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शान्ति पर्व · अध्याय 52

कृष्ण का जागना; भीष्म के पास पुनः यात्रा

रात के अन्तिम प्रहर में कृष्ण जागते हैं, सनातन ब्रह्म का ध्यान करते हैं और सूत उनकी स्तुति करते हैं। प्रातःकर्म और दान के बाद वे सात्यकि को भेजते हैं कि युधिष्ठिर से पूछें कि वे भीष्म के दर्शन को तैयार हैं या नहीं। युधिष्ठिर कहते हैं कि केवल रथ जोता जाए और भीष्म को कष्ट न हो, इसलिए सेना साथ न चले। पाण्डव और कृष्ण कुरुक्षेत्र पहुँचते हैं, ऋषियों का सत्कार करते हैं, और युधिष्ठिर शरशय्या पर लेटे भीष्म को देखते हैं।

अध्याय 51अध्याय-सूचीअध्याय 53

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (12.52.1)

ततः प्रविश्य भवनं प्रसुप्तो मधुसूदनः । याममात्रावशेषायां यामिन्यां प्रत्यबुध्यत ॥

tataḥ praviśya bhavanaṃ prasupto madhusūdanaḥ | yāmamātrāvaśeṣāyāṃ yāminyāṃ pratyabudhyata

तब भवन में प्रवेश करके मधुसूदन सो गए, और जब रात्रि का केवल एक प्रहर शेष रहा तब वे जाग उठे।

श्लोक 2 (12.52.2)

स ध्यानपथमाविश्य सर्वज्ञानानि माधवः । अवलोक्य ततः पश्चाद्दध्यौ ब्रह्म सनातनम् ॥

sa dhyānapathamāviśya sarvajñānāni mādhavaḥ | avalokya tataḥ paścāddadhyau brahma sanātanam

माधव ने ध्यान-मार्ग का आश्रय लेकर सब ज्ञानों का अवलोकन किया और फिर सनातन ब्रह्म का ध्यान किया।

श्लोक 3 (12.52.3)

सूताः स्तुतिपुराणज्ञा रक्तकण्ठाः सुशिक्षिताः । अस्तुवन्विश्वकर्माणं वासुदेवं प्रजापतिम् ॥

sūtāḥ stutipurāṇajñā raktakaṇṭhāḥ suśikṣitāḥ | astuvanviśvakarmāṇaṃ vāsudevaṃ prajāpatim

स्तुति और पुराणों के ज्ञाता, लाल कण्ठ वाले, भली-भाँति शिक्षित सूतों ने विश्वकर्मा, प्रजापति वासुदेव की स्तुति की।

श्लोक 4 (12.52.4)

पठन्ति पाणिस्वनिकास्तथा गायन्ति गायनाः । शङ्खानथ मृदङ्गांश्च प्रवाद्यन्ति सहस्रशः ॥

paṭhanti pāṇisvanikāstathā gāyanti gāyanāḥ | śaṅkhānatha mṛdaṅgāṃśca pravādyanti sahasraśaḥ

ताली बजाकर पाठ करने वाले पाठ करने लगे, गायक गाने लगे, और हजारों शंख तथा मृदंग बजाए गए।

श्लोक 5 (12.52.5)

वीणापणववेणूनां स्वनश्चातिमनोरमः । सहास इव विस्तीर्णः शुश्रुवे तस्य वेश्मनि ॥

vīṇāpaṇavaveṇūnāṃ svanaścātimanoramaḥ | sahāsa iva vistīrṇaḥ śuśruve tasya veśmani

वीणा, पणव और बाँसुरियों की अत्यन्त मनोहर ध्वनि, मानो हँसती हुई दूर तक फैलकर, उनके भवन में सुनाई दी।

श्लोक 6 (12.52.6)

ततो युधिष्ठिरस्यापि राज्ञो मङ्गलसंहिताः । उच्चेरुर्मधुरा वाचो गीतवादित्रबृंहिताः ॥

tato yudhiṣṭhirasyāpi rājño maṅgalasaṃhitāḥ | uccerurmadhurā vāco gītavāditrabṛṃhitāḥ

तब राजा युधिष्ठिर के भवन में भी गीत और वाद्यों से बढ़ी हुई मंगलमय मधुर वाणियाँ गूँज उठीं।

श्लोक 7 (12.52.7)

तत उत्थाय दाशार्हः स्नातः प्राञ्जलिरच्युतः । जप्त्वा गुह्यं महाबाहुरग्नीनाश्रित्य तस्थिवान् ॥

tata utthāya dāśārhaḥ snātaḥ prāñjaliracyutaḥ | japtvā guhyaṃ mahābāhuragnīnāśritya tasthivān

तब दाशार्ह अच्युत उठे, स्नान किया, हाथ जोड़कर गुप्त जप किया और अग्नियों के समीप खड़े हुए।

श्लोक 8 (12.52.8)

ततः सहस्रं विप्राणां चतुर्वेदविदां तथा । गवां सहस्रेणैकैकं वाचयामास माधवः ॥

tataḥ sahasraṃ viprāṇāṃ caturvedavidāṃ tathā | gavāṃ sahasreṇaikaikaṃ vācayāmāsa mādhavaḥ

तब माधव ने चारों वेदों के ज्ञाता एक हजार ब्राह्मणों से मंगल-वाचन कराया और प्रत्येक को एक-एक हजार गायें दीं।

श्लोक 9 (12.52.9)

मङ्गलालम्भनं कृत्वा आत्मानमवलोक्य च । आदर्शे विमले कृष्णस्ततः सात्यकिमब्रवीत् ॥

maṅgalālambhanaṃ kṛtvā ātmānamavalokya ca | ādarśe vimale kṛṣṇastataḥ sātyakimabravīt

मंगल वस्तुओं का स्पर्श करके और स्वच्छ दर्पण में अपने को देखकर कृष्ण ने तब सात्यकि से कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 10 (12.52.10)

गच्छ शैनेय जानीहि गत्वा राजनिवेशनम् । अपि सज्जो महातेजा भीष्मं द्रष्टुं युधिष्ठिरः ॥

gaccha śaineya jānīhi gatvā rājaniveśanam | api sajjo mahātejā bhīṣmaṃ draṣṭuṃ yudhiṣṭhiraḥ

हे शैनेय, जाओ और राजा के निवास पर पहुँचकर पता लगाओ कि महातेजस्वी युधिष्ठिर भीष्म के दर्शन के लिए तैयार हैं या नहीं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (12.52.11)

ततः कृष्णस्य वचनात्सात्यंकिस्त्वरितो ययौ । उपगम्य च राजानं युधिष्ठिरमभाषत ॥

tataḥ kṛṣṇasya vacanātsātyaṃkistvarito yayau | upagamya ca rājānaṃ yudhiṣṭhiramabhāṣata

तब कृष्ण के कहने पर सात्यकि शीघ्र चल पड़े और राजा युधिष्ठिर के पास पहुँचकर बोले।

सात्यकिरुवाच

श्लोक 12 (12.52.12)

युक्तो रथवरो राजन्वासुदेवस्य धीमतः । समीपमापगेयस्य प्रयास्यति जनार्दनः ॥

yukto rathavaro rājanvāsudevasya dhīmataḥ | samīpamāpageyasya prayāsyati janārdanaḥ

बुद्धिमान वासुदेव का उत्तम रथ जुत गया है, हे राजन्; जनार्दन आपगेय (भीष्म) के समीप जाएँगे।

श्लोक 13 (12.52.13)

भवत्प्रतीक्षः कृष्णोऽसौ धर्मराज महाद्युते । यदत्रानन्तरं कृत्यं तद्भवान्कर्तुमर्हति ॥

bhavatpratīkṣaḥ kṛṣṇo'sau dharmarāja mahādyute | yadatrānantaraṃ kṛtyaṃ tadbhavānkartumarhati

हे महातेजस्वी धर्मराज, कृष्ण आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं; इसके बाद जो कार्य करना हो, उसे आप कीजिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (12.52.14)

एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । युज्यतां मे रथवरः फल्गुनाप्रतिमद्युते ॥

evamuktaḥ pratyuvāca dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | yujyatāṃ me rathavaraḥ phalgunāpratimadyute

ऐसा कहे जाने पर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने उत्तर दिया: 'हे अतुल तेज वाले फल्गुन, मेरा उत्तम रथ जोता जाए।'

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 15 (12.52.15)

न सैनिकैश्च यातव्यं यास्यामो वयमेव हि । न च पीडयितव्यो मे भीष्मो धर्मभृतां वरः ॥

na sainikaiśca yātavyaṃ yāsyāmo vayameva hi | na ca pīḍayitavyo me bhīṣmo dharmabhṛtāṃ varaḥ

'सैनिकों के साथ नहीं जाना है, हम स्वयं ही जाएँगे। और धर्म को धारण करने वालों में श्रेष्ठ भीष्म को मेरे कारण कोई कष्ट नहीं होना चाहिए।'

श्लोक 16 (12.52.16)

अतः पुरःसराश्चापि निवर्तन्तु धनञ्जय । अद्यप्रभृति गाङ्गेयः परं गुह्यं प्रवक्ष्यति । अतो नेच्छामि कौन्तेय पृथग्जनसमागमम् ॥

ataḥ puraḥsarāścāpi nivartantu dhanañjaya | adyaprabhṛti gāṅgeyaḥ paraṃ guhyaṃ pravakṣyati | ato necchāmi kaunteya pṛthagjanasamāgamam

'इसलिए हे धनञ्जय, आगे चलने वाले भी लौट जाएँ। आज से गाङ्गेय परम गुप्त बात कहेंगे, इसलिए हे कुन्तीपुत्र, मैं साधारण लोगों का जमावड़ा नहीं चाहता।'

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (12.52.17)

स तद्वाक्यमथाज्ञाय कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । युक्तं रथवरं तस्मा आचचक्षे नरर्षभः ॥

sa tadvākyamathājñāya kuntīputro dhanañjayaḥ | yuktaṃ rathavaraṃ tasmā ācacakṣe nararṣabhaḥ

उन वचनों को सुनकर कुन्तीपुत्र नरश्रेष्ठ धनञ्जय ने उन्हें बताया कि उत्तम रथ जोतकर तैयार है।

श्लोक 18 (12.52.18)

ततो युधिष्ठिरो राजा यमौ भीमार्जुनावपि । भूतानीव समस्तानि ययुः कृष्णनिवेशनम् ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā yamau bhīmārjunāvapi | bhūtānīva samastāni yayuḥ kṛṣṇaniveśanam

तब राजा युधिष्ठिर, दोनों जुड़वाँ भाई, भीम और अर्जुन—मानो सारे भूत एक साथ हों—कृष्ण के निवास की ओर गए।

श्लोक 19 (12.52.19)

आगच्छत्स्वथ कृष्णोऽपि पाण्डवेषु महात्मसु । शैनेयसहितो धीमान्रथमेवान्वपद्यत ॥

āgacchatsvatha kṛṣṇo'pi pāṇḍaveṣu mahātmasu | śaineyasahito dhīmānrathamevānvapadyata

जब महात्मा पाण्डव आ गए, तब बुद्धिमान कृष्ण भी शैनेय के साथ रथ पर चढ़ गए।

श्लोक 20 (12.52.20)

रथस्थाः संविदं कृत्वा सुखां पृष्ट्वा च शर्वरीम् । मेघघोषै रथवरैः प्रययुस्ते नरर्षभाः ॥

rathasthāḥ saṃvidaṃ kṛtvā sukhāṃ pṛṣṭvā ca śarvarīm | meghaghoṣai rathavaraiḥ prayayuste nararṣabhāḥ

रथों में बैठे उन महारथी पुरुषश्रेष्ठों ने एक-दूसरे का अभिवादन किया, रात सुखपूर्वक बीती या नहीं यह पूछा, और बादलों के समान गर्जना करने वाले श्रेष्ठ रथों पर चल पड़े।

श्लोक 21 (12.52.21)

बलाहकं मेघपुष्पं शैब्यं सुग्रीवमेव च । दारुकश्चोदयामास वासुदेवस्य वाजिनः ॥

balāhakaṃ meghapuṣpaṃ śaibyaṃ sugrīvameva ca | dārukaścodayāmāsa vāsudevasya vājinaḥ

दारुक ने वासुदेव के घोड़ों—बलाहक, मेघपुष्प, शैब्य और सुग्रीव—को हाँका।

श्लोक 22 (12.52.22)

ते हया वासुदेवस्य दारुकेण प्रचोदिताः । गां खुराग्रैस्तथा राजँल्लिखन्तः प्रययुस्तदा ॥

te hayā vāsudevasya dārukeṇa pracoditāḥ | gāṃ khurāgraistathā rājam̐llikhantaḥ prayayustadā

हे राजन्, दारुक के हाँकने पर वासुदेव के वे घोड़े अपनी खुरों की नोकों से भूमि को खरोंचते हुए दौड़ चले।

श्लोक 23 (12.52.23)

ते ग्रसन्त इवाकाशं वेगवन्तो महाबलाः । क्षेत्रं धर्मस्य कृत्स्नस्य कुरुक्षेत्रमवातरन् ॥

te grasanta ivākāśaṃ vegavanto mahābalāḥ | kṣetraṃ dharmasya kṛtsnasya kurukṣetramavātaran

वेगवान और महाबली वे मानो आकाश को निगलते हुए समस्त धर्म के क्षेत्र कुरुक्षेत्र में उतर आए।

श्लोक 24 (12.52.24)

ततो ययुर्यत्र भीष्मः शरतल्पगतः प्रभुः । आस्ते महर्षिभिः सार्धं ब्रह्मा देवगणैर्यथा ॥

tato yayuryatra bhīṣmaḥ śaratalpagataḥ prabhuḥ | āste maharṣibhiḥ sārdhaṃ brahmā devagaṇairyathā

तब वे वहाँ पहुँचे जहाँ प्रभु भीष्म शरशय्या पर लेटे थे और ब्रह्मर्षियों के साथ ऐसे विराजमान थे जैसे देवगणों के बीच ब्रह्मा।

श्लोक 25 (12.52.25)

ततोऽवतीर्य गोविन्दो रथात्स च युधिष्ठिरः । भीमो गाण्डीवधन्वा च यमौ सात्यकिरेव च । ऋषीनभ्यर्चयामासुः करानुद्यम्य दक्षिणान् ॥

tato'vatīrya govindo rathātsa ca yudhiṣṭhiraḥ | bhīmo gāṇḍīvadhanvā ca yamau sātyakireva ca | ṛṣīnabhyarcayāmāsuḥ karānudyamya dakṣiṇān

तब गोविन्द रथ से उतरे और युधिष्ठिर, भीम, गाण्डीवधारी अर्जुन, दोनों जुड़वाँ भाई और सात्यकि भी उतरे; और दाहिने हाथ उठाकर उन्होंने ऋषियों का अभिवादन किया।

श्लोक 26 (12.52.26)

स तैः परिवृतो राजा नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः । अभ्याजगाम गाङ्गेयं ब्रह्माणमिव वासवः ॥

sa taiḥ parivṛto rājā nakṣatrairiva candramāḥ | abhyājagāma gāṅgeyaṃ brahmāṇamiva vāsavaḥ

उनसे घिरे हुए राजा, तारों के बीच चन्द्रमा के समान, गाङ्गेय के पास पहुँचे, जैसे इन्द्र ब्रह्मा के पास।

श्लोक 27 (12.52.27)

शरतल्पे शयानं तमादित्यं पतितं यथा । स ददर्श महाबाहुं भयाच्चागतसाध्वसः ॥

śaratalpe śayānaṃ tamādityaṃ patitaṃ yathā | sa dadarśa mahābāhuṃ bhayāccāgatasādhvasaḥ

उन्होंने महाबाहु भीष्म को शरशय्या पर पड़े देखा, मानो आदित्य गिर पड़ा हो, और भय से वे काँप उठे।

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