ॥
balaṃ me prajahātīva prāṇāḥ satvarayanti ca | marmāṇi paritapyanti bhrāntacittastathā hyaham
मेरा बल मानो मुझे छोड़ रहा है, प्राण शीघ्रता कर रहे हैं, मर्मस्थल जल रहे हैं और मेरा चित्त भ्रमित है।
श्लोक 9 (12.51.9)
दौर्बल्यात्सज्जते वाङ्मे स कथं वक्तुमुत्सहे । साधु मे त्वं प्रसीदस्व दाशार्हकुलवर्धन ॥
daurbalyātsajjate vāṅme sa kathaṃ vaktumutsahe | sādhu me tvaṃ prasīdasva dāśārhakulavardhana
दुर्बलता से मेरी वाणी अटक रही है; मैं कैसे बोलने का साहस करूँ? हे दाशार्ह-कुल को बढ़ाने वाले, मुझ पर प्रसन्न हों।
श्लोक 10 (12.51.10)
तत्क्षमस्व महाबाहो न ब्रूयां किंचिदच्युत । त्वत्सन्निधौ च सीदेद्धि वाचस्पतिरपि ब्रुवन् ॥
tatkṣamasva mahābāho na brūyāṃ kiṃcidacyuta | tvatsannidhau ca sīdeddhi vācaspatirapi bruvan
इसलिए हे महाबाहु अच्युत, क्षमा कीजिए; मैं कुछ न बोलूँ। आपके सामने तो बृहस्पति भी बोलते हुए अटक जाएँ।
श्लोक 11 (12.51.11)
न दिशः संप्रजानामि नाकाशं न च मेदिनीम् । केवलं तव वीर्येण तिष्ठामि मधुसूदन ॥
na diśaḥ saṃprajānāmi nākāśaṃ na ca medinīm | kevalaṃ tava vīryeṇa tiṣṭhāmi madhusūdana
मैं न दिशाओं को पहचानता हूँ, न आकाश को, न पृथ्वी को; हे मधुसूदन, मैं केवल आपके बल से टिका हुआ हूँ।
श्लोक 12 (12.51.12)
स्वयमेव भवांस्तस्माद्धर्मराजस्य यद्धितम् । तद्ब्रवीत्वाशु सर्वेषामागमानां त्वमागमः ॥
svayameva bhavāṃstasmāddharmarājasya yaddhitam | tadbravītvāśu sarveṣāmāgamānāṃ tvamāgamaḥ
इसलिए आप स्वयं ही धर्मराज के लिए जो हितकर है, वह शीघ्र कहिए; क्योंकि आप सब शास्त्रों के मूल हैं।
श्लोक 13 (12.51.13)
कथं त्वयि स्थिते कृष्णे शाश्वते लोककर्तरि । प्रब्रूयान्मद्विधः कश्चिद्गुरौ शिष्य इव स्थिते ॥
kathaṃ tvayi sthite kṛṣṇe śāśvate lokakartari | prabrūyānmadvidhaḥ kaścidgurau śiṣya iva sthite
आप, शाश्वत लोक-रचयिता कृष्ण, के उपस्थित रहते मुझ जैसा कोई कैसे बोले, जैसे गुरु के रहते शिष्य?
वासुदेव उवाच
श्लोक 14 (12.51.14)
उपपन्नमिदं वाक्यं कौरवाणां धुरन्धरे । महावीर्ये महासत्वे स्थिरे सर्वार्थदर्शिनि ॥
upapannamidaṃ vākyaṃ kauravāṇāṃ dhurandhare | mahāvīrye mahāsatve sthire sarvārthadarśini
हे कौरवों में अग्रणी, ये वचन आपके योग्य हैं; आप महापराक्रमी, महान् सत्त्व वाले, स्थिर और सब अर्थों के द्रष्टा हैं।
श्लोक 15 (12.51.15)
यच्च मामात्थ गाङ्गेय बाणघातरुजं प्रति । गृहाणात्र वरं भीष्म मत्प्रसादकृतं प्रभो ॥
yacca māmāttha gāṅgeya bāṇaghātarujaṃ prati | gṛhāṇātra varaṃ bhīṣma matprasādakṛtaṃ prabho
और हे गाङ्गेय, बाणों की चोट की पीड़ा के विषय में आपने जो मुझसे कहा, उसके लिए हे भीष्म, हे प्रभो, मेरी कृपा से दिया हुआ यह वर ग्रहण कीजिए।
श्लोक 16 (12.51.16)
न ते ग्लानिर्न ते मूर्च्छा न तापो न च ते रुजा । प्रभविष्यन्ति गाङ्गेय क्षुत्पिपासे न चाप्युत ॥
na te glānirna te mūrcchā na tāpo na ca te rujā | prabhaviṣyanti gāṅgeya kṣutpipāse na cāpyuta
हे गाङ्गेय, आपको न थकान होगी, न मूर्छा, न जलन, न पीड़ा; भूख और प्यास भी आप पर प्रभाव नहीं डालेंगी।
श्लोक 17 (12.51.17)
ज्ञानानि च समग्राणि प्रतिभास्यन्ति तेऽनघ । न च ते क्वचिदासत्तिर्बुद्धेः प्रादुर्भविष्यति ॥
jñānāni ca samagrāṇi pratibhāsyanti te'nagha | na ca te kvacidāsattirbuddheḥ prādurbhaviṣyati
हे निष्पाप, सारा ज्ञान आपमें प्रकाशित होगा और आपकी बुद्धि कहीं भी रुकेगी या थकेगी नहीं।
श्लोक 18 (12.51.18)
सत्वस्थं च मनो नित्यं तव भीष्म भविष्यति । रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तं घनैर्मुक्त इवोडुराट् ॥
satvasthaṃ ca mano nityaṃ tava bhīṣma bhaviṣyati | rajastamobhyāṃ nirmuktaṃ ghanairmukta ivoḍurāṭ
हे भीष्म, आपका मन सदा सत्त्व में स्थित रहेगा, रजस और तमस से रहित, बादलों से मुक्त चन्द्रमा के समान।
श्लोक 19 (12.51.19)
यद्यच्च धर्मसंयुक्तमर्थयुक्तमथापि च । चिन्तयिष्यसि तत्राग्र्या बुद्धिस्तव भविष्यति ॥
yadyacca dharmasaṃyuktamarthayuktamathāpi ca | cintayiṣyasi tatrāgryā buddhistava bhaviṣyati
धर्म या अर्थ से युक्त जिस किसी विषय पर आप विचार करेंगे, उसमें आपकी बुद्धि सर्वोत्तम रहेगी।
श्लोक 20 (12.51.20)
इमं च राजशार्दूल भूतग्रामं चतुर्विधम् । चक्षुर्दिव्यं समाश्रित्य द्रक्ष्यस्यमितविक्रम ॥
imaṃ ca rājaśārdūla bhūtagrāmaṃ caturvidham | cakṣurdivyaṃ samāśritya drakṣyasyamitavikrama
हे राजाओं में सिंह, हे अमित पराक्रमी, दिव्य दृष्टि का आश्रय लेकर आप इस चार प्रकार के प्राणि-समूह को देखेंगे।
श्लोक 21 (12.51.21)
चतुर्विधं प्रजाजालं संयुक्तो ज्ञानचक्षुषा । भीष्म द्रक्ष्यसि तत्त्वेन जले मीन इवामले ॥
caturvidhaṃ prajājālaṃ saṃyukto jñānacakṣuṣā | bhīṣma drakṣyasi tattvena jale mīna ivāmale
ज्ञान-चक्षु से युक्त होकर, हे भीष्म, आप चार प्रकार के प्राणि-जाल को यथार्थ रूप में देखेंगे, जैसे स्वच्छ जल में मछली को।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (12.51.22)
ततस्ते व्याससहिताः सर्व एव महर्षयः । ऋग्यजुःसामसहितैर्वचोभिः कृष्णमार्चयन् ॥
tataste vyāsasahitāḥ sarva eva maharṣayaḥ | ṛgyajuḥsāmasahitairvacobhiḥ kṛṣṇamārcayan
तब व्यास सहित सब महर्षियों ने ऋक्, यजुः और साम से युक्त वचनों द्वारा कृष्ण का सत्कार किया।
श्लोक 23 (12.51.23)
ततः सर्वार्तवं दिव्यं पुष्पवर्षं नभस्तलात् । पपात यत्र वार्ष्णेयः सगाङ्गेयः सपाण्डवः ॥
tataḥ sarvārtavaṃ divyaṃ puṣpavarṣaṃ nabhastalāt | papāta yatra vārṣṇeyaḥ sagāṅgeyaḥ sapāṇḍavaḥ
तब आकाश से सब ऋतुओं के दिव्य फूलों की वर्षा उस स्थान पर हुई जहाँ वार्ष्णेय गाङ्गेय और पाण्डवों के साथ थे।
श्लोक 24 (12.51.24)
वादित्राणि च सर्वाणि जगुश्चाप्सरसां गणाः । न चाहितमनिष्टं च किंचित्तत्र व्यदृश्यत ॥
vāditrāṇi ca sarvāṇi jaguścāpsarasāṃ gaṇāḥ | na cāhitamaniṣṭaṃ ca kiṃcittatra vyadṛśyata
सब वाद्य बजे और अप्सराओं के समूह गाने लगे; वहाँ कुछ भी अनिष्ट या अमंगल दिखाई नहीं दिया।
श्लोक 25 (12.51.25)
ववौ शिवः सुखो वायुः सर्वगन्धवहः शुचिः । शान्तायां दिशि शान्ताश्च प्रावदन्मृगपक्षिणः ॥
vavau śivaḥ sukho vāyuḥ sarvagandhavahaḥ śuciḥ | śāntāyāṃ diśi śāntāśca prāvadanmṛgapakṣiṇaḥ
सब गन्धों को वहन करने वाली सुखद और शुद्ध मंगलमय वायु बहने लगी; दिशाएँ शान्त हो गईं और मृग तथा पक्षी शान्त भाव से बोलने लगे।
श्लोक 26 (12.51.26)
ततो मुहूर्ताद्भगवान्सहस्रांशुर्दिवाकरः । दहन्वनमिवैकान्ते प्रतीच्यां प्रत्यदृश्यत ॥
tato muhūrtādbhagavānsahasrāṃśurdivākaraḥ | dahanvanamivaikānte pratīcyāṃ pratyadṛśyata
फिर थोड़ी ही देर में पश्चिम में भगवान् सहस्रांशु दिवाकर, निर्जन वन को जलाते हुए अग्नि के समान, दिखाई दिए।
श्लोक 27 (12.51.27)
ततो महर्षयः सर्वे समुत्थाय जनार्दनम् । भीष्ममामन्त्रयांचक्रू राजानं च युधिष्ठिरम् ॥
tato maharṣayaḥ sarve samutthāya janārdanam | bhīṣmamāmantrayāṃcakrū rājānaṃ ca yudhiṣṭhiram
तब सब महर्षि उठे और उन्होंने जनार्दन, भीष्म तथा राजा युधिष्ठिर से विदा माँगी।
श्लोक 28 (12.51.28)
ततः प्रणाममकरोत्केशवः सहपाण्डवः । सात्यकिः सञ्जयश्चैव स च शारद्वतः कृपः ॥
tataḥ praṇāmamakarotkeśavaḥ sahapāṇḍavaḥ | sātyakiḥ sañjayaścaiva sa ca śāradvataḥ kṛpaḥ
तब केशव ने प्रणाम किया, और पाण्डवों ने, सात्यकि और सञ्जय ने तथा शरद्वान् के पुत्र कृप ने भी।
श्लोक 29 (12.51.29)
ततस्ते धर्मनिरताः सम्यक् तैरभिपूजिताः । श्वः समेष्याम इत्युक्त्वा यथेष्टं त्वरिता ययुः ॥
tataste dharmaniratāḥ samyak tairabhipūjitāḥ | śvaḥ sameṣyāma ityuktvā yatheṣṭaṃ tvaritā yayuḥ
तब धर्म में लगे उन लोगों ने, उनसे विधिवत् सम्मानित होकर, 'कल फिर मिलेंगे' कहा और अपनी इच्छा के अनुसार शीघ्र चले गए।
श्लोक 30 (12.51.30)
तथैवामन्त्र्य गाङ्गेयं केशवः पाण्डवास्तथा । प्रदक्षिणमुपावृत्य रथानारुरुहुः शुभान् ॥
tathaivāmantrya gāṅgeyaṃ keśavaḥ pāṇḍavāstathā | pradakṣiṇamupāvṛtya rathānāruruhuḥ śubhān
इसी प्रकार गाङ्गेय से विदा लेकर केशव और पाण्डवों ने उनकी प्रदक्षिणा की और अपने सुन्दर रथों पर चढ़ गए।
श्लोक 31 (12.51.31)
ततो रथैः काञ्चनचित्रकूबरै । र्महीधराभैः समदैश्च दन्तिभिः । हयैः सुपर्णैरिव चाशुगामिभिः । पदातिभिश्चात्तशरासनादिभिः ॥
tato rathaiḥ kāñcanacitrakūbarai | rmahīdharābhaiḥ samadaiśca dantibhiḥ | hayaiḥ suparṇairiva cāśugāmibhiḥ | padātibhiścāttaśarāsanādibhiḥ
तब सोने के विचित्र जुए वाले, पर्वत जैसे विशाल रथों, मदमस्त हाथियों, गरुड़ जैसे वेगवान घोड़ों और धनुष आदि शस्त्र धारण किए पैदल सैनिकों के साथ—
श्लोक 32 (12.51.32)
ययौ रथानां पुरतो हि सा चमू । स्तथैव पश्चादतिमात्रसारिणी । पुरश्च पश्चाच्च यथा महानदी । तमृक्षवन्तं गिरिमेत्य नर्मदा ॥
yayau rathānāṃ purato hi sā camū | stathaiva paścādatimātrasāriṇī | puraśca paścācca yathā mahānadī | tamṛkṣavantaṃ girimetya narmadā
वह सेना रथों के आगे चली और वैसे ही पीछे भी अत्यन्त वेग से बढ़ती रही; आगे और पीछे वह ऐसी लगती थी जैसे ऋक्षवान् पर्वत पर पहुँचकर बहने वाली महानदी नर्मदा।
श्लोक 33 (12.51.33)
ततः पुरस्ताद्भगवान्निशाकरः । समुत्थितस्तामभिहर्षयंश्चमूम् । दिवाकरापीतरसा महौषधीः । पुनः स्वकेनैव गुणेन योजयन् ॥
tataḥ purastādbhagavānniśākaraḥ | samutthitastāmabhiharṣayaṃścamūm | divākarāpītarasā mahauṣadhīḥ | punaḥ svakenaiva guṇena yojayan
तब आगे भगवान् चन्द्रमा उदित हुए; उन्होंने सेना को आनन्दित किया और दिवाकर द्वारा सोखे गए रस वाली महौषधियों को फिर अपने गुण से युक्त कर दिया।
श्लोक 34 (12.51.34)
ततः पुरं सुरपुरसंमितद्युति । प्रविश्य ते यदुवृषपाण्डवास्तदा । यथोचितान्भवनवरान्समाविशन् । श्रमान्विता मृगपतयो गुहा इव ॥
tataḥ puraṃ surapurasaṃmitadyuti | praviśya te yaduvṛṣapāṇḍavāstadā | yathocitānbhavanavarānsamāviśan | śramānvitā mṛgapatayo guhā iva
तब देवनगर के समान कान्ति वाले नगर में प्रवेश करके यदुओं और पाण्डवों के वे वीर श्रेष्ठ महलों में यथोचित रूप से चले गए, थके हुए सिंहों के गुफाओं में जाने के समान।