शान्ति पर्व · अध्याय 70
राजा के छत्तीस गुण
युधिष्ठिर पूछते हैं कि किस आचरण से राजा को इस लोक और परलोक में कल्याण मिलता है। भीष्म छत्तीस गुणों का समूह जोड़ियों में बताते हैं: कठोरता के बिना धर्म, क्रूरता के बिना अर्थ, दीनता के बिना प्रिय वाणी, नीच जनों से मेल नहीं, परीक्षा के बाद ही दण्ड, और किस पर विश्वास किया जाए इसमें सावधानी। वे कहते हैं कि जो राजा इनका पालन करता है वह स्वर्ग में सम्मानित होता है। अन्त में वैशम्पायन बताते हैं कि युधिष्ठिर ने पितामह को प्रणाम किया और उनके वचनों के अनुसार कार्य किया.
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.70.1)
केन वृत्तेन वृत्तज्ञः वर्तमानो महीपतिः । सुखेनार्थान् सुखोदर्कानिह च प्रेत्य चाश्नुते ॥
kena vṛttena vṛttajñaḥ vartamāno mahīpatiḥ | sukhenārthān sukhodarkāniha ca pretya cāśnute
आचरण को जाननेवाला राजा किस आचरण से चलकर इस लोक में और परलोक में सहज ही उन प्रयोजनों को पाता है जिनका फल सुखदायी होता है?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.70.2)
इत्थं गुणानां षट्त्रिंशी षट्त्रिंशद्गुणसंयुता । यान्गुणांस्तु गुणोपेतः कुर्वन्गुणमवाप्नुयात् ॥
itthaṃ guṇānāṃ ṣaṭtriṃśī ṣaṭtriṃśadguṇasaṃyutā | yānguṇāṃstu guṇopetaḥ kurvanguṇamavāpnuyāt
यह गुणों की छत्तीसी है, जो स्वयं छत्तीस गुणों से युक्त है; गुणवान पुरुष इन गुणों का आचरण करता हुआ पुण्यफल पाता है।
श्लोक 3 (12.70.3)
चरेद्धर्मानकटुको मुञ्चेत्स्नेहं न नास्तिकः । अनृशंसश्चरेदर्थं चरेत्काममनुद्धतः ॥
careddharmānakaṭuko muñcetsnehaṃ na nāstikaḥ | anṛśaṃsaścaredarthaṃ caretkāmamanuddhataḥ
वह कठोरता के बिना धर्म का आचरण करे, आसक्ति छोड़े पर नास्तिक न बने; निर्दयता के बिना अर्थ का सेवन करे, और उद्धत हुए बिना काम का सेवन करे।
श्लोक 4 (12.70.4)
प्रियं ब्रूयादकृपणः शूरः स्यादविकत्थनः । दाता नापात्रवर्षी स्यात्प्रगल्भः स्यादनिष्ठुरः ॥
priyaṃ brūyādakṛpaṇaḥ śūraḥ syādavikatthanaḥ | dātā nāpātravarṣī syātpragalbhaḥ syādaniṣṭhuraḥ
वह दीनता के बिना प्रिय बोले, बड़ाई हाँके बिना शूर हो, अपात्र पर वर्षा किए बिना दाता हो, और कठोर हुए बिना निडर हो।
श्लोक 5 (12.70.5)
संदधीत न चानार्यैर्विगृह्णीयाच्च शत्रुभिः । नानाप्तैश्चारयेच्चारं कुर्यात्कार्यमपीडया ॥
saṃdadhīta na cānāryairvigṛhṇīyācca śatrubhiḥ | nānāptaiścārayeccāraṃ kuryātkāryamapīḍayā
वह सन्धि करे, पर नीच जनों से नहीं; शत्रुओं से युद्ध करे; अविश्वस्त लोगों से गुप्तचरी न करवाए; और किसी को पीड़ा दिए बिना कार्य सिद्ध करे।
श्लोक 6 (12.70.6)
अर्थं ब्रूयान्न चासत्सु गुणान्ब्रूयान्न चात्मनः । आदद्यान्न च साधुभ्यो नासत्पुरुषमाश्रयेत् ॥
arthaṃ brūyānna cāsatsu guṇānbrūyānna cātmanaḥ | ādadyānna ca sādhubhyo nāsatpuruṣamāśrayet
वह दुष्टों के सामने अपना प्रयोजन न कहे, न अपने गुणों का बखान करे; सज्जनों से कुछ न ले, और असज्जन का आश्रय न ले।
श्लोक 7 (12.70.7)
नापरीक्ष्य नयेद्दण्डं न च मन्त्रं प्रकाशयेत् । विसृजेन्न च लुब्धेभ्यो विश्वसेन्नापकारिषु ॥
nāparīkṣya nayeddaṇḍaṃ na ca mantraṃ prakāśayet | visṛjenna ca lubdhebhyo viśvasennāpakāriṣu
वह बिना परीक्षा किए दण्ड न दे, न अपनी मन्त्रणा प्रकट करे; लोभियों को न दे, और अपकार करनेवालों पर विश्वास न करे।
श्लोक 8 (12.70.8)
अनीर्षुर्गुप्तदारः स्याच्चोक्षः स्यादघृणी नृपः । स्त्रियः सेवेत नात्यर्थं मृष्टं भुञ्जीत नाहितम् ॥
anīrṣurguptadāraḥ syāccokṣaḥ syādaghṛṇī nṛpaḥ | striyaḥ seveta nātyarthaṃ mṛṣṭaṃ bhuñjīta nāhitam
राजा ईर्ष्या न करे पर अपनी स्त्रियों की रक्षा करे, शुद्ध रहे पर घृणा से ग्रस्त न हो। वह स्त्रियों का अत्यधिक सेवन न करे, और स्वादिष्ट भोजन करे पर अहितकर न खाए।
श्लोक 9 (12.70.9)
अस्तब्धः पूजयन्मान्यान्गुरून्सेवेदमायया । अर्चेद्देवानदम्भेन श्रियमिच्छेदकुत्सिताम् ॥
astabdhaḥ pūjayanmānyāngurūnsevedamāyayā | arceddevānadambhena śriyamicchedakutsitām
वह अहंकार छोड़कर माननीय जनों का सम्मान करे; छल के बिना गुरुजनों की सेवा करे; दम्भ के बिना देवताओं की पूजा करे, और निर्दोष लक्ष्मी की इच्छा करे।
श्लोक 10 (12.70.10)
सेवेत प्रणयं हित्वा दक्षः स्यान्न त्वकालवित् । सान्त्वयेन्न च मोक्षाय अनुगृह्णन्न चाक्षिपेत् ॥
seveta praṇayaṃ hitvā dakṣaḥ syānna tvakālavit | sāntvayenna ca mokṣāya anugṛhṇanna cākṣipet
वह निजी लगाव छोड़कर सेवा करे; कुशल हो, समय को न पहचाननेवाला न हो; केवल छुटकारे के लिए सान्त्वना न दे, और अनुग्रह करते हुए तिरस्कार न करे।
श्लोक 11 (12.70.11)
प्रहरेन्न त्वविज्ञाय हत्वा शत्रून्न शोचयेत् । क्रोधं कुर्यान्न चाकस्मान्मृदुः स्यान्नापकारिषु ॥
praharenna tvavijñāya hatvā śatrūnna śocayet | krodhaṃ kuryānna cākasmānmṛduḥ syānnāpakāriṣu
वह बिना समझे प्रहार न करे; शत्रुओं को मारकर शोक न कराए; अचानक क्रोध न करे, और अपकार करनेवालों के प्रति कोमल न हो।
श्लोक 12 (12.70.12)
एवं चरस्व राज्यस्थो यदि श्रेय इहेच्छसि । अतोऽन्यथा नरपतिर्भयमृच्छत्यनुत्तमम् ॥
evaṃ carasva rājyastho yadi śreya ihecchasi | ato'nyathā narapatirbhayamṛcchatyanuttamam
यदि आप यहाँ अपना कल्याण चाहते हैं तो राज्य में स्थित रहकर ऐसा ही आचरण कीजिए; इससे भिन्न आचरण करनेवाला राजा अत्यन्त भय को प्राप्त होता है।
श्लोक 13 (12.70.13)
इति सर्वान्गुणानेतान्यथोक्तान्योऽनुवर्तते । अनुभूयेह भद्राणि प्रेत्य स्वर्गे महीयते ॥
iti sarvānguṇānetānyathoktānyo'nuvartate | anubhūyeha bhadrāṇi pretya svarge mahīyate
जो इन सब गुणों का वैसा ही पालन करता है जैसा कहा गया, वह यहाँ कल्याण भोगकर मरने के बाद स्वर्ग में सम्मानित होता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (12.70.14)
इदं वचः शान्तनवस्य शुश्रुवा । न्युधिष्ठिरः पार्थिवमुख्यसंवृतः । तदा ववन्दे च पितामहं नृपो । यथोक्तमेतच्च चकार बुद्धिमान् ॥
idaṃ vacaḥ śāntanavasya śuśruvā | nyudhiṣṭhiraḥ pārthivamukhyasaṃvṛtaḥ | tadā vavande ca pitāmahaṃ nṛpo | yathoktametacca cakāra buddhimān
शान्तनु-पुत्र भीष्म के ये वचन सुनकर श्रेष्ठ राजाओं से घिरे हुए युधिष्ठिर ने तब पितामह को प्रणाम किया; और उस बुद्धिमान राजा ने जैसा कहा गया था वैसा ही किया।