शान्ति पर्व · अध्याय 84
बृहस्पति का इन्द्र को मधुर वाणी का उपदेश
भीष्म युधिष्ठिर को इन्द्र और बृहस्पति का एक पुराना संवाद सुनाते हैं। इन्द्र पूछते हैं कि वह कौन-सा एक आचरण है जिससे मनुष्य सब प्राणियों के लिए प्रमाण बनता और महान् यश पाता है। बृहस्पति उत्तर देते हैं कि वह मधुर और स्नेहपूर्ण वाणी है: उससे मनुष्य सबका प्रिय होता है, कुछ लेते समय भी वह संसार को वश में कर लेता है, और दण्ड देने की इच्छा रखने वाले को भी उसी का प्रयोग करना चाहिए। अन्त में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि वे भी इन्द्र की तरह इसका पालन करें।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.84.1)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । बृहस्पतेश्च संवादं शक्रस्य च युधिष्ठिर ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | bṛhaspateśca saṃvādaṃ śakrasya ca yudhiṣṭhira
इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं: बृहस्पति और इन्द्र का संवाद, हे युधिष्ठिर।
शक्र उवाच
श्लोक 2 (12.84.2)
किंस्विदेकपदं ब्रह्मन्पुरुषः सम्यगाचरन् । प्रमाणं सर्वभूतानां यशश्चैवाप्नुयान्महत् ॥
kiṃsvidekapadaṃ brahmanpuruṣaḥ samyagācaran | pramāṇaṃ sarvabhūtānāṃ yaśaścaivāpnuyānmahat
हे ब्रह्मन्, वह कौन-सा एक ही आचरण है जिसका ठीक-ठीक पालन करके मनुष्य सब प्राणियों के लिए प्रमाण (आदर्श) बन जाता है और महान् यश पाता है?
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 3 (12.84.3)
सान्त्वमेकपदं शक्र पुरुषः सम्यगाचरन् । प्रमाणं सर्वभूतानां यशश्चैवाप्नुयान्महत् ॥
sāntvamekapadaṃ śakra puruṣaḥ samyagācaran | pramāṇaṃ sarvabhūtānāṃ yaśaścaivāpnuyānmahat
हे शक्र, मधुर और शान्त वाणी (सान्त्वना) ही वह एक आचरण है; उसका ठीक-ठीक पालन करने वाला मनुष्य सब प्राणियों के लिए प्रमाण बनता है और महान् यश पाता है।
श्लोक 4 (12.84.4)
एतदेकपदं शक्र सर्वलोकसुखावहम् । आचरन्सर्वभूतेषु प्रियो भवति सर्वदा ॥
etadekapadaṃ śakra sarvalokasukhāvaham | ācaransarvabhūteṣu priyo bhavati sarvadā
हे शक्र, यह एक ही आचरण सारे संसार को सुख देने वाला है; इसे सब प्राणियों के प्रति अपनाने वाला सदा उन सबका प्रिय होता है।
श्लोक 5 (12.84.5)
यो हि नाभाषते किंचित्सर्वदा भुकुटीमुखः । द्वेष्यो भवति भूतानां स सान्त्वमिह नाचरन् ॥
yo hi nābhāṣate kiṃcitsarvadā bhukuṭīmukhaḥ | dveṣyo bhavati bhūtānāṃ sa sāntvamiha nācaran
जो सदा भौंहें चढ़ाए रहता है और कभी कुछ नहीं बोलता, वह प्राणियों का द्वेषपात्र हो जाता है, क्योंकि वह यहाँ सान्त्वना का आचरण नहीं करता।
श्लोक 6 (12.84.6)
यस्तु सर्वमभिप्रेक्ष्य पूर्वमेवाभिभाषते । स्मितपूर्वाभिभाषी च तस्य लोकः प्रसीदति ॥
yastu sarvamabhiprekṣya pūrvamevābhibhāṣate | smitapūrvābhibhāṣī ca tasya lokaḥ prasīdati
किन्तु जो सब पर दृष्टि डालकर पहले ही बोलता है और मुस्कराहट के साथ बात आरम्भ करता है, उस पर संसार प्रसन्न रहता है।
श्लोक 7 (12.84.7)
दानमेव हि सर्वत्र सान्त्वेनानभिजल्पितम् । न प्रीणयति भूतानि निर्व्यञ्जनमिवाशनम् ॥
dānameva hi sarvatra sāntvenānabhijalpitam | na prīṇayati bhūtāni nirvyañjanamivāśanam
सब जगह दान भी, यदि उसके साथ मधुर वचन न हों, प्राणियों को प्रसन्न नहीं करता, जैसे बिना मसाले का भोजन।
श्लोक 8 (12.84.8)
आददन्नपि भूतानां मधुरामीरयन्गिरम् । सर्वलोकमिमं शक्र सान्त्वेव कुरुते वशे ॥
ādadannapi bhūtānāṃ madhurāmīrayangiram | sarvalokamimaṃ śakra sāntveva kurute vaśe
हे शक्र, प्राणियों से कुछ लेते हुए भी जो मधुर वाणी बोलता है, वह इस सारे संसार को सान्त्वना से ही अपने वश में कर लेता है।
श्लोक 9 (12.84.9)
तस्मात्सान्त्वं प्रयोक्तव्यं दण्डमाधित्सताऽपि हि । प्रीतिं च जनयत्येवं न चास्योद्विजते जनः ॥
tasmātsāntvaṃ prayoktavyaṃ daṇḍamādhitsatā'pi hi | prītiṃ ca janayatyevaṃ na cāsyodvijate janaḥ
इसलिए जो दण्ड देना चाहता हो, उसे भी सान्त्वना का प्रयोग करना चाहिए; इस प्रकार वह प्रेम उत्पन्न करता है और लोग उससे उद्विग्न नहीं होते।
श्लोक 10 (12.84.10)
सुकृतस्य हि सान्त्वस्य श्लक्ष्णस्य मधुरस्य च । सम्यगासेव्यमानस्य तुल्यं जातु न विद्यते ॥
sukṛtasya hi sāntvasya ślakṣṇasya madhurasya ca | samyagāsevyamānasya tulyaṃ jātu na vidyate
भलीभाँति किए गए, स्नेहपूर्ण, कोमल और मधुर सान्त्वना वचन का, जब उसका ठीक से सेवन किया जाए, कभी कोई समकक्ष नहीं होता।
भीष्म उवाच
श्लोक 11 (12.84.11)
इत्युक्तः कृतवान्सर्वं यथा शक्रः पुरोधसा । तथा त्वमपि कौन्तेय सम्यगेतत्समाचर ॥
ityuktaḥ kṛtavānsarvaṃ yathā śakraḥ purodhasā | tathā tvamapi kaunteya samyagetatsamācara
यह सुनकर इन्द्र ने अपने पुरोहित के कहे अनुसार सब किया। हे कुन्तीपुत्र, तुम भी इसका ठीक-ठीक पालन करो।