शान्ति पर्व · अध्याय 72
ब्राह्मण और पृथ्वी: पुरूरवा और वायु का संवाद
युधिष्ठिर पूछते हैं कि राजा को कैसा ब्राह्मण अपना सलाहकार बनाना चाहिए; भीष्म उत्तर में इला के पुत्र पुरूरवा और वायु (मातरिश्वा) का एक प्राचीन संवाद सुनाते हैं। वायु चारों वर्णों की उत्पत्ति बताते हैं, कहते हैं कि जन्म और ज्येष्ठता के कारण सारा जगत् ब्राह्मण का है, और राजा को चाहिए कि जीती हुई भूमि किसी विद्वान्, निर्लोभ ब्राह्मण को दे, जो उसका मार्गदर्शन करे। अध्याय के अन्त में राजा को रक्षक बताया गया है, जिस पर देवता, पितर और सब प्राणी निर्भर हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.72.1)
कीदृशो ब्राह्मणो राजा कार्याकार्यविचारणे । क्षमः कर्तुं समर्थो वा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kīdṛśo brāhmaṇo rājā kāryākāryavicāraṇe | kṣamaḥ kartuṃ samartho vā tanme brūhi pitāmaha
पितामह, राजा के लिए कैसा ब्राह्मण करणीय और अकरणीय का विचार करने में समर्थ और योग्य होता है? यह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.72.2)
य एव तु सतो रक्षेदसतश्च निवर्तयेत् । स एव राज्ञा कर्तव्यो राजन्राजपुरोहितः ॥
ya eva tu sato rakṣedasataśca nivartayet | sa eva rājñā kartavyo rājanrājapurohitaḥ
राजन्, जो सज्जनों की रक्षा करे और दुष्टों को दूर हटाए, राजा को उसी को अपना पुरोहित बनाना चाहिए।
श्लोक 3 (12.72.3)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । पुरूरवस ऐलस्य संवादं मातरिश्वना ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | purūravasa ailasya saṃvādaṃ mātariśvanā
इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं: इला के पुत्र पुरूरवा और मातरिश्वा (वायु) का संवाद।
पुरूरवा उवाच
श्लोक 4 (12.72.4)
कुतः स्विद्ब्राह्मणो जातो वर्णाश्चापि कुतस्त्रयः । कस्माच्च भवति श्रेयांस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
kutaḥ svidbrāhmaṇo jāto varṇāścāpi kutastrayaḥ | kasmācca bhavati śreyāṃstanme vyākhyātumarhasi
ब्राह्मण कहाँ से उत्पन्न हुआ, और अन्य तीन वर्ण कहाँ से? और वह किस कारण श्रेष्ठ होता है? कृपा करके मुझे यह समझाइए।
मातरिश्वोवाच
श्लोक 5 (12.72.5)
ब्राह्मणो मुखतः सृष्टो ब्रह्मणो राजसत्तम । बाहुभ्यां क्षत्रियः सृष्ट ऊरुभ्यां वैश्य एव च ॥
brāhmaṇo mukhataḥ sṛṣṭo brahmaṇo rājasattama | bāhubhyāṃ kṣatriyaḥ sṛṣṭa ūrubhyāṃ vaiśya eva ca
हे राजाओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से रचा गया, क्षत्रिय भुजाओं से रचा गया, और वैश्य जंघाओं से।
श्लोक 6 (12.72.6)
वर्णानां परिचर्यार्थं त्रयाणां भरतर्षभ । वर्णश्चतुर्थः पश्चात्तु पद्भ्यां शूद्रो विनिर्मितः ॥
varṇānāṃ paricaryārthaṃ trayāṇāṃ bharatarṣabha | varṇaścaturthaḥ paścāttu padbhyāṃ śūdro vinirmitaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, तीनों वर्णों की सेवा के लिए बाद में चौथा वर्ण शूद्र उनके चरणों से बनाया गया।
श्लोक 7 (12.72.7)
ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यामनुजायते । ईश्वरः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये ॥
brāhmaṇo jāyamāno hi pṛthivyāmanujāyate | īśvaraḥ sarvabhūtānāṃ dharmakośasya guptaye
ब्राह्मण जन्म लेते ही पृथ्वी पर सब प्राणियों के स्वामी के रूप में उत्पन्न होता है, धर्म के कोश की रक्षा के लिए।
श्लोक 8 (12.72.8)
सर्वस्वं ब्राह्मणस्येदं यत्किंचिदिह दृश्यते । धर्मयुक्तं प्रशस्तं च जगत्यस्मिन्नृपात्मज ॥
sarvasvaṃ brāhmaṇasyedaṃ yatkiṃcidiha dṛśyate | dharmayuktaṃ praśastaṃ ca jagatyasminnṛpātmaja
यहाँ जो कुछ दिखाई देता है, वह सब ब्राह्मण का है; इस जगत् में जो कुछ धर्मयुक्त और श्रेष्ठ है, हे राजकुमार, वह भी।
श्लोक 9 (12.72.9)
ततः पृथिव्या यन्तारं क्षत्रियं दण्डधारणे । द्वितीयं वर्णमकरोत्प्रजानामनुगुप्तये ॥
tataḥ pṛthivyā yantāraṃ kṣatriyaṃ daṇḍadhāraṇe | dvitīyaṃ varṇamakarotprajānāmanuguptaye
तब दण्ड धारण करके पृथ्वी को नियन्त्रण में रखने के लिए, प्रजा की रक्षा के निमित्त, उसने क्षत्रिय को दूसरा वर्ण बनाया।
श्लोक 10 (12.72.10)
वैश्यस्तु धनधान्येन त्रीन्वर्णान्बिभृयादिमान् । शूद्रो ह्येतान्परिचरेदिति ब्रह्मानुशासनम् ॥
vaiśyastu dhanadhānyena trīnvarṇānbibhṛyādimān | śūdro hyetānparicarediti brahmānuśāsanam
वैश्य धन-धान्य से इन तीनों वर्णों का भरण करे और शूद्र इनकी सेवा करे: यही ब्रह्मा का आदेश है।
ऐल उवाच
श्लोक 11 (12.72.11)
द्विजस्य क्षत्रबन्धोर्वा कस्येयं पृथिवी भवेत् । धर्मतः सह वित्तेन सम्यग्वायो प्रचक्ष्व मे ॥
dvijasya kṣatrabandhorvā kasyeyaṃ pṛthivī bhavet | dharmataḥ saha vittena samyagvāyo pracakṣva me
वायु, धर्म के अनुसार धन-सहित यह पृथ्वी किसकी है, ब्राह्मण की या क्षत्रिय की? यह मुझे ठीक-ठीक बताइए।
वायुरुवाच
श्लोक 12 (12.72.12)
विप्रस्य सर्वमेवैतद्यत्किंचिज्जगतीगतम् । धनं धान्यं हिरण्यं च स्त्रियो रत्नानि वाहनम् ॥
viprasya sarvamevaitadyatkiṃcijjagatīgatam | dhanaṃ dhānyaṃ hiraṇyaṃ ca striyo ratnāni vāhanam
पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह सब ब्राह्मण का है: धन, अन्न, सोना, स्त्रियाँ, रत्न और वाहन।
श्लोक 13 (12.72.13)
मङ्गलं च प्रशस्तं च यच्चान्यदपि विद्यते । ज्येष्ठेनाभिजनेनेह तद्धर्मकुशला विदुः ॥
maṅgalaṃ ca praśastaṃ ca yaccānyadapi vidyate | jyeṣṭhenābhijaneneha taddharmakuśalā viduḥ
जो कुछ मंगलमय और श्रेष्ठ है, और जो कुछ और भी है, उसे धर्म में कुशल लोग ज्येष्ठता और उत्तम जन्म के कारण ब्राह्मण का ही मानते हैं।
श्लोक 14 (12.72.14)
स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च । गुरुर्हि सर्ववर्णानां ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च वै द्विजः ॥
svameva brāhmaṇo bhuṅkte svaṃ vaste svaṃ dadāti ca | gururhi sarvavarṇānāṃ jyeṣṭhaḥ śreṣṭhaśca vai dvijaḥ
ब्राह्मण अपना ही खाता है, अपना ही पहनता है और अपना ही देता है। वह द्विज सब वर्णों का गुरु, ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है।
श्लोक 15 (12.72.15)
पत्यभावे यथैव स्त्री देवरं कुरुते पतिम् । आनन्तर्यात्तथा क्षत्रं पृथिवी कुरुते पतिम् । एष ते प्रथमः कल्प आपद्यन्यो भवेदतः ॥
patyabhāve yathaiva strī devaraṃ kurute patim | ānantaryāttathā kṣatraṃ pṛthivī kurute patim | eṣa te prathamaḥ kalpa āpadyanyo bhavedataḥ
जैसे पति के न रहने पर स्त्री देवर को पति बना लेती है, वैसे ही क्रम में अगला होने के कारण पृथ्वी क्षत्रिय को पति बनाती है। यह तुम्हारे लिए पहला विधान है; आपत्ति में इसके बाद दूसरा विधान लागू होता है।
श्लोक 16 (12.72.16)
यदि स्वर्गे परं स्थानं धर्मतः परिमार्गसि । यत्किंचिज्जयसे भूमिं ब्राह्मणाय निवेदय ॥
yadi svarge paraṃ sthānaṃ dharmataḥ parimārgasi | yatkiṃcijjayase bhūmiṃ brāhmaṇāya nivedaya
यदि तुम धर्म के द्वारा स्वर्ग में सर्वोच्च स्थान चाहते हो, तो जो भी भूमि तुम जीतो, उसे किसी ब्राह्मण को अर्पित कर दो,
श्लोक 17 (12.72.17)
श्रुतवृत्तोपपन्नाय धर्मज्ञाय तपस्विने । स्वधर्मपरितृप्ताय यो न वित्तपरो भवेत् ॥
śrutavṛttopapannāya dharmajñāya tapasvine | svadharmaparitṛptāya yo na vittaparo bhavet
ऐसे ब्राह्मण को जो शास्त्रज्ञ और सदाचारी हो, धर्म को जानता हो और तपस्वी हो, अपने धर्म में सन्तुष्ट हो और धन के पीछे न दौड़ता हो,
श्लोक 18 (12.72.18)
यो राजानं नयेद्बुद्ध्या सर्वतः परिपूर्णया । ब्राह्मणो हि कुले जातः कृतप्रज्ञो विनीतवान् ॥
yo rājānaṃ nayedbuddhyā sarvataḥ paripūrṇayā | brāhmaṇo hi kule jātaḥ kṛtaprajño vinītavān
जो सब ओर से परिपूर्ण बुद्धि द्वारा राजा का मार्गदर्शन करे — अच्छे कुल में उत्पन्न, सुशिक्षित बुद्धि वाला और विनीत वाणी बोलने वाला ब्राह्मण।
श्लोक 19 (12.72.19)
श्रेयो नयति राजानं ब्रुवंश्चित्रां सरस्वतीम् । राजा चरति यं धर्मं ब्राह्मणेन निदर्शितम् ॥
śreyo nayati rājānaṃ bruvaṃścitrāṃ sarasvatīm | rājā carati yaṃ dharmaṃ brāhmaṇena nidarśitam
ऐसा ब्राह्मण विविध और सुन्दर वाणी बोलकर राजा को कल्याण के मार्ग पर ले जाता है। ब्राह्मण के दिखाए जिस धर्म का राजा आचरण करता है,
श्लोक 20 (12.72.20)
शुश्रूषुरनहंवादी क्षत्रधर्मव्रते स्थितः । तावता सत्कृतः प्राज्ञश्चिरं यशसि तिष्ठति ॥
śuśrūṣuranahaṃvādī kṣatradharmavrate sthitaḥ | tāvatā satkṛtaḥ prājñaściraṃ yaśasi tiṣṭhati
उसमें आज्ञाकारी, अहंकाररहित और क्षत्रिय-धर्म के व्रत में स्थिर रहकर, उतने से ही वह सम्मानित होता है, और ऐसा बुद्धिमान् राजा चिरकाल तक यश में प्रतिष्ठित रहता है।
श्लोक 21 (12.72.21)
तस्य धर्मस्य सर्वस्य भागी राजपुरोहितः । एवमेव प्रजाः सर्वा राजानमभिसंश्रिताः ॥
tasya dharmasya sarvasya bhāgī rājapurohitaḥ | evameva prajāḥ sarvā rājānamabhisaṃśritāḥ
उस सारे धर्म में राजा के पुरोहित का भी भाग होता है। इसी प्रकार सारी प्रजा राजा की शरण में आई हुई है,
श्लोक 22 (12.72.22)
ब्राह्मणं च सुविद्वांसं राजशास्त्रविपश्चितम् । सम्यग्वृत्ताः स्वधर्मस्था न कुतश्चिद्भयान्विताः ॥
brāhmaṇaṃ ca suvidvāṃsaṃ rājaśāstravipaścitam | samyagvṛttāḥ svadharmasthā na kutaścidbhayānvitāḥ
और ऐसे ब्राह्मण की, जो अत्यन्त विद्वान् और राजशास्त्र में निपुण है; सदाचार से रहती और अपने धर्म में स्थित वह प्रजा किसी ओर से भी भयभीत नहीं होती।
श्लोक 23 (12.72.23)
राष्ट्रे चरन्ति यं धर्मं राज्ञा साध्वभिरक्षिताः । चतुर्थं तस्य धर्मस्य राजा भागं तु विन्दति ॥
rāṣṭre caranti yaṃ dharmaṃ rājñā sādhvabhirakṣitāḥ | caturthaṃ tasya dharmasya rājā bhāgaṃ tu vindati
राजा से भली-भाँति रक्षित प्रजा राष्ट्र में जो धर्म करती है, उस धर्म का चौथा भाग राजा को मिलता है।
श्लोक 24 (12.72.24)
देवा मनुष्याः पितरो गन्धर्वोरगराक्षसाः । यज्ञमेवोपजीवन्ति नास्ति यष्टा ह्यराजके ॥
devā manuṣyāḥ pitaro gandharvoragarākṣasāḥ | yajñamevopajīvanti nāsti yaṣṭā hyarājake
देवता, मनुष्य, पितर, गन्धर्व, नाग और राक्षस, सब यज्ञ पर ही जीते हैं; और जहाँ राजा नहीं, वहाँ यज्ञ करने वाला कोई नहीं।
श्लोक 25 (12.72.25)
इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा । राजन्येवास्य धर्मस्य योगक्षेमः प्रतिष्ठितः ॥
ito dattena jīvanti devatāḥ pitarastathā | rājanyevāsya dharmasya yogakṣemaḥ pratiṣṭhitaḥ
देवता और पितर यहाँ से दिए गए अन्न-हविष्य पर जीते हैं, और इस धर्म का योगक्षेम राजा पर ही टिका है।
श्लोक 26 (12.72.26)
छायायामप्सु वायौ च सुखमुष्णेऽधिगच्छति । अग्नौ वाससि सूर्ये च सुखं शीतेऽधिगच्छति । शब्दे स्पर्शे रसे रूपे गन्धे च रमते मनः ॥
chāyāyāmapsu vāyau ca sukhamuṣṇe'dhigacchati | agnau vāsasi sūrye ca sukhaṃ śīte'dhigacchati | śabde sparśe rase rūpe gandhe ca ramate manaḥ
गर्मी में छाया, जल और हवा में सुख मिलता है; सर्दी में अग्नि, वस्त्र और सूर्य में सुख मिलता है; और मन शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्ध में रमता है।
श्लोक 27 (12.72.27)
तेषु भोगेषु सर्वेषु न भीतो लभते सुखम् । अभयस्य हि यो दाता तस्यैव सुमहत्फलम् ॥
teṣu bhogeṣu sarveṣu na bhīto labhate sukham | abhayasya hi yo dātā tasyaiva sumahatphalam
फिर भी इन सब भोगों के बीच भयभीत मनुष्य को सुख नहीं मिलता। जो अभय देता है, उसे बहुत बड़ा फल मिलता है।
श्लोक 28 (12.72.28)
न हि प्राणसमं दानं त्रिषु लोकेषु विद्यते । इन्द्रो राजा यमो राजा धर्मो राजा तथैव च । राजा बिभर्ति भूतानि राज्ञा सर्वमिदं धृतम् ॥
na hi prāṇasamaṃ dānaṃ triṣu lokeṣu vidyate | indro rājā yamo rājā dharmo rājā tathaiva ca | rājā bibharti bhūtāni rājñā sarvamidaṃ dhṛtam
तीनों लोकों में प्राणदान के समान कोई दान नहीं है। राजा इन्द्र है, राजा यम है, और इसी प्रकार राजा धर्म है; राजा प्राणियों को धारण करता है, और राजा से ही यह सब थमा हुआ है।