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शान्ति पर्व · अध्याय 74

मुचुकुन्द और कुबेर: ब्रह्मबल और क्षत्रबल

युधिष्ठिर भीष्म से ब्राह्मण-बल और क्षत्रिय-बल का निर्णय सुनना चाहते हैं। भीष्म बताते हैं कि राष्ट्र का कल्याण राजा पर और राजा का पुरोहित पर टिका है, और राजा मुचुकुन्द तथा कुबेर का प्राचीन आख्यान सुनाते हैं। पृथ्वी जीतने के बाद मुचुकुन्द ने कुबेर के बल की परीक्षा लेनी चाही; कुबेर के राक्षसों ने उसकी सेना रौंद डाली, तब पुरोहित वसिष्ठ ने तप से उन्हें नष्ट किया। ब्राह्मण के बल पर चलने का उलाहना देने पर मुचुकुन्द ने उत्तर दिया कि दोनों बल एक ही मूल से उपजे हैं और मिलकर लोक की रक्षा करें, और कुबेर के दिए राज्य को ठुकरा दिया, क्योंकि वह केवल अपनी भुजाओं से जीता हुआ राज्य भोगना चाहता था।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.74.1)

ब्रह्मक्षत्रस्य सामर्थ्यं कथितं ते पितामह । पुरोहितप्रभावश्च लक्षणं च पुरोधसः ॥

brahmakṣatrasya sāmarthyaṃ kathitaṃ te pitāmaha | purohitaprabhāvaśca lakṣaṇaṃ ca purodhasaḥ

पितामह, आपने मुझे ब्राह्मण और क्षत्रिय की सामर्थ्य बताई, पुरोहित का प्रभाव बताया और पुरोहित के लक्षण भी बताए।

श्लोक 2 (12.74.2)

इदानीं श्रोतुमिच्छामि ब्रह्मक्षत्रविनिर्णयम् । ब्रह्मक्षत्रं हि सर्वस्य कारणं जगतः परम् । योगक्षेमो हि राष्ट्रस्य ताभ्यामायत्त एव च ॥

idānīṃ śrotumicchāmi brahmakṣatravinirṇayam | brahmakṣatraṃ hi sarvasya kāraṇaṃ jagataḥ param | yogakṣemo hi rāṣṭrasya tābhyāmāyatta eva ca

अब मैं ब्राह्मण-बल और क्षत्रिय-बल का निर्णय सुनना चाहता हूँ। ब्राह्मण और क्षत्रिय ही सारे जगत् के परम कारण हैं, और राष्ट्र का योगक्षेम, अर्थात् अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा, उन्हीं दोनों पर टिका है।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (12.74.3)

योगक्षेमो हि राष्ट्रस्य राजन्यायत्त उच्यते । योगक्षेमो हि राज्ञो हि समायत्तः पुरोहिते ॥

yogakṣemo hi rāṣṭrasya rājanyāyatta ucyate | yogakṣemo hi rājño hi samāyattaḥ purohite

कहा जाता है कि राष्ट्र का योगक्षेम राजा पर टिका है, और राजा का योगक्षेम पुरोहित पर निर्भर है।

श्लोक 4 (12.74.4)

यत्रादृष्टं भयं ब्रह्म प्रजानां शमयत्युत । दृष्टं च राजा बाहुभ्यां तद्राज्यं सुखमेधते ॥

yatrādṛṣṭaṃ bhayaṃ brahma prajānāṃ śamayatyuta | dṛṣṭaṃ ca rājā bāhubhyāṃ tadrājyaṃ sukhamedhate

जिस राज्य में ब्राह्मण प्रजा के अदृश्य भय को शान्त करता है और राजा अपनी भुजाओं से दृश्य भय को, वह राज्य सुखपूर्वक बढ़ता है।

श्लोक 5 (12.74.5)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । मुचुकुन्दस्य संवादं राज्ञो वैश्रवणस्य च ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | mucukundasya saṃvādaṃ rājño vaiśravaṇasya ca

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं: राजा मुचुकुन्द और राजा वैश्रवण का संवाद।

श्लोक 6 (12.74.6)

मुचुकुन्दो विजित्येमां पृथिवीं पृथिवीपतिः । जिज्ञासमानः स बलमभ्ययादलकाधिपम् ॥

mucukundo vijityemāṃ pṛthivīṃ pṛthivīpatiḥ | jijñāsamānaḥ sa balamabhyayādalakādhipam

पृथ्वीपति मुचुकुन्द इस पृथ्वी को जीतकर अपना बल परखने की इच्छा से अलका के स्वामी पर चढ़ आए।

श्लोक 7 (12.74.7)

ततो वैश्रवणो राजा राक्षसानसृजत्तदा । ते बलान्यवमृद्नन्त मुचुकुन्दस्य नैर्ऋताः ॥

tato vaiśravaṇo rājā rākṣasānasṛjattadā | te balānyavamṛdnanta mucukundasya nairṛtāḥ

तब राजा वैश्रवण ने राक्षसों को भेजा, और उन नैर्ऋतों ने मुचुकुन्द की सेनाओं को रौंद डाला।

श्लोक 8 (12.74.8)

स हन्यमाने सैन्ये स्वे मुचुकुन्दो नराधिपः । गर्हयामास विद्वांसं पुरोहितमरिन्दमः ॥

sa hanyamāne sainye sve mucukundo narādhipaḥ | garhayāmāsa vidvāṃsaṃ purohitamarindamaḥ

अपनी सेना को मरते देख शत्रुदमन राजा मुचुकुन्द ने अपने विद्वान् पुरोहित को उलाहना दिया।

श्लोक 9 (12.74.9)

तत उग्रं तपस्तप्त्वा वसिष्ठो धर्मवित्तमः । रक्षांस्युपावधीत्तत्र पन्थानं चाप्यविन्दत ॥

tata ugraṃ tapastaptvā vasiṣṭho dharmavittamaḥ | rakṣāṃsyupāvadhīttatra panthānaṃ cāpyavindata

तब धर्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ वसिष्ठ ने उग्र तप करके वहाँ राक्षसों का संहार किया और आगे का मार्ग भी पा लिया।

श्लोक 10 (12.74.10)

ततो वैश्रवणो राजा मुचुकुन्दमगर्हयत् । वध्यमानेषु सैन्येषु वचनं चेदमब्रवीत् ॥

tato vaiśravaṇo rājā mucukundamagarhayat | vadhyamāneṣu sainyeṣu vacanaṃ cedamabravīt

तब राजा वैश्रवण ने मुचुकुन्द को फटकारा, और सेनाओं के कटते समय यह वचन कहा।

धनद उवाच

श्लोक 11 (12.74.11)

बलवन्तस्त्वया पूर्वे राजानः सपुरोहिताः । न चैवं समवर्तन्त यथा त्वमिव वर्तसे ॥

balavantastvayā pūrve rājānaḥ sapurohitāḥ | na caivaṃ samavartanta yathā tvamiva vartase

तुमसे पहले के राजा, पुरोहितों सहित, तुमसे अधिक बलवान् थे, फिर भी वे वैसा आचरण नहीं करते थे जैसा तुम कर रहे हो।

श्लोक 12 (12.74.12)

ते खल्वपि कृतास्त्राश्च बलवन्तश्च भूमिपाः । आगम्य पर्युपासन्ते मामीशं सुखदुःखयोः ॥

te khalvapi kṛtāstrāśca balavantaśca bhūmipāḥ | āgamya paryupāsante māmīśaṃ sukhaduḥkhayoḥ

वे भूमिपाल अस्त्रों में निपुण और बलवान् होकर भी आते हैं और सुख-दुःख में मुझ स्वामी की उपासना करते हैं।

श्लोक 13 (12.74.13)

यद्यस्ति बाहुवीर्यं ते तद्दर्शयितुमर्हसि । किं ब्राह्मणबलेन त्वमतिमात्रं प्रवर्तसे ॥

yadyasti bāhuvīryaṃ te taddarśayitumarhasi | kiṃ brāhmaṇabalena tvamatimātraṃ pravartase

यदि तुम्हारी भुजाओं में बल है तो उसे दिखाओ। ब्राह्मण के बल के भरोसे तुम इतना अधिक क्यों इतरा रहे हो?

भीष्म उवाच

श्लोक 14 (12.74.14)

मुचुकुन्दस्ततः क्रुद्धः प्रत्युवाच धनेश्वरम् । न्यायपूर्वमसंरब्धमसंभ्रान्तमिदं वचः ॥

mucukundastataḥ kruddhaḥ pratyuvāca dhaneśvaram | nyāyapūrvamasaṃrabdhamasaṃbhrāntamidaṃ vacaḥ

तब क्रोधित मुचुकुन्द ने धनेश्वर को ये वचन कहे, जो न्यायसंगत, शान्त और अविचलित थे।

मुचुकुन्द उवाच

श्लोक 15 (12.74.15)

ब्रह्मक्षत्रमिदं सृष्टमेकयोनि स्वयंभुवा । पृथग्बलविधानं च तल्लोकं परिपालयेत् ॥

brahmakṣatramidaṃ sṛṣṭamekayoni svayaṃbhuvā | pṛthagbalavidhānaṃ ca tallokaṃ paripālayet

स्वयंभू ने ब्राह्मण-बल और क्षत्रिय-बल को एक ही योनि से रचा है; दोनों के बल का विधान अलग-अलग है, और वे दोनों मिलकर लोक की रक्षा करें।

श्लोक 16 (12.74.16)

तपोमन्त्रबलं नित्यं ब्राह्मणेषु प्रतिष्ठितम् । अस्रबाहुबलं नित्यं क्षत्रियेषु प्रतिष्ठितम् ॥

tapomantrabalaṃ nityaṃ brāhmaṇeṣu pratiṣṭhitam | asrabāhubalaṃ nityaṃ kṣatriyeṣu pratiṣṭhitam

तप और मन्त्र का बल सदा ब्राह्मणों में प्रतिष्ठित है; अस्त्र और भुजाओं का बल सदा क्षत्रियों में प्रतिष्ठित है।

श्लोक 17 (12.74.17)

ताभ्यां संभूय कर्तव्यं प्रजानां परिपालनम् । तथा च मां प्रवर्तन्तं किं गर्हस्यलकाधिप ॥

tābhyāṃ saṃbhūya kartavyaṃ prajānāṃ paripālanam | tathā ca māṃ pravartantaṃ kiṃ garhasyalakādhipa

प्रजा की रक्षा इन दोनों को मिलकर करनी चाहिए। फिर हे अलका के स्वामी, मेरे ऐसा करने पर तुम मुझे क्यों कोसते हो?

भीष्म उवाच

श्लोक 18 (12.74.18)

ततोऽब्रवीद्वैश्रवणो राजानं सपुरोहितम् । नाहं राज्यमनिर्दिष्टं कस्मैचिद्विदधाम्युत ॥

tato'bravīdvaiśravaṇo rājānaṃ sapurohitam | nāhaṃ rājyamanirdiṣṭaṃ kasmaicidvidadhāmyuta

तब वैश्रवण ने पुरोहित सहित राजा से कहा, ‘मैं किसी को भी बिना निर्दिष्ट किए राज्य नहीं देता।’

धनद उवाच

श्लोक 19 (12.74.19)

नाच्छिन्दे वाऽप्यनिर्दिष्टमिति जानीहि पार्थिव । प्रशाधि पृथिवीं कृत्स्नां मद्दत्तामखिलामिमाम् । एवमुक्तः प्रत्युवाच मुचुकुन्दो महीपतिः ॥

nācchinde vā'pyanirdiṣṭamiti jānīhi pārthiva | praśādhi pṛthivīṃ kṛtsnāṃ maddattāmakhilāmimām | evamuktaḥ pratyuvāca mucukundo mahīpatiḥ

‘जो निर्दिष्ट नहीं है, उसे मैं छीनता भी नहीं; हे राजन्, यह जान लो। मेरी दी हुई यह सारी पृथ्वी तुम शासन करो।’ ऐसा कहे जाने पर राजा मुचुकुन्द ने उत्तर दिया।

मुचुकुन्द उवाच

श्लोक 20 (12.74.20)

नाहं राज्यं भवद्दत्तं भोक्तुमिच्छामि पार्थिव । बाहुवीर्यार्जितं राज्यमश्नीयामिति कामये ॥

nāhaṃ rājyaṃ bhavaddattaṃ bhoktumicchāmi pārthiva | bāhuvīryārjitaṃ rājyamaśnīyāmiti kāmaye

हे राजन्, मैं तुम्हारा दिया हुआ राज्य भोगना नहीं चाहता। मेरी कामना यह है कि मैं अपनी भुजाओं के बल से जीता हुआ राज्य भोगूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 21 (12.74.21)

ततो वैश्रवणो राजा विस्मयं परमं ययौ । क्षत्रधर्मे स्थितं दृष्ट्वा मुचुकुन्दमरिन्दमम् ॥

tato vaiśravaṇo rājā vismayaṃ paramaṃ yayau | kṣatradharme sthitaṃ dṛṣṭvā mucukundamarindamam

तब क्षत्रिय-धर्म में दृढ़ खड़े शत्रुदमन मुचुकुन्द को देखकर राजा वैश्रवण को बड़ा विस्मय हुआ।

श्लोक 22 (12.74.22)

ततो राजा मुचुकुन्दः सोन्वशासद्वसुंधराम् । बाहुवीर्यार्जितां सम्यक्क्षत्रधर्ममनुव्रतः ॥

tato rājā mucukundaḥ sonvaśāsadvasuṃdharām | bāhuvīryārjitāṃ samyakkṣatradharmamanuvrataḥ

तब राजा मुचुकुन्द ने क्षत्रिय-धर्म का भली-भाँति पालन करते हुए, अपनी भुजाओं के बल से जीती हुई पृथ्वी पर शासन किया।

श्लोक 23 (12.74.23)

एवं यो ब्रह्मविद्राजा ब्रह्मपूर्वं प्रवर्तते । स भुङ्क्ते विजितामुर्वीं यशश्च महदश्नुते ॥

evaṃ yo brahmavidrājā brahmapūrvaṃ pravartate | sa bhuṅkte vijitāmurvīṃ yaśaśca mahadaśnute

इस प्रकार जो ब्रह्मवेत्ता राजा ब्राह्मण को आगे रखकर चलता है, वह जीती हुई पृथ्वी को भोगता है और महान् यश पाता है।

श्लोक 24 (12.74.24)

नित्योदकी ब्राह्मणः स्यान्नित्यशस्त्रश्च क्षत्रियः । तयोर्हि सर्वमायत्तं यत्किंचिज्जगतीगतम् ॥

nityodakī brāhmaṇaḥ syānnityaśastraśca kṣatriyaḥ | tayorhi sarvamāyattaṃ yatkiṃcijjagatīgatam

ब्राह्मण सदा जल साथ रखकर कर्म करने वाला हो और क्षत्रिय सदा शस्त्रधारी हो; क्योंकि जगत् में जो कुछ भी है, वह सब इन्हीं दोनों पर आश्रित है।

श्लोक 25 (12.74.25)

यशश्च तेजश्च महीं च कृत्स्नां । प्राप्नोति राजन्विपुलां च कीर्तिम् । प्रधानधर्मं नृपते नियच्छ । तथा च धर्मस्य चतुर्थमंशम् ॥

yaśaśca tejaśca mahīṃ ca kṛtsnāṃ | prāpnoti rājanvipulāṃ ca kīrtim | pradhānadharmaṃ nṛpate niyaccha | tathā ca dharmasya caturthamaṃśam

हे राजन्, वह यश, तेज, सारी पृथ्वी और विपुल कीर्ति पाता है। हे नरपति, प्रधान धर्म को ग्रहण करो, और इसी प्रकार धर्म का चौथा अंश भी।

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