शान्ति पर्व · अध्याय 69
दण्डनीति और चार युग
युधिष्ठिर पूछते हैं कि दण्डनीति और राजा किस प्रकार सिद्धि देते हैं। भीष्म समझाते हैं कि युग का कारण काल नहीं, राजा है: जो राजा दण्डनीति का पूरा पालन करता है वह कृतयुग लाता है, तीन अंशों का पालन करनेवाला त्रेता, आधे का पालन करनेवाला द्वापर, और उसे छोड़ देनेवाला कलियुग। वे प्रत्येक युग के लक्षण और उसे लानेवाले राजा को मिलनेवाले स्वर्ग या नरक का वर्णन करते हैं, और युधिष्ठिर से धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करने का आग्रह करते हैं.
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.69.1)
दण्डनीतिश्च राजा च समस्तौ तावुभावपि । तत्र किं कुर्वतः सिद्धिस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
daṇḍanītiśca rājā ca samastau tāvubhāvapi | tatra kiṃ kurvataḥ siddhistanme brūhi pitāmaha
दण्डनीति और राजा, ये दोनों साथ-साथ यहाँ सम्मिलित हैं। हे पितामह, मुझे बताइए कि इस विषय में क्या करने से सिद्धि मिलती है?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.69.2)
माहात्म्यं दण्डनीत्यास्तु साध्यं शब्दैः सहेतुकैः । शृणु मे शंसतो राजन्यथावदिह भारत ॥
māhātmyaṃ daṇḍanītyāstu sādhyaṃ śabdaiḥ sahetukaiḥ | śṛṇu me śaṃsato rājanyathāvadiha bhārata
दण्डनीति की महिमा हेतुयुक्त वचनों से सिद्ध की जानी है। हे राजन्, हे भारत, मैं जैसा है वैसा बताता हूँ, सुनिए।
श्लोक 3 (12.69.3)
दण्डनीतिः स्वधर्मेषु चातुर्वर्ण्यं नियच्छति । प्रयुक्ता स्वामिना सम्यगधर्मेभ्यो नियच्छति ॥
daṇḍanītiḥ svadharmeṣu cāturvarṇyaṃ niyacchati | prayuktā svāminā samyagadharmebhyo niyacchati
दण्डनीति चारों वर्णों को उनके अपने धर्मों में स्थिर रखती है; और स्वामी द्वारा ठीक प्रकार से प्रयुक्त होने पर उन्हें अधर्म से रोकती है।
श्लोक 4 (12.69.4)
चातुर्वर्ण्ये स्वधर्मस्थे मर्यादानामसंकरे । दण्डनीतिकृते क्षेमे प्रजानामकुतोभये ॥
cāturvarṇye svadharmasthe maryādānāmasaṃkare | daṇḍanītikṛte kṣeme prajānāmakutobhaye
जब चारों वर्ण अपने धर्म में स्थित हों, मर्यादाओं का संकर न हो, दण्डनीति के द्वारा कल्याण स्थापित हो और प्रजा को कहीं से भय न हो,
श्लोक 5 (12.69.5)
सोमे प्रयत्नं कुर्वन्ति त्रयो वर्णा यथाविधि । तस्मादेव मनुष्याणां सुखं विद्धि समाहितम् ॥
some prayatnaṃ kurvanti trayo varṇā yathāvidhi | tasmādeva manuṣyāṇāṃ sukhaṃ viddhi samāhitam
तब तीनों वर्ण विधि के अनुसार सोमयज्ञ में प्रयत्न करते हैं; जानिए कि इसी से मनुष्यों का सुख सुस्थिर होता है।
श्लोक 6 (12.69.6)
कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् । इति ते संशयो माभूद्राजा कालस्य कारणम् ॥
kālo vā kāraṇaṃ rājño rājā vā kālakāraṇam | iti te saṃśayo mābhūdrājā kālasya kāraṇam
क्या काल राजा का कारण है, या राजा काल का कारण है? आपको यह सन्देह न रहे: राजा ही काल का कारण है।
श्लोक 7 (12.69.7)
दण्डनीत्यां यदा राजा सम्यक्कार्त्स्न्येन वर्तते । तदा कृतयुगं नाम कालः श्रेष्ठः प्रवर्तते ॥
daṇḍanītyāṃ yadā rājā samyakkārtsnyena vartate | tadā kṛtayugaṃ nāma kālaḥ śreṣṭhaḥ pravartate
जब राजा दण्डनीति के अनुसार पूर्ण रूप से और ठीक प्रकार से चलता है, तब कृतयुग नाम का वह श्रेष्ठ काल प्रारम्भ होता है।
श्लोक 8 (12.69.8)
भवेत्कृतयुगे धर्मो नाधर्मो विद्यते क्वचित् । सर्वेषामेव वर्णानां नाधर्मे रमते मनः ॥
bhavetkṛtayuge dharmo nādharmo vidyate kvacit | sarveṣāmeva varṇānāṃ nādharme ramate manaḥ
कृतयुग में धर्म ही होता है, अधर्म कहीं नहीं रहता; किसी भी वर्ण का मन अधर्म में नहीं रमता।
श्लोक 9 (12.69.9)
योगक्षेमाः प्रवर्तन्ते प्रजानां नात्र संशयः । वैदिकानि च कर्माणि भवन्त्यपि गुणान्युत ॥
yogakṣemāḥ pravartante prajānāṃ nātra saṃśayaḥ | vaidikāni ca karmāṇi bhavantyapi guṇānyuta
इसमें सन्देह नहीं कि प्रजा का योगक्षेम बना रहता है, और वैदिक कर्म भी गुणयुक्त होकर सम्पन्न होते हैं।
श्लोक 10 (12.69.10)
ऋतवश्च सुखाः सर्वे भवन्त्युत निरामयाः । प्रसीदन्ति नराणां च स्वरवर्णमनांसि च ॥
ṛtavaśca sukhāḥ sarve bhavantyuta nirāmayāḥ | prasīdanti narāṇāṃ ca svaravarṇamanāṃsi ca
सब ऋतुएँ सुखद और रोगरहित होती हैं, और मनुष्यों की वाणी, वर्ण और मन प्रसन्न रहते हैं।
श्लोक 11 (12.69.11)
व्याधयो न भवन्त्यत्र नाल्पायुर्दृश्यते नरः । विधवा न भवन्त्यत्र नृशंसो नात्र जायते ॥
vyādhayo na bhavantyatra nālpāyurdṛśyate naraḥ | vidhavā na bhavantyatra nṛśaṃso nātra jāyate
यहाँ रोग नहीं होते, कोई मनुष्य अल्पायु नहीं दिखाई देता, विधवाएँ नहीं होतीं और कोई क्रूर पुरुष जन्म नहीं लेता।
श्लोक 12 (12.69.12)
अकृष्टपच्या पृथिवी भवन्त्योषधयस्तथा । त्वक्पत्रफलमूलानि वीर्यवन्ति भवन्ति च ॥
akṛṣṭapacyā pṛthivī bhavantyoṣadhayastathā | tvakpatraphalamūlāni vīryavanti bhavanti ca
पृथ्वी बिना जोते ही अन्न देती है, और ओषधियाँ भी वैसी ही होती हैं; छाल, पत्ते, फल और मूल प्रभावशाली हो जाते हैं।
श्लोक 13 (12.69.13)
नाधर्मो विद्यते तत्र धर्म एव तु केवलम् । इति कार्तयुगानेतान्गुणान्विद्धि युधिष्ठिर ॥
nādharmo vidyate tatra dharma eva tu kevalam | iti kārtayugānetānguṇānviddhi yudhiṣṭhira
वहाँ अधर्म नहीं होता, केवल धर्म ही होता है। हे युधिष्ठिर, इन्हें कृतयुग के गुण जानिए।
श्लोक 14 (12.69.14)
दण्डनीत्या यदा राजा त्रीनंशाननुवर्तते । चतुर्थमंशमुत्सृज्य तदा त्रेता प्रवर्तते ॥
daṇḍanītyā yadā rājā trīnaṃśānanuvartate | caturthamaṃśamutsṛjya tadā tretā pravartate
जब राजा दण्डनीति के तीन अंशों का पालन करता है और चौथा अंश छोड़ देता है, तब त्रेतायुग प्रारम्भ होता है।
श्लोक 15 (12.69.15)
अधर्मस्य चतुर्थांशस्त्रीनंशाननुवर्तते । कृष्टपच्यैव पृथिवी भवन्त्योषधयस्तथा ॥
adharmasya caturthāṃśastrīnaṃśānanuvartate | kṛṣṭapacyaiva pṛthivī bhavantyoṣadhayastathā
अधर्म का चौथा अंश तीन अंशों के साथ चलता है; पृथ्वी जोतने पर ही अन्न देती है, और ओषधियाँ भी वैसी ही होती हैं।
श्लोक 16 (12.69.16)
अर्धं त्यक्त्वा यदा राजा नीत्यर्धमनुवर्तते । ततस्तु द्वापरं नाम स कालः संप्रवर्तते ॥
ardhaṃ tyaktvā yadā rājā nītyardhamanuvartate | tatastu dvāparaṃ nāma sa kālaḥ saṃpravartate
जब राजा आधा छोड़कर नीति के आधे का ही पालन करता है, तब द्वापर नामक वह काल आरम्भ होता है।
श्लोक 17 (12.69.17)
अशुभस्य यदा त्वर्धं द्वावंशावनुवर्तते । कृष्टपच्यैव पृथिवी भवत्यर्धफला तथा ॥
aśubhasya yadā tvardhaṃ dvāvaṃśāvanuvartate | kṛṣṭapacyaiva pṛthivī bhavatyardhaphalā tathā
जब अशुभ का आधा भाग दो अंशों के साथ चलता है, तब पृथ्वी जोतने पर ही अन्न देती है और आधा ही फल देती है।
श्लोक 18 (12.69.18)
दण्डनीतिं परित्यज्य यदा कार्त्स्न्येन भूमिपः । प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन प्रवर्तेत तदा कलिः ॥
daṇḍanītiṃ parityajya yadā kārtsnyena bhūmipaḥ | prajāḥ kliśnātyayogena pravarteta tadā kaliḥ
जब राजा दण्डनीति को पूरी तरह छोड़कर कुशासन से प्रजा को कष्ट देता है, तब कलियुग आरम्भ होता है।
श्लोक 19 (12.69.19)
कलावधर्मो भूयिष्ठो धर्मो भवति न क्वचित् । सर्वेषामेव वर्णानां स्वधर्माच्च्यवते मनः ॥
kalāvadharmo bhūyiṣṭho dharmo bhavati na kvacit | sarveṣāmeva varṇānāṃ svadharmāccyavate manaḥ
कलियुग में अधर्म की प्रधानता रहती है और धर्म कहीं नहीं रहता; सभी वर्णों का मन अपने धर्म से डिग जाता है।
श्लोक 20 (12.69.20)
शूद्रा भैक्षेण जीवन्ति ब्राह्मणाः परिचर्यया । योगक्षेमस्य नाशश्च वर्तते वर्णसंकरः ॥
śūdrā bhaikṣeṇa jīvanti brāhmaṇāḥ paricaryayā | yogakṣemasya nāśaśca vartate varṇasaṃkaraḥ
शूद्र भिक्षा से जीते हैं और ब्राह्मण सेवा से; योगक्षेम का नाश हो जाता है और वर्णसंकर फैल जाता है।
श्लोक 21 (12.69.21)
वैदिकानि च कर्माणि भवन्ति विगुणान्युत । ऋतवो न सुखाः सर्वे भवन्त्यामयिनस्तथा ॥
vaidikāni ca karmāṇi bhavanti viguṇānyuta | ṛtavo na sukhāḥ sarve bhavantyāmayinastathā
वैदिक कर्म दोषयुक्त हो जाते हैं; ऋतुएँ सुखद नहीं रहतीं और रोग लानेवाली हो जाती हैं।
श्लोक 22 (12.69.22)
ह्रसन्ति च मनुष्याणां स्वरवर्णमनांस्युत । व्याधयश्च भवन्त्यत्र म्रियन्ते चाशतायुषः ॥
hrasanti ca manuṣyāṇāṃ svaravarṇamanāṃsyuta | vyādhayaśca bhavantyatra mriyante cāśatāyuṣaḥ
मनुष्यों की वाणी, वर्ण और मन क्षीण होते हैं; रोग उत्पन्न होते हैं, और लोग सौ वर्ष पूरे किए बिना ही मर जाते हैं।
श्लोक 23 (12.69.23)
विधवाश्च भवन्त्यत्र नृशंसा जायते प्रजा । क्वचिद्वर्षति पर्जन्यः क्वचित्सस्यं प्ररोहति ॥
vidhavāśca bhavantyatra nṛśaṃsā jāyate prajā | kvacidvarṣati parjanyaḥ kvacitsasyaṃ prarohati
विधवाएँ होती हैं और क्रूर सन्तानें जन्म लेती हैं। कहीं वर्षा होती है और कहीं अन्न उगता है।
श्लोक 24 (12.69.24)
रसाः सर्वे क्षयं यान्ति यदा नेच्छति भूमिपः । प्रजाः संरक्षितुं सम्यग्दण्डनीतिसमाहितः ॥
rasāḥ sarve kṣayaṃ yānti yadā necchati bhūmipaḥ | prajāḥ saṃrakṣituṃ samyagdaṇḍanītisamāhitaḥ
जब राजा, दण्डनीति से सम्पन्न होते हुए भी, प्रजा की ठीक प्रकार से रक्षा करना नहीं चाहता, तब सारे रस क्षीण हो जाते हैं।
श्लोक 25 (12.69.25)
राजा कृतयुगस्रष्टा त्रेताया द्वापरस्य च । युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम् ॥
rājā kṛtayugasraṣṭā tretāyā dvāparasya ca | yugasya ca caturthasya rājā bhavati kāraṇam
राजा कृतयुग का, त्रेता का और द्वापर का स्रष्टा है, और चौथे युग का कारण भी राजा ही है।
श्लोक 26 (12.69.26)
कृतस्य करणाद्राजा स्वर्गमत्यन्तमश्नुते । त्रेतायाः करणाद्राजा स्वर्गं नात्यन्तमश्नुते ॥
kṛtasya karaṇādrājā svargamatyantamaśnute | tretāyāḥ karaṇādrājā svargaṃ nātyantamaśnute
कृतयुग को लाने से राजा पूर्ण रूप से स्वर्ग पाता है; त्रेता को लाने से वह पूर्ण स्वर्ग नहीं पाता।
श्लोक 27 (12.69.27)
प्रवर्तनाद्द्वापरस्य यथाभागमुपाश्नुते । कलेः प्रवर्तनाद्राजा पापमत्यन्तमश्नुते ॥
pravartanāddvāparasya yathābhāgamupāśnute | kaleḥ pravartanādrājā pāpamatyantamaśnute
द्वापर को प्रवृत्त करने से वह अपने भाग के अनुसार फल पाता है; कलि को प्रवृत्त करने से राजा अत्यन्त पाप का भागी होता है।
श्लोक 28 (12.69.28)
ततो वसति दुष्कर्मा नरके शाश्वतीः समाः । प्रजानां कल्मषे मग्नोऽकीर्तिं पापं च विन्दति ॥
tato vasati duṣkarmā narake śāśvatīḥ samāḥ | prajānāṃ kalmaṣe magno'kīrtiṃ pāpaṃ ca vindati
तब वह दुष्कर्मी अनन्त वर्षों तक नरक में रहता है, प्रजा के पापों में डूबा हुआ, और अपयश तथा पाप को प्राप्त करता है।
श्लोक 29 (12.69.29)
दण्डनीतिं पुरस्कृत्य क्षत्रियेण विजानता । लिप्सितव्यमलभ्यं च लब्धं रक्ष्यं च भारत । योगक्षेमाः प्रवर्तन्ते प्रजानां नात्र संशयः ॥
daṇḍanītiṃ puraskṛtya kṣatriyeṇa vijānatā | lipsitavyamalabhyaṃ ca labdhaṃ rakṣyaṃ ca bhārata | yogakṣemāḥ pravartante prajānāṃ nātra saṃśayaḥ
दण्डनीति को आगे रखकर समझदार क्षत्रिय को जो नहीं मिला है उसे पाने की इच्छा करनी चाहिए और जो मिल चुका है उसकी रक्षा करनी चाहिए, हे भारत। तब, इसमें सन्देह नहीं, प्रजा का योगक्षेम फलता-फूलता है।
श्लोक 30 (12.69.30)
लोकस्य सीमन्तकरी मर्यादा लोकपावनी । सम्यङ्नीता दण्डनीतिर्यथा माता यथा पिता ॥
lokasya sīmantakarī maryādā lokapāvanī | samyaṅnītā daṇḍanītiryathā mātā yathā pitā
ठीक प्रकार से चलाई गई दण्डनीति संसार की सीमा बाँधनेवाली मर्यादा है और लोक को पवित्र करनेवाली है; वह माता और पिता के समान है।
श्लोक 31 (12.69.31)
यस्यां भवन्ति भूतानि तद्विद्धि भरतर्षभ । एष एव परो धर्मो यद्राजा दण्डनीतिमान् ॥
yasyāṃ bhavanti bhūtāni tadviddhi bharatarṣabha | eṣa eva paro dharmo yadrājā daṇḍanītimān
हे भरतश्रेष्ठ, जानिए कि प्राणी उसी में स्थित होकर जीते हैं। यही परम धर्म है कि राजा दण्डनीति से युक्त हो।
श्लोक 32 (12.69.32)
तस्मात्कौरव्य धर्मेण प्रजाः पालय नीतिमान् । एवं वृत्तः प्रजा रक्षन्स्वर्गं जेतासि दुर्जयम् ॥
tasmātkauravya dharmeṇa prajāḥ pālaya nītimān | evaṃ vṛttaḥ prajā rakṣansvargaṃ jetāsi durjayam
इसलिए हे कौरव, नीति जाननेवाले होकर आप धर्म से प्रजा का पालन कीजिए। इस प्रकार आचरण करके प्रजा की रक्षा करते हुए आप दुर्जय स्वर्ग को जीतेंगे।