शान्ति पर्व · अध्याय 86
राजा का नगर और उसकी रक्षा-व्यवस्था
युधिष्ठिर पूछते हैं कि राजा को कैसे नगर में रहना चाहिए। भीष्म छह प्रकार के दुर्ग गिनाते हैं और एक सुसज्जित, सुरक्षित और समृद्ध नगर का वर्णन करते हैं, फिर बताते हैं कि राजा को कौन-कौन सी सामग्री और कौन-से कुशल जन संचित रखने चाहिए। वे राजा से कहते हैं कि वह गुप्तचरों से अपने राज्य को जाने, असहायों का भरण-पोषण करे, तपस्वियों का सम्मान करे और विश्वस्त तपस्वियों को अपने तथा पड़ोसी राज्यों में आपत्ति के समय शरण पाने के लिए नियुक्त करे।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.86.1)
कथंविधं पुरं राजा स्वयमावस्तुमर्हति । कृतं वा कारयित्वा वा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kathaṃvidhaṃ puraṃ rājā svayamāvastumarhati | kṛtaṃ vā kārayitvā vā tanme brūhi pitāmaha
राजा को स्वयं कैसे नगर में रहना चाहिए, बना-बनाया या स्वयं बनवाया हुआ? हे पितामह, यह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.86.2)
वस्तव्यं यत्र कौन्तेय सपुत्रज्ञातिबन्धुना । न्याय्यं च परिप्रष्टुं वृत्तिं गुप्तिं च भारत ॥
vastavyaṃ yatra kaunteya saputrajñātibandhunā | nyāyyaṃ ca paripraṣṭuṃ vṛttiṃ guptiṃ ca bhārata
हे कुन्तीपुत्र, जहाँ पुत्रों, जाति-बन्धुओं और सम्बन्धियों के साथ रहना है, उसकी रक्षा और उसकी जीविका के विषय में पूछना उचित है, हे भारत।
श्लोक 3 (12.86.3)
तस्मात्ते वर्तयिष्यामि दुर्गकर्म विशेषतः । श्रुत्वा तथा विधातव्यमनुष्ठेयं च यत्नतः ॥
tasmātte vartayiṣyāmi durgakarma viśeṣataḥ | śrutvā tathā vidhātavyamanuṣṭheyaṃ ca yatnataḥ
इसलिए मैं तुम्हें दुर्ग-निर्माण का विशेष वर्णन करूँगा; उसे सुनकर तुम वैसा ही प्रबन्ध करना और यत्न से उसका पालन करना।
श्लोक 4 (12.86.4)
षड्विधं दुर्गमास्थाय पुराण्यथ निवेशयेत् । सर्वसंपत्प्रधानं च बाहुल्यं चापि संभवेत् ॥
ṣaḍvidhaṃ durgamāsthāya purāṇyatha niveśayet | sarvasaṃpatpradhānaṃ ca bāhulyaṃ cāpi saṃbhavet
छह प्रकार के दुर्गों का आश्रय लेकर वह नगर बसाए, ऐसे नगर जो सब सम्पत्तियों में प्रधान हों और जिनमें प्रचुरता सम्भव हो।
श्लोक 5 (12.86.5)
धन्वदुर्गं महीदुर्गं गिरिदुर्गं तथैव च । मनुष्यदुर्गं मृद्दुर्गं वनदुर्गं च तानि षट् ॥
dhanvadurgaṃ mahīdurgaṃ giridurgaṃ tathaiva ca | manuṣyadurgaṃ mṛddurgaṃ vanadurgaṃ ca tāni ṣaṭ
धन्वदुर्ग (मरुस्थल), महीदुर्ग (भूमि), गिरिदुर्ग (पर्वत), मनुष्यदुर्ग, मृद्दुर्ग (कीचड़-मिट्टी) और वनदुर्ग: ये छह हैं।
श्लोक 6 (12.86.6)
यत्पुरं दुर्गसंपन्नं धान्यायुधसमन्वितम् । दृढप्राकारपरिखं हस्त्यश्वरथसंकुलम् ॥
yatpuraṃ durgasaṃpannaṃ dhānyāyudhasamanvitam | dṛḍhaprākāraparikhaṃ hastyaśvarathasaṃkulam
जो नगर दुर्गों से युक्त हो, अन्न और शस्त्रों से भरा हो, जिसकी चहारदीवारी और खाई दृढ़ हो, और जो हाथी, घोड़े और रथों से भरा हो,
श्लोक 7 (12.86.7)
विद्वांसः शिल्पिनो यत्र निचयाश्च सुसंचिताः । धार्मिकश्च जनो यत्र दाक्ष्यमुत्तममास्थितः ॥
vidvāṃsaḥ śilpino yatra nicayāśca susaṃcitāḥ | dhārmikaśca jano yatra dākṣyamuttamamāsthitaḥ
जहाँ विद्वान् और शिल्पी हों, भलीभाँति संचित भण्डार हों, और जहाँ के लोग धार्मिक हों तथा उत्तम कुशलता को प्राप्त हों,
श्लोक 8 (12.86.8)
ऊर्जस्विनरनागाश्वं चत्वरापणशोभितम् । प्रसिद्धव्यवहारं च प्रशान्तमकुतोभयम् ॥
ūrjasvinaranāgāśvaṃ catvarāpaṇaśobhitam | prasiddhavyavahāraṃ ca praśāntamakutobhayam
जो तेजस्वी पुरुषों, हाथियों और घोड़ों से भरा हो, चौराहों और बाज़ारों से सुशोभित हो, जहाँ व्यापार भली-भाँति प्रसिद्ध हो, जो शान्त हो और जहाँ कहीं से भय न हो,
श्लोक 9 (12.86.9)
सुप्रभं सानुनादं च सुप्रशस्तनिवेशनम् । शूराढ्यं प्राज्ञसंपूर्णं ब्रह्मघोषानुनादितम् ॥
suprabhaṃ sānunādaṃ ca supraśastaniveśanam | śūrāḍhyaṃ prājñasaṃpūrṇaṃ brahmaghoṣānunāditam
जो प्रकाशमान और गूँजता हुआ हो, जिसके निवास भली-भाँति बसाए गए हों, जो शूरवीरों से सम्पन्न और विद्वानों से भरा हो, और वेदध्वनि से गूँजता हो,
श्लोक 10 (12.86.10)
समाजोत्सवसंपन्नं सदापूजितदैवतम् । वश्यामात्यबलो राजा तत्पुरं स्वयमाविशेत् ॥
samājotsavasaṃpannaṃ sadāpūjitadaivatam | vaśyāmātyabalo rājā tatpuraṃ svayamāviśet
जो सभाओं और उत्सवों से सम्पन्न हो और जहाँ देवताओं की सदा पूजा होती हो, उस नगर में मन्त्री और सेना को वश में रखने वाला राजा स्वयं प्रवेश करे।
श्लोक 11 (12.86.11)
तत्र कोशं बलं मित्रं व्यवहारं च वर्धयेत् । पुरे जनपदे चैव सर्वदोषान्निवर्तयेत् ॥
tatra kośaṃ balaṃ mitraṃ vyavahāraṃ ca vardhayet | pure janapade caiva sarvadoṣānnivartayet
वहाँ वह कोश, सेना, मित्र और व्यापार बढ़ाए, तथा नगर और जनपद में सब दोषों को दूर करे।
श्लोक 12 (12.86.12)
भाण्डागारायुधागारं प्रयत्नेनाभिवर्धयेत् । निचयान्वर्धयेत्सर्वांस्तथा यन्त्रकटंकटान् ॥
bhāṇḍāgārāyudhāgāraṃ prayatnenābhivardhayet | nicayānvardhayetsarvāṃstathā yantrakaṭaṃkaṭān
वह भण्डारगृह और शस्त्रागार को यत्न से बढ़ाए, सब प्रकार के संचयों को बढ़ाए, तथा यन्त्रों और उनके साधनों को भी।
श्लोक 13 (12.86.13)
काष्ठलोहतुषाङ्गारदारुशृङ्गास्थिवैणवान् । मज्जास्नेहवसाक्षौद्रमौषधग्राममेव च ॥
kāṣṭhalohatuṣāṅgāradāruśṛṅgāsthivaiṇavān | majjāsnehavasākṣaudramauṣadhagrāmameva ca
लकड़ी, लोहा, भूसी, कोयला, काठ, सींग, हड्डी और बाँस; मज्जा, तेल, चर्बी और शहद, और औषधियों का पूरा समूह।
श्लोक 14 (12.86.14)
शणं सर्जरसं धान्यमायुधानि शरांस्तथा । चर्म स्नायुं तथा वेत्रं मुञ्जवल्वजदंध्वनान् ॥
śaṇaṃ sarjarasaṃ dhānyamāyudhāni śarāṃstathā | carma snāyuṃ tathā vetraṃ muñjavalvajadaṃdhvanān
सन, राल, अनाज, शस्त्र और बाण; चमड़ा, स्नायु, बेंत, मूँज और बल्बज घास, तथा नगाड़े जैसे ध्वनि करने वाले वाद्य।
श्लोक 15 (12.86.15)
आशयाश्चोदपानाश्च प्रभूतसलिलाकराः । निरोद्धव्याः सदा राज्ञा क्षीरिणश्च महीरुहाः ॥
āśayāścodapānāśca prabhūtasalilākarāḥ | niroddhavyāḥ sadā rājñā kṣīriṇaśca mahīruhāḥ
जलाशय और कुएँ, जो प्रचुर जल के स्रोत हैं, तथा दूध देने वाले वृक्ष राजा द्वारा सदा सुरक्षित रखे जाने चाहिए।
श्लोक 16 (12.86.16)
सत्कृताश्च प्रयत्नेन आचार्यर्त्विक्पुरोहिताः । महेष्वासाः स्थपतयः सांवत्सरचिकित्सकाः ॥
satkṛtāśca prayatnena ācāryartvikpurohitāḥ | maheṣvāsāḥ sthapatayaḥ sāṃvatsaracikitsakāḥ
आचार्य, ऋत्विज और पुरोहित यत्नपूर्वक सम्मानित हों; इसी प्रकार महान् धनुर्धर, वास्तुकार, ज्योतिषी और वैद्य भी;
श्लोक 17 (12.86.17)
प्राज्ञा मेधाविनो दान्ता दक्षाः शूरा बहुश्रुताः । कुलीनाः सत्वसंपन्ना युक्ताः सर्वेषु कर्मसु ॥
prājñā medhāvino dāntā dakṣāḥ śūrā bahuśrutāḥ | kulīnāḥ satvasaṃpannā yuktāḥ sarveṣu karmasu
जो बुद्धिमान्, मेधावी, संयमी, कुशल, शूर, बहुश्रुत, कुलीन, दृढ़ चरित्र वाले और सब कर्मों में योग्य हों।
श्लोक 18 (12.86.18)
पूजयेद्धार्मिकान्राजा निगृह्णीयादधार्मिकान् । नियुञ्ज्याच्च प्रयत्नेन सर्ववर्णान्स्वकर्मसु ॥
pūjayeddhārmikānrājā nigṛhṇīyādadhārmikān | niyuñjyācca prayatnena sarvavarṇānsvakarmasu
राजा धर्मात्माओं का सम्मान करे, अधर्मियों का निग्रह करे, और यत्न से सब वर्णों को उनके अपने कर्मों में लगाए।
श्लोक 19 (12.86.19)
बाह्यमाभ्यन्तरं चैव पौरजानपदं तथा । चारैः सुविदितं कृत्वा ततः कर्म प्रयोजयेत् ॥
bāhyamābhyantaraṃ caiva paurajānapadaṃ tathā | cāraiḥ suviditaṃ kṛtvā tataḥ karma prayojayet
बाहर और भीतर की बातें तथा नगरवासियों और जनपदवासियों का हाल गुप्तचरों से भलीभाँति जानकर तब वह कार्य आरम्भ करे।
श्लोक 20 (12.86.20)
चरान्मन्त्रं च कोशं च दण्डं चैव विशेषतः । अनुतिष्ठेत्स्वयं राजा सर्वं ह्यत्र प्रतिष्ठितम् ॥
carānmantraṃ ca kośaṃ ca daṇḍaṃ caiva viśeṣataḥ | anutiṣṭhetsvayaṃ rājā sarvaṃ hyatra pratiṣṭhitam
राजा स्वयं विशेष रूप से गुप्तचरों, मन्त्रणा, कोश और सेना का ध्यान रखे, क्योंकि इन्हीं पर सब कुछ टिका है।
श्लोक 21 (12.86.21)
उदासीनारिमित्राणां सर्वमेव चिकीर्षितम् । पुरे जनपदे चैव ज्ञातव्यं चारचक्षुषा ॥
udāsīnārimitrāṇāṃ sarvameva cikīrṣitam | pure janapade caiva jñātavyaṃ cāracakṣuṣā
उदासीन, शत्रु और मित्र राजाओं का जो कुछ करने का विचार है, वह सब नगर और जनपद में गुप्तचर रूपी आँख से जानना चाहिए।
श्लोक 22 (12.86.22)
ततस्तेषां विधातव्यं सर्वमेवाप्रमादतः । भक्तान्पूजयता नित्यं द्विषतश्च निगृह्णता ॥
tatasteṣāṃ vidhātavyaṃ sarvamevāpramādataḥ | bhaktānpūjayatā nityaṃ dviṣataśca nigṛhṇatā
फिर उनके विषय में सब कुछ बिना प्रमाद के करना चाहिए, भक्तों का सदा सम्मान करते हुए और शत्रुओं का निग्रह करते हुए।
श्लोक 23 (12.86.23)
यष्टव्यं क्रतुभिर्नित्यं दातव्यं चाप्यपीडया । प्रजानां रक्षणं कार्यं न कार्यं धर्मबाधकम् ॥
yaṣṭavyaṃ kratubhirnityaṃ dātavyaṃ cāpyapīḍayā | prajānāṃ rakṣaṇaṃ kāryaṃ na kāryaṃ dharmabādhakam
वह सदा यज्ञ करे और किसी को पीड़ा दिए बिना दान दे; प्रजा की रक्षा करे और ऐसा कोई कार्य न करे जो धर्म में बाधक हो।
श्लोक 24 (12.86.24)
कृपणानाथवृद्धानां विधवानां च योषिताम् । योगक्षेमं च वृत्तिं च नित्यमेव प्रकल्पयेत् ॥
kṛpaṇānāthavṛddhānāṃ vidhavānāṃ ca yoṣitām | yogakṣemaṃ ca vṛttiṃ ca nityameva prakalpayet
वह दीनों, अनाथों, वृद्धों, विधवाओं और स्त्रियों के लिए सदा जीविका और योगक्षेम की व्यवस्था करे।
श्लोक 25 (12.86.25)
आश्रमेषु यथाकालं चैलभाजनभोजनम् । सदैवोपहरेद्राजा सत्कृत्याभ्यर्च्य मान्य च ॥
āśrameṣu yathākālaṃ cailabhājanabhojanam | sadaivopaharedrājā satkṛtyābhyarcya mānya ca
आश्रमों में राजा समय पर सदा वस्त्र, पात्र और भोजन भेजता रहे, उनका सत्कार, पूजन और सम्मान करके।
श्लोक 26 (12.86.26)
आत्मानं सर्वकार्याणि तापसे राष्ट्रमेव च । निवेदयेत्प्रयत्नेन तिष्ठेत्प्रह्वश्च सर्वदा ॥
ātmānaṃ sarvakāryāṇi tāpase rāṣṭrameva ca | nivedayetprayatnena tiṣṭhetprahvaśca sarvadā
वह यत्नपूर्वक अपने को, अपने सब कार्यों को और अपने राज्य को तपस्वी को समर्पित करे और सदा विनम्र बना रहे।
श्लोक 27 (12.86.27)
ते कस्यांचिदवस्थायां शरणं शरणार्थिने । राज्ञे दद्युर्यथाकामं तापसाः शंसितव्रताः ॥
te kasyāṃcidavasthāyāṃ śaraṇaṃ śaraṇārthine | rājñe dadyuryathākāmaṃ tāpasāḥ śaṃsitavratāḥ
किसी संकट की अवस्था में प्रशंसित व्रत वाले वे तपस्वी शरण चाहने वाले राजा को इच्छानुसार शरण दें।
श्लोक 28 (12.86.28)
सर्वार्थत्यागिनं राजा कुले जातं बहुश्रुतम् । पूजयेत्तादृशं दृष्ट्वा शयनासनभोजनैः ॥
sarvārthatyāginaṃ rājā kule jātaṃ bahuśrutam | pūjayettādṛśaṃ dṛṣṭvā śayanāsanabhojanaiḥ
जिसने सब कुछ त्याग दिया हो, जो कुलीन और बहुश्रुत हो, ऐसे व्यक्ति को देखकर राजा शय्या, आसन और भोजन से उसका सत्कार करे।
श्लोक 29 (12.86.29)
तस्मिन्कुर्वीत विश्वासं राजा कस्यांचिदापदि । तापसेषु हि विश्वासमपि कुर्वन्ति दस्यवः ॥
tasminkurvīta viśvāsaṃ rājā kasyāṃcidāpadi | tāpaseṣu hi viśvāsamapi kurvanti dasyavaḥ
किसी आपत्ति में राजा उस पर विश्वास करे, क्योंकि डाकू भी तपस्वियों पर विश्वास करते हैं।
श्लोक 30 (12.86.30)
तस्मिन्निधीनादधीत पुनः प्रत्याददीत च । न चाप्यभीक्ष्णं सेवेत भृशं वा प्रतिपूजयेत् ॥
tasminnidhīnādadhīta punaḥ pratyādadīta ca | na cāpyabhīkṣṇaṃ seveta bhṛśaṃ vā pratipūjayet
वह उसके पास धन-निधियाँ रख सकता है और फिर वापस ले सकता है, पर उसके पास बार-बार न जाए और न उसका अत्यधिक सम्मान करे।
श्लोक 31 (12.86.31)
अन्यः कार्यः स्वराष्ट्रेषु परराष्ट्रेषु चापरः । अटवीषु परः कार्यः सामन्तनगरेष्वपि ॥
anyaḥ kāryaḥ svarāṣṭreṣu pararāṣṭreṣu cāparaḥ | aṭavīṣu paraḥ kāryaḥ sāmantanagareṣvapi
ऐसा एक तपस्वी अपने राष्ट्र में, दूसरा शत्रु के राष्ट्रों में, तीसरा वनों में, और चौथा पड़ोसी राजाओं के नगरों में बनाया जाना चाहिए।
श्लोक 32 (12.86.32)
तेषु सत्कारमानाभ्यां संविभागांश्च कारयेत् । परराष्ट्राटवीस्थेषु यथा स्वविषये तथा ॥
teṣu satkāramānābhyāṃ saṃvibhāgāṃśca kārayet | pararāṣṭrāṭavīstheṣu yathā svaviṣaye tathā
शत्रु के राष्ट्रों और वनों में रहने वाले उन तपस्वियों को वैसा ही सत्कार, मान और भाग दिलाए जैसा अपने देश में।
श्लोक 33 (12.86.33)
ते कस्यांचिदवस्थायां शरणं शरणार्थिने । राज्ञे दद्युर्यथाकामं तापसाः संशितव्रताः ॥
te kasyāṃcidavasthāyāṃ śaraṇaṃ śaraṇārthine | rājñe dadyuryathākāmaṃ tāpasāḥ saṃśitavratāḥ
किसी संकट की अवस्था में दृढ़ व्रत वाले वे तपस्वी शरण चाहने वाले राजा को इच्छानुसार शरण दें।
श्लोक 34 (12.86.34)
एष ते लक्षणोद्देशः संक्षेपेण प्रकीर्तितः । यादृशे नगरे राजा स्वयमावस्तुमर्हति ॥
eṣa te lakṣaṇoddeśaḥ saṃkṣepeṇa prakīrtitaḥ | yādṛśe nagare rājā svayamāvastumarhati
यह लक्षणों का संक्षिप्त वर्णन है: जिस प्रकार के नगर में राजा को स्वयं निवास करना चाहिए।