शान्ति पर्व · अध्याय 71
बन्धन में पड़े बिना राजा द्वारा प्रजा का पालन
युधिष्ठिर पूछते हैं कि राजा चिन्ता के बन्धन में पड़े बिना और धर्म के विरुद्ध अपराध किए बिना प्रजा की रक्षा कैसे करे। भीष्म उन्हें विद्वान् ब्राह्मणों का सम्मान करने, काम-क्रोध को त्यागने, ईमानदार और योग्य अधिकारी रखने और केवल धर्मसम्मत उपायों से कर लेने का उपदेश देते हैं; वे राज्य की तुलना दुधारू गाय से करते हैं जिसे दुहना चाहिए, काटना नहीं। प्रजा की रक्षा ही परम धर्म है, और रक्षा करने वाला राजा स्वर्ग पाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.71.1)
कथं राजा प्रजा रक्षन्नाधिबन्धेन युज्यते । धर्मे च नापराध्नोति तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kathaṃ rājā prajā rakṣannādhibandhena yujyate | dharme ca nāparādhnoti tanme brūhi pitāmaha
पितामह, मुझे बताइए कि प्रजा की रक्षा करता हुआ राजा चिन्ता के बन्धन में कैसे नहीं पड़ता, और धर्म के विषय में कोई अपराध भी नहीं करता।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.71.2)
समासेनैव ते राजन्धर्मान्वक्ष्यामि शाश्वतान् । विस्तरेणैव धर्माणां न जात्वन्तमवाप्नुयात् ॥
samāsenaiva te rājandharmānvakṣyāmi śāśvatān | vistareṇaiva dharmāṇāṃ na jātvantamavāpnuyāt
राजन्, मैं तुम्हें संक्षेप में ही सनातन धर्म बताऊँगा; विस्तार से कहने पर तो कोई धर्मों का अन्त कभी पा ही नहीं सकता।
श्लोक 3 (12.71.3)
धर्मनिष्ठाञ्श्रुतवतो देवव्रतसमाहितान् । अर्चितान्वासयेथास्त्वं गृहे गुणवतो द्विजान् ॥
dharmaniṣṭhāñśrutavato devavratasamāhitān | arcitānvāsayethāstvaṃ gṛhe guṇavato dvijān
धर्म में दृढ़, शास्त्रज्ञ, देवव्रतों में स्थिर और गुणवान् ब्राह्मणों का सत्कार करके उन्हें अपने घर में बसाओ।
श्लोक 4 (12.71.4)
प्रत्युत्थायोपसंगृह्य चरणावभिवाद्य च । अथ सर्वाणि कुर्वीथाः कार्याणि सपुरोहितः ॥
pratyutthāyopasaṃgṛhya caraṇāvabhivādya ca | atha sarvāṇi kurvīthāḥ kāryāṇi sapurohitaḥ
उठकर उनका स्वागत करो, उनके चरण छूकर प्रणाम करो; इसके बाद ही अपने पुरोहित के साथ सब कार्य करो।
श्लोक 5 (12.71.5)
धर्मकार्याणि निर्वर्त्य मङ्गलानि प्रयुज्य च । ब्राह्मणान्वाचयेथास्त्वमर्थसिद्धिजयाशिषः ॥
dharmakāryāṇi nirvartya maṅgalāni prayujya ca | brāhmaṇānvācayethāstvamarthasiddhijayāśiṣaḥ
धर्मकार्य पूरे करके और मंगल-विधान करके, ब्राह्मणों से अपने कार्य की सिद्धि और विजय के आशीर्वाद बुलवाओ।
श्लोक 6 (12.71.6)
आर्जवेन च संपन्नो धृत्या बुद्ध्या च भारत । धर्मार्थौ प्रतिगृह्णीयात्कामक्रोधौ च वर्जयेत् ॥
ārjavena ca saṃpanno dhṛtyā buddhyā ca bhārata | dharmārthau pratigṛhṇīyātkāmakrodhau ca varjayet
हे भारत, सरलता, धैर्य और बुद्धि से युक्त होकर धर्म और अर्थ को अपनाओ तथा काम और क्रोध को त्याग दो।
श्लोक 7 (12.71.7)
कामक्रोधौ पुरस्कृत्य योऽर्थं राजाऽनुतिष्ठति । न स धर्मं न चाप्यर्थं प्रतिगृह्णाति बालिशः ॥
kāmakrodhau puraskṛtya yo'rthaṃ rājā'nutiṣṭhati | na sa dharmaṃ na cāpyarthaṃ pratigṛhṇāti bāliśaḥ
जो मूर्ख राजा काम और क्रोध को आगे रखकर अपने प्रयोजन साधता है, वह न धर्म पाता है, न अर्थ।
श्लोक 8 (12.71.8)
मा स्म लुब्धांश्च मूर्खांश्च कामार्थे च प्रयूयुजः । अलुब्धान्बुद्धिसंपन्नान्सर्वकर्मसु योजयेत् ॥
mā sma lubdhāṃśca mūrkhāṃśca kāmārthe ca prayūyujaḥ | alubdhānbuddhisaṃpannānsarvakarmasu yojayet
लोभियों और मूर्खों को कभी काम और अर्थ के कार्यों में मत लगाओ; जो लोभरहित और बुद्धिमान् हों, उन्हें ही सब कामों में नियुक्त करो।
श्लोक 9 (12.71.9)
मूर्खो ह्यधिकृतोऽर्थेषु कार्याणामविशारदः । प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन कामक्रोधसमन्वितः ॥
mūrkho hyadhikṛto'rtheṣu kāryāṇāmaviśāradaḥ | prajāḥ kliśnātyayogena kāmakrodhasamanvitaḥ
काम और क्रोध से भरा हुआ अनाड़ी मूर्ख अधिकारी, जो कार्यों में कुशल नहीं है, कुप्रबन्ध से प्रजा को कष्ट देता है।
श्लोक 10 (12.71.10)
बलिषष्ठेन शुल्केन दण्डेनाथापराधिनाम् । शास्त्रानीतेन लिप्सेथा वेतनेन धनागमम् ॥
baliṣaṣṭhena śulkena daṇḍenāthāparādhinām | śāstrānītena lipsethā vetanena dhanāgamam
शास्त्र के अनुसार धन प्राप्त करो: छठे भाग के कर से, शुल्क से, अपराधियों पर लगाए दण्ड से और सेवा-शुल्क से।
श्लोक 11 (12.71.11)
दापयित्वा करं धर्म्यं राष्ट्रं नीत्या यथाविधि । तथैतं कल्पयेद्राजा योगक्षेममतन्द्रितः ॥
dāpayitvā karaṃ dharmyaṃ rāṣṭraṃ nītyā yathāvidhi | tathaitaṃ kalpayedrājā yogakṣemamatandritaḥ
नीति से और विधि के अनुसार राष्ट्र से धर्मसम्मत कर दिलवाकर, राजा आलस्य छोड़कर उसी प्रकार उसके योगक्षेम, अर्थात् जीविका और सुरक्षा का प्रबन्ध करे।
श्लोक 12 (12.71.12)
गोपायितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम् । अकामद्वेषसंयुक्तमनुरज्यन्ति मानवाः ॥
gopāyitāraṃ dātāraṃ dharmanityamatandritam | akāmadveṣasaṃyuktamanurajyanti mānavāḥ
जो राजा रक्षा करता और दान देता है, सदा धर्म में लगा रहता और आलस्यरहित है तथा राग-द्वेष से मुक्त है, उससे प्रजा प्रेम करती है।
श्लोक 13 (12.71.13)
तस्माद्धर्मेण लाभेन लिप्सेथास्त्वं धनागमम् । धर्मार्थावध्रुवौ तस्य यो न शास्त्रपरो भवेत् ॥
tasmāddharmeṇa lābhena lipsethāstvaṃ dhanāgamam | dharmārthāvadhruvau tasya yo na śāstraparo bhavet
इसलिए धर्मसम्मत लाभ से ही धन प्राप्त करने का प्रयत्न करो। जो राजा शास्त्र में तत्पर नहीं रहता, उसके धर्म और अर्थ दोनों अस्थिर होते हैं।
श्लोक 14 (12.71.14)
अपशास्त्रधनो राजा संचयं नाधिगच्छति । अस्थाने चास्य तद्वित्तं सर्वमेव विनश्यति ॥
apaśāstradhano rājā saṃcayaṃ nādhigacchati | asthāne cāsya tadvittaṃ sarvameva vinaśyati
जो राजा शास्त्र के विरुद्ध धन जुटाता है, उसके पास संचय नहीं टिकता; अनुचित स्थान पर लगकर वह सारा धन नष्ट हो जाता है।
श्लोक 15 (12.71.15)
अर्थमूलोऽपि हिंसां च कुरुते स्वयमात्मनः । करैरशास्त्रदृष्टैर्हि मोहात्संपीडयन्प्रजाः ॥
arthamūlo'pi hiṃsāṃ ca kurute svayamātmanaḥ | karairaśāstradṛṣṭairhi mohātsaṃpīḍayanprajāḥ
जो राजा मोह से शास्त्र-विरुद्ध करों द्वारा प्रजा को पीड़ा देता है, वह अर्थ को मूल मानता हुआ भी स्वयं अपनी ही हानि करता है।
श्लोक 16 (12.71.16)
ऊधश्छिन्द्यात्तु यो धेन्वाः क्षीरार्थी न लभेत्पयः । एवं राष्ट्रमयोगेन पीडितं न विवर्धते ॥
ūdhaśchindyāttu yo dhenvāḥ kṣīrārthī na labhetpayaḥ | evaṃ rāṣṭramayogena pīḍitaṃ na vivardhate
जो दूध चाहने वाला गाय के थन काट डालता है, उसे दूध नहीं मिलता; इसी प्रकार कुनीति से पीड़ित राष्ट्र नहीं बढ़ता।
श्लोक 17 (12.71.17)
यवसोदकमादाय सान्त्वेन विनयेन च । यो हि दोग्ध्रीमुपास्ते च स नित्यं विन्दते पयः । एवं राष्ट्रमुपायेन भुञ्जानो लभते फलम् ॥
yavasodakamādāya sāntvena vinayena ca | yo hi dogdhrīmupāste ca sa nityaṃ vindate payaḥ | evaṃ rāṣṭramupāyena bhuñjāno labhate phalam
चारा और पानी देकर, मधुर वचन और विनय के साथ, जो दुधारू गाय की सेवा करता है, उसे सदा दूध मिलता है। इसी प्रकार उचित उपाय से राष्ट्र का उपभोग करने वाले को उसका फल मिलता है।
श्लोक 18 (12.71.18)
अथ राष्ट्रमुपायेन भुज्यमानं सुरक्षितम् । जनयत्यतुलां नित्यं कोशवृद्धिं युधिष्ठिर ॥
atha rāṣṭramupāyena bhujyamānaṃ surakṣitam | janayatyatulāṃ nityaṃ kośavṛddhiṃ yudhiṣṭhira
युधिष्ठिर, उचित उपाय से भोगा जाता और भली-भाँति रक्षित राष्ट्र खजाने की अनुपम वृद्धि सदा करता रहता है।
श्लोक 19 (12.71.19)
दोग्ध्री धान्यं हिरण्यं च मही राजा सुरक्षिता । नित्यं स्वेभ्यः परेभ्यश्च तृप्ता माता यथा पयः ॥
dogdhrī dhānyaṃ hiraṇyaṃ ca mahī rājā surakṣitā | nityaṃ svebhyaḥ parebhyaśca tṛptā mātā yathā payaḥ
भली-भाँति रक्षित पृथ्वी राजा के लिए दुधारू गाय है, जो अन्न और सोना देती है; सन्तुष्ट माता की तरह वह अपनों को भी और परायों को भी सदा दूध देती है।
श्लोक 20 (12.71.20)
मालाकारोपमो राजन्भव माऽऽङ्गारिकोपमः । तथायुक्तश्चिरं राज्यं भोक्तुं शक्ष्यसि पालयन् ॥
mālākāropamo rājanbhava mā''ṅgārikopamaḥ | tathāyuktaściraṃ rājyaṃ bhoktuṃ śakṣyasi pālayan
राजन्, माली के समान बनो, कोयला बनाने वाले के समान नहीं। ऐसा करते हुए तुम रक्षा करते हुए चिरकाल तक राज्य का भोग कर सकोगे।
श्लोक 21 (12.71.21)
परचक्राभियानेन यदि ते स्याद्धनक्षयः । अथ साम्नैव लिप्सेथा धनमब्राह्मणेषु यत् ॥
paracakrābhiyānena yadi te syāddhanakṣayaḥ | atha sāmnaiva lipsethā dhanamabrāhmaṇeṣu yat
यदि शत्रु के आक्रमण से तुम्हारा धन घट जाए, तो जो धन ब्राह्मणों से भिन्न लोगों के पास है, उसे केवल साम (मधुर उपाय) से प्राप्त करो।
श्लोक 22 (12.71.22)
मा स्म ते ब्राह्मणं दृष्ट्वा धनस्थं प्रचलेन्मनः । अन्त्यायामप्यवस्थायां किमु स्फीतस्य भारत ॥
mā sma te brāhmaṇaṃ dṛṣṭvā dhanasthaṃ pracalenmanaḥ | antyāyāmapyavasthāyāṃ kimu sphītasya bhārata
हे भारत, किसी धनवान् ब्राह्मण को देखकर तुम्हारा मन कभी विचलित न हो, अन्तिम संकट की दशा में भी नहीं, फिर समृद्धि में तो कहना ही क्या।
श्लोक 23 (12.71.23)
धनानि तेभ्यो दद्यास्त्वं यथाशक्ति यथार्हतः । सान्त्वयन्परिरक्षंश्च स्वर्गमाप्स्यसि दुर्जयम् ॥
dhanāni tebhyo dadyāstvaṃ yathāśakti yathārhataḥ | sāntvayanparirakṣaṃśca svargamāpsyasi durjayam
अपनी शक्ति और उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें धन दो; उन्हें सान्त्वना देते और उनकी रक्षा करते हुए तुम दुर्जय स्वर्ग को पाओगे।
श्लोक 24 (12.71.24)
एवं धर्म्येण वृत्तेन प्रजास्त्वं परिपालय । स्वर्ग्यं पुण्यं यशो नित्यं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ॥
evaṃ dharmyeṇa vṛttena prajāstvaṃ paripālaya | svargyaṃ puṇyaṃ yaśo nityaṃ prāpsyase kurunandana
हे कुरुनन्दन, इस प्रकार धर्ममय आचरण से प्रजा का पालन करो; तुम्हें स्वर्ग देने वाला, पुण्यमय और सदा रहने वाला यश मिलेगा।
श्लोक 25 (12.71.25)
धर्मेण व्यवहारेण प्रजाः पालय पाण्डव । युधिष्ठिर यथायुक्तो नाधिबन्धेन योक्ष्यसे ॥
dharmeṇa vyavahāreṇa prajāḥ pālaya pāṇḍava | yudhiṣṭhira yathāyukto nādhibandhena yokṣyase
पाण्डव, धर्मपूर्ण व्यवहार से प्रजा का पालन करो। युधिष्ठिर, इस प्रकार करने से तुम चिन्ता के बन्धन में नहीं पड़ोगे।
श्लोक 26 (12.71.26)
एष एव परो धर्मो यद्राजा रक्षति प्रजाः । भूतानां हि यदा धर्मो रक्षणं परमा दया ॥
eṣa eva paro dharmo yadrājā rakṣati prajāḥ | bhūtānāṃ hi yadā dharmo rakṣaṇaṃ paramā dayā
यही परम धर्म है कि राजा प्रजा की रक्षा करे; क्योंकि प्राणियों का धर्म रक्षा है, और वही सबसे बड़ी दया है।
श्लोक 27 (12.71.27)
तस्मादेवं परं धर्मं मन्यन्ते धर्मकोविदाः । यो राजा रक्षणे युक्तो भूतेषु कुरुते दयाम् ॥
tasmādevaṃ paraṃ dharmaṃ manyante dharmakovidāḥ | yo rājā rakṣaṇe yukto bhūteṣu kurute dayām
इसीलिए धर्म के जानने वाले इसी को परम धर्म मानते हैं कि राजा रक्षा में लगा रहे और प्राणियों पर दया करे।
श्लोक 28 (12.71.28)
यदह्ना कुरुते पापमरक्षन्भयतः प्रजाः । राजा वर्षसहस्रेण तस्यान्तमधिगच्छति ॥
yadahnā kurute pāpamarakṣanbhayataḥ prajāḥ | rājā varṣasahasreṇa tasyāntamadhigacchati
भय के कारण प्रजा की रक्षा न करता हुआ राजा जो पाप एक दिन में करता है, उसका अन्त वह एक हजार वर्ष में पाता है।
श्लोक 29 (12.71.29)
यदह्ना कुरुते धर्मं प्रजा धर्मेण पालयन् । दशवर्षसहस्राणि तस्य भुङ्क्ते फलं दिवि ॥
yadahnā kurute dharmaṃ prajā dharmeṇa pālayan | daśavarṣasahasrāṇi tasya bhuṅkte phalaṃ divi
धर्म से प्रजा का पालन करता हुआ राजा जो पुण्य एक दिन में कमाता है, उसका फल वह दस हजार वर्ष तक स्वर्ग में भोगता है।
श्लोक 30 (12.71.30)
स्विष्टिः स्वधीतिः सुतपा लोकाञ्जयति यावतः । क्षणेन तानवाप्नोति प्रजा धर्मेण पालयन् ॥
sviṣṭiḥ svadhītiḥ sutapā lokāñjayati yāvataḥ | kṣaṇena tānavāpnoti prajā dharmeṇa pālayan
भली-भाँति यज्ञ करने वाला, भली-भाँति अध्ययन करने वाला और उत्तम तप करने वाला जितने लोक जीतता है, उन सबको राजा प्रजा का धर्म से पालन करते हुए क्षण भर में पा लेता है।
श्लोक 31 (12.71.31)
एवं धर्मं प्रयत्नेन कौन्तेय परिपालय । ततः पुण्यफलं लब्ध्वा नानुबन्धेन योक्ष्यसे ॥
evaṃ dharmaṃ prayatnena kaunteya paripālaya | tataḥ puṇyaphalaṃ labdhvā nānubandhena yokṣyase
इसलिए कुन्तीपुत्र, पूरे प्रयत्न से धर्म का पालन करो; पुण्य का फल पाकर तुम किसी अगले बन्धन में नहीं पड़ोगे।
श्लोक 32 (12.71.32)
स्वर्गलोके सुमहतीं श्रियं प्राप्स्यसि पाण्डव । असंभवश्च धर्माणामीदृशानामराजसु ॥
svargaloke sumahatīṃ śriyaṃ prāpsyasi pāṇḍava | asaṃbhavaśca dharmāṇāmīdṛśānāmarājasu
पाण्डव, तुम स्वर्गलोक में महान् श्री पाओगे; और ऐसे धर्मफल जो राजा नहीं हैं, उनके लिए सम्भव नहीं।
श्लोक 33 (12.71.33)
तस्माद्राजैव नान्योऽस्ति यो धर्मफलमाप्नुयात् । स राज्यं धृतिमान्प्राप्य धर्मेण परिपालय । इन्द्रं तर्पय सोमेन कामैश्च सुहृदो जनान् ॥
tasmādrājaiva nānyo'sti yo dharmaphalamāpnuyāt | sa rājyaṃ dhṛtimānprāpya dharmeṇa paripālaya | indraṃ tarpaya somena kāmaiśca suhṛdo janān
इसलिए धर्म का फल राजा ही पा सकता है, दूसरा कोई नहीं। धैर्यवान् होकर राज्य पाओ और धर्म से उसका पालन करो; सोम से इन्द्र को तृप्त करो, तथा मनचाही वस्तुओं से अपने मित्रों और प्रजाजनों को।