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शान्ति पर्व · अध्याय 53

कृष्ण का भीष्म से धर्मोपदेश के लिए अनुरोध

जनमेजय पूछते हैं कि शरशय्या पर पड़े भीष्म के पास क्या वार्ता हुई। नारद पाण्डवों और बचे हुए राजाओं से कहते हैं कि भीष्म के प्राण त्यागने से पहले उनसे प्रश्न करो, और युधिष्ठिर के कहने पर कृष्ण उनके पास जाते हैं। भीष्म बताते हैं कि कृष्ण की कृपा से उनकी पीड़ा दूर हो गई है और समस्त धर्म उनके मन में स्पष्ट है, और पूछते हैं कि कृष्ण ने स्वयं क्यों नहीं कहा। कृष्ण उत्तर देते हैं कि वे भीष्म का यश बढ़ाना चाहते हैं, और उनसे प्रतीक्षा करते राजाओं को धर्म का उपदेश देने का आग्रह करते हैं।

अध्याय 52अध्याय-सूचीअध्याय 54

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (12.53.1)

धर्मात्मनि महावीर्ये सत्यसन्धे जितात्मनि । देवव्रते महाभागे शरतल्पगतेऽच्युते ॥

dharmātmani mahāvīrye satyasandhe jitātmani | devavrate mahābhāge śaratalpagate'cyute

जनमेजय ने कहा — धर्मात्मा, महापराक्रमी, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय, महाभाग्यशाली और अपने स्थान से कभी न डिगने वाले देवव्रत भीष्म शरशय्या पर पड़े हुए थे;

श्लोक 2 (12.53.2)

शयाने वीरशयने भीष्मे शन्तनुनन्दने । गाङ्गेये पुरुषव्याघ्रे पाण्डवैः पर्युपासिते ॥

śayāne vīraśayane bhīṣme śantanunandane | gāṅgeye puruṣavyāghre pāṇḍavaiḥ paryupāsite

शान्तनु के पुत्र गंगानन्दन पुरुषसिंह भीष्म वीरशय्या पर लेटे थे और पाण्डव उनकी सेवा में बैठे थे;

श्लोक 3 (12.53.3)

काः कथाः समवर्तन्त तस्मिन्वीरसमागमे । हतेषु सर्वसैन्येषु तन्मे शंस महामुने ॥

kāḥ kathāḥ samavartanta tasminvīrasamāgame | hateṣu sarvasainyeṣu tanme śaṃsa mahāmune

तब वीरों के उस समागम में, जब सारी सेनाएँ मारी जा चुकी थीं, कौन-सी कथाएँ हुईं? हे महामुनि, वह मुझे बताइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (12.53.4)

शरतल्पगते भीष्मे कौरवाणां पितामहे । आजग्मुर्ऋषयः सिद्धा नारदप्रमुखा नृप ॥

śaratalpagate bhīṣme kauravāṇāṃ pitāmahe | ājagmurṛṣayaḥ siddhā nāradapramukhā nṛpa

वैशम्पायन ने कहा — हे राजन्, जब कौरवों के पितामह भीष्म शरशय्या पर लेटे थे, तब नारद को आगे करके ऋषि और सिद्ध उनके पास आए।

श्लोक 5 (12.53.5)

हतशिष्टाश्च राजानो युधिष्ठिरपुरोगमाः । धृतराष्ट्रश्च कृष्णश्च भीमार्जुनयमास्तथा ॥

hataśiṣṭāśca rājāno yudhiṣṭhirapurogamāḥ | dhṛtarāṣṭraśca kṛṣṇaśca bhīmārjunayamāstathā

युद्ध में बचे हुए राजा भी आए, जिनमें युधिष्ठिर सबसे आगे थे; और धृतराष्ट्र, कृष्ण, भीम, अर्जुन तथा दोनों जुड़वाँ भाई भी आए।

श्लोक 6 (12.53.6)

तेऽभिगम्य महात्मानो भरतानां पितामहम् । अन्वशोचन्त गाङ्गेयमादित्यं पतितं यथा ॥

te'bhigamya mahātmāno bharatānāṃ pitāmaham | anvaśocanta gāṅgeyamādityaṃ patitaṃ yathā

उन महात्माओं ने भरतवंशियों के पितामह के पास जाकर आकाश से गिरे हुए सूर्य के समान पड़े गंगापुत्र के लिए शोक किया।

श्लोक 7 (12.53.7)

मुहूर्तमिव च ध्यात्वा नारदो देवदर्शनः । उवाच पाण्डवान्सर्वान्हतशिष्टांश्च पार्थिवान् ॥

muhūrtamiva ca dhyātvā nārado devadarśanaḥ | uvāca pāṇḍavānsarvānhataśiṣṭāṃśca pārthivān

क्षण भर विचार करके देवों के दर्शन करने वाले नारद ने सब पाण्डवों और बचे हुए राजाओं से कहा।

नारद उवाच

श्लोक 8 (12.53.8)

प्राप्तकालं समाचक्षे भीष्मोऽयमनुयुज्यताम् । अस्तमेति हि गाङ्गेयो भानुमानिव भारत ॥

prāptakālaṃ samācakṣe bhīṣmo'yamanuyujyatām | astameti hi gāṅgeyo bhānumāniva bhārata

नारद ने कहा — मैं कहता हूँ कि समय आ गया है; भीष्म से प्रश्न किए जाएँ। हे भारत, गंगापुत्र सूर्य की भाँति अस्त होने जा रहे हैं।

श्लोक 9 (12.53.9)

अयं प्राणानुत्सिसृक्षुस्तं सर्वेऽभ्यनुपृच्छत । कृत्स्नान्हि विविधान्धर्मांश्चातुर्वर्ण्यस्य वेत्त्ययम् ॥

ayaṃ prāṇānutsisṛkṣustaṃ sarve'bhyanupṛcchata | kṛtsnānhi vividhāndharmāṃścāturvarṇyasya vettyayam

ये प्राण छोड़ना चाहते हैं; तुम सब इनके पास जाकर पूछो। ये चारों वर्णों के सब प्रकार के धर्मों को पूरी तरह जानते हैं।

श्लोक 10 (12.53.10)

एष वृद्धः पराँल्लोकान्संप्राप्नोति तनुं त्यजन् । तं शीघ्रमनुयुञ्जीध्वं संशयान्मनसि स्थितान् ॥

eṣa vṛddhaḥ parām̐llokānsaṃprāpnoti tanuṃ tyajan | taṃ śīghramanuyuñjīdhvaṃ saṃśayānmanasi sthitān

ये वृद्ध पुरुष देह त्यागते ही परम लोकों को प्राप्त होंगे। तुम्हारे मन में जो संशय हैं, उन्हें लेकर शीघ्र इनसे प्रश्न करो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (12.53.11)

एवमुक्ते नारदेन भीष्ममीयुर्नराधिपाः । प्रष्टुं चाशक्रुवन्तस्ते वीक्षांचक्रुः परस्परम् ॥

evamukte nāradena bhīṣmamīyurnarādhipāḥ | praṣṭuṃ cāśakruvantaste vīkṣāṃcakruḥ parasparam

वैशम्पायन ने कहा — नारद के ऐसा कहने पर राजा लोग भीष्म के पास गए, पर प्रश्न करने का साहस न कर पाने से वे एक-दूसरे का मुँह देखते रहे।

श्लोक 12 (12.53.12)

अथोवाच हृषीकेशं पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः । नान्यस्त्वद्देवकीपुत्र शक्तः प्रष्टुं पितामहम् ॥

athovāca hṛṣīkeśaṃ pāṇḍuputro yudhiṣṭhiraḥ | nānyastvaddevakīputra śaktaḥ praṣṭuṃ pitāmaham

तब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने हृषीकेश से कहा — हे देवकीनन्दन, आपके सिवा और कोई पितामह से प्रश्न करने में समर्थ नहीं है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 13 (12.53.13)

प्रव्याहर यदुश्रेष्ठ त्वमग्रे मधुसूदन । त्वं हि नस्तात सर्वेषां सर्वधर्मविदुत्तमः ॥

pravyāhara yaduśreṣṭha tvamagre madhusūdana | tvaṃ hi nastāta sarveṣāṃ sarvadharmaviduttamaḥ

हे यदुश्रेष्ठ मधुसूदन, आप ही सबसे पहले बोलिए; क्योंकि हे तात, आप हम सबमें सब धर्मों को जानने वालों में श्रेष्ठ हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (12.53.14)

एवमुक्तः पाण्डवेन भगवान्केशवस्तदा । अभिगम्य दुराधर्षं प्रव्याहारयदच्युतः ॥

evamuktaḥ pāṇḍavena bhagavānkeśavastadā | abhigamya durādharṣaṃ pravyāhārayadacyutaḥ

पाण्डव के ऐसा कहने पर अविनाशी भगवान् केशव उन दुर्धर्ष भीष्म के पास गए और उनसे बोले।

वासुदेव उवाच

श्लोक 15 (12.53.15)

कच्चित्सुखेन रजनी व्युष्टा ते राजसत्तम । विस्पष्टलक्षणा बुद्धिः कच्चिच्चोपस्थिता तव ॥

kaccitsukhena rajanī vyuṣṭā te rājasattama | vispaṣṭalakṣaṇā buddhiḥ kacciccopasthitā tava

वासुदेव ने कहा — हे राजाओं में श्रेष्ठ, आपकी रात सुख से बीती न? और क्या आपकी बुद्धि स्पष्ट लक्षणों वाली होकर आपके पास उपस्थित है?

श्लोक 16 (12.53.16)

कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रतिभान्ति च तेऽनघ । न ग्लायते च हृदयं न च ते व्याकुलं मनः ॥

kaccijjñānāni sarvāṇi pratibhānti ca te'nagha | na glāyate ca hṛdayaṃ na ca te vyākulaṃ manaḥ

हे निष्पाप, क्या सब प्रकार के ज्ञान आपको सूझ रहे हैं? आपका हृदय थका तो नहीं, और मन व्याकुल तो नहीं?

भीष्म उवाच

श्लोक 17 (12.53.17)

दाहो मोहः श्रमश्चैव क्लमो ग्लानिस्तथा रुजा । तव प्रसादाद्वार्ष्णेय सद्यो व्यपगतानि मे ॥

dāho mohaḥ śramaścaiva klamo glānistathā rujā | tava prasādādvārṣṇeya sadyo vyapagatāni me

भीष्म ने कहा — हे वृष्णिवंशी, आपकी कृपा से दाह, मोह, थकान, क्लेश, ग्लानि और पीड़ा, सब एक साथ मुझसे दूर हो गए हैं।

श्लोक 18 (12.53.18)

यच्च भूतं भविष्यच्च भवच्च परमद्युते । तत्सर्वमनुपश्यामि पाणौ फलमिवाहितम् ॥

yacca bhūtaṃ bhaviṣyacca bhavacca paramadyute | tatsarvamanupaśyāmi pāṇau phalamivāhitam

हे परम तेजस्वी, जो बीत चुका, जो होने वाला है और जो हो रहा है, वह सब मैं हथेली पर रखे फल की तरह देख रहा हूँ।

श्लोक 19 (12.53.19)

वेदोक्ताश्चैव ये धर्मा वेदान्ताधिगताश्च ये । तान्सर्वान्संप्रपश्यामि वरदानात्तवाच्युत ॥

vedoktāścaiva ye dharmā vedāntādhigatāśca ye | tānsarvānsaṃprapaśyāmi varadānāttavācyuta

हे अच्युत, वेदों में कहे गए जो धर्म हैं और वेदान्त से जाने गए जो धर्म हैं, उन सबको मैं आपके वरदान से भली-भाँति देख रहा हूँ।

श्लोक 20 (12.53.20)

शिष्टैश्च धर्मो यः प्रोक्तः स च मे हृदि वर्तते । देशजातिकुलानां च धर्मज्ञोऽस्मि जनार्दन ॥

śiṣṭaiśca dharmo yaḥ proktaḥ sa ca me hṛdi vartate | deśajātikulānāṃ ca dharmajño'smi janārdana

शिष्ट जनों ने जो धर्म बताया है, वह मेरे हृदय में स्थित है; और हे जनार्दन, मैं देशों, जातियों और कुलों के धर्म को भी जानता हूँ।

श्लोक 21 (12.53.21)

चतुर्ष्वाश्रमधर्मेषु योऽर्थः स च हृदि स्थितः । राजधर्मांश्च सकलानवगच्छामि केशव ॥

caturṣvāśramadharmeṣu yo'rthaḥ sa ca hṛdi sthitaḥ | rājadharmāṃśca sakalānavagacchāmi keśava

चारों आश्रमों के धर्मों में जो अर्थ है, वह मेरे हृदय में स्थित है; और हे केशव, मैं राजाओं के सब धर्मों को भी समझता हूँ।

श्लोक 22 (12.53.22)

यच्च यत्र च वक्तव्यं तद्वक्ष्यामि जनार्दन । तव प्रसादाद्धि शुभा मनो मे बुद्धिराविशत् ॥

yacca yatra ca vaktavyaṃ tadvakṣyāmi janārdana | tava prasādāddhi śubhā mano me buddhirāviśat

हे जनार्दन, जहाँ जो कहना उचित है, वह मैं कहूँगा; आपकी कृपा से मेरे मन में शुभ बुद्धि प्रविष्ट हो गई है।

श्लोक 23 (12.53.23)

युवेवास्मि समावृत्तस्त्वदनुध्यानबृंहितः । वक्तुं श्रेयः समर्थोऽस्मि त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ॥

yuvevāsmi samāvṛttastvadanudhyānabṛṃhitaḥ | vaktuṃ śreyaḥ samartho'smi tvatprasādājjanārdana

आपके ध्यान से पुष्ट होकर मैं मानो फिर युवा हो गया हूँ; हे जनार्दन, आपकी कृपा से मैं कल्याणकारी बात कहने में समर्थ हूँ।

श्लोक 24 (12.53.24)

स्वयं किमर्थं तु भवाञ्श्रेयो न प्राह पाण्डवम् । किं ते विवक्षितं चात्र तदाशु वद माधव ॥

svayaṃ kimarthaṃ tu bhavāñśreyo na prāha pāṇḍavam | kiṃ te vivakṣitaṃ cātra tadāśu vada mādhava

पर आपने स्वयं ही पाण्डव को कल्याण की बात क्यों नहीं बताई? इस विषय में आप क्या कहना चाहते थे? हे माधव, शीघ्र बताइए।

वासुदेव उवाच

श्लोक 25 (12.53.25)

यशसः श्रेयसश्चैव मूलं मां विद्धि कौरव । मत्तः सर्वेऽभिनिर्वृत्ता भावाः सदसदात्मकाः ॥

yaśasaḥ śreyasaścaiva mūlaṃ māṃ viddhi kaurava | mattaḥ sarve'bhinirvṛttā bhāvāḥ sadasadātmakāḥ

वासुदेव ने कहा — हे कौरव, मुझे यश और कल्याण का मूल जानिए; सत् और असत् रूप सब भाव मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं।

श्लोक 26 (12.53.26)

शीतांशुश्चन्द्र इत्युक्ते लोके को विस्मयिष्यति । तथैव यशसा पूर्णे मयि को विस्मयिष्यति ॥

śītāṃśuścandra ityukte loke ko vismayiṣyati | tathaiva yaśasā pūrṇe mayi ko vismayiṣyati

चन्द्रमा को शीतल किरणों वाला कहने पर लोक में कौन चकित होता है? उसी प्रकार यश से परिपूर्ण मुझ पर कौन चकित होगा?

श्लोक 27 (12.53.27)

आधेयं तु मया भूयो यशस्तव महाद्युते । ततो मे विपुला बुद्धिस्त्वयि भीष्म समाहिता ॥

ādheyaṃ tu mayā bhūyo yaśastava mahādyute | tato me vipulā buddhistvayi bhīṣma samāhitā

हे महातेजस्वी, मैं आपके यश को और बढ़ाना चाहता हूँ; इसीलिए, हे भीष्म, मेरी विशाल बुद्धि आप पर टिकी है।

श्लोक 28 (12.53.28)

यावद्धि पृथिवीपाल पृथ्वीयं स्थास्यति ध्रुवा । तावत्तवाक्षया कीर्तिर्लोकाननुचरिष्यति ॥

yāvaddhi pṛthivīpāla pṛthvīyaṃ sthāsyati dhruvā | tāvattavākṣayā kīrtirlokānanucariṣyati

हे पृथ्वीपति, जब तक यह पृथ्वी स्थिर रहेगी, तब तक आपकी अक्षय कीर्ति लोकों में विचरती रहेगी।

श्लोक 29 (12.53.29)

यच्च त्वं वक्ष्यसे भीष्म पाण्डवायानुपृच्छते । वेदप्रवाद इव ते स्थास्यते वसुधातले ॥

yacca tvaṃ vakṣyase bhīṣma pāṇḍavāyānupṛcchate | vedapravāda iva te sthāsyate vasudhātale

और हे भीष्म, प्रश्न करने वाले पाण्डव से आप जो कहेंगे, वह वेदवाक्य के समान पृथ्वी पर बना रहेगा।

श्लोक 30 (12.53.30)

यश्चैतेन प्रमाणेन योक्ष्यत्यात्मानमात्मना । स फलं सर्वपुण्यानां प्रेत्य चानुभविष्यति ॥

yaścaitena pramāṇena yokṣyatyātmānamātmanā | sa phalaṃ sarvapuṇyānāṃ pretya cānubhaviṣyati

जो इस प्रमाण के अनुसार अपने आपको अपने द्वारा योग में लगाएगा, वह परलोक में सब पुण्यों का फल भोगेगा।

श्लोक 31 (12.53.31)

एतस्मात्कारणाद्भीष्म मतिर्दिव्या मया हि ते । दत्ता यशो विप्रथयेत्कथं भूयस्तवेति ह ॥

etasmātkāraṇādbhīṣma matirdivyā mayā hi te | dattā yaśo viprathayetkathaṃ bhūyastaveti ha

हे भीष्म, इसी कारण मैंने आपको दिव्य बुद्धि दी है, यह सोचकर कि आपका यश और कैसे फैले।

श्लोक 32 (12.53.32)

यावद्धि प्रथते लोके पुरुषस्य यशो भुवि । तावत्तस्याक्षया कीर्तिर्भवतीति विनिश्चिता ॥

yāvaddhi prathate loke puruṣasya yaśo bhuvi | tāvattasyākṣayā kīrtirbhavatīti viniścitā

यह निश्चित है कि पृथ्वी पर मनुष्य का यश जहाँ तक फैलता है, वहाँ तक उसकी कीर्ति अक्षय रहती है।

श्लोक 33 (12.53.33)

राजानो हतशिष्टास्त्वां राजन्नभित आसते । धर्माननुयुयुक्षन्तस्तेभ्यः प्रब्रूहि भारत ॥

rājāno hataśiṣṭāstvāṃ rājannabhita āsate | dharmānanuyuyukṣantastebhyaḥ prabrūhi bhārata

हे राजन्, ये बचे हुए राजा धर्म के विषय में पूछने की इच्छा से आपके चारों ओर बैठे हैं; हे भारत, इन्हें उपदेश दीजिए।

श्लोक 34 (12.53.34)

भवान्हि वयसा वृद्धः श्रुताचारसमन्वितः । कुशलो राजधर्माणां सर्वेषामपराश्च ये ॥

bhavānhi vayasā vṛddhaḥ śrutācārasamanvitaḥ | kuśalo rājadharmāṇāṃ sarveṣāmaparāśca ye

आप अवस्था में वृद्ध हैं, शास्त्रज्ञान और सदाचार से सम्पन्न हैं, और सब राजधर्मों तथा अन्य धर्मों में भी कुशल हैं।

श्लोक 35 (12.53.35)

जन्मप्रभृति ते किंचिद्वृजिनं न ददर्श ह । ज्ञातारं सर्वधर्माणां त्वां विदुः सर्वपार्थिवाः ॥

janmaprabhṛti te kiṃcidvṛjinaṃ na dadarśa ha | jñātāraṃ sarvadharmāṇāṃ tvāṃ viduḥ sarvapārthivāḥ

जन्म से लेकर आज तक किसी ने आपमें कोई दोष नहीं देखा; सब राजा आपको सब धर्मों का ज्ञाता मानते हैं।

श्लोक 36 (12.53.36)

तेभ्यः पितेव पुत्रेभ्यो राजन्ब्रूहि परं नयम् । ऋषयश्चैव देवाश्च त्वया नित्यमुपासिताः ॥

tebhyaḥ piteva putrebhyo rājanbrūhi paraṃ nayam | ṛṣayaścaiva devāśca tvayā nityamupāsitāḥ

हे राजन्, जैसे पिता पुत्रों को सिखाता है, वैसे ही इन्हें परम नीति का उपदेश दीजिए; आपने ऋषियों और देवताओं की सदा सेवा की है।

श्लोक 37 (12.53.37)

तस्माद्वक्तव्यमेवेदं त्वयाऽवश्यमशेषतः । धर्मं शुश्रूषमाणेभ्यः पृष्टेन न सता पुनः ॥

tasmādvaktavyamevedaṃ tvayā'vaśyamaśeṣataḥ | dharmaṃ śuśrūṣamāṇebhyaḥ pṛṣṭena na satā punaḥ

इसलिए धर्म सुनने के इच्छुक इन लोगों को आपको यह सब निश्चय ही पूरा-पूरा बताना चाहिए; क्योंकि पूछे जाने पर सज्जन को चुप नहीं रहना चाहिए।

श्लोक 38 (12.53.38)

वक्तव्यं विदुषा चेति धर्ममाहुर्मनीषिणः । अप्रतिब्रुवतः कष्टो दोषो हि भविता प्रभो ॥

vaktavyaṃ viduṣā ceti dharmamāhurmanīṣiṇaḥ | apratibruvataḥ kaṣṭo doṣo hi bhavitā prabho

मनीषी कहते हैं कि विद्वान् को पूछे जाने पर बोलना चाहिए; हे प्रभो, उत्तर न देने वाले को भारी दोष लगता है।

श्लोक 39 (12.53.39)

तस्मात्पुत्रैश्च पौत्रैश्च धर्मान्पृष्टान्सनातनान् । विद्वञ्जिज्ञासमानेभ्यः प्रब्रूहि भरतर्षभ ॥

tasmātputraiśca pautraiśca dharmānpṛṣṭānsanātanān | vidvañjijñāsamānebhyaḥ prabrūhi bharatarṣabha

इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, आप विद्वान् हैं; जानने की इच्छा से पूछते हुए अपने इन पुत्रों और पौत्रों को सनातन धर्मों का उपदेश दीजिए।

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