शान्ति पर्व · अध्याय 68
गुप्तचर, दुर्ग और राजा के सात रक्षणीय अंग
युधिष्ठिर पूछते हैं कि राजा के लिए अब क्या करना शेष है, राज्य की रक्षा कैसे हो, और शत्रुओं, गुप्तचरों, सेवकों, पत्नियों तथा पुत्रों के साथ कैसा व्यवहार हो। भीष्म आत्मसंयम से आरम्भ करते हैं, फिर गुप्तचरों की नियुक्ति और पहचान, बलवान से सन्धि, मन्त्रियों का चयन, चढ़ाई के नियम, कर और न्याय, तथा घिरे हुए नगर की रक्षा और रसद का वर्णन करते हैं। वे राजा के सात रक्षणीय अंग, षाड्गुण्य और धर्म-अर्थ-काम के त्रिवर्ग गिनाते हैं, और अंगिरा तथा उशना के श्लोकों के साथ समाप्त करते हैं, जो धर्म से शासन करने और विद्वानों की बात सुनने का उपदेश देते हैं.
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.68.1)
पार्थिवेन विशेषेण किं कार्यमवशिष्यते । कथं रक्ष्यो जनपदः कथं वध्याश्च शत्रवः ॥
pārthivena viśeṣeṇa kiṃ kāryamavaśiṣyate | kathaṃ rakṣyo janapadaḥ kathaṃ vadhyāśca śatravaḥ
राजा के लिए विशेष रूप से और कौन-सा कर्तव्य शेष रह जाता है? देश की रक्षा कैसे की जाए, और शत्रुओं का वध कैसे किया जाए?
श्लोक 2 (12.68.2)
कथं चारान्प्रयुञ्जीत वर्णान्विश्वासयेत्कथम् । कथं भृत्यान्कथं दारान्कथं पुत्रांश्च भारत ॥
kathaṃ cārānprayuñjīta varṇānviśvāsayetkatham | kathaṃ bhṛtyānkathaṃ dārānkathaṃ putrāṃśca bhārata
वह गुप्तचरों को कैसे नियुक्त करे? वर्णों का विश्वास कैसे जीते? हे भारत, सेवकों, पत्नियों और पुत्रों के साथ वह कैसा व्यवहार करे?
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.68.3)
राजवृत्तं महाराज शृणुष्वावहितोऽखिलम् । यत्कार्यं पार्थिवेनादौ पार्थिवप्रकृतेन वा ॥
rājavṛttaṃ mahārāja śṛṇuṣvāvahito'khilam | yatkāryaṃ pārthivenādau pārthivaprakṛtena vā
हे महाराज, राजाओं के सम्पूर्ण आचरण को ध्यान से सुनिए: राजा को, अथवा राजा के स्थान पर कार्य करनेवाले को, पहले क्या करना चाहिए।
श्लोक 4 (12.68.4)
आत्मा जेयः सदा राज्ञा ततो जेयाश्च शत्रवः । अजितात्मा नरपतिर्विजयेत कथं रिपून् ॥
ātmā jeyaḥ sadā rājñā tato jeyāśca śatravaḥ | ajitātmā narapatirvijayeta kathaṃ ripūn
राजा को सदा पहले स्वयं को जीतना चाहिए, तभी शत्रुओं को जीतना चाहिए। जिसने अपने को नहीं जीता, वह राजा शत्रुओं को कैसे जीत सकेगा?
श्लोक 5 (12.68.5)
एतावानात्मविजयः पञ्चवर्गविनिग्रहः । जितेन्द्रियो नरपतिर्बाधितुं शक्नुयाद्रिपुन् ॥
etāvānātmavijayaḥ pañcavargavinigrahaḥ | jitendriyo narapatirbādhituṃ śaknuyādripun
आत्मविजय इतना ही है: पाँचों इन्द्रियों के समूह का संयम। जिस राजा ने इन्द्रियों को जीत लिया है, वही शत्रुओं को दबा सकता है।
श्लोक 6 (12.68.6)
न्यसेत गुल्मान्दुर्गेषु सन्धौ च कुरुनन्दन । नगरोपवने चैव पुरोद्याने तथैव च ॥
nyaseta gulmāndurgeṣu sandhau ca kurunandana | nagaropavane caiva purodyāne tathaiva ca
हे कुरुनन्दन, वह दुर्गों में और सीमा पर, नगर के समीप के वनों में तथा नगर के उद्यानों में भी रक्षक सैनिक नियुक्त करे।
श्लोक 7 (12.68.7)
संस्थानेषु च सर्वेषु पुटेषु नगरस्य च । मध्ये च नरशार्दूल तथा राजनिवेशने ॥
saṃsthāneṣu ca sarveṣu puṭeṣu nagarasya ca | madhye ca naraśārdūla tathā rājaniveśane
हे पुरुषसिंह, वह उन्हें सभी ठहरने के स्थानों में, नगर के सब विभागों में, नगर के मध्य में तथा राजभवन में भी नियुक्त करे।
श्लोक 8 (12.68.8)
प्रणिधींश्च ततः कुर्याज्जडान्धबधिराकृतीन् । पुंसः परीक्षितान्प्राज्ञान्क्षुत्पिपासाश्रमक्षमान् ॥
praṇidhīṃśca tataḥ kuryājjaḍāndhabadhirākṛtīn | puṃsaḥ parīkṣitānprājñānkṣutpipāsāśramakṣamān
तब वह ऐसे पुरुषों को गुप्तचर बनाए जो परखे हुए, चतुर तथा भूख, प्यास और थकान सहने में समर्थ हों और जो जड़, अंधे या बहरे जैसे दिखाई दें।
श्लोक 9 (12.68.9)
अमात्येषु च सर्वेषु मित्रेषु त्रिविधेषु च । पुत्रेषु च महाराज प्रणिदध्यात्समाहितः ॥
amātyeṣu ca sarveṣu mitreṣu trividheṣu ca | putreṣu ca mahārāja praṇidadhyātsamāhitaḥ
हे महाराज, सावधान रहकर वह अपने सब अमात्यों में, तीनों प्रकार के मित्रों में और पुत्रों में भी गुप्तचर रखे।
श्लोक 10 (12.68.10)
पुरे जनपदे चैव तथा सामन्तराजसु । यथा न विद्युरन्योन्यं प्रणिधेयास्तथा हि ते ॥
pure janapade caiva tathā sāmantarājasu | yathā na vidyuranyonyaṃ praṇidheyāstathā hi te
नगर में, देहात में और पड़ोसी राजाओं के यहाँ गुप्तचर इस प्रकार रखे जाएँ कि वे एक-दूसरे को न जानें।
श्लोक 11 (12.68.11)
चारांश्च विद्यात्प्रहितान्परेण भरतर्षभ । आपणेषु विहारेषु समवायेषु वीथिषु ॥
cārāṃśca vidyātprahitānpareṇa bharatarṣabha | āpaṇeṣu vihāreṣu samavāyeṣu vīthiṣu
हे भरतश्रेष्ठ, शत्रु के भेजे हुए गुप्तचरों को भी वह पहचाने: बाज़ारों में, विहार-स्थलों में, जमघटों में, गलियों में,
श्लोक 12 (12.68.12)
आरामेषु तथोद्याने पण्डितानां समागमे । वेशेषु चत्वरे चैव सभास्वावसथेषु च ॥
ārāmeṣu tathodyāne paṇḍitānāṃ samāgame | veśeṣu catvare caiva sabhāsvāvasatheṣu ca
उपवनों और उद्यानों में, विद्वानों की सभाओं में, वेश्याओं के निवासों में, चौराहों पर, सभाभवनों में और धर्मशालाओं में।
श्लोक 13 (12.68.13)
एवं विहन्याच्चारेण परचारं विचक्षणः । चारे च विहते सर्वं हतं भवति भारत ॥
evaṃ vihanyāccāreṇa paracāraṃ vicakṣaṇaḥ | cāre ca vihate sarvaṃ hataṃ bhavati bhārata
इस प्रकार बुद्धिमान राजा अपने गुप्तचरों से शत्रु के गुप्तचरों को निष्फल करे; क्योंकि हे भारत, गुप्तचर-तन्त्र के नष्ट हो जाने पर सब कुछ नष्ट हो जाता है।
श्लोक 14 (12.68.14)
यदा तु हीनं नृपतिर्विद्यादात्मानमात्मना । अमात्यैः सह संमन्त्र्य कुर्यात्सन्धिं बलीयसा ॥
yadā tu hīnaṃ nṛpatirvidyādātmānamātmanā | amātyaiḥ saha saṃmantrya kuryātsandhiṃ balīyasā
जब राजा स्वयं अपने को दुर्बल समझे, तब अमात्यों के साथ मन्त्रणा करके अपने से बलवान राजा के साथ सन्धि कर ले।
श्लोक 15 (12.68.15)
विद्वांसः क्षत्रिया वैश्या ब्राह्मणाश्च बहुश्रुताः । दण्डनीतौ तु निष्पन्ना मन्त्रिणः पृथिवीपते ॥
vidvāṃsaḥ kṣatriyā vaiśyā brāhmaṇāśca bahuśrutāḥ | daṇḍanītau tu niṣpannā mantriṇaḥ pṛthivīpate
हे पृथ्वीपति, विद्वान क्षत्रिय और वैश्य तथा बहुश्रुत ब्राह्मण, जो दण्डनीति में निपुण हों, मन्त्री होने योग्य हैं।
श्लोक 16 (12.68.16)
प्रष्टव्यो ब्राह्मणः पूर्वं नीतिशास्त्रस्य तत्ववित् । पश्चात्पृच्छेत भूपालः क्षत्रियं नीतिकोविदम् । वैश्यशूद्रौ तथा भूयः शास्त्रज्ञौ हितकारिणौ ॥
praṣṭavyo brāhmaṇaḥ pūrvaṃ nītiśāstrasya tatvavit | paścātpṛccheta bhūpālaḥ kṣatriyaṃ nītikovidam | vaiśyaśūdrau tathā bhūyaḥ śāstrajñau hitakāriṇau
राजा पहले नीतिशास्त्र के तत्त्व को जाननेवाले ब्राह्मण से पूछे; उसके बाद नीति में कुशल क्षत्रिय से पूछे; और फिर शास्त्र जाननेवाले तथा हित करनेवाले वैश्य और शूद्र से पूछे।
श्लोक 17 (12.68.17)
अज्ञायमाने हीनत्वे सन्धिं कुर्यात्परेण वै । लिप्सुर्वा कंचिदेवार्थं त्वरमाणो विचक्षणः ॥
ajñāyamāne hīnatve sandhiṃ kuryātpareṇa vai | lipsurvā kaṃcidevārthaṃ tvaramāṇo vicakṣaṇaḥ
जब तक उसकी दुर्बलता का पता न चला हो, तब तक बुद्धिमान राजा शत्रु से सन्धि कर ले; अथवा किसी विशेष प्रयोजन को पाने की इच्छा से शीघ्रता करे।
श्लोक 18 (12.68.18)
गुणवन्तो महोत्साहा धर्मज्ञाः साधवश्च ये । सन्दधीत नृपस्तैश्च राष्ट्रं धर्मेण पालयन् ॥
guṇavanto mahotsāhā dharmajñāḥ sādhavaśca ye | sandadhīta nṛpastaiśca rāṣṭraṃ dharmeṇa pālayan
राजा धर्म से राज्य का पालन करते हुए उन लोगों से मेल करे जो गुणवान, महान उत्साहवाले, धर्म के ज्ञाता और सज्जन हों।
श्लोक 19 (12.68.19)
उच्छिद्यमानमात्मानं ज्ञात्वा राजा महामतिः । पूर्वापकारिणो हन्याल्लोकद्विष्टांश्च सर्वशः ॥
ucchidyamānamātmānaṃ jñātvā rājā mahāmatiḥ | pūrvāpakāriṇo hanyāllokadviṣṭāṃśca sarvaśaḥ
जब बुद्धिमान राजा जान ले कि उसका स्वयं उन्मूलन हो रहा है, तब वह पहले अपकार करनेवालों को और उन सबको मार डाले जिनसे लोग द्वेष करते हैं।
श्लोक 20 (12.68.20)
यो नोपकर्तुं शक्नोति नापकर्तुं महीपतिः । न शक्यरूपश्चोद्धर्तुमुपेक्ष्यस्तादृशो भवेत् ॥
yo nopakartuṃ śaknoti nāpakartuṃ mahīpatiḥ | na śakyarūpaścoddhartumupekṣyastādṛśo bhavet
जो राजा न उपकार कर सकता है, न अपकार, और जिसका उन्मूलन भी सहज नहीं है, उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए।
श्लोक 21 (12.68.21)
यात्रां यायादविज्ञातमनाक्रन्दमनन्तरम् । व्यासक्तं च प्रमत्तं च दुर्बलं च विचक्षणः ॥
yātrāṃ yāyādavijñātamanākrandamanantaram | vyāsaktaṃ ca pramattaṃ ca durbalaṃ ca vicakṣaṇaḥ
बुद्धिमान राजा ऐसे शत्रु पर चुपचाप चढ़ाई करे जिसका कोई सहायक पुकारने को न हो, जिसके निकट कोई बन्धु न हो, जो अन्यत्र उलझा हो, असावधान हो या दुर्बल हो।
श्लोक 22 (12.68.22)
यात्रामाज्ञापयेद्वीरः कल्यः पुष्टबलः सुखी । पूर्वं कृत्वा विधानं च यात्रायां नगरे तथा ॥
yātrāmājñāpayedvīraḥ kalyaḥ puṣṭabalaḥ sukhī | pūrvaṃ kṛtvā vidhānaṃ ca yātrāyāṃ nagare tathā
जो वीर राजा स्वस्थ, पुष्ट सेनावाला और सुखी हो, वह पहले यात्रा और नगर दोनों के विषय में प्रबन्ध करके तब चढ़ाई की आज्ञा दे।
श्लोक 23 (12.68.23)
न च वश्यो भवेदस्य नृपो यश्चातिवीर्यवान् । हीनश्च बलवीर्याभ्यां कर्षयंस्तत्परो वसेत् ॥
na ca vaśyo bhavedasya nṛpo yaścātivīryavān | hīnaśca balavīryābhyāṃ karṣayaṃstatparo vaset
जो राजा उसके वश में नहीं आता, चाहे वह अत्यन्त पराक्रमी हो, अथवा बल और पराक्रम में हीन हो, उसे थकाने में तत्पर होकर वह डटा रहे।
श्लोक 24 (12.68.24)
राष्ट्रं च पीडयेत्तस्य शस्त्राग्निविषमूर्च्छनैः । अमात्यवल्लभानां च विवादांस्तस्य कारयेत् ॥
rāṣṭraṃ ca pīḍayettasya śastrāgniviṣamūrcchanaiḥ | amātyavallabhānāṃ ca vivādāṃstasya kārayet
वह उस राजा के राष्ट्र को शस्त्र, अग्नि, विष और मूर्छित करनेवाले प्रयोगों से पीड़ित करे, और उसके अमात्यों तथा प्रियजनों में झगड़े करवाए।
श्लोक 25 (12.68.25)
वर्जनीयं सदा युद्धं राज्यकामेन धीमता । उपायैस्त्रिभिरादानमर्थस्याह बृहस्पतिः ॥
varjanīyaṃ sadā yuddhaṃ rājyakāmena dhīmatā | upāyaistribhirādānamarthasyāha bṛhaspatiḥ
राज्य चाहनेवाले बुद्धिमान को युद्ध से सदा बचना चाहिए। बृहस्पति ने कहा है कि अर्थ की प्राप्ति तीन उपायों से होती है।
श्लोक 26 (12.68.26)
सान्त्वेन तु प्रदानेन भेदेन च नराधिप । यमर्थं शक्नुयात्प्राप्तुं तेन तुष्येत पण्डितः ॥
sāntvena tu pradānena bhedena ca narādhipa | yamarthaṃ śaknuyātprāptuṃ tena tuṣyeta paṇḍitaḥ
हे नराधिप, साम, दान और भेद से जो प्रयोजन वह पा सके, उसी से पण्डित को सन्तुष्ट हो जाना चाहिए।
श्लोक 27 (12.68.27)
आददीत बलिं चापि प्रजाभ्यः कुरुनन्दन । षड्भागममितप्रज्ञस्तासामेवाभिगुप्तये ॥
ādadīta baliṃ cāpi prajābhyaḥ kurunandana | ṣaḍbhāgamamitaprajñastāsāmevābhiguptaye
हे कुरुनन्दन, अपार बुद्धिवाला राजा प्रजा से कर के रूप में छठा भाग ले, पर उन्हीं की रक्षा के लिए।
श्लोक 28 (12.68.28)
दशाधर्मगतेभ्यो यद्वसु बह्वल्पमेव वा । तन्नाददीत सहसा पौराणां रक्षणाय वै ॥
daśādharmagatebhyo yadvasu bahvalpameva vā | tannādadīta sahasā paurāṇāṃ rakṣaṇāya vai
जो धन, थोड़ा हो या बहुत, उन लोगों का हो जो दस प्रकार की अयोग्य अवस्थाओं में पड़े हैं, उसे वह नगरवासियों की रक्षा के लिए अचानक न ले।
श्लोक 29 (12.68.29)
यथा पुत्रास्तथा पौरा द्रष्टव्यास्ते न संशयः । भक्तिश्चैषु न कर्तव्या व्यवहारप्रदर्शने ॥
yathā putrāstathā paurā draṣṭavyāste na saṃśayaḥ | bhaktiścaiṣu na kartavyā vyavahārapradarśane
तुम्हें नगरवासियों को पुत्रों के समान देखना चाहिए, इसमें सन्देह नहीं; परन्तु जब कोई मुकदमा सामने आए तब उनमें से किसी के प्रति पक्षपात नहीं करना चाहिए।
श्लोक 30 (12.68.30)
श्रोतुं चैव न्यसेद्राजा प्राज्ञान्सर्वार्थदर्शिनः । व्यवहारेषु सततं तत्र राज्यं प्रतिष्ठितम् ॥
śrotuṃ caiva nyasedrājā prājñānsarvārthadarśinaḥ | vyavahāreṣu satataṃ tatra rājyaṃ pratiṣṭhitam
राजा सब बातों को देखनेवाले बुद्धिमान लोगों को मुकदमे सुनने के लिए नियुक्त करे; व्यवहार (न्याय) पर ही राज्य प्रतिष्ठित है।
श्लोक 31 (12.68.31)
आकरे लवणे शुल्के तरे नागबले तथा । न्यसेदमात्यान्नृपतिः स्वाप्तान्वा पुरुषान्हितान् ॥
ākare lavaṇe śulke tare nāgabale tathā | nyasedamātyānnṛpatiḥ svāptānvā puruṣānhitān
खानों में, नमक के स्थानों में, चुंगी की चौकियों में, घाटों पर और हाथियों की सेना में राजा अमात्यों को, अथवा विश्वस्त और हितैषी पुरुषों को नियुक्त करे।
श्लोक 32 (12.68.32)
सम्यग्दण्डधरो नित्यं राजा धर्ममवाप्नुयात् । नृपस्य सततं दण्डः सम्यग्धर्मः प्रशस्यते ॥
samyagdaṇḍadharo nityaṃ rājā dharmamavāpnuyāt | nṛpasya satataṃ daṇḍaḥ samyagdharmaḥ praśasyate
जो राजा सदा ठीक प्रकार से दण्ड धारण करता है, वह धर्म को प्राप्त होता है। राजा के लिए ठीक रीति से दिया गया दण्ड सदा धर्म के रूप में प्रशंसित है।
श्लोक 33 (12.68.33)
वेदवेदाङ्गवित्प्राज्ञः सुतपस्वी नृपो भवेत् । दानशीलश्च सततं यज्ञशीलश्च भारत ॥
vedavedāṅgavitprājñaḥ sutapasvī nṛpo bhavet | dānaśīlaśca satataṃ yajñaśīlaśca bhārata
हे भारत, राजा वेद और वेदांगों का ज्ञाता, बुद्धिमान और उत्तम तपस्वी हो, तथा सदा दान और यज्ञ में तत्पर रहे।
श्लोक 34 (12.68.34)
एते गुणाः समस्ताः स्युर्नृपस्य सततं स्थिराः । व्यवहारस्य लोपेन कुतः स्वर्गः कुतो यशः ॥
ete guṇāḥ samastāḥ syurnṛpasya satataṃ sthirāḥ | vyavahārasya lopena kutaḥ svargaḥ kuto yaśaḥ
राजा में ये सब गुण सदा स्थिर रूप से हों, फिर भी यदि न्याय-व्यवहार का लोप हो जाए तो उसके लिए स्वर्ग कहाँ और यश कहाँ?
श्लोक 35 (12.68.35)
यदा तु पीडितो राजा भवेद्राज्ञा बलीयसा । तदाभिसंश्रयेद्दुर्गं बुद्धिमान्पृथिवीपतिः ॥
yadā tu pīḍito rājā bhavedrājñā balīyasā | tadābhisaṃśrayeddurgaṃ buddhimānpṛthivīpatiḥ
जब कोई राजा अपने से बलवान राजा से पीड़ित हो, तब बुद्धिमान राजा किसी दुर्ग का आश्रय ले।
श्लोक 36 (12.68.36)
विधावाक्रम्य मित्राणि विधानमुपकल्पयेत् । सामभेदान्विरोधार्थं विधानमुपकल्पयेत् ॥
vidhāvākramya mitrāṇi vidhānamupakalpayet | sāmabhedānvirodhārthaṃ vidhānamupakalpayet
विधि के अनुसार मित्रों के पास पहुँचकर वह अपना प्रबन्ध करे; और विरोध के लिए साम तथा भेद के द्वारा प्रबन्ध करे।
श्लोक 37 (12.68.37)
त्रिधा तु कृत्वा मित्राणि विधानमुपकल्पयेत् । घोषान्न्यसेत मार्गेषु ग्रामानुत्थापयेदपि । प्रवेशयेच्च तान्सर्वाञ्शाखानगरकेष्वपि ॥
tridhā tu kṛtvā mitrāṇi vidhānamupakalpayet | ghoṣānnyaseta mārgeṣu grāmānutthāpayedapi | praveśayecca tānsarvāñśākhānagarakeṣvapi
मित्रों को तीन भागों में बाँटकर वह अपना प्रबन्ध करे। वह घोषों (ग्वालों की बस्तियों) को मार्गों पर बसाए, गाँवों को वहाँ से हटवाए, और उन सबको शाखा-नगरों में पहुँचा दे।
श्लोक 38 (12.68.38)
ये गुप्ताश्चैव दुर्गाश्च देशास्तेषु प्रवेशयेत् । धनिनो बलमुख्यांश्च सान्त्वयित्वा पुनः पुनः ॥
ye guptāścaiva durgāśca deśāsteṣu praveśayet | dhanino balamukhyāṃśca sāntvayitvā punaḥ punaḥ
जो प्रदेश छिपे हुए और दुर्गम हों, उनमें वह इन्हें बसा दे, और धनवानों तथा सेना के प्रमुखों को बार-बार सान्त्वना देता रहे।
श्लोक 39 (12.68.39)
सस्याभिहारं कुर्वीत स्वयमेव नराधिपः । असंभवे प्रवेशस्य दाहयेदग्निना भृशम् ॥
sasyābhihāraṃ kurvīta svayameva narādhipaḥ | asaṃbhave praveśasya dāhayedagninā bhṛśam
राजा स्वयं खड़ी फ़सल को हटा ले; यदि उसे भीतर ले जाना सम्भव न हो तो उसे आग से पूरी तरह जला दे।
श्लोक 40 (12.68.40)
क्षेत्रस्थेषु च सस्येषु शत्रोरुपजपेन्नरान् । विनाशयेद्वा तत्सर्वं बलेनाथ स्वकेन वै ॥
kṣetrastheṣu ca sasyeṣu śatrorupajapennarān | vināśayedvā tatsarvaṃ balenātha svakena vai
खेतों में फ़सल खड़ी रहते हुए वह शत्रु के आदमियों को अपनी ओर फोड़ ले, अथवा अपनी ही सेना से उस सबका नाश कर दे।
श्लोक 41 (12.68.41)
नदीमार्गेषु च तथा संक्रमानवसादयेत् । जलं विस्रावयेत्सर्वमविस्राव्यं च दूषयेत् ॥
nadīmārgeṣu ca tathā saṃkramānavasādayet | jalaṃ visrāvayetsarvamavisrāvyaṃ ca dūṣayet
इसी प्रकार नदी के मार्गों पर वह पुलों और उतरने के साधनों को तुड़वा दे; जो जल बहाया जा सके उसे सारा बहा दे, और जो न बहाया जा सके उसे दूषित कर दे।
श्लोक 42 (12.68.42)
तदात्वेनायतीभिश्च निवसेद्भूम्यनन्तरम् । प्रतिघातं परस्याजौ युद्धकालेऽप्युपस्थिते ॥
tadātvenāyatībhiśca nivasedbhūmyanantaram | pratighātaṃ parasyājau yuddhakāle'pyupasthite
वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए वह पास की भूमि में टिके, ताकि युद्ध का समय आ पहुँचने पर भी शत्रु के विरुद्ध प्रतिरोध बना रहे।
श्लोक 43 (12.68.43)
दुर्गाणां चाभितो राजा मूलच्छेदं प्रकारयेत् । सर्वेषां क्षुद्रवृक्षाणां चैत्यवृक्षान्विवर्जयेत् ॥
durgāṇāṃ cābhito rājā mūlacchedaṃ prakārayet | sarveṣāṃ kṣudravṛkṣāṇāṃ caityavṛkṣānvivarjayet
राजा दुर्गों के चारों ओर सब छोटे वृक्षों को जड़ से कटवा दे, पर चैत्यवृक्षों को छोड़ दे।
श्लोक 44 (12.68.44)
प्रवृद्धानां च वृक्षाणां शाखां प्रच्छेदयेत्तथा । चैत्यानां सर्वथा त्याज्यमपि पत्रस्य पातनम् ॥
pravṛddhānāṃ ca vṛkṣāṇāṃ śākhāṃ pracchedayettathā | caityānāṃ sarvathā tyājyamapi patrasya pātanam
बड़े हो चुके वृक्षों की डालियाँ भी कटवा दे; पर चैत्यों में तो पत्ता तक गिराना सर्वथा त्याज्य है।
श्लोक 45 (12.68.45)
देवानामाश्रयाश्चैत्या यक्षराक्षसभोगिनाम् । पिशाचपन्नगानां च गन्धर्वाप्सरसामपि । रौद्राणां चैव भूतानां तस्मात्तान्परिवर्जयेत् ॥
devānāmāśrayāścaityā yakṣarākṣasabhoginām | piśācapannagānāṃ ca gandharvāpsarasāmapi | raudrāṇāṃ caiva bhūtānāṃ tasmāttānparivarjayet
चैत्यवृक्ष देवताओं के, यक्षों, राक्षसों और भोगियों (सर्पों) के, पिशाचों और पन्नगों के, गन्धर्वों और अप्सराओं के तथा भयंकर भूतों के निवास हैं; इसलिए उन्हें छोड़ देना चाहिए।
श्लोक 46 (12.68.46)
श्रूयते हि निकुम्भेन सौदासस्य बलं हतम् । महेश्वरगणेशेन वाराणस्यां नराधिप ॥
śrūyate hi nikumbhena saudāsasya balaṃ hatam | maheśvaragaṇeśena vārāṇasyāṃ narādhipa
क्योंकि सुना जाता है कि महेश्वर के गणों के अधिपति निकुम्भ ने वाराणसी में सौदास की सेना का संहार कर दिया था, हे नराधिप।
श्लोक 47 (12.68.47)
प्रगण्डीः कारयेत्सम्यगाकाशजननीस्तदा । आपूरयेच्च परिखां स्थाणुनक्रझषाकुलाम् ॥
pragaṇḍīḥ kārayetsamyagākāśajananīstadā | āpūrayecca parikhāṃ sthāṇunakrajhaṣākulām
वह परकोटे के चबूतरों और दीवार के झरोखों को ठीक से बनवाए, और खाई को जल से भर दे, जो काँटेदार खूँटों, मगरों और मछलियों से भरी हो।
श्लोक 48 (12.68.48)
सङ्कटद्वारकाणि स्युरुच्छ्वासार्थं पुरस्य च । तेषां च द्वारवद्गुप्तिः कार्या सर्वात्मना भवेत् ॥
saṅkaṭadvārakāṇi syurucchvāsārthaṃ purasya ca | teṣāṃ ca dvāravadguptiḥ kāryā sarvātmanā bhavet
नगर के आने-जाने की सुविधा के लिए सँकरे छोटे द्वार भी हों, और उनकी रक्षा भी पूरे प्रयत्न से मुख्य द्वारों के समान की जाए।
श्लोक 49 (12.68.49)
द्वारेषु च गुरूण्येव यन्त्राणि स्थापयेत्सदा । आरोपयेच्छतघ्नीश्च स्वाधीनानि च कारयेत् ॥
dvāreṣu ca gurūṇyeva yantrāṇi sthāpayetsadā | āropayecchataghnīśca svādhīnāni ca kārayet
द्वारों पर वह सदा भारी यन्त्र लगवाए, शतघ्नियाँ चढ़वाए और उन्हें अपने ही अधीन रखे।
श्लोक 50 (12.68.50)
काष्ठानि चाभिहार्याणि तथा कूपांश्च खानयेत् । संशोधयेत्तथा कूपान्कृतान्पूर्वं पयोर्थिभिः ॥
kāṣṭhāni cābhihāryāṇi tathā kūpāṃśca khānayet | saṃśodhayettathā kūpānkṛtānpūrvaṃ payorthibhiḥ
वह जलाने की लकड़ी जमा करे और कुएँ खुदवाए, और पानी चाहनेवालों ने पहले जो कुएँ बनाए थे, उनकी सफ़ाई करवाए।
श्लोक 51 (12.68.51)
तृणच्छन्नानि वेश्मानि पङ्केनाथ प्रलेपयेत् । निर्हरेच्च तृणं मासि चैत्रे वह्निभयात्पुरा ॥
tṛṇacchannāni veśmāni paṅkenātha pralepayet | nirharecca tṛṇaṃ māsi caitre vahnibhayātpurā
घास से छाए हुए घरों पर वह कीचड़ का लेप करवा दे, और चैत्र मास में आग के भय से पहले ही घास हटवा दे।
श्लोक 52 (12.68.52)
नक्तमेव च भक्तानि पाचयेत नराधिपः । न दिवा ज्वालयेदग्निं वर्जयित्वाऽऽग्निहोत्रिकम् ॥
naktameva ca bhaktāni pācayeta narādhipaḥ | na divā jvālayedagniṃ varjayitvā''gnihotrikam
राजा भोजन रात में ही पकवाए, और दिन में अग्नि न जलाई जाए, केवल अग्निहोत्र की अग्नि को छोड़कर।
श्लोक 53 (12.68.53)
यथासंभवशैलानि चैष्टकानि च कारयेत् । मृण्मयानि च कुर्वीत ज्ञात्वा देशं बलाबलम् ॥
yathāsaṃbhavaśailāni caiṣṭakāni ca kārayet | mṛṇmayāni ca kurvīta jñātvā deśaṃ balābalam
जहाँ तक सम्भव हो वह पत्थर की और ईंट की वस्तुएँ बनवाए, और स्थान तथा बलाबल को समझकर मिट्टी की भी बनवाए।
श्लोक 54 (12.68.54)
कर्मारारिष्टशालासु ज्वलेदग्निः सुरक्षितः । गृहाणि च प्रवेश्यान्तर्विधेयः स्याद्धुताशनः ॥
karmārāriṣṭaśālāsu jvaledagniḥ surakṣitaḥ | gṛhāṇi ca praveśyāntarvidheyaḥ syāddhutāśanaḥ
अग्नि केवल लुहारों की शालाओं और प्रसूति-गृहों में, भली-भाँति सुरक्षित रहकर जले; और घरों के भीतर आने पर भी अग्नि को नियन्त्रण में रखा जाए।
श्लोक 55 (12.68.55)
महादण्डश्च तस्य स्याद्यस्याग्निर्वै दिवा भवेत् । प्रघोषयेदथैवं च रक्षणार्थं पुरस्य च ॥
mahādaṇḍaśca tasya syādyasyāgnirvai divā bhavet | praghoṣayedathaivaṃ ca rakṣaṇārthaṃ purasya ca
जिसके यहाँ दिन में अग्नि जलती पाई जाए, उसे भारी दण्ड मिले; नगर की रक्षा के लिए यह घोषणा भी करवा दी जाए।
श्लोक 56 (12.68.56)
भिक्षुकांश्चाक्रिकांश्चैव क्लीबोन्मत्तान्कुशीलवान् । बाह्यान्कुर्यान्नरश्रेष्ठ दोषाय स्युर्हि ते शठाः ॥
bhikṣukāṃścākrikāṃścaiva klībonmattānkuśīlavān | bāhyānkuryānnaraśreṣṭha doṣāya syurhi te śaṭhāḥ
हे नरश्रेष्ठ, भिक्षुकों, गाड़ीवानों, नपुंसकों, पागलों और नट-गायकों को वह नगर से बाहर रखे; क्योंकि वे धूर्त हानि पहुँचा सकते हैं।
श्लोक 57 (12.68.57)
चत्वरेष्वथ तीर्थेषु सभास्वावसथेषु च । यथार्थवर्णं प्रणिधिं कुर्यात्सर्वत्र पार्थिवः ॥
catvareṣvatha tīrtheṣu sabhāsvāvasatheṣu ca | yathārthavarṇaṃ praṇidhiṃ kuryātsarvatra pārthivaḥ
चौराहों पर, तीर्थों पर, सभाभवनों में और धर्मशालाओं में राजा सर्वत्र स्थान के अनुकूल वर्ण और वेष के गुप्तचर नियुक्त करे।
श्लोक 58 (12.68.58)
विशालान्राजमार्गांश्च कारयेत नराधिपः । प्रपाश्च विपणीश्चैव यथोद्देशं समादिशेत् ॥
viśālānrājamārgāṃśca kārayeta narādhipaḥ | prapāśca vipaṇīścaiva yathoddeśaṃ samādiśet
राजा चौड़े राजमार्ग बनवाए, और प्याऊ तथा दुकानों को उनके उचित स्थानों पर बनाने का आदेश दे।
श्लोक 59 (12.68.59)
भाण्डागारायुधागारान्धान्यागारांश्च सर्वशः । अश्वागारान्गजागारान्बलाधिकरणानि च ॥
bhāṇḍāgārāyudhāgārāndhānyāgārāṃśca sarvaśaḥ | aśvāgārāngajāgārānbalādhikaraṇāni ca
सब कहीं भण्डारगृह, शस्त्रागार और अन्नागार, घोड़ों की अश्वशालाएँ, हाथियों की गजशालाएँ तथा सेना के कार्यालय बनाए जाएँ।
श्लोक 60 (12.68.60)
परिखाश्चैव कौरव्य प्रतोलीसङ्कटानि च । न जातु कश्चित्पश्येत गुह्यमेतद्युधिष्ठिर ॥
parikhāścaiva kauravya pratolīsaṅkaṭāni ca | na jātu kaścitpaśyeta guhyametadyudhiṣṭhira
हे कौरव, खाइयाँ, फाटक और सँकरे मार्ग: इन्हें कोई कभी न देखे; हे युधिष्ठिर, यह गुप्त रखने की बात है।
श्लोक 61 (12.68.61)
अर्थसंनिचयं कुर्याद्राजा परबलार्दितः । तैलं मधु घृतं सस्यमौषधानि च सर्वशः ॥
arthasaṃnicayaṃ kuryādrājā parabalārditaḥ | tailaṃ madhu ghṛtaṃ sasyamauṣadhāni ca sarvaśaḥ
शत्रु की सेना से पीड़ित राजा सामग्री का संचय करे: तेल, मधु, घी, अनाज और सब प्रकार की औषधियाँ।
श्लोक 62 (12.68.62)
अङ्गारकुशमुञ्जानां पलाशशरवर्णिनाम् । यवसेन्धनदिग्धानां कारयेत च संचयान् ॥
aṅgārakuśamuñjānāṃ palāśaśaravarṇinām | yavasendhanadigdhānāṃ kārayeta ca saṃcayān
वह कोयले, कुश और मूँज, पलाश की लकड़ी और लिखने के सरकण्डों, चारे, ईंधन तथा विष-बुझे बाणों के भण्डार इकट्ठे करवाए।
श्लोक 63 (12.68.63)
आयुधानां च सर्वेषां शक्त्यृष्टिप्रासचर्मणाम् । संचयानेवमादीनां कारयेत नराधिपः ॥
āyudhānāṃ ca sarveṣāṃ śaktyṛṣṭiprāsacarmaṇām | saṃcayānevamādīnāṃ kārayeta narādhipaḥ
राजा इसी प्रकार सब प्रकार के आयुधों का संग्रह भी करवाए: शक्ति, ऋष्टि, प्रास, ढाल और ऐसे ही अन्य।
श्लोक 64 (12.68.64)
औषधानि च सर्वाणि मूलानि च फलानि च । चतुर्विधांश्च वैद्यान्वै संगृह्णीयाद्विशेषतः ॥
auṣadhāni ca sarvāṇi mūlāni ca phalāni ca | caturvidhāṃśca vaidyānvai saṃgṛhṇīyādviśeṣataḥ
सब औषधियाँ, कन्द-मूल और फल, और विशेष रूप से चारों प्रकार के वैद्य, वह एकत्र करे।
श्लोक 65 (12.68.65)
नटांश्च नर्तकांश्चैव मल्लान्मायाविनस्तथा । शोभयेयुः पुरवरं मोदयेयुश्च सर्वशः ॥
naṭāṃśca nartakāṃścaiva mallānmāyāvinastathā | śobhayeyuḥ puravaraṃ modayeyuśca sarvaśaḥ
नट और नर्तक, पहलवान और जादूगर: वे उस श्रेष्ठ नगर को सजाएँ और सब ओर लोगों को आनन्द दें।
श्लोक 66 (12.68.66)
यतः शङ्का भवेच्चापि भृत्यतोऽथापि मन्त्रितः । पौरेभ्यो नृपतेर्वापि स्वाधीनान्कारयेत तान् ॥
yataḥ śaṅkā bhaveccāpi bhṛtyato'thāpi mantritaḥ | paurebhyo nṛpatervāpi svādhīnānkārayeta tān
जहाँ भृत्य से, मन्त्री से, नगरवासियों से या राजा से भी शंका हो, वहाँ वह उन लोगों को अपने अधीन कर ले।
श्लोक 67 (12.68.67)
कृते कर्माणि राजा तान्पूजयेद्धनसंचयैः । माननेन यथार्हेण सान्त्वेन विविधेन च ॥
kṛte karmāṇi rājā tānpūjayeddhanasaṃcayaiḥ | mānanena yathārheṇa sāntvena vividhena ca
काम पूरा हो जाने पर राजा उन्हें धन की राशियों से, यथोचित सम्मान से और नाना प्रकार की सान्त्वना से सम्मानित करे।
श्लोक 68 (12.68.68)
निर्वेदयित्वा तु परं हत्वा वा कुरुनन्दन । गतानृण्यो भवेद्राजा यथा शास्त्रे निदर्शितम् ॥
nirvedayitvā tu paraṃ hatvā vā kurunandana | gatānṛṇyo bhavedrājā yathā śāstre nidarśitam
हे कुरुनन्दन, शत्रु को झुकाकर या उसे मारकर राजा ऋण से मुक्त हो जाता है, जैसा शास्त्र में बताया गया है।
श्लोक 69 (12.68.69)
राज्ञा सप्तैव रक्ष्याणि तानि चैव निबोध मे । आत्माऽमात्याश्च कोशाश्च दण्डो मित्राणि चैव हि ॥
rājñā saptaiva rakṣyāṇi tāni caiva nibodha me | ātmā'mātyāśca kośāśca daṇḍo mitrāṇi caiva hi
राजा को सात वस्तुओं की रक्षा करनी चाहिए; उन्हें मुझसे सुनिए: स्वयं अपनी, अमात्यों की, कोशों की, दण्ड (सेना) की और मित्रों की,
श्लोक 70 (12.68.70)
तथा जनपदाश्चैव पुरं च कुरुनन्दन । एतत्सप्तात्मकं राज्यं परिपाल्यं प्रयत्नतः ॥
tathā janapadāścaiva puraṃ ca kurunandana | etatsaptātmakaṃ rājyaṃ paripālyaṃ prayatnataḥ
और इसी प्रकार जनपदों की तथा राजधानी की भी, हे कुरुनन्दन। राज्य इन सात अंगोंवाला है, और उसकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 71 (12.68.71)
षाङ्गुण्यं च त्रिवर्गं च त्रिवर्गपरमं तथा । यो वेत्ति पुरुषव्याघ्र स भुङ्क्ते पृथिवीमिमाम् ॥
ṣāṅguṇyaṃ ca trivargaṃ ca trivargaparamaṃ tathā | yo vetti puruṣavyāghra sa bhuṅkte pṛthivīmimām
हे पुरुषव्याघ्र, जो षाड्गुण्य को, त्रिवर्ग को और त्रिवर्ग से परे जो श्रेष्ठ है उसको जानता है, वह इस पृथ्वी का भोग करता है।
श्लोक 72 (12.68.72)
षाङ्गुण्यमिति यत्प्रोक्तं तन्निबोध युधिष्ठिर । सन्धायासनमित्येव यात्रासन्धानमेव च ॥
ṣāṅguṇyamiti yatproktaṃ tannibodha yudhiṣṭhira | sandhāyāsanamityeva yātrāsandhānameva ca
हे युधिष्ठिर, जिसे षाड्गुण्य कहा गया है, उसे सुनिए: सन्धि करके टिके रहना, और सन्धि करके चढ़ाई करना;
श्लोक 73 (12.68.73)
विगृह्यासनमित्येव यात्रां संपरिगृह्य च । द्वैधीभावस्तथाऽन्येषां संश्रयोऽथ परस्य च ॥
vigṛhyāsanamityeva yātrāṃ saṃparigṛhya ca | dvaidhībhāvastathā'nyeṣāṃ saṃśrayo'tha parasya ca
युद्ध करके टिके रहना, और चढ़ाई के लिए सब साधन जुटाकर आगे बढ़ना; दूसरों के प्रति दुहरी नीति; और किसी अन्य का आश्रय लेना।
श्लोक 74 (12.68.74)
त्रिवर्गश्चापि यः प्रोक्तस्तमिहैकमनाः शृणु । क्षयः स्थानं च वृद्धिश्च त्रिवर्गः परमस्तथा ॥
trivargaścāpi yaḥ proktastamihaikamanāḥ śṛṇu | kṣayaḥ sthānaṃ ca vṛddhiśca trivargaḥ paramastathā
जिस त्रिवर्ग का उल्लेख हुआ था, उसे अब एकाग्र मन से सुनिए: क्षय, स्थिति और वृद्धि; और उसी प्रकार परम त्रिवर्ग भी।
श्लोक 75 (12.68.75)
धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रिवर्गो वै सनातनः । मन्त्रश्चैव प्रभावश्च उत्साहश्चैव तान्त्रिकः । शक्तित्रयं समाख्यातं त्रिवर्गस्य च तत्परम् ॥
dharmaścārthaśca kāmaśca trivargo vai sanātanaḥ | mantraścaiva prabhāvaśca utsāhaścaiva tāntrikaḥ | śaktitrayaṃ samākhyātaṃ trivargasya ca tatparam
धर्म, अर्थ और काम सनातन त्रिवर्ग हैं। मन्त्र, प्रभाव और उत्साह, ये शासन-तन्त्र की तीन शक्तियाँ बताई गई हैं; और उस त्रिवर्ग से परे जो है, वही परम है।
श्लोक 76 (12.68.76)
कार्यं च कारणं चैव कर्ता च परिकीर्तितः । एतत्परतरं विद्यान्त्रिवर्गादपि भारत । सर्वेषां च क्षये राजन्यस्त्रिवर्गः सनातनः ॥
kāryaṃ ca kāraṇaṃ caiva kartā ca parikīrtitaḥ | etatparataraṃ vidyāntrivargādapi bhārata | sarveṣāṃ ca kṣaye rājanyastrivargaḥ sanātanaḥ
कार्य, कारण और कर्ता, ये कहे गए हैं। हे भारत, इसे त्रिवर्ग से भी परे जानिए; हे राजन्, सबके क्षय होने पर भी जो त्रिवर्ग सनातन रहता है, वही यह है।
श्लोक 77 (12.68.77)
सत्वं रजस्तमश्चैव त्रिवर्गकरणं स्मृतम् । तेनात्यन्तविमुक्तश्च मुक्तः पुरुष उच्यते ॥
satvaṃ rajastamaścaiva trivargakaraṇaṃ smṛtam | tenātyantavimuktaśca muktaḥ puruṣa ucyate
सत्त्व, रज और तम को त्रिवर्ग का साधन कहा गया है। जो पुरुष उससे पूरी तरह छूट गया है, वह मुक्त कहलाता है।
श्लोक 78 (12.68.78)
कार्यस्य सर्वथा नाशो मोक्ष इत्यभिधीयते । तेन मोक्षपरश्चैव देवदेवः पितामहः । तुष्ट्यर्थस्य त्रिवर्गस्य रक्षामाह पितामहः ॥
kāryasya sarvathā nāśo mokṣa ityabhidhīyate | tena mokṣaparaścaiva devadevaḥ pitāmahaḥ | tuṣṭyarthasya trivargasya rakṣāmāha pitāmahaḥ
कार्य का सर्वथा नाश मोक्ष कहलाता है। इसी से देवों के देव पितामह मोक्ष में लगे रहते हैं, फिर भी पितामह ने तुष्टि के लिए त्रिवर्ग की रक्षा की बात कही है।
श्लोक 79 (12.68.79)
जगतो लौकिकी यात्रा यत्र नित्यं प्रतिष्ठिता । धर्मोऽर्थश्चैव कामश्च सेवितव्याः स्वकालतः ॥
jagato laukikī yātrā yatra nityaṃ pratiṣṭhitā | dharmo'rthaścaiva kāmaśca sevitavyāḥ svakālataḥ
जिस पर संसार की लौकिक यात्रा सदा टिकी हुई है, वह यही है। धर्म, अर्थ और काम का अपने-अपने समय पर सेवन करना चाहिए।
श्लोक 80 (12.68.80)
सेवा धर्मस्य कर्तव्या सततं भूरिवत्सरैः । पुरुषैर्नरशार्दूल तन्मूलाः सर्वथा क्रियाः ॥
sevā dharmasya kartavyā satataṃ bhūrivatsaraiḥ | puruṣairnaraśārdūla tanmūlāḥ sarvathā kriyāḥ
हे नरशार्दूल, मनुष्यों को अपने जीवन के अनेक वर्षों तक निरन्तर धर्म की सेवा करनी चाहिए; सब कर्मों की जड़ वही है।
श्लोक 81 (12.68.81)
धर्मेण च महीपालश्चिरं रक्षति मेदिनीम् । यः कश्चिद्धार्मिको राजा स विपन्नोऽपि भूपतिः । अर्थकामविहीनोऽपि चिरं पालयते महीम् ॥
dharmeṇa ca mahīpālaściraṃ rakṣati medinīm | yaḥ kaściddhārmiko rājā sa vipanno'pi bhūpatiḥ | arthakāmavihīno'pi ciraṃ pālayate mahīm
धर्म से राजा बहुत समय तक पृथ्वी की रक्षा करता है। जो भी राजा धार्मिक है, वह विपत्ति में पड़ा हो और अर्थ तथा काम से रहित हो, तब भी चिरकाल तक पृथ्वी का पालन करता है।
श्लोक 82 (12.68.82)
अस्मिन्नर्थे हि द्वौ श्लोकौ गीतावङ्गिरसा स्वयम् । यादवीपुत्र भद्रं ते श्रोतुमर्हसि तावपि ॥
asminnarthe hi dvau ślokau gītāvaṅgirasā svayam | yādavīputra bhadraṃ te śrotumarhasi tāvapi
इस विषय में स्वयं अंगिरा ने दो श्लोक गाए थे। हे यादवी के पुत्र, आपका कल्याण हो; आपको उन्हें भी सुनना चाहिए।
श्लोक 83 (12.68.83)
कृत्वा कार्याणि धर्मेण सम्यक्संपाल्य मेदिनीम् । पालयित्वा तथा पौरान्परत्र सुखमेधते ॥
kṛtvā kāryāṇi dharmeṇa samyaksaṃpālya medinīm | pālayitvā tathā paurānparatra sukhamedhate
धर्म के अनुसार अपने कर्तव्य पूरे करके, पृथ्वी का ठीक पालन करके और नगरवासियों की रक्षा करके राजा परलोक में सुख पाता है।
श्लोक 84 (12.68.84)
किं तस्य तपसा राज्ञः किंच तस्याध्वरैः कृतैः । सुपालिताः प्रजा यस्य सर्वधर्मकृदेव सः ॥
kiṃ tasya tapasā rājñaḥ kiṃca tasyādhvaraiḥ kṛtaiḥ | supālitāḥ prajā yasya sarvadharmakṛdeva saḥ
उस राजा को तप से क्या प्रयोजन, और किए हुए यज्ञों से भी क्या? जिसकी प्रजा भली-भाँति पाली जाती है, वह स्वयं ही सब धर्म करनेवाला है।
श्लोक 85 (12.68.85)
श्लोकाश्चोशनसा गीतास्तान्निबोध युधिष्ठिर । दण्डनीतेश्च यन्मूलं त्रिवर्गस्य च भूपते ॥
ślokāścośanasā gītāstānnibodha yudhiṣṭhira | daṇḍanīteśca yanmūlaṃ trivargasya ca bhūpate
उशना ने भी श्लोक गाए हैं; हे युधिष्ठिर, उन्हें जानिए: वे दण्डनीति के और त्रिवर्ग के मूल के विषय में हैं, हे राजन्।
श्लोक 86 (12.68.86)
भार्गवाङ्गिरसं कर्म षोडशाङ्गं च यद्बलम् । विषं माया च दैवं च पौरुषं चात्मसिद्धये ॥
bhārgavāṅgirasaṃ karma ṣoḍaśāṅgaṃ ca yadbalam | viṣaṃ māyā ca daivaṃ ca pauruṣaṃ cātmasiddhaye
भार्गव और आंगिरस का कर्म, सोलह अंगोंवाला बल, विष, माया, दैव और पुरुषार्थ: ये अपनी सिद्धि के लिए हैं।
श्लोक 87 (12.68.87)
प्रागुदक्प्रवणं दुर्गं समासाद्य महीपतिः । त्रिवर्गत्रयसंपूर्णमुपादाय तमुद्वहेत् ॥
prāgudakpravaṇaṃ durgaṃ samāsādya mahīpatiḥ | trivargatrayasaṃpūrṇamupādāya tamudvahet
पूर्वोत्तर की ओर ढालवाले दुर्ग को पाकर और तीनों त्रिवर्गों से पूर्ण साधन को अपनाकर राजा उस भार को वहन करे।
श्लोक 88 (12.68.88)
षट्पञ्च च विनिर्जित्य दश चाष्टौ च भूपतिः । त्रिवर्गैर्दशभिर्युक्तः सुरैरपि न जीर्यते ॥
ṣaṭpañca ca vinirjitya daśa cāṣṭau ca bhūpatiḥ | trivargairdaśabhiryuktaḥ surairapi na jīryate
जो राजा छह और पाँच को, तथा दस और आठ को जीतकर दस त्रिवर्गों से युक्त होता है, वह देवताओं से भी क्षीण नहीं किया जा सकता।
श्लोक 89 (12.68.89)
न बुद्धिं परिगृह्णीत स्त्रीणां मूर्खजनस्य च । दैवोपहतबुद्धीनां ये च वेदैर्विवर्जिताः । न तेषां शृणुयाद्राजा बुद्धिस्तेषां पराङ्मुखी ॥
na buddhiṃ parigṛhṇīta strīṇāṃ mūrkhajanasya ca | daivopahatabuddhīnāṃ ye ca vedairvivarjitāḥ | na teṣāṃ śṛṇuyādrājā buddhisteṣāṃ parāṅmukhī
वह स्त्रियों, मूर्ख जनों, दैव से मारी गई बुद्धिवालों और वेदों से रहित लोगों की बुद्धि को न माने। राजा उनकी बात न सुने, क्योंकि उनकी बुद्धि सत्य से विमुख है।
श्लोक 90 (12.68.90)
स्त्रीप्रधानानि राज्यानि विद्वद्भिर्वर्जितानि च । मूर्खामात्याग्नितप्तानि शुष्यन्ते जलबिन्दुवत् ॥
strīpradhānāni rājyāni vidvadbhirvarjitāni ca | mūrkhāmātyāgnitaptāni śuṣyante jalabinduvat
जिन राज्यों में स्त्रियों की प्रधानता है, जो विद्वानों से रहित हैं और मूर्ख अमात्यों की अग्नि से तपे हुए हैं, वे जल की बूँदों की तरह सूख जाते हैं।
श्लोक 91 (12.68.91)
विद्वांसः प्रथिता ये च ये चाप्ताः सर्वकर्मसु । युद्धेषु दृष्टकर्माणस्तेषां च शृणुयान्नृपः ॥
vidvāṃsaḥ prathitā ye ca ye cāptāḥ sarvakarmasu | yuddheṣu dṛṣṭakarmāṇasteṣāṃ ca śṛṇuyānnṛpaḥ
राजा उनकी सुने जो विद्वान और प्रसिद्ध हों, सब कार्यों में विश्वसनीय हों और जिनके कर्म युद्धों में देखे जा चुके हों।
श्लोक 92 (12.68.92)
दैवं पुरुषकारं च त्रिवर्गं च समाश्रितः । दैवतानि च विप्रांश्च प्रणम्य विजयी भवेत् ॥
daivaṃ puruṣakāraṃ ca trivargaṃ ca samāśritaḥ | daivatāni ca viprāṃśca praṇamya vijayī bhavet
दैव, पुरुषार्थ और त्रिवर्ग का आश्रय लेकर तथा देवताओं और ब्राह्मणों को प्रणाम करके वह विजयी होगा।