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शान्ति पर्व · अध्याय 82

कालकवृक्षीय मुनि की कोसलराज को चेतावनी

भीष्म युधिष्ठिर को बताते हैं कि राजकोश की चोरी की सूचना देनेवाले को अमात्यों से बचाना चाहिए, और कालकवृक्षीय मुनि की कथा सुनाते हैं। पिंजरे में कौआ लेकर घूमते हुए मुनि ने कोसलराज क्षेमदर्शी के कर्मचारियों का भ्रष्टाचार जानकर उसे प्रकट किया, जिस पर उन्होंने कौए को मार डाला। तब मुनि ने राजा को उसके दरबार के खतरों से सावधान किया और सलाह दी कि वह अपने दुष्ट अमात्यों को एक-एक करके दुर्बल करे और नष्ट करे; राजा ने वैसा ही किया।

अध्याय 81अध्याय-सूचीअध्याय 83

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.82.1)

एषा प्रथमतो वृत्तिर्द्वितीयां शृणु भारत । यः कश्चिद्वेदयेदर्थं राज्ञा रक्ष्यः स मानवः ॥

eṣā prathamato vṛttirdvitīyāṃ śṛṇu bhārata | yaḥ kaścidvedayedarthaṃ rājñā rakṣyaḥ sa mānavaḥ

यह पहली रीति है; हे भारत, अब दूसरी सुनो। जो कोई राजा को कोई बात बता दे, उस मनुष्य की राजा को रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 2 (12.82.2)

ह्रियमाणममात्येन भृत्यो वा यदि वा भृतः । यो राजकोशं नश्यन्तमाचक्षीत युधिष्ठिर ॥

hriyamāṇamamātyena bhṛtyo vā yadi vā bhṛtaḥ | yo rājakośaṃ naśyantamācakṣīta yudhiṣṭhira

जो कोई, चाहे सेवक हो या वेतनभोगी, किसी अमात्य द्वारा चुराए जाते और नष्ट होते राजकोश की सूचना दे, हे युधिष्ठिर,

श्लोक 3 (12.82.3)

श्रोतव्यमस्य च रहो रक्ष्यश्चामात्यतो भवेत् । अमात्या ह्यपहर्तारो भूयिष्ठं घ्नन्ति भारत ॥

śrotavyamasya ca raho rakṣyaścāmātyato bhavet | amātyā hyapahartāro bhūyiṣṭhaṃ ghnanti bhārata

उसकी बात एकान्त में सुननी चाहिए और उसे उस अमात्य से बचाना चाहिए; क्योंकि हे भारत, चोर अमात्य प्रायः सूचना देनेवाले को मार डालते हैं।

श्लोक 4 (12.82.4)

राजकोशस्य गोप्तारं राजकोशविलोपकाः । समेत्य सर्वे बाधन्ते स विनश्यत्यरक्षितः ॥

rājakośasya goptāraṃ rājakośavilopakāḥ | sametya sarve bādhante sa vinaśyatyarakṣitaḥ

राजकोश को लूटनेवाले सब मिलकर राजकोश के रक्षक को सताते हैं; रक्षा न मिलने पर वह नष्ट हो जाता है।

श्लोक 5 (12.82.5)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । मुनिः कालकवृक्षीयः कौसल्यं यदुवाच ह ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | muniḥ kālakavṛkṣīyaḥ kausalyaṃ yaduvāca ha

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं: कालकवृक्षीय मुनि ने कोसल के राजा से जो कहा था।

श्लोक 6 (12.82.6)

कोसलानामाधिपत्यं संप्राप्तं क्षेमदर्शिनम् । मुनिः कालकवृक्षीय आजगामेति नः श्रुतम् ॥

kosalānāmādhipatyaṃ saṃprāptaṃ kṣemadarśinam | muniḥ kālakavṛkṣīya ājagāmeti naḥ śrutam

हमने सुना है कि जब क्षेमदर्शी को कोसलों का आधिपत्य प्राप्त हो चुका था, तब कालकवृक्षीय मुनि उनके पास आए।

श्लोक 7 (12.82.7)

स काकं पञ्जरे बद्ध्वा विषयं क्षेमदर्शिनः । सर्वं पर्यचरद्युक्तः प्रवृत्त्यर्थी पुनः पुनः ॥

sa kākaṃ pañjare baddhvā viṣayaṃ kṣemadarśinaḥ | sarvaṃ paryacaradyuktaḥ pravṛttyarthī punaḥ punaḥ

एक कौए को पिंजरे में बन्द करके, अपना प्रयोजन सिद्ध करने की इच्छा से, वे क्षेमदर्शी के सारे राज्य में बार-बार सावधानी से घूमते रहे।

मुनिरुवाच

श्लोक 8 (12.82.8)

अधीये वायसीं विद्यां शंसन्ति मम वायसाः । अनागतमतीतं च यच्च संप्रति वर्तते ॥

adhīye vāyasīṃ vidyāṃ śaṃsanti mama vāyasāḥ | anāgatamatītaṃ ca yacca saṃprati vartate

‘मैंने कौओं की विद्या पढ़ी है; मेरे कौए मुझे भविष्य, भूत और जो अभी हो रहा है, वह सब बताते हैं।’

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (12.82.9)

इति राष्ट्रे परिपतन्बहुभिः पुरुषैः सह । सर्वेषां राजयुक्तानां दुष्कृतं परिदृष्टवान् ॥

iti rāṣṭre paripatanbahubhiḥ puruṣaiḥ saha | sarveṣāṃ rājayuktānāṃ duṣkṛtaṃ paridṛṣṭavān

इस प्रकार बहुत-से लोगों के साथ देश में घूमते हुए उन्होंने राजा के सभी अधिकारियों के दुष्कर्म देख लिए।

श्लोक 10 (12.82.10)

स बुद्ध्वा तस्य राष्ट्रस्य व्यवसायं हि सर्वशः । राजयुक्तापचारांश्च सर्वान्बुद्ध्वा ततस्ततः ॥

sa buddhvā tasya rāṣṭrasya vyavasāyaṃ hi sarvaśaḥ | rājayuktāpacārāṃśca sarvānbuddhvā tatastataḥ

उस देश की सारी स्थिति को सब ओर से समझकर और जहाँ-तहाँ राजकर्मचारियों के सब अनाचारों को जानकर,

श्लोक 11 (12.82.11)

ततः स काकमादाय राजानं द्रष्टुमागमत् । सर्वज्ञोऽस्मीति वचनं ब्रुवाणः संशितव्रतः ॥

tataḥ sa kākamādāya rājānaṃ draṣṭumāgamat | sarvajño'smīti vacanaṃ bruvāṇaḥ saṃśitavrataḥ

दृढ़ व्रतवाले वे मुनि ‘मैं सर्वज्ञ हूँ’ ऐसा कहते हुए उसी कौए को लेकर राजा से मिलने गए।

श्लोक 12 (12.82.12)

स स्म कौसल्यमागम्य राजामात्यमलंकृतम् । प्राह काकस्य वचनादमुत्रेदं त्वया कृतम् ॥

sa sma kausalyamāgamya rājāmātyamalaṃkṛtam | prāha kākasya vacanādamutredaṃ tvayā kṛtam

कोसलराज के पास पहुँचकर उन्होंने राजा के सम्मान से सजे एक अमात्य से कौए के कथन के आधार पर कहा: ‘अमुक स्थान पर तुमने यह किया है।’

मुनिरुवाच

श्लोक 13 (12.82.13)

असौ चासौ च जानीते राजकोशस्त्वया हृतः । एवमाख्याति काकोऽयं तच्छीघ्रमनुगम्यताम् ॥

asau cāsau ca jānīte rājakośastvayā hṛtaḥ | evamākhyāti kāko'yaṃ tacchīghramanugamyatām

‘अमुक और अमुक जानते हैं कि राजकोश तुमने चुराया है; यह कौआ ऐसा बताता है। अतः इसकी शीघ्र जाँच की जाए।’

भीष्म उवाच

श्लोक 14 (12.82.14)

तथाऽन्यानपि स प्राह राजकोशहरांस्तदा । न चास्य वचनं किंचिदनृतं श्रूयते क्वचित् ॥

tathā'nyānapi sa prāha rājakośaharāṃstadā | na cāsya vacanaṃ kiṃcidanṛtaṃ śrūyate kvacit

इसी तरह उन्होंने राजकोश चुरानेवाले अन्य लोगों को भी बताया; और उनकी कोई बात कभी झूठी नहीं सुनी गई।

श्लोक 15 (12.82.15)

तेन विप्रकृताः सर्वे राजयुक्ताः कुरूद्वह । तमतिक्रम्य सुप्तं तु निशि काकमपोथयन् ॥

tena viprakṛtāḥ sarve rājayuktāḥ kurūdvaha | tamatikramya suptaṃ tu niśi kākamapothayan

हे कुरुश्रेष्ठ, उनसे अपमानित हुए सब राजकर्मचारियों ने उनके सोते रहने पर उन्हें बचाकर रात में उस कौए को मार डाला।

श्लोक 16 (12.82.16)

वायसं तु विनिर्भिन्नं दृष्ट्वा वाणेन पञ्जरे । पूर्वाह्णे ब्राह्मणो वाक्यं क्षेमदर्शिनमब्रवीत् ॥

vāyasaṃ tu vinirbhinnaṃ dṛṣṭvā vāṇena pañjare | pūrvāhṇe brāhmaṇo vākyaṃ kṣemadarśinamabravīt

पिंजरे में बाण से बिंधे कौए को देखकर उस ब्राह्मण ने प्रातःकाल क्षेमदर्शी से कहा:

मुनिरुवाच

श्लोक 17 (12.82.17)

राजंस्त्वामभयं याचे प्रभुं प्राणधनेश्वरम् । अनुज्ञातस्त्वया ब्रूयां वचनं भवतो हितम् ॥

rājaṃstvāmabhayaṃ yāce prabhuṃ prāṇadhaneśvaram | anujñātastvayā brūyāṃ vacanaṃ bhavato hitam

‘हे राजन्, आप प्राण और धन के स्वामी हैं; मैं आपसे अभय माँगता हूँ। आपकी अनुमति मिले तो मैं आपके हित की बात कहूँ।’

श्लोक 18 (12.82.18)

मित्रार्थमभिसंतप्तो भक्त्या सर्वात्मनाऽऽगतः । ह्रियन्ते हि महार्थाश्च पुरुषे विक्रमत्यपि ॥

mitrārthamabhisaṃtapto bhaktyā sarvātmanā''gataḥ | hriyante hi mahārthāśca puruṣe vikramatyapi

‘मित्र के लिए संतप्त होकर, पूरे हृदय से मैं आया हूँ; क्योंकि पराक्रम करते हुए मनुष्य से भी बड़े-बड़े अर्थ छीन लिए जाते हैं।’

श्लोक 19 (12.82.19)

संबुबोधयिषुर्मित्रं सदश्वमिव सारथिः । अतिमन्युप्रसक्तो हि प्रसह्य हितकारणात् ॥

saṃbubodhayiṣurmitraṃ sadaśvamiva sārathiḥ | atimanyuprasakto hi prasahya hitakāraṇāt

‘जैसे सारथि उत्तम घोड़े को जगाता है, वैसे ही मैं अपने मित्र को जगाना चाहता हूँ; अत्यन्त आवेश में आकर मैं उसके हित के लिए बलपूर्वक यह कह रहा हूँ।’

श्लोक 20 (12.82.20)

तथाविधस्य सुहृदा क्षन्तव्यं संविजानता । ऐश्वर्यमिच्छता नित्यं पुरुषेण बुभूषता ॥

tathāvidhasya suhṛdā kṣantavyaṃ saṃvijānatā | aiśvaryamicchatā nityaṃ puruṣeṇa bubhūṣatā

‘जो समझदार हो, सदा ऐश्वर्य चाहता हो और उन्नति करना चाहता हो, उसे ऐसे मित्र को क्षमा करना चाहिए।’

भीष्म उवाच

श्लोक 21 (12.82.21)

तं राजा प्रत्युवाचेदं यत्किंचिन्मां भवान्वदेत् । कस्मादहं न क्षमेयमाकाङ्क्षन्नात्मनो हितम् ॥

taṃ rājā pratyuvācedaṃ yatkiṃcinmāṃ bhavānvadet | kasmādahaṃ na kṣameyamākāṅkṣannātmano hitam

राजा ने उनसे कहा: ‘आप मुझसे जो भी कहें, अपना हित चाहते हुए मैं उसे क्षमा क्यों न करूँ?’

राजोवाच

श्लोक 22 (12.82.22)

ब्राह्मण प्रतिजाने ते प्रब्रूहि यदिहेच्छसि । करिष्यामि हि ते वाक्यं यन्मां विप्र प्रवक्ष्यसि ॥

brāhmaṇa pratijāne te prabrūhi yadihecchasi | kariṣyāmi hi te vākyaṃ yanmāṃ vipra pravakṣyasi

‘ब्राह्मण, मैं वचन देता हूँ; यहाँ आप जो चाहें कहिए। हे विप्र, आप मुझसे जो कहेंगे, मैं आपकी वह बात अवश्य करूँगा।’

मुनिरुवाच

श्लोक 23 (12.82.23)

विद्वान्नयानपायांश्च भयाख्यातॄन्भयानि च । भक्त्या वृत्तिं समाख्यातुं भवतोऽन्तिकमागतः ॥

vidvānnayānapāyāṃśca bhayākhyātṝnbhayāni ca | bhaktyā vṛttiṃ samākhyātuṃ bhavato'ntikamāgataḥ

‘नीति और अनीति को, सेवकों से आनेवाले भयों को और भय की सूचना देनेवालों को जानते हुए, मैं भक्ति से आचरण की रीति बताने आपके पास आया हूँ।’

श्लोक 24 (12.82.24)

प्रागेवोक्तं तु दोषोऽयमाचार्यैर्नृपसेवनम् । अगतेः कुगतिर्ह्येषा या राज्ञा सहजीविका ॥

prāgevoktaṃ tu doṣo'yamācāryairnṛpasevanam | agateḥ kugatirhyeṣā yā rājñā sahajīvikā

‘आचार्यों ने बहुत पहले ही राजसेवा का यह दोष बता दिया है: राजा के साथ जीविका चलाना उसी की बुरी गति है जिसके पास और कोई गति नहीं।’

श्लोक 25 (12.82.25)

आशीविषैश्च तस्याहुः संगमं यस्य राजभिः । बहुमित्राश्च राजानो बह्वमित्रास्तथैव च ॥

āśīviṣaiśca tasyāhuḥ saṃgamaṃ yasya rājabhiḥ | bahumitrāśca rājāno bahvamitrāstathaiva ca

‘कहते हैं कि जिसका राजाओं से संग है, उसका विषैले साँपों से संग है; और राजाओं के मित्र बहुत होते हैं और शत्रु भी उतने ही।’

श्लोक 26 (12.82.26)

तेभ्यः सर्वेभ्य एवाहुर्भयं राजोपजीविनाम् । तथाऽस्य राजतो राजन्मुहुर्तादागतं भयम् ॥

tebhyaḥ sarvebhya evāhurbhayaṃ rājopajīvinām | tathā'sya rājato rājanmuhurtādāgataṃ bhayam

‘उन सबसे राजा पर निर्भर रहनेवालों को भय बताया गया है; और हे राजन्, इसी प्रकार ऐसे मनुष्य को स्वयं राजा से भी एक क्षण में भय आ सकता है।’

श्लोक 27 (12.82.27)

नैकान्तेनाप्रमादो हि शक्यः कर्तुं महीपतौ । न तु प्रमादः कर्तव्यः कथंचिद्भूतिमिच्छता ॥

naikāntenāpramādo hi śakyaḥ kartuṃ mahīpatau | na tu pramādaḥ kartavyaḥ kathaṃcidbhūtimicchatā

‘राजा के विषय में हर क्षण पूरी तरह सावधान रहना सम्भव नहीं; फिर भी कल्याण चाहनेवाले को किसी प्रकार प्रमाद नहीं करना चाहिए।’

श्लोक 28 (12.82.28)

प्रमादात्स्खलते बुद्धिः स्खलतो नास्ति जीवितम् । अग्निं दीप्तमिवासीदेद्राजानमुपशिक्षितः ॥

pramādātskhalate buddhiḥ skhalato nāsti jīvitam | agniṃ dīptamivāsīdedrājānamupaśikṣitaḥ

‘प्रमाद से बुद्धि फिसल जाती है, और फिसलनेवाले का जीवन नहीं बचता। जो सीखा हुआ हो, वह राजा के पास वैसे ही जाए जैसे जलती आग के पास,’

श्लोक 29 (12.82.29)

आशीविषमिव क्रुद्धं प्रभुं प्राणधनेश्वरम् । यत्नेनोपचरेन्नित्यं नाहमस्मीति मानवः ॥

āśīviṣamiva kruddhaṃ prabhuṃ prāṇadhaneśvaram | yatnenopacarennityaṃ nāhamasmīti mānavaḥ

‘जैसे क्रुद्ध विषैले साँप के पास। प्राण और धन के स्वामी प्रभु की मनुष्य सदा यत्न से सेवा करे, अपने को कुछ भी न मानते हुए।’

श्लोक 30 (12.82.30)

दुर्व्याहृताच्छङ्कमानो दुःस्थिताद्दुरनुष्ठितात् । दुरासदाद्दुर्वृजिनादिङ्गिताद्ध्यायितादपि ॥

durvyāhṛtācchaṅkamāno duḥsthitādduranuṣṭhitāt | durāsadāddurvṛjinādiṅgitāddhyāyitādapi

‘वह बुरे ढंग से कही गई बात से, बुरी स्थिति से, बुरे ढंग से किए कर्म से, अनुचित पहुँच से, दुराचरण से, किसी संकेत से और यहाँ तक कि किसी विचार से भी सावधान रहे,’

श्लोक 31 (12.82.31)

देवतेव हि सर्वार्थान्कुर्याद्राजा प्रसादितः । वैश्वानर इव क्रुद्धः समूलमपि निर्दहेत् ॥

devateva hi sarvārthānkuryādrājā prasāditaḥ | vaiśvānara iva kruddhaḥ samūlamapi nirdahet

‘क्योंकि प्रसन्न राजा देवता की तरह सारे प्रयोजन पूरे कर देता है, और क्रुद्ध होने पर अग्नि की तरह जड़ तक जला डालता है।’

श्लोक 32 (12.82.32)

इति राजन्यमः प्राह वर्तते च तथैव तत् । अथ भूयांसमेवार्थं करिष्यामि पुनः पुनः ॥

iti rājanyamaḥ prāha vartate ca tathaiva tat | atha bhūyāṃsamevārthaṃ kariṣyāmi punaḥ punaḥ

‘हे राजन्, यम ने ऐसा कहा था, और आज भी वही सच है। अब मैं बार-बार और भी बड़ा कार्य करूँगा।’

श्लोक 33 (12.82.33)

ददात्यस्मद्विधोऽमात्यो बुद्धिसाहाय्यमापदि । वायसस्त्वेष मे राजन्नन्तकायाभिसंहितः ॥

dadātyasmadvidho'mātyo buddhisāhāyyamāpadi | vāyasastveṣa me rājannantakāyābhisaṃhitaḥ

‘मेरे जैसा अमात्य संकट में बुद्धि की सहायता देता है। हे राजन्, यह मेरा कौआ मृत्यु के लिए ही निशाना बनाया गया था।’

श्लोक 34 (12.82.34)

न च मेऽत्र भवान्गर्ह्यो न च येषां भवान्प्रियः । हिताहितांस्तु बुद्ध्येथा मा परोक्षमतिर्भव ॥

na ca me'tra bhavāngarhyo na ca yeṣāṃ bhavānpriyaḥ | hitāhitāṃstu buddhyethā mā parokṣamatirbhava

‘इसमें न आप दोषी हैं, न वे लोग जिन्हें आप प्रिय हैं। परन्तु हितकारी और अहितकारी को पहचानिए, और आँखों से ओझल बातों पर ही अपनी बुद्धि मत टिकाइए।’

श्लोक 35 (12.82.35)

ये त्वादानपरा एव वसन्ति भवतो गृहे । अभूतिकामा भूतानां तादृशैर्मेऽभिसंहितम् ॥

ye tvādānaparā eva vasanti bhavato gṛhe | abhūtikāmā bhūtānāṃ tādṛśairme'bhisaṃhitam

‘जो लोग आपके घर में केवल लेने की ताक में रहते हैं और प्राणियों का अहित चाहते हैं, ऐसे ही लोगों ने मेरे विरुद्ध यह योजना बनाई।’

श्लोक 36 (12.82.36)

यो वा भवद्विनाशेन राज्यमिच्छत्यनन्तरम् । आन्तरैरभिसंधाय राजन्सिद्ध्यति नान्यथा ॥

yo vā bhavadvināśena rājyamicchatyanantaram | āntarairabhisaṃdhāya rājansiddhyati nānyathā

‘अथवा जो आपके विनाश के तुरन्त बाद राज्य चाहता है, वह भीतरवालों के द्वारा षड्यन्त्र रचकर ही, हे राजन्, सफल होता है, अन्यथा नहीं।’

श्लोक 37 (12.82.37)

तेषामहं भयाद्राजन्गमिष्याम्यन्यमाश्रमम् । तैर्हि मे संधितो बाणः काके निपतितः प्रभो ॥

teṣāmahaṃ bhayādrājangamiṣyāmyanyamāśramam | tairhi me saṃdhito bāṇaḥ kāke nipatitaḥ prabho

‘हे राजन्, उनके भय से मैं किसी दूसरे आश्रम में चला जाऊँगा। हे प्रभु, उन्होंने ही मुझ पर बाण साधा था; वह कौए पर आ गिरा।’

श्लोक 38 (12.82.38)

छद्मना मम काकश्च गमितो यमसादनम् । दृष्टं ह्येतन्मया राजंस्तपोदीर्घेण चक्षुषा ॥

chadmanā mama kākaśca gamito yamasādanam | dṛṣṭaṃ hyetanmayā rājaṃstapodīrgheṇa cakṣuṣā

‘छल से मेरा कौआ यमलोक पहुँचा दिया गया। हे राजन्, तपस्या की दूर तक देखनेवाली दृष्टि से मैंने यह देख लिया है।’

श्लोक 39 (12.82.39)

बहुनक्रझषग्राहां तिमिंगिलगणैर्युताम् । काकेन वालिशेनेमामतार्षमहमापगाम् ॥

bahunakrajhaṣagrāhāṃ timiṃgilagaṇairyutām | kākena vāliśenemāmatārṣamahamāpagām

‘मगरों, मछलियों और ग्राहों से भरी तथा तिमिंगिल जैसे विशाल जीवों के झुण्डों से घिरी इस नदी को मैंने उस भोले कौए के सहारे पार किया है।’

श्लोक 40 (12.82.40)

स्थाण्वश्मकण्टकवतीं सिंहव्याघ्रसमाकुलाम् । दुरासदां दुष्प्रसहां गुहां हैमवतीमिव ॥

sthāṇvaśmakaṇṭakavatīṃ siṃhavyāghrasamākulām | durāsadāṃ duṣprasahāṃ guhāṃ haimavatīmiva

‘यह ठूँठों, चट्टानों और काँटों से भरी, सिंहों और बाघों से ठसाठस, पहुँचने में कठिन और प्रवेश करने में कठिन है, हिमालय की गुफा के समान।’

श्लोक 41 (12.82.41)

अग्निना तामसं दुर्गं नौभिराप्यं च गम्यते । राजदुर्गावतरणे नोपायं पण्डिता विदुः ॥

agninā tāmasaṃ durgaṃ naubhirāpyaṃ ca gamyate | rājadurgāvataraṇe nopāyaṃ paṇḍitā viduḥ

‘अँधेरे का दुर्ग अग्नि से पार किया जाता है और जल का दुर्ग नावों से; पर राजा के दुर्ग को पार करने का कोई उपाय विद्वान नहीं जानते।’

श्लोक 42 (12.82.42)

गहनं भवतो राज्यमन्धकारं तमोन्वितम् । नेह विश्वसितुं शक्यं भवताऽपि कुतो मया ॥

gahanaṃ bhavato rājyamandhakāraṃ tamonvitam | neha viśvasituṃ śakyaṃ bhavatā'pi kuto mayā

‘आपका राज्य एक घना जंगल है, अन्धकार और तम से ढका हुआ। यहाँ विश्वास करना सम्भव नहीं: आप पर भी नहीं, फिर मुझ पर तो कैसे?’

श्लोक 43 (12.82.43)

अतो नायं शुभो वासस्तुल्ये सदसती इह । वधो ह्येवात्र सुकृते दुष्कृते न च संशयः ॥

ato nāyaṃ śubho vāsastulye sadasatī iha | vadho hyevātra sukṛte duṣkṛte na ca saṃśayaḥ

‘इसलिए यहाँ रहना शुभ नहीं; यहाँ भले और बुरे को एक-सा माना जाता है, और निःसन्देह यहाँ पुण्य करनेवाले का भी वध होता है और पाप करनेवाले का भी।’

श्लोक 44 (12.82.44)

न्यायतो दुष्कृते घातः सुकृते न कथंचन । नेह युक्तं स्थिरं स्थातुं जवेनैवाव्रजेद्बुधः ॥

nyāyato duṣkṛte ghātaḥ sukṛte na kathaṃcana | neha yuktaṃ sthiraṃ sthātuṃ javenaivāvrajedbudhaḥ

‘न्याय से दुष्कर्मी को दण्ड मिलना चाहिए, सुकर्मी का वध किसी प्रकार नहीं। यहाँ टिके रहना उचित नहीं; बुद्धिमान को तेजी से निकल जाना चाहिए।’

श्लोक 45 (12.82.45)

सीता नाम नदी राजन्प्लवो यस्यां निमज्जति । तथोपमामिमां मन्ये वागुरां सर्वघातिनीम् ॥

sītā nāma nadī rājanplavo yasyāṃ nimajjati | tathopamāmimāṃ manye vāgurāṃ sarvaghātinīm

‘हे राजन्, सीता नाम की एक नदी है जिसमें बेड़ा भी डूब जाता है। सबका वध करनेवाले इस जाल को मैं उसी के समान मानता हूँ।’

श्लोक 46 (12.82.46)

मधुप्रपातो हि भवान्भोजनं विषसंयुतम् । असतामिव ते भावो वर्तते न सतामिव ॥

madhuprapāto hi bhavānbhojanaṃ viṣasaṃyutam | asatāmiva te bhāvo vartate na satāmiva

‘आप मधु-लिपटा प्रपात हैं, विष मिला हुआ भोजन हैं; आपका स्वभाव असज्जनों जैसा है, सज्जनों जैसा नहीं।’

श्लोक 47 (12.82.47)

आशीविषैः परिवृतः कूपस्त्वमसि पार्थिव ॥

āśīviṣaiḥ parivṛtaḥ kūpastvamasi pārthiva

‘हे राजन्, आप विषैले साँपों से घिरे कुएँ के समान हैं।’

श्लोक 48 (12.82.48)

दुर्गतीर्था बृहत्कूला कावेरी चोरसंयुता । नदी मधुरपानीया यथा राजंस्तथा भवान् । श्वगृध्रगोमायुयुतो राजहंससमो ह्यसि ॥

durgatīrthā bṛhatkūlā kāverī corasaṃyutā | nadī madhurapānīyā yathā rājaṃstathā bhavān | śvagṛdhragomāyuyuto rājahaṃsasamo hyasi

‘जैसे वह नदी जिसके घाट पहुँच से कठिन हैं, किनारे ऊँचे हैं, जो चोरों से घिरी कावेरी है, फिर भी जिसका जल मीठा है; हे राजन्, आप वैसे ही हैं, और कुत्तों, गिद्धों तथा सियारों के बीच राजहंस के समान हैं।’

श्लोक 49 (12.82.49)

यथाऽऽश्रित्य महावृक्षं कक्षः संवर्धते महान् । ततस्तं संवृणोत्येव तमतीत्य च वर्धते ॥

yathā''śritya mahāvṛkṣaṃ kakṣaḥ saṃvardhate mahān | tatastaṃ saṃvṛṇotyeva tamatītya ca vardhate

‘जैसे बड़े वृक्ष का सहारा लेकर झाड़ी बढ़ती है, फिर उसी को लपेट लेती है और उसके भी ऊपर बढ़ जाती है,’

श्लोक 50 (12.82.50)

तेनैवोग्रेन्धनेनैनं दावो दहति दारुणः । तथोपमा ह्यमात्यास्ते राजंस्तान्परिशोधय ॥

tenaivogrendhanenainaṃ dāvo dahati dāruṇaḥ | tathopamā hyamātyāste rājaṃstānpariśodhaya

‘वैसे ही उसी उग्र ईंधन से भयंकर दावाग्नि उस वृक्ष को भी जला देती है। हे राजन्, आपके अमात्य वैसे ही हैं; उनका शोधन कीजिए।’

श्लोक 51 (12.82.51)

त्वया चैव कृता राजन्भवता परिपालिताः । भवन्तं पर्यवज्ञाय जिघांसन्ति भवत्प्रियम् ॥

tvayā caiva kṛtā rājanbhavatā paripālitāḥ | bhavantaṃ paryavajñāya jighāṃsanti bhavatpriyam

‘हे राजन्, उन्हें आपने ही बनाया और आपने ही पाला है; फिर भी आपका अपमान करके वे अपने हितैषी आपको मारना चाहते हैं।’

श्लोक 52 (12.82.52)

उषितं शङ्कमानेन प्रमादं परिरक्षता । अन्तः सर्प इवागारे वीरपत्न्या इवालये । शीलं जिज्ञासमानेन राज्ञः साहसजीविनः ॥

uṣitaṃ śaṅkamānena pramādaṃ parirakṣatā | antaḥ sarpa ivāgāre vīrapatnyā ivālaye | śīlaṃ jijñāsamānena rājñaḥ sāhasajīvinaḥ

‘मैं शंकित रहकर और प्रमाद से बचते हुए यहाँ रहा हूँ, घर के भीतर साँप की तरह, वीर की पत्नी के घर में उसकी तरह, साहस के बल पर जीनेवाले राजा का स्वभाव जानने की इच्छा से।’

श्लोक 53 (12.82.53)

कच्चिज्जितेन्द्रियो राजा कच्चिदस्यान्तरा जिताः । कच्चिदेषां प्रियो राजा कच्चिद्राज्ञः प्रियाः प्रजाः ॥

kaccijjitendriyo rājā kaccidasyāntarā jitāḥ | kaccideṣāṃ priyo rājā kaccidrājñaḥ priyāḥ prajāḥ

‘क्या राजा जितेन्द्रिय है? क्या उसके अन्तरंग जन वश में हैं? क्या वे राजा को प्रिय मानते हैं? क्या प्रजा राजा को प्रिय है?’

श्लोक 54 (12.82.54)

विजिज्ञासुरिह प्राप्तस्तवाहं राजसत्तम । तस्य मे रोचते राजन्क्षुधितस्येव भोजनम् ॥

vijijñāsuriha prāptastavāhaṃ rājasattama | tasya me rocate rājankṣudhitasyeva bhojanam

‘हे राजश्रेष्ठ, यही जानने की इच्छा से मैं यहाँ आया हूँ; और हे राजन्, आप मुझे वैसे ही भाते हैं जैसे भूखे को भोजन।’

श्लोक 55 (12.82.55)

अमात्या मे न रोचन्ते वितृष्णस्य यथोदकम् । भवतोऽर्थकृदित्येवं मयि ते दोषमादधन् । विद्यते कारणं नान्यदिति मे नात्र संशयः ॥

amātyā me na rocante vitṛṣṇasya yathodakam | bhavato'rthakṛdityevaṃ mayi te doṣamādadhan | vidyate kāraṇaṃ nānyaditi me nātra saṃśayaḥ

‘आपके अमात्य मुझे नहीं भाते, जैसे प्यासरहित को जल नहीं भाता। “यह आपका हितकारी है”, इसी कारण उन्होंने मुझ पर दोष लगाया। इसका और कोई कारण नहीं है, इसमें मुझे संदेह नहीं।’

श्लोक 56 (12.82.56)

न हि तेषामहं द्रोग्धा तत्तेषां द्रोहवद्गतम् । अरेर्हि दुर्हृदाद्भेयं भग्नपृष्ठादिवोरगात् ॥

na hi teṣāmahaṃ drogdhā tatteṣāṃ drohavadgatam | arerhi durhṛdādbheyaṃ bhagnapṛṣṭhādivoragāt

‘मैंने उनका कोई अपकार नहीं किया; उनका जो द्वेष है, वह उनका अपना दोष है। दुष्ट शत्रु से डरना चाहिए, जैसे टूटी पीठवाले साँप से।’

राजोवाच

श्लोक 57 (12.82.57)

भूयसा परिहारेण सत्कारेण च भूयसा । पूजितो ब्राह्मणश्रेष्ठ भूयो वस गृहे मम ॥

bhūyasā parihāreṇa satkāreṇa ca bhūyasā | pūjito brāhmaṇaśreṣṭha bhūyo vasa gṛhe mama

‘हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, बहुत कृपा-चिह्नों और बहुत सत्कार से पूजित होकर आप फिर मेरे घर में रहिए।’

श्लोक 58 (12.82.58)

ये त्वां ब्राह्मण नेच्छन्ति ते न वत्स्यन्ति मे गृहे । भवतैव हि तज्ज्ञेयं यत्तदेषामनन्तरम् ॥

ye tvāṃ brāhmaṇa necchanti te na vatsyanti me gṛhe | bhavataiva hi tajjñeyaṃ yattadeṣāmanantaram

‘हे ब्राह्मण, जो आपको नहीं चाहते, वे मेरे घर में नहीं रहेंगे; उनके विषय में आगे क्या करना है, यह आप ही निश्चित करें।’

श्लोक 59 (12.82.59)

यथा स्यात्सुधृतो दण्डो यथा च सुकृतं कृतम् । तथा समीक्ष्य भगवञ्श्रेयसे विनियुङ्क्ष्व माम् ॥

yathā syātsudhṛto daṇḍo yathā ca sukṛtaṃ kṛtam | tathā samīkṣya bhagavañśreyase viniyuṅkṣva mām

‘दुष्ट को भली-भाँति दण्ड मिले और सुकर्म का फल मिले, हे भगवन्, ऐसा विचारकर मुझे कल्याण के कार्य में लगाइए।’

मुनिरुवाच

श्लोक 60 (12.82.60)

अदर्शयन्निमं दोषमेकैकं दुर्बलं कुरु । ततः कारणमाज्ञाय पुरुषंपुरुषं जहि । एकदोषा हि बहवो मृद्नीयुरपि कण्टकान् ॥

adarśayannimaṃ doṣamekaikaṃ durbalaṃ kuru | tataḥ kāraṇamājñāya puruṣaṃpuruṣaṃ jahi | ekadoṣā hi bahavo mṛdnīyurapi kaṇṭakān

‘उन्हें यह संदेह दिखाए बिना एक-एक को दुर्बल कीजिए; फिर कारण जानकर एक-एक पुरुष को मारिए। क्योंकि एक ही दोषवाले बहुत लोग काँटों तक को कुचल सकते हैं।’

श्लोक 61 (12.82.61)

अर्थे सर्वं जगद्बद्धमर्थेनैव निबध्यते । अर्थे दर्पो मनुष्याणां तस्मादर्थं विरोचय ॥

arthe sarvaṃ jagadbaddhamarthenaiva nibadhyate | arthe darpo manuṣyāṇāṃ tasmādarthaṃ virocaya

‘सारा जगत धन में बँधा है और धन से ही बाँधा जाता है; मनुष्यों का अभिमान धन पर टिका है। इसलिए धन को आगे रखिए।’

श्लोक 62 (12.82.62)

एकेनैकस्य दोषेण तद्विरुद्धं प्रचोदय । स तस्य दोषानुद्भाव्य तस्यार्थं ग्राहयिष्यति ॥

ekenaikasya doṣeṇa tadviruddhaṃ pracodaya | sa tasya doṣānudbhāvya tasyārthaṃ grāhayiṣyati

‘एक के दोष के सहारे उसके विरोधी को उसके विरुद्ध उभारिए; वह उसके दोष प्रकट करके उसका धन दिलवा देगा।’

श्लोक 63 (12.82.63)

सामपूर्वं च केषांचिद्भेदेन च परस्परम् । वैरं कारय भूपाल पश्चाद्दण्डं प्रचोदय ॥

sāmapūrvaṃ ca keṣāṃcidbhedena ca parasparam | vairaṃ kāraya bhūpāla paścāddaṇḍaṃ pracodaya

‘कुछ को साम से और कुछ को आपस में भेद डालकर, हे भूपाल, उनमें वैर कराइए और बाद में दण्ड दीजिए।’

श्लोक 64 (12.82.64)

बिल्वेन च यथा बिल्वमाकारं छाद्य बुद्धिमान् । अशुद्धं सचिवं राजन्नशुद्धेनैव नाशय ॥

bilvena ca yathā bilvamākāraṃ chādya buddhimān | aśuddhaṃ sacivaṃ rājannaśuddhenaiva nāśaya

‘जैसे चतुर मनुष्य अपना आशय छिपाकर एक बेल के फल को दूसरे बेल के फल से फोड़ता है, वैसे ही हे राजन्, दुष्ट मन्त्री को दुष्ट के ही द्वारा नष्ट कीजिए।’

श्लोक 65 (12.82.65)

मन्त्रभेदभयाद्राजंस्तस्मादेतद्ब्रवीमि ते ॥

mantrabhedabhayādrājaṃstasmādetadbravīmi te

‘हे राजन्, गुप्त परामर्श के फूट जाने के भय से ही मैं आपसे यह कहता हूँ।’

श्लोक 66 (12.82.66)

वयं तु ब्राह्मणा नाम मृदुदण्डाः कृपालवः । स्वस्ति चेच्छाम भवतः परेषां च यथाऽऽत्मनः ॥

vayaṃ tu brāhmaṇā nāma mṛdudaṇḍāḥ kṛpālavaḥ | svasti cecchāma bhavataḥ pareṣāṃ ca yathā''tmanaḥ

‘हम ब्राह्मण कोमल दण्ड देनेवाले और दयालु माने जाते हैं; मैं आपका और दूसरों का कल्याण वैसे ही चाहता हूँ जैसे अपना।’

श्लोक 67 (12.82.67)

राजन्नात्मानमाचक्षे संबन्धी भवतो ह्यहम् । मुनिः कालकवृक्षीय इत्येवमभिसंज्ञितः । पितुः सखा च भवतः संमतः सत्यसंगरः ॥

rājannātmānamācakṣe saṃbandhī bhavato hyaham | muniḥ kālakavṛkṣīya ityevamabhisaṃjñitaḥ | pituḥ sakhā ca bhavataḥ saṃmataḥ satyasaṃgaraḥ

‘हे राजन्, मैं अपना परिचय देता हूँ: मैं आपका सम्बन्धी हूँ, कालकवृक्षीय मुनि नाम से जाना जाता हूँ, आपके पिता का मित्र, उनका माना हुआ और सत्य पर अडिग।’

श्लोक 68 (12.82.68)

व्यापन्ने भवतो राज्ये राजन्पितरि संस्थिते । सर्वकामान्परित्यज्य तपस्तप्तं तदा मया ॥

vyāpanne bhavato rājye rājanpitari saṃsthite | sarvakāmānparityajya tapastaptaṃ tadā mayā

‘हे राजन्, जब आपका राज्य विपत्ति में पड़ा और आपके पिता परलोक सिधार गए, तब मैंने सारी कामनाएँ छोड़कर तप किया।’

श्लोक 69 (12.82.69)

स्नेहात्त्वां तु ब्रवीम्येतन्मा भूयो विभ्रमेदिति ॥

snehāttvāṃ tu bravīmyetanmā bhūyo vibhramediti

‘स्नेह के कारण मैं आपसे यह कहता हूँ, ताकि आप फिर भटक न जाएँ।’

श्लोक 70 (12.82.70)

उभे दृष्ट्वा दुःखसुखे राज्यं प्राप्य यदृच्छया । राज्येनामात्यसंस्थेन कथं राजन्प्रमाद्यसि ॥

ubhe dṛṣṭvā duḥkhasukhe rājyaṃ prāpya yadṛcchayā | rājyenāmātyasaṃsthena kathaṃ rājanpramādyasi

‘सुख और दुःख दोनों देखकर, संयोग से राज्य पाकर, हे राजन्, अमात्यों पर टिके राज्य के साथ आप प्रमाद कैसे करते हैं?’

भीष्म उवाच

श्लोक 71 (12.82.71)

ततो राजकुले नान्दी संजज्ञे भूयसा पुनः । पुरोहितकुले चैव संप्राप्ते ब्राह्मणर्षभे ॥

tato rājakule nāndī saṃjajñe bhūyasā punaḥ | purohitakule caiva saṃprāpte brāhmaṇarṣabhe

तब उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के आ जाने पर राजकुल में और पुरोहित के कुल में फिर बड़ा हर्षोल्लास हुआ।

श्लोक 72 (12.82.72)

एकच्छत्रां महीं कृत्वा कौसल्याय यशस्विने । मुनिः कालकवृक्षीय ईजे क्रतुभिरुत्तमैः ॥

ekacchatrāṃ mahīṃ kṛtvā kausalyāya yaśasvine | muniḥ kālakavṛkṣīya īje kratubhiruttamaiḥ

यशस्वी कोसलराज के लिए पृथ्वी को एकछत्र बनाकर कालकवृक्षीय मुनि ने उत्तम यज्ञ किए।

श्लोक 73 (12.82.73)

हितं तद्वचनं श्रुत्वा कौसल्योऽप्यजयन्महीम् । तथा च कृतवान्राजा यथोक्तं तेन भारत ॥

hitaṃ tadvacanaṃ śrutvā kausalyo'pyajayanmahīm | tathā ca kṛtavānrājā yathoktaṃ tena bhārata

उन हितकर वचनों को सुनकर कोसलराज ने भी पृथ्वी जीत ली; और हे भारत, राजा ने ठीक वैसा ही किया जैसा उस मुनि ने कहा था।

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