शान्ति पर्व · अध्याय 67
बृहस्पति का राजा वसुमना को उपदेश
युधिष्ठिर पूछते हैं कि ब्राह्मण राजा को किस अर्थ में देवता कहते हैं। भीष्म कोसल के राजा वसुमना की पुरानी कथा सुनाते हैं, जिन्होंने बृहस्पति से पूछा कि प्राणी किससे बढ़ते हैं और किससे घटते हैं। बृहस्पति बताते हैं कि रक्षक राजा के बिना संसार कैसे नष्ट होता है और राजा के रहते कैसे सुरक्षित रहता है; राजा मनुष्य-रूप में महान् देवता है जो समय-समय पर अग्नि, सूर्य, मृत्यु, यम और कुबेर बनता है, इसलिए मनुष्यों को उसका सम्मान और सेवा करनी चाहिए। इसके बाद वसुमना प्रजा का उत्तम पालन करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.67.1)
किमाहुर्दैवतं विप्रा राजानं भरतर्षभ । मनुष्याणामधिपतिं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kimāhurdaivataṃ viprā rājānaṃ bharatarṣabha | manuṣyāṇāmadhipatiṃ tanme brūhi pitāmaha
हे भरतश्रेष्ठ, ब्राह्मण मनुष्यों के अधिपति राजा को किस देवता के रूप में बताते हैं? पितामह, यह मुझे कहिए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.67.2)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । बृहस्पतिं वसुमना यथा पप्रच्छ भारत ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | bṛhaspatiṃ vasumanā yathā papraccha bhārata
इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं: हे भारत, वसुमना ने बृहस्पति से किस प्रकार प्रश्न किया था।
श्लोक 3 (12.67.3)
राजा वसुमना नाम कौसल्यो धीमतां वरः । महर्षि किल पप्रच्छ कृतप्रज्ञं बृहस्पतिम् ॥
rājā vasumanā nāma kausalyo dhīmatāṃ varaḥ | maharṣi kila papraccha kṛtaprajñaṃ bṛhaspatim
वसुमना नाम के एक कोसलराज थे, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ थे। कहते हैं कि उन्होंने स्थिर प्रज्ञा वाले महर्षि बृहस्पति से प्रश्न किया।
श्लोक 4 (12.67.4)
सर्वं वैनयिकं कृत्वा विनयज्ञो बृहस्पतिम् । दक्षिणानन्तरो भूत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम् ॥
sarvaṃ vainayikaṃ kṛtvā vinayajño bṛhaspatim | dakṣiṇānantaro bhūtvā praṇamya vidhipūrvakam
बृहस्पति के प्रति सब शिष्टाचार पूरा करके, विनय के जानकार वसुमना उनके दाहिनी ओर समीप खड़े हुए और विधिपूर्वक प्रणाम करके
श्लोक 5 (12.67.5)
विधिं पप्रच्छ राज्यस्य सर्वलोकहिते रतः । प्रजानां सुखमन्विच्छन्धर्मशीलं बृहस्पतिम् ॥
vidhiṃ papraccha rājyasya sarvalokahite rataḥ | prajānāṃ sukhamanvicchandharmaśīlaṃ bṛhaspatim
सब प्राणियों के हित में लगे हुए और प्रजा का सुख चाहने वाले उन्होंने धर्मशील बृहस्पति से राज्य की विधि के विषय में पूछा।
वसुमना उवाच
श्लोक 6 (12.67.6)
केन भूतानि वर्धन्ते क्षयं गच्छन्ति केन वा । कमर्चन्तो महाप्राज्ञ सुखमव्ययमाप्नुयुः । एतन्मे शंस देवर्षे धर्मकामार्थसंशयम् ॥
kena bhūtāni vardhante kṣayaṃ gacchanti kena vā | kamarcanto mahāprājña sukhamavyayamāpnuyuḥ | etanme śaṃsa devarṣe dharmakāmārthasaṃśayam
प्राणी किससे बढ़ते हैं और किससे क्षय को प्राप्त होते हैं? हे महाप्राज्ञ, किसकी पूजा करने से वे अविनाशी सुख पा सकते हैं? हे देवर्षि, धर्म, काम और अर्थ के विषय में मेरा यह संशय मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 7 (12.67.7)
एवं पृष्टो महाप्राज्ञः कौसल्येनामितौजसा । राजसत्कारमव्यग्रो राज्यस्य च विवर्धनम् । दण्डनीतिं समाश्रित्य शशंसास्मै बृहस्पतिः ॥
evaṃ pṛṣṭo mahāprājñaḥ kausalyenāmitaujasā | rājasatkāramavyagro rājyasya ca vivardhanam | daṇḍanītiṃ samāśritya śaśaṃsāsmai bṛhaspatiḥ
अमित तेज वाले कोसलराज के इस प्रकार पूछने पर महाप्राज्ञ बृहस्पति ने शान्त भाव से दण्डनीति का आश्रय लेकर उन्हें राजा के सत्कार और राज्य की वृद्धि का उपदेश दिया।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 8 (12.67.8)
राजमूलो महाप्राज्ञ धर्मो लोकस्य लक्ष्यते । प्रजा राजभयादेव न खादन्ति परस्परम् ॥
rājamūlo mahāprājña dharmo lokasya lakṣyate | prajā rājabhayādeva na khādanti parasparam
हे महाप्राज्ञ, संसार के धर्म का मूल राजा ही दिखाई देता है। राजा के भय से ही प्रजाएँ एक-दूसरे को नहीं खातीं।
श्लोक 9 (12.67.9)
राजा ह्येवाखिलं लोकं समुदीर्णं समुत्सुकम् । प्रसादयति धर्मेण प्रसाद्य च विराजते ॥
rājā hyevākhilaṃ lokaṃ samudīrṇaṃ samutsukam | prasādayati dharmeṇa prasādya ca virājate
क्योंकि राजा धर्म के द्वारा उमड़े हुए और उतावले सारे लोक को शान्त करता है, और उसे शान्त करके स्वयं शोभित होता है।
श्लोक 10 (12.67.10)
यथा ह्यनुदये राजन्भूतानि शशिसूर्ययोः । अन्धे तमसि मज्जेयुरपश्यन्तः परस्परम् ॥
yathā hyanudaye rājanbhūtāni śaśisūryayoḥ | andhe tamasi majjeyurapaśyantaḥ parasparam
हे राजन्, जैसे सूर्य और चन्द्रमा के उदय न होने पर प्राणी एक-दूसरे को न देखते हुए घने अन्धकार में डूब जाएँ,
श्लोक 11 (12.67.11)
यथा ह्यनुदके मत्स्या निराक्रन्दे विहङ्गमाः । विहरेयुर्यथाकामं विहिंसन्तः पुनः पुनः ॥
yathā hyanudake matsyā nirākrande vihaṅgamāḥ | vihareyuryathākāmaṃ vihiṃsantaḥ punaḥ punaḥ
जैसे उथले जल में मछलियाँ और भयरहित स्थान में पक्षी अपनी इच्छा से घूमते हुए बार-बार एक-दूसरे को मारें,
श्लोक 12 (12.67.12)
विमथ्यातिक्रमेरंश्च विषह्यापि परस्परम् । अभावमचिरेणैव गच्छेयुर्नात्र संशयः ॥
vimathyātikrameraṃśca viṣahyāpi parasparam | abhāvamacireṇaiva gaccheyurnātra saṃśayaḥ
एक-दूसरे को कुचलें और बलपूर्वक हराएँ, और शीघ्र ही विनाश को पहुँच जाएँ, इसमें कोई संदेह नहीं,
श्लोक 13 (12.67.13)
एवमेव विना राज्ञा विनश्येयुरिमाः प्रजाः । अन्धे तमसि मज्जेयुरगोपाः पशवो यथा ॥
evameva vinā rājñā vinaśyeyurimāḥ prajāḥ | andhe tamasi majjeyuragopāḥ paśavo yathā
उसी प्रकार राजा के बिना ये प्रजाएँ नष्ट हो जाएँ। वे बिना ग्वाले के पशुओं की भाँति घने अन्धकार में डूब जाएँ।
श्लोक 14 (12.67.14)
हरेयुर्बलवन्तोऽपि दुर्बलानां परिग्रहान् । हन्युर्व्यायच्छमानांश्च यदि राजा न पालयेत् ॥
hareyurbalavanto'pi durbalānāṃ parigrahān | hanyurvyāyacchamānāṃśca yadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो बलवान् लोग दुर्बलों की सम्पत्ति छीन लें और अपनी वस्तु की रक्षा के लिए जूझने वालों को मार डालें।
श्लोक 15 (12.67.15)
ममेदमिति लोकेऽस्मिन्न भवेत्स्वपरिग्रहः । न दारा न च पुत्रः स्यान्न धनं न परिग्रहः । विष्वग्लोपः प्रवर्तेत यदि राजा न पालयेत् ॥
mamedamiti loke'sminna bhavetsvaparigrahaḥ | na dārā na ca putraḥ syānna dhanaṃ na parigrahaḥ | viṣvaglopaḥ pravarteta yadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो इस लोक में "यह मेरा है" कहकर अपनी वस्तु रखना न रहे; न पत्नी रहे, न पुत्र, न धन, न सम्पत्ति; चारों ओर लूट मच जाए।
श्लोक 16 (12.67.16)
यानं वस्त्रमलङ्कारान्रत्नानि विविधानि च । हरेयुः सहसा पापा यदि राजा न पालयेत् ॥
yānaṃ vastramalaṅkārānratnāni vividhāni ca | hareyuḥ sahasā pāpā yadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो पापी लोग सवारियाँ, वस्त्र, आभूषण और नाना प्रकार के रत्न तुरन्त छीन लें।
श्लोक 17 (12.67.17)
पतेद्बहुविधं शस्त्रं बहुधा धर्मचारिषु । अधर्मः प्रगृहीतः स्याद्यदि राजा न पालयेत् ॥
patedbahuvidhaṃ śastraṃ bahudhā dharmacāriṣu | adharmaḥ pragṛhītaḥ syādyadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो धर्म का आचरण करने वालों पर अनेक प्रकार से अनेक शस्त्र गिरें और अधर्म को ही अपना लिया जाए।
श्लोक 18 (12.67.18)
मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम् । क्लिश्नीयुरपि हिंस्युर्वा यदि राजा न पालयेत् ॥
mātaraṃ pitaraṃ vṛddhamācāryamatithiṃ gurum | kliśnīyurapi hiṃsyurvā yadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो माता, पिता, वृद्ध, आचार्य, अतिथि और गुरु को लोग सताएँ या मार भी डालें।
श्लोक 19 (12.67.19)
अन्यांश्च क्रोशतो हिंस्युर्लोकोऽयं दस्युवद्भवेत् । वधबन्धपरिक्लेशो नित्यमर्थवतां भवेत् । ममत्वं च न विन्देयुर्यदि राजा न पालयेत् ॥
anyāṃśca krośato hiṃsyurloko'yaṃ dasyuvadbhavet | vadhabandhaparikleśo nityamarthavatāṃ bhavet | mamatvaṃ ca na vindeyuryadi rājā na pālayet
वे पुकारते हुए दूसरे लोगों को भी मार डालें और यह संसार डाकुओं का देश-सा हो जाए। धनवानों पर सदा वध, बन्धन और कष्ट पड़ें, और लोग अपनेपन का भाव ही न पाएँ, यदि राजा रक्षा न करे।
श्लोक 20 (12.67.20)
अन्ताश्चाकाल एव स्युर्लोकोऽयं दस्युसाद्भवेत् । पतेद्बहुविधं राज्यं यदि राजा न पालयेत् ॥
antāścākāla eva syurloko'yaṃ dasyusādbhavet | patedbahuvidhaṃ rājyaṃ yadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो प्राणों का अन्त असमय ही हो जाए, यह लोक डाकुओं के हाथ में चला जाए और राज्य अनेक प्रकार से गिर पड़े।
श्लोक 21 (12.67.21)
न योनिदोषो वर्तेत न कृषिर्न वणिक्पथः । मज्जेद्धर्मस्त्रयी न स्याद्यदि राजा न पालयेत् ॥
na yonidoṣo varteta na kṛṣirna vaṇikpathaḥ | majjeddharmastrayī na syādyadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो व्यभिचार की निन्दा न रहे, न खेती चले, न व्यापार के मार्ग रहें; धर्म डूब जाए और त्रयी (वेदत्रयी) लुप्त हो जाए।
श्लोक 22 (12.67.22)
न यज्ञाः संप्रवर्तेयुर्विधिवत्स्वाप्तदक्षिणाः । न विवाहाः समाजो वा यदि राजा न पालयेत् ॥
na yajñāḥ saṃpravarteyurvidhivatsvāptadakṣiṇāḥ | na vivāhāḥ samājo vā yadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो विधिपूर्वक और पूरी दक्षिणा वाले यज्ञ न चलें, और न विवाह हों, न सभाएँ।
श्लोक 23 (12.67.23)
न वृषाः संप्रवर्तेरन्न मथ्येरंश्च गर्गराः । घोषाः प्रणाशं गच्छेयुर्यदि राजा न पालयेत् ॥
na vṛṣāḥ saṃpravarteranna mathyeraṃśca gargarāḥ | ghoṣāḥ praṇāśaṃ gaccheyuryadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो साँड़ गायों से संयोग न करें, मथानी के पात्रों में मथन न हो और गोष्ठ (ग्वालों की बस्तियाँ) नष्ट हो जाएँ।
श्लोक 24 (12.67.24)
त्रस्तमुद्विग्नहृदयं हाहाभूतमचेतनम् । क्षणेन विनशेत्सर्वं यदि राजा न पालयेत् ॥
trastamudvignahṛdayaṃ hāhābhūtamacetanam | kṣaṇena vinaśetsarvaṃ yadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो सब कुछ भयभीत, उद्विग्न हृदय वाला, "हाय-हाय" करता हुआ और चेतनाहीन होकर क्षण भर में नष्ट हो जाए।
श्लोक 25 (12.67.25)
न संवत्सरसत्राणि तिष्ठेयुरकुतोभयाः । विधिवद्दक्षिणावन्ति यदि राजा न पालयेत् ॥
na saṃvatsarasatrāṇi tiṣṭheyurakutobhayāḥ | vidhivaddakṣiṇāvanti yadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो विधिपूर्वक दक्षिणा वाले वर्ष-भर चलने वाले सत्र निर्भय होकर न चल सकें।
श्लोक 26 (12.67.26)
ब्राह्मणाश्चतुरो वेदान्नाधीयीरंस्तपस्विनः । विद्यास्नाता व्रतस्नाता यदि राजा न पालयेत् ॥
brāhmaṇāścaturo vedānnādhīyīraṃstapasvinaḥ | vidyāsnātā vratasnātā yadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो विद्या और व्रत में स्नात तपस्वी ब्राह्मण चारों वेदों का अध्ययन न करें।
श्लोक 27 (12.67.27)
न भवेद्धर्मसंसेवी मोहविप्रहतो जनः । हर्ता स्वेच्छेन्द्रियो गच्छेद्यदि राजा न पालयेत् ॥
na bhaveddharmasaṃsevī mohaviprahato janaḥ | hartā svecchendriyo gacchedyadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो मोह से मारे हुए लोग धर्म का सेवन न करें और लुटेरा अपनी इच्छा के अनुसार जहाँ चाहे जाए।
श्लोक 28 (12.67.28)
हस्ताद्धस्तं परिमुषेद्भिद्येरन्सर्वसेतवः । भयार्तं विद्रवेत्सर्वं यदि राजा न पालयेत् ॥
hastāddhastaṃ parimuṣedbhidyeransarvasetavaḥ | bhayārtaṃ vidravetsarvaṃ yadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो हाथ से हाथ का माल छिन जाए, सारी मर्यादाएँ (सेतु) टूट जाएँ और सब भय से पीड़ित होकर भाग खड़े हों।
श्लोक 29 (12.67.29)
अनयाः संप्रवर्तेरन्भवेद्वै वर्णसङ्करः । दुर्भिक्षमाविशेद्राष्ट्रं यदि राजा न पालयेत् ॥
anayāḥ saṃpravarteranbhavedvai varṇasaṅkaraḥ | durbhikṣamāviśedrāṣṭraṃ yadi rājā na pālayet
यदि राजा रक्षा न करे तो अनीति फैले, वर्णसंकर हो जाए और राष्ट्र में अकाल घुस आए।
श्लोक 30 (12.67.30)
विवृत्य हि यथाकामं गृहद्वाराणि शेरते । मनुष्या रक्षिता राज्ञा समन्तादकुतोभयाः ॥
vivṛtya hi yathākāmaṃ gṛhadvārāṇi śerate | manuṣyā rakṣitā rājñā samantādakutobhayāḥ
पर राजा से रक्षित मनुष्य सब ओर निर्भय होकर घर के द्वार खुले छोड़कर इच्छानुसार सोते हैं।
श्लोक 31 (12.67.31)
नाक्रुष्टं सहते कश्चित्कुतो वा हस्तलाघवम् । यदि राजा न सम्यग्गां रक्षयत्यपि धार्मिकः ॥
nākruṣṭaṃ sahate kaścitkuto vā hastalāghavam | yadi rājā na samyaggāṃ rakṣayatyapi dhārmikaḥ
कोई गाली नहीं सहता, फिर हाथ उठाना तो दूर की बात है; पर यदि राजा धर्मात्मा होकर भी पृथ्वी की ठीक से रक्षा न करे, तो लोगों को यह भी सहना पड़ता है।
श्लोक 32 (12.67.32)
स्त्रियश्चापुरुषा मार्गं सर्वालङ्कारभूषिताः । निर्भयाः प्रतिपद्यन्ते यदि रक्षति भूमिपः ॥
striyaścāpuruṣā mārgaṃ sarvālaṅkārabhūṣitāḥ | nirbhayāḥ pratipadyante yadi rakṣati bhūmipaḥ
जब राजा रक्षा करता है, तब बिना किसी पुरुष के साथ, सब आभूषणों से सजी स्त्रियाँ निर्भय होकर मार्ग पर चलती हैं।
श्लोक 33 (12.67.33)
धर्ममेव प्रपद्यन्ते न हिंसन्ति परस्परम् । अनुगृह्णन्ति चान्योन्यं यदा रक्षति भूमिपः ॥
dharmameva prapadyante na hiṃsanti parasparam | anugṛhṇanti cānyonyaṃ yadā rakṣati bhūmipaḥ
जब राजा रक्षा करता है, तब लोग धर्म का ही आश्रय लेते हैं, एक-दूसरे को नहीं मारते और आपस में सहायता करते हैं।
श्लोक 34 (12.67.34)
यजन्ते च महायज्ञैस्त्रयो वर्णाः पृथग्विधैः । युक्ताश्चाधीयते विद्यां यदा रक्षति भूमिपः ॥
yajante ca mahāyajñaistrayo varṇāḥ pṛthagvidhaiḥ | yuktāścādhīyate vidyāṃ yadā rakṣati bhūmipaḥ
जब राजा रक्षा करता है, तब तीनों वर्ण नाना प्रकार के बड़े यज्ञों से यजन करते हैं और मन लगाकर विद्या का अध्ययन करते हैं।
श्लोक 35 (12.67.35)
वार्तामूलो ह्ययं लोकस्तया वै धार्यते सदा । तत्सर्वं वर्तते सम्यग्यदा रक्षति भूमिपः ॥
vārtāmūlo hyayaṃ lokastayā vai dhāryate sadā | tatsarvaṃ vartate samyagyadā rakṣati bhūmipaḥ
यह लोक आजीविका (वार्ता) की जड़ पर टिका है और उसी से सदा धारण किया जाता है; वह सब ठीक चलता है जब राजा रक्षा करता है।
श्लोक 36 (12.67.36)
यदा राजा धुरं श्रेष्ठामादाय वहति प्रजाः । महता बलयोगेन तदा लोकः प्रसीदति ॥
yadā rājā dhuraṃ śreṣṭhāmādāya vahati prajāḥ | mahatā balayogena tadā lokaḥ prasīdati
जब राजा श्रेष्ठ भार उठाकर बड़े बल-प्रयोग से प्रजा का वहन करता है, तब संसार प्रसन्न रहता है।
श्लोक 37 (12.67.37)
यस्याभावेन भूतानामभावः स्यात्समन्ततः । भावे च भावो नित्यं स्यात्कस्तं न प्रतिपूजयेत् ॥
yasyābhāvena bhūtānāmabhāvaḥ syātsamantataḥ | bhāve ca bhāvo nityaṃ syātkastaṃ na pratipūjayet
जिसके न रहने पर सब ओर प्राणियों का अभाव हो जाए और जिसके रहने पर उनका अस्तित्व सदा बना रहे, उसका आदर कौन न करे?
श्लोक 38 (12.67.38)
तस्य यो वहते भारं सर्वलोकसुखावहम् । तिष्ठन्प्रियहिते राज्ञ उभौ लोकाविमौ जयेत् ॥
tasya yo vahate bhāraṃ sarvalokasukhāvaham | tiṣṭhanpriyahite rājña ubhau lokāvimau jayet
सब लोकों को सुख देने वाला जो भार वह उठाता है, उसे जो उठाने में सहायक होता है और राजा के प्रिय तथा हित में लगा रहता है, वह दोनों लोकों को जीत ले।
श्लोक 39 (12.67.39)
यस्तस्य पुरुषः पापं मनसाऽप्यनुचिन्तयेत् । असंशयमिह क्लिष्टः प्रेत्यापि नरकं व्रजेत् ॥
yastasya puruṣaḥ pāpaṃ manasā'pyanucintayet | asaṃśayamiha kliṣṭaḥ pretyāpi narakaṃ vrajet
जो पुरुष मन से भी उसके लिए बुरा सोचता है, वह निःसन्देह यहाँ कष्ट पाता है और मरकर भी नरक में जाता है।
श्लोक 40 (12.67.40)
न हि जात्ववमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः । महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ॥
na hi jātvavamantavyo manuṣya iti bhūmipaḥ | mahatī devatā hyeṣā nararūpeṇa tiṣṭhati
"यह तो मनुष्य ही है" ऐसा समझकर राजा का कभी अपमान नहीं करना चाहिए; वह मनुष्य के रूप में खड़ा हुआ महान् देवता है।
श्लोक 41 (12.67.41)
कुरुते पञ्चरूपाणि कालयुक्तानि यः सदा । भवत्यग्निस्तथाऽऽदित्यो मृत्युर्वैश्रवणो यमः ॥
kurute pañcarūpāṇi kālayuktāni yaḥ sadā | bhavatyagnistathā''dityo mṛtyurvaiśravaṇo yamaḥ
वह समय के अनुसार पाँच रूप धारण करता है: वह अग्नि, आदित्य, मृत्यु, वैश्रवण और यम बनता है।
श्लोक 42 (12.67.42)
यदा ह्यासीदतः पापान्दहत्युग्रेण तेजसा । मिथ्योपचरितो राजा तदा भवति पावकः ॥
yadā hyāsīdataḥ pāpāndahatyugreṇa tejasā | mithyopacarito rājā tadā bhavati pāvakaḥ
जब वह अपने पास आने वाले पापियों को उग्र तेज से जला देता है, तब मिथ्या सेवा किया गया राजा अग्नि बन जाता है।
श्लोक 43 (12.67.43)
यदा पश्यति चारेण सर्वभूतानि भूमिपः । क्षेमं च कृत्वा व्रजति तदा भवति भास्करः ॥
yadā paśyati cāreṇa sarvabhūtāni bhūmipaḥ | kṣemaṃ ca kṛtvā vrajati tadā bhavati bhāskaraḥ
जब वह गुप्तचरों के द्वारा सब प्राणियों को देखता है और उनका कल्याण करके आगे बढ़ता है, तब वह सूर्य बन जाता है।
श्लोक 44 (12.67.44)
अशुचींश्च यदा क्रुद्धः क्षिणोति शतशो नरान् । सपुत्रपौत्रान्सामात्यांस्तदा भवति सोऽन्तकः ॥
aśucīṃśca yadā kruddhaḥ kṣiṇoti śataśo narān | saputrapautrānsāmātyāṃstadā bhavati so'ntakaḥ
जब वह क्रोध में सैकड़ों अपवित्र मनुष्यों को उनके पुत्र, पौत्र और मन्त्रियों सहित नष्ट कर देता है, तब वह अन्तक बन जाता है।
श्लोक 45 (12.67.45)
यदा त्वधार्मिकान्सर्वांस्तीक्ष्णैर्दण्डैर्नियच्छति । धार्मिकांश्चानुगृह्णाति भवत्यथ यमस्तदा ॥
yadā tvadhārmikānsarvāṃstīkṣṇairdaṇḍairniyacchati | dhārmikāṃścānugṛhṇāti bhavatyatha yamastadā
जब वह सब अधर्मियों को तीखे दण्डों से नियन्त्रित करता है और धर्मात्माओं पर अनुग्रह करता है, तब वह यम बन जाता है।
श्लोक 46 (12.67.46)
यदा तु धनधाराभिस्तर्पयत्युपकारिणः । आच्छिनत्ति च रत्नानि विविधान्यपकारिणां ॥
yadā tu dhanadhārābhistarpayatyupakāriṇaḥ | ācchinatti ca ratnāni vividhānyapakāriṇāṃ
जब वह उपकार करने वालों को धन की धाराओं से तृप्त करता है और अपकार करने वालों के नाना रत्न छीन लेता है,
श्लोक 47 (12.67.47)
श्रियं ददाति कस्मैचित्कस्माच्चिदपकर्षति । तदा वैश्रवणो राजा लोके भवति भूमिपः ॥
śriyaṃ dadāti kasmaicitkasmāccidapakarṣati | tadā vaiśravaṇo rājā loke bhavati bhūmipaḥ
किसी को सम्पत्ति देता है और किसी से छीन लेता है, तब राजा लोक में वैश्रवण बन जाता है।
श्लोक 48 (12.67.48)
नास्यापवादे स्थातव्यं दक्षेणाक्लिष्टकर्मणा । धर्ममाकाङ्क्षता लोके ईश्वरस्यानसूयता ॥
nāsyāpavāde sthātavyaṃ dakṣeṇākliṣṭakarmaṇā | dharmamākāṅkṣatā loke īśvarasyānasūyatā
जो कुशल, निष्कलंक कर्म वाला मनुष्य संसार में धर्म चाहता है, उसे राजा की निन्दा के विरुद्ध खड़ा नहीं होना चाहिए और स्वामी के प्रति द्वेष नहीं रखना चाहिए।
श्लोक 49 (12.67.49)
न हि राज्ञः प्रतीपानि कुर्वन्सुखमवाप्नुयात् । पुत्रो भ्राता वयस्यो वा यद्यप्यात्मसमो भवेत् ॥
na hi rājñaḥ pratīpāni kurvansukhamavāpnuyāt | putro bhrātā vayasyo vā yadyapyātmasamo bhavet
राजा के विरुद्ध आचरण करता हुआ कोई सुख नहीं पा सकता, चाहे वह पुत्र, भाई या मित्र हो, और अपने समान प्रिय ही क्यों न हो।
श्लोक 50 (12.67.50)
कुर्यात्कृष्णगतिः शेषं ज्वलितोऽनिलसारथिः । न तु राज्ञाऽभिपन्नस्य शेषं क्वचन विद्यते ॥
kuryātkṛṣṇagatiḥ śeṣaṃ jvalito'nilasārathiḥ | na tu rājñā'bhipannasya śeṣaṃ kvacana vidyate
वायु को सारथि बनाए हुए, काले मार्ग वाली प्रज्वलित अग्नि कुछ शेष भी छोड़ दे; पर जिसे राजा ने घेर लिया है, उसका कहीं कुछ शेष नहीं रहता।
श्लोक 51 (12.67.51)
तस्य सर्वाणि रक्ष्याणि दूरतः परिवर्जयेत् । मृत्योरिव जुगुप्सेत राजस्वहरणान्नरः ॥
tasya sarvāṇi rakṣyāṇi dūrataḥ parivarjayet | mṛtyoriva jugupseta rājasvaharaṇānnaraḥ
राजा जिन-जिन वस्तुओं की रक्षा करता है, उन सबसे दूर रहना चाहिए। राजा का धन हरने से मनुष्य को वैसे ही घृणा करनी चाहिए जैसे मृत्यु से।
श्लोक 52 (12.67.52)
वध्येताभिमृशन्सद्यो मृगः कूटमिव स्पृशन् । आत्मस्वमिव संरक्षेद्राजस्वमिह बुद्धिमान् ॥
vadhyetābhimṛśansadyo mṛgaḥ kūṭamiva spṛśan | ātmasvamiva saṃrakṣedrājasvamiha buddhimān
जो उसे छूता है, वह जाल को छूने वाले मृग की भाँति तुरन्त मारा जाता है। बुद्धिमान् को यहाँ राजा के धन की अपने धन के समान रक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 53 (12.67.53)
महान्तं नरकं घोरमप्रतिष्ठमचेतसः । पतन्ति चिररात्राय राजवित्तापहारिणः ॥
mahāntaṃ narakaṃ ghoramapratiṣṭhamacetasaḥ | patanti cirarātrāya rājavittāpahāriṇaḥ
राजा का धन चुराने वाले मूर्ख बहुत लम्बे समय के लिए एक बड़े, घोर और आधारहीन नरक में गिरते हैं।
श्लोक 54 (12.67.54)
राजा भोजो विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः । य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति ॥
rājā bhojo virāṭ samrāṭ kṣatriyo bhūpatirnṛpaḥ | ya ebhiḥ stūyate śabdaiḥ kastaṃ nārcitumarhati
राजा, भोज, विराट्, सम्राट्, क्षत्रिय, भूपति, नृप: इन शब्दों से जिसकी स्तुति की जाती है, उसकी पूजा कौन न करे?
श्लोक 55 (12.67.55)
तस्माद्बुभूषुर्नियतो जितात्मा संयतेन्द्रियः । मेधावी धृतिमान्दक्षः संश्रयेत् महीपतिम् ॥
tasmādbubhūṣurniyato jitātmā saṃyatendriyaḥ | medhāvī dhṛtimāndakṣaḥ saṃśrayet mahīpatim
इसलिए उन्नति चाहने वाले संयमी, जितात्मा, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान्, धैर्यवान् और कुशल मनुष्य को राजा का आश्रय लेना चाहिए।
श्लोक 56 (12.67.56)
कृतज्ञं प्राज्ञमक्षुद्रं दृढभक्तिं जितेन्द्रियम् । धर्मनित्यं स्थितं स्थाने मन्त्रिणं पूजयेन्नृपः ॥
kṛtajñaṃ prājñamakṣudraṃ dṛḍhabhaktiṃ jitendriyam | dharmanityaṃ sthitaṃ sthāne mantriṇaṃ pūjayennṛpaḥ
राजा को ऐसे मन्त्री का सम्मान करना चाहिए जो कृतज्ञ, बुद्धिमान्, उदार, दृढ़ भक्ति वाला, जितेन्द्रिय, सदा धर्म में लगा हुआ और अपने स्थान पर स्थिर हो।
श्लोक 57 (12.67.57)
दृढभक्तिं कृतप्रज्ञं धर्मज्ञं संयतेन्द्रियम् । शूरमक्षुद्रकर्माणं प्रसिद्धं जनमाश्रयेत् ॥
dṛḍhabhaktiṃ kṛtaprajñaṃ dharmajñaṃ saṃyatendriyam | śūramakṣudrakarmāṇaṃ prasiddhaṃ janamāśrayet
उसे ऐसे मनुष्य का आश्रय लेना चाहिए जो दृढ़ भक्ति वाला, स्थिर बुद्धि वाला, धर्म का जानकार, संयमी, शूर, उदार कर्म वाला और प्रसिद्ध हो।
श्लोक 58 (12.67.58)
राजा प्रगल्भं पुरुषं करोति । राजा भृशं बृंहयते मनुष्यम् । राजाभिपन्नस्य कुतः सुखानि । राजाऽभ्युपेतं सुखिनं करोति ॥
rājā pragalbhaṃ puruṣaṃ karoti | rājā bhṛśaṃ bṛṃhayate manuṣyam | rājābhipannasya kutaḥ sukhāni | rājā'bhyupetaṃ sukhinaṃ karoti
राजा पुरुष को प्रगल्भ बनाता है; राजा दुर्बल मनुष्य को पुष्ट करता है। जिसे राजा ने घेर लिया, उसके लिए सुख कहाँ? जो राजा के पास आश्रय पाकर आता है, उसे राजा सुखी करता है।
श्लोक 59 (12.67.59)
राजा प्रजानां प्रथमं शरीरं । प्रजाश्च राज्ञोऽप्रतिमं शरीरम् । राज्ञा विहीना न भवन्ति देशा । देशैर्विहीना न नृपा भवन्ति ॥
rājā prajānāṃ prathamaṃ śarīraṃ | prajāśca rājño'pratimaṃ śarīram | rājñā vihīnā na bhavanti deśā | deśairvihīnā na nṛpā bhavanti
राजा प्रजा का पहला शरीर है और प्रजा राजा का अनुपम शरीर है। राजा के बिना देश नहीं टिकते और देशों के बिना राजा नहीं रहते।
श्लोक 60 (12.67.60)
राजा प्रजानां हृदयं गरीयो । गतिः प्रतिष्ठा सुखमुत्तमं च । समाश्रिता लोकमिमं परं च । जयन्ति सम्यक्पुरुषा नरेन्द्र ॥
rājā prajānāṃ hṛdayaṃ garīyo | gatiḥ pratiṣṭhā sukhamuttamaṃ ca | samāśritā lokamimaṃ paraṃ ca | jayanti samyakpuruṣā narendra
राजा प्रजा का हृदय है, सबसे भारी, उनकी गति, आधार और परम सुख है। हे नरेन्द्र, उसका आश्रय लेने वाले पुरुष इस लोक और परलोक को भली-भाँति जीत लेते हैं।
श्लोक 61 (12.67.61)
नराधिपश्चाप्यनुशिष्य मेदिनीं । दमेन सत्येन च सौहृदेन । महद्भिरिष्ट्वा क्रतुभिर्महायशा । त्रिविष्टपे स्थानमुपैति शाश्वतम् ॥
narādhipaścāpyanuśiṣya medinīṃ | damena satyena ca sauhṛdena | mahadbhiriṣṭvā kratubhirmahāyaśā | triviṣṭape sthānamupaiti śāśvatam
जो नराधिप दम, सत्य और सौहार्द से पृथ्वी का शासन करके और बड़े-बड़े यज्ञ करके महायशस्वी होता है, वह स्वर्ग में शाश्वत स्थान को प्राप्त करता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 62 (12.67.62)
स एवमुक्तोऽङ्गिरसा कौसल्यो राजसत्तमः । प्रयत्नात्कृतवान्वीरः प्रजापालनमुत्तमम् ॥
sa evamukto'ṅgirasā kausalyo rājasattamaḥ | prayatnātkṛtavānvīraḥ prajāpālanamuttamam
अंगिरा (बृहस्पति) के इस प्रकार कहने पर कोसलराज वसुमना, राजाओं में श्रेष्ठ उस वीर ने यत्नपूर्वक प्रजा का उत्तम पालन किया।