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शान्ति पर्व · अध्याय 83

सभासदों, सहायकों और मन्त्रियों के लक्षण

युधिष्ठिर पूछते हैं कि सभासद, सहायक, मित्र, परिजन और अमात्य कैसे लोग होने चाहिए। भीष्म उन सबके गुण बताते हैं, मन्त्रियों की परीक्षा की रीति समझाते हैं, बताते हैं कि राजा की मन्त्रणा सुनने के योग्य कौन है और कौन नहीं, और यह भी कि मन्त्रणा कैसे और कहाँ गुप्त रूप से की जाए।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.83.1)

सभासदः सहायाश्च सुहृदश्च विशांपते । परिच्छदास्तथाऽमात्याः कीदृशाः स्युः पितामह ॥

sabhāsadaḥ sahāyāśca suhṛdaśca viśāṃpate | paricchadāstathā'mātyāḥ kīdṛśāḥ syuḥ pitāmaha

हे प्रजापति पितामह, सभासद, सहायक, मित्र, परिजन और अमात्य कैसे लोग होने चाहिए?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.83.2)

ह्रीनिषेवास्तथा दान्ताः सत्यार्जवसमन्विताः । शक्ताः कथयितुं सम्यक्ते तव स्युः सभासदः ॥

hrīniṣevāstathā dāntāḥ satyārjavasamanvitāḥ | śaktāḥ kathayituṃ samyakte tava syuḥ sabhāsadaḥ

जो लज्जाशील और संयमी हों, सत्य और सरलता से युक्त हों, तथा भली-भाँति बोलने में समर्थ हों, वे तुम्हारे सभासद होने चाहिए।

श्लोक 3 (12.83.3)

अमात्याश्चातिशूराश्च ब्रह्मण्याश्च बहुश्रुताः । सुसंतृष्टाश्च कौन्तेय महोत्साहाश्च कर्मसु ॥

amātyāścātiśūrāśca brahmaṇyāśca bahuśrutāḥ | susaṃtṛṣṭāśca kaunteya mahotsāhāśca karmasu

हे कुन्तीपुत्र, तुम्हारे अमात्य अत्यन्त शूर, ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धालु, बहुश्रुत, भली-भाँति सन्तुष्ट और कार्यों में महान उत्साहवाले हों।

श्लोक 4 (12.83.4)

एतान्सहायाँल्लिप्सेथाः सर्वास्वापत्सु भारत ॥

etānsahāyām̐llipsethāḥ sarvāsvāpatsu bhārata

हे भारत, तुम्हें सब आपत्तियों में ऐसे ही सहायकों को पाने की इच्छा करनी चाहिए।

श्लोक 5 (12.83.5)

कुलीनः पूजितो नित्यं न हि शक्तिं निगूहति । प्रसन्नमप्रसन्नं वा पीडितं हतमेव वा । आवर्तयति भूयिष्ठं तदेव ह्यनुपालितम् ॥

kulīnaḥ pūjito nityaṃ na hi śaktiṃ nigūhati | prasannamaprasannaṃ vā pīḍitaṃ hatameva vā | āvartayati bhūyiṣṭhaṃ tadeva hyanupālitam

कुलीन मनुष्य, जिसका सदा सम्मान होता रहा हो, अपनी शक्ति नहीं छिपाता। चाहे उसके साथ कृपा का व्यवहार हुआ हो या अकृपा का, चाहे वह पीड़ित हुआ हो या लुट गया हो, वह प्रायः उसी की ओर लौट आता है जो उसके भीतर पाला गया है।

श्लोक 6 (12.83.6)

कुलीना देशजाः प्राज्ञा रूपवन्तो बहुश्रुताः । प्रगल्भाश्चानुरक्ताश्च ते तव स्युः परिच्छदाः ॥

kulīnā deśajāḥ prājñā rūpavanto bahuśrutāḥ | pragalbhāścānuraktāśca te tava syuḥ paricchadāḥ

कुलीन, देश में जन्मे, बुद्धिमान, रूपवान, बहुश्रुत, निर्भीक और अनुरक्त लोग तुम्हारे परिजन होने चाहिए।

श्लोक 7 (12.83.7)

दौष्कुलेयाश्च लुब्धाश्च नृशंसा निरपत्रपाः । ते त्वां तात निषेवेयुर्यावदार्द्रकपाणयः ॥

dauṣkuleyāśca lubdhāśca nṛśaṃsā nirapatrapāḥ | te tvāṃ tāta niṣeveyuryāvadārdrakapāṇayaḥ

बुरे कुल के, लोभी, क्रूर और निर्लज्ज लोग, हे तात, तुम्हारी सेवा तभी तक करेंगे जब तक उनके हाथ गीले हैं।

श्लोक 8 (12.83.8)

कुलीनाञ्शीलसंपन्नानिङ्गितज्ञानानिष्ठुरान् । देशकालविधानज्ञान्भर्तृकार्यहितैषिणः । नित्यमर्थेषु सर्वेषु राजा कुर्वीत मन्त्रिणः ॥

kulīnāñśīlasaṃpannāniṅgitajñānāniṣṭhurān | deśakālavidhānajñānbhartṛkāryahitaiṣiṇaḥ | nityamartheṣu sarveṣu rājā kurvīta mantriṇaḥ

जो कुलीन हों, शीलवान हों, संकेत समझनेवाले और कठोर न हों, देश, काल और विधि को जानते हों और अपने स्वामी के कार्य का हित चाहते हों, ऐसे लोगों को राजा सब कार्यों में सदा मन्त्री बनाए।

श्लोक 9 (12.83.9)

अर्थमानार्घसत्कारैर्भोगैरुच्चावचैः प्रियैः । यानर्थभाजो मन्येथास्तेते स्युः सुखभागिनः ॥

arthamānārghasatkārairbhogairuccāvacaiḥ priyaiḥ | yānarthabhājo manyethāstete syuḥ sukhabhāginaḥ

धन, मान, बहुमूल्य उपहार, सत्कार और नाना प्रकार के भोगों से उन प्रिय लोगों को सम्मानित करो जिन्हें तुम अपने धन का भागी होने योग्य समझो; वे तुम्हारे सुख के भागी हों।

श्लोक 10 (12.83.10)

अभिन्नवृत्ता विद्वांसः सद्वृत्ताश्चरितव्रताः । न त्वां नित्यार्थिनो जह्युरक्षुद्राः सत्यवादिनः ॥

abhinnavṛttā vidvāṃsaḥ sadvṛttāścaritavratāḥ | na tvāṃ nityārthino jahyurakṣudrāḥ satyavādinaḥ

जिनका आचरण अखण्ड हो, जो विद्वान, सदाचारी और दृढ़ व्रतवाले हों, क्षुद्र न हों और सत्य बोलनेवाले हों, वे सदा अभावग्रस्त रहकर भी तुम्हें नहीं छोड़ेंगे।

श्लोक 11 (12.83.11)

अनार्या ये न जानन्ति समयं मन्दचेतसः । तेभ्यः परिजुगुप्सेथा ये चापि समयच्युताः ॥

anāryā ye na jānanti samayaṃ mandacetasaḥ | tebhyaḥ parijugupsethā ye cāpi samayacyutāḥ

जो अनार्य और मन्दबुद्धि मर्यादा को नहीं जानते, उनसे और उनसे भी जो मर्यादा से च्युत हो गए हैं, अपनी रक्षा करो।

श्लोक 12 (12.83.12)

नैकमिच्छेद्गणं हित्वा स्याच्चेदन्यतरग्रहः । यस्त्वेको बहुभिः श्रेयान्कामं तेन गणं त्यजेत् ॥

naikamicchedgaṇaṃ hitvā syāccedanyataragrahaḥ | yastveko bahubhiḥ śreyānkāmaṃ tena gaṇaṃ tyajet

यदि किसी एक पक्ष को ही लेना पड़े, तो भी गण को छोड़कर किसी एक को नहीं चुनना चाहिए; परन्तु जो अकेला बहुतों से श्रेष्ठ हो, उसके लिए भले ही गण को छोड़ दे।

श्लोक 13 (12.83.13)

श्रेयसो लक्षणं चैतद्विक्रमो यस्य दृश्यते । कीर्तिप्रधानो यश्च स्यात्समये यश्च तिष्ठति ॥

śreyaso lakṣaṇaṃ caitadvikramo yasya dṛśyate | kīrtipradhāno yaśca syātsamaye yaśca tiṣṭhati

श्रेष्ठ पुरुष का लक्षण यही है कि जिसमें पराक्रम दिखाई दे, जो कीर्ति को प्रधान माने और मर्यादा में स्थित रहे,

श्लोक 14 (12.83.14)

समर्थान्पूजयेद्यश्च नास्पर्ध्यैः स्पर्धते च यः । न च कामाद्भयात्क्रोधाल्लोभाद्वा धर्ममुत्सृजेत् ॥

samarthānpūjayedyaśca nāspardhyaiḥ spardhate ca yaḥ | na ca kāmādbhayātkrodhāllobhādvā dharmamutsṛjet

जो समर्थों का आदर करे, जिनसे होड़ नहीं करनी चाहिए उनसे होड़ न करे, और काम, भय, क्रोध या लोभ के कारण धर्म को न छोड़े।

श्लोक 15 (12.83.15)

अमानी सत्यवाक्शक्तो जितात्मा मानसंयुतः । स ते मन्त्रसहायः स्यात्सर्वावस्थापरीक्षितः ॥

amānī satyavākśakto jitātmā mānasaṃyutaḥ | sa te mantrasahāyaḥ syātsarvāvasthāparīkṣitaḥ

जो अभिमानरहित, सत्यवादी, समर्थ, जितेन्द्रिय और मानयुक्त हो, तथा सब अवस्थाओं में परखा जा चुका हो, वह तुम्हारा मन्त्रणा-सहायक हो।

श्लोक 16 (12.83.16)

कुलीनः कुलसंपन्नस्तितिक्षुर्दक्ष आत्मवान् । शूरः कृतज्ञः सत्यश्च श्रेयसः पार्थ लक्षणम् ॥

kulīnaḥ kulasaṃpannastitikṣurdakṣa ātmavān | śūraḥ kṛtajñaḥ satyaśca śreyasaḥ pārtha lakṣaṇam

कुलीन, उत्तम कुलवाला, सहनशील, दक्ष, आत्मवान्, शूर, कृतज्ञ और सत्यवादी, हे पार्थ, ये श्रेष्ठ पुरुष के लक्षण हैं।

श्लोक 17 (12.83.17)

तस्यैवं वर्तमानस्य पुरुषस्य विजानतः । अमित्राः संप्रसीदन्ति तथा मित्रीभवन्त्यपि ॥

tasyaivaṃ vartamānasya puruṣasya vijānataḥ | amitrāḥ saṃprasīdanti tathā mitrībhavantyapi

जब कोई समझदार पुरुष इस प्रकार आचरण करता है, तब उसके शत्रु भी प्रसन्न हो जाते हैं और फिर उसके मित्र बन जाते हैं।

श्लोक 18 (12.83.18)

अत ऊर्ध्वममात्यानां परीक्षेत गुणागुणम् । संयतात्मा कृतप्रज्ञो भूतिकामश्च भूमिपः ॥

ata ūrdhvamamātyānāṃ parīkṣeta guṇāguṇam | saṃyatātmā kṛtaprajño bhūtikāmaśca bhūmipaḥ

इसके बाद संयतात्मा, प्रज्ञावान् और कल्याण चाहनेवाला राजा अपने अमात्यों के गुण और दोषों की परीक्षा करे।

श्लोक 19 (12.83.19)

संबन्धिपुरुषैराप्तैरभिजातैः स्वदेशजैः । अहार्यैरव्यभीचारैः सर्वशः सुपरीक्षितैः ॥

saṃbandhipuruṣairāptairabhijātaiḥ svadeśajaiḥ | ahāryairavyabhīcāraiḥ sarvaśaḥ suparīkṣitaiḥ

वे ऐसे विश्वस्त, कुलीन, अपने देश में जन्मे, अलोभनीय, निष्ठावान् और सब प्रकार से भली-भाँति परखे हुए सम्बन्धी पुरुषों के द्वारा उससे जुड़े हों।

श्लोक 20 (12.83.20)

यौनाः श्रौतास्तथा मौलास्तथैवाप्यनहंकृताः । कर्तव्या भूतिकामेन पुरुषेण बुभूषता ॥

yaunāḥ śrautāstathā maulāstathaivāpyanahaṃkṛtāḥ | kartavyā bhūtikāmena puruṣeṇa bubhūṣatā

कल्याण चाहनेवाले और उन्नति की इच्छा रखनेवाले पुरुष को उत्तम कुल के, शास्त्रज्ञ, पीढ़ियों से सेवा करनेवाले और अहंकाररहित लोगों को अमात्य बनाना चाहिए।

श्लोक 21 (12.83.21)

एषां वैनयिकी बुद्धिः प्रकृतिश्चैव शोभना । तेजो धैर्यं क्षमा शौचमनुरागः स्थितिर्धृतिः ॥

eṣāṃ vainayikī buddhiḥ prakṛtiścaiva śobhanā | tejo dhairyaṃ kṣamā śaucamanurāgaḥ sthitirdhṛtiḥ

उनमें विनयशील बुद्धि और उत्तम स्वभाव हो, तथा तेज, धैर्य, क्षमा, शुचिता, अनुराग, स्थिरता और धृति हो।

श्लोक 22 (12.83.22)

परीक्ष्य च गुणान्नित्यं प्रौढभावान्धुरंधरान् । पञ्चोपधाव्यतीतांश्च कुर्याद्राजाऽर्थकारिणः ॥

parīkṣya ca guṇānnityaṃ prauḍhabhāvāndhuraṃdharān | pañcopadhāvyatītāṃśca kuryādrājā'rthakāriṇaḥ

उनके गुणों को परखकर राजा उन्हें अपने कार्यकर्ता बनाए जो सदा परिपक्व स्वभाव के हों, भार उठाने में समर्थ हों और पाँच परीक्षाओं में खरे उतरे हों।

श्लोक 23 (12.83.23)

पर्याप्तवचनान्वीरान्प्रतिपत्तिविशारदान् । कुलीनान्सत्त्वसंपन्नानिङ्गितज्ञानानिष्ठुरान् ॥

paryāptavacanānvīrānpratipattiviśāradān | kulīnānsattvasaṃpannāniṅgitajñānāniṣṭhurān

जो बोलने में प्रभावशाली, वीर, कर्तव्य निश्चय करने में कुशल, कुलीन, सत्त्वसम्पन्न, संकेत समझनेवाले और कठोर न हों,

श्लोक 24 (12.83.24)

देशकालविधानज्ञान्भर्तृकार्यहितैषिणः । नित्यमर्थेषु सर्वेषु राजन्कुर्वीत मन्त्रिणः ॥

deśakālavidhānajñānbhartṛkāryahitaiṣiṇaḥ | nityamartheṣu sarveṣu rājankurvīta mantriṇaḥ

देश, काल और विधि को जानते हों और स्वामी के कार्य का हित चाहते हों, ऐसे लोगों को राजा सब कार्यों में सदा मन्त्री बनाए।

श्लोक 25 (12.83.25)

हीनतेजोभिसंसृष्टो नैव जातु व्यवस्यति । अवश्यं जनयत्येव सर्वकर्मसु संशयम् ॥

hīnatejobhisaṃsṛṣṭo naiva jātu vyavasyati | avaśyaṃ janayatyeva sarvakarmasu saṃśayam

जो तेजहीन के साथ जुड़ा हो, वह कभी निश्चय नहीं कर पाता, और सब कार्यों में अवश्य ही संशय उत्पन्न करता है।

श्लोक 26 (12.83.26)

एवमल्पश्रुतो मन्त्री कल्याणाभिजनोऽप्युत । धर्मार्थकामसंयुक्तो नालं मन्त्रं परीक्षितुम् ॥

evamalpaśruto mantrī kalyāṇābhijano'pyuta | dharmārthakāmasaṃyukto nālaṃ mantraṃ parīkṣitum

इसी प्रकार थोड़ा सुननेवाला मन्त्री, चाहे वह उत्तम कुल का और धर्म, अर्थ तथा काम से युक्त हो, मन्त्रणा की परीक्षा करने में समर्थ नहीं होता।

श्लोक 27 (12.83.27)

तथैवानभिजातोऽपि काममस्तु बहुश्रुतः । अनायक इवाचक्षुर्मुह्यत्यूह्येषु कर्मसु ॥

tathaivānabhijāto'pi kāmamastu bahuśrutaḥ | anāyaka ivācakṣurmuhyatyūhyeṣu karmasu

इसी प्रकार जो उत्तम कुल का न हो, चाहे वह बहुश्रुत भी हो, वह विचारणीय कार्यों में बिना नायक के अन्धे की तरह भटक जाता है।

श्लोक 28 (12.83.28)

यो वाऽप्यस्थिरसंकल्पो बुद्धिमानागतागमः । उपायज्ञोऽपि नालं स कर्म प्रापयितुं चिरम् ॥

yo vā'pyasthirasaṃkalpo buddhimānāgatāgamaḥ | upāyajño'pi nālaṃ sa karma prāpayituṃ ciram

और जो अस्थिर संकल्पवाला हो, वह बुद्धिमान, अनुभवी और उपाय जाननेवाला होकर भी किसी कार्य को देर तक निभा नहीं सकता।

श्लोक 29 (12.83.29)

केवलात्पुनरादानात्कर्मणो नोपपद्यते । परामर्शो विशेषाणामश्रुतस्येह दुर्मतेः ॥

kevalātpunarādānātkarmaṇo nopapadyate | parāmarśo viśeṣāṇāmaśrutasyeha durmateḥ

केवल कार्य उठा लेने से अशिक्षित और दुर्बुद्धि मनुष्य में उसकी विशेष बातों का ठीक विचार उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 30 (12.83.30)

मन्त्रिण्यननुरक्ते तु विश्वासो नोपपद्यते । तस्मादननुरक्ताय नैव मन्त्रं प्रकाशयेत् ॥

mantriṇyananurakte tu viśvāso nopapadyate | tasmādananuraktāya naiva mantraṃ prakāśayet

जो मन्त्री अनुरक्त नहीं है, उस पर विश्वास नहीं बनता; इसलिए जो अनुरक्त न हो, उसे कभी मन्त्रणा प्रकट नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 31 (12.83.31)

व्यथयेद्धि स राजानं मन्त्रिभिः सहितोऽनृजुः । मारुतोपहितच्छिद्रैः प्रविश्याग्निरिव द्रुमम् ॥

vyathayeddhi sa rājānaṃ mantribhiḥ sahito'nṛjuḥ | mārutopahitacchidraiḥ praviśyāgniriva drumam

क्योंकि मन्त्रियों के साथ बैठा कुटिल मनुष्य राजा को वैसे ही पीड़ा देता है, जैसे हवा से बनी दरारों से घुसकर आग वृक्ष को।

श्लोक 32 (12.83.32)

संक्रुद्धश्चैकदा स्वामी स्थानाच्चैवापकर्षति । वाचा क्षिपति संरब्धः पुनः पश्चात्प्रसीदति ॥

saṃkruddhaścaikadā svāmī sthānāccaivāpakarṣati | vācā kṣipati saṃrabdhaḥ punaḥ paścātprasīdati

स्वामी कभी क्रोध में आकर किसी को उसके पद से हटा देता है और आवेश में वाणी से चोट करता है; फिर बाद में प्रसन्न हो जाता है।

श्लोक 33 (12.83.33)

तानितान्यनुरक्तेन शक्यानि हि तितिक्षितुम् । मन्त्रिणां च भवेत्क्रोधो विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥

tānitānyanuraktena śakyāni hi titikṣitum | mantriṇāṃ ca bhavetkrodho visphūrjitamivāśaneḥ

अनुरक्त पुरुष ये सब बातें सह सकता है; पर मन्त्रियों का क्रोध बिजली की कड़क के समान होता है।

श्लोक 34 (12.83.34)

यस्तु संहरते तानि भर्तुः प्रियचिकीर्षया । समानसुखदुःखं तं पृच्छेदर्थेषु मानवम् ॥

yastu saṃharate tāni bhartuḥ priyacikīrṣayā | samānasukhaduḥkhaṃ taṃ pṛcchedartheṣu mānavam

जो स्वामी का प्रिय करने की इच्छा से उन्हें सह लेता है और सुख-दुःख में उसके समान रहता है, ऐसे मनुष्य से कार्यों में परामर्श करना चाहिए।

श्लोक 35 (12.83.35)

अनृजुस्त्वनुरक्तोऽपि संपन्नश्चेतरैर्गुणैः । राज्ञः प्रज्ञानयुक्तोऽपि न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥

anṛjustvanurakto'pi saṃpannaścetarairguṇaiḥ | rājñaḥ prajñānayukto'pi na mantraṃ śrotumarhati

कुटिल मनुष्य, चाहे वह अनुरक्त हो, अन्य गुणों से सम्पन्न हो और राजा के लिए बुद्धि और नीति से युक्त हो, फिर भी मन्त्रणा सुनने के योग्य नहीं।

श्लोक 36 (12.83.36)

योऽमित्रैः सह संबद्धो न परान्बहुमन्यते । असुहृत्तादृशो ज्ञेयो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥

yo'mitraiḥ saha saṃbaddho na parānbahumanyate | asuhṛttādṛśo jñeyo na mantraṃ śrotumarhati

जो शत्रुओं से मिला हुआ हो और दूसरों का आदर न करता हो, उसे मित्र नहीं जानना चाहिए; वह मन्त्रणा सुनने के योग्य नहीं।

श्लोक 37 (12.83.37)

अविद्वानशुचिः स्तब्धः शत्रुसेवी विकत्थनः । असुहृत्क्रोधनो लुब्धो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥

avidvānaśuciḥ stabdhaḥ śatrusevī vikatthanaḥ | asuhṛtkrodhano lubdho na mantraṃ śrotumarhati

अविद्वान्, अपवित्र, अकड़ू, शत्रु की सेवा करनेवाला, डींग हाँकनेवाला, अमित्र, क्रोधी और लोभी मन्त्रणा सुनने के योग्य नहीं।

श्लोक 38 (12.83.38)

आगन्तुश्चानुरक्तोऽपि काममस्तु बहुश्रुतः । सत्कृतः संविभक्तो वा न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥

āgantuścānurakto'pi kāmamastu bahuśrutaḥ | satkṛtaḥ saṃvibhakto vā na mantraṃ śrotumarhati

नया आया हुआ मनुष्य, चाहे वह अनुरक्त और बहुश्रुत हो, चाहे सम्मानित हो या उसे हिस्सा दिया गया हो, मन्त्रणा सुनने के योग्य नहीं।

श्लोक 39 (12.83.39)

विधर्मतो विप्रकृतः पिता यस्याभवत्पुरा । सत्कृतः स्थापितः सोऽपि न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥

vidharmato viprakṛtaḥ pitā yasyābhavatpurā | satkṛtaḥ sthāpitaḥ so'pi na mantraṃ śrotumarhati

जिसके पिता का पहले अन्याय से अपकार हुआ हो, वह बाद में सम्मानित और प्रतिष्ठित किया गया हो, तो भी वह मन्त्रणा सुनने के योग्य नहीं।

श्लोक 40 (12.83.40)

यः स्वल्पेनापि कार्येण सुहृदाक्षारितो भवेत् । पुनरन्यैर्गुणैर्युक्तो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥

yaḥ svalpenāpi kāryeṇa suhṛdākṣārito bhavet | punaranyairguṇairyukto na mantraṃ śrotumarhati

जो मित्र द्वारा छोटे-से कारण से भी एक बार अपमानित या पीड़ित हो चुका हो, वह दूसरे गुणों से युक्त होने पर भी मन्त्रणा सुनने के योग्य नहीं।

श्लोक 41 (12.83.41)

कृतप्रज्ञश्च मेधावी बुधो जानपदः शुचिः । सर्वकर्मसु यः शुद्धः स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥

kṛtaprajñaśca medhāvī budho jānapadaḥ śuciḥ | sarvakarmasu yaḥ śuddhaḥ sa mantraṃ śrotumarhati

जिसकी प्रज्ञा परिपक्व हो, जो मेधावी, विद्वान, देश का निवासी और पवित्र हो, और सब कार्यों में शुद्ध हो, वह मन्त्रणा सुनने के योग्य है।

श्लोक 42 (12.83.42)

ज्ञानविज्ञानसंपन्नः प्रकृतिज्ञः परात्मनोः । सुहृदात्मसमो राज्ञः स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥

jñānavijñānasaṃpannaḥ prakṛtijñaḥ parātmanoḥ | suhṛdātmasamo rājñaḥ sa mantraṃ śrotumarhati

जो ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न हो, अपनी और शत्रु की प्रकृति को जानता हो, और राजा का अपने समान मित्र हो, वह मन्त्रणा सुनने के योग्य है।

श्लोक 43 (12.83.43)

सत्यवाक्शीलसंपन्नो गम्भीरः सत्रपो मृदुः । पितृपैतामहो यः स्यात्स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥

satyavākśīlasaṃpanno gambhīraḥ satrapo mṛduḥ | pitṛpaitāmaho yaḥ syātsa mantraṃ śrotumarhati

जो सत्य बोलनेवाला, शीलवान, गम्भीर, लज्जाशील और मृदु हो, और पिता-पितामह से चली आती परम्परा का हो, वह मन्त्रणा सुनने के योग्य है।

श्लोक 44 (12.83.44)

संतुष्टः संमतः सद्भिः शौटीरो द्वेष्यपापकः । मन्त्रवित्कालविच्छूरः स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥

saṃtuṣṭaḥ saṃmataḥ sadbhiḥ śauṭīro dveṣyapāpakaḥ | mantravitkālavicchūraḥ sa mantraṃ śrotumarhati

जो सन्तुष्ट हो, सज्जनों द्वारा माना जाता हो, निर्भीक हो, पाप से घृणा करता हो, मन्त्र और काल को जानता हो और शूर हो, वह मन्त्रणा सुनने के योग्य है।

श्लोक 45 (12.83.45)

सर्वलोकमिमं शक्तः सान्त्वेन कुरुते वशम् । तस्मै मन्त्रः प्रयोक्तव्यो दण्डमाधित्सता नृप ॥

sarvalokamimaṃ śaktaḥ sāntvena kurute vaśam | tasmai mantraḥ prayoktavyo daṇḍamādhitsatā nṛpa

जो इस सारे जगत को सान्त्वना से वश में करने में समर्थ है, हे राजन्, दण्ड धारण करने की इच्छा रखनेवाले राजा को ऐसे ही पुरुष को मन्त्रणा सौंपनी चाहिए।

श्लोक 46 (12.83.46)

पौरजानपदा यस्मिन्विश्वासं धर्मतो गताः । योद्धा नयविपश्चिच्च स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ॥

paurajānapadā yasminviśvāsaṃ dharmato gatāḥ | yoddhā nayavipaścicca sa mantraṃ śrotumarhati

जिस पर नगरवासियों और देहातियों ने धर्मपूर्वक विश्वास किया हो, जो योद्धा हो और नीति में विद्वान हो, वह मन्त्रणा सुनने के योग्य है।

श्लोक 47 (12.83.47)

तस्मात्सर्वैर्गुणैरेतैरुपपन्नाः सुपूजिताः । मन्त्रिणः प्रकृतिज्ञाः स्युस्त्र्यवरा महदीप्सवः ॥

tasmātsarvairguṇairetairupapannāḥ supūjitāḥ | mantriṇaḥ prakṛtijñāḥ syustryavarā mahadīpsavaḥ

इसलिए तुम्हारे मन्त्री इन सब गुणों से सम्पन्न, भली-भाँति सम्मानित, राज्य की प्रकृति को जाननेवाले, कम से कम तीन और बड़े लक्ष्य चाहनेवाले हों।

श्लोक 48 (12.83.48)

स्वासु प्रकृतिषु च्छिद्रं लक्षयेरन्परस्य च । मन्त्रिणां मन्त्रमूलं हि राज्ञो राष्ट्रं विवर्धते ॥

svāsu prakṛtiṣu cchidraṃ lakṣayeranparasya ca | mantriṇāṃ mantramūlaṃ hi rājño rāṣṭraṃ vivardhate

वे अपने पक्ष में और शत्रु के पक्ष में कमजोरियों पर दृष्टि रखें; क्योंकि मन्त्रियों की शक्ति का मूल मन्त्रणा है और उसी से राजा का राष्ट्र बढ़ता है।

श्लोक 49 (12.83.49)

नास्य च्छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेषु परमन्वियात् । गूहेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मनः ॥

nāsya cchidraṃ paraḥ paśyecchidreṣu paramanviyāt | gūhetkūrma ivāṅgāni rakṣedvivaramātmanaḥ

उसकी कमजोरी को शत्रु न देखे, पर वह शत्रु की कमजोरियों में प्रवेश करे; कछुए की तरह अपने अंगों को समेट ले और अपने छिद्रों की रक्षा करे।

श्लोक 50 (12.83.50)

मन्त्रग्राहा हि राज्यस्य मन्त्रिणो ये मनीषिणः । मन्त्रसंहननो राजा मन्त्राङ्गानीतरे जनः ॥

mantragrāhā hi rājyasya mantriṇo ye manīṣiṇaḥ | mantrasaṃhanano rājā mantrāṅgānītare janaḥ

जो बुद्धिमान मन्त्री हैं, वे राज्य की मन्त्रणा के रक्षक हैं; राजा मन्त्रणा को ही कवच बनाए हुए है और शेष लोग मन्त्रणा के अंग हैं।

श्लोक 51 (12.83.51)

राज्यं प्रणिधिमूलं हि मन्त्रसारं प्रचक्षते । स्वामिनं त्वनुवर्तन्ति वृत्त्यर्थमिह मन्त्रिणः ॥

rājyaṃ praṇidhimūlaṃ hi mantrasāraṃ pracakṣate | svāminaṃ tvanuvartanti vṛttyarthamiha mantriṇaḥ

कहते हैं कि राज्य का मूल गुप्तचर हैं और उसका सार मन्त्रणा है; मन्त्री यहाँ आजीविका के लिए स्वामी का अनुसरण करते हैं।

श्लोक 52 (12.83.52)

संविनीयमदक्रोधौ मानमीर्ष्यां च निर्वृताः । नित्यं पञ्चोपधातीतैर्मन्त्रयेत्सह मन्त्रिभिः ॥

saṃvinīyamadakrodhau mānamīrṣyāṃ ca nirvṛtāḥ | nityaṃ pañcopadhātītairmantrayetsaha mantribhiḥ

मद, क्रोध, मान और ईर्ष्या को जीतकर, निश्चिन्त होकर वह पाँच परीक्षाओं को पार किए हुए मन्त्रियों के साथ सदा मन्त्रणा करे।

श्लोक 53 (12.83.53)

तेषां त्रयाणां त्रिविधं विमर्शं । विबुध्य चित्तं विनिवेश्य तत्र । स्वनिश्चयं तं परनिश्चयं च । निदर्शयेदुत्तरमन्त्रकाले ॥

teṣāṃ trayāṇāṃ trividhaṃ vimarśaṃ | vibudhya cittaṃ viniveśya tatra | svaniścayaṃ taṃ paraniścayaṃ ca | nidarśayeduttaramantrakāle

उन तीनों के अलग-अलग विचारों को समझे, उन पर चित्त लगाकर, और अन्तिम मन्त्रणा के समय अपना निश्चय तथा दूसरों का निश्चय दोनों प्रस्तुत करे।

श्लोक 54 (12.83.54)

धर्मार्थकामज्ञमुपेत्य पृच्छे । द्युक्तो गुरुं ब्राह्मणमुत्तरार्थम् । निष्ठा कृता तेन यदा सह स्या । त्तं मन्त्रमार्गं प्रणयेदसक्तः ॥

dharmārthakāmajñamupetya pṛcche | dyukto guruṃ brāhmaṇamuttarārtham | niṣṭhā kṛtā tena yadā saha syā | ttaṃ mantramārgaṃ praṇayedasaktaḥ

सावधान होकर वह धर्म, अर्थ और काम को जाननेवाले ब्राह्मण गुरु के पास जाकर अन्तिम निर्णय के विषय में पूछे; जब उसके साथ निर्णय हो जाए, तब अनासक्त होकर उस मन्त्रणा-मार्ग को चलाए।

श्लोक 55 (12.83.55)

एवं सदा मन्त्रयितव्यमाहु । र्ये मन्त्रतत्त्वार्थविनिश्चयज्ञाः । तस्मात्तमेवं प्रणयेत्सदैव । मन्त्रं प्रजासंग्रहणे समर्थम् ॥

evaṃ sadā mantrayitavyamāhu | rye mantratattvārthaviniścayajñāḥ | tasmāttamevaṃ praṇayetsadaiva | mantraṃ prajāsaṃgrahaṇe samartham

मन्त्र के तत्त्व और अर्थ का निश्चय जाननेवाले कहते हैं कि मन्त्रणा सदा इसी प्रकार करनी चाहिए; इसलिए प्रजा को अपने साथ जोड़ने में समर्थ मन्त्रणा को वह सदा इसी प्रकार चलाए।

श्लोक 56 (12.83.56)

न वामनाः कुब्जकृशा न खञ्जा । नान्धा जडाः स्त्री च नपुंसकाश्च । न चात्र तिर्यक्च पुरो न पश्चा । न्नोर्ध्वं न चाधः प्रचरेत्कथंचित् ॥

na vāmanāḥ kubjakṛśā na khañjā | nāndhā jaḍāḥ strī ca napuṃsakāśca | na cātra tiryakca puro na paścā | nnordhvaṃ na cādhaḥ pracaretkathaṃcit

वहाँ बौने, कुबड़े, दुबले, लँगड़े, अन्धे, जड़, स्त्री और नपुंसक न हों; और न कोई तिरछा, आगे, पीछे, ऊपर या नीचे किसी प्रकार घूमता-फिरता रहे।

श्लोक 57 (12.83.57)

आरुह्य वा वेश्म तथैव शून्यं । स्थलं प्रकाशं कुशकाशहीनम् । वागङ्गदोषान्परिहृत्य सर्वा । न्संमन्त्रयेत्कार्यमहीनकालम् ॥

āruhya vā veśma tathaiva śūnyaṃ | sthalaṃ prakāśaṃ kuśakāśahīnam | vāgaṅgadoṣānparihṛtya sarvā | nsaṃmantrayetkāryamahīnakālam

या तो घर के ऊपर चढ़कर, या खाली, खुले और कुश-काश से रहित स्थान में, वाणी और अंग-चेष्टा के सब दोषों से बचते हुए, वह उचित समय पर कार्य की मन्त्रणा करे।

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