शान्ति पर्व · अध्याय 78
आपत्ति में ब्राह्मण की जीविका और शस्त्र-धारण
युधिष्ठिर पूछते हैं कि आपत्ति के समय ब्राह्मण वैश्य-धर्म से जीविका चला सकता है या नहीं; भीष्म बताते हैं कि उसे कौन-सी वस्तुएँ कभी नहीं बेचनी चाहिए और अन्न का विनिमय किन शर्तों पर हो सकता है। जब क्षत्रिय-वर्ग असमर्थ हो जाए या ब्राह्मणों के प्रति दुष्ट हो जाए, तब रक्षक कौन हो, इस प्रश्न पर भीष्म कहते हैं कि ब्रह्मबल को ही क्षत्रिय का नियन्त्रण करना चाहिए और अराजकता में सभी वर्ण शस्त्र उठा सकते हैं। ब्राह्मणों के लिए लड़कर मरने वाले उत्तम लोक पाते हैं, दस्युओं से असहायों की रक्षा करने वाला सम्मान के योग्य है, और रक्षा न करने वाला राजा बाँझ गाय या न बरसने वाले बादल के समान निरर्थक है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.78.1)
व्याख्याता राजधर्मेण वृत्तिरापत्सु भारत । कथंचिद्वैश्यधर्मेण जीवेद्वा ब्राह्मणो न वा ॥
vyākhyātā rājadharmeṇa vṛttirāpatsu bhārata | kathaṃcidvaiśyadharmeṇa jīvedvā brāhmaṇo na vā
भारत! आपत्ति के समय राजधर्म के अनुसार जीविका कैसे चले, यह आपने बता दिया। अब बताइए, ब्राह्मण किसी प्रकार वैश्य-धर्म से जीवन-निर्वाह कर सकता है या नहीं?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.78.2)
अशक्तः क्षत्रधर्मेण वैश्यधर्मेण वर्तयेत् । कृषिं गोरक्ष्यमास्थाय व्यसने वृत्तिसंक्षये ॥
aśaktaḥ kṣatradharmeṇa vaiśyadharmeṇa vartayet | kṛṣiṃ gorakṣyamāsthāya vyasane vṛttisaṃkṣaye
यदि वह क्षत्रिय-धर्म से जीविका चलाने में असमर्थ हो, तो संकट आने पर और जीविका के नष्ट हो जाने पर खेती और गोपालन का आश्रय लेकर वैश्य-धर्म से जीवन बिताए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 3 (12.78.3)
कानि पण्यानि विक्रीणन्स्वर्गलोकान्न हीयते । ब्राह्मणो वैश्यधर्मेण वर्तयन्भरतर्षभ ॥
kāni paṇyāni vikrīṇansvargalokānna hīyate | brāhmaṇo vaiśyadharmeṇa vartayanbharatarṣabha
भरतश्रेष्ठ! वैश्य-धर्म से जीवन बिताने वाला ब्राह्मण कौन-कौन-सी वस्तुएँ बेचकर स्वर्गलोकों से च्युत नहीं होता?
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (12.78.4)
सुरालवणमित्येतत्तिलान्केसरिणः पशून् । वृषभान्मधु मांसं च कृतान्नं च युधिष्ठिर ॥
surālavaṇamityetattilānkesariṇaḥ paśūn | vṛṣabhānmadhu māṃsaṃ ca kṛtānnaṃ ca yudhiṣṭhira
युधिष्ठिर! सुरा और नमक, तिल, घोड़े, पशु, बैल, मधु, मांस और पका हुआ अन्न—
श्लोक 5 (12.78.5)
सर्वास्ववस्थास्वेतानि ब्राह्मणः परिवर्जयेत् । एतेषां विक्रयात्तात ब्राह्मणो नरके पतेत् ॥
sarvāsvavasthāsvetāni brāhmaṇaḥ parivarjayet | eteṣāṃ vikrayāttāta brāhmaṇo narake patet
ब्राह्मण को सभी अवस्थाओं में इन्हें बेचने से बचना चाहिए। तात! इनके बेचने से ब्राह्मण नरक में गिरता है।
श्लोक 6 (12.78.6)
अजोऽग्निर्वरुणो मेषः सूर्योऽश्वः पृथिवी विराट् । धेनुर्यज्ञश्च सोमश्च न विक्रेयाः कथंचन ॥
ajo'gnirvaruṇo meṣaḥ sūryo'śvaḥ pṛthivī virāṭ | dhenuryajñaśca somaśca na vikreyāḥ kathaṃcana
बकरा, अग्नि, वरुण, मेढ़ा, सूर्य, घोड़ा, पृथ्वी, विराट्, गौ, यज्ञ और सोम—इन्हें किसी प्रकार नहीं बेचना चाहिए।
श्लोक 7 (12.78.7)
पक्वेनामस्य निमयं न प्रशंसन्ति साधवः । निमयेत्पक्वमामेन भोजनार्थाय भारत ॥
pakvenāmasya nimayaṃ na praśaṃsanti sādhavaḥ | nimayetpakvamāmena bhojanārthāya bhārata
सज्जन पका अन्न देकर कच्चा अन्न लेने को अच्छा नहीं मानते; पर भारत! भोजन के लिए कच्चा अन्न देकर पका अन्न लिया जा सकता है।
श्लोक 8 (12.78.8)
वयं सिद्धमशिष्यामो भवान्साधयतामिदम् । एवं संवीक्ष्य समयं नाधर्मोऽस्ति कथंचन ॥
vayaṃ siddhamaśiṣyāmo bhavānsādhayatāmidam | evaṃ saṃvīkṣya samayaṃ nādharmo'sti kathaṃcana
'हम बना-बनाया भोजन करेंगे, आप यह तैयार कर दीजिए'—इस प्रकार की शर्त पर किया गया विनिमय किसी प्रकार अधर्म नहीं है।
श्लोक 9 (12.78.9)
अत्र ते वर्तयिष्यामि यथा धर्मः सनातनः । व्यवहारप्रवृत्तानां तन्निबोध युधिष्ठिर ॥
atra te vartayiṣyāmi yathā dharmaḥ sanātanaḥ | vyavahārapravṛttānāṃ tannibodha yudhiṣṭhira
युधिष्ठिर! व्यवहार में लगे लोगों के लिए इस विषय में सनातन धर्म जैसा है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ; उसे सुनो।
श्लोक 10 (12.78.10)
भवतेऽहं ददानीदं भवानेतत्प्रयच्छतु । उचितो वर्तते धर्मो न बलात्संप्रवर्तते ॥
bhavate'haṃ dadānīdaṃ bhavānetatprayacchatu | ucito vartate dharmo na balātsaṃpravartate
'मैं आपको यह देता हूँ, आप मुझे वह दीजिए'—इसी प्रकार उचित धर्म चलता है; वह बल से नहीं चलाया जाता।
श्लोक 11 (12.78.11)
इत्येवं संप्रवर्तन्ते व्यवहाराः पुरातनाः । ऋषीणामितरेषां च साधु चैतदसंशयम् ॥
ityevaṃ saṃpravartante vyavahārāḥ purātanāḥ | ṛṣīṇāmitareṣāṃ ca sādhu caitadasaṃśayam
इस प्रकार प्राचीन काल से ऋषियों और दूसरे लोगों के व्यवहार चले आ रहे हैं; यह निस्सन्देह उत्तम है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 12 (12.78.12)
अथ तात यदा सर्वाः शस्त्रमाददते प्रजाः । व्युत्क्रमन्ते स्वधर्मेभ्यः क्षत्रस्य क्षीयते बलम् ॥
atha tāta yadā sarvāḥ śastramādadate prajāḥ | vyutkramante svadharmebhyaḥ kṣatrasya kṣīyate balam
तात! जब सारी प्रजा शस्त्र उठाने लगे और अपने-अपने धर्मों से विचलित हो जाए, तब क्षत्रिय का बल घटने लगता है।
श्लोक 13 (12.78.13)
तदा त्राता तु को नु स्यात्को धर्मः किं परायणम् । एतं मे संशयं ब्रूहि विस्तरेण पितामह ॥
tadā trātā tu ko nu syātko dharmaḥ kiṃ parāyaṇam | etaṃ me saṃśayaṃ brūhi vistareṇa pitāmaha
तब रक्षक कौन होगा, धर्म क्या होगा और आश्रय क्या होगा? पितामह! मेरा यह संशय विस्तार से बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 14 (12.78.14)
दानेन तपसा यज्ञैरद्रोहेण दमेन च । ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः क्षेममिच्छेयुरात्मनः ॥
dānena tapasā yajñairadroheṇa damena ca | brāhmaṇapramukhā varṇāḥ kṣemamiccheyurātmanaḥ
ब्राह्मण जिनमें प्रधान हैं, वे वर्ण दान, तप, यज्ञ, अद्रोह और संयम के द्वारा अपना कल्याण चाहें।
श्लोक 15 (12.78.15)
तेषां ये वेदबलिनस्त उत्थाय समन्ततः । राज्ञो बलं वर्धयेयुर्महेन्द्रस्येव देवताः ॥
teṣāṃ ye vedabalinasta utthāya samantataḥ | rājño balaṃ vardhayeyurmahendrasyeva devatāḥ
उनमें जो वेद के बल से सम्पन्न हों, वे सब ओर से उठकर राजा का बल उसी प्रकार बढ़ाएँ, जैसे देवता महेन्द्र का बल बढ़ाते हैं।
श्लोक 16 (12.78.16)
राज्ञो हि क्षीयमाणस्य ब्रह्मैवाहुः परायणम् । तस्माद्ब्राह्मबलेनैव समुत्थेयं विजानता ॥
rājño hi kṣīyamāṇasya brahmaivāhuḥ parāyaṇam | tasmādbrāhmabalenaiva samuttheyaṃ vijānatā
क्षीण होते हुए राजा के लिए ब्रह्मबल को ही परम आश्रय कहा गया है; इसलिए समझदार मनुष्य को ब्रह्मबल से ही उठ खड़ा होना चाहिए।
श्लोक 17 (12.78.17)
यदा तु विजयी राजा क्षेमं राष्ट्रेऽभिसन्दधेत् । तदा वर्णा यथाधर्मं निविशेयुः स्वकर्मसु ॥
yadā tu vijayī rājā kṣemaṃ rāṣṭre'bhisandadhet | tadā varṇā yathādharmaṃ niviśeyuḥ svakarmasu
पर जब विजयी राजा राष्ट्र में शान्ति और कल्याण की स्थापना कर ले, तब सब वर्ण धर्म के अनुसार फिर अपने-अपने कर्मों में लग जाएँ।
श्लोक 18 (12.78.18)
उन्मर्यादे प्रवृत्ते तु दस्युभिः संकरे कृते । सर्वे वर्णा न दुष्येयुः शस्त्रवन्तो युधिष्ठिर ॥
unmaryāde pravṛtte tu dasyubhiḥ saṃkare kṛte | sarve varṇā na duṣyeyuḥ śastravanto yudhiṣṭhira
युधिष्ठिर! जब मर्यादा टूट जाए और दस्युओं ने वर्णों में संकर फैला दिया हो, तब शस्त्र धारण करने वाले सभी वर्ण दोषी नहीं होते।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 19 (12.78.19)
अथ चेत्सर्वतः क्षत्रं प्रदुष्येद्ब्राह्मणं प्रति । कस्तत्र ब्राह्मणांस्त्राता को धर्मः किं परायणम् ॥
atha cetsarvataḥ kṣatraṃ praduṣyedbrāhmaṇaṃ prati | kastatra brāhmaṇāṃstrātā ko dharmaḥ kiṃ parāyaṇam
और यदि क्षत्रिय सब ओर से ब्राह्मणों के प्रति दुष्ट हो जाएँ, तो वहाँ ब्राह्मणों का रक्षक कौन होगा, धर्म क्या होगा और आश्रय क्या होगा?
भीष्म उवाच
श्लोक 20 (12.78.20)
तपसा ब्रह्मचर्येण शस्त्रेण च बलेन च । अमायया मायया च नियन्तव्यं तदा भवेत् ॥
tapasā brahmacaryeṇa śastreṇa ca balena ca | amāyayā māyayā ca niyantavyaṃ tadā bhavet
तब तप, ब्रह्मचर्य, शस्त्र और बल से, तथा निष्कपट और कपट दोनों उपायों से उसे वश में करना चाहिए।
श्लोक 21 (12.78.21)
क्षत्रियस्यातिवृत्तस्य ब्राह्मणेषु विशेषतः । ब्रह्मैव संनियन्तृ स्यात्क्षत्रं हि ब्रह्मसंभवम् ॥
kṣatriyasyātivṛttasya brāhmaṇeṣu viśeṣataḥ | brahmaiva saṃniyantṛ syātkṣatraṃ hi brahmasaṃbhavam
जब कोई क्षत्रिय, विशेषकर ब्राह्मणों के प्रति, मर्यादा लाँघ जाए, तब ब्रह्म ही उसका नियन्त्रण करने वाला हो; क्योंकि क्षत्र ब्रह्म से ही उत्पन्न है।
श्लोक 22 (12.78.22)
अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् । तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वस्वयोनिषु शाम्यति ॥
adbhyo'gnirbrahmataḥ kṣatramaśmano lohamutthitam | teṣāṃ sarvatragaṃ tejaḥ svasvayoniṣu śāmyati
जल से अग्नि, ब्राह्मण से क्षत्रिय और पत्थर से लोहा उत्पन्न हुआ। इनका सर्वत्र पहुँचने वाला तेज अपने-अपने उत्पत्ति-स्थान में शान्त हो जाता है।
श्लोक 23 (12.78.23)
यदा छिनत्त्ययोऽश्मानमग्निश्चापोऽभिहन्ति च । क्षत्रं च ब्राह्मणं द्वेष्टि तदा शाम्यन्ति ते त्रयः ॥
yadā chinattyayo'śmānamagniścāpo'bhihanti ca | kṣatraṃ ca brāhmaṇaṃ dveṣṭi tadā śāmyanti te trayaḥ
जब लोहा पत्थर को काटता है, अग्नि जल पर प्रहार करती है और क्षत्रिय ब्राह्मण से द्वेष करता है, तब ये तीनों शान्त हो जाते हैं।
श्लोक 24 (12.78.24)
तस्माद्ब्रह्मणि शाम्यन्ति क्षत्रियाणां युधिष्ठिर । समुदीर्णान्यजेयानि तेजांसि च बलानि च ॥
tasmādbrahmaṇi śāmyanti kṣatriyāṇāṃ yudhiṣṭhira | samudīrṇānyajeyāni tejāṃsi ca balāni ca
युधिष्ठिर! इसलिए क्षत्रियों के बढ़े हुए और अजेय तेज तथा बल ब्रह्म के सामने शान्त हो जाते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 25 (12.78.25)
ब्रह्मवीर्ये मृदूभूते क्षत्रवीर्ये च दुर्बले । दुष्टेषु सर्ववर्णेषु ब्राह्मणान्प्रति भारत ॥
brahmavīrye mṛdūbhūte kṣatravīrye ca durbale | duṣṭeṣu sarvavarṇeṣu brāhmaṇānprati bhārata
भारत! जब ब्राह्मणों का वीर्य मन्द पड़ गया हो, क्षत्रियों का बल दुर्बल हो और सभी वर्ण ब्राह्मणों के प्रति दुष्ट हो गए हों—
श्लोक 26 (12.78.26)
ये तत्र युद्धं कुर्वन्ति त्यक्त्वा जीवितमात्मनः । ब्राह्मणान्परिरक्षन्ति तेषां लोका भवन्ति के ॥
ye tatra yuddhaṃ kurvanti tyaktvā jīvitamātmanaḥ | brāhmaṇānparirakṣanti teṣāṃ lokā bhavanti ke
तब जो लोग अपने प्राणों का मोह छोड़कर युद्ध करते हैं और ब्राह्मणों की रक्षा करते हैं, उन्हें कौन-से लोक मिलते हैं?
भीष्म उवाच
श्लोक 27 (12.78.27)
ब्राह्मणान्परिरक्षन्तो धर्ममात्मानमेव च । मनस्विनो मन्युमन्तः पुण्याँल्लोकान्व्रजन्त्यमी । ब्राह्मणार्थं हि सर्वेषां शस्त्रग्रहणमिष्यते ॥
brāhmaṇānparirakṣanto dharmamātmānameva ca | manasvino manyumantaḥ puṇyām̐llokānvrajantyamī | brāhmaṇārthaṃ hi sarveṣāṃ śastragrahaṇamiṣyate
ब्राह्मणों, धर्म और अपने आप की रक्षा करने वाले वे स्वाभिमानी और क्रोधी वीर पुण्यलोकों को जाते हैं। ब्राह्मण के लिए तो सभी का शस्त्र धारण करना अभीष्ट माना गया है।
श्लोक 28 (12.78.28)
अतिस्विष्टमधीतानां लोकानतितपस्विनाम् । अनाशकाग्न्याहितानां शूरा यान्ति परां गतिम् ॥
atisviṣṭamadhītānāṃ lokānatitapasvinām | anāśakāgnyāhitānāṃ śūrā yānti parāṃ gatim
खूब यज्ञ करने वालों और पढ़े हुओं के, महातपस्वियों के, उपवास से प्राण त्यागने वालों के और अग्निहोत्रियों के लोकों को पार करके शूरवीर परम गति पाते हैं।
श्लोक 29 (12.78.29)
ब्राह्मणस्त्रिषु वर्णेषु शस्त्रं गृह्णन्न दुष्यति । एष एवात्मनस्त्यागो नान्यं धर्मं विदुर्जना ॥
brāhmaṇastriṣu varṇeṣu śastraṃ gṛhṇanna duṣyati | eṣa evātmanastyāgo nānyaṃ dharmaṃ vidurjanā
तीनों वर्णों की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने वाला ब्राह्मण दोषी नहीं होता। यही अपने आपका त्याग है; लोग इससे भिन्न किसी धर्म को नहीं जानते।
श्लोक 30 (12.78.30)
तेभ्यो नमश्च भद्रं च ये शरीराणि जुह्वति । ब्रह्मद्विषो जिघांसन्तस्तेषां नोऽस्तु सलोकता ॥
tebhyo namaśca bhadraṃ ca ye śarīrāṇi juhvati | brahmadviṣo jighāṃsantasteṣāṃ no'stu salokatā
उन्हें नमस्कार और कल्याण हो, जो ब्राह्मणों से द्वेष करने वालों को मारने की इच्छा से अपने शरीरों की आहुति देते हैं; हमें उनके साथ एक ही लोक मिले।
श्लोक 31 (12.78.31)
ब्रह्मलोकजितः स्वर्ग्यान्वीरांस्तान्मनुरब्रवीत् । यथाऽश्वमेधावभृथे स्नाताः पूता भवन्त्युत । दुष्कृतः सुकृतश्चैव तथा शस्त्रहता रणे ॥
brahmalokajitaḥ svargyānvīrāṃstānmanurabravīt | yathā'śvamedhāvabhṛthe snātāḥ pūtā bhavantyuta | duṣkṛtaḥ sukṛtaścaiva tathā śastrahatā raṇe
मनु ने कहा है कि ऐसे वीर ब्रह्मलोक और स्वर्ग को जीत लेते हैं। जैसे अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ-स्नान में नहाए हुए लोग पवित्र हो जाते हैं, वैसे ही रणभूमि में शस्त्र से मारे गए लोग पवित्र हो जाते हैं, चाहे उन्होंने पाप किया हो या पुण्य।
श्लोक 32 (12.78.32)
भवत्यधर्मो धर्मो हि धर्मोऽधर्मो भवत्युत । कारणाद्देशकालस्य देशः कालः स तादृशः ॥
bhavatyadharmo dharmo hi dharmo'dharmo bhavatyuta | kāraṇāddeśakālasya deśaḥ kālaḥ sa tādṛśaḥ
देश और काल के कारण अधर्म धर्म बन जाता है और धर्म अधर्म; क्योंकि देश और काल वैसे ही होते हैं।
श्लोक 33 (12.78.33)
मैत्राः क्रूराणि कुर्वन्तो जयन्ति स्वर्गमुत्तमम् । धर्म्याः पापानि कुर्वाणा गच्छन्ति परमां गतिम् ॥
maitrāḥ krūrāṇi kurvanto jayanti svargamuttamam | dharmyāḥ pāpāni kurvāṇā gacchanti paramāṃ gatim
मैत्रीपूर्ण स्वभाव के लोग क्रूर कर्म करते हुए भी उत्तम स्वर्ग जीत लेते हैं, और धर्मनिष्ठ लोग पाप करते हुए भी परम गति पाते हैं।
श्लोक 34 (12.78.34)
ब्राह्मणस्त्रिषु कालेषु शस्त्रं गृह्णन्न दुष्यति । आत्मत्राणे दस्युदोषे सर्वस्वहरणे तथा ॥
brāhmaṇastriṣu kāleṣu śastraṃ gṛhṇanna duṣyati | ātmatrāṇe dasyudoṣe sarvasvaharaṇe tathā
तीन अवसरों पर शस्त्र धारण करने वाला ब्राह्मण दोषी नहीं होता—अपनी रक्षा में, दस्युओं का भय होने पर और सर्वस्व छीने जाने पर।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 35 (12.78.35)
अभ्युत्थिते दस्युबले क्षत्रार्थे वर्णसङ्करे । संप्रमूढेषु वर्णेषु यदन्योऽभिभवेद्वली ॥
abhyutthite dasyubale kṣatrārthe varṇasaṅkare | saṃpramūḍheṣu varṇeṣu yadanyo'bhibhavedvalī
जब दस्युओं का बल उठ खड़ा हो, क्षत्रिय का कार्य विफल हो और वर्णसंकर फैले, जब सब वर्ण मोहग्रस्त हों और कोई बलवान् दूसरों को दबाए—
श्लोक 36 (12.78.36)
ब्राह्मणो यदि वा वैश्यः शूद्रो वा राजसत्तम । दस्युभ्यो यः प्रजा रक्षेद्दण्डं धर्मेण धारयेत् ॥
brāhmaṇo yadi vā vaiśyaḥ śūdro vā rājasattama | dasyubhyo yaḥ prajā rakṣeddaṇḍaṃ dharmeṇa dhārayet
तब, राजाओं में श्रेष्ठ! चाहे वह ब्राह्मण हो, वैश्य हो या शूद्र, जो दस्युओं से प्रजा की रक्षा करे और धर्मपूर्वक दण्ड धारण करे—
भीष्म उवाच
श्लोक 37 (12.78.37)
कार्यं कुर्यान्न वा कुर्यात्स वार्यो वा भवेन्न वा । न स्म शस्त्रं गृहीतव्यमन्यत्र क्षत्रबन्धुतः ॥
kāryaṃ kuryānna vā kuryātsa vāryo vā bhavenna vā | na sma śastraṃ gṛhītavyamanyatra kṣatrabandhutaḥ
वह कार्य करे या न करे, उसे रोका जाए या न रोका जाए—क्षत्रिय को छोड़कर किसी दूसरे को शस्त्र नहीं उठाना चाहिए।
श्लोक 38 (12.78.38)
अपारे यो भवेत्पारमप्लवे यः प्लवो भवेत् । शूद्रो वा यदि वाऽप्यन्यः सर्वथा मानमर्हति ॥
apāre yo bhavetpāramaplave yaḥ plavo bhavet | śūdro vā yadi vā'pyanyaḥ sarvathā mānamarhati
जो पार न पाने वालों के लिए पार बन जाए और नाव न होने पर नाव बन जाए, वह शूद्र हो या कोई और, हर प्रकार से सम्मान के योग्य है।
श्लोक 39 (12.78.39)
यमाश्रित्य नरा राजन्वर्तयेयुर्यथासुखम् । अनाथास्तप्यमानाश्च दस्युभिः परिपीडिताः ॥
yamāśritya narā rājanvartayeyuryathāsukham | anāthāstapyamānāśca dasyubhiḥ paripīḍitāḥ
राजन्! जिसका आश्रय लेकर अनाथ, दुःखी और दस्युओं से पीड़ित लोग सुखपूर्वक जीवन बिताते हैं,
श्लोक 40 (12.78.40)
तमेव पूजयेयुस्ते प्रीत्या स्वमिव बान्धवम् । महद्ध्यभीष्टं कौरव्य कर्ता सन्मानमर्हति ॥
tameva pūjayeyuste prītyā svamiva bāndhavam | mahaddhyabhīṣṭaṃ kauravya kartā sanmānamarhati
उसी की वे प्रेम से अपने बन्धु के समान पूजा करें। कुरुवंशी! जो ऐसा महान् और अभीष्ट कार्य करे, वह सम्मान के योग्य है।
श्लोक 41 (12.78.41)
किमनडुहा यो न वहेत्किं धेन्वा वाऽप्यदुग्धया । बन्ध्यया भार्यया कोऽर्थः कोऽर्थो राज्ञाऽप्यरक्षता ॥
kimanaḍuhā yo na vahetkiṃ dhenvā vā'pyadugdhayā | bandhyayā bhāryayā ko'rthaḥ ko'rtho rājñā'pyarakṣatā
जो बैल बोझ न ढोए, जो गाय दूध न दे और जो पत्नी बाँझ हो, उनसे क्या लाभ? और जो राजा रक्षा न करे, उससे क्या लाभ?
श्लोक 42 (12.78.42)
यथा दारुमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । यथा ह्यदक्षः पुरुषः पथि क्षेत्रं यथोपरम् ॥
yathā dārumayo hastī yathā carmamayo mṛgaḥ | yathā hyadakṣaḥ puruṣaḥ pathi kṣetraṃ yathoparam
जैसे काठ का हाथी, चमड़े का मृग, मार्ग में अनाड़ी मनुष्य और ऊसर खेत,
श्लोक 43 (12.78.43)
यथा विप्रोऽनधीयानो राजा यश्च न रक्षिता । मेघो न वर्षते यश्च सर्व एव निरर्थकाः ॥
yathā vipro'nadhīyāno rājā yaśca na rakṣitā | megho na varṣate yaśca sarva eva nirarthakāḥ
जैसे अनपढ़ ब्राह्मण, रक्षा न करने वाला राजा और न बरसने वाला बादल—ये सब निरर्थक हैं।
श्लोक 44 (12.78.44)
नित्यं यस्तु सतो रक्षेदसतश्च निवर्तयेत् । स एव राजा कर्तव्यस्तेन सर्वमिदं धृतम् ॥
nityaṃ yastu sato rakṣedasataśca nivartayet | sa eva rājā kartavyastena sarvamidaṃ dhṛtam
जो सदा सज्जनों की रक्षा करे और दुष्टों को दूर करे, उसी को राजा बनाना चाहिए; उसी से यह सब धारण किया गया है।