शान्ति पर्व · अध्याय 73
राजा का पुरोहित: ऐल और कश्यप का संवाद
युधिष्ठिर पूछते हैं कि राजा को कैसा पुरोहित नियुक्त करना चाहिए। भीष्म पुरोहित के गुण और कर्तव्य, राजा के सात दोष जो पुरोहित पर आते हैं, और कौन-सी वेद-शाखाएँ ग्राह्य या त्याज्य हैं, यह बताते हैं। फिर वे ऐल और कश्यप का संवाद सुनाते हैं: जब ब्राह्मण और क्षत्रिय एक-दूसरे को छोड़ देते हैं तो राष्ट्र का नाश होता है, और मनुष्यों के पापों से संहारक रुद्र उत्पन्न होता है। अध्याय के अन्त में राजा को ब्राह्मण का सम्मान करने की सीख दी गई है, क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय का बल एक-दूसरे को बढ़ाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.73.1)
राज्ञा पुरोहितः कार्यः कीदृशो वर्णतो भवेत् । पुरोधा यादृशः कार्यः कथयस्व पितामह ॥
rājñā purohitaḥ kāryaḥ kīdṛśo varṇato bhavet | purodhā yādṛśaḥ kāryaḥ kathayasva pitāmaha
राजा को पुरोहित नियुक्त करना चाहिए; वह वर्ण (रंग) में कैसा हो? पितामह, बताइए कि कैसा पुरोहित बनाना चाहिए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.73.2)
गौरो वा लोहितो वाऽपि श्यामो वा नीरुजः सुखी । अक्रोधनो ह्यचपलः सर्वतश्च जितेन्द्रियः ॥
gauro vā lohito vā'pi śyāmo vā nīrujaḥ sukhī | akrodhano hyacapalaḥ sarvataśca jitendriyaḥ
वह गोरा हो, लाल हो या साँवला, रोगरहित और सुखी, क्रोधहीन, चंचलतारहित और सब प्रकार से जितेन्द्रिय हो।
श्लोक 3 (12.73.3)
राज्ञा पुरोहितः कार्यो भवेद्विद्वान्बहुश्रुतः । उभौ समीक्ष्य धर्मार्थावप्रमेयावनन्तरम् ॥
rājñā purohitaḥ kāryo bhavedvidvānbahuśrutaḥ | ubhau samīkṣya dharmārthāvaprameyāvanantaram
राजा को ऐसा पुरोहित बनाना चाहिए जो विद्वान् और बहुश्रुत हो, और जिसने अपरिमेय धर्म और अर्थ दोनों का भली-भाँति विचार किया हो।
श्लोक 4 (12.73.4)
धर्मात्मा मन्त्रविद्येषां राज्ञां राजन्पुरोहितः । तेषामर्थश्च कामश्च धर्मश्चेति विनिश्चयः ॥
dharmātmā mantravidyeṣāṃ rājñāṃ rājanpurohitaḥ | teṣāmarthaśca kāmaśca dharmaśceti viniścayaḥ
राजन्, जिन राजाओं का पुरोहित धर्मात्मा और मन्त्रों का जानकार हो, उनके लिए निश्चित फल अर्थ, काम और धर्म होता है।
श्लोक 5 (12.73.5)
श्लोकाश्चोशनसा गीतास्तान्निबोध युधिष्ठिर । उच्छिष्टः स भवेद्राजा यस्य नास्ति पुरोहितः ॥
ślokāścośanasā gītāstānnibodha yudhiṣṭhira | ucchiṣṭaḥ sa bhavedrājā yasya nāsti purohitaḥ
युधिष्ठिर, उशना द्वारा गाए गए श्लोक सुनो: जिस राजा के पास पुरोहित नहीं है, वह उच्छिष्ट, अर्थात् अपवित्र है।
श्लोक 6 (12.73.6)
रक्षसामसुराणां च पिशाचोरगपक्षिणाम् । शत्रूणां च भवेद्वध्यो यस्य नास्ति पुरोहितः ॥
rakṣasāmasurāṇāṃ ca piśācoragapakṣiṇām | śatrūṇāṃ ca bhavedvadhyo yasya nāsti purohitaḥ
जिस राजा के पास पुरोहित नहीं, वह राक्षसों, असुरों, पिशाचों, सर्पों, पक्षियों और शत्रुओं के हाथ मारे जाने योग्य हो जाता है।
श्लोक 7 (12.73.7)
ब्रह्मत्वं सर्वयज्ञेषु कुर्वीताथर्वणो द्विजः । राज्ञश्चाथर्ववेदेन सर्वकर्माणि कारयेत् ॥
brahmatvaṃ sarvayajñeṣu kurvītātharvaṇo dvijaḥ | rājñaścātharvavedena sarvakarmāṇi kārayet
सब यज्ञों में अथर्ववेदी ब्राह्मण को ब्रह्मा का कार्य करना चाहिए, और राजा के सब कर्म अथर्ववेद की विधि से कराने चाहिए।
श्लोक 8 (12.73.8)
ब्रूयाद्गर्ह्याणि सततं महोत्पातान्यघानि च । इष्टमङ्गलयुक्तानि तथाऽन्तः पुरिकाणि च ॥
brūyādgarhyāṇi satataṃ mahotpātānyaghāni ca | iṣṭamaṅgalayuktāni tathā'ntaḥ purikāṇi ca
वह निन्दनीय बातों, बड़े उत्पातों और अनिष्टों का, तथा इष्ट और मंगलकारी बातों का और अन्तःपुर सम्बन्धी बातों का भी सदा निरूपण करे।
श्लोक 9 (12.73.9)
गीतनृत्ताधिकारेषु संमतेषु महीपतेः । कर्तव्यं करणीयं वै वैश्वदेवबलिस्तथा ॥
gītanṛttādhikāreṣu saṃmateṣu mahīpateḥ | kartavyaṃ karaṇīyaṃ vai vaiśvadevabalistathā
राजा को मान्य गीत-नृत्य के विषयों में क्या करना है और क्या होना चाहिए, यह वही बताए; और वैश्वदेव बलि भी वही कराए।
श्लोक 10 (12.73.10)
पक्षसंधिषु कुर्वीत महाशान्तिं पुरोहितः । रौद्रहोमसहस्रं च स्वस्य राज्ञः प्रियं हितम् ॥
pakṣasaṃdhiṣu kurvīta mahāśāntiṃ purohitaḥ | raudrahomasahasraṃ ca svasya rājñaḥ priyaṃ hitam
पक्षों की सन्धियों पर पुरोहित महाशान्ति का अनुष्ठान करे और अपने राजा के प्रिय और हित के लिए एक हजार रौद्र होम करे।
श्लोक 11 (12.73.11)
राज्ञः पापमलाः सप्त यानृच्छति पुरोहितः । अमात्याश्च कुकर्माणो मन्त्रिणश्चाप्युपेक्षकाः ॥
rājñaḥ pāpamalāḥ sapta yānṛcchati purohitaḥ | amātyāśca kukarmāṇo mantriṇaścāpyupekṣakāḥ
राजा के पाप के सात मल हैं, जो पुरोहित तक पहुँचते हैं: कुकर्मी अमात्य और उपेक्षा करने वाले मन्त्री,
श्लोक 12 (12.73.12)
चौर्यमव्यवहारश्च व्यवहारोपसेविनाम् । अदण्ड्यदण्डनं चैव दण्ड्यानां चाप्यदण्डनम् ॥
cauryamavyavahāraśca vyavahāropasevinām | adaṇḍyadaṇḍanaṃ caiva daṇḍyānāṃ cāpyadaṇḍanam
चोरी, और न्यायालयों का सहारा लेने वालों में अनुचित व्यवहार, दण्ड के अयोग्य को दण्ड देना और दण्ड के योग्य को दण्ड न देना।
श्लोक 13 (12.73.13)
हिंसा चान्यत्र संग्रामाद्राज्ञश्च मल उच्यते । कुभृत्यैस्तु प्रजानाशः सप्तमस्तु महामलः ॥
hiṃsā cānyatra saṃgrāmādrājñaśca mala ucyate | kubhṛtyaistu prajānāśaḥ saptamastu mahāmalaḥ
युद्ध के अतिरिक्त अन्यत्र की गई हिंसा भी राजा का दोष कही जाती है; और बुरे सेवकों के कारण प्रजा का नाश सातवाँ और सबसे बड़ा दोष है।
श्लोक 14 (12.73.14)
रौद्रैर्होमैर्महाशान्त्या घृतकम्बलकर्मणा । भृग्वङ्गिरोविधिज्ञो वै पुरोधा निर्णुदे मलात् ॥
raudrairhomairmahāśāntyā ghṛtakambalakarmaṇā | bhṛgvaṅgirovidhijño vai purodhā nirṇude malāt
भृगु और अंगिरा की विधि को जानने वाला पुरोहित रौद्र होमों, महाशान्ति और घृतकम्बल कर्म से राजा को उस दोष से छुड़ाता है।
श्लोक 15 (12.73.15)
एतान्हित्वा दिवं याति राजा सप्त महामलान् । सामात्यः सपुरोधाश्च प्रजानां पालने रतः ॥
etānhitvā divaṃ yāti rājā sapta mahāmalān | sāmātyaḥ sapurodhāśca prajānāṃ pālane rataḥ
इन सात महादोषों को त्यागकर, प्रजा के पालन में लगा हुआ राजा अपने अमात्यों और पुरोहित के साथ स्वर्ग जाता है।
श्लोक 16 (12.73.16)
एतस्मिन्नेव कौरव्य पौरोहित्ये महामते । श्लोकानाह महेन्द्रस्य गुरुर्देवो बृहस्पतिः ॥
etasminneva kauravya paurohitye mahāmate | ślokānāha mahendrasya gururdevo bṛhaspatiḥ
हे महामति कौरव, पौरोहित्य के इसी विषय में देवताओं के गुरु देव बृहस्पति ने महेन्द्र को श्लोक सुनाए थे।
श्लोक 17 (12.73.17)
तान्निबोध महीपाल महाभाग हिताञ्शुभान् । ऋग्वेदे सामवेदे च यजुर्वेदे च वाजिनाम् ॥
tānnibodha mahīpāla mahābhāga hitāñśubhān | ṛgvede sāmavede ca yajurvede ca vājinām
हे पृथ्वीपाल, हे महाभाग, उन्हें सुनो; वे राजाओं के लिए शुभ और हितकर हैं। ऋग्वेद में, सामवेद में और वाजिनों के यजुर्वेद में,
श्लोक 18 (12.73.18)
न निर्दिष्टानि कर्माणि त्रिषु स्थानेषु भूभृताम् । शान्तिकं पौष्टिकं चैव अरिष्टानां च शातनम् ॥
na nirdiṣṭāni karmāṇi triṣu sthāneṣu bhūbhṛtām | śāntikaṃ pauṣṭikaṃ caiva ariṣṭānāṃ ca śātanam
राजाओं के कर्म इन तीन स्थानों में निर्दिष्ट नहीं हैं: शान्ति कर्म, पुष्टि कर्म और अनिष्टों का नाश।
श्लोक 19 (12.73.19)
शप्तास्ते याज्ञवल्क्येन यज्ञानां हितमीहता । ब्रह्मिष्ठानां वरिष्ठेन ब्रह्मणः संमते विभोः ॥
śaptāste yājñavalkyena yajñānāṃ hitamīhatā | brahmiṣṭhānāṃ variṣṭhena brahmaṇaḥ saṃmate vibhoḥ
यज्ञों का हित चाहने वाले, ब्रह्मनिष्ठों में श्रेष्ठ और भगवान् ब्रह्मा द्वारा सम्मानित याज्ञवल्क्य ने उन्हें शाप दिया था।
श्लोक 20 (12.73.20)
बह्वृचं सामगं चैव वाजिनं च विवर्जयेत् । बह्वृचो राष्ट्रनाशाय राजनाशाय सामगः । अध्वर्युर्बलनाशाय प्रोक्तो वाजसनेयकः ॥
bahvṛcaṃ sāmagaṃ caiva vājinaṃ ca vivarjayet | bahvṛco rāṣṭranāśāya rājanāśāya sāmagaḥ | adhvaryurbalanāśāya prokto vājasaneyakaḥ
वह ऋग्वेदी, सामवेदी और वाजी का त्याग करे। ऋग्वेदी राष्ट्र के नाश के लिए, सामवेदी राजा के नाश के लिए और वाजसनेयक अध्वर्यु सेना के नाश के लिए कहा गया है।
श्लोक 21 (12.73.21)
अब्राह्मणेषु वर्णेषु मन्त्रान्वाजसनेयकान् । शान्तिके पौष्टिके चैव नित्यं कर्मणि वर्जयेत् ॥
abrāhmaṇeṣu varṇeṣu mantrānvājasaneyakān | śāntike pauṣṭike caiva nityaṃ karmaṇi varjayet
शान्ति और पुष्टि के कर्मों में, ब्राह्मणों से भिन्न वर्णों के लिए, वह वाजसनेयक मन्त्रों का सदा त्याग करे।
श्लोक 22 (12.73.22)
ब्राह्मणस्य महीपस्य सर्वथा न विरोधिनः । वेदाश्चत्वार इत्येते ब्राह्मणा ये च तद्विदुः ॥
brāhmaṇasya mahīpasya sarvathā na virodhinaḥ | vedāścatvāra ityete brāhmaṇā ye ca tadviduḥ
ऐसे लोग जो ब्राह्मण और राजा के किसी प्रकार विरोधी नहीं हैं। वेद चार हैं; ब्राह्मण वे हैं जो उन्हें जानते हैं।
श्लोक 23 (12.73.23)
पौरोहित्ये प्रमाणं तु ब्राह्मणश्च महीपतेः । जात्या न क्षत्रियः प्रोक्तः क्षतत्राणं करोति यः ॥
paurohitye pramāṇaṃ tu brāhmaṇaśca mahīpateḥ | jātyā na kṣatriyaḥ proktaḥ kṣatatrāṇaṃ karoti yaḥ
पौरोहित्य के विषय में राजा के लिए ब्राह्मण ही प्रमाण है। क्षत्रिय जन्म से नहीं कहा गया; जो क्षति से रक्षा करता है, वही क्षत्रिय है।
श्लोक 24 (12.73.24)
चातुर्वर्ण्यबहिष्ठोऽपि स एव क्षत्रियः स्मृतः । भार्गवाङ्गिरसैर्मन्त्रैस्तेषां कर्म विधीयते ॥
cāturvarṇyabahiṣṭho'pi sa eva kṣatriyaḥ smṛtaḥ | bhārgavāṅgirasairmantraisteṣāṃ karma vidhīyate
चारों वर्णों से बाहर रहने वाला भी, यदि वह यह करता है, तो क्षत्रिय ही माना गया है। उनका कर्म भृगु और अंगिरा के मन्त्रों से विहित है।
श्लोक 25 (12.73.25)
वैतानं कर्म यच्चैव गृह्यकर्म च यत्स्मृतम् । द्विजातीनां त्रयाणां तु सर्वकर्म विधीयते ॥
vaitānaṃ karma yaccaiva gṛhyakarma ca yatsmṛtam | dvijātīnāṃ trayāṇāṃ tu sarvakarma vidhīyate
श्रौत कर्म और स्मृति में बताया गृह्य कर्म: तीनों द्विजातियों के लिए सब कर्म विहित हैं।
श्लोक 26 (12.73.26)
राजधर्मप्रवृत्तानां हितार्थं त्रीणि कारयेत् । शान्तिकं पौष्टिकं चैव तथाऽभिचरणं च यत् ॥
rājadharmapravṛttānāṃ hitārthaṃ trīṇi kārayet | śāntikaṃ pauṣṭikaṃ caiva tathā'bhicaraṇaṃ ca yat
राजधर्म में लगे हुओं के हित के लिए वह तीन कर्म कराए: शान्ति कर्म, पुष्टि कर्म और अभिचार कर्म।
श्लोक 27 (12.73.27)
अग्निष्टोममुखैर्यज्ञैर्दूषिता भूपकर्मभिः । न सम्यक्फलमृच्छन्ति ये यजन्ति द्विजातयः ॥
agniṣṭomamukhairyajñairdūṣitā bhūpakarmabhiḥ | na samyakphalamṛcchanti ye yajanti dvijātayaḥ
अग्निष्टोम आदि यज्ञों से यज्ञ करने वाले द्विज, जो राजा के कर्मों से दूषित हो जाते हैं, उचित फल नहीं पाते।
श्लोक 28 (12.73.28)
पौरोहित्यं तु कुर्वाणा नाशं यास्यन्ति भूभृताम् । यज्ञकर्माणि कुर्वाणा ऋत्विजस्तु विरोधिनः ॥
paurohityaṃ tu kurvāṇā nāśaṃ yāsyanti bhūbhṛtām | yajñakarmāṇi kurvāṇā ṛtvijastu virodhinaḥ
जो पौरोहित्य करते हैं, वे राजाओं के नाश को प्राप्त होंगे, और यज्ञकर्म करने वाले ऋत्विज् उनके विरोधी होते हैं।
श्लोक 29 (12.73.29)
ब्रह्मक्षत्रविशः सर्वे पौरोहित्ये विवर्जिताः । तदभावे च पारक्यं निर्दिष्टं राजकर्मसु ॥
brahmakṣatraviśaḥ sarve paurohitye vivarjitāḥ | tadabhāve ca pārakyaṃ nirdiṣṭaṃ rājakarmasu
सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य पौरोहित्य से वर्जित हैं; और उनके अभाव में राजा के कर्मों में दूसरे को निर्दिष्ट किया गया है।
श्लोक 30 (12.73.30)
ऋषिणा याज्ञवल्क्येन तत्तथा न तदन्यथा । भार्गवाङ्गिरसां वेदे कृतविद्यः षडङ्गवित् ॥
ṛṣiṇā yājñavalkyena tattathā na tadanyathā | bhārgavāṅgirasāṃ vede kṛtavidyaḥ ṣaḍaṅgavit
ऋषि याज्ञवल्क्य ने ऐसा ही कहा है: वह वैसा ही है, अन्यथा नहीं। वह भृगु-अंगिरस वेद में निपुण और छहों अंगों का जानने वाला हो,
श्लोक 31 (12.73.31)
यज्ञकर्मविधिज्ञस्तु विधिज्ञः पौष्टिकेषु च । अष्टादशविकल्पानां विधिज्ञः शान्तिकर्मणाम् ॥
yajñakarmavidhijñastu vidhijñaḥ pauṣṭikeṣu ca | aṣṭādaśavikalpānāṃ vidhijñaḥ śāntikarmaṇām
यज्ञकर्म की विधि को जानने वाला, पुष्टि कर्मों की विधि का जानकार और शान्ति कर्मों के अठारह प्रकारों की विधि को जानने वाला,
श्लोक 32 (12.73.32)
सर्वरोगविहीनश्च संयतः संयतेन्द्रियः । श्वित्रकुष्ठक्षयक्षीणैर्ग्रहापस्मारदूषितैः ॥
sarvarogavihīnaśca saṃyataḥ saṃyatendriyaḥ | śvitrakuṣṭhakṣayakṣīṇairgrahāpasmāradūṣitaiḥ
सब रोगों से रहित, संयमी और इन्द्रियों को वश में रखने वाला हो; और श्वित्र, कुष्ठ या क्षय से क्षीण, तथा ग्रह और मिरगी से पीड़ित लोगों से राजा दूर रहकर ही बात करे,
श्लोक 33 (12.73.33)
अशस्तैर्वातदुष्टैश्च दूरस्थैः संवदेन्नृपः । रोगिणं ऋत्विजं चैव वर्जयेच्च पुरोहितम् ॥
aśastairvātaduṣṭaiśca dūrasthaiḥ saṃvadennṛpaḥ | rogiṇaṃ ṛtvijaṃ caiva varjayecca purohitam
और जो अशुभ हों या वात आदि दोष से दूषित हों, उनसे भी। रोगी ऋत्विज् और रोगी पुरोहित को भी वह त्याग दे।
श्लोक 34 (12.73.34)
न चान्यस्य कृतं येन पौरोहित्यं कदाचन । यस्य याज्यो मृतश्चैव भ्रष्टः प्रव्रजितो यथा ॥
na cānyasya kṛtaṃ yena paurohityaṃ kadācana | yasya yājyo mṛtaścaiva bhraṣṭaḥ pravrajito yathā
वह भी वर्जित है जिसने पहले कभी किसी और का पौरोहित्य नहीं किया, और वह जिसका यजमान मर गया हो, पतित हो गया हो या संन्यास लेकर चला गया हो,
श्लोक 35 (12.73.35)
युद्धे पराजितश्चैव सर्वांस्तान्वर्जयेन्नृपः । नक्षत्रस्यानुकूल्येन यः संजातो नरेश्वरः ॥
yuddhe parājitaścaiva sarvāṃstānvarjayennṛpaḥ | nakṣatrasyānukūlyena yaḥ saṃjāto nareśvaraḥ
और जो युद्ध में हार चुका हो: इन सबको राजा त्याग दे। हे नरेश्वर, जो राजा के नक्षत्र के अनुकूल नक्षत्र में उत्पन्न हुआ हो,
श्लोक 36 (12.73.36)
राजशास्त्रविनीतश्च श्रेयान्राज्ञः पुरोहितः । अधन्यानां निमित्तानामुत्पातानामथार्थवित् ॥
rājaśāstravinītaśca śreyānrājñaḥ purohitaḥ | adhanyānāṃ nimittānāmutpātānāmathārthavit
और राजशास्त्र में शिक्षित हो, ऐसा पुरोहित राजा के लिए श्रेष्ठ है; वैसे ही वह भी जो अशुभ लक्षणों और उत्पातों का अर्थ जानता हो,
श्लोक 37 (12.73.37)
शत्रुपक्षक्षयज्ञश्च श्रेयान्राज्ञः पुरोहितः । वाजिनं तदभावे च चरकाध्वर्यवानपि ॥
śatrupakṣakṣayajñaśca śreyānrājñaḥ purohitaḥ | vājinaṃ tadabhāve ca carakādhvaryavānapi
और जो शत्रुपक्ष के नाश का उपाय जानता हो: ऐसा पुरोहित राजा के लिए श्रेष्ठ है। उसके अभाव में वाजी और चरक अध्वर्यु भी,
श्लोक 38 (12.73.38)
बह्वृचं सामगं चैव नीतिशास्त्रकृतश्रमान् । कृतिनोऽथर्वणो वेदे स्थापयेत्तु पुरोहितान् ॥
bahvṛcaṃ sāmagaṃ caiva nītiśāstrakṛtaśramān | kṛtino'tharvaṇo vede sthāpayettu purohitān
ऋग्वेदी और सामवेदी भी, जिन्होंने नीतिशास्त्र में परिश्रम किया हो और जो अथर्ववेद में निपुण हों, उन्हें वह पुरोहित बनाए।
श्लोक 39 (12.73.39)
हिंसालिङ्गा हि निर्दिष्टा मन्त्रा वैतानिकैर्द्विजैः । न तानुच्चारयेत्प्राज्ञः क्षात्रधर्मविरोधिनः ॥
hiṃsāliṅgā hi nirdiṣṭā mantrā vaitānikairdvijaiḥ | na tānuccārayetprājñaḥ kṣātradharmavirodhinaḥ
वैतानिक द्विजों ने जिन मन्त्रों का विधान किया है, उनमें हिंसा के चिह्न हैं; समझदार मनुष्य उन्हें उच्चारित न करे, क्योंकि वे क्षत्रिय-धर्म के विरोधी हैं।
श्लोक 40 (12.73.40)
प्रजागुणाः पुरोधाश्च पुरोहितगुणाः प्रजाः । राजा वै सगुणो येषां कुशलं तेषु सर्वशः ॥
prajāguṇāḥ purodhāśca purohitaguṇāḥ prajāḥ | rājā vai saguṇo yeṣāṃ kuśalaṃ teṣu sarvaśaḥ
प्रजा के गुण पुरोहित में और पुरोहित के गुण प्रजा में होते हैं। जिनका राजा सद्गुणों से युक्त होता है, उनका सब प्रकार से कल्याण होता है।
श्लोक 41 (12.73.41)
उभौ प्रजा वर्धयतो देवान्पूर्वापरान्पितॄन् । यौ भवेतां स्थितौ धर्मे श्रद्धेयौ सुतपस्विनौ ॥
ubhau prajā vardhayato devānpūrvāparānpitṝn | yau bhavetāṃ sthitau dharme śraddheyau sutapasvinau
राजा और पुरोहित दोनों प्रजा को, देवताओं को तथा आगे-पीछे के पितरों को बढ़ाते हैं, यदि वे धर्म में स्थित, विश्वास के योग्य और महान् तपस्वी हों।
श्लोक 42 (12.73.42)
परस्परस्य सुहृदौ विहितौ समचेतसौ । ब्रह्मक्षत्रस्य संमानात्प्रजा सुखमवाप्नुयात् ॥
parasparasya suhṛdau vihitau samacetasau | brahmakṣatrasya saṃmānātprajā sukhamavāpnuyāt
वे एक-दूसरे के मित्र और समान चित्त वाले, अपने-अपने स्थान पर नियुक्त हों; ब्राह्मण और क्षत्रिय के सम्मान से प्रजा सुख पाएगी।
श्लोक 43 (12.73.43)
विमाननात्तयोरेव प्रजा नश्येयुरेव हि । ब्रह्मक्षत्रं हि सर्वासां प्रजानां मूलमुच्यते ॥
vimānanāttayoreva prajā naśyeyureva hi | brahmakṣatraṃ hi sarvāsāṃ prajānāṃ mūlamucyate
उन दोनों का अपमान होने से प्रजा अवश्य नष्ट हो जाएगी; क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय सब प्रजाओं का मूल कहे जाते हैं।
श्लोक 44 (12.73.44)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ऐलकश्यपसंवादं तं निबोध युधिष्ठिर ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | ailakaśyapasaṃvādaṃ taṃ nibodha yudhiṣṭhira
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं: ऐल और कश्यप का संवाद। युधिष्ठिर, उसे सुनो।
ऐल उवाच
श्लोक 45 (12.73.45)
यदा हि ब्रह्म प्रजहाति क्षत्रं । क्षत्रं यदा वा प्रजहाति ब्रह्म । अन्वग्बलं कतमेऽस्मिन्भजन्ते । तथा बलं कतमेऽस्मिन्ध्रियन्ते ॥
yadā hi brahma prajahāti kṣatraṃ | kṣatraṃ yadā vā prajahāti brahma | anvagbalaṃ katame'sminbhajante | tathā balaṃ katame'smindhriyante
जब ब्राह्मण का बल क्षत्रिय को छोड़ दे, या क्षत्रिय का बल ब्राह्मण को छोड़ दे, तब लोग किसके पीछे चलते हैं और बल किसमें टिकता है?
कश्यप उवाच
श्लोक 46 (12.73.46)
द्विधा हि राष्ट्रं भवति क्षत्रियस्य । ब्रह्म क्षत्रं यत्र विरुध्यतीह । अन्वग्बलं दस्यवस्तद्भजन्ते । तथा वर्णं तत्र विदन्ति सन्तः ॥
dvidhā hi rāṣṭraṃ bhavati kṣatriyasya | brahma kṣatraṃ yatra virudhyatīha | anvagbalaṃ dasyavastadbhajante | tathā varṇaṃ tatra vidanti santaḥ
जब ब्राह्मण और क्षत्रिय आपस में विरोध करते हैं, तब क्षत्रिय का राष्ट्र दो भागों में बँट जाता है। तब दस्यु बलवान् के पीछे चलते हैं, और वहाँ सज्जन जान लेते हैं कि उसका जन्म कैसा है।
श्लोक 47 (12.73.47)
नैषां ब्रह्म च वर्धते नोत पुत्रा । न गर्गरो मथ्यते नो यजन्ते । नैषां पुत्रा वेदमधीयते च । यदा ब्रह्म क्षत्रियाः संत्यजन्ति ॥
naiṣāṃ brahma ca vardhate nota putrā | na gargaro mathyate no yajante | naiṣāṃ putrā vedamadhīyate ca | yadā brahma kṣatriyāḥ saṃtyajanti
उनमें ब्रह्मविद्या नहीं बढ़ती, पुत्र भी नहीं बढ़ते; मथानी नहीं चलती और वे यज्ञ नहीं करते; उनके पुत्र वेद नहीं पढ़ते, जब ब्राह्मण और क्षत्रिय एक-दूसरे को छोड़ देते हैं।
श्लोक 48 (12.73.48)
नैषामर्थो वर्धते जातु गेहे । नाधीयते तत्प्रजा नो यजन्ते । अपध्वस्ता दस्युभूता भवन्ति । ये ब्राह्मणान्क्षत्रियाः संत्यजन्ति ॥
naiṣāmartho vardhate jātu gehe | nādhīyate tatprajā no yajante | apadhvastā dasyubhūtā bhavanti | ye brāhmaṇānkṣatriyāḥ saṃtyajanti
उनके घर में धन कभी नहीं बढ़ता; उनकी प्रजा न पढ़ती है, न यज्ञ करती है। जो क्षत्रिय ब्राह्मणों को छोड़ देते हैं, वे नष्ट होकर दस्यु बन जाते हैं।
श्लोक 49 (12.73.49)
एतौ हि नित्यं संयुक्तावितरेतरधारणे । क्षत्रं वै ब्रह्मणो योनिर्योनिः क्षत्रस्य वै द्विजः ॥
etau hi nityaṃ saṃyuktāvitaretaradhāraṇe | kṣatraṃ vai brahmaṇo yoniryoniḥ kṣatrasya vai dvijaḥ
ये दोनों सदा जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे को धारण करते हैं: क्षत्रिय ब्राह्मण की योनि है, और ब्राह्मण क्षत्रिय की योनि है।
श्लोक 50 (12.73.50)
उभावेतौ नित्यमभिप्रपन्नौ । संप्रापतुर्महतीं संप्रतिष्ठाम् । तयोः सन्धिर्भिद्यते चेत्पुराण । स्ततः सर्वं भवति हि संप्रमूढम् ॥
ubhāvetau nityamabhiprapannau | saṃprāpaturmahatīṃ saṃpratiṣṭhām | tayoḥ sandhirbhidyate cetpurāṇa | stataḥ sarvaṃ bhavati hi saṃpramūḍham
ये दोनों सदा एक-दूसरे का आश्रय लेकर बड़ी प्रतिष्ठा को प्राप्त हुए हैं। यदि इनका पुराना सम्बन्ध टूट जाए, तो सब कुछ घोर भ्रम में पड़ जाता है।
श्लोक 51 (12.73.51)
नात्र पारं लभते पारगामी । महोदधौ नौरिव संप्रभिन्ना । चातुर्वर्ण्यं भवति हि संप्रमूढं । प्रजास्ततः क्षयसंस्था भवन्ति ॥
nātra pāraṃ labhate pāragāmī | mahodadhau nauriva saṃprabhinnā | cāturvarṇyaṃ bhavati hi saṃpramūḍhaṃ | prajāstataḥ kṣayasaṃsthā bhavanti
तब महासागर में टूटी नाव के समान, पार जाने वाले को पार जाने का साधन नहीं मिलता; चारों वर्ण भ्रम में पड़ जाते हैं और प्रजा विनाश की दशा को पहुँचती है।
श्लोक 52 (12.73.52)
ब्रह्मवृक्षो रक्ष्यमाणो मधु हेम च वर्षति । अरक्ष्यमाणः सततमश्रु पापं च वर्षति ॥
brahmavṛkṣo rakṣyamāṇo madhu hema ca varṣati | arakṣyamāṇaḥ satatamaśru pāpaṃ ca varṣati
ब्रह्म-वृक्ष की रक्षा हो तो वह मधु और सोना बरसाता है; रक्षा न हो तो निरन्तर आँसू और पाप बरसाता है।
श्लोक 53 (12.73.53)
अब्रह्मचारी चरणादपेतो । यदा ब्रह्म ब्रह्मणि त्राणमिच्छेत् । आश्चर्यतो वर्षति तत्र देव । स्तत्राभीक्ष्णं दुष्प्रभाश्चाविशन्ति ॥
abrahmacārī caraṇādapeto | yadā brahma brahmaṇi trāṇamicchet | āścaryato varṣati tatra deva | statrābhīkṣṇaṃ duṣprabhāścāviśanti
जब आचरण से भ्रष्ट, ब्रह्मचर्यहीन ब्राह्मण-वर्ग रक्षा की इच्छा करता है, तब वहाँ देवता आश्चर्य से ही बरसता है, और वहाँ बार-बार भीषण विपत्तियाँ प्रवेश करती हैं।
श्लोक 54 (12.73.54)
स्त्रियं हत्वा ब्राह्मणं वाऽपि पापः । सभायां यत्र लभते साधुवादम् । राज्ञः सकाशे न विभेति चापि । ततो भयं विद्यते क्षत्रियस्य ॥
striyaṃ hatvā brāhmaṇaṃ vā'pi pāpaḥ | sabhāyāṃ yatra labhate sādhuvādam | rājñaḥ sakāśe na vibheti cāpi | tato bhayaṃ vidyate kṣatriyasya
जब स्त्री या ब्राह्मण की हत्या करने वाला पापी सभा में प्रशंसा पाता है और राजा के सामने भी नहीं डरता, तब क्षत्रिय के लिए भय उत्पन्न होता है।
श्लोक 55 (12.73.55)
पापैः पापे क्रियमाणेऽतिवेलं । ततो रुद्रो जायते देव एषः । पापैः पापाः संजनयन्ति रुद्रं । ततः सर्वान्साध्वसाधून्हिनस्ति ॥
pāpaiḥ pāpe kriyamāṇe'tivelaṃ | tato rudro jāyate deva eṣaḥ | pāpaiḥ pāpāḥ saṃjanayanti rudraṃ | tataḥ sarvānsādhvasādhūnhinasti
जब पापी लोग हद से अधिक पाप करते हैं, तब यह देव रुद्र उत्पन्न होता है। पापी अपने पापों से रुद्र को जन्म देते हैं, और फिर वह सज्जनों और दुर्जनों सबका संहार करता है।
ऐल उवाच
श्लोक 56 (12.73.56)
कुतो रुद्रः कीदृशो वाऽपि रुद्रः । सत्वैः सत्वं दृश्यते वध्यमानम् । एतत्सर्वं कश्यप मे प्रचक्ष्व । यतो रुद्रो जायते देव एषः ॥
kuto rudraḥ kīdṛśo vā'pi rudraḥ | satvaiḥ satvaṃ dṛśyate vadhyamānam | etatsarvaṃ kaśyapa me pracakṣva | yato rudro jāyate deva eṣaḥ
रुद्र कहाँ से आता है और रुद्र कैसा है? एक प्राणी दूसरे के द्वारा मारा जाता दिखाई देता है। कश्यप, यह सब मुझे बताइए: यह देव रुद्र कहाँ से उत्पन्न होता है?
कश्यप उवाच
श्लोक 57 (12.73.57)
आत्मा रुद्रो हृदये मानवानां । स्वं स्वं देहं परदेहं च हन्ति । वातोत्पातैः सदृशं रुद्रमाहु । र्देवं जीमूतैः सदृशं रूपमस्य ॥
ātmā rudro hṛdaye mānavānāṃ | svaṃ svaṃ dehaṃ paradehaṃ ca hanti | vātotpātaiḥ sadṛśaṃ rudramāhu | rdevaṃ jīmūtaiḥ sadṛśaṃ rūpamasya
रुद्र मनुष्यों के हृदय में स्थित आत्मा है; वह अपने शरीर को भी मारता है और दूसरों के शरीर को भी। लोग कहते हैं कि देव रुद्र आँधियों के समान है और उसका रूप बादलों के समान है।
ऐल उवाच
श्लोक 58 (12.73.58)
न वै वातः परिवृणोति कश्चि । न्न जीमूतो वर्षति तत्र देवः । तथा युक्तो दृश्यते मानुषेषु । कामद्वेषाद्वध्यते मुह्यते च ॥
na vai vātaḥ parivṛṇoti kaści | nna jīmūto varṣati tatra devaḥ | tathā yukto dṛśyate mānuṣeṣu | kāmadveṣādvadhyate muhyate ca
हवा को कोई घेरकर नहीं रखता; वहाँ न बादल बरसता है, न कोई देवता; फिर भी मनुष्यों में ऐसा योग-युक्त प्राणी दिखता है, जो काम और द्वेष से बँधता और मोहित होता है।
कश्यप उवाच
श्लोक 59 (12.73.59)
यथैकगेहाज्जातवेदाः प्रदीप्तः । कृत्स्नं ग्रामं दहते च त्वरावान् । विमोहनं कुरुते देव एष । ततः सर्वं स्पृश्यते पुण्यपापैः ॥
yathaikagehājjātavedāḥ pradīptaḥ | kṛtsnaṃ grāmaṃ dahate ca tvarāvān | vimohanaṃ kurute deva eṣa | tataḥ sarvaṃ spṛśyate puṇyapāpaiḥ
जैसे एक घर में जली आग तेजी से फैलकर पूरे गाँव को जला देती है, वैसे ही यह देव मोह उत्पन्न करता है, और तब सब कुछ पुण्य और पाप से छू जाता है।
ऐल उवाच
श्लोक 60 (12.73.60)
यदि दण्डः स्पृशतेऽपुण्यपापं । पापं पापे क्रियमाणे विशेषात् । कस्य हेतोः सुकृतं नाम कुर्या । द्दुष्कृतं वा कस्य हेतोर्न कुर्यात् ॥
yadi daṇḍaḥ spṛśate'puṇyapāpaṃ | pāpaṃ pāpe kriyamāṇe viśeṣāt | kasya hetoḥ sukṛtaṃ nāma kuryā | dduṣkṛtaṃ vā kasya hetorna kuryāt
यदि पाप होने के कारण दण्ड उस पर भी पड़े जिसमें न पुण्य है, न पाप, तो कोई किस कारण से सत्कर्म करे, और किस कारण से दुष्कर्म न करे?
कश्यप उवाच
श्लोक 61 (12.73.61)
असंत्यागात्पापकृतामपापां । स्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात् । शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावा । न्न मिश्रः स्यात्पापकृद्भिः कथंचित् ॥
asaṃtyāgātpāpakṛtāmapāpāṃ | stulyo daṇḍaḥ spṛśate miśrabhāvāt | śuṣkeṇārdraṃ dahyate miśrabhāvā | nna miśraḥ syātpāpakṛdbhiḥ kathaṃcit
निष्पाप लोग पापियों को छोड़ते नहीं, इसलिए मेल के कारण वही दण्ड उन्हें भी छूता है; सूखे के साथ मिलने से गीला भी जल जाता है। इसलिए पापियों के साथ कभी न मिले।
ऐल उवाच
श्लोक 62 (12.73.62)
साध्वसाधून्धारयतीह भूमिः । साध्वसाधूंस्तापयतीह सूर्यः । साध्वसाधूंश्चापि वातीह वायु । रापस्तथा साध्वसाधून्वहन्ति ॥
sādhvasādhūndhārayatīha bhūmiḥ | sādhvasādhūṃstāpayatīha sūryaḥ | sādhvasādhūṃścāpi vātīha vāyu | rāpastathā sādhvasādhūnvahanti
यहाँ पृथ्वी सज्जनों और दुर्जनों दोनों को धारण करती है; सूर्य दोनों को तपाता है; वायु दोनों पर बहती है; और जल भी दोनों को बहा ले जाता है।
कश्यप उवाच
श्लोक 63 (12.73.63)
एवमस्मिन्वर्तते लोक एष । नामुत्रैवं वर्तते राजपुत्र । प्रेत्यैतयोरन्तरावान्विशेषो । यो वै पुण्यं चरते यश्च पापम् ॥
evamasminvartate loka eṣa | nāmutraivaṃ vartate rājaputra | pretyaitayorantarāvānviśeṣo | yo vai puṇyaṃ carate yaśca pāpam
राजपुत्र, इस लोक में ऐसा ही चलता है, परलोक में ऐसा नहीं होता। मरने के बाद पुण्य करने वाले और पाप करने वाले में बहुत बड़ा अन्तर हो जाता है।
श्लोक 64 (12.73.64)
पुण्यस्य लोको मधुमान्घृतार्चि । र्हिरण्यज्योतिरमृतस्य नाभिः । तत्र प्रेत्य मोदते ब्रह्मचारी । न तत्र मृत्युर्न जरा नोत दुःखम् ॥
puṇyasya loko madhumānghṛtārci | rhiraṇyajyotiramṛtasya nābhiḥ | tatra pretya modate brahmacārī | na tatra mṛtyurna jarā nota duḥkham
पुण्य का लोक मधुर है, घी की ज्योति से दीप्त है, स्वर्ण-प्रकाश से चमकता है, अमृत की नाभि है। वहाँ ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला मरकर आनन्द करता है; वहाँ न मृत्यु है, न बुढ़ापा, न दुःख।
श्लोक 65 (12.73.65)
पापस्य लोको निरयोऽप्रकाशो । नित्यं दुःखं शोकभूयिष्ठमेव । तत्रात्मानं शोचति पापकर्मा । बह्वीः समाः प्रतपन्नप्रतिष्ठः ॥
pāpasya loko nirayo'prakāśo | nityaṃ duḥkhaṃ śokabhūyiṣṭhameva | tatrātmānaṃ śocati pāpakarmā | bahvīḥ samāḥ pratapannapratiṣṭhaḥ
पापी का लोक नरक है, प्रकाशहीन, सदा दुःखमय और शोक से भरा। वहाँ पापकर्मा बहुत वर्षों तक अपने लिए शोक करता है, तपता हुआ और बिना किसी आधार के।
श्लोक 66 (12.73.66)
मिथोभेदाद्ब्राह्मणक्षत्रियाणां । प्रजा दुःखं दुःसहं चाविशन्ति । एवं ज्ञात्वा कार्य एवेह विद्वान् । पुरोहितो नैकविद्यो नृपेण ॥
mithobhedādbrāhmaṇakṣatriyāṇāṃ | prajā duḥkhaṃ duḥsahaṃ cāviśanti | evaṃ jñātvā kārya eveha vidvān | purohito naikavidyo nṛpeṇa
ब्राह्मणों और क्षत्रियों के आपसी भेद से प्रजा असह्य दुःख में पड़ती है। यह जानकर राजा को अनेक विद्याओं के ज्ञाता विद्वान् पुरोहित को नियुक्त करना चाहिए।
श्लोक 67 (12.73.67)
तं चैव लब्ध्वाभिषिञ्चेत्तथा धर्मो विधीयते । अग्रं हि ब्राह्मणः प्रोक्तं सर्वस्यैवेह धर्मतः ॥
taṃ caiva labdhvābhiṣiñcettathā dharmo vidhīyate | agraṃ hi brāhmaṇaḥ proktaṃ sarvasyaiveha dharmataḥ
और ऐसे पुरोहित को पाकर राजा अपना अभिषेक कराए; क्योंकि इसी प्रकार धर्म का विधान है। धर्म के अनुसार यहाँ ब्राह्मण ही सबमें अग्र कहा गया है।
श्लोक 68 (12.73.68)
पूर्वं हि ब्रह्मणः सृष्टिरिति ब्रह्मविदो विदुः । ज्येष्ठेनाभिजनेनास्य प्राप्तं पूर्वं यदुत्तमम् ॥
pūrvaṃ hi brahmaṇaḥ sṛṣṭiriti brahmavido viduḥ | jyeṣṭhenābhijanenāsya prāptaṃ pūrvaṃ yaduttamam
ब्रह्म को जानने वाले कहते हैं कि सबसे पहले ब्राह्मणों की सृष्टि हुई; ज्येष्ठता और उत्तम जन्म के कारण जो कुछ सर्वोत्तम है, वह पहले उसी को प्राप्त हुआ।
श्लोक 69 (12.73.69)
तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च ब्राह्मणः प्रसृताग्रभुक् । सर्वं श्रेष्ठं विशिष्टं च निवेद्यं तस्य धीमतः ॥
tasmānmānyaśca pūjyaśca brāhmaṇaḥ prasṛtāgrabhuk | sarvaṃ śreṣṭhaṃ viśiṣṭaṃ ca nivedyaṃ tasya dhīmataḥ
इसलिए अग्र भाग ग्रहण करने वाला ब्राह्मण मान्य और पूज्य है; जो कुछ श्रेष्ठ और उत्तम है, वह उस बुद्धिमान् को अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 70 (12.73.70)
अवश्यमेतत्कर्तव्यं राज्ञा बलवताऽपि हि । ब्रह्म वर्धयति क्षत्रं क्षत्रतो ब्रह्म वर्धते । राज्ञः सर्वस्य चान्यस्य स्वामी राज्ञः पुरोहितः ॥
avaśyametatkartavyaṃ rājñā balavatā'pi hi | brahma vardhayati kṣatraṃ kṣatrato brahma vardhate | rājñaḥ sarvasya cānyasya svāmī rājñaḥ purohitaḥ
राजा को, चाहे वह बलवान् ही क्यों न हो, यह अवश्य करना चाहिए: ब्राह्मण क्षत्रिय को बढ़ाता है और क्षत्रिय से ब्राह्मण बढ़ता है। राजा का पुरोहित राजा का और अन्य सबका स्वामी है।