शान्ति पर्व · अध्याय 54
भीष्म का युधिष्ठिर को प्रश्न करने के लिए बुलाना
भीष्म धर्म पर बोलने को तैयार होते हैं और चाहते हैं कि युधिष्ठिर ही उनसे प्रश्न करें, जिनके गुण वे गिनाते हैं। कृष्ण बताते हैं कि युद्ध में बन्धु-बान्धवों और गुरुजनों का वध करने के कारण युधिष्ठिर लज्जा और निन्दा के भय से उनके पास नहीं आ रहे। भीष्म उत्तर देते हैं कि क्षत्रिय के लिए युद्ध में मारना धर्म है; तब युधिष्ठिर आगे आकर उनके चरण पकड़ते हैं, और भीष्म उन्हें बैठने तथा निर्भय होकर पूछने को कहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (12.54.1)
अथाब्रवीन्महातेजा वाक्यं कौरवनन्दनः । हन्त धर्मान्प्रवक्ष्यामि दृढे वाङ्मनसी मम ॥
athābravīnmahātejā vākyaṃ kauravanandanaḥ | hanta dharmānpravakṣyāmi dṛḍhe vāṅmanasī mama
वैशम्पायन ने कहा — तब महातेजस्वी कुरुनन्दन भीष्म बोले — अब मैं धर्मों का वर्णन करूँगा; मेरी वाणी और मेरा मन दृढ़ हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.54.2)
तव प्रसादाद्गोविन्द भूतात्मा ह्यसि शाश्वतः । युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा मां धर्माननुपृच्छतु । एवं प्रीतो भविष्यामि धर्मान्वक्ष्यामि चाखिलान् ॥
tava prasādādgovinda bhūtātmā hyasi śāśvataḥ | yudhiṣṭhirastu dharmātmā māṃ dharmānanupṛcchatu | evaṃ prīto bhaviṣyāmi dharmānvakṣyāmi cākhilān
हे गोविन्द, आपकी कृपा से, क्योंकि आप सब प्राणियों के सनातन आत्मा हैं — धर्मात्मा युधिष्ठिर ही मुझसे धर्मों के विषय में पूछें। इससे मैं प्रसन्न होऊँगा और सब धर्मों का वर्णन करूँगा।
श्लोक 3 (12.54.3)
यस्मिन्राजर्षभे जाते धर्मात्मनि महात्मनि । अहृष्यन्नृषयः सर्वे स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥
yasminrājarṣabhe jāte dharmātmani mahātmani | ahṛṣyannṛṣayaḥ sarve sa māṃ pṛcchatu pāṇḍavaḥ
जिस धर्मात्मा महात्मा राजर्षिश्रेष्ठ के जन्म पर सब ऋषि हर्षित हुए थे, वही पाण्डव मुझसे पूछे।
श्लोक 4 (12.54.4)
सर्वेषां दीप्तयशसां कुरूणां धर्मचारिणाम् । यस्य नास्ति समः कश्चित्स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥
sarveṣāṃ dīptayaśasāṃ kurūṇāṃ dharmacāriṇām | yasya nāsti samaḥ kaścitsa māṃ pṛcchatu pāṇḍavaḥ
यशस्वी और धर्मपरायण सब कुरुवंशियों में जिसकी बराबरी का कोई नहीं, वही पाण्डव मुझसे पूछे।
श्लोक 5 (12.54.5)
धृतिर्दमो ब्रह्मचर्यं क्षमा धर्मश्च नित्यदा । यस्मिन्नोजश्च तेजश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥
dhṛtirdamo brahmacaryaṃ kṣamā dharmaśca nityadā | yasminnojaśca tejaśca sa māṃ pṛcchatu pāṇḍavaḥ
धैर्य, संयम, ब्रह्मचर्य, क्षमा और धर्म जिसमें सदा रहते हैं, और ओज तथा तेज भी जिसमें विद्यमान हैं, वही पाण्डव मुझसे पूछे।
श्लोक 6 (12.54.6)
संबन्धिनोऽतिथीन्भृत्यान्संश्रितांश्चैव यो भृशम् । संमानयति सत्कृत्य स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥
saṃbandhino'tithīnbhṛtyānsaṃśritāṃścaiva yo bhṛśam | saṃmānayati satkṛtya sa māṃ pṛcchatu pāṇḍavaḥ
जो अपने सम्बन्धियों, अतिथियों, सेवकों और आश्रितों का आदर-सत्कार के साथ बड़े सम्मान से पालन करता है, वही पाण्डव मुझसे पूछे।
श्लोक 7 (12.54.7)
सत्यं दानं तपः शौर्यं शान्तिर्दाक्ष्यमसंभ्रमः । यस्मिन्नेतानि सर्वाणि स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥
satyaṃ dānaṃ tapaḥ śauryaṃ śāntirdākṣyamasaṃbhramaḥ | yasminnetāni sarvāṇi sa māṃ pṛcchatu pāṇḍavaḥ
सत्य, दान, तप, शौर्य, शान्ति, दक्षता और निश्चिन्तता — ये सब जिसमें हैं, वही पाण्डव मुझसे पूछे।
श्लोक 8 (12.54.8)
यो न कामान्न संरम्भान्न भयान्नार्थकारणात् । कुर्यादधर्मं धर्मात्मा स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥
yo na kāmānna saṃrambhānna bhayānnārthakāraṇāt | kuryādadharmaṃ dharmātmā sa māṃ pṛcchatu pāṇḍavaḥ
जो धर्मात्मा न काम से, न क्रोध से, न भय से और न धन के लोभ से अधर्म करेगा, वही पाण्डव मुझसे पूछे।
श्लोक 9 (12.54.9)
सत्यनित्यः क्षमानित्यो ज्ञाननित्योऽतिथिप्रियः । यो ददाति सतां नित्यं स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥
satyanityaḥ kṣamānityo jñānanityo'tithipriyaḥ | yo dadāti satāṃ nityaṃ sa māṃ pṛcchatu pāṇḍavaḥ
जो सदा सत्यनिष्ठ, सदा क्षमाशील, सदा ज्ञान में लगा रहने वाला और अतिथिप्रिय है, जो सज्जनों को सदा दान देता है, वही पाण्डव मुझसे पूछे।
श्लोक 10 (12.54.10)
इज्याध्ययननित्यश्च धर्मे च निरतः सदा । क्षान्तः श्रुतरहस्यश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥
ijyādhyayananityaśca dharme ca nirataḥ sadā | kṣāntaḥ śrutarahasyaśca sa māṃ pṛcchatu pāṇḍavaḥ
जो यज्ञ और अध्ययन में सदा लगा रहता है, सदा धर्म में रत है, सहनशील है और शास्त्रों के रहस्यों को जानता है, वही पाण्डव मुझसे पूछे।
वासुदेव उवाच
श्लोक 11 (12.54.11)
लज्जया परयोपेतो धर्मराजो युधिष्ठिरः । अभिशापभयाद्भीतो भवन्तं नोपसर्पति ॥
lajjayā parayopeto dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | abhiśāpabhayādbhīto bhavantaṃ nopasarpati
वासुदेव ने कहा — धर्मराज युधिष्ठिर बड़ी लज्जा से भरे हैं; निन्दा के भय से डरकर वे आपके पास नहीं आ रहे।
श्लोक 12 (12.54.12)
लोकस्य कदनं कृत्वा लोकनाथो विशांपते । अभिशापभयाद्भीतो भवन्तं नोपसर्पति ॥
lokasya kadanaṃ kṛtvā lokanātho viśāṃpate | abhiśāpabhayādbhīto bhavantaṃ nopasarpati
हे राजन्, लोक का संहार करके, लोकनाथ होते हुए भी वे निन्दा के भय से डरकर आपके पास नहीं आ रहे।
श्लोक 13 (12.54.13)
पूज्यान्मान्यांश्च भक्तांश्च गुरून्संबन्धिबान्धवान् । अर्घार्हानिषुभिर्भित्त्वा भवन्तं नोपसर्पति ॥
pūjyānmānyāṃśca bhaktāṃśca gurūnsaṃbandhibāndhavān | arghārhāniṣubhirbhittvā bhavantaṃ nopasarpati
पूज्य, माननीय, भक्त, गुरुजन, सम्बन्धी और बान्धव, जो अर्घ्य देकर सत्कार करने योग्य थे, उन्हें बाणों से बींधकर वे आपके पास नहीं आ रहे।
भीष्म उवाच
श्लोक 14 (12.54.14)
ब्राह्मणानां यथा धर्मो दानमध्ययनं तपः । क्षत्रियाणां तथा कृष्ण समरे देहपातनम् ॥
brāhmaṇānāṃ yathā dharmo dānamadhyayanaṃ tapaḥ | kṣatriyāṇāṃ tathā kṛṣṇa samare dehapātanam
भीष्म ने कहा — हे कृष्ण, जैसे ब्राह्मणों का धर्म दान, अध्ययन और तप है, वैसे ही क्षत्रियों का धर्म युद्ध में देह त्याग करना है।
श्लोक 15 (12.54.15)
पितॄन्पितामहान्भ्रातॄन्गुरून्संबन्धिबान्धवान् । मिथ्याप्रवृत्तान्यः सख्ये निहन्याद्धर्म एव सः ॥
pitṝnpitāmahānbhrātṝngurūnsaṃbandhibāndhavān | mithyāpravṛttānyaḥ sakhye nihanyāddharma eva saḥ
पिता, पितामह, भाई, गुरु, सम्बन्धी और बान्धव — यदि ये मिथ्या मार्ग पर चलें, तो युद्ध में इन्हें मारना धर्म ही है।
श्लोक 16 (12.54.16)
समयत्यागिनो लुब्धान्गुरूनपि च केशव । निहन्ति समरे पापान्क्षत्रियो यः स धर्मवित् ॥
samayatyāgino lubdhāngurūnapi ca keśava | nihanti samare pāpānkṣatriyo yaḥ sa dharmavit
हे केशव, जो क्षत्रिय युद्ध में प्रतिज्ञा तोड़ने वाले, लोभी और पापी लोगों को, गुरुजनों को भी, मार डालता है, वह धर्म को जानने वाला है।
श्लोक 17 (12.54.17)
यो लोभान्न समीक्षेत धर्मसेतुं सनातनम् । निहन्ति यस्तं समरे क्षत्रियो वै स धर्मवित् ॥
yo lobhānna samīkṣeta dharmasetuṃ sanātanam | nihanti yastaṃ samare kṣatriyo vai sa dharmavit
जो लोभ के कारण सनातन धर्म-सेतु का आदर नहीं करता, उसे जो क्षत्रिय युद्ध में मारता है, वही सचमुच धर्म को जानने वाला है।
श्लोक 18 (12.54.18)
लोहितोदां केशतृणां गजशैलां ध्वजद्रुमाम् । महीं करोति युद्धेषु क्षत्रियो यः स धर्मवित् ॥
lohitodāṃ keśatṛṇāṃ gajaśailāṃ dhvajadrumām | mahīṃ karoti yuddheṣu kṣatriyo yaḥ sa dharmavit
जो क्षत्रिय युद्धों में पृथ्वी को ऐसी बना देता है कि जिसका जल रक्त है, तृण केश हैं, पर्वत हाथी हैं और वृक्ष ध्वज हैं, वह धर्म को जानने वाला है।
श्लोक 19 (12.54.19)
आहूतेन रणे नित्यं योद्धव्यं क्षत्रबन्धुना । धर्म्यं स्वर्ग्यं च लोक्यं च युद्धं हि मनुरब्रवीत् ॥
āhūtena raṇe nityaṃ yoddhavyaṃ kṣatrabandhunā | dharmyaṃ svargyaṃ ca lokyaṃ ca yuddhaṃ hi manurabravīt
बुलाए जाने पर क्षत्रिय को युद्ध में सदा लड़ना चाहिए; मनु ने युद्ध को धर्मयुक्त, स्वर्ग देने वाला और लोकों को जिताने वाला कहा है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (12.54.20)
एवमुक्तस्तु भीष्मेण धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । विनीतवदुपागम्य तस्थौ संदर्शनेऽग्रतः ॥
evamuktastu bhīṣmeṇa dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | vinītavadupāgamya tasthau saṃdarśane'grataḥ
वैशम्पायन ने कहा — भीष्म के ऐसा कहने पर धर्मपुत्र युधिष्ठिर विनीत भाव से पास जाकर उनके सामने, उनकी दृष्टि के भीतर खड़े हो गए।
श्लोक 21 (12.54.21)
अथास्य पादौ जग्राह भीष्मश्चापि ननन्द तम् । मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय निषीदेत्यब्रवीत्तदा ॥
athāsya pādau jagrāha bhīṣmaścāpi nananda tam | mūrdhni cainamupāghrāya niṣīdetyabravīttadā
तब उन्होंने भीष्म के चरण पकड़े और भीष्म को भी हर्ष हुआ; उनका मस्तक सूँघकर उन्होंने उस समय कहा — बैठो।
श्लोक 22 (12.54.22)
तमुवाचाथ गाङ्गेयो वृषभः सर्वधन्विनाम् । मां पृच्छ तात विस्रब्धं मा भैस्त्वं कुरुसत्तम ॥
tamuvācātha gāṅgeyo vṛṣabhaḥ sarvadhanvinām | māṃ pṛccha tāta visrabdhaṃ mā bhaistvaṃ kurusattama
तब सब धनुर्धरों में श्रेष्ठ गंगानन्दन ने उनसे कहा — हे तात, मुझसे निःशंक होकर पूछो; हे कुरुश्रेष्ठ, डरो मत।