शान्ति पर्व · अध्याय 85
भीष्म द्वारा राजा के मन्त्रियों और अधिकारियों का वर्णन
युधिष्ठिर पूछते हैं कि प्रजा का पालन करता हुआ राजा धर्म और स्थायी कीर्ति कैसे पाता है। भीष्म बताते हैं कि यह शुद्ध (निष्पक्ष) व्यवहार से होता है, और राजा को जिन सलाहकारों को रखना चाहिए उनकी सूची देते हैं: चार ब्राह्मण, अठारह क्षत्रिय, इक्कीस वैश्य, तीन शूद्र और एक विद्वान् सूत। वे मुकदमों के निर्णय और दण्ड की रीति बताते हैं, दूत के वध का निषेध करते हैं, दूत, द्वारपाल, सन्धि-विग्रह के मन्त्री और सेनापति के गुण गिनाते हैं, और अन्त में उपदेश देते हैं कि राजा को किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.85.1)
कथंस्विदिह राजेन्द्र पालयन्पार्थिवः प्रजाः । प्रैति धर्मं विशेषेण कीर्तिमाप्नोति शाश्वतीम् ॥
kathaṃsvidiha rājendra pālayanpārthivaḥ prajāḥ | praiti dharmaṃ viśeṣeṇa kīrtimāpnoti śāśvatīm
हे राजेन्द्र, प्रजा का पालन करता हुआ राजा किस प्रकार विशेष रूप से धर्म को प्राप्त करता है और शाश्वत कीर्ति पाता है?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.85.2)
व्यवहारेण शुद्धेन प्रजापालनतत्परः । प्राप्य धर्मं च कीर्ति च लोकानाप्नोत्यसौ शुचिः ॥
vyavahāreṇa śuddhena prajāpālanatatparaḥ | prāpya dharmaṃ ca kīrti ca lokānāpnotyasau śuciḥ
जो राजा शुद्ध (निष्पक्ष) व्यवहार से प्रजा के पालन में लगा रहता है, वह धर्म और कीर्ति पाकर पवित्र होता हुआ उत्तम लोकों को प्राप्त करता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 3 (12.85.3)
कीदृशव्यवहारं तु कैश्च व्यवहरेन्नृपः । एतत्पृष्टो महाप्राज्ञ यथावद्वक्तुमर्हसि ॥
kīdṛśavyavahāraṃ tu kaiśca vyavaharennṛpaḥ | etatpṛṣṭo mahāprājña yathāvadvaktumarhasi
राजा किस प्रकार के नियम से और किनकी सहायता से न्याय का निर्णय करे? हे महाप्राज्ञ, यह प्रश्न पूछे जाने पर आपको इसका यथावत् उत्तर देना चाहिए।
श्लोक 4 (12.85.4)
ये चैव पूर्वकथिता गुणास्ते पुरुषं प्रति । नैकस्मिन्पुरुषे ह्येते विद्यन्त इति मे मतिः ॥
ye caiva pūrvakathitā guṇāste puruṣaṃ prati | naikasminpuruṣe hyete vidyanta iti me matiḥ
और जो गुण पहले पुरुष के लिए बताए गए थे, वे सब किसी एक पुरुष में नहीं मिलते, ऐसा मेरा विचार है।
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (12.85.5)
एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि बुद्धिमन् । दुर्लभः पुरुषः कश्चिदेभिर्युक्तो गुणैः शुभैः ॥
evametanmahāprājña yathā vadasi buddhiman | durlabhaḥ puruṣaḥ kaścidebhiryukto guṇaiḥ śubhaiḥ
हे बुद्धिमान् महाप्राज्ञ, जैसा तुम कहते हो वैसा ही है; इन सब शुभ गुणों से युक्त कोई पुरुष मिलना दुर्लभ है।
श्लोक 6 (12.85.6)
किंतु संक्षेपतः शीलं प्रयत्नेनेह दुर्लभम् । वक्ष्यामि तु यथाऽमात्यान्यादृशांश्च करिष्यसि ॥
kiṃtu saṃkṣepataḥ śīlaṃ prayatneneha durlabham | vakṣyāmi tu yathā'mātyānyādṛśāṃśca kariṣyasi
फिर भी प्रयत्न करने पर भी जिस शील का मिलना कठिन है, उसे मैं संक्षेप में कहूँगा, और यह भी कि तुम कैसे मन्त्री नियुक्त करोगे।
श्लोक 7 (12.85.7)
चतुरो ब्राह्मणान्वैद्यान्प्रगल्भान्स्नातकाञ्शुचीन् । क्षत्रियान्दश चाष्टौ च बलिनः शस्त्रपाणिनः ॥
caturo brāhmaṇānvaidyānpragalbhānsnātakāñśucīn | kṣatriyāndaśa cāṣṭau ca balinaḥ śastrapāṇinaḥ
चार ब्राह्मण, जो विद्वान्, निर्भीक, स्नातक और पवित्र हों; अठारह क्षत्रिय, जो बलवान् और हाथ में शस्त्र लिए हों;
श्लोक 8 (12.85.8)
वैश्यान्वित्तेन संपन्नानेकविंशतिसङ्ख्यया । त्रींश्च शूद्रान्विनीतांश्च शुचीन्कर्मणि पूर्वके ॥
vaiśyānvittena saṃpannānekaviṃśatisaṅkhyayā | trīṃśca śūdrānvinītāṃśca śucīnkarmaṇi pūrvake
धन से सम्पन्न इक्कीस वैश्य; और अपने परम्परागत कर्म में पवित्र तथा विनम्र तीन शूद्र;
श्लोक 9 (12.85.9)
अष्टाभिश्च गुणैर्युक्तं सूतं पौराणिकं तथा । पञ्चाशद्वर्षवयसं प्रगल्भमनसूयकम् ॥
aṣṭābhiśca guṇairyuktaṃ sūtaṃ paurāṇikaṃ tathā | pañcāśadvarṣavayasaṃ pragalbhamanasūyakam
तथा आठ गुणों से युक्त, पचास वर्ष की आयु का, निर्भीक और ईर्ष्या से रहित, पुराणों का ज्ञाता एक सूत;
श्लोक 10 (12.85.10)
श्रुतिस्मृतिसमायुक्तं विनीतं समदर्शिनम् । कार्ये विवदमानानां शक्तमर्थेष्वलोलुपम् ॥
śrutismṛtisamāyuktaṃ vinītaṃ samadarśinam | kārye vivadamānānāṃ śaktamartheṣvalolupam
जो श्रुति और स्मृति का ज्ञाता, विनम्र, सबको समान दृष्टि से देखने वाला, विवाद करने वालों के मामले में निर्णय करने में समर्थ और धन का लोभी न हो,
श्लोक 11 (12.85.11)
वर्जितं चैव व्यसनैः सुघोरैः सप्तभिर्भृशम् । अष्टानां मन्त्रिणां मध्ये मन्त्रं राजोपधारयेत् ॥
varjitaṃ caiva vyasanaiḥ sughoraiḥ saptabhirbhṛśam | aṣṭānāṃ mantriṇāṃ madhye mantraṃ rājopadhārayet
और जो सात अत्यन्त भयंकर व्यसनों से पूरी तरह दूर हो। इन आठ मन्त्रियों के बीच राजा मन्त्रणा पर विचार करे।
श्लोक 12 (12.85.12)
ततः संप्रेषयेद्राष्ट्रे राष्ट्रीयाय च दर्शयेत् । अनेन व्यवहारेण द्रष्टव्यास्ते प्रजाः सदा ॥
tataḥ saṃpreṣayedrāṣṭre rāṣṭrīyāya ca darśayet | anena vyavahāreṇa draṣṭavyāste prajāḥ sadā
फिर उन्हें राज्य में भेजे और राज्य के अधिकारी को दिखलाए, कि इसी नियम से प्रजा की सदा देखभाल की जानी चाहिए।
श्लोक 13 (12.85.13)
न चापि गूढं द्रव्यं ते ग्राह्यं कार्योपघातकम् । कार्ये खलु विपन्ने त्वां यो धर्मस्तं च पीडयेत् ॥
na cāpi gūḍhaṃ dravyaṃ te grāhyaṃ kāryopaghātakam | kārye khalu vipanne tvāṃ yo dharmastaṃ ca pīḍayet
और तुम्हें कोई ऐसा छिपा हुआ धन नहीं लेना चाहिए जो कार्य को हानि पहुँचाए; क्योंकि कार्य बिगड़ने पर वह तुम्हें और तुम्हारे धर्म को पीड़ा देगा।
श्लोक 14 (12.85.14)
विद्रवेच्चैव राष्ट्रं ते श्येनात्पक्षिगणा इव । परिस्रवेच्च सततं नौर्विशीर्णेव सागरे ॥
vidraveccaiva rāṣṭraṃ te śyenātpakṣigaṇā iva | parisravecca satataṃ naurviśīrṇeva sāgare
तुम्हारा राष्ट्र बाज़ से डरे पक्षियों के झुंड की तरह बिखर जाएगा और समुद्र में टूटी नाव की तरह निरन्तर रिसता जाएगा।
श्लोक 15 (12.85.15)
प्रजाः पालयतोऽसम्यगधर्मेणेह भूपतेः । हार्दं भयं संभवति स्वर्गश्चस्य विरुध्यते ॥
prajāḥ pālayato'samyagadharmeṇeha bhūpateḥ | hārdaṃ bhayaṃ saṃbhavati svargaścasya virudhyate
जो राजा प्रजा का पालन अनुचित रीति से, अधर्म से करता है, उसके हृदय में भय उत्पन्न होता है और उसका स्वर्ग का मार्ग रुक जाता है।
श्लोक 16 (12.85.16)
अथ यो धर्मतः पाति राजाऽमात्योऽथवाऽऽत्मजः । धर्मासने सन्नियुक्तो धर्ममूले नरर्षभ ॥
atha yo dharmataḥ pāti rājā'mātyo'thavā''tmajaḥ | dharmāsane sanniyukto dharmamūle nararṣabha
किन्तु हे नरश्रेष्ठ, जो राजा, मन्त्री या पुत्र धर्मपूर्वक पालन करता है और धर्म को मूल मानने वाले न्यायासन पर नियुक्त है,
श्लोक 17 (12.85.17)
स्वर्गं याति महीपालो नियुक्तैः सचिवैः सह । कार्येष्वधिकृताः सम्यगकुर्वन्तो नृपानुगाः । आत्मानं पुरतः कृत्वा यान्त्यधः सह पार्थिवाः ॥
svargaṃ yāti mahīpālo niyuktaiḥ sacivaiḥ saha | kāryeṣvadhikṛtāḥ samyagakurvanto nṛpānugāḥ | ātmānaṃ purataḥ kṛtvā yāntyadhaḥ saha pārthivāḥ
वह राजा नियुक्त मन्त्रियों के साथ स्वर्ग जाता है। किन्तु कार्यों पर नियुक्त जो राजा के अनुयायी ठीक से कार्य नहीं करते और अपने को आगे रखते हैं, वे राजाओं के साथ नीचे (नरक में) जाते हैं।
श्लोक 18 (12.85.18)
बलात्कृतानां बलिभिः कृपणं बहुजल्पताम् । नाथो वै भूमिपो नित्यमनाथानां नृणां भवेत् ॥
balātkṛtānāṃ balibhiḥ kṛpaṇaṃ bahujalpatām | nātho vai bhūmipo nityamanāthānāṃ nṛṇāṃ bhavet
बलवानों के द्वारा सताए गए और दीनता से बहुत विलाप करने वाले असहाय लोगों का राजा सदा रक्षक होता है।
श्लोक 19 (12.85.19)
ततः साक्षिबलं साधु द्वैधवादकृतं भवेत् । असाक्षिकमनाथं वा परीक्ष्यं तद्विशेषतः ॥
tataḥ sākṣibalaṃ sādhu dvaidhavādakṛtaṃ bhavet | asākṣikamanāthaṃ vā parīkṣyaṃ tadviśeṣataḥ
तब दोनों पक्षों की दलीलों से प्रकट हुआ साक्षियों का बल उचित होना चाहिए; जहाँ साक्षी न हो या पक्ष असहाय हो, वहाँ मामले की विशेष रूप से जाँच करनी चाहिए।
श्लोक 20 (12.85.20)
अपराधानुरूपं च दण्डं पापेषु धारयेत् । वियोजयेद्धनैर्ऋद्धानधनानथ बन्धनैः ॥
aparādhānurūpaṃ ca daṇḍaṃ pāpeṣu dhārayet | viyojayeddhanairṛddhānadhanānatha bandhanaiḥ
पापियों पर अपराध के अनुसार दण्ड दे: धनवानों को उनके धन से वंचित करे और निर्धनों को कारावास से दण्डित करे।
श्लोक 21 (12.85.21)
विनयेच्चापि दुर्वृत्तान्प्रहारैरपि पार्थिवः । सान्त्वेनोपप्रदानेन शिष्टांश्च परिपालयेत् ॥
vinayeccāpi durvṛttānprahārairapi pārthivaḥ | sāntvenopapradānena śiṣṭāṃśca paripālayet
राजा दुराचारियों को मार-पीट से भी अनुशासित करे और सज्जनों की सान्त्वना और दान से रक्षा करे।
श्लोक 22 (12.85.22)
राज्ञो वधं चिकीर्षेद्यस्तस्य चित्रो वधो भवेत् । आदीपकस्य स्तेनस्य वर्णसंकरिकस्य च ॥
rājño vadhaṃ cikīrṣedyastasya citro vadho bhavet | ādīpakasya stenasya varṇasaṃkarikasya ca
जो राजा का वध करना चाहे, उसका वध अनेक प्रकार का (कठोर) होना चाहिए; इसी प्रकार आग लगाने वाले, चोर और वर्णसंकर करने वाले का भी।
श्लोक 23 (12.85.23)
सम्यक्प्रणयतो दण्डं भूमिपस्य विशांपते । युक्तस्य वा नास्त्यधर्मो धर्म एव हि शाश्वतः ॥
samyakpraṇayato daṇḍaṃ bhūmipasya viśāṃpate | yuktasya vā nāstyadharmo dharma eva hi śāśvataḥ
हे प्रजापति, जब राजा, या उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति, ठीक रीति से दण्ड देता है तो उसमें अधर्म नहीं होता; वह तो शाश्वत धर्म ही है।
श्लोक 24 (12.85.24)
कामकारेण दण्डं तु यः कुर्यादविचक्षणः । स इहाकीर्तिसंयुक्तो मृतो नरकमृच्छति ॥
kāmakāreṇa daṇḍaṃ tu yaḥ kuryādavicakṣaṇaḥ | sa ihākīrtisaṃyukto mṛto narakamṛcchati
किन्तु जो अविवेकी अपनी इच्छा से दण्ड देता है, वह यहाँ अपकीर्ति पाता है और मरने पर नरक में जाता है।
श्लोक 25 (12.85.25)
न परस्य प्रवादेन परेषां दण्डमर्पयेत् । आगमानुगमं कृत्वा बध्नीयान्मोक्षयीत वा ॥
na parasya pravādena pareṣāṃ daṇḍamarpayet | āgamānugamaṃ kṛtvā badhnīyānmokṣayīta vā
दूसरे के कहने मात्र से किसी को दण्ड के लिए सौंपना नहीं चाहिए; मामले की उत्पत्ति और परिणाम की जाँच करके ही बाँधे या छोड़े।
श्लोक 26 (12.85.26)
न तु हन्यान्नृपो जातु दूतं कस्यांचिदापदि । दूतस्य हन्ता निरयमाविशेत्सचिवैः सह ॥
na tu hanyānnṛpo jātu dūtaṃ kasyāṃcidāpadi | dūtasya hantā nirayamāviśetsacivaiḥ saha
किसी भी आपत्ति में राजा को कभी दूत का वध नहीं करना चाहिए; दूत को मारने वाला अपने मन्त्रियों सहित नरक में पड़ता है।
श्लोक 27 (12.85.27)
यथोक्तवादिनं दूतं क्षत्रधर्मरतो नृपः । यो हन्यात्पितरस्तस्य भ्रूणहत्यामवाप्नुयुः ॥
yathoktavādinaṃ dūtaṃ kṣatradharmarato nṛpaḥ | yo hanyātpitarastasya bhrūṇahatyāmavāpnuyuḥ
क्षत्रिय-धर्म में लगा जो राजा जैसा कहा गया हो वैसा ही कहने वाले दूत को मारता है, उसके पितरों को भ्रूणहत्या का पाप लगता है।
श्लोक 28 (12.85.28)
कुलीनः शीलसंपन्नो वाग्मी दक्षः प्रियंवदः । यथोक्तवादीस्मृतिमान्दूतः स्यात्सप्तभिर्गुणैः ॥
kulīnaḥ śīlasaṃpanno vāgmī dakṣaḥ priyaṃvadaḥ | yathoktavādīsmṛtimāndūtaḥ syātsaptabhirguṇaiḥ
दूत में सात गुण होने चाहिए: कुलीनता, शील, वाक्पटुता, कुशलता, प्रिय बोलना, जैसा कहा गया हो वैसा ही कहना, और स्मरणशक्ति।
श्लोक 29 (12.85.29)
एतैरेव गुणैर्युक्तः प्रतीहारोऽस्य रक्षिता । शिरोरक्षश्च भवति गुणैरेतैः समन्वितः ॥
etaireva guṇairyuktaḥ pratīhāro'sya rakṣitā | śirorakṣaśca bhavati guṇairetaiḥ samanvitaḥ
इन्हीं गुणों से राजा का द्वारपाल और रक्षक युक्त होना चाहिए, तथा उसका अंगरक्षक भी इन्हीं गुणों वाला हो।
श्लोक 30 (12.85.30)
धर्मशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः सांधिविग्रहिको भवेत् । मतिमान्धृतिमान्ह्रीमान्रहस्यविनिगूहिता ॥
dharmaśāstrārthatattvajñaḥ sāṃdhivigrahiko bhavet | matimāndhṛtimānhrīmānrahasyavinigūhitā
सन्धि और युद्ध का मन्त्री धर्मशास्त्र के अर्थ और तत्त्व का ज्ञाता हो; वह बुद्धिमान्, धैर्यवान्, लज्जाशील और रहस्यों को छिपाने वाला हो।
श्लोक 31 (12.85.31)
कुलीनः सत्वसंपन्नः शुक्लोऽमात्यः प्रशस्यते । एतैरेव गुणैर्युक्तस्तथा सेनापतिर्भवेत् ॥
kulīnaḥ satvasaṃpannaḥ śuklo'mātyaḥ praśasyate | etaireva guṇairyuktastathā senāpatirbhavet
कुलीन, दृढ़ चरित्र वाला और निर्मल मन्त्री प्रशंसनीय होता है; इन्हीं गुणों से युक्त व्यक्ति सेनापति बने।
श्लोक 32 (12.85.32)
व्यूहयन्त्रायुधानां च तत्त्वज्ञो विक्रमान्वितः । वर्षशीतोष्णवातानां सहिष्णुः पररन्ध्रवित् ॥
vyūhayantrāyudhānāṃ ca tattvajño vikramānvitaḥ | varṣaśītoṣṇavātānāṃ sahiṣṇuḥ pararandhravit
वह व्यूहों, यन्त्रों और शस्त्रों के तत्त्व को जानता हो, पराक्रमी हो, वर्षा, शीत, गर्मी और हवा को सहने वाला हो और शत्रु की कमज़ोरियों को पहचानता हो।
श्लोक 33 (12.85.33)
विश्वासयेत्परांश्चैव विश्वसेच्च न कस्यचित् । पुत्रेष्वपि हि राजेन्द्र विश्वासो न प्रशस्यते ॥
viśvāsayetparāṃścaiva viśvasecca na kasyacit | putreṣvapi hi rājendra viśvāso na praśasyate
वह दूसरों को अपने ऊपर विश्वास दिलाए, पर स्वयं किसी पर विश्वास न करे; हे राजेन्द्र, पुत्रों पर भी विश्वास करना प्रशंसनीय नहीं है।
श्लोक 34 (12.85.34)
एतच्छास्त्रार्थतत्त्वं तु मयाऽऽख्यातं तवानघ । अविश्वासो नरेन्द्राणां गुह्यं परममुच्यते ॥
etacchāstrārthatattvaṃ tu mayā''khyātaṃ tavānagha | aviśvāso narendrāṇāṃ guhyaṃ paramamucyate
हे निष्पाप, शास्त्रों के अर्थ का यह सार मैंने तुम्हें बता दिया; राजाओं के लिए अविश्वास ही परम गुप्त रहस्य कहा जाता है।