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शान्ति पर्व · अध्याय 81

नारद का कृष्ण को ज्ञातिजनों के विषय में उपदेश

अपने स्वभाव से वश में न आने वाले ज्ञातिजनों के बीच मित्र-शत्रु को कैसे परखा जाए, यह पूछने पर भीष्म कृष्ण और देवर्षि नारद का प्राचीन संवाद सुनाते हैं। कृष्ण कहते हैं कि वे अपने ज्ञातिजनों के दास की तरह रहते हैं, उनकी कठोर बातें सहते हैं और आहुक तथा अक्रूर के विवाद में किसी का पक्ष नहीं ले सकते। नारद इसे कृष्ण की अपनी करनी से उपजी भीतरी आपत्ति बताते हैं और कहते हैं कि लोहे के शस्त्र से नहीं, बल्कि यथाशक्ति अन्नदान, क्षमा, सरलता, कोमलता और उचित सम्मान से उनकी जीभ का काँटा निकालो और वृष्णियों के संघ को टूटने से बचाओ।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.81.1)

एवमग्राह्यके तस्मिञ्ज्ञातिसंबन्धिमण्डले । मित्रेष्वमित्रेष्वपि च कथं भावो विभाव्यते ॥

evamagrāhyake tasmiñjñātisaṃbandhimaṇḍale | mitreṣvamitreṣvapi ca kathaṃ bhāvo vibhāvyate

ज्ञातियों और सम्बन्धियों का मण्डल जब इस प्रकार वश में आने योग्य नहीं है, तब मित्रों और शत्रुओं के प्रति अपना भाव कैसे परखा जाए?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.81.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं वासुदेवस्य महर्षेर्नारदस्य च ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | saṃvādaṃ vāsudevasya maharṣernāradasya ca

इस विषय में लोग यह प्राचीन इतिहास सुनाते हैं—वासुदेव और महर्षि नारद का संवाद।

वासुदेव उवाच

श्लोक 3 (12.81.3)

नासुहृत्परमं मन्त्रं नारदार्हति वेदितुम् । अपण्डितो वाऽपि सुहृत्पण्डितो वाप्यनात्मवान् ॥

nāsuhṛtparamaṃ mantraṃ nāradārhati veditum | apaṇḍito vā'pi suhṛtpaṇḍito vāpyanātmavān

नारद! जो मित्र नहीं है, वह परम मन्त्र जानने के योग्य नहीं है; न वह मित्र योग्य है जो अपण्डित हो, और न वह जो पण्डित होकर भी आत्मसंयमी न हो।

श्लोक 4 (12.81.4)

स ते सौहृदमास्थाय किंचिद्वक्ष्यामि नारद । कृत्स्नां बुद्धिं च ते प्रेक्ष्य संपृच्छे त्रिदिवङ्गम ॥

sa te sauhṛdamāsthāya kiṃcidvakṣyāmi nārada | kṛtsnāṃ buddhiṃ ca te prekṣya saṃpṛcche tridivaṅgama

नारद! आपकी मित्रता का भरोसा करके मैं आपसे कुछ कहूँगा; आपकी पूरी बुद्धि को देखकर, हे आकाशचारी, मैं आपसे पूछता हूँ।

श्लोक 5 (12.81.5)

दास्यमैश्वर्यवादेन ज्ञातीनां वै करोम्यहम् । अर्धंभोक्ताऽस्मि भोगानां वाग्दुरुक्तानि च क्षमे ॥

dāsyamaiśvaryavādena jñātīnāṃ vai karomyaham | ardhaṃbhoktā'smi bhogānāṃ vāgduruktāni ca kṣame

ज्ञातियों के ऐश्वर्य के नाम पर मैं उनका दास-कर्म करता हूँ। मैं भोगों का आधा भागी हूँ और उनके कठोर वचन सहता हूँ।

श्लोक 6 (12.81.6)

अरणीमग्निकामो वा मथ्नाति हृदयं मम । वाचा दुरुक्तं देवर्षे तन्मां दहति नित्यदा ॥

araṇīmagnikāmo vā mathnāti hṛdayaṃ mama | vācā duruktaṃ devarṣe tanmāṃ dahati nityadā

जैसे अग्नि चाहने वाला अरणी को मथता है, वैसे ही देवर्षे! उनका कठोर वचन मेरे हृदय को मथता है और मुझे निरन्तर जलाता रहता है।

श्लोक 7 (12.81.7)

बलं सङ्कर्षणे नित्यं सौकुमार्यं पुनर्गदे । रूपेण मत्तः प्रद्युम्नः सोऽसहायोऽस्मि नारद ॥

balaṃ saṅkarṣaṇe nityaṃ saukumāryaṃ punargade | rūpeṇa mattaḥ pradyumnaḥ so'sahāyo'smi nārada

संकर्षण में सदा बल है, गद में कोमलता है, प्रद्युम्न अपने रूप से मतवाला है; और नारद! मैं असहाय हूँ।

श्लोक 8 (12.81.8)

अन्ये हि सुमहाभागा बलवन्तो दुरासदाः । नित्योत्थानेन संपन्ना नारदान्धकवृष्णयः ॥

anye hi sumahābhāgā balavanto durāsadāḥ | nityotthānena saṃpannā nāradāndhakavṛṣṇayaḥ

नारद! अन्य अन्धक और वृष्णि भी बड़े भाग्यशाली, बलवान्, दुर्धर्ष और सदा उद्योगशील हैं।

श्लोक 9 (12.81.9)

यस्य न स्युर्न वै स स्याद्यस्य स्युः कृत्स्नमेव तत् । द्वयोरेनं प्रचरतोर्वृणोम्येकरतं न च ॥

yasya na syurna vai sa syādyasya syuḥ kṛtsnameva tat | dvayorenaṃ pracaratorvṛṇomyekarataṃ na ca

जिसके पास वे न हों, वह मानो है ही नहीं; और जिसके पास वे हों, उसका सब कुछ है। इन दोनों के इस प्रकार चलते रहने पर मैं किसी एक का पक्ष नहीं चुन पाता।

श्लोक 10 (12.81.10)

स्यातां यस्याहुकाक्रूरौ किं नु दुःखतरं ततः । यस्य चापि न तौ स्यातां किं नु दुःखतरं ततः ॥

syātāṃ yasyāhukākrūrau kiṃ nu duḥkhataraṃ tataḥ | yasya cāpi na tau syātāṃ kiṃ nu duḥkhataraṃ tataḥ

जिसके पास आहुक और अक्रूर हों, उससे बढ़कर दुःखी कौन? और जिसके पास वे दोनों न हों, उससे बढ़कर दुःखी कौन?

श्लोक 11 (12.81.11)

सोऽहं कितवमातेव द्वयोरपि महामुने । नैकस्य जयमाशंसे द्वितीयस्य पराजयम् ॥

so'haṃ kitavamāteva dvayorapi mahāmune | naikasya jayamāśaṃse dvitīyasya parājayam

महामुने! इसलिए मैं दो जुआरियों की माता के समान हूँ; मैं एक की जीत और दूसरे की हार नहीं चाह सकता।

श्लोक 12 (12.81.12)

ममैवं क्लिश्यमानस्य नारदोभयदर्शनात् । वक्तुमर्हसि यच्छ्रेयो ज्ञातीनामात्मनस्तथा ॥

mamaivaṃ kliśyamānasya nāradobhayadarśanāt | vaktumarhasi yacchreyo jñātīnāmātmanastathā

नारद! दोनों ओर का दृश्य देखकर इस प्रकार कष्ट पाते हुए मुझे आप बताइए कि ज्ञातियों के लिए और मेरे लिए क्या श्रेयस्कर है।

नारद उवाच

श्लोक 13 (12.81.13)

आपदो द्विविधाः कृष्ण बाह्याश्चाभ्यन्तराश्च ह । प्रादुर्भवन्ति वार्ष्णेय स्वकृता यदि वाऽन्यतः ॥

āpado dvividhāḥ kṛṣṇa bāhyāścābhyantarāśca ha | prādurbhavanti vārṣṇeya svakṛtā yadi vā'nyataḥ

कृष्ण! आपत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं—बाहरी और भीतरी। वार्ष्णेय! वे अपने किए से भी आती हैं और दूसरे से भी।

श्लोक 14 (12.81.14)

सेयमाभ्यन्तरा तुभ्यमापत्कृच्छ्रा स्वकर्मजा । अक्रूरभोजप्रभवा सर्वे ह्येते तदन्वयाः ॥

seyamābhyantarā tubhyamāpatkṛcchrā svakarmajā | akrūrabhojaprabhavā sarve hyete tadanvayāḥ

यह आपके लिए भीतरी आपत्ति है, कठिन और अपने ही कर्मों से उत्पन्न; यह अक्रूर और भोजों से उठी है, क्योंकि ये सब उन्हीं के वंश के हैं।

श्लोक 15 (12.81.15)

अर्थहेतोर्हि कामाद्वा वीरबीभत्सयाऽपि वा । आत्मना प्राप्तमैश्वर्यमन्यत्र प्रतिपादितम् ॥

arthahetorhi kāmādvā vīrabībhatsayā'pi vā | ātmanā prāptamaiśvaryamanyatra pratipāditam

चाहे धन के लिए, चाहे कामना से, चाहे घृणा से, आपने अपने ही प्रयत्न से पाया हुआ ऐश्वर्य दूसरे को सौंप दिया।

श्लोक 16 (12.81.16)

कृतमूलमिदानीं तद्राजशब्दसहायवत् । न शक्यं पुनरादातुं वान्तमन्नमिव स्वयम् ॥

kṛtamūlamidānīṃ tadrājaśabdasahāyavat | na śakyaṃ punarādātuṃ vāntamannamiva svayam

अब वह जड़ पकड़ चुका है, उसके साथ राजा का नाम और सहायक हैं; उसे वापस नहीं लिया जा सकता, जैसे उगला हुआ अन्न।

श्लोक 17 (12.81.17)

बभ्रूग्रसेनतो राज्यं नाप्तुं शक्यं कथंचन । ज्ञातिभेदभयात्कृष्ण त्वया चापि विशेषतः ॥

babhrūgrasenato rājyaṃ nāptuṃ śakyaṃ kathaṃcana | jñātibhedabhayātkṛṣṇa tvayā cāpi viśeṣataḥ

कृष्ण! ज्ञातियों में फूट के भय से बभ्रु और उग्रसेन से राज्य किसी प्रकार नहीं लिया जा सकता, और आपके लिए तो विशेष रूप से नहीं।

श्लोक 18 (12.81.18)

तच्च सिध्येत्प्रयत्नेन कृत्वा कर्म सुदुष्करम् । महाक्षयं व्ययो वा स्याद्विनाशो वा पुनर्भवेत् ॥

tacca sidhyetprayatnena kṛtvā karma suduṣkaram | mahākṣayaṃ vyayo vā syādvināśo vā punarbhavet

यदि वह प्रयत्न से, अत्यन्त कठिन कर्म करके, सिद्ध भी हो जाए, तो भारी क्षय और व्यय होगा, अथवा फिर विनाश ही होगा।

श्लोक 19 (12.81.19)

अनायसेन शस्त्रेण मृदुना हृदयच्छिदा । जिह्वामुद्धर सर्वेषां परिमृज्यानुमृज्य च ॥

anāyasena śastreṇa mṛdunā hṛdayacchidā | jihvāmuddhara sarveṣāṃ parimṛjyānumṛjya ca

लोहे से न बने, कोमल, हृदय को छेदने वाले शस्त्र से उन सबकी जीभ खींच निकालिए, उसे सहलाते और पोंछते हुए।

वासुदेव उवाच

श्लोक 20 (12.81.20)

अनायसं मुने शस्त्रं मृदु विद्यामहं कथम् । येनैषामुद्धरे जिह्वां परिमृज्यानुमृज्य च ॥

anāyasaṃ mune śastraṃ mṛdu vidyāmahaṃ katham | yenaiṣāmuddhare jihvāṃ parimṛjyānumṛjya ca

मुने! वह लोहे का न बना, कोमल शस्त्र मैं कैसे जानूँ, जिससे मैं उनकी जीभ खींच निकालूँ, उसे सहलाते और पोंछते हुए?

नारद उवाच

श्लोक 21 (12.81.21)

शक्त्याऽन्नदानं सततं तितिक्षाऽऽर्जवमार्दवम् । यथार्हप्रतिपूजा च शस्त्रमेतदनायसम् ॥

śaktyā'nnadānaṃ satataṃ titikṣā''rjavamārdavam | yathārhapratipūjā ca śastrametadanāyasam

यथाशक्ति सदा अन्नदान, क्षमा, सरलता और कोमलता, तथा योग्यता के अनुसार सबका सत्कार—यही लोहे का न बना शस्त्र है।

श्लोक 22 (12.81.22)

ज्ञातीनां वक्तुकामानां कटुकानि लघूनि च । गिरा त्वं हृदयं वाचं शमयस्व मनांसि च ॥

jñātīnāṃ vaktukāmānāṃ kaṭukāni laghūni ca | girā tvaṃ hṛdayaṃ vācaṃ śamayasva manāṃsi ca

जब आपके ज्ञातिजन कठोर और हल्की बातें कहना चाहें, तब अपनी वाणी से उनकी वाणी, हृदय और मन को शान्त कीजिए।

श्लोक 23 (12.81.23)

नामहापुरुषः कश्चिन्नानात्मा नासहायवान् । महतीं धुरमादाय समुद्यम्योरसा वहेत् ॥

nāmahāpuruṣaḥ kaścinnānātmā nāsahāyavān | mahatīṃ dhuramādāya samudyamyorasā vahet

जो महापुरुष नहीं, जो आत्मसंयमी नहीं और जिसके सहायक नहीं, वह कोई भी भारी जूआ उठाकर उसे छाती के बल से नहीं ढो सकता।

श्लोक 24 (12.81.24)

सर्व एव गुरुं भारमनड्वान्वहते समे । दुर्गे प्रतीतः सुगवो भारं वहति दुर्वहम् ॥

sarva eva guruṃ bhāramanaḍvānvahate same | durge pratītaḥ sugavo bhāraṃ vahati durvaham

समतल भूमि पर तो हर बैल भारी बोझ ढो लेता है; पर कठिन मार्ग पर प्रसिद्ध, अच्छा बैल ही कठिन बोझ ढोता है।

श्लोक 25 (12.81.25)

भेदाद्विनाशः सङ्घानां सङ्घमुख्योऽसि केशव । यथा त्वां प्राप्य नोत्सीदेदयं सङ्घस्तथा कुरु ॥

bhedādvināśaḥ saṅghānāṃ saṅghamukhyo'si keśava | yathā tvāṃ prāpya notsīdedayaṃ saṅghastathā kuru

फूट से संघों का विनाश होता है, और केशव! आप इस संघ के प्रमुख हैं। ऐसा कीजिए कि आपको पाकर यह संघ नष्ट न हो।

श्लोक 26 (12.81.26)

नान्यत्र बुद्धिक्षान्तिभ्यां नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् । नान्यत्र धनसन्त्यागाद्गुणः प्राज्ञेऽवतिष्ठते ॥

nānyatra buddhikṣāntibhyāṃ nānyatrendriyanigrahāt | nānyatra dhanasantyāgādguṇaḥ prājñe'vatiṣṭhate

बुद्धि और धैर्य के बिना, इन्द्रिय-संयम के बिना और धन के उदार त्याग के बिना प्रज्ञावान् पुरुष में गुण नहीं टिकता।

श्लोक 27 (12.81.27)

धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वपक्षोद्भावनं सदा । ज्ञातीनामविनाशः स्याद्यथा कृष्ण तथा कुरु ॥

dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ svapakṣodbhāvanaṃ sadā | jñātīnāmavināśaḥ syādyathā kṛṣṇa tathā kuru

कृष्ण! ऐसा कीजिए कि ज्ञातियों का विनाश न हो; यही धन, यश और आयु देने वाला है और सदा अपने पक्ष को ऊँचा उठाता है।

श्लोक 28 (12.81.28)

आयत्यां च तदात्वे च न तेऽस्त्यविदितं प्रभो । षाङ्गुण्यस्य विधानेन यात्रा यानविधौ तथा ॥

āyatyāṃ ca tadātve ca na te'styaviditaṃ prabho | ṣāṅguṇyasya vidhānena yātrā yānavidhau tathā

प्रभो! भविष्य और वर्तमान में आपके लिए कुछ भी अज्ञात नहीं है; न षाड्गुण्य नीति का प्रयोग, न यात्रा और सेना-प्रयाण की विधि।

श्लोक 29 (12.81.29)

यादवाः कुकुरा भोजाः सर्वे चान्धकवृष्णयः । त्वय्यायत्ता महाबाहो लोका लोकेश्वराश्च ये ॥

yādavāḥ kukurā bhojāḥ sarve cāndhakavṛṣṇayaḥ | tvayyāyattā mahābāho lokā lokeśvarāśca ye

महाबाहो! यादव, कुकुर, भोज तथा सब अन्धक और वृष्णि, और लोक तथा लोकेश्वर भी आप पर ही आश्रित हैं।

श्लोक 30 (12.81.30)

उपासन्ते हि त्वद्बुद्धिमृषयश्चापि माधव । त्वं गुरुः सर्वभूतानां जानीषे त्वं परां गतिम् ॥

upāsante hi tvadbuddhimṛṣayaścāpi mādhava | tvaṃ guruḥ sarvabhūtānāṃ jānīṣe tvaṃ parāṃ gatim

माधव! ऋषि भी आपकी बुद्धि की उपासना करते हैं। आप सब प्राणियों के गुरु हैं और परम गति को जानते हैं।

श्लोक 31 (12.81.31)

त्वामासाद्य यदुश्रेष्ठमेधन्ते यादवाः सुखम् ॥

tvāmāsādya yaduśreṣṭhamedhante yādavāḥ sukham

यदुश्रेष्ठ! आपको पाकर यादव सुखपूर्वक बढ़ते हैं।

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