शान्ति पर्व · अध्याय 65
राजा के कर्तव्य में निहित आश्रमों का फल
युधिष्ठिर भीष्म से चारों मानव आश्रमों की व्याख्या करने को कहते हैं। भीष्म बताते हैं कि जो राजा करुणा, दान, निर्बलों की रक्षा और राज्य के पालन के साथ अपना कर्तव्य ठीक से निभाता है, उसे क्रमशः भिक्षु, क्षमाशील, दीक्षित, वनवासी, ब्रह्मचारी और गृहस्थ आश्रम का पद प्राप्त होता है। अन्त में वे युधिष्ठिर को ब्राह्मणों और धर्मात्माओं की रक्षा करने को कहते हैं, क्योंकि राजा अपने रक्षित जनों के धर्म का भागी होता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.65.1)
श्रुता मे कथिताः पूर्वं चत्वारो मानवाश्रमाः । व्याख्यानमेषामाचक्ष्व पृच्छतो मे पितामह ॥
śrutā me kathitāḥ pūrvaṃ catvāro mānavāśramāḥ | vyākhyānameṣāmācakṣva pṛcchato me pitāmaha
मनुष्यों के चार आश्रमों के विषय में पहले जो कहा गया था, वह मैंने सुना है; हे पितामह, मेरे पूछने पर आप इनकी व्याख्या कीजिए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.65.2)
विदिताः सर्व एवेह धर्मास्तव युधिष्ठिर । यथा मम महाबाहो विदिताः साधुसंमताः ॥
viditāḥ sarva eveha dharmāstava yudhiṣṭhira | yathā mama mahābāho viditāḥ sādhusaṃmatāḥ
हे युधिष्ठिर, ये सब धर्म तुम्हें पहले से विदित हैं, हे महाबाहो, जैसे मुझे विदित हैं; सज्जनों ने इन्हें माना है।
श्लोक 3 (12.65.3)
यत्तु लिङ्गान्तरगतं पृच्छसे मां युधिष्ठिर । धर्मं धर्मभृतां श्रेष्ठ तन्निबोध नराधिप ॥
yattu liṅgāntaragataṃ pṛcchase māṃ yudhiṣṭhira | dharmaṃ dharmabhṛtāṃ śreṣṭha tannibodha narādhipa
परन्तु हे युधिष्ठिर, तुम मुझसे जो दूसरे वेश में स्थित धर्म के विषय में पूछते हो, उसे सुनो, हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, हे नराधिप।
श्लोक 4 (12.65.4)
सर्वाण्येतानि कौन्तेय विद्यन्ते भरतर्षभ । साध्वाचारप्रवृत्तानां चातुराश्रम्यकर्मणाम् ॥
sarvāṇyetāni kaunteya vidyante bharatarṣabha | sādhvācārapravṛttānāṃ cāturāśramyakarmaṇām
हे कुन्तीपुत्र, हे भरतश्रेष्ठ, ये सब उन लोगों में मिलते हैं जो सदाचार में लगे हैं और चारों आश्रमों के कर्म करते हैं।
श्लोक 5 (12.65.5)
अकामद्वेषसंयुक्तो दण्डनीत्या युधिष्ठिर । समदर्शी च भूतेषु भैक्ष्याश्रमपदं भवेत् ॥
akāmadveṣasaṃyukto daṇḍanītyā yudhiṣṭhira | samadarśī ca bhūteṣu bhaikṣyāśramapadaṃ bhavet
हे युधिष्ठिर, जो काम और द्वेष से रहित है, दण्डनीति से शासन करता है और सब प्राणियों को समान दृष्टि से देखता है, उसे भिक्षु-आश्रम का पद प्राप्त होता है।
श्लोक 6 (12.65.6)
वेत्ति दानं विसर्गं च विग्रहानुग्रहौ तथा । यथोक्तवृत्तो धीरश्च क्षमाश्रमपदं भवेत् ॥
vetti dānaṃ visargaṃ ca vigrahānugrahau tathā | yathoktavṛtto dhīraśca kṣamāśramapadaṃ bhavet
जो दान और विसर्जन को, तथा दण्ड और अनुग्रह को जानता है, शास्त्रोक्त रीति से चलता है और धीर है, उसे क्षमा-आश्रम का पद प्राप्त होता है।
श्लोक 7 (12.65.7)
अर्हान्पूजयतो नित्यं संविभागेन पाण्डव । सर्वतस्तस्य कौन्तेय भैक्ष्याश्रमपदं भवेत् ॥
arhānpūjayato nityaṃ saṃvibhāgena pāṇḍava | sarvatastasya kaunteya bhaikṣyāśramapadaṃ bhavet
हे पाण्डव, जो पूजनीयों का सदा आदर करता है और उनके साथ अपना बाँटकर चलता है, हे कौन्तेय, उसे सब प्रकार से भिक्षु-आश्रम का पद प्राप्त है।
श्लोक 8 (12.65.8)
ज्ञातिसंबन्धिमित्राणि व्यापन्नानि युधिष्ठिर । समभ्युद्धरमाणस्य दीक्षाश्रमपदं भवेत् ॥
jñātisaṃbandhimitrāṇi vyāpannāni yudhiṣṭhira | samabhyuddharamāṇasya dīkṣāśramapadaṃ bhavet
हे युधिष्ठिर, जो विपत्ति में पड़े हुए जाति-भाइयों, सम्बन्धियों और मित्रों का उद्धार करता है, उसे दीक्षा-आश्रम का पद प्राप्त है।
श्लोक 9 (12.65.9)
लोकमुख्येषु सत्कारं लिङ्गिमुख्येषु चासकृत् । कुर्वतस्तस्य कौन्तेय वन्याश्रमपदं भवेत् ॥
lokamukhyeṣu satkāraṃ liṅgimukhyeṣu cāsakṛt | kurvatastasya kaunteya vanyāśramapadaṃ bhavet
हे कौन्तेय, जो लोक के प्रमुख जनों का और चिह्न धारण करनेवाले प्रमुख तपस्वियों का बार-बार सत्कार करता है, उसे वन-आश्रम का पद प्राप्त है।
श्लोक 10 (12.65.10)
आह्निकं पितृयज्ञांश्च भूतयज्ञान्समानुषान् । कुर्वतः पार्थ विपुलान्वन्याश्रमपदं भवेत् ॥
āhnikaṃ pitṛyajñāṃśca bhūtayajñānsamānuṣān | kurvataḥ pārtha vipulānvanyāśramapadaṃ bhavet
हे पार्थ, जो नित्य कर्म, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ बड़े पैमाने पर करता है, उसे वन-आश्रम का पद प्राप्त है।
श्लोक 11 (12.65.11)
संविभागेन भूतानामतिथीनां तथाऽर्चनात् । देवयज्ञैश्च राजेन्द्र वन्याश्रमपदं भवेत् ॥
saṃvibhāgena bhūtānāmatithīnāṃ tathā'rcanāt | devayajñaiśca rājendra vanyāśramapadaṃ bhavet
हे राजेन्द्र, प्राणियों में बाँटने से, अतिथियों का सत्कार करने से और देवयज्ञों से भी वन-आश्रम का पद प्राप्त होता है।
श्लोक 12 (12.65.12)
मर्दनं परराष्ट्राणां शिष्टार्थं सत्यविक्रम । कुर्वतः पुरुषव्याघ्र वन्याश्रमपदं भवेत् ॥
mardanaṃ pararāṣṭrāṇāṃ śiṣṭārthaṃ satyavikrama | kurvataḥ puruṣavyāghra vanyāśramapadaṃ bhavet
हे सत्यपराक्रमी पुरुषव्याघ्र, जो सज्जनों के हित के लिए शत्रु-राज्यों का मर्दन करता है, उसे वन-आश्रम का पद प्राप्त है।
श्लोक 13 (12.65.13)
पालनात्सर्वभूतानां स्वराष्ट्रपरिपालनात् । दीक्षा बहुविधा राजन्सत्याश्रमपदं भवेत् ॥
pālanātsarvabhūtānāṃ svarāṣṭraparipālanāt | dīkṣā bahuvidhā rājansatyāśramapadaṃ bhavet
हे राजन्, सब प्राणियों की रक्षा और अपने राज्य के पालन से, तथा अनेक प्रकार की दीक्षा से सत्य-आश्रम का पद प्राप्त होता है।
श्लोक 14 (12.65.14)
वेदाध्ययननित्यत्वं क्षमाऽथाचार्यपूजनम् । तथोपाध्यायशुश्रूषा ब्रह्माश्रमपदं भवेत् ॥
vedādhyayananityatvaṃ kṣamā'thācāryapūjanam | tathopādhyāyaśuśrūṣā brahmāśramapadaṃ bhavet
वेद के अध्ययन में नित्य लगे रहना, क्षमा, आचार्य की पूजा और उपाध्याय की सेवा, यह ब्रह्म-आश्रम का पद है।
श्लोक 15 (12.65.15)
आह्निकाञ्जपमानस्य देवान्पूजयतः सदा । धर्मेण पुरुषव्याघ्र धर्माश्रमपदं भवेत् ॥
āhnikāñjapamānasya devānpūjayataḥ sadā | dharmeṇa puruṣavyāghra dharmāśramapadaṃ bhavet
हे पुरुषव्याघ्र, जो नित्य जप करता और धर्मपूर्वक देवताओं की सदा पूजा करता है, उसे धर्म-आश्रम का पद प्राप्त है।
श्लोक 16 (12.65.16)
मृत्युर्वा रक्षणं वेति यस्य राज्ञो विनिश्चयः । प्राणद्यूते व्यवस्थाप्य ब्रह्माश्रमपदं भवेत् ॥
mṛtyurvā rakṣaṇaṃ veti yasya rājño viniścayaḥ | prāṇadyūte vyavasthāpya brahmāśramapadaṃ bhavet
जिस राजा का दृढ़ निश्चय है कि 'या तो मृत्यु या रक्षा', और जो प्राणों की बाज़ी लगाकर युद्ध-द्यूत में उतरता है, उसे ब्रह्म-आश्रम का पद प्राप्त है।
श्लोक 17 (12.65.17)
अजिह्नमशठं मार्गं वर्तमानस्य भारत । सर्वदा सर्वभूतेषु ब्रह्माश्रमपदं भवेत् ॥
ajihnamaśaṭhaṃ mārgaṃ vartamānasya bhārata | sarvadā sarvabhūteṣu brahmāśramapadaṃ bhavet
हे भारत, जो सब प्राणियों के प्रति सदा सरल और निष्कपट मार्ग पर चलता है, उसे ब्रह्म-आश्रम का पद प्राप्त है।
श्लोक 18 (12.65.18)
वानप्रस्थेषु विप्रेषु त्रैविद्येषु च भारत । प्रयच्छतोऽर्थान्विपुलान्वन्याश्रमपदं भवेत् ॥
vānaprastheṣu vipreṣu traividyeṣu ca bhārata | prayacchato'rthānvipulānvanyāśramapadaṃ bhavet
हे भारत, जो वानप्रस्थ ब्राह्मणों और त्रिवेदज्ञ ब्राह्मणों को बहुत धन देता है, उसे वन-आश्रम का पद प्राप्त है।
श्लोक 19 (12.65.19)
सर्वभूतेष्वनुक्रोशं कुर्वतस्तव भारत । आनृशंस्ये प्रवृत्तस्य नियतः पुण्यसंचयः ॥
sarvabhūteṣvanukrośaṃ kurvatastava bhārata | ānṛśaṃsye pravṛttasya niyataḥ puṇyasaṃcayaḥ
हे भारत, सब प्राणियों पर दया करने और करुणा में लगे रहनेवाले तुम्हारे लिए पुण्य का संचय निश्चित है।
श्लोक 20 (12.65.20)
बालवृद्धेषु कौन्तेय सर्वावस्थं युधिष्ठिर । अनुक्रोशक्रिया पार्थ धर्म एष सनातनः ॥
bālavṛddheṣu kaunteya sarvāvasthaṃ yudhiṣṭhira | anukrośakriyā pārtha dharma eṣa sanātanaḥ
हे कौन्तेय, हे युधिष्ठिर, बालकों और वृद्धों के प्रति सब अवस्थाओं में दया का आचरण, हे पार्थ, सनातन धर्म है।
श्लोक 21 (12.65.21)
बलात्कृतेषु भूतेषु परित्राणं कुरूद्वह । शरणागतेषु कौरव्य परं कारुण्यमाचर ॥
balātkṛteṣu bhūteṣu paritrāṇaṃ kurūdvaha | śaraṇāgateṣu kauravya paraṃ kāruṇyamācara
हे कुरुश्रेष्ठ, बलपूर्वक सताए गए प्राणियों की रक्षा करो; हे कौरव, शरण में आए हुओं पर परम करुणा का आचरण करो।
श्लोक 22 (12.65.22)
चराचराणां भूतानां रक्षणं चापि सर्वशः । यथार्हपूजां च तथा कुर्वन्गार्हस्थ्यमावसेत् ॥
carācarāṇāṃ bhūtānāṃ rakṣaṇaṃ cāpi sarvaśaḥ | yathārhapūjāṃ ca tathā kurvangārhasthyamāvaset
चर और अचर सब प्राणियों की सब प्रकार से रक्षा तथा यथायोग्य पूजा करते हुए मनुष्य गृहस्थ-आश्रम में रहे।
श्लोक 23 (12.65.23)
ज्येष्ठानुज्येष्ठपत्नीनां भ्रातॄणां पुत्रनप्तृणाम् । निग्रहानुग्रहौ पार्थ गार्हस्थ्यममितं तपः ॥
jyeṣṭhānujyeṣṭhapatnīnāṃ bhrātṝṇāṃ putranaptṛṇām | nigrahānugrahau pārtha gārhasthyamamitaṃ tapaḥ
हे पार्थ, बड़ों और छोटों, पत्नियों, भाइयों, पुत्रों और पौत्रों के प्रति नियन्त्रण और अनुग्रह, यही गृहस्थ-आश्रम है, जो अपार तप है।
श्लोक 24 (12.65.24)
साधूनामर्चनीयानां पूजासु विदितात्मनाम् । पालनं पुरुषव्याघ्र गृहाश्रमपदं भवेत् ॥
sādhūnāmarcanīyānāṃ pūjāsu viditātmanām | pālanaṃ puruṣavyāghra gṛhāśramapadaṃ bhavet
हे पुरुषव्याघ्र, पूजनीय, आत्मज्ञानी सज्जनों की पूजा और रक्षा करना, यह गृहस्थ-आश्रम का पद है।
श्लोक 25 (12.65.25)
आश्रमस्थानि भूतानि यस्य वेश्मनि भारत । भुञ्जते विपुलं भोज्यं तद्गार्हस्थ्यं युधिष्ठिर ॥
āśramasthāni bhūtāni yasya veśmani bhārata | bhuñjate vipulaṃ bhojyaṃ tadgārhasthyaṃ yudhiṣṭhira
हे भारत, जिसके घर में आश्रमों में स्थित प्राणी प्रचुर भोजन पाते हैं, वही गृहस्थ-धर्म है, हे युधिष्ठिर।
श्लोक 26 (12.65.26)
यः स्थितः पुरुषो धर्मे धात्रा सृष्टे यथार्थवत् । आश्रमाणां हि सर्वेषां फलं प्राप्नोत्यनामयम् ॥
yaḥ sthitaḥ puruṣo dharme dhātrā sṛṣṭe yathārthavat | āśramāṇāṃ hi sarveṣāṃ phalaṃ prāpnotyanāmayam
जो पुरुष विधाता के रचे धर्म में, उसके यथार्थ रूप में, स्थित रहता है, वह सब आश्रमों का निर्दोष फल पाता है।
श्लोक 27 (12.65.27)
यस्मिन्न नश्यन्ति गुणाः कौन्तेय पुरुषे सदा । आश्रमस्थं तमप्याहुर्नरश्रेष्ठं युधिष्ठिर ॥
yasminna naśyanti guṇāḥ kaunteya puruṣe sadā | āśramasthaṃ tamapyāhurnaraśreṣṭhaṃ yudhiṣṭhira
हे कौन्तेय, जिस पुरुष में गुण कभी नष्ट नहीं होते, हे नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर, उसे भी वे आश्रम में स्थित कहते हैं।
श्लोक 28 (12.65.28)
स्थानमानं कुलेमानं वयोमानं तथैव च । कुर्वन्वसति सर्वेषु ह्याश्रमेषु युधिष्ठिर ॥
sthānamānaṃ kulemānaṃ vayomānaṃ tathaiva ca | kurvanvasati sarveṣu hyāśrameṣu yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर, स्थान, कुल और आयु का मान करता हुआ वह सब आश्रमों में निवास करता है।
श्लोक 29 (12.65.29)
देशधर्मांश्च कौन्तेय कुलधर्मास्तथैव च । पालयन्पुरुषव्याघ्र राजा सर्वाश्रमी भवेत् ॥
deśadharmāṃśca kaunteya kuladharmāstathaiva ca | pālayanpuruṣavyāghra rājā sarvāśramī bhavet
हे कौन्तेय, हे पुरुषव्याघ्र, देशों के धर्मों और कुलों के धर्मों का पालन करता हुआ राजा सब आश्रमों का अधिकारी होता है।
श्लोक 30 (12.65.30)
काले विभूतिं भूतानामुपहारांस्तथैव च । अर्हयन्पुरुषव्याघ्र साधूनामाश्रमे वसेत् ॥
kāle vibhūtiṃ bhūtānāmupahārāṃstathaiva ca | arhayanpuruṣavyāghra sādhūnāmāśrame vaset
हे पुरुषव्याघ्र, समय पर प्राणियों के वैभव और उनकी भेंटों का आदर करता हुआ वह सज्जनों के आश्रम में निवास करे।
श्लोक 31 (12.65.31)
देशधर्मगतश्चापि यो धर्मं प्रत्यवेक्षते । सर्वलोकस्य कौन्तेय राजा भवति सोऽऽश्रमी ॥
deśadharmagataścāpi yo dharmaṃ pratyavekṣate | sarvalokasya kaunteya rājā bhavati so''śramī
हे कौन्तेय, जो देशों के धर्मों के अनुसार चलता हुआ भी सारे लोक के लिए धर्म का ध्यान रखता है, वह राजा सब आश्रमों का भागी होता है।
श्लोक 32 (12.65.32)
ये धर्मकुशला लोके धर्मं कुर्वन्ति भारत । पालिता यस्य विषये पादांशस्तस्य भूपतेः ॥
ye dharmakuśalā loke dharmaṃ kurvanti bhārata | pālitā yasya viṣaye pādāṃśastasya bhūpateḥ
हे भारत, लोक में जो धर्म-कुशल लोग धर्म का आचरण करते हैं, वे जिस राजा के राज्य में सुरक्षित रहते हैं, उसे उसका चौथाई भाग मिलता है।
श्लोक 33 (12.65.33)
धर्मारामान्धर्मपरान्ये न रक्षन्ति मानवान् । पार्थिवाः पुरुषव्याघ्र तेषां पापं हरन्ति ते ॥
dharmārāmāndharmaparānye na rakṣanti mānavān | pārthivāḥ puruṣavyāghra teṣāṃ pāpaṃ haranti te
हे पुरुषव्याघ्र, जो राजा धर्म में रमनेवाले, धर्मपरायण मनुष्यों की रक्षा नहीं करते, वे उनका पाप अपने ऊपर ले लेते हैं।
श्लोक 34 (12.65.34)
ये च रक्षासहायाः स्युः पार्थिवानां युधिष्ठिर । ते चैवांशहराः सर्वे धर्मे परकृतेऽनघ ॥
ye ca rakṣāsahāyāḥ syuḥ pārthivānāṃ yudhiṣṭhira | te caivāṃśaharāḥ sarve dharme parakṛte'nagha
हे युधिष्ठिर, जो लोग राजाओं की रक्षा-कार्य में सहायक होते हैं, हे निष्पाप, वे सब दूसरे के किए धर्म में भी भाग पाते हैं।
श्लोक 35 (12.65.35)
सर्वाश्रमपदेऽप्याहुर्गार्हस्थ्यं दीप्तनिर्णयम् । पावनं पुरुषव्याघ्र यद्वयं पर्युपास्महे ॥
sarvāśramapade'pyāhurgārhasthyaṃ dīptanirṇayam | pāvanaṃ puruṣavyāghra yadvayaṃ paryupāsmahe
हे पुरुषव्याघ्र, वे कहते हैं कि सब आश्रमों के पदों में भी गृहस्थाश्रम का निर्णय दीप्त और पवित्र करनेवाला है; और हम स्वयं उसी का सेवन करते हैं।
श्लोक 36 (12.65.36)
आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति मानवः । न्यस्तदण्डो जितक्रोधः प्रेत्येह लभते सुखम् ॥
ātmopamastu bhūteṣu yo vai bhavati mānavaḥ | nyastadaṇḍo jitakrodhaḥ pretyeha labhate sukham
जो मनुष्य प्राणियों के प्रति आत्मवत् है, जिसने दण्ड त्याग दिया है और क्रोध को जीत लिया है, वह यहाँ और परलोक में सुख पाता है।
श्लोक 37 (12.65.37)
धर्मोच्छ्रिता सत्यजला शीलयष्टिर्दमध्वजा । त्यागवाताध्वगा शीघ्रा नौस्तया सन्तरिष्यति ॥
dharmocchritā satyajalā śīlayaṣṭirdamadhvajā | tyāgavātādhvagā śīghrā naustayā santariṣyati
धर्म से उठाई हुई, सत्य जिसका जल है, शील जिसका मस्तूल है और दम जिसकी पताका है, त्याग की हवा पर तेज़ चलनेवाली नौका, उसी से वह पार उतर जाएगा।
श्लोक 38 (12.65.38)
यदा सर्वत्र निर्मुक्तः कामो नास्य हृदि स्थितः । यदा सत्यान्वितो वृत्तैस्तदा ब्रह्म समश्नुते ॥
yadā sarvatra nirmuktaḥ kāmo nāsya hṛdi sthitaḥ | yadā satyānvito vṛttaistadā brahma samaśnute
जब वह सबसे मुक्त हो जाता है और उसके हृदय में कोई कामना नहीं रहती, जब उसका आचरण सत्य से युक्त होता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।
श्लोक 39 (12.65.39)
सुप्रसन्नस्तु भावेन योगेन च नराधिप । धर्मं पुरुषशार्दूल प्राप्स्यसे पालने रतः ॥
suprasannastu bhāvena yogena ca narādhipa | dharmaṃ puruṣaśārdūla prāpsyase pālane rataḥ
हे नराधिप, भाव से और योग से सुप्रसन्न होकर, हे पुरुषसिंह, तुम पालन में रत रहते हुए धर्म को प्राप्त करोगे।
श्लोक 40 (12.65.40)
वेदाध्ययनशीलानां विप्राणां साधुकर्मणाम् । पालने यत्नमातिष्ठ सर्वलोकस्य चानघ ॥
vedādhyayanaśīlānāṃ viprāṇāṃ sādhukarmaṇām | pālane yatnamātiṣṭha sarvalokasya cānagha
हे निष्पाप, वेदाध्ययन में लगे हुए सत्कर्मी ब्राह्मणों की और सारे लोक की रक्षा में यत्न करो।
श्लोक 41 (12.65.41)
वने चरन्ति ये धर्ममाश्रमेषु च भारत । रक्षणात्तच्छतगुणं धर्मं प्राप्नोति पार्थिवः ॥
vane caranti ye dharmamāśrameṣu ca bhārata | rakṣaṇāttacchataguṇaṃ dharmaṃ prāpnoti pārthivaḥ
हे भारत, जो वन में और आश्रमों में धर्म का आचरण करते हैं, उनकी रक्षा करने से राजा को उस धर्म का सौ गुना फल मिलता है।
श्लोक 42 (12.65.42)
एष ते विविधो धर्मः पाण्डवश्रेष्ठ कीर्तितः । युधिष्ठिर त्वमेनं वै पूर्वं दृष्टं सनातनम् ॥
eṣa te vividho dharmaḥ pāṇḍavaśreṣṭha kīrtitaḥ | yudhiṣṭhira tvamenaṃ vai pūrvaṃ dṛṣṭaṃ sanātanam
हे पाण्डवश्रेष्ठ, यह अनेक प्रकार का धर्म तुम्हें बता दिया गया। हे युधिष्ठिर, तुम इसका अनुसरण करो; यह पूर्वजनों द्वारा देखा हुआ सनातन मार्ग है।
श्लोक 43 (12.65.43)
चातुराश्रम्यमैकाग्र्यं चातुर्वर्ण्यं च पाण्डव । धर्मं पुरुषशार्दूल प्राप्स्यसे पालने रतः ॥
cāturāśramyamaikāgryaṃ cāturvarṇyaṃ ca pāṇḍava | dharmaṃ puruṣaśārdūla prāpsyase pālane rataḥ
हे पाण्डव, चारों आश्रमों और चारों वर्णों के धर्म में एकाग्रचित्त रहकर, हे पुरुषसिंह, तुम पालन में रत रहते हुए धर्म को प्राप्त करोगे।