शान्ति पर्व · अध्याय 80
मित्र-शत्रु, मन्त्री और ज्ञातिजन
युधिष्ठिर पूछते हैं कि अकेला राजा राज्य कैसे चलाए, मन्त्री कैसे चुने और किस पर विश्वास करे। भीष्म चार प्रकार के मित्र और पाँचवें धर्मात्मा मित्र का वर्णन करते हैं, बताते हैं कि उपकार और अपकार से ही मित्र-शत्रु बनते हैं, विश्वास न पूरा होना चाहिए न बिल्कुल अभाव, और सच्चे मित्र तथा राजा के निकटवर्ती अमात्य के लक्षण गिनाते हैं। अन्त में वे अपने ही ज्ञातिजनों के विषय में कहते हैं कि वे उन्नति करते मनुष्य को सह नहीं पाते, फिर भी अपमानित का एकमात्र आश्रय वही हैं, इसलिए वाणी और कर्म से उनका सम्मान करते हुए सावधानी से विश्वास करना चाहिए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.80.1)
यदप्यल्पतरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् । पुरुषेणासहायेन किमु राज्यं पितामह ॥
yadapyalpataraṃ karma tadapyekena duṣkaram | puruṣeṇāsahāyena kimu rājyaṃ pitāmaha
पितामह! छोटा-सा काम भी अकेले के लिए कठिन होता है; फिर बिना सहायक के अकेला मनुष्य राज्य कैसे चलाए?
श्लोक 2 (12.80.2)
किंशीलः किंसमाचारो राज्ञो यः सचिवो भवेत् । कीदृशे विश्वसेद्राजा कीदृशे न च विश्वसेत् ॥
kiṃśīlaḥ kiṃsamācāro rājño yaḥ sacivo bhavet | kīdṛśe viśvasedrājā kīdṛśe na ca viśvaset
राजा का मन्त्री कैसे स्वभाव और कैसे आचरण वाला होना चाहिए? राजा किस प्रकार के मनुष्य पर विश्वास करे और किस प्रकार के पर न करे?
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.80.3)
चतुर्विधानि मित्राणि राज्ञां राजन्भवन्त्युत । सहार्थो भजमानश्च सहजः कृत्रिमस्तथा ॥
caturvidhāni mitrāṇi rājñāṃ rājanbhavantyuta | sahārtho bhajamānaśca sahajaḥ kṛtrimastathā
राजन्! राजाओं के चार प्रकार के मित्र होते हैं—समान उद्देश्य वाला, सेवा में आने वाला, जन्म से मित्र और बनाया हुआ मित्र।
श्लोक 4 (12.80.4)
धर्मात्मा पञ्चमं मित्रं स तु नैकस्य न द्वयोः । यतो धर्मस्ततो वा स्यान्मध्यस्थो वा ततो भवेत् ॥
dharmātmā pañcamaṃ mitraṃ sa tu naikasya na dvayoḥ | yato dharmastato vā syānmadhyastho vā tato bhavet
पाँचवाँ मित्र धर्मात्मा होता है; वह न किसी एक का होता है, न दो का। जहाँ धर्म हो, वह उधर ही रहे, अथवा तटस्थ हो जाए।
श्लोक 5 (12.80.5)
यो यस्यार्थो न रोचेत न तं तस्य प्रकाशयेत् । मित्राणां प्रकृतिर्नास्ति त्वमित्राणां च भारत । उपकाराद्भवेन्मित्रमपकाराद्भवेदरिः ॥
yo yasyārtho na roceta na taṃ tasya prakāśayet | mitrāṇāṃ prakṛtirnāsti tvamitrāṇāṃ ca bhārata | upakārādbhavenmitramapakārādbhavedariḥ
जिस मनुष्य का अभिप्राय दूसरे को न रुचे, उसे वह उसके सामने प्रकट न करे। भारत! मित्रों और अमित्रों का कोई स्थिर स्वभाव नहीं होता; उपकार से मनुष्य मित्र बनता है और अपकार से शत्रु।
श्लोक 6 (12.80.6)
यस्यैव हि मनुष्यस्य नरो मरणमिच्छति । तस्य पर्यागते काले पुनर्जीवितुमिच्छति ॥
yasyaiva hi manuṣyasya naro maraṇamicchati | tasya paryāgate kāle punarjīvitumicchati
जिस मनुष्य की मृत्यु कोई चाहता है, समय पलट जाने पर वही उसका फिर से जीना चाहता है।
श्लोक 7 (12.80.7)
धर्माधर्मेण राजानश्चरन्ति विजिगीषवः । चतुर्णां मध्यमौ श्रेष्ठौ नित्यं शङ्क्यौ तथाऽपरौ । सर्वे नित्यं शङ्कितव्याः प्रत्यक्षं कार्यमात्मनः ॥
dharmādharmeṇa rājānaścaranti vijigīṣavaḥ | caturṇāṃ madhyamau śreṣṭhau nityaṃ śaṅkyau tathā'parau | sarve nityaṃ śaṅkitavyāḥ pratyakṣaṃ kāryamātmanaḥ
विजय चाहने वाले राजा धर्म और अधर्म दोनों से व्यवहार करते हैं। चारों में बीच के दो श्रेष्ठ हैं, और शेष दो सदा शंका के योग्य हैं; वास्तव में सभी पर सदा शंका करनी चाहिए, और अपना काम अपनी आँखों के सामने देखना चाहिए।
श्लोक 8 (12.80.8)
न हि राज्ञा प्रमादो वै कर्तव्यो मित्ररक्षणे । प्रमादिनं हि राजानं लोकाः परिभवन्त्युत ॥
na hi rājñā pramādo vai kartavyo mitrarakṣaṇe | pramādinaṃ hi rājānaṃ lokāḥ paribhavantyuta
राजा को मित्रों की रक्षा में प्रमाद कभी नहीं करना चाहिए; प्रमादी राजा का लोग तिरस्कार करते हैं।
श्लोक 9 (12.80.9)
असाधुः साधुतामेति साधुर्भवति दारुणः । अरिश्च मित्रं भवति मित्रं चापि प्रदुष्यति ॥
asādhuḥ sādhutāmeti sādhurbhavati dāruṇaḥ | ariśca mitraṃ bhavati mitraṃ cāpi praduṣyati
दुष्ट सज्जन बन जाता है और सज्जन कठोर हो जाता है; शत्रु मित्र हो जाता है और मित्र भी बिगड़ जाता है।
श्लोक 10 (12.80.10)
अनित्यचित्तः पुरुषस्तस्मिन्को जातु विश्वसेत् । तस्मात्प्रधानं यत्कार्यं प्रत्यक्षं तत्समाचरेत् ॥
anityacittaḥ puruṣastasminko jātu viśvaset | tasmātpradhānaṃ yatkāryaṃ pratyakṣaṃ tatsamācaret
मनुष्य का चित्त अस्थिर है; उस पर कौन कभी विश्वास करे? इसलिए जो मुख्य कार्य हो, उसे अपनी आँखों के सामने करना चाहिए।
श्लोक 11 (12.80.11)
एकान्तेन हि विश्वासः कृत्स्नो धर्मार्थनाशकः । अविश्वासश्च सर्वत्र मृत्युर्नापि विशिष्यते ॥
ekāntena hi viśvāsaḥ kṛtsno dharmārthanāśakaḥ | aviśvāsaśca sarvatra mṛtyurnāpi viśiṣyate
पूरा विश्वास धर्म और अर्थ का नाश कर देता है, और सर्वत्र अविश्वास भी मृत्यु से कम नहीं है।
श्लोक 12 (12.80.12)
अकालमृत्युर्विश्वासो विश्वसन्हि विपद्यते । यस्मिन्करोति विश्वासमिच्छतस्तस्य जीवति ॥
akālamṛtyurviśvāso viśvasanhi vipadyate | yasminkaroti viśvāsamicchatastasya jīvati
विश्वास अकाल मृत्यु है; विश्वास करने वाला नष्ट होता है। जिस पर विश्वास किया जाता है, उसकी इच्छा रहने तक ही विश्वास करने वाला जीता है।
श्लोक 13 (12.80.13)
तस्माद्विश्वसितव्यं च शङ्कितव्यं च केषुचित् । एषा नीतिगतिस्तात लक्ष्मीश्चैषा सनातनी ॥
tasmādviśvasitavyaṃ ca śaṅkitavyaṃ ca keṣucit | eṣā nītigatistāta lakṣmīścaiṣā sanātanī
इसलिए कुछ पर विश्वास करना चाहिए और कुछ पर शंका। तात! यही नीति की गति है और यही सनातन लक्ष्मी है।
श्लोक 14 (12.80.14)
यं मन्येत ममाभावादिममर्थागमः स्पृशेत् । नित्यं तस्माच्छङ्कितव्यममित्रं तं विदुर्बुधाः ॥
yaṃ manyeta mamābhāvādimamarthāgamaḥ spṛśet | nityaṃ tasmācchaṅkitavyamamitraṃ taṃ vidurbudhāḥ
जिसके विषय में वह सोचे कि 'मेरे न रहने पर यह धन पाएगा', उस पर सदा शंका रखनी चाहिए; विद्वान् उसे शत्रु मानते हैं।
श्लोक 15 (12.80.15)
यस्य क्षेत्रादप्युदकं क्षेत्रमन्यस्य गच्छति । न तत्रानिच्छतस्तस्य भिद्येरन्सर्वसेतवः ॥
yasya kṣetrādapyudakaṃ kṣetramanyasya gacchati | na tatrānicchatastasya bhidyeransarvasetavaḥ
यदि एक के खेत का पानी दूसरे के खेत में चला जाए, तो वहाँ उसकी इच्छा न होने पर सारे बाँध नहीं टूटते।
श्लोक 16 (12.80.16)
तथैवात्युदकाद्भीतस्तस्य भेदनमिच्छति । यमेवंलक्षणं विद्यात्तममित्रं विदुर्बुधाः ॥
tathaivātyudakādbhītastasya bhedanamicchati | yamevaṃlakṣaṇaṃ vidyāttamamitraṃ vidurbudhāḥ
इसी प्रकार जो अधिक जल से डरता है, वह उन्हें तोड़ना चाहता है। जिसमें ऐसा लक्षण जान पड़े, उसे विद्वान् शत्रु कहते हैं।
श्लोक 17 (12.80.17)
यस्तु वृद्ध्या न तप्येत क्षये दीनतरो भवेत् । एतदुत्तममित्रस्य निमित्तमभिचक्षते ॥
yastu vṛddhyā na tapyeta kṣaye dīnataro bhavet | etaduttamamitrasya nimittamabhicakṣate
जो मित्र की वृद्धि से नहीं जलता और उसके क्षय में और भी दीन हो जाता है—इसे उत्तम मित्र का लक्षण कहते हैं।
श्लोक 18 (12.80.18)
यन्मन्येत ममाभावादस्याभावो भवेदिति । तस्मिन्कुर्वीत विश्वासं यथा पितरि वै तथा ॥
yanmanyeta mamābhāvādasyābhāvo bhavediti | tasminkurvīta viśvāsaṃ yathā pitari vai tathā
जिसके विषय में वह यह माने कि 'मेरे न रहने पर इसका भी अभाव हो जाएगा', उस पर पिता के समान विश्वास करे।
श्लोक 19 (12.80.19)
तं शक्त्या वर्तमानं च सर्वतः परिबृंहयेत् । नित्यं क्षताद्वारयति यो धर्मेष्वपि कर्मसु ॥
taṃ śaktyā vartamānaṃ ca sarvataḥ paribṛṃhayet | nityaṃ kṣatādvārayati yo dharmeṣvapi karmasu
जो सदा क्षति से बचाता है, धर्म के कार्यों में भी, और जो पास रहता है, उसे अपनी शक्ति भर सब ओर से बढ़ाए।
श्लोक 20 (12.80.20)
क्षताद्भीतं विजानीयादुत्तमं मित्रलक्षणम् । ये यस्य क्षयमिच्छन्ति ते तस्य रिपवः स्मृताः ॥
kṣatādbhītaṃ vijānīyāduttamaṃ mitralakṣaṇam | ye yasya kṣayamicchanti te tasya ripavaḥ smṛtāḥ
क्षति के विषय में भय को उत्तम मित्र का लक्षण जानना चाहिए। जो जिसके विनाश की इच्छा करते हैं, वे उसके शत्रु कहे गए हैं।
श्लोक 21 (12.80.21)
व्यसनान्नित्यभीतो यः समृद्ध्या यो न दुष्यति । यत्स्यादेवंविधं मित्रं तदात्मसममुच्यते ॥
vyasanānnityabhīto yaḥ samṛddhyā yo na duṣyati | yatsyādevaṃvidhaṃ mitraṃ tadātmasamamucyate
जो विपत्ति से सदा डरता रहता है और समृद्धि से जिसका मन नहीं बिगड़ता, इस प्रकार का मित्र अपने ही समान कहा जाता है।
श्लोक 22 (12.80.22)
रूपवर्णस्वरोपेतस्तितिक्षुरनसूयकः । कुलीनः शीलसंपन्नः स ते स्यात्प्रत्यनन्तरः ॥
rūpavarṇasvaropetastitikṣuranasūyakaḥ | kulīnaḥ śīlasaṃpannaḥ sa te syātpratyanantaraḥ
रूप, वर्ण और स्वर से सम्पन्न, सहनशील, असूया से रहित, कुलीन और शीलवान् पुरुष तुम्हारा प्रतिनिधि हो सकता है।
श्लोक 23 (12.80.23)
मेधावी स्मृतिमान्दक्षः प्रकृत्या चानृशंस्यवान् । यो मानितोऽमानितो वा न सन्तुष्येत्कथंचन ॥
medhāvī smṛtimāndakṣaḥ prakṛtyā cānṛśaṃsyavān | yo mānito'mānito vā na santuṣyetkathaṃcana
जो मेधावी, स्मरणशील, दक्ष और स्वभाव से दयालु हो, और सम्मानित हो या अपमानित—किसी प्रकार सन्तुष्ट न हो जाए—
श्लोक 24 (12.80.24)
ऋत्विग्वा यदि वाऽऽचार्यः सखा वाऽत्यंतसत्कृतः । गृहे वसेदमात्यस्ते स स्यात्परमपूजितः ॥
ṛtvigvā yadi vā''cāryaḥ sakhā vā'tyaṃtasatkṛtaḥ | gṛhe vasedamātyaste sa syātparamapūjitaḥ
ऋत्विज् हो, आचार्य हो या अत्यन्त सत्कार पाया हुआ मित्र—वह तुम्हारे घर में रहने वाला अमात्य हो और तुम्हारा परम पूजित हो।
श्लोक 25 (12.80.25)
संविद्याः परमं मित्रं प्रकृतिं चार्थधर्मयोः । विश्वासस्ते भवेत्तत्र यथा पितरि वै तथा ॥
saṃvidyāḥ paramaṃ mitraṃ prakṛtiṃ cārthadharmayoḥ | viśvāsaste bhavettatra yathā pitari vai tathā
उसे परम मित्र और अर्थ तथा धर्म के स्वभाव को जानने वाला समझो; उस पर तुम्हारा विश्वास वैसा हो जैसा पिता पर होता है।
श्लोक 26 (12.80.26)
नैव द्वौ न त्रयः कार्या न मृष्येरन्परस्परम् । एकार्थे हेतुभूतानां भेदो भवति सर्वदा ॥
naiva dvau na trayaḥ kāryā na mṛṣyeranparasparam | ekārthe hetubhūtānāṃ bhedo bhavati sarvadā
दो या तीन को एक ही पद पर नियुक्त नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे एक-दूसरे को सहन नहीं करेंगे; एक ही कार्य के कारण बने हुए लोगों में सदा फूट पैदा होती है।
श्लोक 27 (12.80.27)
कीर्तिप्रधानो यस्तु स्याद्यश्च स्यात्समये स्थितः । समर्थान्यश्च न द्वेष्टि नानर्थान्कुरुते च यः ॥
kīrtipradhāno yastu syādyaśca syātsamaye sthitaḥ | samarthānyaśca na dveṣṭi nānarthānkurute ca yaḥ
जो यश को प्रधान मानता हो, जो मर्यादा में स्थित हो, जो समर्थों से द्वेष न करता हो और किसी का अनर्थ न करता हो—
श्लोक 28 (12.80.28)
यो न कामाद्भयाल्लोभात्क्रोधाद्वा धर्ममुत्सृजेत् । दक्षः पर्याप्तवचनः स ते स्यात्प्रत्यनन्तरः ॥
yo na kāmādbhayāllobhātkrodhādvā dharmamutsṛjet | dakṣaḥ paryāptavacanaḥ sa te syātpratyanantaraḥ
जो काम, भय, लोभ या क्रोध से धर्म को न छोड़े, जो दक्ष हो और बोलने में समर्थ हो, वह तुम्हारा प्रतिनिधि हो।
श्लोक 29 (12.80.29)
कुलीनः शीलसंपन्नस्तितिक्षुरविकत्थनः । शूरश्चार्यश्च विद्वांश्च प्रतिपत्तिविशारदः ॥
kulīnaḥ śīlasaṃpannastitikṣuravikatthanaḥ | śūraścāryaśca vidvāṃśca pratipattiviśāradaḥ
कुलीन, शीलवान्, सहनशील, डींग न मारने वाला, शूर, आर्य, विद्वान् और कर्तव्य निश्चित करने में कुशल—
श्लोक 30 (12.80.30)
एते ह्यमात्याः कर्तव्याः सर्वकर्मस्ववस्थिताः । पूजिताः संबिभक्ताश्च सुसहायाः स्वनुष्ठिताः ॥
ete hyamātyāḥ kartavyāḥ sarvakarmasvavasthitāḥ | pūjitāḥ saṃbibhaktāśca susahāyāḥ svanuṣṭhitāḥ
ऐसे ही पुरुषों को सब कार्यों में स्थित अमात्य बनाना चाहिए; उन्हें सम्मान मिले, हिस्सा मिले, सहायक मिलें और भली-भाँति देखभाल हो।
श्लोक 31 (12.80.31)
कृत्स्नमेते विनिक्षिप्ताः प्रतिरूपेषु कर्मसु । युक्ता महत्सु कार्येषु श्रेयांस्युत्पादयन्त्युत ॥
kṛtsnamete vinikṣiptāḥ pratirūpeṣu karmasu | yuktā mahatsu kāryeṣu śreyāṃsyutpādayantyuta
सब कुछ सौंपे जाने पर, उचित कार्यों में लगाए जाने पर और बड़े कार्यों में नियुक्त होने पर वे कल्याणकारी परिणाम उत्पन्न करते हैं।
श्लोक 32 (12.80.32)
एते कर्माणि कुर्वन्ति स्पर्धमाना मिथः सदा । अनुतिष्ठन्ति चैवार्थमाचक्षाणाः परस्परम् ॥
ete karmāṇi kurvanti spardhamānā mithaḥ sadā | anutiṣṭhanti caivārthamācakṣāṇāḥ parasparam
ये लोग सदा आपस में होड़ करते हुए कार्य करते हैं और एक-दूसरे को बताते हुए कार्यों को पूरा करते हैं।
श्लोक 33 (12.80.33)
ज्ञातिभ्यो बिभियाश्चैव मृत्योरिव यतस्तदा । उपराजेव राजर्धि ज्ञातिर्न सहते सदा ॥
jñātibhyo bibhiyāścaiva mṛtyoriva yatastadā | uparājeva rājardhi jñātirna sahate sadā
तुम्हें अपने ज्ञातियों से मृत्यु के समान डरना चाहिए, क्योंकि जैसे समीप का छोटा राजा राजर्षि को सहन नहीं करता, वैसे ही ज्ञाति कभी उसे सहन नहीं करता।
श्लोक 34 (12.80.34)
ऋजोर्मृदोर्वदान्यस्य ह्रीमतः सत्यवादिनः । नान्यो ज्ञातेर्महाबाहो विनाशमभिनन्दति ॥
ṛjormṛdorvadānyasya hrīmataḥ satyavādinaḥ | nānyo jñātermahābāho vināśamabhinandati
महाबाहो! सरल, कोमल, उदार, लज्जाशील और सत्यवादी पुरुष के विनाश से ज्ञाति को छोड़ दूसरा कोई प्रसन्न नहीं होता।
श्लोक 35 (12.80.35)
अज्ञातयोऽप्यसुखदा ज्ञातयोऽपि सुखावहाः । अज्ञातिमन्तं पुरुषं परे चाभिभवन्त्युत ॥
ajñātayo'pyasukhadā jñātayo'pi sukhāvahāḥ | ajñātimantaṃ puruṣaṃ pare cābhibhavantyuta
जो ज्ञाति नहीं हैं वे भी सुख देने वाले नहीं होते, और ज्ञाति भी सुख लाने वाले होते हैं; ज्ञातिहीन पुरुष को दूसरे दबा लेते हैं।
श्लोक 36 (12.80.36)
निकृतस्य नरैरन्यैर्ज्ञातिरेव परायणम् । नान्यो निकारं सहते ज्ञातिर्ज्ञातेः कदाचन ॥
nikṛtasya narairanyairjñātireva parāyaṇam | nānyo nikāraṃ sahate jñātirjñāteḥ kadācana
दूसरों से अपमानित मनुष्य का आश्रय ज्ञाति ही है; ज्ञाति अपने ज्ञाति के अपमान को कभी नहीं सहता।
श्लोक 37 (12.80.37)
आत्मानमेव जानाति निकृतं बान्धवैरपि । तेषु सन्ति गुणाश्चैव नैर्गुण्यं चैव लक्ष्यते ॥
ātmānameva jānāti nikṛtaṃ bāndhavairapi | teṣu santi guṇāścaiva nairguṇyaṃ caiva lakṣyate
बन्धुओं से भी अपमानित हुआ मनुष्य अपने आपको ही जानता है; उन ज्ञातियों में गुण भी हैं और निर्गुणता भी दिखाई देती है।
श्लोक 38 (12.80.38)
नाज्ञातिरनुगृह्णाति नाज्ञातिर्वृद्धिमश्नुते । उभयं ज्ञातिवर्गेषु दृश्यते साध्वसाधु च ॥
nājñātiranugṛhṇāti nājñātirvṛddhimaśnute | ubhayaṃ jñātivargeṣu dṛśyate sādhvasādhu ca
जो ज्ञाति नहीं, वह न अनुग्रह करता है, न उन्नति पाता है; ज्ञातियों के समूह में दोनों बातें—भली भी और बुरी भी—दिखाई देती हैं।
श्लोक 39 (12.80.39)
संमानयेत्पूजयेच्च वाचा नित्यं च कर्मणा । कुर्याच्च प्रियमेतेभ्यो नाप्रियं किंचिदाचरेत् ॥
saṃmānayetpūjayecca vācā nityaṃ ca karmaṇā | kuryācca priyametebhyo nāpriyaṃ kiṃcidācaret
वाणी और कर्म से सदा उनका सम्मान और पूजन करे, उनका प्रिय करे और कभी कोई अप्रिय आचरण न करे।
श्लोक 40 (12.80.40)
विश्वस्तवदविश्वस्तस्तेषु वर्तेत सर्वदा । न हि दोषो गुणो वेति निरूप्यस्तेषु दृश्यते ॥
viśvastavadaviśvastasteṣu varteta sarvadā | na hi doṣo guṇo veti nirūpyasteṣu dṛśyate
उनके साथ सदा ऐसा बर्ताव करे मानो विश्वास कर रहा हो, पर विश्वास न करे; क्योंकि उनमें दोष या गुण निश्चित रूप से नहीं दिखाई देता।
श्लोक 41 (12.80.41)
अस्यैवं वर्तमानस्य पुरुषस्याप्रमादिनः । अमित्राः संप्रसीदन्ति ततो मित्रं भवन्त्यपि ॥
asyaivaṃ vartamānasya puruṣasyāpramādinaḥ | amitrāḥ saṃprasīdanti tato mitraṃ bhavantyapi
इस प्रकार सावधान रहकर व्यवहार करने वाले पुरुष पर शत्रु भी प्रसन्न हो जाते हैं और फिर मित्र भी बन जाते हैं।
श्लोक 42 (12.80.42)
य एवं वर्तते नित्यं ज्ञातिसंबन्धिमण्डले । मित्रेष्वमित्रे मध्यस्थे चिरं यशसि तिष्ठति ॥
ya evaṃ vartate nityaṃ jñātisaṃbandhimaṇḍale | mitreṣvamitre madhyasthe ciraṃ yaśasi tiṣṭhati
जो ज्ञातियों और सम्बन्धियों के मण्डल में सदा ऐसा बर्ताव करता है, वह मित्रों, शत्रुओं और तटस्थों के बीच भी चिरकाल तक यश में प्रतिष्ठित रहता है।