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शान्ति पर्व · अध्याय 66

राज्य के लिए राजा की आवश्यकता

युधिष्ठिर पूछते हैं कि राष्ट्र का सबसे आवश्यक कर्तव्य क्या है, और भीष्म उत्तर देते हैं कि वह राजा का अभिषेक है: राजा के बिना धर्म टिकता नहीं, बलवान् निर्बल को खा जाते हैं और यज्ञ की अग्नि भी हव्य नहीं वहन करती। वे बताते हैं कि प्राचीन काल में राजाविहीन प्रजाओं ने कैसे आपस में नियम बाँधे, ब्रह्मा के पास गईं, और अपने धन तथा धर्म का अंश देने का वचन देकर संकोच करते हुए मनु को राजा होने के लिए मनाया। अन्त में वे कहते हैं कि जो समृद्धि चाहे, वह सबसे पहले राजा बनाए, उसका सम्मान करे और उसे राजचिह्न तथा सब सामग्री दे।

अध्याय 65अध्याय-सूचीअध्याय 67

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.66.1)

चातुराश्रम्यमुक्तं ते चातुर्वण्यं तथैव च । राष्ट्रस्य यत्कृत्यतमं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

cāturāśramyamuktaṃ te cāturvaṇyaṃ tathaiva ca | rāṣṭrasya yatkṛtyatamaṃ tanme brūhi pitāmaha

पितामह, आपने मुझे चारों आश्रमों और उसी प्रकार चारों वर्णों के विषय में बताया। अब यह बताइए कि राष्ट्र का सबसे आवश्यक कर्तव्य क्या है।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.66.2)

राष्ट्रस्य यत्कृत्यतमं राज्ञ एवाभिषेचनम् । अनिन्द्रमबलं राष्ट्रं दस्यवोऽभिभवन्त्युत ॥

rāṣṭrasya yatkṛtyatamaṃ rājña evābhiṣecanam | anindramabalaṃ rāṣṭraṃ dasyavo'bhibhavantyuta

राष्ट्र का सबसे आवश्यक कर्तव्य राजा का अभिषेक ही है। जिस राष्ट्र में इन्द्र के समान कोई राजा नहीं होता, वह निर्बल हो जाता है और डाकू उसे दबोच लेते हैं।

श्लोक 3 (12.66.3)

अराजकेषु राष्ट्रेषु धर्मो न व्यवतिष्ठते । परस्परं च खादन्ति सर्वथा धिगराजकम् ॥

arājakeṣu rāṣṭreṣu dharmo na vyavatiṣṭhate | parasparaṃ ca khādanti sarvathā dhigarājakam

जिन राष्ट्रों में राजा नहीं होता, वहाँ धर्म स्थिर नहीं रहता और लोग एक-दूसरे को खा जाते हैं। राजाविहीन देश को सब प्रकार से धिक्कार है।

श्लोक 4 (12.66.4)

इन्द्रमेव प्रणमते यद्राजानमिति श्रुतिः । यथैवेन्द्रस्तथा राजा संपूज्यो भूतिमिच्छता ॥

indrameva praṇamate yadrājānamiti śrutiḥ | yathaivendrastathā rājā saṃpūjyo bhūtimicchatā

श्रुति कहती है कि जो राजा को प्रणाम करता है, वह इन्द्र को ही प्रणाम करता है। इसलिए जैसे इन्द्र पूजनीय हैं, वैसे ही कल्याण चाहने वाले को राजा की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 5 (12.66.5)

नाराजकेषु राष्ट्रेषु वस्तव्यमिति वैदिकम् । नाराजकेषु राष्ट्रेषु हव्यं वहति पावकः ॥

nārājakeṣu rāṣṭreṣu vastavyamiti vaidikam | nārājakeṣu rāṣṭreṣu havyaṃ vahati pāvakaḥ

वेद का विधान है कि बिना राजा वाले राष्ट्रों में नहीं रहना चाहिए; राजाविहीन राष्ट्रों में अग्नि भी हव्य का वहन नहीं करता।

श्लोक 6 (12.66.6)

अथ चेदधिवर्तेत राज्यार्थी बलवत्तरः । अराजकाणि राष्ट्राणि हतवीराणि वा पुनः ॥

atha cedadhivarteta rājyārthī balavattaraḥ | arājakāṇi rāṣṭrāṇi hatavīrāṇi vā punaḥ

यदि कोई अधिक बलवान् पुरुष राज्य पाने की इच्छा से ऐसे राष्ट्रों पर चढ़ आए जिनमें राजा नहीं है, या जिनके वीर मारे जा चुके हैं,

श्लोक 7 (12.66.7)

प्रत्युद्गम्याभिपूज्यः स्यादेतदत्र सुमन्त्रितम् । न हि राज्यात्पापतरमस्ति किंचिदराजकात् ॥

pratyudgamyābhipūjyaḥ syādetadatra sumantritam | na hi rājyātpāpataramasti kiṃcidarājakāt

तो आगे जाकर उसका स्वागत और सम्मान करना चाहिए; ऐसे अवसर पर यही उत्तम परामर्श है, क्योंकि राजाविहीन अवस्था से बढ़कर पापमय कुछ भी नहीं है।

श्लोक 8 (12.66.8)

स चेत्समनुपश्येत समग्रं कुशलं भवेत् । बलवान्हि प्रकुपितः कुर्यान्निः शेषतामपि ॥

sa cetsamanupaśyeta samagraṃ kuśalaṃ bhavet | balavānhi prakupitaḥ kuryānniḥ śeṣatāmapi

यदि वह उन पर कृपा की दृष्टि रखे तो सब कुशल होगा; पर बलवान् पुरुष कुपित हो जाए तो सब कुछ नष्ट भी कर सकता है।

श्लोक 9 (12.66.9)

भूयांसं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा । अथ या सुदुहा राजन्नैव तां वितुदन्त्यपि ॥

bhūyāṃsaṃ labhate kleśaṃ yā gaurbhavati durduhā | atha yā suduhā rājannaiva tāṃ vitudantyapi

हे राजन्, जो गाय कठिनाई से दुही जाती है, वह बहुत कष्ट पाती है; पर जो सहज ही दूध देती है, उसे वे बिलकुल नहीं सताते।

श्लोक 10 (12.66.10)

यदतप्तं प्रणमते न तत्संतापयन्त्युत । यत्स्वयं नमते दारु न तत्संनामयन्त्यपि ॥

yadataptaṃ praṇamate na tatsaṃtāpayantyuta | yatsvayaṃ namate dāru na tatsaṃnāmayantyapi

जो बिना तपाए झुक जाता है, उसे वे तपाते नहीं; और जो लकड़ी अपने आप झुक जाती है, उसे वे बलपूर्वक नहीं झुकाते।

श्लोक 11 (12.66.11)

एतयोपमया धीरः सन्नमेत बलीयसे । इन्द्राय स प्रणमते नमते यो बलीयसे ॥

etayopamayā dhīraḥ sannameta balīyase | indrāya sa praṇamate namate yo balīyase

इस उपमा से धीर पुरुष को अपने से बलवान् के आगे झुक जाना चाहिए; जो बलवान् के आगे झुकता है, वह मानो इन्द्र को ही प्रणाम करता है।

श्लोक 12 (12.66.12)

तस्माद्राजैव कर्तव्यः सततं भूतिमिच्छता । न धनार्थो न दारार्थस्तेषां येषामराजकम् ॥

tasmādrājaiva kartavyaḥ satataṃ bhūtimicchatā | na dhanārtho na dārārthasteṣāṃ yeṣāmarājakam

इसलिए समृद्धि चाहने वाले को सदा राजा बनाना ही चाहिए। जिनके यहाँ राजा नहीं है, उनके लिए न धन रहता है, न पत्नी।

श्लोक 13 (12.66.13)

प्रीयते हि हरन्पापः परवित्तमराजके । यदाऽस्य तद्धरन्त्यन्ये तदा राजानमिच्छति ॥

prīyate hi haranpāpaḥ paravittamarājake | yadā'sya taddharantyanye tadā rājānamicchati

जहाँ राजा नहीं होता, वहाँ पापी दूसरों का धन छीनकर प्रसन्न होता है; पर जब दूसरे लोग उसी से वह धन छीन लेते हैं, तब वह राजा की इच्छा करता है।

श्लोक 14 (12.66.14)

पापा ह्यपि तदा क्षेमं न लभन्ते कदाचन । एकस्य हि द्वौ हरतो द्वयोश्च बहवोऽपरे ॥

pāpā hyapi tadā kṣemaṃ na labhante kadācana | ekasya hi dvau harato dvayośca bahavo'pare

तब तो पापी भी कभी कुशल से नहीं रह पाते: एक को दो लूटते हैं, और उन दोनों को बहुत-से और लूट लेते हैं।

श्लोक 15 (12.66.15)

अदासः क्रियते दासो ह्रियन्ते च बलात्स्त्रियः । एतस्मात्कारणाद्देवाः प्रजापालान्प्रचक्रिरे ॥

adāsaḥ kriyate dāso hriyante ca balātstriyaḥ | etasmātkāraṇāddevāḥ prajāpālānpracakrire

जो दास नहीं है, उसे दास बना लिया जाता है और स्त्रियाँ बलपूर्वक हर ली जाती हैं। इसी कारण देवताओं ने प्रजा के पालक राजाओं की रचना की।

श्लोक 16 (12.66.16)

राजा चेन्न भवेल्लोके पृथिव्या दण्डधारकः । जले मत्स्यानिवाभक्ष्यन्दुर्बलं बलवत्तराः ॥

rājā cenna bhavelloke pṛthivyā daṇḍadhārakaḥ | jale matsyānivābhakṣyandurbalaṃ balavattarāḥ

यदि संसार में पृथ्वी पर दण्ड धारण करने वाला राजा न हो, तो बलवान् लोग निर्बल को वैसे ही खा जाएँ जैसे जल में मछलियाँ (छोटी मछलियों को) खाती हैं।

श्लोक 17 (12.66.17)

अराजकाः प्रजाः पूर्वं विनेशुरिति नः श्रुतम् । परस्परं भक्षयन्तो मत्स्या इव जले कृशान् ॥

arājakāḥ prajāḥ pūrvaṃ vineśuriti naḥ śrutam | parasparaṃ bhakṣayanto matsyā iva jale kṛśān

हमने सुना है कि पूर्वकाल में राजाविहीन प्रजाएँ नष्ट हो गई थीं; वे एक-दूसरे को वैसे ही खाती थीं जैसे जल में मछलियाँ दुर्बल मछलियों को खाती हैं।

श्लोक 18 (12.66.18)

समेत्य तास्ततश्चक्रुः समयानिति नः श्रुतम् । वाक्शूरो दण्डपरुषो यश्च स्यात्पारदारिकः ॥

sametya tāstataścakruḥ samayāniti naḥ śrutam | vākśūro daṇḍaparuṣo yaśca syātpāradārikaḥ

हमने सुना है कि तब उन्होंने इकट्ठे होकर नियम बनाए: जो कठोर वाणी बोलने वाला, दण्ड देने में उग्र या परस्त्रीगामी हो,

श्लोक 19 (12.66.19)

यश्च नः समयं भिन्द्यात्त्याज्या नस्तादृशा इति । विश्वासार्थं च सर्वेषां वर्णानामविशेषतः । तास्तथा समयं कृत्वा समयेनावतस्थिरे ॥

yaśca naḥ samayaṃ bhindyāttyājyā nastādṛśā iti | viśvāsārthaṃ ca sarveṣāṃ varṇānāmaviśeṣataḥ | tāstathā samayaṃ kṛtvā samayenāvatasthire

और जो हमारे इस नियम को तोड़े, ऐसे लोग हमारे द्वारा त्याग दिए जाएँ। सब वर्णों को बिना भेद के विश्वास दिलाने के लिए उन्होंने इस प्रकार नियम बाँधा और उसी नियम पर स्थिर रहे।

श्लोक 20 (12.66.20)

सहितास्तास्तदा जग्मुरसुखार्ताः पितामहम् । अनीश्वरा विनश्यामो भगवन्नीश्वरं दिश ॥

sahitāstāstadā jagmurasukhārtāḥ pitāmaham | anīśvarā vinaśyāmo bhagavannīśvaraṃ diśa

फिर वे सब मिलकर दुःख से पीड़ित होकर पितामह (ब्रह्मा) के पास गईं और बोलीं: "प्रभु, स्वामी के बिना हम नष्ट हो रही हैं; हमारे लिए कोई स्वामी नियुक्त कीजिए,

श्लोक 21 (12.66.21)

यं पूजयेम संभूय यश्च नः प्रतिपालयेत् । ताभ्यो मनुं व्यादिदेश मनुर्नाभिननन्द ताः ॥

yaṃ pūjayema saṃbhūya yaśca naḥ pratipālayet | tābhyo manuṃ vyādideśa manurnābhinananda tāḥ

जिसकी हम सब मिलकर पूजा करें और जो हमारा पालन करे।" ब्रह्मा ने उनके लिए मनु को नियुक्त किया, किन्तु मनु ने उन्हें स्वीकार नहीं किया।

मनुरुवाच

श्लोक 22 (12.66.22)

बिभेमि कर्मणः पापाद्राज्यं हि भृशदुष्करम् । विशेषतो मनुष्येषु मिथ्यावृत्तेषु नित्यदा ॥

bibhemi karmaṇaḥ pāpādrājyaṃ hi bhṛśaduṣkaram | viśeṣato manuṣyeṣu mithyāvṛtteṣu nityadā

मनु ने कहा: मैं इस कर्म के पाप से डरता हूँ। राज्य का संचालन अत्यन्त कठिन है, विशेषकर उन मनुष्यों के बीच जो सदा मिथ्या आचरण में लगे रहते हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 23 (12.66.23)

तमब्रुवन्प्रजा मा भैर्विधास्यामो धनं तव । पशूनामथ पञ्चांशं हिरण्यस्य तथैव च ॥

tamabruvanprajā mā bhairvidhāsyāmo dhanaṃ tava | paśūnāmatha pañcāṃśaṃ hiraṇyasya tathaiva ca

प्रजाओं ने उनसे कहा: "डरिए नहीं; हम आपके लिए धन जुटाएँगे। हम आपको पशुओं का पाँचवाँ भाग और उसी प्रकार स्वर्ण का भी पाँचवाँ भाग देंगे,

प्रजा ऊचुः

श्लोक 24 (12.66.24)

धान्यस्य दशमं भागं दास्यामः कोशवर्धनम् । कन्यां शुल्के चारुरूपां विवाहेषूद्यतासु च ॥

dhānyasya daśamaṃ bhāgaṃ dāsyāmaḥ kośavardhanam | kanyāṃ śulke cārurūpāṃ vivāheṣūdyatāsu ca

अन्न का दसवाँ भाग भी देंगे, जिससे आपका कोष बढ़े; और विवाहों की तैयारी होने पर शुल्क के रूप में एक सुन्दर कन्या देंगे।

श्लोक 25 (12.66.25)

मुख्येन शस्त्रपत्रेण ये मनुष्याः प्रधानतः । भवन्तं तेऽनुयास्यन्ति महेन्द्रमिव देवताः ॥

mukhyena śastrapatreṇa ye manuṣyāḥ pradhānataḥ | bhavantaṃ te'nuyāsyanti mahendramiva devatāḥ

हममें जो प्रधान पुरुष हैं, वे अपने श्रेष्ठ शस्त्र और वाहनों के साथ आपके पीछे चलेंगे, जैसे देवता महेन्द्र के पीछे चलते हैं।

श्लोक 26 (12.66.26)

स त्वं जातबलो राजन्दुष्प्रधर्षः प्रतापवान् । सुखे धास्यसि नः सर्वान्कुबेर इव नैर्ऋतान् ॥

sa tvaṃ jātabalo rājanduṣpradharṣaḥ pratāpavān | sukhe dhāsyasi naḥ sarvānkubera iva nairṛtān

हे राजन्, बल पाकर आप दुर्धर्ष और प्रतापी होंगे और हम सबको सुख में स्थापित करेंगे, जैसे कुबेर नैर्ऋतों को करते हैं।

श्लोक 27 (12.66.27)

यं च धर्मं चरिष्यन्ति प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः । चतुर्थं तस्य धर्मस्य त्वत्संस्थं नो भविष्यति ॥

yaṃ ca dharmaṃ cariṣyanti prajā rājñā surakṣitāḥ | caturthaṃ tasya dharmasya tvatsaṃsthaṃ no bhaviṣyati

राजा से भली-भाँति रक्षित होकर प्रजा जो भी धर्म करेगी, उस धर्म का चौथा भाग हमारी ओर से आपके पास रहेगा।

श्लोक 28 (12.66.28)

तेन धर्मेण महता सुखं लब्धेन भावितः । पाह्यस्मान्सर्वतो राजन्देवानिव शतक्रतुः ॥

tena dharmeṇa mahatā sukhaṃ labdhena bhāvitaḥ | pāhyasmānsarvato rājandevāniva śatakratuḥ

उस महान् धर्म और उससे मिले सुख से पुष्ट होकर, हे राजन्, आप हमारी सब ओर से रक्षा कीजिए, जैसे शतक्रतु (इन्द्र) देवताओं की रक्षा करते हैं।

श्लोक 29 (12.66.29)

विजयाय हि निर्याहि प्रतपन्रश्मिवानिव । मानं विधम शत्रूणां धर्मं जनय नः सदा ॥

vijayāya hi niryāhi pratapanraśmivāniva | mānaṃ vidhama śatrūṇāṃ dharmaṃ janaya naḥ sadā

विजय के लिए निकलिए, किरणों वाले तपते सूर्य के समान। शत्रुओं का अभिमान चूर कीजिए और सदा हमारे लिए धर्म को उत्पन्न कीजिए।"

भीष्म उवाच

श्लोक 30 (12.66.30)

स निर्ययौ महातेजा बलेन महता वृतः । महाभिजनसंपन्नस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥

sa niryayau mahātejā balena mahatā vṛtaḥ | mahābhijanasaṃpannastejasā prajvalanniva

तब वे महातेजस्वी मनु बड़ी सेना से घिरे हुए निकले; वे उच्च कुल से सम्पन्न थे और अपने तेज से मानो जल रहे थे।

श्लोक 31 (12.66.31)

तस्य दृष्ट्वा महत्वं ते महेन्द्रस्येव देवताः । अपतत्रसिरे सर्वे स्वधर्मे च ददुर्मनः । वर्णिनश्चाश्रमाश्चैव म्लेच्छाः सर्वे च दस्यवः ॥

tasya dṛṣṭvā mahatvaṃ te mahendrasyeva devatāḥ | apatatrasire sarve svadharme ca dadurmanaḥ | varṇinaścāśramāścaiva mlecchāḥ sarve ca dasyavaḥ

उनकी महिमा देखकर सब लोग भयभीत हो गए, जैसे देवता महेन्द्र को देखकर होते हैं, और उन्होंने अपना मन अपने-अपने धर्म में लगा दिया: वर्णों और आश्रमों के लोगों ने, और म्लेच्छों तथा सब डाकुओं ने भी।

श्लोक 32 (12.66.32)

ततो महीं परिययौ पर्जन्य इव वृष्टिमान् । शमयन्सर्वतः पापान्स्वकर्मसु च योजयन् ॥

tato mahīṃ pariyayau parjanya iva vṛṣṭimān | śamayansarvataḥ pāpānsvakarmasu ca yojayan

फिर वे वर्षा करने वाले पर्जन्य के समान पृथ्वी का भ्रमण करने लगे; वे सब ओर पापियों को शान्त करते और सबको अपने-अपने कर्म में लगाते थे।

श्लोक 33 (12.66.33)

एवं ये भूतिमिच्छेयुः पृथिव्यां मानवाः क्वचित् । कुर्यू राजानमेवाग्रे प्रजानुग्रहकारणात् ॥

evaṃ ye bhūtimiccheyuḥ pṛthivyāṃ mānavāḥ kvacit | kuryū rājānamevāgre prajānugrahakāraṇāt

इस प्रकार, पृथ्वी पर कहीं भी जो मनुष्य समृद्धि चाहें, उन्हें प्रजा के कल्याण के लिए सबसे पहले राजा को ही बनाना चाहिए।

श्लोक 34 (12.66.34)

नमस्येरंश्च तं भक्त्या शिष्या इव गुरुं सदा । देवा इव च देवेन्द्रं नरा राजानमन्तिकात् ॥

namasyeraṃśca taṃ bhaktyā śiṣyā iva guruṃ sadā | devā iva ca devendraṃ narā rājānamantikāt

वे सदा भक्ति से उसे प्रणाम करें, जैसे शिष्य गुरु को और देवता देवराज को करते हैं; इसी भाव से मनुष्य अपने राजा के समीप जाएँ।

श्लोक 35 (12.66.35)

सत्कृतं स्वजनेनेह परोऽपि बहुमन्यते । स्वजनेन त्ववज्ञातं परे परिभवन्त्युत ॥

satkṛtaṃ svajaneneha paro'pi bahumanyate | svajanena tvavajñātaṃ pare paribhavantyuta

जिसका अपने लोग सत्कार करते हैं, उसे पराये भी बहुत मानते हैं; और जिसका अपने ही लोग अनादर करते हैं, उसका पराये तिरस्कार करते हैं।

श्लोक 36 (12.66.36)

राज्ञः परैः परिभवः सर्वेषामसुखावहः । तस्माच्छत्रं च पत्रं च वासांस्याभरणानि च ॥

rājñaḥ paraiḥ paribhavaḥ sarveṣāmasukhāvahaḥ | tasmācchatraṃ ca patraṃ ca vāsāṃsyābharaṇāni ca

राजा का दूसरों से अपमान होना सबके लिए दुःखदायी है। इसलिए लोग उसे छत्र और पंखा, वस्त्र और आभूषण,

श्लोक 37 (12.66.37)

भोजनान्यथ पानानि राज्ञे दद्युर्गृहाणि च । आसनानि च शय्याश्च सर्वोपकरणानि च ॥

bhojanānyatha pānāni rājñe dadyurgṛhāṇi ca | āsanāni ca śayyāśca sarvopakaraṇāni ca

भोजन, पेय, घर, आसन, शय्याएँ और सब प्रकार की सामग्री दें।

श्लोक 38 (12.66.38)

गोप्ता चास्य दुराधर्षः स्मितपूर्वाभिभाषिता । आभाषितश्च मधुरं प्रत्याभाषेत मानवान् ॥

goptā cāsya durādharṣaḥ smitapūrvābhibhāṣitā | ābhāṣitaśca madhuraṃ pratyābhāṣeta mānavān

वह रक्षक और दुर्धर्ष हो, मुस्कराकर पहले बोलने वाला हो; और जब कोई उससे बोले तो वह मधुरता से प्रजाजनों को उत्तर दे।

श्लोक 39 (12.66.39)

कृतज्ञो दृढभक्तिः स्यात्संविभागी जितेन्द्रियः । ईक्षितः प्रतिवीक्षेत मृदु वल्गु च चर्जु च ॥

kṛtajño dṛḍhabhaktiḥ syātsaṃvibhāgī jitendriyaḥ | īkṣitaḥ prativīkṣeta mṛdu valgu ca carju ca

वह कृतज्ञ, दृढ़ भक्ति वाला, बाँटकर देने वाला और जितेन्द्रिय हो; जब कोई उसकी ओर देखे तो वह भी कोमलता, मधुरता और सरलता से उसकी ओर देखे।

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